हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४१ – तिलांजलि ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा तिलांजलि”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४१ ☆

🌻लघु कथा 🤲 तिलांजलि 🤲

पितृपक्ष का कड़ुवा माह। धर्म और आस्था को मानते – आज वह फिर जलाशय में जाकर कुश, तिल, जवा, चाँवल के दाने अंजलि भर तिलांजलि दे रहा था। मानो अपने पाप का प्रायश्चित कर रहा हो। निर्मल जल की धार में खड़े होकर मांग रहा था– हे प्रभु मेरे गुनाहों को माफ कर देना। मुझे अगले जन्म में फिर से अपनी माँ की कोख से जन्म ले सकूं। उसकी सेवा कर सकूं। इस जन्म में तो मैंने उन्हें बहुत कष्ट दिया है।

पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे– आपके इस पुण्य प्रताप से आपके माता जी को भगवान श्री हरि के धाम में जगह मिले।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– बेटा केशी! जल्द घर आ जाओ।

मां बुरी तरह सुबकती हुई फोन पर कह रही थी।

– क्यों? क्या हुआ?

– तुम्हारे छोटे भाई ने मुझे बैठक में अलग कर दिया है और अपनी रोटी पानी भी मैं ही बना कर खाती हूं। क्या करूं? बुढ़ापा पेंशन में कहीं गुजारा होता है! तुम आ जाओ बस।

– मैं कैसे आ सकता हूं मां?

– क्यों? तूने भी आंखें फेर लीं मां से?

– नहीं। पर मैं इतनी दूर जो हूं। छुट्टी लेनी पड़ेगी। मिले न मिले। बच्चों के पेपर हैं।

– जाओ फिर भूल जाओ मां को!

– ऐसे न कहो मां! मेरी मजबूरी को समझो। मैं जल्द आकर तुम्हें ले आऊंगा। फिर तो खुश?

– हां। जल्द आ जाना।

सुबकती सुबकती मां फोन रख गयी।

फिर जरूरत ही न रही लाने की।

कुछ दिन बाद मां दम तोड़ गयी थी। भाई ने बुलाया और सब काम धाम छोड़कर भागा!

काश! पहले …!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बलि ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा बलि

☆ लघुकथा – बलि ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

गाँव में पैदा हुई प्राइमरी क्लास तक पढ़ी-लिखी मंगली की शादी शहर में ऑटो रिक्शा चलाकर अपना गुजर-बसर करने वाले राजू से हो गई। वह पहली बार ट्रेन में बैठकर शहर पहुँची। शहर की भीड़-भाड़ और रौशनी की चकाचौंध देखकर कुछ दिनों के लिए उसका सर ऐसा चकराया कि बेचारी घर से बाहर ही नहीं निकली।

पर जैसाकि सूरज के निकलने पर धीरे-धीरे अँधेरा छँटता है और चीजें साफ़ होती जाती है। मंगली भी शहर की आबो-हवा की आदी हो गई। शादी के बाद राजू को जब ऑटो चालन से जीवन-यापन में मुश्किलें आने लगी, तो मंगली ने पड़ोस के बँगले में रहने वाले साहब के घर पर झाड़ू-पोंछा करने का काम शुरू कर दिया।

मंगली की बोल-चाल और व्यवहार इतना अच्छा था कि उसने मेम साहब का दिल जीत लिया। एक दिन वह मेम साहब से बोली- ‘मेडम जी, मुझे इस माह की पगार नगदी में चाहिए। माल जाकर बच्चों और उनके पापा के लिए कपड़े ख़रीदना है।’

