हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण # 133 ☆ अच्छा ही हुआ…! ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरण “अच्छा ही हुआ…! ”।)  

☆ संस्मरण  # 133 ☆ अच्छा ही हुआ…! ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

मेरे व्यंग्य के पहले गुरु आदरणीय हरिशंकर परसाई रहे हैं, बात उन दिनों की है जब आदरणीय श्री प्रताप सोमवंशी (संप्रति -संपादक, हिन्दुस्तान, दिल्ली) के निर्देश पर मैंने स्व हरिशंकर परसाई जी से लम्बा इंटरव्यू लिया था जो इलाहाबाद की पत्रिका ‘कथ्य रूप’ में सोमवंशी जी के संपादन में छपा था। इलाहाबाद की उस पत्रिका में छपने के कुछ साल बाद परसाई जी का निधन हो गया था। इस प्रकार ये इंटरव्यू परसाई के जीवन का अंतिम इंटरव्यू रहा। बाद में परसाई जी के चले जाने के बाद इस इंटरव्यू को साभार हंस पत्रिका ने छापा था। हालांकि, कुछ मित्रों ने मुझ पर व्यंग्य भी किया था, कि आप अभी उनका इंटरव्यू न लेते तो शायद परसाई जी कुछ साल और जी लेते।

कुछ साल बाद भारतीय स्टेट बैंक, राजभाषा विभाग, मुंबई के महाप्रबंधक एवं “प्रयास” पत्रिका के संपादक डॉ सुरेश कांत के निर्देश पर मैंने ख्यातिप्राप्त व्यंग्यकार हरि जोशी जी का भोपाल में इंटरव्यू लिया, जिसको प्रयास पत्रिका में छपने हेतु भेजा। किन्तु, श्री सुरेश कांत जी के मन में उहापोह की हालत बनी रही और उन्होंने इस इंटरव्यू को पेंडिग में डाल दिया जो ‘प्रयास’ पत्रिका में छपने के लिए आज तक पेंडिग में पड़ा है। न तो स्टेट बैंक की प्रयास पत्रिका ने वापस किया और न ही ये छप पाया ।

मैं भी खुश हूँ कि अच्छा हुआ नहीं छपा… नहीं तो खामोंखा मित्र लोग मेरे ऊपर फिर से व्यंग्य करने लगते …..!

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ राजी सेठ : बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ है बाकी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण ☆ राजी सेठ : बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ है बाकी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

राजी सेठ जिनसे बहुत कुछ सीखा और जाना व समझा। सन् 1975 फरवरी माह की बात है। मेरा चयन केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा अहिंदी भाषी लेखकों के लिए लगाये जाने वाले लेखन शिविर में हुआ था और यह शिविर अहमदाबाद में गुजरात विश्विद्यालय में होने जा रहा था। मैं उस समय मात्र तेईस वर्ष का था और छोटे से कस्बे नवांशहर का निवासी। इससे पहले कभी इतनी दूरी की रेल यात्रा नहीं की थी। हां, डाॅ नरेंद्र कोहली से परिचय था और वे दिल्ली रहते थे। बस। उन्हीं के पास पहुंचा और उन्होंने पूछा कि क्या अपनी सीट आरक्षित करवाई है? मैं कहां जानता था इस बारे में? बहुत डांटा मुझे और रेल पर बिठाने छोटे से बेटे को गोदी उठाये खुद गये मेरे साथ। भारतीय रेल का वही दृश्य जो सबने कभी न कभी देखा होगा सामने था। गाड़ी खोजने, प्लेटफॉर्म पर पहुंच कर सीट पाने की मारामारी तक डाॅ नरेंद्र कोहली मेरे साथ भागते दौड़ते रहे और आखिर गाड़ी में बिठा कर जब विदा होने लगे तब तक मुझे एक टीन के कनस्तर पर बैठने की जगह मिल पाई थी और इसी पर पूरे चौबीस घंटे बैठ कर अहमदाबाद पहुंचा था दूसरे दिन सबेरे।

लेखन शिविर के पहले दिन पहले सत्र में हमारी प्रिय विधा के अनुसार तीन विधाओं पर छोटे छोटे समूह बनाये गये -कथा, कविता और नाटक। मैंने कथा समूह चुना। फिर छोटा सा मध्यांतर जलपान का आया। चाय और कुछ खाने के लिए प्लेट में लेकर मैं अलग से खड़ा था कि दो महिलाएं मेरी ओर बढ़ती हुई आईं और सामने खड़ी हो गयीं। ऐनक के पीछे से झांकती आंखों में जिज्ञासा में पूछा -कहां से आए हो?

-पंजाब।

-पंजाबी बोलनी आती है?

-क्यों नहीं? पंजाबी पुत्तर हूं तो आती ही है।

-फेर पंजाबी च बोल भरा।

इस तरह हमारा परिचय जिन महिलाओं से हुआ वे राजी सेठ और उनकी छोटी बहन कमलेश सिंह थीं। वे उन दिनों अहमदाबाद में ही रहती थीं। मैंने पूछा -पंजाबी में ही बात क्यों?

-भरावा इत्थे पंजाबी च गल्ल करन लई तरस जाइदा। ऐसलई। यह कहते कहते अपनी प्लेट में से आलू की एक टिक्की मेरी प्लेट में सरका दी थी। मैंने भी बताया कि अच्छा किया क्योंकि कल रात से यहां का खाना नहीं खा रहा क्योंकि यह बिल्कुल उलट स्वाद वाला है। मीठे की जगह नमक और नमक की जगह मीठा डाल रहे हैं।

-अच्छा एह गल्ल ऐ?

-जी।

-फिर ठीक ऐ। दोपहर दी ब्रेक च खाना साडे घरे?

-रोज?

-की गल्ल? मंजूर नहीं?

-होर की चाहिदा?

