श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १४९ ☆ देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆
नब्बे के दशक तक ” छाता बनवा लो” जैसे शब्द कान में सुनाई दिया करते थे। अब तो ये शब्द सुने हुए एक लंबा अंतराल हो चुका हैं। पहले पैदल चलते हुए कांधे पर बड़े से झोले में अपनी पूरी दुकान को समेट कर द्वार द्वार से कारीगर अपनी सेवाएं देते थे।
आश्चर्य तो तब होता था, भरी बरसात में ये लोग स्वयं छाता वहन नहीं कर पाते थे। हमारे यहां गरीबी का ये अलाम है, दूध विक्रेता स्वयं दूध नहीं पी पाता हैं।
बाद के वर्षों में ये छाता सुधारक पुरानी साइकिल से गली कूचे पहुंच कर सेवा देने लगे थे। समय ने करवट ली, लोगों का रहन सहन, सुविधा जनक हुआ, लोग छत वाली कार में घूमने लगें। छाते का उपयोग ही कम हो गया, बाइक और स्कूटर वाले भी छाते का उपयोग कर पाने में असहज हैं। गरीब लोग तो प्रिपोपलाइन के पुराने बोरे से वर्षा ऋतु में काम चला लेते हैं।
हमने तो बचपन से लेकर आजतक भी काले रंग का जेब्रा ब्रांड का छाता ही उपयोग किया हैं। दुनिया तो अब रंगीन छातों की हो चुकी हैं। हमारे पिताश्री वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छाते को धूप में अच्छे से सुखाकर और उसके अंदर लगी हुई धातु की डांडियों पर तेल लगाने के बाद ही रखते थे, ताकि उस में जंग आदि ना लगे। अब तो हर वर्ष नया खरीदने का रिवाज़ बन चुका हैं।
मुम्बई जैसे शहर जहां वर्षा तो अधिक होती ही है, लोग पैदल भी खूब चलते है, छाते अभी भी अपनी उपयोगिता प्रमाणित करते हैं। वहां इसकी मरम्मत का कार्य अधिकतर मोची ही कर लेते हैं।
चीन देश से सस्ते और घटिया छातों ने इन कारीगरों की रोजी रोटी छीन ली हैं। “उपयोग और फेंको ” पद्धति ने कुटीर उद्योगों की रीढ़ की हड्डी तो तोड़ी ही है, साथ ही साथ रिपेयर जैसे छोटे काम करने वाली क़ौम का प्रायः खात्मा ही कर दिया हैं।
ये कारीगर भी सीजनल कार्य की कर पाते थे। जून के अंत से सितंबर माह की समाप्ति तक ही इनकी आवश्यकता रहती हैं। अब सितंबर माह भी समाप्त हो रहा है, हम भी अपनी लेखनी को विराम देते हैं।
© श्री राकेश कुमार
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