श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४० ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
बेलखेड़ी से गंगई 07 नवम्बर.2019
सुबह एक-एक गिलास दूध पीकर आठ बजे बेलखेड़ी गाँव से नर्मदा की गोदी में उतर कर चल पड़े। रास्ता बड़ा कठिन था, किसानों ने खेतों को गोड़ दिया है या फ़सल बोकर स्प्रिंकलर चलने के कारण रास्ते पर कीचड़ हो जाने से जूतों में दो-दो किलो मिट्टी चिपकने से चलना दूभर था। बड़ी मुश्किल से रुक-रुक कर चलते रहे। नर्मदा के अति सुंदर नज़ारे आँखों और मोबाईल में क़ैद होने लगे। क़रीबन तीन बजे धुरन्धर बाबा के आश्रम में पहुँचे। धुरन्धर बाबा बिहार से आकर नर्मदा के किनारे एक पहाड़ी पर आश्रम बनाकर रहने लगे हैं। गाँजे की पत्ती और चाय उनका भोजन है। एक बार सरकारी आबकारी विभाग ने धुरन्धर बाबा को गाँजे के पौधे साक्ष्य स्वरुप लेकर नरसिंहपुर कलेक्टर के सामने पेश किया। धुरन्धर बाबा ने दलील दी कि गाँजे की पत्तियाँ मेरा भोजन है, नहीं खाऊँगा तो मर जाऊँगा और हत्या का आरोप आपके माथे पर आएगा। कलेक्टर साहब ने आबकारी अधिकारी को धुरन्धर बाबा की पेशकारी पर डाँट पिलाई। उस दिन के बाद धुरन्धर बाबा निर्विघ्न गाँजे की खेती करके पत्तियों के भोजन और चाय सेवन से ज़िंदा हैं। उनके बाल दस फ़ुट लम्बे हैं, बाबा का कहना है कि जिन लड़कियों या औरतों को केश की लम्बाई बढ़ानी है वे गाँजे की पत्तियों का नियमित सेवन करें। बाबा मज़बूत पाए के काऊच पर आसन जमाए गाँजा रगड़ते और बाँटते हैं उनके पास आठ-दस कुत्ते पले हैं जिनको भी गाँजे के धुएँ और पत्तियों के सेवन की आदत पड़ गई है। पहले हमारा साबका उनके एक धूर्त सेवक से हुआ, जो खींसे निपोरकर किसी भी बात का मुंडी हिलाकर जबाव देता था। पहले बोला आश्रम में दाल-चावल भर हैं। रात में केवल दाल-चावल खाने से रात में बार-बार पेशाब से नींद टूटती है और अच्छी नींद नहीं होने से शरीर टूटने लगता है जबकि हमें रोज़ दस किलोमीटर चलना होता है। हम अरुण भाई के साथ गाँव से आलू, भटे और टमाटर ख़रीद लाए तो वह बोला आपही बना लो, जब धुरन्धर बाबा को पता चला तो उन्होंने स्वयं सब्ज़ी और आठ चपाती के बराबर एक 10-12 मिलीमीटर मोटाई का एक-एक टिक्क बनाकर परसा जिसे मुश्किल से खपा पाए।
परिक्रमा के दौरान एक बात पता चली कि संगीन अपराधी बाबा का चोला रखकर परिक्रमा करते रहते हैं। कोई भी परिक्रमा वासी सात दिन एक आश्रम में खाने, पीने और रहने की सहूलियत पा सकता है। वह हर सात दिन में जगह बदलकर पुलिस को चकमा देते रह सकता है, वैसे भी एक थाना क्षेत्र की पुलिस दूसरे क्षेत्र में दख़लंदाज़ी नहीं करती है। एक अनुमान के अनुसार तीन-चार हज़ार से अधिक आश्रम नर्मदा किनारे हैं, जहाँ अपराधी शरण पाते रह सकते हैं। साधु सन्यास लेते समय नाम बदल लेते हैं, तो वे लोग भी नाम बदल लेते हैं। उनसे नाम पता पूछो तो घुमा फिराकर इधर उधर की बात से भरमा देते हैं जैसे :-
नाम न पूछो साधु का पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।
सुबह-शाम धुरन्धर बाबा के शिष्य नियम से गाँजे की चिलम खींचने आते हैं। दरबार में काऊच पर बाबा के आसन के सामने लम्बी चौड़ी दरी पर शिष्यों का चिलम का दौर रामचरितमानस के किष्किन्धा कांड और सुंदर काण्ड के प्रवचन की सी डी पर चलता रहता है।
