श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अनाथ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ ☆
☔ लघुकथा ☔ अनाथ ☔
पारंपरिक रूप से त्योहार मनाना, उसे उत्साह उमंग उल्लास के साथ मिलबाँट कर सहेजना प्रेम, प्यार, सौहार्द की भावना को बढ़ते देखना सभी को अच्छा लगता है।
आज मानसी के ह्दय में उथल- पुथल मची थी कि रक्षाबंधन तो आया पर क्या? राखी का प्यार विश्वास भैया निभा पाया या वह स्वयं निभा सकी।
आसपास की बातें सुनने और घर में सिर्फ औपचारिकता से राखी बंधवाने का मतलब, अब उसे लगने लगा कि रक्षाबंधन अब एक मानसिक बंधन होने लगा है। भौहें-चढ़ाना, आँखे ततेरना, हर बात पर छींटाकशी और सिर्फ मै मेरा!! तू तेरा।
वह उठी पूजा की थाल लिए घर के मंदिर में दीपक जला, भारी मन से प्रार्थना करने लगी – – – प्रभु मुझे अगले जनम अनाथ बना देना। कम से कम सामाजिक दानदाताओं और चेरिटी वाले कृतज्ञता कातर दृष्टि से ही सही एक दिन का तो परिवार मिल जाता है।
पीछे से भाई की आवाज आई रहने दो—मै अभी जा रहा हूँ!! बाद में आऊंगा तो देखते है।
मानसी राखी की डोरी लिए माँ की तरफ देखने लगी। बंधन ही तो है – – – – तू कान्हा जी को बाँध ले! बिटिया माँ ने रुंधे गले से आवाज लगाई।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