इस तरह दोपहर का खाना राजी सेठ के घर हुआ मेरा पूरे सातों दिन। पर उन दिनों ही उनकी पहली कहानी ‘क्योंकर’ कहानी में प्रकाशित हुई थी और लेखिका का नाम था-राजेन् सेठ। यह उनका असली नाम था लेकिन उन्हें पुरूष समझ कर जब खत आने लगे तब उन्होंने नाम बनाया राजी सेठ। फिर इसी नाम से अब तक लिखा और हिंदी साहित्य में उन्हें जाना जा रहा है। वे सात दिन और हमारी कथा विधा की कक्षाएं कभी न भूलने वाले दिन रहे। विष्णु प्रभाकर जी हमारे शिक्षक या कहिए मार्गदर्शक थे। राजी सेठ, कमलेश सिंह और मैं तीनों इसी कक्षा में बैठते। मैंने अपनी एक अप्रकाशित कहानी पढ़ी थी-एक ही हमाम में। जो विष्णु प्रभाकर जी को पसंद आई थी। वे उन दिनों साप्ताहिक हिंदुस्तान में कहानियों का चयन करते थे। शाम को जब उनके साथ विश्विद्यालय में घूम रहा था तब विष्णु जी ने कहा कि यदि इसमें थोड़ा बदलाव कर लो तो मैं इसे साप्ताहिक हिंदुस्तान में ले लूं। दूसरे दिन दोपहर को राजी सेठ को मैंने यह बात बताई तो उन्होंने सुझाव दिया कि इस लोभ में अपनी कहानी न बदल लेना कि एक बड़े साप्ताहिक में आ जायेगी। यदि बदलाव मन से आए तो करना नहीं तो न करना। मैंने रात भर विचार किया और अपनी कहानी को बार बार पढ़ा तब राजी सेठ का सुझाव अच्छा लगा और मैंने विष्णु जी को कहानी में बदलाव करने से विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया। बाद में वह कहानी रमेश बतरा के संपादन में साहित्य निर्झर के कहानी विशेषांक में आई।

जिस दिन चलने का समय आया उस दिन उनकी सीख थी -कमलेश, बहुत सी बातें हमारी होती रहीं लेकिन आज एक सुझाव दे रही हूं, जिन लोगों के साथ बैठकर मन को खुशी और सुकून न मिले, वे कितने भी बड़े हों, उनके बीच मत बैठना। यह सीख, सुझाव मेरे अब तक बहुत काम आ रहा है। चलते चलते एक प्यारी सी डायरी,पैन और एक नयी नकोर शर्ट भी दी। मैं जल्द ही किनारा कर लेता हूं ऐसे लोगों से जिनके बीच बैठकर सुकून न मिल रहा हो। बहुत बड़ी सीख मिली। वे तब चालीस वर्ष की थीं और मेरा व उनका अंतर सत्रह वर्ष का। वे आज 87 की हो गयी हैं और मैं 70 में आ गया लेकिन वह लम्बा संबंध 47 वर्ष से चलता आ रहा है। विभाजन के बाद कुछ समय राजी सेठ के परिवार ने पंजाब के नकोदर में बिताया था। यह भी उन्होंने मुझे बताया था।

फिर राजी सेठ के पति सेठ साहब का तबादला दिल्ली हो गया और वे मालवीय नगर में आकर किराये के बंगले में रहने लगे। सेठ साहब आयकर विभाग में उच्चाधिकारी रहे हैं। मैं रमेश बतरा के दिल्ली आ जाने के बाद से काफी चक्कर दिल्ली के लगाने लगा। मेरे दो ही ठिकाने होते -टाइम्स ऑफ इंडिया में सारिका का ऑफिस और शाम को मालवीय नगर राजी सेठ के घर। वे अपने घर काम करने वाले पहाड़ी युवक दान सिंह को अपने बेटे की तरह ही मान कर रखे हुई थीं और मुझे पहले दिन ही कह दिया था कि कमलेश, दान सिंह को भूल कर भी हमारे घर का छोटा सा काम करने वाला न कहकर पुकारना। उस दान सिंह को राजी सेठ ने न केवल पढ़ाया लिखाया बल्कि वर्धा के महात्मा गांधी विश्विद्यालय में नौकरी भी लगवा दी। हालांकि दान सिंह की पत्नी और दोनों बेटियां आज भी राजी सेठ के साकेत स्थित बनाये बंगले में उनके साथ रहती हैं और दान सिंह भी वर्धा से आता जाता रहता है। दोनों बेटियां राजी सेठ को दादी ही कहती हैं और दान सिंह की पत्नी मुझे भैया पुकारती है। जब ये बच्चियां छोटी थीं तब राजी सेठ शाम के समय इन्हें घुमा लाने को कहतीं और वे भी शाम को घूम कर खुश हो जातीं। मुझे ऐसा लगता है कि ‘धर्मयुग’ में प्रकशित कहानी ‘गलत होता पंचतंत्र’ का नायक दान सिंह ही है। पर कभी कहा नहीं। मन ही मन समझ गया।

फिर राजी सेठ ने उपन्यास ‘तत्सम’ लिखना शुरू किया। उन दिनों जब भी घर गया तब टाइप पन्ने मुझे देकर कहतीं कि इन्हें पढ़ कर बताओ कि कैसे चल रहा है? इस तरह मैंने वह चर्चित उपन्यास टाइप होते ही पढ़ने की खुशी पाई। वे एक एक पंक्ति और एक एक शब्द पर कितना ध्यान देती थीं, यह जाना। जब तक किसी शब्द से संतुष्ट न हो जातीं तब तक काम अटका रहता। यह उपन्यास भी उन्होंने अपनी एक निकट संबंधी के जीवन से बीज रूप में लिया था जिसके पति की असमय मृत्यु हो गयी थी और राजी सेठ ने संदेश दिया है कि यदि हमारे घर की दहलीज किसी आग में जल कर खराब हो जाये तो बदल लेनी चाहिए। ऐसे ही यह जीवन यदि किसी एक घटना से दूभर बन रहा हो तो बदल लेना चाहिए यानी दूसरी शादी, नयी जिंदगी शुरू कर लेने का संदेश दिया है इस उपन्यास में। यानी तत्सम क्यों? वैसे का वैसा जीवन क्यों जीते चले जाओ? इसे बदलो। वे यह भी मानती हैं कि हर स्त्री का आर्थिक आधार होना चाहिए यानी नौकरी लेकिन सोच इससे भी ऊपर होनी चाहिए।

