हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 1 ☆ बह गई तोड़ के बंधन ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी के हम आभारी हैं जिन्होने हमारे आग्रह को स्वीकार कर  “साप्ताहिक स्तम्भ – कोहरे के आँचल से ” शीर्षक प्रारम्भ करना  स्वीकार किया। सौ. सुजाता जी मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  ऐसी ही एक प्राकृतिक आपदा पर आधारित भावप्रवण कविता  ‘बह गई तोड़ के बंधन ’।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 1 ☆

☆ बह गई तोड़ के बंधन

सालों जो बँधी हुई थी
दो पाटल के धारों में
आज बह गई तोड़ के बंधन
गाँवों में गलियारों में।

 

हाहाकार मचाया उसने
राहों में चौराहों में,
उद्दंड़ बनकर बह गई माता
गोद लिए खलियानों में।

 

हुआ अनर्थ, अनर्थ यह भारी

देख दृश्य यह आँखों ने।
आज बह गई तोड़ के बंधन
गाँवों  में गलियारों में।

 

धूम मचाई घर नगर में उसने
संसार सभी के ध्वस्त किए।
कहीं गिरि को भेदती निकली
कहीं  सागर से गले मिले।

 

जो जो मिला राह में उसको
सब आँचल में छुपा लिया।
चल अचल को ध्वंस करती
हिलोरें लेकर बहा दिया।

 

स्नेहाशीष का आँचल क्यों
फिर सरकाया है माँ ने,
आज बह गई तोड़ के बंधन
गाँवों में गलियारों में।

 

© सुजाता काळे ✍

पंचगनी, महाराष्ट्र।

9975577684

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 10 ☆ नाथ! चले आओ ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है  उनका एक गीत  “नाथ! चले आओ”।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 10 ☆

 

☆ नाथ! चले आओ ☆

 

जीवन संध्या होने को है, अब तो नाथ चले आओ

नैनो की ज्योति बोझिल, आके दरस दिखा जाओ

जीवन संध्या…

 

मन व्याकुल है, नेत्र विकल, अधरों पर उमड़ी है प्यास

स्नेह सुधा बरसाओ आकर, मेरे मन को हर्षा जाओ

जीवन संध्या…

 

सांसो की सरगम मध्यम हुई, जीवन से आशा बिछुड़ी बाधित हैं

स्वर मेरे उर के, आकर प्यास जगा जाओ

जीवन संध्या…

 

सहमे-सहमे अंधकार में, मार्ग बताने वाला कोई नहीं

ऐसे में बनकर  रहबर तुम,  सही कहा दिखला जाओ

जीवन संध्या…

 

जीवन नैया  डोल  रही,  मझधारों के बीच प्रभु

तुम तारणहार जगत् के, मुझको पार लगा जाओ

जीवन संध्या…

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – वह-3 ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

(इस सप्ताह हम आपसे श्री संजय भारद्वाज जी की “वह” शीर्षक से अब तक प्राप्त कवितायें साझा कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इन कविताओं के एक एक शब्द और एक-एक पंक्ति आत्मसात करने का प्रयास करेंगे।)

 

☆ संजय दृष्टि  – वह – 3 

 

माँ सरस्वती की अनुकम्पा से  *वह* शीर्षक से थोड़े-थोड़े अंतराल में अनेक रचनाएँ जन्मीं। इन रचनाओं को आप सबसे साझा कर रहा हूँ। विश्वास है कि ये लघु कहन अपनी भूमिका का निर्वहन करने में आपकी आशाओं पर खरी उतरेंगी। – संजय भारद्वाज 

 

पन्द्रह 

 

वह जलाती है

चूल्हा..,

आग में तपकर

कुंदन होती है।

 

सोलह 

 

वह परिभाषित

नहीं करती यौवन को

यौवन उससे

परिभाषित होता है,

वह परिभाषा को

यौवन प्रदान करती है।

 

सत्रह 

 

वह जानती है

बोलते  ही ‘देह’

हर आँख में उभरता है

उसका ही आकार,

आकार को मनुष्य

बनाने के मिशन में

सदियों से जुटी है वह!