जबलपुर-इटारसी रेल खंड स्टेशनों की दूरी नर्मदा किनारों से दस से बीस किलोमीटर है। मुख्य सड़क भी कमोवेश उतनी ही दूरी पर है इसलिए वायु, जल प्रदूषण नहीं है, पेड़ों और गन्ने के खेतों की सघन हरियाली से सूर्य की किरणें ज़मीन में जज़्ब होने से वातावरण गर्म नहीं होता है। जबकि शहरों के कांकरीट जंगल भट्टी की तरह झुलसते हैं। अनाज सागभाजी और भरपूर दूध दही मक्खन सेवन से लोग मेहनतकश और स्वस्थ रहते हैं जबकि शहरों में विलासिता पूर्ण जीवन के आदी लोग दवाइयों के भरोसे ज़िंदा रहने के अभ्यासी हो गए हैं। गांधी जी का ग्रामीण परिवेश को स्वावलम्बी बनाने का उद्देश्य था कि स्थानीय कुशल कारीगर ज़रूरत की चीज़ें स्थानीय स्तर पर पैदा करें लेकिन निज़ाम ने उन्हे शहरी कारख़ानों का उपभोक्ता बना छोड़ा है। गांधी जी के सिद्धांत पर भूटान आर्थिक नीतियों को अमल में लाकर ख़ुशहाली इण्डेक्स में पहली पाँच श्रेणी में स्थान पाता है। भारत में शहर प्रदूषण के अड्डे बन गए हैं। गाँव के मेहनतकश लोग सुबह और शाम दो बार भोजन करते हैं जबकि उन्हें दिन भर ऊर्जा हेतु ग्लूकोज़ की दरकार होती है। नरसिंहपुर जिले में सर्वाधिक फ़सल गन्ने की होती है इसलिए चाय-दूध में बहुत अधिक शक्कर डालने का रिवाज बन गया है ताकि उनकी ग्लूकोज़ की भरपाई होती रहे। खेती में मशीनीकरण के कारण समृद्ध किसान डायबिटीज़ और हृदय रोग के शिकार होना शुरू हो गए हैं। धुरन्धर बाबा के आश्रम में तार पर सूखने डाले, चड्डी और बानियान छूट गए और बेलखेड़ी में चार्जर जल गया, जबलपुर से अविनाश दवे आगे साँकल घाट पर यात्रा में जुड़ने वाले थे अतः दोनों चीजें लाने हेतु उन्हें फ़ोन कर दिया।
गंगई से ब्रह्म कुण्ड 08 नवम्बर 2019
हमारी परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की लालसा से नहीं की जा रही है अपितु हिंदू जिज्ञासुओं की एक सांस्कृतिक परिक्रमा है जिसका उद्देश्य परिक्रमा की भावना, क्षेत्र, विस्तार और लक्ष्य की सीधी जानकारी लेना है ताकि उन्हें भावी पीढ़ी के लिए संजो कर रखा जा सके।
शाहपुरा-भिटौनी के मनकेडी गाँव से दो व्यक्तियों ने आज ब्रह्मकुण्ड घाट से विधिवत अखंड परिक्रमा ऊठाई है। उनका कहना था कि बेटी का हाथ बंदर ने चबा लिया था उसे डाक्टर ठीक न कर सके नर्मदा मैया ने दर्शन देकर उसे आशीर्वाद दिया और बेटी का हाथ ठीक हो गया। दूसरे ने घरेलू वाद-विवाद से मुक्ति हेतु परिक्रमा व्रत लिया है। वे भिक्षा में सीधा लेकर भोजन बनाते हैं और अतिरिक्त सामग्री दान कर देते हैं। प्रतिदिन पाँच घर भिक्षा माँगते हैं। समान्यत: लोग पाप मुक्ति, मान्यता या स्वर्ग कामना से परिक्रमा करते है। उन्हें आस्था का संबल खींचता है। हमारे जैसे बिना किसी कामना के अमृत लाल बेगड़ जैसे बहुत कम लोग इस अत्यंत दुरुह यात्रा पर निकलते है।
