डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “साजिश…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८
कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
फन कुचल दो वरना वो तुम्हें ही डसेगा
चूके अगर ज़रा कहीं,वो तुमपे हँसेगा
=2=
दोगे आस्तीन में पनाह ग़र उसे
हौले-हौले अपना वो शिकंजा कसेगा
=3=
जाल जो बिछायेगा दूजों के वास्ते
अपनी रची साजिशों में ख़ुद ही फंसेगा
=4=
सोचा न था इक दिन मेरे कलेजे का टुकड़ा
रोजी के वास्ते कहीं जा दूर बसेगा
=5=
‘राजेश’ जिसकी फ़ितरतें हैं टाँग अड़ाना
देखना महफ़िल में वो ज़बरन आ ठसेगा
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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