श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २५९ ☆ आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व… ☆
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मातु स्वरूप लगे मनभावन, ज्योति जले जग ज्योतित जंगम।
सिंह विराजत आप कृपामय, दिव्य सुहावन आगम संगम।।
रूप अलौकिक पावन मंगल, फैल रही मन मोह तरंगम।
भक्त खड़े दरबार निहारत, अष्टभुजा वरदान विहंगम।।
(किरीट सवैया)
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मैया का अष्टभुजा स्वरूप, लाल चुनरिया, सिंह सवारी मनमोहक लगता है। हर त्योहार की तरह इसमें भी पर्यावरण की रक्षा का संदेश जौ बोने और उसे 9 दिनों तक उगते हुए देखना।
जौ को प्रथम अन्न मानते हैं, इसे मिट्टी के बर्तन में नवरात्रि के दिन मैया का स्वरूप मानकर बोया जाता है। दो- तीन दिनों में इसमें अंकुरण होता है और हरे रंग की पत्तियों के शुभ दर्शन होते हैं।
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पूरी तरह हरा- सुख समृद्धि
आधा हरा आधा पीला- मिलाजुला असर
ऊँचाई तक स्वस्थ्य पौध- विजय/ जीत का प्रतीक है।
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मंदिर में पुजारी जी और घरों में बड़े बुजुर्ग इसे विधि विधान के साथ बोते हैं। नवमीं के दिन कलश विसर्जन के बाद इन जवारों को भक्त अपने शुभ स्थानों में रखते हैं। इसे सुख शांति, वैभव का प्रतीक माना जाता है।
आस्थावान बनने के साथ ही पर्यावरण के हितैषी भी बनें, श्रद्धा और विश्वास के साथ जो भी कार्य होगा वो फलदायक होता है।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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