हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 573 ⇒ डेविड मैनुअल (David Manuel) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डेविड मैनुअल (David Manuel)।)

?अभी अभी # 573 ⇒ डेविड मैनुअल (David Manuel) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बैंकिंग की दुनिया में मेरा वास्ता केवल मैन्युअल ऑफ इंस्ट्रक्शंस से ही पड़ा था, जो हमारे लिए गीता, बाइबल, कुरआन ही नहीं, बैंकिंग उद्योग का एक तरह से संविधान ही था। बस हमने बैंक ज्वॉइन करने के पहले सिर्फ इस संविधान की शपथ ही नहीं ली थी, लेकिन हम पूरी तरह से इसके लकीर के फकीर थे।

हमारी शाखा में एक जीता जागता मैनुएल और था, जिसका नाम डेविड मैनुअल था। एक हड्डी का, जवानी में बुजुर्गियत ओढ़े यह शख्स सिर्फ अंग्रेजी बोलना ही जानता था। मेन्यूअल ऑफ इंस्ट्रक्शंस और मिस्टर डेविड मैनुएल की अंग्रेजी एक जैसी थी, जिसे समझना हिंदीभाषी कर्मचारियों के लिए टेढ़ी खीर था।।

फिर भी जिस तरह हम हिंदी भाषी, टूटी फूटी अंग्रेजी से काम चला लेते हैं, मिस्टर डेविड भी टूटी फूटी हिंदी से काम चला ही लेते थे। यह तब की बात है, जब दफ्तरों में पान और धूम्रपान वर्जित नहीं था। मिस्टर डेविड भी एक चैन स्मोकर थे, और जरूरत पड़ने पर किसी डेली वेजेस के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से टूटी फूटी हिंदी में पुचकारते हुए, दो रुपए का नोट थमाकर, बाहर पान वाले से, दो विल्स और एक पान लाने का आग्रह करते थे। वह जब आदेश का पालन कर, बाकी पैसे लौटाने लगता, तो दरियादिली से कहते, कीप द चेंज। काम की अंग्रेजी हर भारतीय को आती है, वह खुश हो जाता।

अफसर हो अथवा क्लर्क, मिस्टर डेविड की धाराप्रवाह अंग्रेजी के बोझ से हमेशा दबे रहते, और फिर भी अपना रौब झाड़ने के लिए पूरा जोर लगाकर उन्हें अंग्रेजी में डांटने का प्रयास करते, जिसे मिस्टर डेविड अंग्रेजी में कोई घटिया सा जोक सुनाकर निष्प्रभावी कर देते। जोक हंसने के लिए होता है, इसलिए समझने वाले और नहीं समझने वाले दोनों, जोक पर हंस देते।।

मिस्टर डेविड मैनुएल कॉन्वेंट रिटर्न थे इसलिए उनका उच्चारण आम हिंदी भाषियों से अलग और परिष्कृत था। फिर भी वे हिन्दी प्रेमी थे, और एक आम नागरिक की तरह हिंदी और अंग्रेजी दोनों गालियों का बराबर प्रयोग करते थे। पूरे अंग्रेजी वाक्य में केवल हिंदी गालियों को इतना सम्मान देना, आसान नहीं। थ्री चीयर्स टू मिस्टर डेविड।

चीयर्स से याद आया, एक बरसात की शाम मिस्टर डेविड मुझसे बाजार में टकरा गए, और मुझे चाय का न्यौता दे बैठे। मुझे एक चाय की गंदी सी दुकान पर बैठाकर वे अचानक उठकर बाहर चले गए, और जब बाहर आए, तो उनके हाथ में एक बीयर की बोतल थी। मैं नहीं जानता था, उनकी चाय की परिभाषा। जब उन्होंने दो ग्लास और कुछ ठंडे भजिए बुलवाए, तो मैंने उनकी चाय पीने से मना कर दिया। उसी समय, मैं उनकी निगाह से गिर गया।।

इतना ही नहीं, पास की टेबल पर एक सज्जन को उल्टी हो गई, जिसे देख हमारे मित्र भी हड़बड़ा गए और उनकी बीयर की बोतल धक्का लगने से जमीन पर गिर, चकनाचूर हो गई। मुझे अफसोस हुआ कि मैने उनका मजा किरकिरा कर दिया। मैने आग्रह किया, मैं दूसरी बोतल ले आता हूं, लेकिन वे नहीं माने, और कसम खा ली कि कभी आगे से आपके साथ “चाय” नहीं पीऊंगा।