 

अठारह 

 

वह मांजती है बरतन

चमकाती है बरतन,

धरती को

महापुरुषों की चमक

उसी के बूते मिली है।

 

उन्नीस 

 

वह बुहारती है झाड़ू

सारा कचरा

घर से निकालती है,

मन की शुचिता के सूत्र

अध्यात्म को

उसी ने दिये हैं।

 

©  संजय भारद्वाज , पुणे

9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – बाल कविता – ☆ सम्बन्धों का मोल ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

(श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी की कवितायें हमें मानवीय संवेदनाओं का आभास कराती हैं। प्रत्येक कविता के नेपथ्य में कोई न कोई  कहानी होती है। मैं कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी का हृदय से आभारी हूँ जिन्होने इस कविता के सम्पादन में सहयोग दिया। आज प्रस्तुत है एक शिक्षाप्रद बाल-कविता “सम्बन्धों का मोल ”। श्री सूबेदार पाण्डेय जी ने अपनी कविता के माध्यम से सम्बन्धों के मोल को बड़े ही सहज शब्दों में समझाने की चेष्टा की है। यह कविता बच्चों के लिए जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही महत्वपूर्ण बड़ों के लिए भी है।  )

 

 ☆ बाल कविता – संबंधो का मोल ☆

 

एक समय में, किसी गाँव में,

रहते थे दो जुड़वाँ भाई

आपस मे न था तनिक प्रेम,

खूब दूरियाँ, दिल में खांई

 

अलगाव हुआ उन दोनों में,

आपस में किया बटवारा

सोने की एक अंगूठी बनी  कारण,

हुआ उनमें विवाद करारा

 

अपना झगड़ा लेके पहुंचे,

दोनों एक संत के पास

सुनी समस्या, रख अंगूठी

दिया दिलासा, ढेरों आस

 

बोले सन्त, अब घर जाओ,

कल सबेरे तुम सब आना

फिर यहाँ से, तुम मेरे से

अपनी अंगूठी ले जाना

 

उन के जाने पर संत ने,

तुरन्त एक सुनार बुलवाया

वैसी ही एक दूसरी अंगूठी,

उन्होंने जल्दी से बनवाया

 

क्यों मोल चुकाया अंगूठी का

भेद गूढ़ कोई समझ न पाया

जब आये सुबह दोनों भाई,

उनको अलग-अलग बुलवाया

 

अपनी अंगूठी पा कर,

दोनों खूब हुए खूब सन्तुष्ट

गिले-शिकवे दूर कर  अपने

दोनों भाई हुए प्रसन्न यथेष्ट

 

इक दिन बातों-बातों मे,

खुल गया रहस्य यूँही वैसे

अंगूठी तो एक ही  थी,

फिर मिली दोनो को  कैसे

 

करी भीषण माथापच्ची

पर सच का  हुआ न ज्ञान

पहुंचे  दोनों कुटिया में

किया संन्त का मान-सम्मान

 

बातें उनकी सुन मुस्कुराए,

तब बाबा ने उनको समझाया

संम्बधो  के मोल को समझो,

कभी न करो अपना पराया

 

सोना तो है तुक्ष चीज,

संम्बधों का, है नही मोल

भातृ-प्रेम है सोने से बढ़ कर,

याद रखो सदा ये वचन अनमोल

 

दी अंगूठियाँ तुमको मैंने,

बतलाने को जीवन-तत्व

सदा सर्वदा समझो अपने

संबंधों का सतत महत्व…

 

सुन बाबा से तत्व-ज्ञान

हुए दोनों अति तुष्ट

सदा सुखी रहने का मंत्र,

समझ गये दोनों हो संतुष्ट…

 

-सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

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हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – वह-2 ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

(इस सप्ताह हम आपसे श्री संजय भारद्वाज जी की “वह” शीर्षक से अब तक प्राप्त कवितायें साझा कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इन कविताओं के एक एक शब्द और एक-एक पंक्ति आत्मसात करने का प्रयास करेंगे।)

 

☆ संजय दृष्टि  – वह – 2

 

माँ सरस्वती की अनुकम्पा से  *वह* शीर्षक से थोड़े-थोड़े अंतराल में अनेक रचनाएँ जन्मीं। इन रचनाओं को आप सबसे साझा कर रहा हूँ। विश्वास है कि ये लघु कहन अपनी भूमिका का निर्वहन करने में आपकी आशाओं पर खरी उतरेंगी। – संजय भारद्वाज 

 

सात 

 

वह नाचती है

आग सी,

यह आग

धौंकनी सी

काटती जाती है

सारी बेड़ियाँ।

 

आठ 

 

वह गुनगुनाती है

झरने सी,

यह झरना

झर डालता है

सारा थोपा हुआ

और बहता है

पहाड़ से

मिट्टी की ओर।

 

नौ 

 

वह करती है श्रृंगार

इस श्रृंगार से

उभरता है

व्यक्तित्व,

उमड़ता है

अस्तित्व।

 

दस 

 

वह लजाती है,

इस लाज से

ढकी-छुपी रहती हैं

समाज की कुंठाएँ।

 

ग्यारह 

 

वह खीझती है,

इस खीझ में

होती है तपिश

सर्द पड़ते रिश्तों को

गरमाने की।

 

