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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 168 ☆ लघुकथा – इच्छा मृत्यु… ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा – इच्छा मृत्यु … ।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 168 ☆ लघुकथा – इच्छा मृत्यु …  राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे. किंतु सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि राज्य का उत्तराधिकारी सत्यवती का पुत्र ही हो. अपने पिता की सत्यवती से विवाह की प्रबल इच्छा को पूरा करने के लिए गंगा पुत्र भीष्म ने अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली. पिता के प्रति प्रेम के इस अद्भुत त्याग से प्रसन्न हो, उन्होने भीष्म को इच्छा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 128 – लघुकथा – चुनावी कशमकश… ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाती सशक्त लघुकथा  “चुनावी कशमकश …”। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 128 ☆ ☆ लघुकथा – चुनावी कशमकश ☆ गाँव में चुनाव का माहौल बना हुआ था। घर- घर जाकर प्रत्याशी अपनी-अपनी योजना और लाभ का विवरण दे रहे थे। चुनाव कार्यालय से लगा हुआ छोटा सा मकान जिसमें अपने माता-पिता के साथ रूपा रहती थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। चाह कर भी रूपा पढ़ाई नहीं कर सकी। लेकिन सिलाई का कोर्स पूरा कर पूरे घर का खर्च चलाती थी। माँ बेचारी दिहाड़ी मजदूरी का काम करती थी और पिताजी पैर से लाचार होने के कारण ज्यादा कुछ नहीं कर पाते परंतु अपना स्वयं का खर्च किसी तरह काम करके निकाल लेते थे। चुनाव के झंडे, बैनर सिलने के लिए रूपा को दिया गया।...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – अहम की भेंट ☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆

डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ (आज  प्रस्तुत है  डॉ कामना कौस्तुभ जी की एक विचारणीय लघुकथा अहम की भेंट। )   ☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा – अहम की भेंट ☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆  धूमधाम से मुंबई से मैट्रिक पास लड़की को ब्याह कर लाए। कुछ दिनों बाद निशा ने कहा आप लोगों ने तो कहा था कि पढ़ने देंगे। तब अजय ने डांट कर कहा – “कोई जरूरत नहीं पढ़ने लिखने की। घर गृहस्ती संभालो और उसके बाद मारपीट गाली-गलौज के माहौल में एक के बाद एक तीन लड़कियों को जन्म दिया। अजय के तेज स्वभाव ने कभी भी उसे गृहस्ती के या लड़कियों के पढ़ाई लिखाई और भविष्य के निर्णयों में बोलने का अधिकार नहीं दिया। तीनों लड़कियों को बिना ज्यादा पढ़ाई के शादी कर जहां-तहां पटक दिया गया।  यहां तक कि अजय का बिजनेस कैसे चलता है इसकी जानकारी भी कभी निशा को नहीं दी। अचानक अजय को एक के बाद एक दो हार्ट अटैक आए और 2 दिन के बाद ही...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार # 95 – अभागा राजा और भाग्यशाली दास ☆ श्री आशीष कुमार ☆

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”) ☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #95 अभागा राजा और भाग्यशाली दास  ☆ श्री आशीष कुमार☆ एक बार एक...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – सीख ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।)  आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सीख ।) ☆ लघुकथा – सीख  ☆ श्री हरभगवान चावला ☆ मुन्ना जब बहुत छोटा था, माँ को हमेशा लगता कि कहीं वह भूखा न रह जाए। वह उसकी अनिच्छा के बावजूद उसे बार-बार दूध पिलाती रहती। मुन्ना बड़ा हो गया, उसकी भूख भी बड़ी हो गई, पर घर ग़रीब बना रहा। पति ने पत्नी से कहा,"हमें मुन्ना को भूखा रहना सिखाना होगा। तुमने बचपन में उसे ज़रूरत से ज़्यादा दूध पिलाया जिससे उसकी भूख बढ़ गई।" "उसकी भूख की चिन्ता तुम्हें मुझसे ज़्यादा थी, मुझे इल्ज़ाम मत दो।" "चलो छोड़ो पिछली बातें। आज की परिस्थिति में उसकी भूख हमारी ही नहीं, उसकी भी चिंता का कारण होनी चाहिए। रोज़गार कहीं है नहीं। कहीं दिहाड़ी करेगा...