श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिंदूर की महिमा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 ☆
🌻लघु कथा🌻सिंदूर की महिमा 🌻
कालेज का अंतिम वर्ष हॉस्टल में रेखा बहुत परेशान रहती थी।
रोज-रोज की चिंता, मनचले युवाओं की छींटाकसी से वह परेशान हो चुकी थी। इस बार घर जाऊगीं, तो लौटकर नहीं आऊंगी।
लेकिन रेखा जब आज लौटकर हॉस्टल आई तो सिंदूर भरी हुई मांग को देखकर, बाकी सब छात्राएं बोलने लगी – – – – क्या बात है बहुत छुपी हुई रुस्तम निकली, शादी कर ली बताया तक नहीं।
रेखा बहुत सुंदर शरमाते हुए मुस्कुरा कर बोली— गाँव में तो ऐसा ही होता है। माँ-बाप पसंद से शादी ब्याह करा देते हैं।
हॉस्टल से सभी बातें करते-करते कॉलेज चली जा रही थी। आज रेखा सबसे आगे बड़ी निडर होकर चल रही थी। न जाने कहाँ से उसके मन में यह भावना आ गई थी।
सभी छात्राएं कहने लगी– सच में शादी के बाद तो रेखा बहुत होशियार और निडर हो गई। अब तो हमें भी घर में मम्मी-पापा जो कहेंगे तैयार हो जाएंगे।
पलड़ा भारी होते देख, रेखा ने भगवान को दोनों हाथ उठाकर धन्यवाद दिया। जो लड़कियाँ सीधी बात नहीं समझ रही थी। दुनिया की चका-चौध में खिंची चली जा रही थी। उनको रास्ता दिखाने के लिए रेखा को यह सब नाटक करना पड़ा।
लड़कों के लिए यह चुनौती था। बेधड़क रेखा अब सभी को लेकर अपनी बात कह सकने में सक्षम हो चुकी थी। और आने-जाने में निडर हो चुकी थी।
गाँव से चुनिया काकी ने यह समझाया था – – – बिन माँ – बाप की बेटी हो होशियार बने रहना। सिंदूर को ही ईश्वर मानना और यह शस्त्र धारण कर लो।
बाकी समय आने पर सब ठीक होगा।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




