हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९९ – वसुधैव कुटुंबकम… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – वसुधैव कुटुंबकम ।)

☆ लघुकथा # ९९ – वसुधैव कुटुंबकम  श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

नेताजी अपने कार्यकर्ताओं के साथ गली मोहल्ले में घूम रहे थे घूमते- घूमते अचानक उनको एक बुढ़िया घर के बाहर बैठी दिखाई दी।

“अम्मा हमारे नेता जी को ही वोट देना। “

“चुनाव चिन्ह ध्यान से देख लो ?”

“अंगूठे का निशान इसी चिन्ह पर लगाना। ‘

नेता जी ने कहा -“माँ जी आपको कोई समस्या तो नहीं है?”

बुढ़िया (कमला) ने कहा -“बेटा मुझे कोई समस्या नहीं है अब इस उम्र में मैं खुद ही एक समस्या हूं। आजकल तो बहुत मजे हैं।”

“बेटा बहुत सारे नेता लोग आते हैं बहुत सारा सामान देकर जाते हैं, अनाज भी मिल जाता है पहले तो पेट भरने के लिए यहाँ -वहां भटकना पड़ता।”

 “अब आराम से मेरी गुजर हो जाती है, मेरा आशीर्वाद है बेटा तुम जुग जुग जियो। “

“माता जी सब आप लोगों की दया दृष्टि है इस बार मेरा ध्यान रखना। अपने आसपास के भी सभी लोगों को कह देना। “

“ठीक है बेटा” बुढ़िया कमला ने कहा। 

“बेटा थक गए होगे? थोड़ा आराम कर लो पानी पी लो चाय बना कर पिलाऊं बेटा?”

“ठीक है माँ पानी पिला दो। “

“बेटा आपने बहुत मान सम्मान दिया। मैं दिल से आशीर्वाद देती हूं। तुम ही जीतोगे पर एक बात ध्यान रखना कि जैसे हो सदा ऐसे ही रहना क्योंकि जीत के बाद बदल जाते हैं सब लोग। “

“मेरी क्या अपनी सगी माँ की भी सुध लेते……?”

“मेरे बेटे बहू भी शहर चले गए हैं मुझे यहाँ अकेले छोड़के यदि आपकी कृपा दृष्टि न होती बेटा तो कैसे चलता ?”

“बेटा मुझे अपना घर दिखा दो , आपकी माँ कैसी हैं उनसे मिलना चाहती हूँ। “

 “बेटा मेरा बेटा भी बहुत बोलता था , हम सब उसे नेता जी कहते थे हमें ही धोखा दे दिया। “

कार्यकर्ता ने कहा- “अम्मा नेता जी बहुत बिजी हैं हम लोग एक दिन आपको जरूर लें चलेंगे। “

“वोट नेता जी को देना जीतने के बाद भोज में बुलाएंगे। “

“हमारे नेता जी वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास करते हैं पूरे प्रदेश के लोगों को अपना परिवार मानते हैं। “

“अच्छा बेटा देखते हैं?”

 कार्यकर्ता जयकारा लगाने लगते हैं।

“राम प्रसाद भैया की जय।”

“हमारा नेता कैसा हो रामप्रसाद भैया जैसा हो।”

जोर- जोर से जयकारे लग रहे थे।

 वृद्ध अम्मा सोच रही थी कि – क्या सच में कोई प्रदेश को अपना परिवार समझता है बिना स्वार्थ के…। “

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५२ – क्रू मेंबर ट्रेनिंग ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा क्रू मेंबर ट्रेनिंग”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५२ ☆

🌻लघु कथा🌻 ✈️ क्रू मेंबर ट्रेनिंग ✈️

विवाह का घर सैकड़ो काम और कुछ नहीं तो यहाँ से वहाँ भागना। गाँव का वातावरण भी अछूता नहीं रहा शहरों की हवा से और सोशल मीडिया की कृपा से।

ऐसे ही एक परिवार में शादी के दिन मेहंदी की रस्म निभाई जा रही है। सभी हँसते खिलखिलाते नाच गा रहे हैं। घर की सयानी वरिष्ठ महिलाएं जो कुछ अपने समय नहीं कर पाई वह भी शामिल थी, परंतु कुछ वरिष्टों को पसंद नहीं आ रहा था।

बहुत देर से एक सुंदर सी बिटिया पर निगाह टिकी थी दादी की। परंतु उसके हाव-भाव अच्छे नहीं लग रहे थे। पास जाकर पूछने लगी– किसकी बेटी हो?

