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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – राम-लक्ष्मण ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

श्री घनश्याम अग्रवाल (श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा राम-लक्ष्मण। ) ☆ लघुकथा – राम-लक्ष्मण ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆  इस पावन पर्व पर एक नयी दृष्टि से लिखी ये लघुकथा, श्रीराम को प्रणाम करते हुए :- राम जब वन में सीता को ढूंढ रहे थे तो उन्हें एक हार दिखाई पड़ा । उन्होंने लक्ष्मण से पूछा-" देखो, ये हार कहीं सीता का तो नहीं है ? " इस पर लक्ष्मण ने कहा-" भैया, मैंने तो जीवनभर भाभी के चरण ही देखे हैं, मैं हार नहीं पहचान सकता। हाँ, पायल होती तो पहचान लेता। " यह पौराणिक प्रसंग पढ़-सुनकर मेरा मन लक्ष्मण की इस पावन श्रद्धा के प्रति झुक गया । पर एक बात मन में बार-बार उठ भी रही थी कि राम का लक्षण से यह पूछना, क्या लक्ष्मण का अपमान नहीं है ? लक्ष्मण की पावनता को भला राम से ज्यादा कौन जानता होगा ? इस सोच-विचार मैं मेरी आँख लग गई । और मैंने सपने...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #62 – धीरे चलो ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”) ☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #62 – धीरे चलो ☆ श्री आशीष कुमार☆ नदी के तट पर एक भिक्षु...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 74 ☆ भँवर ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा (डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा भँवर । डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस संवेदनशील एवं विचारणीय लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 74 ☆ ☆ लघुकथा – भँवर ☆ रोज की तरह वह बस स्टैंड पर आ खडी हुई, शाम छ: बजे की बस में यहीं से  बैठती है। काम निपटाकर सुबह पाँच बजे वापस आ जाती है। बस अभी तक नहीं आई। आज घर से निकलते समय ही मन बैचैन हो रहा था। मिनी बडी हो रही है। रंग भी निखरता जा रहा है। दूसरी माँएं अपनी...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 90 – लघुकथा – फुर्सत ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  लघुकथा  “फुर्सत”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 90 ☆ ☆ लघुकथा — फुर्सत ☆  पत्नी बोले जा रही थी। कभी विद्यालय की बातें और कभी पड़ोसन की बातें। पति 'हां- हां' कह रहा था। तभी पत्नी ने कहा, " बेसन की मिर्ची बना लूं?" पति ने 'हां' में गर्दन हिला दी। " मैं क्या कह रही हूं? सुन रहे हो?" पत्नी मोबाइल में देखते हुए कह रही थी। पति उसी की ओर एकटक देखे जा रहे थे ।  तभी पत्नी ने कहा, " तुम्हें मेरे लिए फुर्सत कहां है ? बस, मोबाइल में ही घुसे रहते हो।" पति ने फिर गर्दन 'हां' में हिला दी । तभी पत्नी ने चिल्ला कर कहा, "...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – आग ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – लघुकथा - आग दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे। बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – रहस्य ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – लघुकथा - रहस्य ...जादूगर की जान का रहस्य, अब रहस्य न रहा। उधर उसने तोते को पकड़ा, इधर जादूगर छटपटाने लगा। ....देर तक छटपटाया मैं, जब तक मेरी कलम लौटकर मेरे हाथों में न आ गई।   ©  संजय भारद्वाज (रात्रि 2:29, 2.2.19) अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ मोबाइल–...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 99 – लघुकथा – ओरिजनल फोटो ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  स्त्री विमर्श पर आधारित एक संवेदनशील लघुकथा  “ओरिजनल फोटो”। इस विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 99 ☆  लघुकथा – ओरिजनल फोटो शहर की भीड़भाड़ ईलाके के पास एक फोटो कापी की दुकान। विज्ञापन निकाला गया कि काम करने वाले लड़के - लड़कियों की आवश्यकता है, आकर संपर्क करें। दुकान पर कई दिनों से भीड़ लगी थीं। बच्चे आते और चले जाते। आज दोपहर 2:00 बजे एक लड़की अपना मुंह चारों तरफ से बांध और ऐसे ही आजकल मास्क लगा हुआ। जल्दी से कोई पहचान नहीं पाता। दुकान पर आकर खड़ी हुई। मालिक ने कहा कहां से आई हो, उसने कहा... पास ही है घर मैं समय पर आ कर सब काम कर जाऊंगी। मेरे पास छोटी स्कूटी है। दुकानदार ने कहा...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ मैं ‘असहमत’ हूँ …..! ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव

श्री अरुण श्रीवास्तव  (ई-अभिव्यक्ति में श्री अरुण श्रीवास्तव जी का हार्दिक स्वागत है। आप भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उनका ऐसा ही एक पात्र है 'असहमत' जिसके इर्द गिर्द उनकी कथाओं का ताना बना है।  आइये हम अपने प्रबुद्ध पाठकों से उनके पात्र 'असहमत' से परिचय करवाते हैं। हम साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से आपको असहमत से सहमत करवाने का प्रयास करेंगे। कृपया प्रतिक्रिया एवं प्रतिसादअवश्य दें।)      ☆ मैं 'असहमत' हूँ ...! ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆ बाजार में वो दिखा तो लगा वही है पर जैसे जैसे पास आता गया तो लगने लगा कि नहीं है पर कुछ कुछ मिलता सा लगा....
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ☆ डॉ. हंसा दीप

डॉ. हंसा दीप ☆ लघुकथा – काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ☆ डॉ. हंसा दीप ☆ गुजराती जैन दंपत्ति बस में सफर कर रहे थे। उनके समीप ही सिख दंपत्ति बैठे थे। बातों-बातों में सिख दंपत्ति ने अपने साथ का नाश्ता-मिठाई-नमकीन वगैरह गुजराती दंपत्ति से खाने का आग्रह किया। उन्होंने विनम्रता पूर्वक इनकार कर दिया और बताया कि जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद खाना, नाश्ता आदि करने की मनाही होती है। सिख महिला ने अपने पति से पंजाबी में कहा - "ए लोग किन्ने पिछड़े हन, रात दी रोटी दा और धरम दा कि मेल?"  ठीक उसी समय गुजराती महिला अपने पति से कह रही थी – “आ लोकों केटला जूना जमाना ना छे, एटलो मोटो पागड़ो बांधे, ने लांबी डाढ़ी राखे छे।” ☆☆☆☆☆ © डॉ. हंसा दीप संपर्क – Dr. Hansa Deep, 1512-17 Anndale Drive, North York, Toronto, ON – M2N2W7 Canada दूरभाष – 001 647 213 1817 hansadeep8@gmail.com ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #61 – अपना दीपक स्वयं बनें ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”) ☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #61 – अपना दीपक स्वयं बनें  ☆ श्री आशीष कुमार☆ एक गांव मे अंधे...
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