राजी सेठ ने दर्शन शास्त्र में एम ए की है और वे सचमुच दार्शनिक ही हैं। देखने, समझने और व्यवहार में। शांत सा चेहरा और दूसरे का सम्मान करना कोई इनसे सीखे। नंगे पांव खड़े रहकर मेहमान को खाना खिलाना और साहित्य की बातें करते रहना। फोन पर भी लम्बी बातें। दिल्ली आकर उन्हें प्रसिद्ध लेखक अज्ञेय जी का सहयोग व मार्गदर्शन मिला जिससे वे हिदी साहित्य में अपने परिश्रम व लेखन से स्थान बनाने में सफल रहीं। मेरी दो कहानियां भी इनके सहयोग से अज्ञेय जी द्वारा संपादित पत्रिका -‘नया प्रतीक’ पत्रिका में आईं और चर्चित रहीं। मेरे प्रथम कथा संग्रह ‘महक से ऊपर’ के प्रकाशन का सारा श्रेय उनको ही जाता है। मैं तो डाॅ महीप सिंह से संग्रह को प्रकाशन से पहले कभी मिला भी न था लेकिन सब किया राजी सेठ ने। इस तरह मेरे प्रथम कथा संग्रह की प्रेरक भी राजी सेठ ही रहीं। वे अपनी हर पुस्तक प्रकाशक से मुझे भिजवाती रहीं। मैं भी उनको अपनी हर पुस्तक भेजता हूं। उनका बेटा राहुल तब सिर्फ दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था, फिर वह अमेरिका गया। अब दिल्ली में ही मां पापा के साथ आ गया है और बन गया है लेखक राहुल सेठ। राहुल ने अपनी मां राजी सेठ की कहानी ‘तुम भी’ का नाट्य रूपांतर भी किया है और अपनी पुस्तक मां की तरह ही भेजी। सेठ साहब कहा करते हैं कि मैंने ज्यादा से ज्यादा समय राजी को लिखने के लिए दिया, खाना पकाने में समय लगाने से भरसक बचाये रखा क्योंकि वे खाना बनाने से बहुत बड़ा काम कर रही हैं लेखन का। हर स्त्री लेखन नहीं कर सकती और हर लेखिका को सेठ साहब नहीं मिलते। परिवार ने पूरा साथ दिया। छोटी बहन कमलेश सिंह का कहानी संग्रह भी राजी सेठ ने ही प्रकाशित करवाया। मेरी डाॅ इंद्रनाथ मदान वाली इंटरव्यू भी एक पत्रिका शायद ‘साक्षी’ में प्रकाशित की, जिसका वे अपने गुरु डाॅ देवराज के साथ सहसंपादन करती थीं। अपने समय का कैसे सदुपयोग करना है, शब्दों का कैसे चयन करना है, कृति को कैसे धैर्य के साथ संपन्न करना है और जब तक संतुष्टि न हो तब तक उस पर काम करते जाना है यह बिल्कुल करीब से जाना समझा है मैंने। राजी सेठ और उनका परिवार मुझे लघुकथा लेखन के चलते ‘लघुकुमार’ ही पुकारता है। इतनी चिट्ठियां लिख लिख कर मुझे समझाती रहती थीं जिंदगी और साहित्य के बारे में कि काश वे चिट्ठियां संजो कर रखी होतीं तो आज एक पुस्तक आ जाती। कभी कभार पुराने खतों में कोई खत मिल जाता है। बेटी रश्मि के विवाह पर शगुन का लिफाफा मिला तो उनके प्यार से आंखें भर आईं। नये लेखकों को पढ़ना और अपनी ओर से कुछ सलाह देना यह निरंतर जारी रहा। रमेश बतरा के संपादन में साहित्य निर्झर के लिए कहानी मंगवाई थी।

अभी दो साल पहले सपरिवार दिल्ली साकेत स्थित घर गया था तब वे अस्वस्थ जरूर थीं लेकिन वही गर्मजोशी, वही प्यार और वही आशीष। बहू बेटे, सेठ साहब सबको खाने की मेज पर बुलाया और कहा कि देखो, मेरा भरा केशी मिलने आया है। और बड़े लाड चाव से कहा कि मेरा केशी इतना बड़ा लेखक बन गया है। बहू उज्ज्वला से पहली बार ही मुलाकात हुई। चलते चलते एक लालटेन दी जो बिजली से रोशन कर सकती थी लेकिन सोचता हूं कि राजी सेठ सदैव मुझे जीवन, व्यवहार और साहित्य की रोशनी देती आ रही हैं। जब पंजाब सरकार की शिरोमणि साहित्यकार का पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो फोन लगाया और बोलीं कि बस। इसमें क्या, मैं तो लेखिका हूं और रहूंगी। ज्यादा सुनाई भी नहीं देता आजकल। या तो राहुल या फिर दान सिंह की पत्नी ही बताती हैं कि कमलेश भैया हैं फोन पर। तब वे उन्हें कुछ जवाब बताती हैं और इस तरह बातचीत चलती है हमारी। एक बार वे मुझे मन्नू भंडारी से मिलाने भी ले गयी थीं और दैनिक ट्रिब्यून के लिए उनका इंटरव्यू भी करवाया था। इसी तरह चंडीगढ़ आई थीं योजना रावत के कथा संग्रह के विमोचन पर तब गया था पंजाब विश्वविद्यालय में मिलने तब भी अपना इंटरव्यू न करवा कर निर्मला जैन का इंटरव्यू करवाया। अपने प्रचार से सदैव दूर रहीं। दूसरों के बारे में ज्यादा सजग और प्रेमभरी, प्रेममयी रहीं। अब क्या क्या याद करूं और क्या क्या भूलूं? बस। दीर्घायु हों और आशीष बना रहे। स्नेह बना रहे।

©  श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण # 132 ☆ चिंता और चिंतन… ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरण “चिंता और चिंतन… ”।)  

☆ संस्मरण  # 132 ☆ चिंता और चिंतन… ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

गांव का खपरैल स्कूल है, सभी बच्चे टाटपट्टी बिछा कर पढ़ने बैठते हैं। फर्श गोबर से बच्चे लीप लेते हैं, फिर सूख जाने पर टाट पट्टी बिछा के पढ़ने बैठ जाते हैं।

मास्टर जी छड़ी रखते हैं और टूटी कुर्सी में बैठ कर खैनी से तम्बाकू में चूना रगड़ रगड़ के नाक मे ऊंगली डालके छींक मारते हैं फिर फटे झोले से सलेट निकाल लेते हैं। बड़े पंडित जी जैसई पंहुचे सब बच्चे खड़े होकर पंडित जी को प्रणाम करते हैं। हम सब ये सब कुछ दूर से खड़े खड़े देख रहे हैं। पिता जी हाथ पकड़ के बड़े पंडित जी के सामने ले जाते हैं। पहली कक्षा में नाम लिखाने पिताजी हमें लाए हैं। अम्मा ने आते समय कहा उमर पांच साल बताना, सो हमने कह दिया  पाँच साल… 