बारह 

 

वह उत्तर नहीं देती,

प्रश्न जानते हैं

उत्तर आत्मसात

रखने की उसकी क्षमता,

प्रश्न निरुत्तर हो जाते हैं।

 

तेरह 

 

वह सींचती है

तुलसी चौरा,

जानती है

शालिग्राम को

बंधक बनाने की कला।

 

चौदह 

 

वह बनाती है रसोई,

देह में समाकर

देह को अस्तित्व देकर

देह को सिंचित-पोषित कर

वह गढ़ती है अगली पीढ़ी।

 

©  संजय भारद्वाज , पुणे

9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य – # 8 – कितना बचेंगे …… ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है एक गीत  “कितना बचेंगे….. । )

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 8 ☆

 

☆ कितना बचेंगे …..    ☆  

 

काल की है अनगिनत

परछाईयाँ

कितना बचेंगे।

 

टोह लेता है, घड़ी पल-छिन दिवस का

शून्य से सम्पूर्ण तक के  झूठ – सच का

मखमली है पैर या कि

बिवाईयां है

चलेंगे विपरीत, सुनिश्चित है

थकेंगे  ।  काल की…….

 

कष्ट भी झेले, सुखद सब खेल खेले

गंध  चंदन  की, भुजंग मिले  विषैले

खाईयां है या कि फिर

ऊंचाईयां है

बेवजह तकरार पर निश्चित

डसेंगे  । काल की………….।

 

विविध चिंताएं, बने चिंतक सुदर्शन

वेश धर कर  दे रहे हैं, दिव्य प्रवचन

यश, प्रशस्तिगान संग

शहनाईयां है

छद्म अक्षर, संस्मरण कितने

रचेंगे  । काल की…………..।

 

लालसाएं लोभ अतिशय चाह में सब

जब कभी ठोकर  लगेगी, राह में तब

छोर अंतिम पर खड़ी

सच्चाइयां है

चित्र खुद के देख कर खुद ही

हंसेंगे  ।

काल की है अनगिनत परछाईयाँ

कितना बचेंगे।।

 

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – वह ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

(इस सप्ताह हम आपसे श्री संजय भारद्वाज जी की “वह” शीर्षक से अब तक प्राप्त कवितायें साझा कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इन कविताओं के एक एक शब्द और एक-एक पंक्ति आत्मसात करने का प्रयास करेंगे।)

 

☆ संजय दृष्टि  – वह 

 

माँ सरस्वती की अनुकम्पा से  *वह* शीर्षक से थोड़े-थोड़े अंतराल में अनेक रचनाएँ जन्मीं। इन रचनाओं को आप सबसे साझा कर रहा हूँ। विश्वास है कि ये लघु कहन अपनी भूमिका का निर्वहन करने में आपकी आशाओं पर खरी उतरेंगी। – संजय भारद्वाज 

 

एक 

 

वह ताकती है

ज़मीन अकारण,

इस कारण

उसके भीतर समाई है

पूरी की पूरी एक धरती।

 

दो 

 

वह चलती है

दबे पाँव,

उसके पैरों के नीचे

दबे हैं सैकड़ों कोलाहल।

 

तीन 

 

वह करती है प्रेम

मौन रहकर,

इस मौन में छिपी हैं

प्रलय की आशंकाएँ

सृजन की संभावनाएँ।

 

चार 

 

वह अंकुरित

करती है

सृष्टि का बीज,

धरती का हरापन

उसका मोहताज़ है।

 

पाँच 

 

वह बोलती बहुत है

उसके बोलने से

पिघलते हैं

उसके भीतर बसी

अधूरी इच्छाओं के पहाड़।

 

छह 

 

वह हँसती है

मीठी, पहाड़ी

नदिया-सी,

इस नदी के

पेट में है

खारे पानी का

एक समंदर।

 

©  संजय भारद्वाज , पुणे

9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ कहाँ गया आँखों का पानी? ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आज प्रस्तुत है आदरणीय श्री संतोष नेमा जी की  समाज से प्रश्न करती हुई  एक  भावप्रवण कविता  “कहाँ गया आँखों का पानी?”)

 

☆ कहाँ गया आँखों का पानी ?☆ 

कहाँ गया आँखों का पानी

खोज रहे ज्ञानी विज्ञानी।।

 

बात बात पर झगड़ा करते ।

आपस में ही लड़ते मरते ।।

नाहक में बदनाम जवानी।।

कहाँ गया आँखों का पानी ।।

 

मर्यादा,गैरत,खुद्दारी ।

गये दिनों की बातें सारी। ।।

गरम खून करता मनमानी ।

कहाँ गया आँखों का पानी ।।

 

बड़े बुजुर्ग पड़े हैरत में।  ।

बचा शेष क्या अब गैरत में ।।

मर्यादा की मिटी निशानी।।

कहाँ गया आँखों का पानी ।।

 

मूल्य हीन संस्कार पड़े सब।

तिरष्कार की भेंट चढ़े सब।।

भूले जब से राम-कहानी ।

कहाँ गया आँखों का पानी ।

 

सडक,बग़ीचे या चौराहे ।

सब नाजायज गए उगाहे।।

करें खूब फूहड़ नादानी। ।

कहाँ गया आँखों का पानी।।

 

तंग हुए तन के पहिनावे ।

लाज-शरम अँसुआ ढरकावे

लफ्फाजों की चुभती बानी ।

कहाँ गया आँखों का पानी ।।

 

बिनु ‘संतोष’ नहीं सुख भैया।

दुख में डूबी जीवन नैया ।।

हुई तिरोहित रीति पुरानी। ।

कहाँ गया आँखों का पानी ।।

 

कहाँ गया आँखों का पानी ।

खोज रहे ज्ञानी विज्ञानी ।।

 

@ संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 2 ☆ बांसुरी ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा ☆

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “बांसुरी”। )

 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 2 

 

☆ बांसुरी ☆

 

मैं तो बस

एक बांस की बांसुरी थी,

मेरा कहाँ कोई अस्तित्व था?

तुम्हारे ही होठों से बजती थी,

तुम्हारे ही हाथों पर सजती थी

और तुम्हारे ही उँगलियों से

मेरी धुन सुरीली होती थी!

 

जब

छोड़ देते थे तुम मुझे,

मैं किसी सूने कमरे के सूने कोने में

सुबक-सुबककर रोती थी,

और जब

बुला लेते थे तुम पास मुझे

मैं ख़ुशी से गुनगुनाने लगती थी!

 

ए कान्हा!

तुम तो गाते रहे प्रेम के गीत

सांवरी सी राधा के साथ;

तुमने तो कभी न जाना

कि मैं भी तुमपर मरती थी!

 

कितनी अजब सी बात है, ए कान्हा,

कि जिस वक़्त तुमने

राधा को अलविदा कहा

हरे पेड़ों की छाँव में,

और तुम चले गए समंदर के देश में,

मैं भी कहीं लुप्त हो गयी

तुम्हारे होठों से!

 

राधा और मैं

शायद दोनों ही प्रेम के

अनूठे प्रतिबिम्ब थे!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

 

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हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – शब्द- दर-शब्द  ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )

 

☆ संजय दृष्टि  – शब्द- दर-शब्द 

 

शब्दों के ढेर सरीखे

रखे हैं, काया के

कई चोले मेरे सम्मुख,

यह पहनूँ, वो उतारूँ

इसे रखूँ , उसे संवारूँ..?

 

तुम ढूँढ़ते रहना

चोले का इतिहास

या तलाशना व्याकरण,

परिभाषित करना

चाहे अनुशासित,

अपभ्रंश कहना

या परिष्कृत,

शुद्ध या सम्मिश्रित,

कितना ही घेरना

तलवार चलाना,

ख़त्म नहीं कर पाओगे

शब्दों में छिपा मेरा अस्तित्व!

 

मेरा वर्तमान चोला

खींच पाए अगर,

तब भी-

हर दूसरे शब्द में,

मैं रहूँगा..,

फिर तीसरे, चौथे,

चार सौवें, चालीस हज़ारवें और असंख्य शब्दों में

बसकर महाकाव्य कहूँगा..,

 

हाँ, अगर कभी

प्रयत्नपूर्वक

घोंट पाए गला

मेरे शब्द का,

मत मनाना उत्सव

मत करना तुमुल निनाद,

गूँजेगा मौन मेरा

मेरे शब्दों के बाद..,

 

शापित अश्वत्थामा नहीं

शाश्वत सारस्वत हूँ मैं,

अमृत बन अनुभूति में रहूँगा

शब्द- दर-शब्द बहूँगा..,

 

मेरे शब्दों के सहारे

जब कभी मुझे

श्रद्धांजलि देना चाहोगे,

झिलमिलाने लगेंगे शब्द मेरे

आयोजन की धारा बदल देंगे,

तुम नाचोगे, हर्ष मनाओगे

भूलकर शोकसभा

मेरे नये जन्म की

बधाइयाँ गाओगे..!

 

‘शब्द ब्रह्म’ को नमन। आपका दिन सार्थक हो।

©  संजय भारद्वाज , पुणे

9890122603

writersanjay@gmail.com

( कविता संग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता।’)

 

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