कुछ साम्यवादी हिंदू पौराणिक शास्त्रों को बकवास और धर्म को जनता की अफ़ीम बताते हैं लेकिन उनके रूसी आका येरूसलम, कन्नांन, हारान को पवित्र भूमि और पुराना नियम को इतिहास बताकर ख़ुश होते हैं। यहूदियों ने अपनी किताबों और सिद्धांतों व विचारधारा से 2500 सालों बाद इज़राइल पाकर उसे सशक्त आधुनिक राष्ट्र बनाया। हिंदुओं के पुराणों में नर्मदा के जिन घाटों, ऋषि-मुनियों और आध्यात्मिक सिद्धांतों का उल्लेख है, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं उन जगहों की जानकारी लिपिबद्ध करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। ज़रा सोचिए, लोगों से तथाकथित अफ़ीम छुड़ा ली जाए तो उनके पास जीवन की विद्रुपता से निपटने हेतु सिवाय शराब और सेक्स के क्या बचेगा।
सभी धर्मों के प्राचीन ग्रंथ बड़े बेतरतीबी से लिखे या संग्रहित किए गए हैं। जिस समय वे लिखे जा रहे थे उस समय पुस्तकें लिखने की कला विकसित नहीं हुई थी। सौ या दो सौ सालों तक उनका संकलन होता रहता था फिर एक, दो, तीन या चार संगिति में सम्बंधित धर्म के विद्वान उसे अंतिम स्वरुप देते थे। बाइबिल, क़ुरान, बुध्यचर्या और गुरुग्रंथ सहित समस्त पुराण इसी तरह संकलित हुए हैं। समय-समय पर उन्हें अद्यतन किया जाता रहा है, जैसे विकीपीडिया में जो जब चाहे कुछ भी जोड़ सकता है, अतः उनमें बुद्धिगम्य तार्किकता पूर्ण संदेश ढूंढ़ना मृग मरिचिका के सिवाय कुछ नहीं है लेकिन एक बात ज़रूर सही है कि सम्बंधित धर्मों के मूलभूत सिद्धांत उन बेतरतीब शास्त्रों में आस्था पूर्वक पिरोए गए हैं इसीलिए वे ग्रंथ उनके अनुयायियों के लिए पूजनीय हैं। उनमें से काम की चीज़ लेकर बाक़ी छोड़ दीजिए।
जड़ चेतन गुण दोष मय विश्व कीन्ह करतार
संत हंस गुण पय लहहीं छोड़ वारी विकार।
हिंदुओं के 4 वेद, 18 पुराण और 108 उपनिषद 1194 में मुहम्मद गौरी से लेकर 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने तक 600 साल इस्लामिक अत्याचार से बचते-बचाते उपेक्षित रहे हालाँकि वे शास्त्र आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं सदी में देश के चार धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों, बावन स्थापित शक्तिपीठों और नर्मदा किनारे भेड़ाघाट से भंडोंच तक अनेकों ऋषि आश्रमों में सुरक्षित रखे रहे। सोमनाथ, उज्जैन, मथुरा और काशी में मंदिर-मूर्तियाँ तोड़कर ग्रंथ जलाए गए लेकिन सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच वनाच्छादित घने बियाबांन जंगलों में 1300 से अधिक किलोमीटर लम्बी नर्मदा के घाटों में सुरक्षित रहे। ऋषि-मुनि उन्हें ढोकर परिक्रमा करते श्रुति और स्मृति में ज़िंदा रखे रहे। 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में एक व्यक्ति विलियम जोंस न्यायाधीश बनकर आए, उन्होंने देखा कि हिंदुओं का न्याय भी मुस्लिम शरीयत से होता है, जिसके कारण उनके साथ अन्याय बरता जाता है। उन्होंने संस्कृत पढ़कर हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से हिंदू न्याय सिद्धांतों को जानना चाहा तो कोई उन्हें संस्कृत पढ़ाने वाला न मिला। अंत में काशी का एक ब्राह्मण माँस-मदिरा त्याग कर हिंदू पद्धति से रहने की शर्त पर उन्हें हिंदू दर्शन व धार्मिक शास्त्रों के अध्ययन कराने को तैयार हुआ। उन्होंने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। तब पश्चिमी दुनिया उन्हें पढ़कर चौंक गई। विवेकानंद ने प्रेसीडेंसी कालेज में वेदान्त का अंग्रेज़ी भाष्य उनके अनुवाद से पढ़कर शिकागो का प्रसिद्ध वक्तव्य दिया था। तथाकथित खंडित बुद्धिजीवी इन्हें बकवास मानते हैं लेकिन घरों में उन्ही पौराणिक पात्रों को घंटी बजाकर पूजते हैं।
