श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता रिश्तों की हवेली

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 7 – याद ☆

 

माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची अक्सर याद आते हैं,

मायूस ऑंखें मजबूर हो सबको दुनिया से विदा होते देखती रह गयी ||

 

याद कर सबको बरबस आँखों से हर कभी आंसू निकल आते हैं,

दिल में ख्याल आता है सेवा में हमसे बहुत कमी रह गयी थी||

 

थोड़ी सेवा और कर लेते, ना करने की भी कोई मजबूरी ना थी,

काश! इलाज और करा लेते, पैसे की भी कोई कमी ना थी ||

 

मगर ये सब बातें अब अक्सर रोज दिल को कचोटती है,

माफ़ करना ऐसा कुछ ना करने की कोई भावना हमारी नहीं थी ||

 

आप सबसे एक ही विनती, माफ़ी स्वीकार कर लीजिए हमारी,

चाहे जो सजा दे देना पर चरणों में अपने ही हमें जगह देना ||

 

हम अंश आपके बुद्धिहीन नादान, माफ़ी के हरगिज नहीं हकदार,

रह गयी बहुत सेवा में कमी, नादान समझ हमें माफ़ कर देना ||

 

ना जाने सांसरिक जीवन में क्यों ऐसी कमियां रह जाती,

हाथ जोड़ विनती करते,  हम भटकों को सही राह दिखा देना ||

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002

Please share your Post !

Shares
2.7 3 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

2 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Shyam Khaparde
0

अच्छी रचना

प्रहलाद
0

जी धन्यवाद।