श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मै किसान हूँ ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 ☆
🌻लघु कथा🌻 👨🎓मै किसान हूँ 🌻
शहर में कई प्राईवेट दंत चिकित्सालय, और सभी अस्पताल में मारामारी। पहले हम, पहले हम, और नेता, पैसे वालों की पुर पहुँच। पूछताछ कक्ष पर बैठी सिस्टर बार-बार कह रही थी – – – सभी लाइन में आए, सभी लाइन में आए!! अपनी-अपनी पारी से आए नहीं तो डॉक्टर साहब बाहर निकाल देंगे।
फिर ना कहना हमें बताया नहीं। सभी के नाम परिचय के साथ लिख रही थी।लगभग चौबीस वर्ष का युवक पिता के साथ बैठा था। जब उससे पूछा गया – –
आपका नाम– बहुत ही शालीनता के साथ उसने बोला- अभिषेक
किसको दिखाना है?
अपने पिताजी लेकर आया हूँ।
क्या करता है – – – खेती करता हूँ।
सर से पाँव तक न जाने क्यों सभी लोग देखने लगे। साधारण पहनावा पर कद काठी गठीला दमकता शरीर।
अपने पिताजी के दांत दर्द से वह परेशान हो रहा था। बातों ही बातों में पास बैठी एक सज्जन महिला ने पूछ लिया— नौकरी नहीं? मिली या पढ़ाई नहीं किया?
अभिषेक ने धीरे से गहरी मुस्कान के साथ बताया बी. ई. की पूरी पढ़ाई करने और सर्विस को छोड़ने के बाद मैं खेती करने आ गया।
पापा का हाथ बटाना चाहता हूँ।
और यह कहते हुए पेंट की जेब से नोटों की गड्डी को निकाला और फीस जमा करने लगा।
उसके दृढ विश्वास को देख महिला ने ताली बजाकर कहा – – गर्व से कहो मै किसान हूँ।
प्यार दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली अब कोई पूछे तो खेती करता हूँ नहीं गर्व से सीना तानकर कहना – – – मैं एक किसान हूँ।
अभिषेक के चेहरे पर मासूम भरी मुस्कान और किसान की पहचान।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





