श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २५७ ☆ हरियाली से मिले तृप्ति: पितृ पक्ष… ☆
वृक्ष प्रत्यक्ष देव होते हैं, ऐसा भारतीय संस्कृति का आधार है। आश्विन मास, कृष्ण पक्ष, हमारे पितरों को समर्पित होता है। ये 16 दिन, जिसमें प्रथम दिवस भादों की पूर्णिमा को शामिल किया जाता है। हरियाली से आत्मा तृप्त होती है। नदी, तालाबों में जाकर जल अर्पण करना, अन्न दान, वस्त्र दान साथ ही धन का भी दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है। यहाँ पौधारोपण करना सबसे उत्तम मानते हैं। एक वृक्ष 100 पुत्रों के समान है, ऐसे विचार हमें हरियाली बृद्धि के लिए प्रेरित करते हैं।
हिंदू परंपरा में पितरों की तृप्ति के लिए अर्पण, श्राद्ध और तर्पण का महत्व है। पर्यावरण को सहेजना हमारे पर्वों से जुड़ा है। जब हम कोई पौधा लगाते हैं, उसे बढ़ाते हैं, जिससे हरियाली फैलती है, तो इससे केवल वातावरण ही नहीं, वरन हमारे पितरों की आत्मा भी तृप्त होती है।
पेड़-पौधे न सिर्फ ऑक्सीजन देते हैं बल्कि वे पितरों का आशीर्वाद पाने का साधन भी बन जाते हैं। इसीलिए यह विचार पूर्णतया सत्य है कि…
वृक्ष पितरों का निवास हैं, इनकी छाया में पूर्वजों की कृपा बरसती है।
आइए संकल्प लें कि…
पितृपक्ष या किसी भी शुभ अवसर पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएंगे।
यह पौधा सबके लिए अमृत तुल्य होगा।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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