श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 254 ☆ संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी ☆
वर्षा ऋतु आगमन से, सावन -भादों मास प्रकृति के रंगों में सराबोर हो धरती का स्वागत करने को आतुर हो उठता है। कजरी के राग सुन झूमते लोगों का दिखना बहुत अच्छा लगता है। रक्षाबंधन का पर्व मनाने के लिए बहनें मायके आतीं हैं। वहाँ सखियों से मिलना, कजरी तीज के अवसर पर व्रत रखकर शिव पार्वती के मिलन का पर्व मनाना। ऐसा माना जाता है कि इस दिन ही पार्वती जी को शिव जी मिले थे। हरे- भरे खेत देख किसान उमंगित हो जाते हैं। भादों मास के आने वाले त्योहारों की छटा अपनी फसल में देखते हैं। धान की रोपाई, मनभावनी छवि हृदय को छू जाती है।
*
हरी भरी धरती मन मोहे
हर डाली में पत्ते सोहे
रिमझिम बारिश होती ऐसे
नवयौवन छाया हो जैसे।
*
भींगी चूनर ओढ़े आतीं।
कजरी राग सुहावन गातीं। ।
सखियाँ मिलजुल झूला झूलें।
राग- द्वेष जीवन के भूलें। ।
*
आइए हम सभी मिलकर इन सांस्कृतिक धरोहरों का पालन -पोषण करें। इन्हें जीवन में शामिल कर अपनी परम्पराओं के जीवंत स्वरूप से लाभान्वित हों।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈





