श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बालकनी।)
☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
“माँ, सामने वाले अंकल रोज यहाँ क्यों बैठे रहते हैं?”
“शायद किसी का इंतज़ार करते हैं।”
“आपको कैसे पता?”
सुधा मुस्कुराई, “क्योंकि कभी तुम्हारे पापा भी ऐसे ही मेरा इंतज़ार किया करते थे।”
अंशु कुछ कहता, उससे पहले ही नीचे ब्रेक लगने की तेज आवाज गूँजी।
एक बाइक फिसली। युवक उछलकर सड़क पर गिरा। हेलमेट दूर जा छिटका।
“माँ!”
अंशु रेलिंग पकड़कर नीचे झुक गया।
सुधा के हाथ काँपने लगे। आँखों के सामने वही दृश्य कौंध गया—सड़क पर पड़ी कार, टूटे शीशे और अस्पताल से आया वह एक वाक्य—
“मैडम, इन्हें बचाया नहीं जा सका।”
विवेक की मौत को वर्षों बीत चुके थे, मगर उस एक क्षण ने समय को फिर वहीं रोक दिया था।
“माँ, कुछ हुआ तो नहीं?”
सुधा ने बेटे का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“नहीं… आज बस एक पुराना हादसा सामने आ गया।”
नीचे लोग घायल युवक को उठाकर अस्पताल ले जाने लगे।
अंशु ने धीरे से पूछा, “पापा भी ऐसे ही गए थे?”
सुधा ने सिर हिलाया।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर अंशु बोला, “माँ, आप फिर भी यहाँ क्यों आती हैं?”
सुधा ने सामने देखा।
“क्योंकि तुम्हारे पापा ने यहीं से मुझे पहली बार देखा था… और मैंने यहीं से उन्हें।”
अंशु ने माँ का हाथ थाम लिया।
सुधा ने गहरी साँस ली।
एक क्षण ने आज किसी अजनबी को सड़क पर गिराया था और वर्षों पहले उसी तरह के एक क्षण ने उससे उसका अपना संसार छीन लिया था।
वह धीरे से भीतर चली गई।
पीछे रह गई शाम, सड़क और वह जगह—जहाँ एक नजर ने जीवन दिया था और एक हादसे ने उसे छीन लिया था।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