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – प्रेम☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – लघुकथा  - प्रेम "वी आर इन रिलेशनशिप.., आई लव हर डैड," होस्टल में रहनेवाले बेटे ने फोन पर ऐलान किया था। वह चुप रहा। यहाँ-वहाँ की बातें कर कुछ देर बाद फोन रख दिया। ज़्यादा समय नहीं बीता। शायद छह महीने बाद ही उसने घोषणा कर दी, " हमारा ब्रेकअप हो गया है। आई डोंट लव हर एनी मोर।"...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # 37 – जन्मदिवस – भाग – 1 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव (श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना  जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है अनुभवों एवं परिकल्पना  में उपजे पात्र संतोषी जी पर आधारित श्रृंखला “जन्मदिवस“।)    ☆ कथा कहानी # 37 – जन्मदिवस – भाग – 1 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆ शाखा के मुख्य प्रबंधक जब सुबह 9:30 पर शाखा पहुंचे तो थकान महसूस कर रहे थे. लगातार बढ़ता काम का बोझ,लक्ष्य की चुनौतियां, लोगों की शिकायतें जिसमें नियंत्रक महोदय, स्टाफ और महत्वपूर्ण ग्राहक और उनका परिवार सभी पक्ष शामिल थे,उनके तनाव को दिन प्रतिदिन बढ़ा रहे थे.उन्हें इक्के दुक्के व्यक्ति...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 127 – लघुकथा – संस्कारों की बुवाई… ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है नवीन पीढ़ी में संस्कारों के अंकुरण हेतु विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा “संस्कारों की बुवाई…”। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 127 ☆ ☆ लघुकथा – संस्कारों की बुवाई ☆ सत्य प्रकाश और उसकी पत्नी धीरा बहुत ही संस्कारवान और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। एक ही बेटा है तनय वह भी बाहर पढ़ते हुए अपनी पसंद से शादी कर सुखद जीवन बिता रहे थे। गाँव में सत्य प्रकाश को बहुत चाहते थे क्योंकि उनकी बातें व्यर्थ नहीं होती थी और न ही कभी असत्य का साथ देते थे। वर्क फ्रॉम होम होने के कारण बेटा बहू अपने पाँच साल के बेटे यश को लेकर घर आए। दादा - दादी के प्यार से यश बहुत खुश हुआ। दिन भर धमाचौकड़ी मचाने वाला बच्चा दादा जी के साथ सुबह से उठकर उनसे अच्छी बातें सुनता, पूजा-पाठ में...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ पितृ दिवस विशेष – लघुकथा – “मुक्ति” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल (श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है  पितृदिवस  पर आपकी एक संवेदनशील लघुकथा  – “मुक्ति”) ☆ कथा-कहानी ☆ पितृ दिवस विशेष - लघुकथा – “मुक्ति” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆  (पिता हर साल बूढ़े होते हैं, पुराने नहीं। आज फादर्स डे पर, सभी के पिताओं प्रणाम करते हुए,  एक बूढ़ी-सी विवश लघुकथा) दो दिन पहले एक भीषण दुर्घटना हो गई। मौसम की पहली तेज मूसलाधार बारिश से नदी के पुल का एक हिस्सा टूट चुका था और आती हुई पैसिंजर ट्रेन की तीन बोगी नदी में गिरकर डूब चुकी थीं। चारों ओर हाहाकार मचा था। लाशें निकाली जा रही थी। फिर भी आशंका थी कि कुछ लाशें अब भी नदी में बहकर चली गई होंगी। राहत अधिकारी ने घोषणा की -" नदी में से लाश ढूँढकर लानेवाले को एक हजार रुपए मिलेंगे। " राहत शिविर से तीन-चार मील दूरी पर एक झोंपड़ी के सामने दो भाई उदास बैठे थे। तीन दिनों से उनके पेट में अन्न का दाना...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बॉयकॉट ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।)  आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बॉयकॉट।) ☆ लघुकथा – बॉयकॉट ☆ श्री हरभगवान चावला ☆ साठ-सत्तर हज़ार की आबादी वाले मेरे शहर में मुस्लिमों की संख्या बहुत कम थी। शहर में सिर्फ़ एक मस्जिद थी जो मेरे घर से बहुत दूर थी। साल-दो साल में एकाध बार ही उधर से जाना होता। उस दिन शुक्रवार था। संयोग से मेरा मस्जिद के सामने से निकलना हुआ। लोग जुम्मे की नमाज़ पढ़कर बाहर निकल रहे थे। मैंने देखा - उन लोगों में जालीदार टोपी लगाए दीपक सब्ज़ीवाला भी था। उसने भी मुझे देख लिया था, लेकिन कतराते हुए एक ओर मुड़ गया। शाम को सब्ज़ी खरीदने के लिए मैं उसकी दुकान पर खड़ा था, जहाँ एक लोहे का बोर्ड टँगा...
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