कल ही मिस्टर डेविड मैनुएल का जन्मदिन था, मैने विश किया, तो अनायास ही ४० वर्ष पुरानी दर्दनाक दास्तान याद आ गई। उम्र का असर उनकी अंग्रेजी पर भी पड़ गया है, अब वे केवल हिंदी में बात करते है हैं। बस इतना ही बोले, जिंदा हूं। आप कैसे हो शर्मा जी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 572 ⇒ दूर संवेदन और पूर्वाभास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर संवेदन और पूर्वाभास।)

?अभी अभी # 572 ⇒ दूर संवेदन और पूर्वाभास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या किसी की अनायास याद आना महज एक संयोग है। आज दूर संचार के माध्यमों ने हमारी वैचारिक तरंगों का स्थान ले लिया है। जब मन किया, कॉल कर लिया। जिन लोगों को कॉल से तसल्ली नहीं होती, वे वीडियो कॉल लगा लेते हैं। आज के डिजिटल इंडिया में राष्ट्र के हर नागरिक के पास संजय की दिव्य दृष्टि है।

केवल कवि की पहुँच ही रवि तक नहीं होती, जब मन के घोड़े सरपट दौड़ते हैं, तो सात समंदर पार बैठा पिया, मल्हारगंज में बैठी मानसी के मन में ऐसा समा जाता है, कि इधर खयाल आया और उधर फोन की घंटी बजी। इसे कहते हैं टेलीपेथी। ।

बड़ी उम्र है आपकी! क्या विचित्र संयोग है, अभी अभी बस आपको याद ही किया था और आप हाजिर। हिचकी को हम कभी गंभीरता से नहीं लेते। क्या किसी के महज स्मरण मात्र से हिचकी आना बंद हो सकती है। कहीं यह टेलीपेथी तो नहीं! मन पर अगर लगाम लगा ली जाए, तो बड़ा काम का है यह मन। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसी मन की अवस्था से तो हम कभी फकीरी और कभी अमीरी का लुत्फ उठा सकते हैं।

हमारी संवेदना का स्तर जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होता चला जाता है, हमारे मन के द्वार खुलते चले जाते हैं। अन्नमय, मनोमय प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष में वह सब है, जो कुबेर के खजाने में भी नहीं। रावण और राम में बस यही अंतर है। ।

हमारा मन चेतन हो अथवा अवचेतन, आगे आने वाली घटनाओं का भी हमें पूर्वाभास होता रहता है। गणित का अध्ययन और धारणा ध्यान का मिला जुला स्वरूप ही है ज्योतिष और नक्षत्र विज्ञान। मंगल पर आप जब जाना चाहें जाएं, हम तो मंगलनाथ कल ही होकर आ गए। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी जैसी विद्याएं कहीं बाहर नहीं, हमारे अंदर ही मौजूद हैं। जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। बस इधर मन चंगा हुआ, उधर कठौती में गंगा प्रकट।

शरीर ही हमारा विज्ञान है और प्रकृति हमारी प्रयोगशाला। सभी वैज्ञानिक हाड़ मांस के पुतले ही थे, जब जिज्ञासा जुनून बन जाती है तब ही आविष्कार संभव होते हैं। ।

घर के जोगी बने रहें, अगर आन गांव में सिद्ध होने की कोशिश की, तो महात्मा बनने का खतरा है। अपनी सिद्धियों को छुपाए रखिए, उनका प्रदर्शन नहीं, सदुपयोग कीजिए, ज्ञानार्जन बुरा नहीं, ज्ञान का मार्केटिंग भ्रमित करने वाला है।

डोनेशन से एडमिशन और कोचिंग क्लासेस का ज्ञान ही आज हमारी धरोहर है, काहे की टेलीपेथी और इंटुइशन की मगजमारी।

इधर कॉल उधर तत्काल..! !

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 227 ☆ बहती धारा अनवरत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना बहती धारा अनवरत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 227 ☆ बहती धारा अनवरत

प्रकृति में वही व्यक्ति या वस्तु अपना अस्तित्व बनाये रह सकती है जो समाज के लिए उपयोगी हो, समय के साथ अनुकूलन व परिवर्तन की कला में सुघड़ता हो। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि मुझे जो मिलना चाहिए वो नहीं मिला या मुझे लोग पसंद नहीं करते।

यदि ऐसी परिस्थितियों का सामना आपको भी करना पड़ रहा है तो अभी भी समय है अपना मूल्यांकन करें, ऐसे कार्यों को सीखें जो समाजोपयोगी हों, निःस्वार्थ भाव से किये गए कार्य एक न एक दिन लोगों की दुआओं व दिल में अपनी जगह बना पायेंगे।

निर्बाध रूप से अगर जीवन चलता रहेगा तो उसमें सौंदर्य का अभाव दिखायी देगा, क्योंकि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। सोचिए नदी यदि उदगम से एक ही धारा में अनवरत बहती तो क्या जल प्रपात से उत्पन्न कल- कल ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो सकता था। इसी तरह पेड़ भी बिल्कुल सीधे रहते तो क्या उस पर पक्षियों का बसेरा संभव होता।

