श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी – “मगर और मछली”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆
☆ बाल कहानी – मगर और मछली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
होशियार पुर गांव के पास एक नदी थी. उस में एक मछली रहती थी. उस का नाम मीना था. वह बहुत होशियार व चंचल थी. उस नदी में एक मगर आ गया. वह मछलियों को मार कर खाने लगा.
यह देख कर मीना की मां ने कहा, ” मीना ! तुम मगर से होशियार रहना. वह बहुत दुष्ट है.”
” ठीक है मां, ” मीना ने कहा और वह नदी की लहरें से खेलने चली गई.
दुष्ट मगर वही बैठा था. उस मीना बहुत अच्छी लगी. उस ने सोचा,’ यह बहुत प्यारी मछली है. यदि इसे मार कर खा लिया जाए तो यह बहुत स्वादिष्ट लगेगी.’ यह सोच कर दुष्ट मगर उस के पीछे पड़ गया.
मीना सतर्क थी. जब उस ने मगर को अपने पीछे आता देखा तो भागी. वह घबरा गई थी. फिर उस ने सोचा कि घबराने से काम नहीं चलेगा. उसे हिम्मत से काम लेना होगा. यह सोच कर उस ने अपने दिमाग को शांत किया.
तब उसे याद आया कि वही पास में नदी में एक चट्टान के नीचे गुफा है. उसी की तरफ दौड़ लगाई जाए. वह तेजी से उस ओर भागी. मगर, उस के पीछे हो लिया.
अब आगेआगे मीना तैर रही थी, पीछेपीछे मगर. मगर, मीना छोटी थी. वह तेजी से तैर नहीं पा रही थी. मगर, उस के पास तेजी से आ गया.
तभी मीना पलटी. वह दो चट्टानों के पास से गुजरी.
गुफा पास ही थी. उसे शरारत सूझी. उस ने मगर को छेड़ा, ” क्यों मामा ! तैरना नहीं आता है. या मुझे मार कर खाने की इच्छा नहीं है.”
मगर, यह सुन कर चौंका. मछली की इतनी हिम्मत. वह मगर को चुनौती दे. इसलिए वह उस के पीछे तेजी से भागा. अब मीना बहुत पास थी. वह चिल्लाई, ” पकड़ो मामा !”
मगर, ने अपना मुंह बढ़ाया. मगर, यह क्या ? वह दो चट्टानों के बीच फंस गया था.
” डर गए मामाजी !” मीना ने मगर को चिढ़ाया, ” क्या सारी ताकत खत्म हो गई है ?”
मगर को गुस्सा आ गया. वह तेजी से हाथपैर से जोर लगा कर आगे बढ़ा. वह जितना आगे बढ़ता गया, उतना चट्टानों के बीच फंसता चला गया. जब वह निकल नहीं पाया तब उस के समझ में आया कि एक छोटीसी समझदार मछली ने उसे चट्टानों के बीच फंसा दिया था.
वह उस चट्टानों के बीच फंसा हुआ भूख से मर गया.
इस तरह समझदार मीना ने दुष्ट मगर से छुटकारा पा लिया.
© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
06/03/2017
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