पहली तारीख़ को मेम साहब ने मंगली से कहा- ‘चलो आज माल चलते हैं। मुझे भी कुछ ख़रीददारी वग़ैरह करनी है। वहाँ पर लगे एटीएम से रुपए निकालकर तुम्हें दे दूँगी।’ मंगली पहली बार माल पहुँची। मेम साहब से उसने रुपए लिए और उनके साथ कपड़ों के ब्राँडेड स्टोर पहुँची। वहाँ पर उसने देखा कि कुछ जवान लड़कियाँ शर्मनाक कपड़े पहने हुए है। वह मेम साहब के पास जाकर धीरे से कान में बोली- ‘मेडम जी, जरा पीछे मुड़कर देखिए। इन्होंने अपने बदन पर, नहीं के बराबर कपड़े पहन रखे हैं।’ मेम साहब बोली- ‘मंगली यह तुम्हारा गाँव नहीं हैं। शहर की लड़कियाँ तुम्हारे जैसी साड़ी-लहंगा नहीं, लड़कों वाले कपड़े पहनती हैं। वह भी अधनंगे। तुम्हें मालूम नहीं आजकल फ़ैशन की दुनिया में नंगई की प्रतिस्पर्धा चल रही है।’

पर एक सुबह बड़े वाले बँगले के साहब और मेम साहब बाहर बरामदे में बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि मंगली अधनंगे कपड़े पहनकर बड़ी ठसक के साथ जलवा बिखेरते हुए चली आ रही है और वहीं मोहल्ले के शोहदे अपने दीठों को फाड़कर उसे घूरे जा रहे हैं। गाँव की रहने वाली भोली-भाली, सीधी-सादी मंगली पर शहरी पहनावे का ऐसा रंग चढ़ा कि देखा-देखी के फेर में बेचारी नंगई की बलि चढ़ गई।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २३ –संदेशप्रद लघुकथा ☆ प्रकृति का संवाद ☆ श्री राजेश सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २३ ☆

☆ संदेशप्रद लघुकथा ☆ प्रकृति का संवाद ☆ श्री राजेश सिंह ‘श्रेयस’ ☆

घर के दूसरी मंजिल पर लगी एसी की सफाई करने वाले आ गए थे। इंटीरियर की सफाई हो चुकी थी। अब बारी थी, एसी के आउटर फैन के सर्विसिंग की। अचानक विमलेश की नजरें आउटर फैन के पीछे गोल गोल मुड़े मोटे पाइपों के बीच अपने बच्चों की हिफाजत में बैठी मादा कबूतर पर गयीं।

 उसने देखा की गोल-गोल मुडे पाईप के बीच में कबूतर के जोड़े ने एक छोटा सा घोंसला बना रखा है। शायद इसमें वह और उसके नन्हे नन्हे बच्चे भी थे।

 *

घर के मुखिया नील के आँखों में अपनी आँखों के द्वारा बोलते हुए उस कबूतर मां ने बड़े ही आरत भाव से कहा-

क्या भैया ! आज आप अपने जीवन में थोड़े सुख के लिए मुझे और मेरे बच्चों को आश्रयहीन कर दोगे ??

भैया मेरा घर तो नहीं उजड़ोगे ??

मादा कबूतर की आंखों में आँशु थे और उसके नन्हें तन की भाव भंगिमा में अपने उपर आया महासंकट साफ-साफ झलक रहा था।

मकान से बंधा एसी का आउटर फैन सब कुछ सुन रहा था। आखिरकार जब उससे नहीं रहा गया तो वह बोल ही पड़ा-

भईया !! आप सबकी की सुख सुविधा के लिए मेरा छोटा भाई दिन और रात ठंडी हवा फेकता है। बदले में मुझे क्या मिलता है ! बदले में मुझे गर्म हवा फेंकने पड़ती है। मैं गर्म हवा के थपेड़े झेलता हूं भैया।

खुले प्रकृति में विचरण करने वाले यह पशु -पक्षी, जीव पौधे सभी मुझे भला बुरा कहते हैं।

घर की गर्म हवा के अलावा, धूप, बरसात और जाड़े की पीड़ा झेलता हूँ। मुझे सुकून नहीं मिलता है भईया ! सुकून नहीं मिलता है… यह कहता हुआ एसी का आउटर फैन रो पड़ा।