बिना पगडंडियों के राहें होती, केवल एक सीध में सारी दुनिया होती तो क्या घूमने में वो मज़ा आता जो गोल- गोल घूमती गलियों के चक्कर लगाने में आता है। यही सब बातें रिश्तों में भी लागू होती हैं इस उतार चढ़ाव से ही तो व्यक्ति की सहनशीलता व कठिनाई पूर्ण माहौल में खुद को ढालने की क्षमता का आंकलन होता है। सुखद परिवेश में तो कोई भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर वाहवाही लूट सकता है पर श्रेष्ठता तो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना लोहा मनवाने में होती है, सच पूछे तो वास्तविक आंनद तभी आता है जब परिश्रम द्वारा सफलता मिले।

नदियों की धारा जुड़ी, राह को बनाते मुड़ी

जल का प्रवाह बढ़ा, कल- कल सी बहे।

*

सागर की ओर चली, बन मतवाली कली

बूंद- बूंद वन- वन, छल- छल सी रहे।।

*

संगम को अकुलाई, बिना रुके चल आई

जीवन को सौंप दिया, सुकुमारी सी कहे।

*

जल बिन कैसे जियें, घूँट- घूँट कैसे पियें

शुद्धता का भाव धारे, मौन मूक सी सहे।।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 326 ☆ आलेख – पठनीयता का अभाव सोशल मीडीया और लघु पत्रिकाएं श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 326 ☆

? आलेख – पठनीयता का अभाव सोशल मीडीया और लघु पत्रिकाएं ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

मुझे स्मरण है, पहले पहल जब टी वी आया तब पत्रिकाओं और किताबो पर इसे मीडीया का खतरा बताया गया था। फिर सोशल मीडीया का स्वसंपादित युग आ गया। अतः यह बहस लाजिमी ही है कि इसका पत्रिकाओं पर क्या प्रभाव हो रहा है। जो भी हो दुनियां भर में केवल प्रकाशित साहित्य ही ऐसी वस्तु हैं जिनके मूल्य की कोई सीमा नही है, इसका कारण है पुस्तको में समाहित ज्ञान। और ज्ञान अनमोल होता है। लघु पत्रिकाओं के वितरण का कोई स्थाई नेटवर्क नहीं है। वे डाक विभाग पर ही निर्भर हैं, अब सस्ते बुक पोस्ट की समाप्ति हो गई है। अतः मुद्रण से लेकर वितरण तक ये पत्रिकाएं जूझ रही हैं। इसलिए ई बुक फ्लिप फॉर्मेट, पीडीएफ में सॉफ्ट स्वरूप मददगार साबित हो रहा है। पठनीयता का अभाव, कागज और पर्यावरण की चिंता पुस्तको के हार्ड कापी स्वरूप पर की जा रही है। सचमुच एक कागज खराब करने का अर्थ एक बांस को नष्ट करना होता है यह तथ्य अंतस में स्थापित करने की जरूरत है।

प्रकाशन सुविधाओं के विस्तार से आज रचनाकार राजाश्रय से मुक्त अधिक स्वतंत्र है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार आज हमारे पास है। आज लेखन, प्रकाशन, व वांछित पाठक तक त्वरित पहुँच बनाने के तकनीकी संसाधन कही अधिक सुगम हैं। लेखन की व अभिव्यक्ति की शैली तेजी से बदली है। माइक्रो ब्लागिंग इसका सशक्त उदाहरण है। पर आज नई पीढ़ी में पठनीयता का तेजी हृास हुआ है। साहित्यिक किताबो की मुद्रण संख्या में कमी हुई है। आज साहित्य की चुनौती है कि पठनीयता के अभाव को समाप्त करने के लिये पाठक व लेखक के बीच उँची होती जा रही दीवार तोड़ी जाये। पाठक की जरूरत के अनुरूप लेखन तो हो पर शाश्वत वैचारिक चिंतन मनन योग्य लेखन की ओर पाठक की रुचि विकसित की जाये। आवश्यक हो तो इसके लिये पाठक की जरूरत के अनुरूप शैली व विधा बदली जा सकती है, प्रस्तुति का माध्यम भी बदला जा सकता है। इस दिशा में लघु पत्रिकाओं का महत्व निर्विवाद है। लघु पत्रिकाओं का विषय केंद्रित, सुरुचिपूर्ण, अनियतकालीन प्रकाशन और समर्पण, पाठकों तक सीमित संसार रोचक है।

