डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है एक विचारणीय एवं सार्थक लघुकथा  ग्रहण । )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 53 ☆

☆ लघुकथा दिवस विशेष – ग्रहण ☆  

इस वर्ष की पदोन्नति सूची आने में अभी एक दिन शेष था, इसके पूर्व ही रामदीन को मित्रों से बधाईयां मिलने लगी थी। यहाँ तक कि, उसके निकटस्थ अधिकारी तिवारी जी से भी प्रमोशन की पुष्टि के साथ उसे अग्रिम बधाई मिल गई थी।

परन्तु यह क्या —–? आज घोषित पदोन्नति  सूची में शुरू से अंत तक रामदीन का कहीं भी नाम नहीं था।

खिन्न मन से अधिकारी तिवारी जी के केबिन में जा कर उनसे पूछा—–

“सर, आपने तो कल ही मुझे बधाई दे दी थी, फिर ये कैसे हो गया! क्या आपने भी दूसरों की देखा-देखी अनुमान के आधार पर बधाई दी थी?”

“नहीं रामदीन! ये कैसे हो गया, मैं भी यही सोच रहा हूँ। कल सूची में मैंने स्वयं तुम्हारा नाम देखा था। रात्रि साढ़े नौ बजे तक मैं महाप्रबंधक जी के कक्ष में था, –  तब भी वही प्रमोशन लिस्ट हमे दिखाई गई थी। पता नहीं इसके बाद किस कारण से तुम्हारा नाम हटाया गया। अचम्भित हूँ मैं भी।”

हताश, रामदीन कारण जानने हेतु हिम्मत कर महाप्रबंधक के पास पहुंचा,——-

“मान्यवर जी—-! मैं जानना चाहता हूँ कि, पात्रता के बावजूद मुझे अयोग्य क्यों समझा गया,यदि आप मेरी कमियाँ बता सकें तो आगे मैं उन्हें सुधारने की कोशिश करूंगा।”

“नहीं रामदीन! — तुममें कोई कमी नहीं है। तुम हर प्रकार से योग्य हो, किन्तु हुआ यह कि, हमारी पदोन्नति सूचि में शासन के नियमानुसार आरक्षित वर्ग की एक संख्या कम रह जाने की भूल के चलते ऊपर से आदेश हुआ था, सूची में एक आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को अनिवार्य रूप से शामिल करने का।”

“पर तुम चिंता नहीं करो रामदीन! अगले वर्ष के लिए अभी से तुम्हारा प्रमोशन पक्का है।”

“किन्तु श्रीमान जी—- मेरा ही नाम क्यों काटा गया? सूची में मुझसे कमतर और नाम भी तो थे। और फिर मेरे बदले में जिसे आपने पदोन्नति दी है उसके विषय में भी आप भलीभांति परीचित हैं।”

“हाँ रामदीन, —सब कुछ जानते हुए भी विवश हैं हम। और तुम्हारा ही नाम क्यों!   तो सुनो एक उदाहरण से—— यह एक सर्वविदित तथ्य है जिसे सब जानते हैं, और तुम भी, कि, कुल्हाड़ी लिए लकड़हारा जब जंगल मे घुसता है तो आड़े-टेढ़े व असामान्य बांसोंसे अपने को बचाते हुए जो सब से सीधा और सही बांस दिखता है, वह उसी पर कुल्हाड़ी से वार करता है। समझ रहे हो न रामदीन तुम, मेरे कहने का आशय?”

“जी मान्यवर,— समझ रहा हूँ और शायद नहीं भी।”

“नहीं भी से क्या तात्पर्य है तुम्हारा?” महाप्रबंधक ने उत्सुकता से पूछा।

“मान्यवर—! कटने के बाद भी ‘सीधे बांस’ की उपयोगिता कहाँ-कहाँ और क्या-क्या होती है इससे तो आप कदापि अनभिज्ञ नहीं होंगे।”

“वही आड़े-टेढ़े बांस “मौसम परिवर्तन”के साथ ही आपस मे टकराते हुए जल कर राख हो जाते हैं, या सूख कर वहीं ठूंठ बने इधर-उधर से थपेड़े खाते रहते हैं।”

महाप्रबंधक जी निरुत्तर हो,अपने दाएं-बाएं झांकने लगे।

झूठ की इस जंग में हार कर भी रामदीन विजयी मुस्कान के साथ अपने कार्यस्थल की और लौट रहा था।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

12/06/2020

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

Please share your Post !

Shares
1 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Shyam Khaparde
0

अच्छी रचना