उसने अपनी बात आगे भी जारी रखी।

भईया ! मुझे तनिक सुकून देने का जब मौका मिला तो मैंने इन दो पक्षियों के जोड़ों को अपने बच्चों को जन्म देने हेतु अपने पीछे आश्रय दे दिया। इनके बच्चों की आवाज सुनता हूं तो मुझे अच्छा लगता है। इन पति पत्नी की आपस की चर्चा को सुनता हूँ तो मेरा भी दिन बीत जाता है। इन्हें क्या, ये मेरे गर्म हवा और कांपते शरीर के बीच बैठक़र पूरा दिन और पूरी रात गुजारा देते हैं।

इन्हें मत उजाड़ना मेरे भैया ! इन्हे मत उजाड़ना। ये प्रकृति की अनमोल धरोहर हैं। प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ के कारण इन पशु पक्षीयों का अस्तित्व तो स्वयं ही खतरे में पड़ता चला जा रहा है.. भईया।

अभी मकान नंबर 1135 के दूसरी मंजिल पर लगा आउटर फैन अपनी बात का ही रहा था कि मकान नंबर 1136 के पहले तल्ले पर लगे दूसरे एसी के आउटर फैन के आगे लगा मासूम सा दिखने वाला फूलों से सजा हुआ पौधा बोल पड़ा –

भैया!! जरा मेरी भी दशा देखो। मेरे कुल खानदान ने पूरी जिंदगी मानवता के स्वास्थ, उनके सुखमय जीवन के लिए,शुद्ध ऑक्सीजन, आंखों के आगे एक हरा भरा संसार और आध्यात्मिक शांति के लिए सुंदर-सुंदर फूल दिए। लेकिन आजकल आउटर फैन भैया न जाने क्यों,पूरे दिन और पूरी रात मुझ पर गर्म हवा फेंकते हैं, मेरी पीड़ा को समझिए।

एसी का आउटर फैन लगभग बिलखते हुए बोल पड़ा –

बहन ! यह मेरी मजबूरी है मैं ऐसा निर्जीव इन मनुष्य द्वारा ही बनाया हुआ ढाचा हूं, जो चल फिर नहीं सकता। जहां बैठा दिया जाता हूं वहीं बैठकर अपनी सेवा देता हूं। मेरा रिमोट तो इन चलते फिरते इंसानों के भीतर है। मुझे मजबूरी में उनकी उंगलियों पर ही नाचना पड़ता है। भला इसमें मेरी क्या गलती है। मुझे माफ करना मेरी बहन, मुझे माफ करना…ऐसा कहते हुए दूसरे एसी का आउटर फैन रो पड़ा।

इस संवाद को शायद मूक मानवता के कान सुन रहे थे या नहीं सुन रहे थे लेकिन साहित्य की नजरे और साहित्य की कलम कहां देखने और लिखने से चुकने वाली थी।

अचानक मादा कबूतर आउटर फैन के पीछे से उड़कर सामने के मकान पर लगे सोलर पैनल पर बैठ गई। लेखक की नजरे उधर पड़ी तो वहां का दृश्य और भी अधिक कारूणिक था।

नर कबूतर, अपनी पत्नी से अपनी पूछ पटक पटक कर पूछ रहा था कि –

अजी बोलो ! क्या कोई बात हो गई क्या? हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं है क्या ? हे भगवान ! कौन सा खतरा आ गया हमारी सुरक्षा इतनी खतरे में क्यों पड़ती जा रही है।

 उन दोनों पति-पत्नी के बीच में चर्चा हो ही रही थी तब तक लेखक ने देखा कि एसी के मालिक के भीतर का करुणा भाव जगा। उन्होंने एसी के आउटर फैन की सफाई रूकवा दी। शायद विगत दिनों पहाड़ों में हुई भारी त्रासदी की याद, और घर मानव संघार या प्रचंड प्रलय की तस्वीर उनके जेहन में आ गयी थी।

नर और मादा कबूतर दोनों निश्चिंत थे। हल्की-फुल्की सफाई करके मिस्त्री मजदूर जा चुके थे। दुबारा से कबूतर मां अपने बच्चों के पास आ गई थी। उसके मन से घर के मालिक नील के प्रति ढेर सारी दुआएं निकल रही थीं।

