श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी — जादूई पेन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३९ ☆
☆ बाल कहानी — जादूई पेन ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
दादीजी सुबह जल्दी उठीं। देखा, श्रेया को बुखार था।
‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था।
‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’
‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा।
मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी।
कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’
‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा।
तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’
‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया।
‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’
‘‘जादूई पेन!’’
‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’
‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’
‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’
‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई।
आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था।
श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी।
वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’
‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं।
श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं।
जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’
उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’
‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा।
लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’
यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’
इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’
‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’
‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’
‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’
‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया।
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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
दिनांक- 10.01.2019
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