बड़े पंडित जी कड़क स्वाभाव के हैं, पिता जी उनको दुर्गा पंडित जी कहते हैं। दुर्गा पंडित जी ने बोला पाँच साल में तो नाम नहीं लिखेंगे। फिर उन्होंने सिर के उपर से हाथ डालकर उल्टा कान पकड़ने को कहा। कान पकड़ में नहीं आया, तो कहने लगे हमारा उसूल है कि हम सात साल में ही नाम लिखते हैं, सो दो साल बढ़ा के नाम लिख दिया गया। पहले दिन स्कूल देर से पहुँचेतो घुटने टिका दिया गया, सलेट नहीं लाए तो गुड्डी तनवा दी , गुड्डी तने देर हुई तो नाक टपकी। मास्टर जी ने खैनी निकाल कर चैतन्य चूर्ण दबाई फिर छड़ी की और हमारी ओर देखा।

बस यहीं से जीवन अच्छे रास्ते पर चल पड़ा। अपने आप चली आयी नियमितता,अनुशासन की लहर, पढ़ने का जुनून, कुछ बन जाने की ललक। पहले दिन गांधी को पढ़ा, कई दिन बाद परसाई जी का “टार्च बेचने वाला” पढ़ा, फिर पढ़ते रहे और पढ़ते ही गए … 

आज अखबार में पढ़ते हैं, मास्टर जी ने बच्चे का कान पकड़ लिया तो हंगामा हो गया… स्कूल का बालक मेडम को लेकर भाग गया… स्कूल के दो बच्चों के बीच झगड़े में छुरा चला … स्कूल के मास्टर ने ट्यूसन के दौरान बेटी की इज्जत लूटी … और न जाने क्या … क्या … !

© जय प्रकाश पाण्डेय

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ मोबाइल है, या मुसीबत – भाग – 3 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।”

आज प्रस्तुत है संस्मरणात्मक आलेख – “मोबाइल है, या मुसीबत” की अगली कड़ी। )

☆ आलेख ☆ मोबाइल है, या मुसीबत  – भाग – 3 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

दिल्ली से वापसी के लिए हम स्टेशन पर स्थित आरक्षण काउंटर पर पहुंचे वहां एक दम pin drop silent जैसा माहौल था। जब फार्म मांगा तो उसने ऐसे देखा जैसे बैंक में आज कोई ड्राफ्ट बनवाने का फार्म मांगता है। काउंटर वाले बाबूजी भी कान से डोरी निकालते हुए बोले, क्यों मोबाइल नहीं है क्या ? जब पूरी दुनिया नेट से टिकट निकाल रही है, आप तो बाबा आदम के जमाने के लगते हो। हमने उससे झूठ बोलते हुए कहा अभी ट्रेन में चोरी हो गया है। फॉर्म के साथ हमने पांच सौ का नया कड़क नोट भी दिया, बोला छुट्टे 485 दो, अभी बोहनी कर रहा हूं। दिन के बारह बज रहे थे, चार घंटे से काउंटर चालू है। खैर हमने भी उसको सौ के चार और दस के नौ नोट दिए और बोला पांच आप दे दो। वो तुरंत बोला बैंक में कैशियर थे, भुगतान हमेशा सौ और दस के नोट से करने की आदत रही होगी। टिकट लेकर और बिना पांच वापिस लिए हम ऑटो स्टैंड पहुंच गए।              

कुछ वर्ष पूर्व तो ऑटो वाले लपक कर सूटकेस आदि झपट कर ऑटो तक ले जाते थे। उस समय रईस टाइप की फीलिंग आती थी। इस बार ऑटो वाला अपने ऑटो में शांत और कान में डोरी डाल कर बैठे है, कहीं हड़ताल तो नही है ना ? पेट्रोल के बढ़ते दामों के कारण। एक ऑटो वाले को हमने अपने गंतव्य स्थान के लिए कहा तो कान से डोरी निकाल कर सुस्ताते हुए गुस्से से उसने कहा पीछे बैठ जाओ। फिर उसने हमारे ब्रीफकेस को चेन से बांध कर lock लगा दिया। हमने जिज्ञासा से पूछा ये ताला क्यो तो वो बोला अभी आप भी अपने मोबाइल में मग्न हो जायेंगे तो उठाईगीर कई बार सामान उठा कर भाग जाते है, और कभी कभी सवारी भी ट्रैफिक जाम में तेजी से बढ़ते मीटर को देखकर भी ऑटो धीरे होने पर बिना पैसे दिए नो दो ग्यारह हो जाती है। इसलिए अपनी पेमेंट को भी सुरक्षित कर लेते है।

जब अपने रिश्तेदार के यहां पहुंचे तो वहां  अकेला पुत्र  ही था। तीन चार बार घंटी बजाने पर भी दरवाज़े नहीं खुला तो हमने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा कर, बंद मोबाइल को चालू किया और उसको घंटी दी, तब दरवाज़ा खुला तो बोला अंकल मैं मोबाइल पर music सुन रहा था, एकदम latest है, ” Amy winehouse – Back to Black”। लाइए, आप के मोबाइल में भी down load कर देता हूं। ना कोई दुआ ना सलाम, सच में मोबाइल है या मुसीबत ❓ 📱

© श्री राकेश कुमार

संपर्क –  B  508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण # 131 ☆ जलेबी वाले जीजा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक अविस्मरणीय संस्मरण “जलेबी वाले जीजा”।)  

☆ संस्मरण  # 131 ☆ जलेबी वाले जीजा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

हम पदोन्नति पाकर जब बिलासपुर आए तो हमारे बचपन के खास मित्र मदन मोहन अग्रवाल  ने बताया कि जीजा बिलासपुर में रहते हैं, गोलबाजार की दुकान में बैठते हैं और लिंक रोड की एक कालोनी में रहते हैं, बिलासपुर नये नये गए थे तो बैंक की नौकरी के बाद कोई बहाना ढूंढकर गोलबाजार की दुकान जीजा से मिलने पहुंच जाते,