***

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि, लेखक, समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – पैसे वाली… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – पैसे वाली 

? लघुकथा – पैसे वाली  ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

घर में मेहमान आने के कारण रोज ही नए नए व्यंजन बनाने पड़ रहे थे . नतीजा यह हुआ कि बचे हुए खाद्य पदार्थ थोड़ा-थोड़ा करके भी काफी मात्रा में इकट्ठे हो गए थे. रोज रोज वही व्यंजन तो मेहमानों के सामने रखे नहीं जा सकते प्रतिष्ठा का सवाल जो था. अतः फ्रीज में ही इकट्ठा करती गई.

मेहमानों के जाने के बाद एक दिन वही सामान स्वयं के लिए इस्तेमाल कर लिया लेकिन किसी ने भी उसे शौक से नहीं खाया. सभी ऊब चुके थे और उसमें वह ताजापन भी नहीं रहा था. अब इस सामग्री को महरी को देने के सिवा कोई चारा शेष नहीं था.

अगले दिन दो तीन सब्जियां तथा कुछ मीठे व्यंजन फ्रिज में से निकाल कर महरी को इस आशय के साथ दिए कि वह  प्रसन्न हो जाएगी उसकी भी दावत हो जाएगी.

उसके जाने के पांच मिनट बाद ही कुछ तेज आवाजों को सुन उत्सुकता से बाहर झांककर देखा तो महरी पड़ोसन से कह रही थी- “ यह बीवीजी चार-पांच दिन पुरानी बासी सब्जियां देकर हम पर एहसान जता रही हैं . अरे, हम भी इंसान हैं. ऐसी चीजें खाकर हमें बीमार होना है क्या?  देनी ही हैं तो ताजी दो जैसी खुद खाती हो. हमने कभी ऐसी सब्जियां, व्यंजन नहीं देखे या नहीं खाए ? होंगी अपने घर पैसे वाली ! हम भी अच्छे खाने पीने वालों में से हैं….” यह  कहकर उसने सारी सब्जियां, व्यंजन कचरे के डब्बे में उलट दिए और अपनी राह चली गई.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – ज़हर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ज़हर ? ?

“बिच्छू ज़हरीला प्राणी है। ज़हर की थैली उसके पेट के निचले हिस्से या टेलसन में होती है। बिच्छू का ज़हर आदमी को नचा देता है। आदमी मरता तो नहीं पर जितनी देर ज़हर का असर रहता है, जीना भूल जाता है।…साँप अगर ज़हरीला है तो उसका ज़हर कितनी देर में असर करेगा, यह उसकी प्रजाति पर निर्भर करता है। कई साँप ऐसे हैं जिनके विष से थोड़ी देर में ही मौत हो सकती है। दुनिया के सबसे विषैले प्राणियों में कुछ साँप भी शामिल हैं। साँप की विषग्रंथि उसके दाँतों के बीच होती है”,  ग्रामीणों के लिए चल रहे प्रौढ़ शिक्षावर्ग में विज्ञान के अध्यापक पढ़ा रहे थे।

 “नहीं माटसाब, सबसे ज़हरीला होता है आदमी। बिच्छू के पेट में होता है, साँप के दाँत में होता है, पर आदमी की ज़बान पर होता है ज़हर। ज़बान से निकले शब्दों का ज़हर ज़िंदगीभर टीसता है। ..जो ज़िंदगीभर टीसे, वो ज़हर ही तो सबसे ज़्यादा तकलीफदेह होता है माटसाब।”

 जीवन के लगभग सात दशक देख चुके विद्यार्थी की बात सुनकर युवा अध्यापक अवाक था।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८३ – रिश्तो से बड़ी जमीन… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्तो से बड़ी जमीन।)

☆ लघुकथा # ८३ – रिश्तो से बड़ी जमीन श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जमीन के बंटवारे की बहस इतनी बढ़ गई की दोनों सगे भाई और दोनों बहनों के बीच में बातचीत भी बंद हो गई। पहले का प्यार जाने कहां खो गया? घर आना जाना भी बंद हो गया।

