श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 142 ☆ देश-परदेश – बिल्ली मौसी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी पांच अगस्त को श्वान घसीटी दिवस था, अब ये बिल्ली दिवस भी आ गया है। पश्चिम ने क्या नए त्यौहार बना दिए हैं। हमारे यहां तो घर में बिल्ली प्रवेश कर ले, तो उसे डंडा दिखा कर भगा दिया जाता है, उसके बाद वहां हाइजीन के कारण सफाई की जाती है।

देखा जाय तो बिल्ली का प्रयोग मुहावरों में खूब किया गया है, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे आदि। बचपन में बिल्ली छाप जूते की पॉलिश से जूते चमकाए जाते थे। बिल्ली के परिवार से ही जंगल का राजा आता है। ऐसा हमारी प्राचीन कहानियों में लिखा हुआ मिलता है।

पश्चिम ने तो स्त्रीयों की सुंदरता नापने के लिए ” बिल्ली चाल” को एक पैमाना तक बना दिया हैं। हमारे यहां चोर बिल्ली चाल से अपना काम करते हैं। हमारे यहां तो “हिरणी जैसी चाल” या “हिरणी जैसी आंखों” से ही खूबसूरती आंकी जाती है। क्रूर महिलाओं की तुलना बिल्ली से अवश्य की जाती है।

हमारा देश भी अब बदल गया है। बिल्ली पालना, कुत्ते पालना के बाद अमीरों का सबसे बड़ा शौक बन चुका है। पहले बिल्लियां पाली नहीं जाती थी, इधर उधर घूम कर अपना जीवन व्यतीत कर लेती थी। अब तो इनके पालनहार घर में पूरी व्यवस्था करते हैं। इनके लिए एक अलग कमरा और स्नानगृह भी होता है। उनको भी जीवन में निजता की आवश्यकता होती है।

बड़े स्टोर्स में बिल्लियों के सामान का अलग काउंटर होता है। इनके गर्मी, सर्दी के अलग अलग वस्त्र भी उपलब्ध होते हैं। विदेश में तो इनके लिए बेकरी भी अलग से होती हैं।

हम मानवों ने तो बिल्लियों में रंग भेद की भावना कर दी है। सुनहरे रंग की बिल्ली संपन्नता लाती है। काली बिल्ली को अशुभ माना जाता है। बिल्ली अगर रास्ता काट जाए, तो हम लोग रास्ता ही बदल लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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