हेमन्त बावनकर
☆ लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆
☆ ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆
(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)
हर दिन की तरह आज शाम को भी कॉम्प्लेक्स के सीनियर सिटीजन दोनों बेंचों पर जाकर बैठ आए गए जिन्हें नगर पार्षद ने मुहैया कराई थी।
हर दिन किसी न किसी मतलब-बेमतलब के टॉपिक पर बेमतलब की चर्चा छिड़ जाती। कुछ लोग सत्तापक्ष की विचारधारा से प्रेरित होकर बहस करते तो कुछ लोग विपक्ष की। सेवकराम जी जैसे कुछ सीनियर सिटिज़न तटस्थ या निष्पक्ष भाव से कभी कभार अपने विचार रखने का प्रयास करते।
वैसे तो टी वी पर आए दिन हर शाम विभिन्न पार्टी के प्रवक्ताओं की नूरा कुश्ती होती ही रहती थी और अक्सर कोई न कोई ब्रेकिंग न्यूज़ चलती रहती थी। ब्रेकिंग न्यूज़ का विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे किसी नेता/बिजनेसमेन के घर ऑफिस में छापा पड़ना, राष्ट्रीय महत्व के नेता का शपथ ग्रहण, आतंकवादी घटना, सैनिकों का शहीद होना और बहुत कुछ।
आज के ब्रेकिंग न्यूज़ की बहस को नया मोड़ देते हुए हरीलाल जी बोले – “आप लोग बेमतलब परेशान हो रहे हो। कल को नई ब्रेकिंग न्यूज़ आएगी और आप लोगों के मन में जो संवेदनाएं हैं उस नई ब्रेकिंग न्यूज़ से जुड़ जाएंगी। फिर आज की ब्रेकिंग न्यूज़ पुरानी ब्रेकिंग न्यूज़ के ढेर में दब जाएंगी।”
कृष्णकांत जी बोले – “आप सही कह रहे हैं। संवेदनशील मुद्दों पर भी राजनीति होने लगती है। अब इंसानियत तो जैसे रही ही नहीं। ऐसी न जाने कितनी ब्रेकिंग न्यूज़ गुजर चुकी हैं जिनपर हम लोगों ने घंटों बहस की और आज हम उनका अंजाम तक नहीं जानते।”
रिटायर्ड प्रो. रामलाल मुस्कराते हुए बोले – “कुछ मुद्दों पर तो हम लोगों में से कुछ लोगों में मतभेद भी हुए और संबंध भी बिगड़ गए। सेवकराम जी, आप क्या कहते हैं?”
सेवकराम जी जरा कम ही बोलते हैं किन्तु जो भी बोलते हैं लोग बड़े ध्यान से सुनते हैं। सब लोगों का ध्यान सेवकराम जी की ओर चला गया।
सेवकराम जी थोड़ा मुस्कराए और बोले – “शायद आज तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि हम लोगों ने अपने जीवन में जितनी भी ब्रेकिंग न्यूज़ देखी हैं उन घटनाओं का अंजाम क्या हुआ? बस नई ब्रेकिंग न्यूज़ देखी सुनी और पिछली ब्रेकिंग न्यूज़ को किताब के पन्नों की तरह पलट दिया। फिर उन्हें दुबारा पलट कर उनका अंजाम न तो दिखाया गया न ही देखने मिला। यह तो शोध का विषय होना चाहिए। शायद साहिर लुधियानवी ने सच ही कहा है कि –
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।
सेवकराम जी उठे हाथ जोड़ कर विदा ली और घर की ओर चल दिये।
समय के साथ वर्तमान ब्रेकिंग न्यूज़ की संवेदनशीलता रोज़मर्रा की जिंदगी में शनैः शनैः संवेदनहीनता में परिवर्तित होने लगी। टी वी चैनलों को अगली ब्रेकिंग न्यूज़ तक टी आर पी बढ़ाने का मुद्दा मिल गया था। राजनीति अपनी जगह चलती रही। कुछ समय के लिए ही सही लोगों का ध्यान अत्यावश्यक मुद्दों से भटक गया या भटका दिया गया।
प्रो. रामलाल जी के मस्तिष्क में कुछ हलचल हुई। उनके विचारों को तो जैसे संजीवनी मिल गई। वे अपने परम शिष्य अनुराग के पी एच डी के लिए विषय ढूंढ रहे थे। भला ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ से बेहतर विषय क्या हो सकता है?
© हेमन्त बावनकर
16 जून 2025, 11.30 रात्रि
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





अर्थपूर्ण सुन्दर रचना बहुत बधाई 🙏
अर्थपूर्ण सुंदर रचना हार्दिक बधाई ।
आभार सर
नए विषय पर सुंदर प्रस्तुति।
आभार आदरणीया
एक दुर्लक्षित विषय को आपने व्यंग्य विधा का जामा पहना दिया है।
वरिष्ठ नागरिकोंका हुनर , उनका ज्ञान, अनुभव का लाभ समाज को होना अपेक्षित रहता है परंतु निरर्थक चर्चा में इसका भान न रहना सामाजिक क्षति है।
आभार सर
बहुत सुंदर कहानी है ।
आभार ताई
प्रभावी कथ्य।
आभार सर
इस आत्मीय स्नेह के लिये आप सभी का हृदय से आभार