जीजा शुरु शुरु में डरे कि कहीं ये आदमी उधार – सुधार न मांगने लगे तो शुरु में लिफ्ट नहीं दी। फिर जब देखा कोई खतरा नहीं है तो एक दिन घर बुला लिया। बिलासपुर के बिनोवा नगर मे हम अकेले रहते तो कभी कभी बोरियत लगती पर जीजा से बार बार मिलने में संकोच होता कि उनके व्यापार में डिस्टर्ब न होवे तो कई बार गोलबाजार के चक्कर लगा के लौट जाते। हांलाकि उन दिनों बिलासपुर छोटा और अपनापन लिए धूल भरा छोटा शहर जैसा था,और जबलपुर के छोटे भाई जैसा लगता था। गोलबाजार की उनकी मिठाई की दुकान बड़ी फेमस थी।  हम मिष्ठान प्रेमी भी थे मिठाईयों से उठती सुगंधित हवा सूंघने का आनंद लेते पर जीजा कभी कोई मिठाई को नहीं पूछते। कई बार लगता कहीं बड़े कंजूस तो नहीं हैं। जब छुट्टी में जबलपुर लौटते तो मित्र मदन गोपाल से टोह लेते तो पता चलता कि जीजा बड़े दिलेर हैं, जब भांवर पड़ रहीं थी तो दिद्दी की सहेली को लेकर भागने वाले थे। हम जब बिलासपुर लौटे तो इस बार मिठाइयों को देख देख जीजा की खूब तारीफ की, पर वे हंसी ठिठोली करने में माहिर, काहे को पिघलें, हमनें भी एक दिन गरमागरम जलेबी का आदेश दिया और बाहर खड़े होकर खाने लगे पर हाय रे जीजा,,  देखकर भी अनजान बन गए। जब पैसा देने गए तो मुस्कराते हुए हालचाल पूछा और बोले मिठाई कम खाना चाहिए …

* आज 24 साल बाद जब रिपोर्ट में बढ़ी हुई शुगर दिखाई दी तो लगा जीजा ठीक ही कहते थे। अब समझ में आया कि जीजा समझदार इंसान हैं तभी तो आत्मकथा की तीन चर्चित किताबें लिख डालीं। उनकी किताब जीवन से साक्षात्कार कराती है चलचित्र की तरह जीवन के अबूझ रहस्यों से सामना करने का हौसला देती है। 

© जय प्रकाश पाण्डेय

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संसमरण # 130 ☆ परसाई के रुप राम ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक अविस्मरणीय संस्मरण “परसाई के रुप राम ”।)  

☆ संस्मरण  # 130 ☆ परसाई के रुप राम ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जबलपुर के बस स्टैंड के बाहर पवार होटल के बाजू में बड़ी पुरानी पान की दुकान है।

रैकवार समाज के प्रदेश अध्यक्ष “रूप राम” मुस्कुराहट के साथ पान लगाकर परसाई जी को पान खिलाते थे। परसाई जी का लकड़ी की बैंच में वहां दरबार लगता था। इस अड्डे में बड़े बड़े साहित्यकार पत्रकार इकठ्ठे होते थे साथ में पाटन वाले चिरुव महराज भी बैठते। वही चिरुव महराज जो जवाहरलाल नेहरू के विरुद्ध चुनाव लड़ते थे। बाजू में उनकी चाय की दुकान थी। मस्त मौला थे।

आज उस पान की दुकान में पान खाते हुए परसाई याद आये, रुप राम याद आये और चिरुव महराज याद आये। पान दुकान में रुप राम की तस्वीर लगी थी, परसाई जी रुप राम रैकवार को बहुत चाहते थे। उनकी कई रचनाओं में पान की दुकान, रुप राम और चिरुव महराज का जिक्र आया है।

अब सब बदल गया है। बस स्टैंड उठकर दूर दीनदयाल चौक के पास चला गया। परसाई नहीं रहे और नहीं रहे रुप राम और चिरुव महराज…। पान की दुकान चल रही है रुप राम का नाती बैठता है। बाजू में पुलिस चौकी चल रही है। पवार होटल भी चल रही है। चिरुव महराज की चाय की होटल बहुत पहले बंद हो गई थी एवं वो पुराने जमाने का बंद किवाड़ और सांकल भी वहीं है और रुप राम तस्वीर से पान खाने वालों को देखते रहते हैं।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ मोबाइल है, या मुसीबत  – भाग – 1 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।”

आज प्रस्तुत है एक संस्मरणात्मक आलेख – “मोबाइल है, या मुसीबत.)

☆ आलेख ☆ मोबाइल है, या मुसीबत  – भाग – 1 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी मैने जैसे ही लिखा, कि मोबाइल के भीतर से एक आवाज़ आई “जिस थाली में खाते हो उसी में छेद करते हो”, नाशुक्रे, गद्दार, एहसानफरामोश, नमकहराम।

हमने उसे कहा ज़रा रुको अभी आगे तो देखो! तुम तो हमारे जैसे बुजुर्गों के समान अधीर हो रहे हो। पूरी बात सुनते नहीं और अपना रोना रोने लग जाते हो। हम तो सठिया गए है, तुम तो अभी अभी पैदा ही हुए हो।

मोबाइल भी आज  सुनने के मूड में था, पुरानी कोई कसक रही होगी!  

दिवाली पर मैं भी छः वर्ष का हो जाऊंगा, बैटरी जवाब दे रही है। दिन भर बिजली का करंट लगता रहता है। इतने सारे ग्रुप बना लिए हो, मेमोरी भी हमेशा लबालब रहती है, जैसे कि भादों में उफनाती नदियां हो जाती है। मेरे स्क्रीन पर इतने स्क्रेचेस है, जितने आपके चेहरे पर झुरियां नही हैं। हर एक सेकंड में कोई नया SMS आ जाता है, और तो और, आप भी हर SMSपर प्रतिक्रिया करने में All India Ranker के टॉप दस में रहते हो। दिन भर आंखे गड़ाए इंतजार करते रहते हो। कोई नया MSG आए तो बिना पढ़े ही दूसरे ग्रुप में सांझा कर Most active मेंबर की ट्रॉफी पर हक़ बना रहे।

अब तो सुबह उठने के लिए मुझे ही मुर्गा बना रखा है, प्रातः और सांय भ्रमण में भी मुझसे अपने कदम गिनवा लेते हो।    

तंग आकर मैंने कहा बस कर मेरे बाप!            