सनातन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अमरकण्टक से नेमावर के बहाव को देवी नर्मदा की देह का ऊपर का हिस्सा माना जाता है, तदानुसार नेमावर नाभिकुंड है। नेमावर को विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मस्थान माना जाता है। इसका मतलब हुआ कि ऋषि जमदग्नि और रेणुका का आश्रम नेमावर में रहा होगा। भृगु, मार्कंडे, वशिष्ठ, कौंडिल्य, पिप्पल, कर्दम, सनत्कुमार अत्रि नचिकेता, कश्यप, कपिल जैसे अनेकों सनातन ऋषियों के आश्रम भेड़ाघाट से नेमावर के बीच रहे हैं जहाँ वेदों का पठन-पाठन, उपनिषद, अरण्यकों, ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों के साथ स्मृतियों का लेखन कार्य उन ऋषि आश्रमों में हुआ है।
आर्य-अनार्य सिद्धांत को ठीक माने तो आर्यों के आगमन के बाद से अनार्य याने असुर विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के बीच सघन जंगलों में प्रवाहित सदानीरा नर्मदा के दोनों किनारों बस गए थे। उत्तर भारत का इलाक़ा उन्होंने आर्यों के लिए छोड़ दिया था। नरसिंहपुर के नृसिंह मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति प्रह्लाद ने स्थापित की होगी। इसी क्षेत्र में हिरण्यकश्यप का राज्य था, शोणितपुर अर्थात वर्तमान सोहागपुर में प्रह्लाद के पोते बाणासुर की राजधानी थी। प्रह्लाद की एक बहन के पुत्र असुरों के गुरु शुक्राचार्य का आश्रम विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के घने वन क्षेत्र में था यहाँ की जड़ीबूटियों के रसायन से उन्होंने अमृत संजीवनी तैयार की थी जिसे अर्जित करने हेतु देवताओं के राजा इंद्र ने गुरु पुत्र कछ को भेजा था। इसी क्षेत्र में उसका प्रेम प्रसंग शुक्राचार्य पुत्री देवयानी से हुआ था। देवासुर संग्राम के पूर्व देवताओं ने ब्रह्मकुण्ड में शिव आराधना की थी। गराडू घाट पर गरूँड़ ने युद्ध काल में तपस्या की थी। नर्मदा की परिक्रमा में इन सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा हो जाती है। जयचंद विद्यालंकार के कालबद्ध पौराणिक इतिहास लेखन के बाद से पौराणिक साहित्य को हिंदुओं का ऐतिहासिक साहित्य माना जाने लगा है। नर्मदा घाटी का भेड़ाघाट से नेमावर का क्षेत्र देव-असुर संग्राम का साक्षी रहा है। स्कन्द पुराण के रचयिता वेद व्यास ने कार्तिकेय अर्थात शिवपुत्र स्कन्द के नाम पर यह यह ग्रंथ संकलित किया था। स्कन्द द्वारा तारकासुर असुर का वध का साक्षी भी यही स्थल रहा है। भगवान शिव संहार के देवता हैं। उनका पुत्र कार्तिकेय संहारक शस्त्र अथवा शक्ति के रूप में जाना जाता है। तारकासुर का वध करने के लिए ही स्कन्द का जन्म हुआ था। कार्तिक माह की ग्यारस के चमकते चाँद की गवाही में इस पौराणिक स्थान का आनंद लिया। स्कंद का एक नाम कार्तिकेय है, कार्तिक मास की पूर्णिमा को नर्मदा के दोनों तटों के हज़ारों घाटों पर भरने वाले मेलों में करोड़ों लोग डुबकी लगाकर पुण्य सहेजते हैं।