पहले सब लोग मिलकर के त्यौहार मनाते थे। कितने सुखद दिन थे? जाने क्यों आज बरबस मन बचपन की तरफ मुड़ गया है।

हम सभी गणपति उत्सव में कितने अच्छे से गणेश जी को सजाते थे सुबह-शाम आरती करते थे।

याद है जब पहली बार गणेश जी घर में रखना था, मां पैसे नहीं दे रही थी तो भैया दिन भर कुम्हार के यहां जाकर उसकी मूर्तियां की मिट्टी को घुटने में उसकी मदद की और एक मिट्टी की ही मूर्ति उसे बनवा कर ले आए थे।

और हंसते हुए कहा था- मां तू मुझे गोबर गणेश कहती है। मैं देख अपने हाथों से गणेश जी की मूर्ति बनाना सीख गया हूं और लाकर स्थापित करता हूं। तब से भाई हर बार गणेश जी की मूर्ति स्वयं बनाता था। पता नहीं बड़े भाई रामकिशोर जी इतने क्यों बदल गए? क्या रिश्तो से बड़ी जमीन होती है?

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४० – हिन्दी में ममत्व ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “हिन्दी में ममत्व”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४० ☆

🌹लघुकथा🌹 हिन्दी में ममत्व 🌹

             🔆🔆🔆

जैसा कि आजकल चलन है बेटा बहू विदेश में उच्च पेकेज पर नौकरी। गाँव या शहर, सिटी में मम्मी- पापा। अब तो माँ बाबूजी शब्द विलुप्त हो चुका है।

आज मम्मी व्हासप चला रही थी। बेटे का मेसेज देख वह गदगद हो गई – – माँ चरण स्पर्श प्रणाम 🙏🙏

😳मम्मी ने मोबाइल पटल पर देखा

अरे हाँ – – आज तो हिन्दी दिवस है।

आभार हिन्दी मेरी ममता में शुभ दिवस बनने के लिए।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ पुरस्कृत कहानी – कोबरा – स्व. डॉ गायत्री तिवारी ☆ साभार – डॉ. भावना शुक्ल ☆

स्व. डॉ गायत्री तिवारी

☆ पुरस्कृत कहानी – कोबरा – स्व. डॉ गायत्री तिवारी ☆ साभार – डॉ. भावना शुक्ल ☆

मेरी नियुक्ति ग्रामीण क्षेत्र के एक स्कूल में हुई। मन निराशा से भर उठा। विवशता थी, जाना ही पड़ा। कम आबादी वाले तीन गाँव पास-पास थे, जैसे शहर में मुहल्ले होते हैं। जिस गाँव की आबादी कुछ ज्यादा थी, वहाँ स्कूल खोला गया था। मैं जैसे तैसे गाँव पहुँची। स्कूल का पता लगाया। स्कूल क्या था मालगुजार के ढोरों की सार थी। आधी जगह में जानवर बँधते और आधी जगह में पहली दूसरी के बच्चे बैठते। स्कूल नाम की जगह में दस-बारह बच्चे बैठे थे। एक सज्जन एक टूटी कुर्सी पर बैठे कुछ पढ़ा रहे थे। मुझे देखते ही वे हडबड़ा कर उठे, गनीमत थी कि कुर्सी से गिरे नहीं। मैंने अपना परिचय दिया। देखा कि उनके चेहरे का भाव बदल रहा था। लगा कि मुझे देखकर उन्हें जो गलतफहमी हुई थी, वह दूर हो गई है। और वे आश्वस्त हो गये हैं। बोले- “यही स्कूल है, और मैं हूँ हेडमास्टर, ठाकुर रामसिंह। मूँछें गवाही दे रही थीं कि वे ठाकुर हैं। मेरी समझ में नहीं आया कि वे ‘हेडमास्टर’ पर जोर दे रहे हैं या ‘ठाकुर पर’। बाद में समझी कि वे ‘ठाकुर पहले हैं और हेडमास्टर बाद में। बहरहाल आदमी भले थे, भले न होते तो अपने प्रभाव से मुझे किराये का मकान न दिलवाते । उन्होंने तत्परता के साथ गाँव में जगह तलाशी। सिफारिश की। और मुझे रहने का ठिकाना मिला। दूध, अनाज, किराना और साग सब्जी कहाँ से और कैसे मिलेगी, यह बताना भी नहीं भूले। मेरे भले की उन्हें फिक्र थी सो समझाइश दी कि मैं मालगुजार साहब से रामजुहार कर लूँ। वे इतना कह के नहीं रह गये, मुझे मालगुजार की बखरी तक ले भी गये। मालगुजार यानी बड़े ठाकुर। साठ-पैंसठ की उम्र, कानों तक खिंचे गलमुच्छे। देखकर डर सा लगा। लेकिन उनकी बोली की मिठास से मैं अभय हो गई। बोले-“बेटी, कोई तकलीफ हो तो बता देना। हाँ, एक बात समझ लेना, नीच जातों को मुँह मत लगाना।”