आप लोगों को बताना कुछ और चाह रहा था।

खैर अब शेष लिखूंगा भाग 2 में📱

© श्री राकेश कुमार

संपर्क –  B  508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण # 126 ☆ “यादों में रानीताल” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है बैंकर्स के जीवन पर आधारित एक अतिसुन्दर संस्मरण यादों में रानीताल”।)  

☆ संस्मरण # 126 ☆ “यादों में रानीताल” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

कल जबलपुर के रानीताल की बात निकल आयी भत्तू की पान की दुकान पर ,,  

ठंडी सुबह में दूर दूर तक फैला कोहरा… रानीताल के सौंदर्य को और निखार देता था । चारों तरफ पानी और बाजू से नेशनल हाईवे से कोहरे की  धुन्ध में गुजरता हुआ कोई ट्रक ……… 

पर अब रानीताल में उग आए हैं  सीमेंट के पहाड़नुमा भवन ……….।

परदेश में बैठे लोगों की यादों में अभी भी उमड़ जाता है रानीताल का सौंदर्य ……

पर इधर रानीताल चौक में आजकल लाल और हरे सिग्नल मचा रहे हैं धमाचौकड़ी ………।

यादों में अभी भी समायी है वो रानीताल चौक की सिंधी की चाय की दुकान जहाँ सुबह सुबह 15 पैसे में गरम गरम चाय मिलती थी । 

रात को आठ बजे सुनसान हो जाता था रानीताल चौक ……… रिक्शा के लिए घन्टे भर इन्तजार करना पड़ता था,अब ओला तुरन्त दौड़ लगाकर आ जाती है ।

संस्कारधानी ताल – तलैया की नगरी……

किस्सू कहता “ताल है अधारताल, बाकी हैं तलैयां ” फिर सवाल उठता है इतना बड़ा रानीताल ? 

रानीताल चौक, रानीताल श्मशान, रानीताल बस्ती, रानीताल मस्जिद और रानीताल के चारों ओर के चौराहे……. पर अब सब चौराहे बहुत व्यस्त हो गए हैं चौराहे के पीपल के नीचे की चौपड़ की गोटी फेंकने वाले अब नहीं रहे पीपल के आसपास गोटी फिट करने वाले दिख जाते हैं……… कभी कभी।

अहा जिंदगी…

अहा यादों में रानीताल……..

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – संस्मरण ☆ लेखांक # 11 – मी प्रभा… आध्यात्माची वाट ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? आत्मकथन ?

☆ लेखांक# 11 – मी प्रभा… आध्यात्माची वाट ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

या अकरा भागात मी तुम्हाला माझी जीवनकथा थोडक्यात सांगितली, म्हणजे ढोबळमानाने माझं जगणं….हे असंच आहे.सगळेच बारकावे, खाचाखोचा शब्दांकित करणं केवळ अशक्य!

पण खोटं, गुडी गुडी असं काहीच लिहिलं नाही, मी आहे ही अशी आहे,  साधी- सरळ, आळशी,वेंधळी,काहीशी चवळटबा ही,मी स्वतःला नियतीची लाडकी लेक समजते,खूप कठीण प्रसंगात नियतीने माझी पाठराखण केली आहे. ….मी नियती शरण आहे! गदिमा म्हणतात तसं,”पराधीन आहे जगती पुत्र मानवाचा” याचा प्रत्यय मी घेतला आहे!

अनेकदा मला माझं आयुष्य गुढ,अद्भुतरम्य ही वाटलेलं आहे….अनेकदा असं वाटतं, इथे प्रत्येक गोष्ट मनाविरुद्धच घडणार आहे का ?……पण पदरात पडलेलं प्रतिभेचं इवलंसं दान ही आयुष्यभराची संजीवनी ठरली आहे.अनेकदा माणसं उगाचच दुखावतात,अर्थात वाईट तर वाटतंच, पण कुणीतरी म्हटलंय ना, जब कोई दिलको दुखाता है तो गज़ल होती है……

कविता, लेखन आयुष्याचा अविभाज्य घटक!

सुमारे वीस वर्षापूर्वी माझ्याकडे अनेक वर्षे काम करणा-या कामवाल्या मावशींबरोबर हरिमंदिरात जाऊ लागले, नंतर बेळगावला जाऊन  कलावती आईंचा अनुग्रह घेतला, सरळ साधा भक्तिमार्ग, नामस्मरण, भजन, पूजन!शिवभक्ती, कृष्ण भक्ती! संसारात राहून पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग  स्वीकारता येत नाही. मनाला काही बांध घालून घेतलेले…..आयुष्य पुढे पुढे चाललंय, जे घडून गेलं ते अटळ होतं, त्याबद्दल कुणालाच दोष नाही देत, मी कोण? पूर्वजन्म काय असेल? भृगुसंहितेत स्वतःला शोधावसं अनेकदा वाटलं,पण नाही शोधलं, आई म्हणतात, भविष्य विचारू नका कुणाला, सत्कर्म करत रहा, कलावतीआईंचा भक्तिमार्ग सरळ सोपा….त्या मार्गावर जाण्याचा प्रयत्न, दोन वर्षांपूर्वी मणक्याचं ऑपरेशन झालं, हाॅस्पिटलमधून कोरोनाची लागण झाली..सगळं कुटुंब बाधित झालं, हे सगळं आपल्यामुळे झालं असं वाटून प्रचंड मानसिक त्रास झाला, यातून नामस्मरण आणि ईश्वर भक्तीनेच तारून नेलं!

“मी नास्तिक आहे”  म्हणणारी माणसं मला प्रचंड अहंकारी वाटतात.कदाचित कुठल्याही संकटाला सामोरं जायची ताकद त्यांच्यात असावी.

पण ज्या ईश्वराने आपल्याला जन्माला घातलं आहे त्याला निश्चितच आपली काळजी आहे असा माझा ठाम विश्वास आहे.कोरोनाबाधित असताना मनःशांतीसाठी ऑनलाईन अनेक मेडिटेशन कोर्सेस केले, ऑनलाईन रेकी शिकायचा प्रयत्न केला.पण ते काहीच फारसं यशस्वी झालं नाही.

आपल्या आतच सद् सद्विवेक बुद्धी वास करत असते ती सतत जागृत ठेवून दिवसभरात एकदा केलेलं ईश्वराचं चिंतन, दुस-या कुणा व्यक्तीबद्दल द्वेष, मत्सर, ईर्षा न बाळगणे हेच सुलभ सोपं आध्यात्म आहे असं मला वाटतं!