हमारी पग-पग यात्रा नर्मदा की कल-कल संगीतमयी सरगम की धुनों पर परवान चढ़ रही थी, धुरन्धर बाबा के आश्रम से उसमें एक नया राग “फूफा-राग” जुड़ गया। यह जनमासा ठाट का दिन के चौथे-पाँचवें पहर में बजाया जाने वाला राग है, इसका आरोह-अवरोह अरुण भाई ने उस समय ईजाद किया था जब जगमोहन भाई ने धुरन्धर बाबा के एक अकड़ूँ चेले की ऐसी तेसी कर दी थी जैसा कि बारातों में दुल्हा के फूफा करते हैं। यह गंगई घराने का राग है जो शाम की उदासी या रात के पहले प्रहर के सन्नाटे और लस्तपस्त शरीरों में जान फूँकने के लिए अरुण भाई द्वारा छेड़ा जाता था, हम तबले पर तीन ताल मे संगत करते थे। फूफा पहले हल्के से गुर्रा कर ता.. थई… ताता… थई पर कत्थक के घुँघरू दार क़दम ताल चलते हुए हल्का चक्कर लेते-लेते तांडव पर उतर आते तब फूफा के रौद्र रूप से समूह को साँप सूंघ जाता। इस प्रकार नीरसता में रस तलाशती यात्रा हमारी यादों की तिजौरी में जमा होती मूल्यवान सम्पत्ति है।
गंगई से ब्रह्मकुंड तक की यात्रा अबतक की सबसे दुरुह पदयात्रा थी। रास्ता बहुत ख़राब कही कीचड़, कहीं नुकीले पत्थर, कहीं रेतीले और कहीं कटे किनारे जानलेवा हो सकते थे। सुबह आठ बजे आश्रम के स्वामी धुरंधर बाबा से विदा लेकर नर्मदा किनारे-किनारे चल पड़े। क़रीबन तीन किलोमीटर चलकर मुआर घाट पहुँचे, मान्यता है कि दुर्गा देवी ने भैंसासुर का वध इसी घाट पर किया था। इसकी प्रबल सम्भावना है कि आर्य-अनार्य संघर्ष सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच प्रवाहमान नर्मदा के दस से बीस किलोमीटर मैदान में हुआ हो वही घटना पुराणों में देवासुर संग्राम के रूप में वर्णित है क्योंकि आर्यों से अलग माने जाने वाली गौंड, भील, कोरकू प्रजातियां अभी भी वहाँ निवास करती हैं। उस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारस थी। घाट पर स्नान चल रहा था, हम सभी ने भी स्नान किए और कुछ चना-चबैना ग्रहण किया। घाट पर चार व्यक्ति अखंड परिक्रमा उठा रहे थे उनके परिजन उन्हें विदाई देने आए थे। आज कई लोग दोनों किनारे के घाटों से परिक्रमा उठा रहे थे। कुछ पंचकोशी परिक्रमा उठा रहे थे। शाम के चार बजे तक सफ़ेद कपड़ों में क़तारबद्ध होकर परिक्रमा वासी चल पड़े, नर्मदा के सौंदर्य में चार चाँद लग गए।
ब्रह्म कुण्ड में सीधी चढ़ाई चढ़कर धर्मशाला पहुँचे वहाँ एक 93 वर्षीय बुज़ुर्ग अपनी लक्वाग्रस्त पत्नी सहित मिले, वे बड़ी आत्मीयता से पत्नी सेवा में रत हैं। पहले हमने जहाँ ठिकाना बनाया वहाँ रोशनी की व्यवस्था नहीं होने से उनके दालान में ठिकाना जमाया, वे भोजन सामग्री देने को तत्पर थे बनाना हमें था परंतु थकान से शरीर टूट रहे थे। एक पंडित जी के घर से तीस रोटी और आलू की सब्ज़ी का ठेका तीन सौ रुपयों में तय हुआ और सुबह से पड़े ख़ाली पेट भर गए। एक असहाय बूढ़ी माँ विक्षिप्त अवस्था में आकाश के नीचे खुले में सो रही थी, आश्रम सेवक से पूछा तो पता चला वह बिस्तर में शरीर की सारी गंदगी फैलाकर बदबू फैलाती है इसलिए आग जलाकर बाहर सोती है। सुबह मुंशीलाल जी ने अपना शाल, इनर, चादर, दरी और मोज़े उस असहाय को दान कर दिए। मुंशीलाल एक-एक करके कपड़े देते जा रहे थे वह ख़ुश होकर आशीर्वाद बरसा रही थी, बड़ा मार्मिक दृश्य था।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