केश लहराते डीजे की धुन पर नाचते वह बोली – – – दिल्ली में रहती हूँ।

फिर से पूछने लगी– क्या नौकरियाँ करती हो।

तपाक से उत्तर मिला क्रू मेंबर की ट्रेनिंग कर रही हूँ।

दादी को समझ नहीं आया। अपना  सा मुँह लेकर बैठ गई, परंतु निगाह अभी भी वहीं पर जाकर टिकी थी।

शायद कुछ सोच रही थी। थोड़ी देर बाद उनका अपना पोता हँसते मुस्कुराते आया दादी को परेशान देख बोला – – कुछ चाहिए।

दादी ने बड़े भोलेपन से कहा– पहले बता गुरु मैदान। पोते ने कहा– अभी नहीं, थोड़ी देर में चलते हैं। अभी बैठो।

उसको लगा शायद बाहर जाने को कह रही है खुले मैदान में। एक किनारे ले जाकर हाथ पकड़ कर पोते से लड़की को दिखाते हुए बोली– गुरु मैदान क्या बहुत बड़ी नौकरियाँ होती है। पोते ने हँस कर कहा – – गुरु मैदान नहीं दादी क्रू मेंबर।

अरे हाँ वही दादी अम्मा ने कहा। दादी हवाई जहाज जो उड़ता है ना उस पर पानी, चाय, पेपर, दवाई, जरूरी सामान और सहायता करना। बस ये समझ लो तुम।

दादी ने कहा अब तू जा। अपनी जगह बैठ गई दादी फिर से चार लोगों से बता रही थी आजकल की बिटियाँ घर में गिलास नहीं उठाती, हवाई जहाज में चाय पानी नाश्ता देती है गुरु मैदान में। फैशन तो ऐसे करी है जाने कहूँ बड़ी नौकरी मिली है।

और उसके बाद जोरदार हँसी की आवाज। सभी पलट कर देखने लगे। जानते हो देती तो चाय पानी ही है। पोता सुन्न होकर दादी को देखता रहा क्रू मेंबर किसे कहते हैं।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९१ – दिल की खातिर… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– दिल की खातिर…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — दिल की खातिर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

चोर ने एक ऐसा आईना चुराया जो आंतरिक दुनिया दिखाता था। उसने आईने में अपना दिल देखा। बड़ा प्यारा दिल था, लेकिन वह चोर होने से उसका दिल रोता था। उसने अपने दिल की खातिर चोरी छोड़ दी। अब उसे अपने दिल का हाल जानने के लिए आईने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पर ऐसा भी था उसने अपना दिल देखने के लिए कहीं से आईना चुराया नहीं था। बस अपने दिल की खातिर एक कल्पना ने उसे बांध लिया था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

13 – 01 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – हरि की माँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – हरि की माँ ? ?

हरि को गोद में आए केवल दस महीने हुए थे, जब हरि का बाप उसे हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। हरि की माँ ने हिम्मत नहीं हारी। हरि की माँ हरि के लिए डटकर खड़ी रही। हरि की माँ को कई बार मरने के हालात से गुज़रना पड़ा पर हरि की माँ नहीं मरी।

हरि की माँ बीते बाईस बरस मर-मरकर ज़िंदा रही। हरि की माँ मर सकती ही नहीं थी, उसे हरि को बड़ा जो करना था।

हरि बड़ा हो गया। हरि ने शादी कर ली। हरि की घरवाली पैसेवाली थी। हरि उसके साथ, अपने ससुराल में रहने लगा। हरि की माँ फिर अकेली हो गई।

हरि की माँ की साँसें उस रोज़ अकस्मात ऊपर-नीचे होने लगीं। हरि की माँ की पड़ोसन अपनी बेटी की मदद से किसी तरह उसे सरकारी अस्पताल ले आई। हरि की माँ को जाँचकर डॉक्टर ने बताया, ज़िंदा है, साँस चल रही है।

हरि की माँ नीमबेहोशी में बुदबुदाई, ‘साँस चलना याने ज़िंदा रहना होता है क्या?’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९५ ☆ लघुकथा – “पासवर्ड” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९५ ☆

?  लघुकथा – पासवर्ड ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

स्क्रीन पर तीसरी बार फिर वह संदेश फिर उभर आया “गलत पासवर्ड.”