समय के अभाव में पाठक छोटी रचना चाहता है, तो क्या फेसबुक की संक्षिप्त टिप्पणियो को या व्यंग्य के कटाक्ष करती क्षणिकाओ को साहित्य का प्रमुख हिस्सा बनाया जा सकता है ? यदि पाठक किताबो तक नही पहुँच रहे तो क्या किताबो को पोस्टर के वृहद रूप में पाठक तक पहुंचाया जावे ? क्या टी वी चैनल्स पर किताबो की चर्चा के प्रायोजित कार्यक्रम प्रारंभ किये जावे ? ऐसे प्रश्न भी विचारणीय हैं। जो भी हो हमारी पीढ़ी और हमारा समय उस परिवर्तन का साक्षी है जब समाज में कुंठाये, रूढ़ियां, परिपाटियां टूट रही हैं। समाज हर तरह से उन्मुक्त हो रहा है, परिवार की इकाई वैवाहिक संस्था तक बंधन मुक्त हो रही है, अतः हमारी लेखकीय पीढ़ी का साहित्यिक दायित्व अधिक है। निश्चित ही आज हम जितनी गंभीरता से इसका निर्वहन करेंगे कल इतिहास में हमें उतना ही अधिक महत्व दिया जावेगा।

किताबें तब से अपनी जगह स्थाई रही हैं जब पत्तो पर हाथों से लिखी जाती थीं। मेरी पीढ़ी को हस्त लिखित और सायक्लोस्टाईल पत्रिका का भी स्मरण है। , मैंने स्वयं अपने हाथो, स्कूल में सायक्लोस्टाईल व स्क्रीन प्रिंटेड एक एक पृष्ठ छाप कर पत्रिका छापी है। आगे और भी परिवर्तन होंगे क्योंकि विज्ञान नित नये पृष्ठ लिख रहा है, मेरा बेटा न्यूयार्क में है, वह ज्यादातर आडियो बुक्स ही सुनता गुनता है। किन्तु मेरे लिये बिस्तर पर नींद से पहले हार्ड कापी की लघु पत्रिकाओं और किताब का ही बोलबाला है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 571 ⇒ तलत की लत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सौन्दर्य बोध।)

?अभी अभी # 571 ⇒ तलत की लत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आदत तो खैर अच्छी बुरी हो सकती है लेकिन किसी चीज की लत अच्छी नहीं।

जुआ, शराब, गुटका और सिगरेट, बहुत बुरी है इनकी लत, लेकिन अगर किसी दीवाने को लग जाए तलत की लत, तो वह क्या करे। एक ओर बदनाम लत और दूसरी ओर मशहूर तलत ;

क्या करूं मैं क्या करूं

ऐ गमे दिल क्या करूं।

तलत एक ऐसा गायक है, जो दिल से गाता है, और दिल भी किसका, एक वतनपरस्त गरीब का ;

मैं गरीबों का दिल हूं

वतन की जुबां।

उसे जिंदगी की तलाश है ;

ऐ मेरी जिंदगी तुझे ढूंढूं कहां

न तो मिल के गए

न ही छोड़ा निशान।

पसंद अपनी अपनी, प्यार अपना अपना। दीवानों का क्या, जो सहगल के दीवाने थे, उनके गले कोई दूसरा गायक उतरता ही नहीं था। अपना अपना नशा है भाई, अपना अपना ब्रांड। सबको झूमने की छूट है, क्योंकि यह संगीत की दुनिया है और गायकी यहां का इल्म है।।

तलत का मुसाफिर अपनी ही धुन में रहता है ;

चले जा रहे हैं किनारे किनारे, मोहब्बत के मारे।

उसकी मजबूरी तो देखिए बेचारा ;

तस्वीर बनाता हूं,

तस्वीर नहीं बनती।

एक ख्वाब सा देखा है

ताबीर नहीं बनती।

कितनी शिकायत है उसे जिंदगी देने वाले से ;

जिंदगी देने वाले सुन

तेरी दुनिया से दिल भर गया

मैं यहां जीते जी मर गया।

एक सच्चे कलाकार की भी यही त्रासदी होती है। केवल जिसे कला की पहचान है, जो तलत का कद्रदान है, वही तलत के दर्द को समझ सकता है;

शामे गम की कसम

आज गमगीन हैं हम

आ भी जा, आ भी जा

आज मेरे सनम।

आप इसे भले ही फुटपाथ की शायरी कहें, लेकिन हर कलाकार की जिंदगी फुटपाथ से ही शुरू होती है। उसकी आवाज फुटपाथ और हर गरीब के झोपड़े तक में गूंजती है। तलत ने कभी महलों के ख्वाब देखे ही नहीं।