लेखमाला समाप्त ?

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – डायरी-संस्मरण ☆ उसका बचपन, मेरा बचपना ☆ डॉ. हंसा दीप ☆

डॉ. हंसा दीप

संक्षिप्त परिचय

यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। तीन उपन्यास व चार कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी व पंजाबी में पुस्तकों का अनुवाद। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020।

☆ डायरी-संस्मरण – उसका बचपन, मेरा बचपना ☆ डॉ. हंसा दीप 

युग तो नहीं गुजरे मेरा अपना बचपन बीते, पर फिर भी न जाने क्यों ऐसा लगता है कि जैसे वह कोई और जमाना था जब मैं और मेरे हमउम्र पैदा होकर बस ऐसे ही बड़े हो गए थे। हालांकि अभी भी बचपन की यादें ताजा हैं। सारी यादें पलट-पलट कर आती हैं और उस मासूम-से समय के टुकड़े के साथ जुगाली करते हुए सामने खड़ी हो जाती हैं। अब, जब नानी बनकर आज के बचपन को ये आँखें लगातार देख रही हैं तो अपने बचपन का बेचारापन बरबस ही सामने आकर बतियाने लगा है। इन दिनों रोज ही कुछ ऐसा आभास होने लगा है जैसे अपना वह बचपन और आज का बचपन, युगों के अंतराल वाली कहानी-सा बन गया है।

आज के बच्चों का जो बचपन है उसे देखकर मेरी तरह कितने ही दादा-दादी-नाना-नानी कई बार सोच ही लेते हैं कि “काश हम भी अभी बच्चे होते।” इन बच्चों के पैरों के साइज़ की क्रिब इनके बढ़ते-बढ़ते तब तक बड़ी होती है, जब तक ये खुद चार साल की उम्र को पार नहीं कर लेते। उसके बाद तो एक पूरा का पूरा कमरा इनका होता है, जो खिलौनों से, टैडी बेयर से, कपड़ों से भरा रहता है। बसंत, गर्मी, पतझड़ और सर्दी हर मौसम के अलग-अलग जूते और अलग-अलग कपड़े। हमारे जमाने में अपनी दुकान के पास वाले पेड़ से, चादर या साड़ी बांधकर पालना बना दिया जाता था और हम ठंडी हवा के झोंकों में मस्त नींद ले लेते थे। कमरे और कपड़ों की कहानी तो अपनी जुबानी याद है। एक कमरे में पाँच से कम का तो हिसाब होता ही नहीं था। लाइन से जमीन पर सोए रहते थे। एक-दूसरे की चादर खींचते हुए, लातें खाते हुए भी नींद पूरी कर लेते थे। तीन-चार साल के बच्चों तक के लिये नये कपड़े आते ही नहीं थे। एक पेटी भरी रहती थी ऐसी झालर वाली टोपियों से, स्वेटरों से, झबले, फ्राक और बुश्शर्ट-नेकर से। आने वाले हर नये बच्चे के लिये इन कपड़ों की जरूरत होती थी। एक कपड़ा खरीदो, पाँच बच्चों को बड़ा कर लो। अनकहा, अनसमझा, रिसायकल वाला सिस्टम था, कपड़ा धोते ही नया हो जाता था।   

जब इन बच्चों के लिये स्मूदी, फलों का शैक बनता है तो मुझे याद आता है तब बेर के अलावा कोई ऐसा फल नहीं था जो हमारे लिये घर में नियमित आता था। बैर बेचने वाली आती थी तो सीधे टोकरी से उठा कर खा लेते थे। फल को धोकर खाने वाली बात के लिये कभी डाँट खायी हो, याद नहीं। सब कुछ ऐसा बिंदास था कि किसी तरह की रोका-टोकी के लिये बिल्कुल जगह नहीं थी। 

आज की मम्मी अपने बच्चों के लिये जब प्रोटीन और कैलोरी गिनती हैं तो मैं सोचती हूँ कि मेरी जीजी (माँ) को कहाँ पता था इन सबके बारे में! वे तो ऊपर वाली मंजिल के किचन से नीचे अनाज की दुकान तक के कामों लगी रहती थीं। कुछ इस तरह कि ऊपर-नीचे के चक्करों में बच्चों के आगे-पीछे चक्कर लगा ही नहीं पातीं। तब हम भाई-बहन अपनी अनाज की दुकान के मूँगफली के ढेर पर बगैर रुके, बगैर हाथ धोए, पेट भर कर मूँगफली छीलते-खाते। कड़वा दाना आते ही मुँह बनाकर अच्छे दाने की खोज में लग जाते। होले- हरे चने के छोड़, जिन्हें पहले तो बैठकर सेंकना और फिर घंटे भर तक खाते रहना। हाथ-मुँह-होंठ हर जगह कालिमा न छा जाए तो क्या होले खाए। ताजी कटी हुई ककड़ियाँ व काचरे शायद हमारे आयरन का सप्लाय था। ये सब खाकर पेट यूँ ही भर जाता था। थोड़ा खाना खाया, न खाया और किचन समेट लिया जाता था। शायद इसीलिये मोटापन दूर ही रहा। बगैर किसी ताम-झाम के भरपूर प्रोटीन और नपी-तुली कैलोरी।    

जब बच्चे कार में बैठ कर स्कूल के लिये रवाना होते हैं तो मेरी अपनी स्कूल बरबस नजरों के सामने आ जाती है जहाँ आधे किलोमीटर पैदल चल कर हम पहुँचते थे। रिसेस में खाना खाने फिर से घर आते थे। कभी कोई लंच बॉक्स या फिर पानी ले जाना भी याद नहीं। स्कूल के नल से पानी पी लेते थे। कभी यह ताकीद नहीं मिलती कि “हाथ धो कर खाना, नल का पानी मत पीना।” आज इन बच्चों के लिये हैंड सैनेटाइजर का पूरा पैकेट आता है। इनके बस्ते से, लंच बॉक्स से टँगे रहते हैं। गाड़ी में भी यहाँ-वहाँ हर सीट के पास रखे होते हैं। जितनी सावधानी रखी जा रही है उतने बैक्टेरिया भी मारक होते जा रहे हैं। एक से एक बड़ी बीमारियाँ मुँह फाड़े खड़ी हैं। तब भी होंगी। उस समय कई बच्चों के विकल्प थे। मैं नहीं तो मेरा भाई या फिर मेरी बहन, एक नंबर की, दो नंबर की। अब “हम दो हमारे दो” के बाद, “हम दो हमारा एक” ने परिभाषाएँ पूरी तरह बदल दी हैं।