शरद बाबू ने चश्मा ठीक किया, उँगलियाँ धीमे धीमे कुंजियों पर चलीं, पर मन डगमगा गया। 

पासवर्ड कभी लिख कर नहीं रखना चाहिए, जानते हुए भी इसी समस्या से बचने के लिए वे अपनी डायरी में पासवर्ड लिख लिया करते हैं। सावधानी के लिए बस किस अकाउंट का पासवर्ड है यह याददाश्त पर छोड़ रखा है, लेकिन फिर भी गड़बड़ हो ही जाती है।

नोटबुक के वे पन्ने पलटे हर जगह दर्ज अंक, प्रतीक और अंग्रेजी के छोटे बड़े अक्षर । मेल , बैंकों के अकाउंट , वाई फाई , नेटलिक्स , पेंशन ऐप वगैरह वगैरह के ढेर सारे विस्मृत,  गड्डम गड्ड होते पासवर्ड अब प्रायः उन्हें चिढ़ाते लगे हैं।

वे कमरे की छत देखते सोच रहे थे, अपने पुराने दिन जब उनकी याददाश्त का ऑफिस में सब लोहा मानते थे, उन्हें दस अंकों के मोबाइल नंबर तक जबानी याद रहते थे, जिन्हें वे जेब में मोबाइल होते हुए भी ऑफिस के लैंडलाइन से डायल कर लिया करते थे, शायद पैसे बचाने ।  

उन्हें खीजता देख ,बेटा हँसकर बोला, “पापा, इतनी दिक्कत है तो पासवर्ड मैनेजर एप रख लीजिए।” 

शरद बाबू मुस्करा कर रह गए ।  

*

रिटायरमेंट को पांच महीने भर तो हुए हैं। 

पहले समय पीछे भागता था, अब वे उसके पीछे दौड़ रहे हैं। 

पत्नी ने रसोई से पुकारा “ओटीपी आया क्या?” 

स्क्रीन पर छह अंकों का नंबर चमका… फिर एस एम एस ही गुम हो गया, सेशन टाइम आउट हो चुका था।

शरद बाबू ने लंबी साँस ली, लैपटॉप बंद किया। 

खिड़की से छनती धूप में धूल के कण चमक रहे थे, जैसे यादें कमरे में घुसी आ रही हों, रोशनी की एक बीम की तरह। 

उनके होंठों पर स्मित मुस्कान थी,

“नया पासवर्ड बनाना है..

bHULNANAHI@1

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – “निर्विरोध अनिर्वाचित” ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ निर्विरोध अनिर्वाचित ☆ हेमन्त बावनकर ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

विघ्नहर्ता हाऊसिंग सोसाइटी ने अपने वार्षिक चुनाव के लिए सर्व सम्मति से सेवकराम जी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया था. साथ ही उन्हें अपनी समिति के गठन के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी गई थी. मुख्य रूप से अध्यक्ष, सचिव् और कोषाध्यक्ष का चुनाव होना था.

पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चुनाव प्रक्रिया चलती रही. अंतिम तिथि पर प्रत्याशियों ने अपने फॉर्म जमा कर दिए. जब लिस्ट जारी करने का समय आया तो पता चला कि दो पैनल आमने सामने आ गए हैं. एक देसाई पेनल और दूसरा पटेल पेनल.

सभी ने जोर शोर से अपने अपने पेनल के लिये प्रचार शुरू कर दिया. माहौल में चुनावी गरमी आ गई. सेवकराम जी की चुनाव समिति को समझ में नहीं आ रहा था कि उस क्षेत्र की सबसे बड़ी हाऊसिंग सोसायटी के चुनाव में लोग इतना पैसा कहाँ से और क्यों खर्च करने को उतारू हैं? बाद में पता चला कि दोनों पेनल के पीछे उस क्षेत्र की राष्ट्रीय स्तर की बड़ी राजनीतिक पार्टियों का हाथ है जिनकी नजर विघ्नहर्ता हाऊसिंग सोसाइटी के पांच हजार से अधिक मतदाताओं पर है.

अंतिम तिथि के आते आते चुनाव का माहौल बदलने लगा. उनकी चुनाव समिति के कानों में तरह तरह की बातें सुनाई देने लगी. फिर वही हुआ जिसका सब को डर था,

विगत चार वर्षों से सत्ता में रहे पटेल पेनल ने धन और राजनीतिक बल पर देसाई पेनल को अपने फॉर्म वापिस लेने पर मजबूर कर दिया.

अब सबकी नजर चुनाव समिति के निर्णय पर टिकी थी. पटेल पेनल अपने आप को “निर्विरोध निर्वाचित” करने पर दबाव बना रहा था.

चुनाव समिति ने काफी मंथन के पश्चात् निर्णय स्वरुप अपनी सूचना जारी किया कि – “प्रत्येक मतदार के मत का अपना महत्व है जो उसका अधिकार है. प्रत्याशियों ने अपना निर्णय लिया है किन्तु मतदार ने अपना निर्णय कहाँ दिया? उसने अपने मताधिकार का प्रयोग कहाँ किया? अतः निर्धारित तिथि को मतदान होगा. बैलट पेपर पर प्रत्येक मतदार को अपना मत देने के लिए “NOTA” (None of the above) अर्थात- “इनमे से कोई भी नहीं”का विकल्प भी रहेगा.”

