डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे  (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०१ ☆

☆ आलेख ☆ ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे  (वैचारिकी)

हल्ला मच गया कि एक महिला सांसद के गले से सोने की जंजीर की झपटमारी हो गयी, वह भी ऐसे क्षेत्र में जहां दूतावासों के भवन थे, यानी अति सुरक्षित क्षेत्र, जहां चौबीस घंटे पुलिस  चौकन्नी रहती है। चेन छीनकर झपटमार आराम से निकल गये और सांसद महोदया फरयाद ही करती रह गयीं।

हाल के समय में रास्ते में झपटमारी की वारदातों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सोना खोने के अतिरिक्त महिलाएं ज़ख्मी भी होती रहती हैं। झपटमारी में इस वृद्धि के कारण क्या हैं? देश में बढ़ती बेरोज़गारी, कानून के डर में कमी, या व्यवस्था की कमज़ोरी? शायद युवाओं को दिन भर ईंट-गारा ढो कर चार सौ रुपये कमाने के बजाय थोड़े से साहस के बूते एक मिनट में दो चार लाख की चेन पा लेना अधिक लुभाता है। सोने के दाम बढ़ने के साथ झपटमारी में वृद्धि की पूरी संभावना है।

सोना पांच हजारी से बढ़ते बढ़ते लखपति हो गया, लेकिन अभी भी वह समाज के मन से उतरा नहीं है। प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को ‘मेरे सोना’ कह कर बुलाते हैं, जो दिखाता है कि प्रेमियों की नज़र में सोने की क्या कीमत है। सोने के लिए फैले पागलपन को लेकर प्रसिद्ध कवि बिहारी ने लिखा, ‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, वह खाये बौरात है यह खाये बौराय।’  यहां ‘कनक’ का अर्थ दोनों जगह अलग-अलग है। एक जगह धतूरा और दूसरी जगह सोना। यमक अलंकार है। कवि कहता है कि धतूरा खाकर आदमी जैसे बौराता है वैसे ही सोना पाकर। सोने की मादकता या नशा धतूरे से सौ गुना अधिक होता है।

सोने का उसके मूल्य के कारण संग्रह करना तो समझ में आता है, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि शरीर पर पहन कर उसकी नुमाइश क्यों की जाती है? आज के युग में कृत्रिम सुन्दर आभूषण उपलब्ध हैं जो सोने की तुलना में बहुत सस्ते होते हैं, लेकिन बहुत सी स्त्रियों को उन्हें पहनने में हेठी का अनुभव होता है। समाज में एक दूसरे से बेहतर दिखने की होड़ में सोना उपकरण बन जाता है।

कुछ पुरुष भी सोना पहनने के शौकीन होते हैं। टीवी पर कुछ महापुरुष ऐसे भी दिखे जो एक-दो किलो सोना शरीर पर लाद कर चलते थे। इनमें एक महन्त जी भी दिखे। ज़ाहिर है कि ये महानुभाव सुरक्षाकर्मियों के बिना नहीं चलते होंगे, अन्यथा उनका हाल भी सांसद महोदया जैसा होता। एक संगीत-निदेशक भी सोना पहनने के शौकीन थे। अनेक पुरुष सोने कीअंगूठियां और जंजीर पहनने के शौकीन होते हैं। कुछ दसों उंगलियों में अंगूठी पहनते हैं, जिसे देखकर सिहरन होती है।

सोने की धमक पूरे विश्व में रही है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले विश्व में स्वर्ण मान था जिसमें देश की मुद्रा स्वर्ण में परिवर्तनीय थी। भारत जैसे जो देश इस व्यवस्था को नहीं अपना सकते थे उन्होंने अपनी मुद्रा को स्वर्ण मान वाले बड़े देशों की  मुद्रा से जोड़ लिया था। प्रथम विश्व युद्ध में हुए युद्ध के भारी व्ययों के कारण यह व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। ब्रिटिश काल में भारत में गिन्नी और अशर्फी नाम के सोने के सिक्के चलन में थे, लेकिन ये सिर्फ हैसियतदारों के पास ही होते थे क्योंकि रियासतों के ज़माने में आम जनता फटेहाल ही हुआ करती थी।

स्वर्ण-मोह की क्लासिक कथा राजा मिडास की है जिसके रचयिता अमेरिकी कथाकार नैथेनियल हॉथॉर्न थे। मिडास ने देवता से वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह जो कुछ भी छुए वह सोना बन जाए। उसे पहला झटका तब लगा जब उसका भोजन छूते ही सोना हो गया। अपनी मूर्खता का पूरा अहसास उसे तब हुआ जब उसकी बेटी उसके छूने से सोने की मूर्ति बन गयी। तब उसने देवता का पुनः आह्वान कर उस वरदान से मुक्ति पायी।

सन्त नामदेव से संबंधित एक घटना याद आती है। नामदेव जी कहीं जा रहे थे। पीछे पत्नी। मार्ग में पड़ा सोने का टुकड़ा दिखा। नामदेव जी को भय लगा कि पत्नी कहीं सोने के लोभ में न पड़ जाए। वे उसे मिट्टी से ढकने लगे। पत्नी ने सोना देख लिया था, बोलीं, ‘मिट्टी से मिट्टी को क्यों ढक रहे हो?’ नामदेव समझ गये कि उनका भय निर्मूल था। पत्नी की दृष्टि में उस सोने का मूल्य मिट्टी से अधिक नहीं था।

सोने-चांदी के दीवानों को फ्रांसीसी कथाकार मोपासां की प्रसिद्ध कहानी ‘डायमंड नेकलेस’ ज़रूर पढ़ना चाहिए। कहानी में एक नौकरानी अपनी मालकिन से एक पार्टी में पहनने के लिए उसका हीरे का हार मांग लेती है। दुर्भाग्य से हार खो जाता है, लेकिन नौकरानी भयवश इस बात को मालकिन से छिपा लेती है। वह धन उधार लेकर वैसा ही हार खरीदकर मालकिन को दे देती है। हार की उधारी चुकाते  चुकाते नौकरानी  असमय ही बूढ़ी हो जाती है। फिर एक दिन वह मालकिन को हार खोने की बात बताती है। मालकिन उसकी हालत पर दुखी होकर उसे बताती है कि उसका हार नकली था। इस तरह एक नकली हार के कारण एक स्त्री की ज़िन्दगी होम हो गयी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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