अब बच्चों की प्ले डेट होती है। फोन से समय तय कर लिया जाता है। छ: साल के नाती, शहंशाहेआलम मनु के द्वारा नानी को चेतावनी दी जाती है– “नानी मेरे दोस्तों के सामने हिन्दी मत बोलना, प्लीज़।” गोया नानी एक अजूबा है, जो उसके उन छोटे-छोटे मित्रों को हिन्दी बोल कर डरा दे। बड़ी शान है, बड़ा एटीट्यूड है व गजब का आत्मविश्वास है। मैं तो आज साठ-इकसठ की उम्र में भी अपने बड़े भाई से आँखें मिलाकर बात नहीं कर पाती। इन्हें देखो नाना-नानी भी इनके लिये एक खिलौना है। ऐसा खिलौना जिसे जब चाहे इस्तेमाल कर ही लेते हैं। हमारा समय तो बस ऐसा समय था कि चुपके से आया और निकल गया। कब आया, कब गया और कब बचपन में ही बड़े-से घर की जिम्मेदारी ओढ़कर खुद भी बड़े हो गए, पता ही न चला। गली-गली दौड़ते-दौड़ते छुपाछुपी खेलना, पकड़ में आ जाना व फिर ढूँढना। न तो ऐसे आईपैड थे हमारे हाथों में, न ही वीडियो गैम्स थे। हाथों में टूटे कवेलू का टुकड़ा लेकर, जिसे पव्वा कहते थे, घर के बाहर की पथरीली जमीन पर लकीरें खींच देते थे। उसी पर कूदते-फांदते, लंगड़ी खेलते बड़े होते रहते थे। बगैर किसी योजना के ही हर घंटे प्ले डेट हो जाती थी। कभी गिर जाते, खून बह रहा होता तो जीजी हल्दी का डिब्बा लाकर उस घाव में मुट्ठी भर हल्दी भर देतीं। पुराने पायजामे का कपड़ा फाड़कर पट्टी बांध देतीं। हम रो-धोकर आँसू पोंछते फिर से अपने घाव को देखते हुए निकल पड़ते थे।

इन बच्चों के लिये सुबह का खास नाश्ता बनता है। हम तो रात के बचे पराठे अचार के साथ खा लेते थे। पोषक आहार के तहत बच्चों की शक्कर पर इनके ममा-पापा नजर लगा कर रहते हैं। हम तो शक्कर वाली मीठी गोलियाँ ऐसे कचड़-कचड़ चबाते रहते थे जैसे उस आवाज से हमारा गहरा रिश्ता हो। बाजार के मीठे रंग वाले, लाल-पीले-हरे बर्फ के लड्डू चूस-चूस कर खाते रहते थे। कभी कोई “मत खाओ” वाली ना-नुकुर नहीं होती। हमारा यह स्वाद सबसे सस्ता होता था फिर भला कोई कुछ क्यों कहता!

मुझे अपना बरसों का अनुभव और ज्ञान अपने नाती मनु को देने की बहुत इच्छा होती है। सुना तो यही है कि सारा ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो जाता है। यहाँ भी मैं मन मसोस कर रह जाती हूँ। उसे कुछ पूछना होता है तो ‘सिरी’ और ‘एलेक्सा’ उसके बगल में खड़ी होती हैं। नानी से कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ती। मेरा ज्ञान भी उसके किसी काम का नहीं रहा।

एक बात बहुत अच्छी है, नया सीखने की मेरी ललक अभी भी है। हालांकि वही अच्छी बात उल्टे प्रहार करती है जब हाथों में रिमोट लेकर निनटेंडो गैम खेलना शुरू करती हूँ। कुछ ही पलों में मनु मेरे हाथ से रिमोट खींचकर मेरे मरते हुए कैरेक्टर को बचाता है।

“नानी आपको तो बिल्कुल भी खेलना नहीं आता। आप तो अपने प्लेयर को मारने पर तुली हुई हैं।” ऐसी हिंसक मैं कभी सपने में भी नहीं होती, लेकिन खेलते हुए कैसे हो जाती हूँ यह आज तक समझ ही नहीं पायी!

“ये निगोड़े गैम में क्यों मरना-मारना लेकर आते हैं!” कहते हुए मैं अपना सिर ठोक लेती हूँ। मनु को कोई जवाब न देकर बुरी तरह हार जाती हूँ। अपने से पचपन साल छोटे बच्चे से हारकर मैं बहुत बेवकूफ महसूस करती हूँ। ऐसा नहीं कि यह हारने का अफसोस हो, सिर्फ हारती तो कोई बात नहीं थी, मगर उसके मन में जो अपनी मूर्खता वाली भावना अनजाने ही छोड़ देती हूँ, उसकी कसक बनी रहती है। मैं बड़ी हूँ, मुझे सब कुछ आना चाहिए। अपने समय में कभी नानी के लिये ऐसा कुछ सोचने की, कुछ कहने की जुर्रत नहीं की। ऐसा कोई मौका मिला भी नहीं। तब तो आदेश होते थे व हम पालन करते थे। बच्चे भी तो एक, दो नहीं थे, पूरे के पूरे दस, या तो इससे एक-दो कम, या एक-दो ज्यादा।

रोज-रोज के इन नये खेलों को सीखना मेरे बस की बात नहीं रही इसलिये मैंने भी तय कर लिया कि उसके बचपन और मेरे बचपने को मिलाकर एक नया रास्ता बना लेती हूँ। धीरे-धीरे दोनों का तालमेल अच्छा होने लग गया है। ऐसा करके जीना मुझे भाने लगा है। फिर भी एक टीस तो है, मैं बदलाव को स्वीकार तो कर रही हूँ, पर मैंने दुनिया में आने की इतनी जल्दी क्यों दिखाई, कुछ साल और रुक जाती।

© डॉ. हंसा दीप

संपर्क – Dr. Hansa Deep, 22 Farrell Avenue, North York, Toronto, ON – M2R1C8 – Canada

दूरभाष – 001 647 213 1817

hansadeep8@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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