ऐ मेरे दिल कहीं और चल

गम की दुनिया से दिल भर गया

ढूंढ लें, चल कोई घर नया

लेकिन एक आम इंसान की तरह वह भी जानता है ;

जाएं तो जाएं कहां

समझेगा कौन यहां

दिल की जुबां …

अगर आपको भी गलती से तलत की लत लग गई है, तो इसे छोड़िए मत। देखिए वे क्या कहते हैं ;

हैं सबसे मधुर वो गीत

जिन्हें हम दर्द के सुर में

गाते हैं।

जब हद से गुजर जाती है खुशी

आंसू भी छलकते आते हैं।।

उन्हें जब रफी साहब का साथ मिला तो वे भी आखिर गा ही उठे ;

गम की अंधेरी रात में

दिल को न बेकरार कर

सुबह जरूर आएगी

सुबह का इंतजार कर।

और देखिए ;

गया अंधेरा, हुआ उजाला

चमका चमका, सुबह का तारा ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 570 ⇒ लिखना मना है ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखना मना है।)

?अभी अभी # 570 ⇒ लिखना मना है ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हँसना मना है, यह तो सुना था, लेकिन लिखना मना है, क्या यह कुछ ज्यादती नहीं हो गई। मनुष्य का यह स्वभाव है कि उसे जिस काम के लिए मना किया जाएगा, वही काम वह अवश्य करेगा। ज़रूर कोई हँसने की बात होगी, इसलिए हँसने को मना किया होगा, और चुटकुलों का शीर्षक हंसना मना है, ही हो गया।

हमारे यहाँ दीवार स्वच्छ भारत के पहले कई काम आती थी। लोग दीवारों पर कुछ भी लिख दिया करते थे। चुनावी नारे और सड़क छाप विज्ञापन। जिन दीवारों पर कुछ भी लिखने का प्रतिबंध लगा होता था, वहां भी यह लिखकर समझाना पड़ता था, यह पेशाब करना मना है। स्वच्छता में हमेशा अव्वल, मेरे शहर में नगर निगम ने स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी ही इतने नारे लिख दिए हैं, कि अब वहां कुछ नहीं लिखा जा सकता और सफाई इतनी कि चिड़िया भी लघु शंका के लिए शरमा जाए।।

अक्सर सरकारी दफ्तरों और कार्यालयों के बाहर, अंदर आना मना है, अथवा प्रवेश निषेध जैसे निर्देश देखे जा सकते हैं। लोग फिर भी चलते चलते झांक ही लेते हैं, अंदर क्या चल रहा है। नो पार्किंग पर गाड़ी खड़ी करना और यहां थूकना मना है वाली हिदायत तो पूरी तरह पान की पीक और कमलापसंद के हवाले कर दी जाती है।

हमारी पीढ़ी ने पिछले 70 वर्षों में देश में पहले केवल कांग्रेस वाली आजादी देखी है और बाद में मोदी जी वाला स्वच्छ भारत। हमने आपातकाल भी देखा है और कोरोना काल भी। अभिव्यक्ति की आजादी भी देखी है प्रेस सेंसरशिप भी। एक पढ़े लिखे समाज में लिखने और बोलने की आजादी तो होती ही है।

हमारा सोशल मीडिया उसे और मुखर बना देता है।।

हम पहले बोलना सीखते हैं, फिर पढ़ना लिखना ! पहले लिखकर पढ़ते हैं, फिर पढ़कर लिखते हैं। पहले किताब पढ़ी, फिर किताब लिखी। जिस तरह हँसना मना नहीं हो सकता, उसी तरह लिखना भी मना नहीं हो सकता,

पढ़ना भी मना नहीं हो सकता और बोलना भी मना नहीं हो सकता।

आजादी और अनुशासन, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लिखने, पढ़ने और बोलने की आजादी भी लोकतंत्र में तब ही सार्थक है, जब यह मर्यादित और रचनात्मक हो। और तो और क्रूर हँसी और हास्यास्पद बयान भी किसी की गरिमा को ठेस पहुंचा सकते हैं। उठने बैठने की ही नहीं, हँसने बोलने की भी तमीज होती है। बुरा कहने, बोलने और सुनने से परहेज करने वाले भले ही तीन बंदर हों, लेकिन उनकी हंसी उड़ाकर, हम अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

हम पर अपने स्वयं के अलावा कौन अंकुश लगा सकता है। मन बहुत मना करता है, कुछ लिखा न जाए, कुछ बोला न जाए। बहुत कोशिश की जाती है, आज गंभीर रहा जाए, खुलकर हंसा न जाए, मुस्कुराया न जाए, लेकिन कंट्रोल नहीं होता। हंसी आखिर फूट ही पड़ती है।