इसका काफी विरोध हुआ किन्तु, सेवकराम जी की समिति टस से मस नहीं हुई. समय पर मतदान हुआ. पटेल पेनल के सभी प्रत्याशियों के विरोध में NOTA को अधिक मत मिले.

अंत में सेवकराम जी की चुनाव समिति ने अपना अंतिम निर्णय दिया – “पटेल पेनल के सभी सदस्यनिर्विरोध अनिर्वाचित”अगले चुनाव की तिथि समिति शीघ्र घोषित करेगी।”

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ – तिल गुड़ की मिठास ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “तिल गुड़ की मिठास”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ ☆

🌻लघु कथा🌻 तिल गुड़ की मिठास🌻

माँ रेवा के घाट पर उतरने चढ़ने वाले सीढ़ियों पर दान की आस लगाए जो बैठे रहते हैं। उनमें से एक महिला बहुत ही साफ सुथरी परंतु गंभीर सोचनीय अवस्था में माला जाप करती दिखी।

मकर संक्रांति का पर्व सभी खिचड़ी कोई तिल चाँवल, कोई चाँवल दाल, कोई गुड़ तिल, कोई एक-एक लड्डू देते चला जा रहा था। मानो सारा पुण्य कमा रहे हो।

पंडितों की पंक्तियां बड़े-बड़े लकड़ी के तख्तों पर आसन जमाए बैठे थे। थोड़ी देर बाद वहीं महिला सुंदर से एक प्लेट पर दान से मिले कुछ लड्डुओं को कपकपाते हाथ से पंडित जी के पास आकर कुछ रुपए रख संकल्प करने के लिए कहने लगी।

उसकी शालीनता को देख पंडित जी भी मुस्कुरा दिए। उसी समय सामने के लकड़ी के तख्त पर नजर पर पड़ी। बड़ी श्रद्धा के साथ जो गाँव की महिला अपने बच्चों के साथ हाथ लगाकर संकल्प कर रही थी और कोई नहीं उसके अपने बेटा बहू थी।

पंडित ने नगद नारायण अपने कब्जे में लेते हुए  बाकी कच्ची रसोई पुरी सब्जी उसी अम्मा को देते हुए कहा— ले जा रख तेरा आज का दिन अच्छा है। तुझे मकर संक्रांति मिल रही है तिल के लड्डू मिल रहे हैं। लेजा दान का सीधा आज अच्छे से भोजन करना।

उनके जाने के बाद आँचल फैला, वह दुआ देती कहने लगी जहाँ मैं हूँ, वहाँ कभी मेरे अपने बैठने ना आए।

बस यही दान की दुआ मै मांगती हूँ। बेटा बहू तिल महादान करके बड़े खुश नजर आ रहे थे। वही सर से मुँह छुपाई वह सोच रही थी– यह तिल गुड़ मिठास, या मिलने वाला त्रास।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९० – चरित्र – मंथन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– चरित्र – मंथन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९० — चरित्र – मंथन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

बिल्ली अपने सामने खड़े चूहे को मजे – मजे देख रही थी। चूहा अपनी ओर से सतर्क ही था। सहसा भूकंप आने पर चूहा और बिल्ली दोनों एक खंडहर में फँस गए। बिल्ली की साँसें उखड़ने पर आईं। जब कि चूहा तो मज़े – मज़े जी सकता था। बिल्ली तो मर ही जाती कि चूहे ने मिट्टी खोद कर बाहर निकलने का रास्ता बना दिया। खंडहर से मुक्त होने पर चूहे के प्रति कृतज्ञ होते भी बिल्ली ने उसका शिकार कर लिया। बिल्ली चूहों का शिकार करने की अपनी प्रकृति से मजबूर थी। उधर ऐसी बात नहीं कि चूहा न जानता हो कि बिल्ली उसे खा जाएगी। पर मिट्टी खोदने की अपनी प्रकृति से चूहा भी मजबूर था।

 © श्री रामदेव धुरंधर
08 – 01 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बाइज़्ज़त…!

☆ लघुकथा  बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

पागल पाशा दिन-दहाड़े दोपहरी के समय सर पर पाँव रखकर सड़क पर बेतहाशा भागा जा रहा था और साथ में अपनी बुलंद आवाज़ में ज़ोर-शोर से चिल्ला रहा था… ‘चल गई… चल गई…! चल गई…!’

