हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #16 ☆ साथी ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “साथी  ”। )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #16 ☆   ☆ साथी  ☆   "चल भाई  ! महफ़िल जमाते है"  रमण ने कहा तो उस ने प्याला उठ लिया. आगे-आगे रमण और पीछे-पीछे वह चलने लगा. कुछ ही देर में महफ़िल जम गई.  एक गिलास में वह कुछ बियर  डाल लेता. दूसरे प्याले में कुछ बियर  उंडेल  देता. "अरे भाई  ! तू बेईमानी मत करना" कहते हुए रमण कागज में रखी सेव का थोड़ा सा भाग उस के सामने रख देता और थोडा सा अपने सामने रख लेता. फिर दोनों सेव  खाते हुए मस्ती से बियर  का मजा ले रहे थे. तभी मोहन वहाँ आ पहुँचा ," क्यों भाई, महफ़िल जम रही है ?" "हाँ  यार,...
Read More

हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ उसने कहा था ☆ – श्री नरेंद्र राणावत

श्री नरेंद्र राणावत   ☆ लघुकथा - उसने कहा था ☆   ऐवन पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य की परेशानियों के कारण तनाव में थी। उसे अपने जीवन की अगली राह दिखाई ही नहीं दे रही थी। मन में व्याप्त अवसाद उसे बार-बार आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहा था। इसी मानसिकता में ऐवन आज आँगन में ओटले पर बैठी पैर के अंगूठे से जमीन को कुरेद जरूर रही थी, उसकी निगाह एकटक शून्य में गुम थी । एक बार तो उसके आँखों के सामने अंधेरा छा गया, फिर जो प्रकाशपुंज उठा, उसकी आँखें तो क्या, आत्मा तक चौंधिया गई। 'ऐवन, मुझे तुम्हारे निर्णय पर कोई आपत्ति नहीं, मैं तुम्हारी किसी मजबूरी का फायदा उठाना नहीं चाहता। शायद तुम मुझे पूरी तरह समझ न पाई हो। लेकिन फिर भी इतना कहूँगा कि मैं जीवन भर सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा इंतजार करूंगा। जब चाहो याद कर सकती हो।' हाँ, कॉलेज में अंतिम दिन यही तो कहा था नरेंद्र ने। नरेंद्र, जो पिछले साल भी मॉल में एक बार फिर...
Read More

हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ श्राद्ध ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक    (डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत है यह सामयिक एवं बेबाक लघुकथा  "श्राद्ध".)   ☆ लघुकथा - श्राद्ध ☆   बाबूजी की तिथि पर सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया था । श्रीमतीजी ने बाबूजी की पसन्द के सभी पकवान बनाये थे । मेहमानों को परोसते हुए कह रही थीं - "बाबूजी को मटर पनीर, आलू छोले, गोभी, पराठाँ  बहुत पसंद थे । उनकी ही पसन्द को ध्यान में रखते हुए यह सब बनाये हैं, ताकि उनकी आत्मा तृप्त हो जाये।" वह श्रीमतीजी के इस कथन पर अंदर ही अंदर कसमसा रहा था -  जब तक बाबूजी जिंदा थे, तब तक वे श्रीमतीजी को फूटी आंख न सुहाते थे। हमेशा ताने मारा करती, बुढ़ापे में बाबूजी की जीभ कुछ ज्यादा ही चलने लगी है, उनकी रोज़ रोज की फरमाइश से में तंग आ गई हूँ। वह उठकर छत पर आ गया। छत की मुंडेर पर बाबूजी के निमित्त निकाली गयी पत्तल वैसी ही रखी थी। उसने चारों ओर नजर घुमाई, दूर दूर तक...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 16 – घड़ी ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “घड़ी”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी  ने  इस लघुकथा के माध्यम से स्वाभिमान एवं  संयम का सन्देश देने का प्रयास किया है।)   ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 16 ☆   ☆ घड़ी ☆   सरोज बहुत ही होनहार और तीव्र बुद्धि वाली लड़की थी। पिताजी किराने की दुकान पर काम करते थे। माँ सिलाई-बुनाई का काम कर घर का खर्च चलाती थी। घर में बूढ़े दादा-दादी भी थे। सरोज का एक भाई भी जो बिल्कुल इन बातों से अनजान छोटा था। खेल-कूद और पढ़ाई में सरोज बहुत ही होशियार थी। किसी तरह पिताजी अपनी गृहस्थी चला रहे थे। पास पड़ोस में सरोज आती जाती थी। और किसी के घर का सामान लाकर दे देना, बदले में थोड़े से पैसे मिल जाते थे, जिससे स्कूल का कॉपी किताब खरीद लेती थी। एक बार स्कूल के किसी कार्यक्रम के तहत उसे...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #15 ☆ बेबस ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “बेबस ”। )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #15 ☆   ☆ बेबस ☆   धनिया इस बार सोच रही थी कि जो 10 बोरी गेहू हुआ है उस से अपने पुत्र रवि के लिए कॉपी, किताब और स्कूल की ड्रेस लाएगी जिस से वह स्कूल जा कर पढ़ सके. मगर उसे पता नहीं था कि उस के पति होरी ने बनिये से पहले ही कर्ज ले रखा है . वह आया. कर्ज में ५ बोरी गेहू ले गया. अब ५ बोरी गेहू बचा था. उसे खाने के लिए रखना था. साथ ही घर भी चलाना था. इस लिए वह सोचते हुए धम से कुर्सी पर बैठ गई कि वह अब क्या करेगी ? पीछे...
Read More