मैं ठाकुर साहब की सीख लेकर लौटी और दूसरे दिन से अपने काम में लगने की कोशिश करने लगी। स्कूल बनाम ढोरों की सार में बैठना शुरू हुआ। गोबर की गंध, मक्खी, मच्छर, चीटी और जानवरों की आवाजाही के माहौल से सिर भन्ना उठा। मैनें हेडमास्टर साहब से कहा तो बोले- “बात ठीक है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं?” मैनें कहा- “कम से कम मालगुजार साहब से निवेदन तो कर सकते हैं।” शाम के धुँधलके में हम बखरी पहुँचे। आगे मैं, पीछे हेडमास्टर। बखरी की परछी में तख्त पर ठाकुर साहब विराजमान थे। हेडमास्टर उनके सामने दंडवत हो गये। मैंने नमस्ते की। उन्होंने प्रश्नवाचक मुद्रा में मेरी ओर देखा। फिर स्वर में भलमनसाहत उड़ेलते हुए कहा-” आइये, बैठिये।” मैंनें इधर उधर देखा। बैठने को कुछ नहीं था। मैनें कहा- “बस ठीक है। मैं तो यह अर्ज करने आई थी कि यदि आप जानवरों को दूसरी जगह बाँधने का इंतजाम कर, पूरी दहलान स्कूल के लिये दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।” बड़े ठाकुर कुछ क्षण चुप रहे फिर कारिन्दे को बुलाकर पूछा- “क्यों रे, बखरी के पीछे के दो कमरों में क्या रखा है?” “अंगड़-खंगड़ भरा है, सरकार।” हूँ। वा को खाली कराके स्कूल वालों को दे दो। फिर मेरी ओर देखकर कहा- “बोलो अब तो खुश हो न?” मैंने कृतज्ञता व्यक्त की और विदा लेकर लौट पड़ी। आगे मैं पीछे हेडमास्टर। लेकिन उनका स्वर बदला हुआ था। लग रहा था कि मैं हेडमास्टर हूँ और वे मेरे मातहत। नयी जगह ठीक ठाक थी। खिड़की दरवाजे थे। दो कक्षाओं के लिये काफी जगह थी। मालगुजार के हुक्म से एक सफाई वाली बाई रोज स्कूल के बाहर साफ-सफाई कर जाती। कमरों में झाडू लगाने का काम परम्परागत रूप से बच्चे ही करते। सफाई वाली बाई के साथ एक लड़का भी आता था जो सफाई में हाथ बटाता और फिर कक्षा के दरवाजे से टुकुर-टुकुर भीतर की ओर ताका करता। एक दिन ध्यान गया कि बाईं तो चली गई हैं लेकिन लड़का नहीं गया। वह दरवाजे पर ही जमा है।

मैंनें उसे बुलाया। वह मेरी ओर भौंचक सा देखता रहा। मैंने कहा- “इधर आओ।” उत्तर मिला- “हम नई आय सकत। मैं कुछ पूछती इसके पहले ही क्लास के बच्चे चिल्ला पड़े वो हमें छू नई सकत। मैं दूसरे ही क्षण आसमान से जमीन पर आ गई। सोचा-“अरे ये शहर नहीं गाँव है, जहाँ अभी भी छुआछूत जारी है।” मैं अपनी जगह से उठकर दरवाजे पर आई और पूछा- बेटा, तुमाओ नाम का है? “कोबरा।” कोबरा। यह कैसा नाम है, मैं सोचती रह गई। फिर पूछा- “तुम पढोगे?” “पढ़ने तो है मनो…… मोय गिनती सोइ आत है।” “कहाँ सीखी?” “इतइ, आप औरन पढ़ात हो, सुन खें याद हो गई।” मुझे लगा कि लड़का प्रतिभाशाली है। उसकी मां से बात की। उसने बताया- हेडमास्टर साब से कही हती। बे कहन लगे का करहौ पढ़ा कें। बॉमनों ठाकुरों के लड़कों के साथ जो कैसे बैठ है ? “कोबरा नाम का इतिहास भी पता चला कि जिस दिन लड़का पैदा हुआ था, बाप को साँप ने डस लिया था। जिज्ञासा हुई कि फिर क्या हुआ? “का होतो। सालभर बाद मोहे दूसरे घर बैठने पड़ो। ए को दूसरो बाप सोइ ढंग को नईया, खूबई नसाखेरी करत है।” मैं समझ गई कि स्थिति विकट है। मैं फिर बड़े ठाकुर के दरवाजे पहुंची। लडके के बारे में उन्हें बताया। वे विद्रूप स्वरों में बोले- हम आपको मना नहीं करते। आप उसका नाम लिख लें लेकिन उसे दरवाजे के बाहर रखें, हमारे लड़कों के साथ न बैठायें। मैंने कहा- “मनुष्यता के नाते……..” वाक्य पूरा होने से पहले ही बडे ठाकुर गरजे काहे की मनुष्यता अरे ये सब साँप हैं, कोबरा हैं, कोबरा। मैं चाहती तो बहस कर सकती थी लेकिन बहस से बात और बिगड़ती। मैं चली आई। मैंने कोबरा का नाम दर्ज किया। कोबरा का नाम विवेक मानव रख दिया।

मैं कई साल गाँव में रही। स्कूल मिडिल तक हो गया। दुक्खम-सुक्खम विवेक पढ़ता बढ़ता गया। उसकी पढ़ाई का कुल खर्चा मैं ही उठाती रही।

आठवीं के बाद दिक्कत आई। विवेक पढना चाहता था। मैंने उसे नागपुर भिजवा दिया। एक परिचित उसे छात्रवृत्ति देने लगे। इधर मैं दिल्ली चली गई।

फिर बैंगलोर । विवेक ने मेट्रिक किया, तब तक उसके पत्र आते रहे। फिर व्यवधान पड़ गया ।

वर्षो बाद की बात है । मुझे आकस्मिक रूप से जबलपुर से भोपाल जाना था। स्टेशन पहुँचकर टिकिट तो ले ली किन्तु रिजर्वेशन न होने से चिंतित थी ।

सोचती विचारती प्लेटफार्म के बुकस्टाल के पास खड़ी हो गई ।

कुछ तभी एक सुदर्शन व्यक्ति सामने आकर खड़ा हो गया। उसने एक क्षण मेरे चेहरे को देखा और दूसरे ही क्षण पाँव छूने झुक गया।

मैं अचंभित थी। सोचा-पता नहीं कौन है? शायद किसी रिश्तेदार का पुत्र हो, शायद मेरा कोई पुराना विद्यार्थी हो ।

ऊहापोह के बीच स्वर झंकृत हुआ- “माताजी, मैं तो आपको पहचान गया। आपने मुझे पढ़ाया है। आज जो भी हूँ आपकी ममता से बना हूँ।

मैंने पहचानने की कोशिश करते हुए कहा- “सूरत काफी बदली हुई लग रही है, नाम भी याद नहीं आ रहा?”

“जी, मैं विवेक मानव हूँ विवेक मानव, नाम ने अतीत के दृश्य स्मृति पटल पर उकेर दिये ।

आप कहाँ जा रही हैं?”

‘जाना तो भोपाल है लेकिन रिजर्वेशन नहीं है । “

विवेक तत्परता से बोला- ” कोई बात नहीं। आप ‘एस फोर’ में जाकर बैठिये। मैं अभी आया । “

मैं डिब्बे में बैठ गई। थोड़ी देर बाद दरवाजे के सिरे पर कालाकोट दिखाई दिया। और विवेक का अभी पता नहीं था ।

टिकिट चेकर जब लगभग पास आया तब मैं किंचित आश्चर्य और प्रसन्नता से भर उठी। अरे, यह तो ‘विवेक’ है।

चेकिंग पूरी कर विवेक मेरे पास आया । और टिकिट चेकर की सीट के पास, एक बर्थ मेरे नाम एलाट कर दी।

ट्रेन में जितनी बातचीत संभव थी, हमने की। सुबह ट्रेन भोपाल पहुँची। मैंने बैग सम्हाँला ही था कि विवेक बोल उठा-लाइये मुझे दीजिये। पहले आपको मेरे साथ चलना है, मेरे घर। दो घंटे बितालें फिर आप जहां कहेंगी पहुँचा दूँगा। विवेक के प्रेमाग्रह ने मुझे विवश कर दिया। विवेक ने आटो किया। हम लगभग चालीस मिनट में घर पहुँचे। घर के दरवाजे पर ताला बंद था। विवेक ने पर्स से चाबी निकालकर दरवाजा खोला। छोटा सा घर था। साफ सुथरा। सजा संवरा। मैंने पूछा-“बहू और बच्चे?” “तीनों जन अपने अपने स्कूल गये होंगे। आपकी बहू भी टीचर है।” मैं सोफे पर बैठी थी। विवेक चाय लेकर आ गया। फिर कहा- “बाथरूम सामने है, आप नहाकर आराम करें, तब तक सब लोग आ जायेंगे।” मैंने स्नान पूजन किया और लेट गई। सफर में थकान के कारण झपकी लग गई। अकस्मात लगा कि कोई कुछ कह रहा है। विवेक मुझे जगा रहा था। “उठिये, भोजन तैयार है।” तभी गुड़िया-सी बहू ने पाँव छुए। नाती और नातिन भी आ गये। बड़े प्यारे बच्चे थे। भोजन करते-करते विवेक ने अपनी पत्नी और बच्चों से कहा- “मैं हमेशा इन्हीं माताजी की चर्चा किया करता था। ये मेरी गुरू भी हैं और माता भी। इनकी कृपा न होती तो पता नहीं मेरा क्या होता।” पढ़े लिखे, नौकरी में लगे, घर परिवार वाले विवेक को देखकर हदय प्रसन्न हो रहा था। मैं सोच रही थी कि ‘मानव’ को ‘कोबरा’ नहीं ‘विवेक’ बनना चाहिये। नहीं, नहीं, शायद भेद मूलक व्यवस्था को समाप्त करने के लिये ‘मानव’ को ‘कोबरा’ भी बनना चाहिये।

 

स्व. डॉ. गायत्री तिवारी

साभार – डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#७६ – विचित्र यात्रा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– विचित्र यात्रा…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७६ — विचित्र यात्रा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

उसकी एक ‘कल्पना’ चल रही थी। वह असाध्य बीमारी झेलते पलंग पर था। उसे प्यास लगने पर पानी पिलाया जाता कि पूरा परिवार रोने लगा। वह अपनों को रोने से मना करता कि उसे लगा कोई उसे लेने आया है। चाहे भगवान ही आए, वह क्यों जाता? तभी उसने सुना उसकी माँ कह रही है — मेरा बेटा चला गया ! माँ के इन शब्दों के साथ उस पर मृत्यु की चादर चढ़ा दी गई। यहीं उसकी ‘कल्पना’ का पटाक्षेप हो गया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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