जिसको सुनकर बाजार की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर ब्रेक लग गए। आबादी के विस्फोट से लावे की तरह फैलते शहर में अचानक सन्नाटा छा गया।

देश के किसी जागरूक नागरिक ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए पुलिस स्टेशन को मोबाइल लगा दिया। सुना है, शहर में चल गई है… आधी-अधूरी सूचना पर पुलिस की गाड़ियाँ सड़कों पर दौड़ने लगी, सायरन बजने लगे, पर किसी भी व्यक्ति ने यह जानने की जरा भी ज़हमत उठाई, न कोशिश की, कि कहाँ और क्या चल गई है…!

पुलिस की बड़ी देर तक चली खोज-बीन और भाग-दौड़ के बाद आखिरकार पाशा पकड़ा गया। उसे पूछताछ के लिए कोतवाली लाया गया। थानेदार के पूछने पर उसने बताया कि कल उसे चलन से बाहर हो चुके चंद अठन्नी के सिक्कों से भरी थैली नाली में पड़ी मिल गई थी जिसे लेकर उसने बॉर से एक पव्वा खरीदा। बगल वाली होटल में बैठकर पीया और साथ में भर पेट बिरयानी खाई। उसके बाद उसे ऐसा नशा चढ़ा कि उसके मुँह से इतना भर निकला… चल गई… चल गई…, लेकिन शहर के दहशतज़दा लोगों ने समझ लिया… गोली चल गई…!

दूसरे दिन शहर की शाँति भंग करने के जुर्म में पुलिस ने पागल पाशा को न्यायाधीश के समक्ष पेश किया। न्यायाधीश ने भूखे पाशा की मनोदशा को ध्यान में रखते हुए सरकार को आदेश दिया कि देश में जितने भी भूखे, नंगे, बेघर हैं उनके लिए खाने, पहनने और रहने का बंदोबस्त किया जाए और पाशा को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। अदालत से बाहर निकलते हुए, पाशा रहमान का शेर-

‘’वो जो एक पागल है कहते हैं जिसे पाशा,

गुल-रुख़ों की सोहबत में और भी सनकता है।’’

गुनगुनाते हुए हवा में विलुप्त हो गया।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कलमुँही — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत. भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “कलमुँही“.)

 ☆ कथा कहानी  ☆ कलमुँही — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

कभी  उसकी सास उसे इसी नाम से पुकारती थी , और इस नाम से वह इतनी अधिक परिचित हो गई थी, कि वह अपना सही नाम ” सपना ” भूल चुकी थी . इस कलमुँही नाम पड़ने की भी एक कहानी है. उसे याद आता है कि जिस दिन  वह कैलाश के साथ ब्याह कर , अपने गाँव बछवारा से यहाँ आयी थी तो सास लक्ष्मी देवी  ने घर के दरवाजे पर पचासों औरतों के साथ उसकी अगवानी बड़े धूम- धाम से परम्परागत धार्मिक विधि  से किया था. परिवार में पति कैलाश के अलावा, उसका छोटा भाई लखन और छोटी बहन तारा थी. ससुर छोटेलाल की किराने की एक दूकान थी और उनके पास  कुछ खेती भी था. कैलाश स्वयं एक सरकारी आफिस में लिपिक के पद पर काम करते थे. घर में कुछ कमी तो नहीं थी, लेकिन सम्पन्नता भी नहीं थी. परिवार में सब कुछ ठीक था.

लेकिन शायद विधाता को सपना का यह सुखी जीवन रास नहीं आ रहा था. ससुर छोटेलाल को एक दिन खूब जाड़ा देकर तेज बुखार आ गया. सपना ने इण्टर तक की पढ़ाई किया था और उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उसके ससुर को मलेरिया हो गया है. शाम को जब कैलाश आफिस से घर आये तो उसने कहा कि बाबूजी को तुरन्त डाक्टर को दिखाईये, बाबूजी को जाड़ा देकर बुखार आया है और यह मलेरिया का ही लक्षण है. कैलाश बोला ठीक है, कल कस्बे के डाक्टर से दिखाते हैं, अभी तो रात हो गया है, और गाँव में किसी के पास कोई मोटर भी नहीं है. सपना बोली बात तो आप सही कह रहे हैं, ठीक है सुबह ही दिखाने ले जाईयेगा. इतने में सास लक्ष्मी देवी किसी के यहाँ से कोई जड़ी-बूटी ले आयीं और बोलीं कि बहु इसका काढ़ा बना कर अभी  पिला दो और रात में एक बार और पिला देना. सपना करती भी क्या? कोई विकल्प नहीं था, उसने काढ़ा बना कर छोटेलाल को दिया. काढ़ा पीने के बाद छोटेलाल को कुछ राहत अनुभव हुआ और बुखार भी कुछ कम हुआ. लेकिन सपना जानती थी कि मलेरिया में बुखार घटता- बढ़ता रहता है. उसने कैलाश से कहा भी कल बाबूजी को डाक्टर के पास ले जाईयेगा. कैलाश ने कहा कि हाॅं, कल ले जाऊंगा. दूसरे दिन छोटेलाल  का बुखार एकदम उतर गया, तो छोटेलाल ने खुद ही कहा कि मैं किसी डाक्टर के पास नहीं जाऊँगा, मैं अन्दर से ठीक महसूस कर रहा हूँ. कैलाश कहता भी तो क्या कहता!