आखिर खिली कली मुस्कुरा ही देती है। कलम के भी मानो पर निकल आते हैं, शब्द बाहर आने के लिए थिरकने लगते हैं। बाहर बोर्ड लगा है, लिखना मना है, और उसी पर कुछ लिखा जा रहा है। कुछ तो ईश्वर का लिखा है, कुछ हमारे द्वारा लिखा जा रहा है। झरना बह उठता है। आप कहते रहें, लिखना मना है। हमने लेकिन कब माना है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 115 – देश-परदेश – समय और साधन तो बदल गए लेकिन हम नहीं बदले ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 115 ☆ देश-परदेश – समय और साधन तो बदल गए लेकिन हम नहीं बदले ☆ श्री राकेश कुमार ☆

दो दशक पूर्व अजमेर से जयपुर बस द्वारा यात्रा करते हुए एक ग्रामीण को बीड़ी पीने से मना करने वाली सूचना की तरफ ध्यानाकर्षण किया था। उसने लपक कर कहा था, हम तो पहले भी बीड़ी पीते थे, अब भी पियेंगे। तू बड़ा आदमी है, तो अपनी माचिस की डिबिया (मारुति कार) में यात्रा किया कर, हम तो बस में बीड़ी पीते ही रहेंगे।

विगत सप्ताह जयपुर की मेट्रो ट्रेन में यात्रा करते हुए पढ़े लिखे प्रतीत हो रहे दो युवा तेज आवाज़ में मोबाइल पर राजनीतिक बहस के मजे ले रहे थे। मेट्रो में तेज आवाज़ के साथ मोबाइल उपयोग निषेध सूचना भी अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषा में बताई जाती है।

अब बीड़ी का चलन बदलकर गुटखे का हो चुका हैं। नियम तोड़ने के लिए नए साधन मोबाइल ही सहारा रह गया हैं। रेल यात्रा में देर रात्रि तक वीडियो सुने और देखे जाते हैं। पुराने समय में कुछ यात्री ट्रांजिस्टर लेकर चलते थे, लेकिन चलती ट्रेन में उसकी कनेक्टिविटी नहीं मिल पाती थी।

हवाई यात्रा जहां सब के बैठने का स्थान निश्चित होता है, लेकिन जैसे ही बोर्डिंग की सूचना मिलती है, पहले हम पहले हम के धक्के लगने लग जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय यात्रा में सीट नंबर के अनुसार प्रवेश मिलता है, तो कुछ स्थिति नियंत्रण में रहती हैं।

हवाई यात्रा की समाप्ति पर अधिकतर यात्री गंतव्य स्थान से बहुत पहले उठ कर केबिन से अपना सामान निकालने लग जाते हैं। उतरने की इतनी जल्दी होती है, मानो जहाज में आग लग गई हो। बाहर निकल कर सबका लगेज तो बेल्ट में एक साथ ही आता है। हम सब बेचैन प्राणी हो चुके हैं। सब को जल्दी रहती है, पर कारण कुछ विशेष नहीं होता है। इतनी शिक्षा और विगत कुछ वर्षों से तो व्हाट्स ऐप का भरपूर ज्ञान भी खूब मिला है, हम सबको, लेकिन हम नहीं बदलेंगे। यदि आज अवकाश है, फिर भी आप सब तो जल्दी जल्दी इस लेख को पढ़ रहें हैं, ना ?

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 569 ⇒ मेरे हिस्से की धूप ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेरे हिस्से की धूप।)

?अभी अभी # 569 ⇒ मेरे हिस्से की धूप ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं नत-मस्तक हूँ, उस सर्व-शक्तिमान के प्रति, जिसने मुझे मेरे नसीब की रोटी, और मेरे हिस्से की धूप आसानी से उपलब्ध कराई। रोटी के लिए भले ही मुझे पुरुषार्थ करना पड़ा हो, लेकिन धूप तो अनायास ही मेरे द्वारे आ गई।

इंसान ने जंगलों को काट डाला, पहाड़ समतल कर डाले, नदियों को प्रदूषित कर दिया, यहाँ तक कि ग़रीब की रोटी तक उसकी गिद्ध दृष्टि चली गई, लेकिन पृथ्वी के हर प्राणी के हिस्से में आने वाली धूप को वह नहीं रोक सका।।

धूप का ठंड में धरती पर सीधा प्रसारण होता है। किसी उपकरण, टॉवर अथवा बैलेंस के बिना चींटी से लेकर हाथी, और मुकेश अम्बानी से लेकर झाबुआ के आदिवासी की झोपड़ी तक इस धूप की पहुँच है। धूप धरती पर फैल जाती है, एक जाजम की तरह, जिस पर सभी भू-लोकवासी कुनकुनी गर्माहट का आनंद लेते हैं।

