स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – महाराज छत्रपति शिवाजी…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २७४ ☆
☆ महाराज छत्रपति शिवाजी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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अति पराक्रमी चपल गति नीति निपुण गुणवान
छोटे कद के सुगठित, देशभक्त बलवान
धर्म परायण, दयालु पर प्रचण्ड रणधीर
महाराष्ट्र के शिवाजी थे एक वीर महान ।।।।।
रणकौशल में अप्रतिम, सजग, सहित अनुमान
उड़ती चिड़िया के परों की जिनको पहचान
घोड़े की ही पीठ पर बीता जीवन काल
गुरू पूजक यों शिवाजी थे पवित्र इन्सान ।।2।।
थे प्रयास हो संगठित बिखरा हुआ समाज
हो देश में स्थापित पावन हिन्दू राज प्रबल
विदेशी शत्रु का हो मूलोच्छेद भारत में
हो उदित नव सुखकर स्वर्ण विहान ।।3।।
यों थे शिवाजी छत्रपति के शुभ उच्च विचार
पूरी होती चाह तो होता कुछ संसार।
आज कार्य के नाम पर होते जो उत्पात
कहीं न होते होता तब जन-जीवन आसान ।।4।।
सामाजिक व्यवहार में जो थे सहज उदार
राजनीति में नीति का जिसने किया विचार।
जिसके हर व्यवहार की छवि अब भी है आदर्श
ऐसे व्यक्ति महान का करते हम यशगान ।।5।।
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© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी भोपाल ४६२०२३
मो. 9425484452
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