लेकिन रात होने के साथ फिर  ठंडक के साथ छोटेलाल को तेज बुखार चढ़ गया. फिर वही काढ़ा बना कर छोटेलाल को पिलाया गया . बुखार तो उतर गया, लेकिन अन्दर से कमजोरी थी. दूसरे दिन भी छोटेलाल ने डाक्टर के यहाँ जाने से मना कर दिया और लक्ष्मी ने भी कहा कि बैद्य जी की दवा से समय लगता है, लेकिन ठीक हो जाता है. कैलाश और सपना, डाक्टर के चलने के लिए कहते रह गए, लेकिन छोटेलाल और लक्ष्मी तैयार नहीं हुए. खैर कैलाश भी कुछ ज्यादा बोल नहीं पाया और बेचारी सपना! वह तो बहु ही थी, वह क्या बोलती! दो – तीन दिनों  के बाद छोटेलाल की तबियत बहुत अधिक बिगड़ गई और कैलाश उन्हें जबरन कस्बे में डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने जब पूरी तरह निरिक्षण किया तो बोला ठीक है मैं दवा करता हूँ, बाकी ईश्वर के हाथ में है, क्योंकि आप इन्हें लाने में पहले ही काफी देर कर चुके हैं.

दो दिनों के बाद छोटेलाल की हालत काफी बिगड़ गई और देर रात छोटेलाल को  अचानक सांस लेने में तकलीफ होने लगी. डाक्टर ने तत्काल  आक्सीजन का मास्क लगा कर और जीवन रक्षक दवाईयों को देकर बचाने का प्रयास किया, लेकिन चार घंटों के सतत् संघर्ष करने के उपरांत भी छोटेलाल के प्राण पखेरू इस संसार को छोड़ कर चल दिए. कैलाश के परिवार पर मानो व्रजपात हो गया. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मामूली सा मलेरिया का बुखार किसी के मृत्यु का कारण भी हो सकता है! लेकिन सत्य यही था. किसी प्रकार से गाँव खबर भेजा गया. लक्ष्मी और सपना और दोनों भाई- बहन लखन और तारा रोते हुए अस्पताल पहुंचे. खैर लोगों ने समझाया कि जो होना था, वह तो हो गया! होनी को कौन टाल सकता है!  गाँव के अन्य बड़े- बुर्जुगों ने परिवार को धीरज दिलाया और छोटेलाल  के अन्तिम संस्कार की व्यवस्था किया गया. छोटेलाल का अन्तिम संस्कार करने के बाद सब लोग घर वापस आये. किसी के पास कुछ कहने के लिए तो था नहीं.

खैर समय तो रुकता नहीं! धार्मिक विधि से सारे कर्म करने के कुछ दिनों बाद  कैलाश अपने आफिस जाने लगे. घर का सारा काम सपना ही करती थी. लक्ष्मी सामान्यतः हमेशा गुमसम ही रहती थी. इसी बीच में गाँव की कुछ बूढ़ी औरतों ने लक्ष्मी को सहानुभूति दिखाने के चक्कर  में एक नयी बात छेड़ दिया. वे बोलीं कि लक्ष्मी देखो, अभी कैलाश के शादी के एक वर्ष भी नहीं बीते कि घर के मुखिया का देहांत हो गया. तुम्हारी बहु सपना कलमुँही है. पहले तो लक्ष्मी ने इन बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, लेकिन बार – बार यही बात सुनने पर, उसके मन में भी यह विश्वास हो गया कि वास्तव में बहु सपना कलमुँही है और एक दिन बातों ही बातों में उसके मुँह से निकल ही गया कि  तू  आते ही मेरे पति को खा गयी. तुम परिवार के लिए कलमुँही हो!