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – सृजन ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  ☆ संजय दृष्टि - सृजन ☆ (माँ शारदा की अनुकम्पा से जन्मी एक लघुकथा) जल शांत था। उसके बहाव में आनंदित ठहराव था। स्वच्छ, निरभ्र जल और दृश्यमान तल। यह निरभ्रता उसकी पूँजी थी, यह पारदर्शिता उसकी उपलब्धि थी। एकाएक कुछ कंकड़ पानी में आ गिरे। अपेक्षाकृत बड़े आकार के कुछ पत्थरों ने भी उनका साथ दिया। हलचल मची। असीम पीड़ा हुई। लहरें उठीं। लहरों से मंथन हुआ। मंथन से सृजन हुआ। कहते हैं, उसकी रचनाओं में लहरों पर खेलता प्रवाह है। पाठक उसकी रचनाओं के प्रशंसक हैं और वह...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 15 – सच्ची मोहब्बत ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “सच्ची मोहब्बत”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी की कलम को इस बेहतरीन लघुकथा के माध्यम से  युवाओं को वैवाहिक निर्णय लेने के समय भावनाओं का सम्मान रखने का अभूतपूर्व संदेश देने के लिए  बधाई ।)   ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 15 ☆   ☆ सच्ची मोहब्बत ☆   मोहब्बत कहते ही लगता है कि एक दूसरे के प्रति अटूट प्यार विश्वास और समर्पण की भावना। मोहब्बत किसी से कहीं भी हो सकती है, बस दिल पर गहरा असर हो। गांव के मोहल्ले में एक छोटा सा परिवार सभी के साथ रहता था। माँ-बाप मजदूरी करते और बिटिया नंदिनी  और हाथ पैर से अपंग भाई। नंदिनी  बहुत सुंदर पढ़ाई लिखाई में तेज और समझदार थी। कहते हैं मजबूरी सब सिखा देती है, ऐसे ही नंदिनी  समय से पहले समझदार और अपने कर्तव्य समझने लगी थी। भाई की कमजोरी...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 14 – लघुकथा – बालवर्ष का लाभ ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  e-abhivyakti के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं । अब हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे।  आज प्रस्तुत है  उनकी  लघुकथा  “बालवर्ष का लाभ”।  यदि हमारे भीतर मानवता जीवित है तो हम आज ऐसे  परजीवी न होते . यह  भी मत भूलिए  कि  जरूरतों और समय ने बच्चों को समय पूर्व ही वयस्क बना दिया है.)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 14 ☆   ☆ लघुकथा – बालवर्ष का लाभ ☆   और फोटोग्राफर भरी दुपहरिया में पसीना-पसीना हुए घूम रहे थे। उद्देश्य था बालवर्ष के सिलसिले में कुछ खस्ताहाल, संघर्षशील बच्चों के इंटरव्यू और चित्र छापना। ढाबे में काम करने वाले एक छोकरे का इंटरव्यू लेकर लौटे थे और दूसरे की तलाश में थे। दूसरा भी मिल गया, चौराहे पर बूट-पॉलिश करता...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 12 ☆ ☆ किससे माँगे क्षमा ? ☆ ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ  -साहित्य निकुंज”के  माध्यम से आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की  एक कहानी   “किससे मांगे क्षमा?”। )    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 12  साहित्य निकुंज ☆   ☆ किससे माँगे क्षमा ? ☆   आज बेटी को विदा करने के बाद मन बहुत उदास था आँसू है जो थमने का नाम ही नहीं ले रहे।इतने में कहीं से एक स्वर उभरा आज जो हुआ वह सही था या पहले जो मैंने निर्णय किया था तुमने वह सही था । दिमाग के सारे दरवाजे खिड़कियाँ खुल गई और मन विचारों के सागर में गोते लगाने लगा पहुंच गए कई वर्ष पीछे..... दरवाजे पर...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #14 ☆ परीक्षा ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “परीक्षा”। )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #14 ☆   ☆ परीक्षा ☆   मैंने परीक्षाकक्ष में जा कर मैडम से कहा, “अब आप बाथरूम जा सकती है.” मैडम ने “थैंक्स” कहा और बाहर चली गई और मैं परीक्षा कक्ष में घूमने लगा. मगर, मेरी निगाहें बरबस छात्रों की उत्तर पुस्तिका पर चली गई थी. सभी छात्रों ने वैकल्पिक प्रश्नों के सही उत्तर कांट कर गलत उत्तर लिख रखे थे. यानी सभी छात्रों ने एक साथ नकल की थी. छात्रों के 20 अंकों के उत्तर गलत थे. मुझसे से रहा नहीं गया. एक छात्र से पूछ लिया,  “ये गलत उत्तर किस ने बताए हैं?” सभी छात्र आवाक रह गए. और एक छात्र ने डरते डरते कहा,...
Read More