श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४५ ☆ देश-परदेश – माननीय हमारी भी सुनो लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

देश के सर्वोच्च न्यायालय के कुत्तों के मामले में यू टर्न लेकर जो साहसिक निर्णय लिया है, पूरे विश्व भर के कुत्ते उसकी “तारीफ़ के पुल” बांध रहें हैं। हालांकि इन पुलों के नीचे देश भर की लाखों बिल्लियां दब गई है। उनकी आवाज़ भी सुननी चाहिए। बढ़ती हुई कुत्तों की आबादी ने इन कोमल और कमसिन बिल्लियों का जीना तक दूभर कर रखा हैं।

बिल्लियों की कम संख्या से कबूतरों की मौज हैं। उनकी आबादी ने तो पूरा आसमान ही पाट दिया हैं। कबूतरों को बचाने में बहुत से धर्मांबली भी आगे आए हैं। बढ़ते हुए कबूतरों से हमारे देश के डॉक्टर बहुत प्रसन्न हैं, रोगियों की संख्या बढ़ाने में कबूतरों के सहयोग को नकारा नहीं जा सकता हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने कुत्तों के बाद हाथियों पर हो रहे अन्याय पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। कुत्तों और हाथी का पुराना संबंध है, सड़क पर जब हाथी मस्ती भरी चाल से निकलता है, तो ये गली के कुत्ते उस पर खूब भौंकते है, मगर क्या मजाल अकेले हाथी पर उसका कोई प्रभाव पड़ता हो। ये भी हो सकता है, इन गली के कुत्तों ने सर्वोच्च न्यायालय से इस बाबत कोई शिकायत की होगी, कि दस कुत्तों के झुंड से भी हाथी उनकी बात नहीं सुनता है, हाथी के कान सर्वोच्च न्यायालय को खींचने चाहिए।

देश का न्यायालय जितनी तत्परता से मानव प्राणी को छोड़ कर अन्य जीवों के लिए साहसिक कदम उठा रहा है, बहुत जल्दी अन्य प्राणियों जैसे कि हजारों वर्षों से मंद बुद्धि (अपमान) का घूंट पीकर कर जीवन व्यतीत कर रहे गधे, गन्दगी के प्रतीक माने जाने वाले सुअर, उछल कूद की पहचान बन चुके बन्दर आदि के लिए भी कुछ साहसिक कदम लेकर निर्णय सुनाए जाएंगे।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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