डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ सच्ची पूजा ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“माँ, चार धाम करके आया हूँ।”
“अच्छा! मन शांत हुआ?”
“बहुत। भगवान खुश हो गए होंगे।”
माँ मुस्कुराई, “पक्का?”
“क्यों?”
“कल शर्मा जी का दिल क्यों दुखाया?”
“वो गलत बोल रहे थे।”
“बहू से भी नाराज़ थे?”
“हाँ… थोड़ा।”
माँ चुप रही।
“क्या हुआ?”
“मंदिर में भगवान को खुश करते हो…”
“तो?”
“घर में इंसानों को क्यों दुख देते हो?”
वह चुप हो गया।
“माँ, पूजा-पाठ तो जरूरी है।”
“बिल्कुल।”
“फिर?”
“भगवान के घर हिसाब भी तो होगा।”
“कैसा हिसाब?”
माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा-
“कितनी बार मंदिर गए, ये नहीं…
तुम्हारी वजह से कितने दिल रोए, ये गिना जाएगा।”
वह सिर झुका गया।
माँ ने बस इतना कहा-
“भगवान को ढूँढ़ने से पहले, इंसान को मत खोना।”
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