सपना तो यह सुनते ही स्तब्ध हो गई. कुछ बोलते नहीं बना, क्या जबाब दे! रात में उसने यह बात कैलाश को रोते – रोते बतायी. कैलाश ने कहा जाने दो, माँ पर दुख का पहाड़ टूट गया है, इसिलिए उलूल- जूलूल बातें किया करती हैं, ध्यान मत तो उनकी बातों पर. ननद तारा ने भी समझाया कि माँ का बाबूजी के देहांत के कारण मानसिक संतुलन बिगड़ गया है.

 छोटेलाल जी के देहांत के समय ही सपना पांच महीने के गर्भ से थी. छोटेलाल जी के देहांत के उपरांत सपना तो दुखी थी ही, पूरा परिवार भी दुखी था, जिसके कारण सपना ने अपनी अवस्था का ध्यान नहीं रखा कि वह गर्भवती है और उसे अपने गर्भ में पलने वाले शिशु का ध्यान रखना चाहिए. इस बीच उसने एक- दो महीने  डाक्टर को भी नहीं दिखाई और दवाईयां खाने में भी उससे काफी लापरवाही हो गयी. एक दिन रात में अचानक सपना को पेट में काफी तेज दर्द हुआ. सपना कैलाश से बोली कि मुझसे दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा है, मुझे डाक्टर के पास ले चलो. संयोग से उसी दिन पड़ोस में एक शादी थी और बारात में कईं गाड़ियां आयी थी. पड़ोसी को जब सपना के बारे में पता चला तो उसने कैलाश से कहा कि मैं तुम्हें गाड़ी दे रहा हूँ, मेरे बेटे को गाड़ी चलाने आता है, वह तुम्हें ले जायेगा. कैलाश सपना को लेकर कस्बे के लेडी डॉक्टर ( जिससे वह सपना को हमेशा दिखाता था) के पास ले गया. संयोग से लेडी डॉक्टर अभी क्लिनिक में थी, उसने देखा. देखने के बाद उसने कहा कि काफी सावधानी की जरूरत है, कोई भारी सामान आदि मत उठाईयेगा, किसी चीज की चिंता बिल्कुल मत करिये, किसी प्रकार की भी चिंता आप के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है. कुछ और आवश्यक निर्देश और दवाईयां डाक्टर ने दिया.

इस घटना के एक सप्ताह के बाद सपना को एक दिन फिर दर्द शुरू हुआ. कैलाश  सपना को लेकर तुरंत कस्बे के लेडी डॉक्टर के पास गया.  तमाम प्रयासों के बावजूद भी डाक्टर शिशु की रक्षा नहीं कर पायी. सपना और कैलाश के उपर दो महीने के भीतर दूसरा व्रजपात हुआ. अभी एक आघात के कष्ट से निकले नहीं थे, कि परिवार पर दूसरा आघात हो गया. खैर होनी को कौन टाल सकता! यही सोचकर परिवार को संतोष करना पड़ा.

लेकिन लक्ष्मी के दिमाग में यही बात रह – रह कर कौंधती थी कि सब  सपना का ही दोष है.सपना के मुंह पर तो खुल कर नहीं कहती थी, लेकिन पीठ पीछे गाँव के महिलाओं को वह यह कहने से नहीं चूकती कि सपना ही कलमुँही है और उसी के कारण उसके परिवार में यह सब घटित हो रहा है. कैलाश तो बेचारा नौकरी करने में सुबह से शाम तक व्यस्त रहता था, लेकिन सपना के कानों तक यह बात पहुँच ही जाती थी. लेकिन वह करती क्या!

एक दिन कैलाश को आफिस से आने में कुछ देर हो गया. जब वह घर पहुँचा तो घर  में अंधेरा था. सपना का कमरा बन्द था, लेकिन अन्दर से खुला था. कैलाश ने बिजली जला दिया, देखा कि सपना लेटी है  आवाज देने पर सपना उठी. कैलाश ने देखा कि सपना की ऑंखें ऑंसूओं से भरी है और चेहरा एकदम दुखी है. कैलाश स्तब्ध हो गया. पूछा क्या हो गया! पहले तो सपना बोली कोई बात नहीं है, लेकिन कैलाश के कहने पर कि जब कोई बात नहीं है, तो रो क्यों रही हो?  सपना ने  सास द्वारा उसके कलमुँही नाम का बार- बार प्रचारित करने के विषय में बताया. बेचारा कैलाश भी क्या कहता! उसने सपना से ही पूछा कि तुम ही कोई रास्ता बताओ, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है. अब सपना भी क्या कहती! माँ से झगड़ा करने का कोई मतलब नहीं था. कैलाश ने कहा कि मैं ही कुछ करता हूँ.