आखिर सूर्य का ही अंश है यह पृथ्वी ! वह कैसे इस वसुंधरा का खयाल नहीं रखेगा। इस धरा को हरी-भरी, धन-धान्य से सम्पन्न रखना उसका भी तो कर्तव्य है। सूर्य का केवल कर्ण ही पुत्र नहीं, हर जीव में उस सूर्य का अंश है। वह कभी अस्त नहीं होता ! हमारी सुविधा के लिए अस्ताचल में चला जाता है, ताकि हम दिन भर के थके, विश्राम कर सकें। नई ऊर्जा के साथ वह फिर हमें एक नई सुबह प्रदान करता है।।

हर किसान, मज़दूर और एक गरीब की झोपड़ी तक सूर्य नारायण की पहुँच है। वे अपने विशाल पात्र में धूप लेकर आते हैं, जिससे ठंड में ठिठुरते बच्चे, महिला, पुरुष स्नान करते हैं। प्रकृति बारिश में जल से, और ठंड में धूप से हम धरती वासियों का अभिषेक करती है। लेकिन शहरों की धूप बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं, बहु-मंजिला इमारतें, और शॉपिंग मॉल्स रोक लेते हैं।

जब तक भगवान आदित्य पूरब दिशा में उदित नहीं होते, कोई स्कूल-दफ़्तर नहीं खुलता ! शहरों की मल्टीज़ से सुबह स्कूल जाते बच्चे धूप में अपनी स्कूल बस का इंतज़ार करते हैं, बसें आती हैं, और उन्हें धूप से जुदा कर देती हैं। लेकिन धूप है कि उनके साथ-साथ ही चलती है। धूप में प्रार्थना हो या व्यायाम, सब सूर्य नमस्कार ही तो है। कौन कृतज्ञ नहीं इस ठिठुरती ठंड में धूप का।।

मेरे हिस्से की धूप मुझे आज भी मिल रही है, भरपूर मिल रही है। गर्मी में जब जल-संकट होता है, पानी के टैंकर बुलाने पड़ते हैं, आज तक कभी हमने धूप का टैंकर नहीं बुलाया।

धूप पर कोई कर नहीं, कोई जीएसटी नहीं ! सिकंदर का एक किस्सा मशहूर है। एक फकीर के सामने अपनी महानता का प्रदर्शन करने लगा। तुम फ़क़ीर हो और मैं सिकन्दर महान ! मांगो जो माँगना है। फ़क़ीर ने उसकी तरफ देखे बिना कहा – तुम मेरी धूप रोके खड़े हो, बस वही छोड़ दो।।

अपने हिस्से की धूप हम सबको नसीब होती रहे। सूर्य के बारह नामों सहित सूर्य नमस्कार करें, ना करें, जब धूप का स्पर्श तन और मन से होता है, मन कह उठता है, ॐ सूर्याय नमः।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 272 – स्थितप्रज्ञ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 272 ☆ स्थितप्रज्ञ… ?

एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर हमारी सोसायटी के पास ही रहा करते थे। सज्जन व्यक्ति थे।अकस्मात मृत्यु हो गई। एक दिन लगभग उसी जगह एक रिक्शा खड़ा देखा तो वे सज्जन याद आए। विचार उठा कि आदमी के जाने के बाद कोई उसे कितने दिन याद रखता है? चिता को अग्नि देने के बाद परिजनों के पास थोड़ी देर  रुकने का समय भी नहीं होता।

एक घटना स्मरण हो आई। एक करीबी परिचित परिवार में शोक प्रसंग था। अंतिम संस्कार के समय, मैं श्मशान में उपस्थित था। सारी प्रक्रिया चल रही थी। लकड़ियाँ लगाई जा रही थीं। साथ के दाहकुंड में कुछ युवा एक अधेड़ की देह लेकर आए थे। उन्होंने नाममात्र लकड़ियाँ लेकर अधिकांश उपलों का उपयोग किया। श्मशान का कर्मचारी समझाता रह गया, पर केवल उपलों के उपयोग से से देह के शीघ्र फुँक जाने का गणित समझा कर अग्नि देने के तुरंत बाद  वे सब चलते बने।

हमें सारी तैयारी में समय लगा। दाह दिया गया। तभी साथ वाले कुंड पर दृष्टि गई तो जो दृश्य दिखा, उससे भीतर तक मन हिल गया। मानो वीभत्स और विदारक एक साथ सामने हों। उस देह का एक पाँव अधजली अवस्था में लगभग पचास अंश में ऊपर की ओर उठ गया था। अधिकांश उपलों के जल जाने के कारण देह के कुछ अन्य भाग भी दिखाई दे रहे थे। 

 श्मशान के कर्मचारी से सम्पर्क करने पर उसने बताया कि हर दिन ऐसे एक-दो मामले तो होते ही हैं, जिनमें परिजन तुरंत चले जाते हैं। बाद में फोन करने पर भी नहीं आते। अंतत:  मृत देह का समुचित संस्कार श्मशान के कर्मचारी ही करते हैं।

लोकमान्यता है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। अपनी कविता ‘स्थितप्रज्ञ’ याद हो आई-

शव को / जलाते हैं / दफनाते हैं,

शोक, विलाप / रुदन, प्रलाप,

अस्थियाँ, माँस, / लकड़ियाँ, बाँस,

बंद मुट्‌ठी लिए / आदमी का आना,

मुट्‌ठी भर होकर / आदमी का जाना,

सब देखते हैं /सब समझते हैं,

निष्ठा से / अपना काम करते हैं,

श्मशान के ये कर्मचारी

परायों की भीड़ में /अपनों से लगते हैं,

घर लौटकर /रोज़ाना की सारी भूमिकाएँ

आनंद से निभाते हैं / विवाह, उत्सव

पर्व, त्यौहार /सभी मनाते हैं

खाते हैं, पीते हैं / नाचते हैं, गाते हैं,

स्थितप्रज्ञता को भगवान,

मोक्षद्वार घोषित करते हैं,

संभवत: / ऐसे ही लोगों को,

स्थितप्रज्ञ कहते हैं..!

विश्वास हो गया कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। इस स्थितप्रज्ञता को प्रणाम !

?

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥  मार्गशीर्ष साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 💥 🕉️ 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 568 ⇒ एक प्याला सुख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक प्याला सुख।)

?अभी अभी # 568 ⇒ एक प्याला सुख ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब संसार क्षणभंगुर है, तो सुख भी क्षणभंगुर होता है, यह कोई कहने की बात नहीं है, लेकिन इस क्षणिक सुख का आनंद ही जीवन का वास्तविक आनंद है।

जो इस एक क्षण को जी लिया, वो ज़िन्दगी जी लिया। वो देखो ! साहिर चले आए। जो भी है, बस यही एक पल।

संसार में सुख की तलाश किसे नहीं। अगर घर बैठे गंगा आ जाए तो क्या बुरा ! एक चाय के प्याले में अगर सुख-सागर प्राप्त हो जाए तो क्यों स्वर्ग और वैकुण्ठ की बात की जाए।।

जो चाय नहीं पीते, या पीना नहीं जानते, उनसे स्वर्ग और वैकुण्ठ की बात करना एक नास्तिक को भागवत सुनाने जैसा है। जो नर्क को ही ज़न्नत समझ बैठा हो, उसे क्या ज्ञान दिया जाए।

सुबह-सुबह कड़कती ठण्ड में कड़क चाय का प्याला हाथ में आ जाए तो ऐसा महसूस होता है मानो साक्षात नारायण वैकुण्ठ से प्याले में उतर आए हों। प्याले से उठती हुई भाप और खुशबू फिर किसी शायर की याद दिला देती है।

वो पहली चाय की खुशबू,  

तेरे प्याले से शायद आ रही है।।

चाय पीना भी एक कला है। आंतरिक सुख का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। एक-एक घूँट शराब की तरह चाय पीना शराब जितना ही नशा देता है। चुस्की और सुड़क चस्के के दो विपरीत स्वरुप हैं। तीसरी कसम के ज़माने में चाय लौटे में पी जाती थी। तब वह चाय नहीं चाह थी। जिसे आज हम कप-प्लेट कहते हैं, वह बचपन में कप-बशी थी। आज भी पुरानी स्टाइल से चाय पीने वाले चाय बशी में ही डालकर पीते हैं। उनकी एक सुड़क के साथ कितना सुख भीतर जाता होगा, बस या तो वह जानते हैं, या उनका ईश्वर।

स्वर्ग वाले देवता बड़े चालाक निकले। कामधेनु, कल्पवृक्ष, पारस पत्थर सब अंटी कर लिया पर आदमी भी कम चालाक नहीं। उसने भगवान् से बदले में चाय का एक प्याला माँग लिया। धरती वालों ने स्वर्ग का सुख एक चाय के प्याले में ढूँढ लिया। सोचो साथ क्या जाएगा, का मतलब यही है कि स्वर्ग जाओ या वैकुण्ठ,  वहाँ आपको चाय नसीब नहीं होने वाली।।

इसलिए हे मूर्ख प्राणी ! देर ना कर। अमर घर चल। एक प्याला चाय बना। उसे अपने मुँह से लगा। स्वर्ग का सुख अगर कहीं है, तो इस चाय के प्याले में ही है। इस चाय के प्याले में ही है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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