रविवार के दिन, नास्ते के समय कैलाश ने अपने दोनों भाई- बहन को बुलाया और उन्हें माँ द्वारा सपना को बार- बार कलमुँही कह कर बदनाम व प्रताड़ित करने की बात बतायी. दोनों ने कहा कि भईया आप ही कोई रास्ता निकालो, इसमें हम क्या कह सकते हैं? कैलाश ने कहा ठीक है, फिर उसने माँ को बुलाया और लक्ष्मी से  कहा कि माँ मैं बहुत दिनों से यह सुन रहा हूँ कि पिता जी के मृत्यु और सपना के गर्भपात के सम्बन्ध में आप  सपना को ही दोषी मानती हो और उसे कलमुँही कहती हुई  गाँव भर में घूमती हो. देखो किसी की भी मृत्यु परमात्मा के अधीन है और कौन अपनी संतान का विनाश चाहेगा! सात महिने गर्भ में रख कर, उसे वह खुद ही नष्ट करना चाहेगा! इस प्रकार का लांछन किसी पर लगाना बहुत ही गलत बात ही नहीं बल्कि निंदनीय है. सपना तो तुम्हारी धर्मपुत्रि है. तुम उसे कभी गृहलक्ष्मी कहती थी. मैं समझ सकता हूँ कि बाबूजी के देहांत का तुम्हें काफी सदमा लगा है, लेकिन इसका यह मतलब यह तो नहीं कि इस प्रकार की निंदनीय काम करो! बाबूजी के देहांत का दुख हम सबको है, एक छोटी सी बीमारी उनके लिए काल बन गयी . हमारी पहली संतान नहीं रही, इसका हमें भी दुख है!

पहले तो लक्ष्मी ने साफ इनकार कर दिया कि वह ऐसा कुछ कहती फिरती है, लेकिन सपना द्वारा कई महिलाओं के नाम लेकर कि उन्होंने ही उसे कहा है, लक्ष्मी के पास कोई रास्ता नहीं था. अन्त में कैलाश ने कहा कि माँ यह सब बकवास तुरंत बन्द करो और एक बात ध्यान से सुन लो. अगर मैंने दुबारा ऐसा कुछ सुना तो मैं अपने भाई- बहन को लेकर किराये के मकान में रह लूंगा, लेकिन तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा. तुम रहना अकेले और फिर जो मन में आये गाँव भर में कहते फिरना. दोनों भाई- बहन ने भी कहा अम्मा तुम यह ठीक नहीं कर रही हो.

रात को सपना ने कैलाश से अकेले में कहा कि आपको अम्मा से  इतनी कठोर बातें नहीं करनी चाहिए थी. कैलाश भड़क गया, बोला,  अब बेकार की ममता मत दिखाओ. तुमने अगर माॅं को पहले ही बेकार की बातें करने का विरोध करती , तो समस्या इतनी आगे नहीं बढ़ती. मैं मानता हूँ कि  मेरी भी उतनी ही गलती है. मुझे भी पहले ही माॅं को इस ढंग के व्यवहार करने से रोकना चाहिए था. अब मुझे इस समस्या का स्थायी समाधान करने दो.

दूसरे दिन से कैलाश , अपनी माँ लक्ष्मी से बातें करना लगभग बन्द कर दिया. लक्ष्मी कुछ कहती भी तो हूँ- हाॅं में जबाब देता. जब माँ- बेटे का यह सिलसिला कई दिनों तक चला तो लक्ष्मी समझ गयी कि कैलाश बहुत ही नाराज है. एक दिन उसने अपने छोटे  बेटे लखन और बेटी तारा से पूछा कि क्या बात है आजकल कैलाश मुझसे बात ही नहीं करता. दोनों ने कहा अम्मा, भईया तुमसे बहुत नाराज हैं . तुमने भाभी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया है और सोचो तुम्हारे इस तरह बोलने से परिवार की कितनी बदनामी होती है. लक्ष्मी क्या कहती!

दो- चार दिनों के बाद एक दिन रात के नौ बजे के आसपास जब कैलाश अपने कमरे में था, लक्ष्मी कमरे में आयी और बोली कि मैं मानती हूँ कि मुझसे गलती हुई, लेकिन मैं भी क्या करती! मेरे उपर ऐसा व्रजपात हुआ कि मेरा दिमाग खराब हो गया था. अब यह गुस्सा थूको, अब मरते दम तक मुझसे  ऐसी गलती नहीं होगी. इतने में सपना कमरे में आ गयी. माँ- बेटे के बीच की बातें उसने भी सुन ली थी. बोली अम्मा , जो हो गया सो गया, ईश्वर हम सबके बीच प्रेम बनाये रखे, परिवार के लिए यही अच्छा है.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

19.12.2025

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

ई-मेल – om1955prakashpandey@gmail.com मो – 9619885135

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares