हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कविता ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “चरित्रहीन“.)

 ☆ कथा कहानी ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

क्या जमाना आ गया! घोर कलयुग ! इसी को कहते हैं कि कलयुग अपने चरम सीमा पर चल रहा है ! क्या हो गया दादू ? अचानक आपको कलयुग का  याद कहाँ से आने लगा. बबलू ने दादू से पूछा. दादू यानी चौधरी रमाशंकर जी. अस्सी साल की आयु पार कर चुके हैं, वास्तविक आयु कितना है, कोई नहीं जानता, लेकिन बच्चे से लेकर बूढ़े तक, सब लोग इनको दादू ही कहते हैं और आप का बड़ा सम्मान करते हैं.

हाँ तो बात हो रहा था, कलयुग का, दादू का परिचय देने में मैं रह गया और बबलू का प्रश्न पीछे  छूट गया. बबलू ने फिर पूछा कि दादू क्या हो गया कि आप को कलयुग याद आ गया. चौधरी जी ने एक गहरा  सांस लिया और बोले कि क्या बताऊँ बेटा, अब कहने को रह ही क्या गया है. बबलू बोला नहीं दादू आपको बताना तो पड़ेगा ही. चौधरी बोले बेटा देखो पंडित रघुराज जी के परिवार के किसी बहु बेटियों  को कभी घर से बाहर अकेले निकलते किसी ने देखा है क्या ? बबलू थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला कभी ध्यान तो नहीं दिया है, लेकिन देखा भी नहीं है.

अभी ये बातें हो ही रहा था कि रमापति बाबू भी आ गए. उन्होंने दादू का प्रश्न सुना तो रुक गये, बोले लेकिन आप यह प्रश्न पूछ ही क्यों रहें हैं, ऐसा क्या कर दिया उनके परिवार के महिलाओं ने. दादू बोले कि चिंता का विषय तो है ही , देखिये पडिंत रघुराज जी के देहांत के बाद उनकी बहु और बेटियों  को जब देखिये वे घर से बाहर निकल जाती हैं और देर रात को वापस आतीं हैं. पता नहीं कहाँ जातीं हैं और क्या- क्या करतीं हैं. रमापति बाबू ने कहा कि कहीं जाती होंगी, कोई काम रहता होगा. लेकिन जब दादू ने अपनी बात पुनः दोहरायी तो रमापति बाबू  उनके कहने का अर्थ कुछ-कुछ समझने लगे.

रमापति बाबू ने कहा कि दादू आप आधी बात कह रहे हैं. पंडित रघुराज जी के देहांत के उपरांत, उनका जवान बेटा, आनन्द का  कोविड से देहांत हो गया. परिवार में आनन्द ही एक मात्र कमाने वाला था. सरकार ने कुछ सहायता किया , लेकिन उससे कितना दिन काम चलता ! तो परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही कठिन समय से गुजर रहा है. मैं आप से एक बात पूछता हूँ कि क्या हममें से कोई एक बार भी जा कर उनके परिवार से उनकी आर्थिक कठिनाईयों के बारे में पूछा, किसी ने कोई सहायता किया. आज महंगाई के जमाने में हर व्यक्ति किसी प्रकार से अपने परिवार का ही खर्चा चला पा रहा है, तो वह दूसरे की सहायता क्या करेगा. मैं आप ही से पूछता हूँ , आप तो पंडित जी के बहुत ही घनिष्ठ परिवारिक मित्र रहे हैं, आप ने क्या किया. दूसरी बात इस प्रकार से रोज- रोज दूसरों से सहायता की प्रतिक्षा करने की जगह, अगर उनके परिवार के महिलाओं ने ख़ुद ही पैसा कमाने का प्रयास किया है और अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प लिया  है, तो हमें उनके इस बात की प्रशंसा करनी चाहिए न कि उनके चरित्र पर किसी प्रकार का संदेह करना. वे पढ़ी लिखी महिलायें हैं, हमें उनके चरित्र पर अनावश्यक संदेह या प्रश्न नहीं करना चाहिए. आखिर हम अपनी लड़कियों को क्यों पढ़ाते हैं?

रमापति बाबू ने फिर आगे पूछा कि आप ने यह धारणा क्यों बना रखा है कि जो महिलाऐं अकेले घर से बाहर निकलतीं हैं, उनका चरित्र ठीक नहीं होता या उनके चरित्र पर संदेह किया जा सकता है. चरित्रवान होना या चरित्रहीन होना, एक बिल्कुल अलग विषय है. आखिर कब तक हम अपनी घर की माँ, बहन व बेटियों को अपंग बना कर रखेंगे. वास्तव में हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे घर की महिलाऐं, चाहे वह कोई भी हों, वे हर तरह से सशक्त होनी ही चाहिए. नौकरी करना या न करना, यह निर्णय उन  पर छोड़ दें, लेकिन अगर  वह नौकरी करना चाहती है, तो मना न करें. परन्तु अगर  किसी कारणवश वह नौकरी  नहीं करना चाहती है, तो उसे नौकरी करने के लिए बाध्य भी न करें. लेकिन वे घर से बाहर अकेले जातीं हैं, इस कारण से उनके चरित्र पर संदेह करना बहुत ही  गलत है.

दादू के चेहरे के भाव से ऐसा लग रहा था कि वे रमापति बाबू के बातों से सहमत नहीं थे. उन्हें पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में चिंता सता रहा था. बबलू रमापति बाबू के बात से पूरी तरह से सहमत तो था,लेकिन वह पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में ज्यादा नहीं जानता था, अत: कुछ बोलना उसे उचित नहीं लगा. खैर उस समय बात वहीं पर समाप्त हो गया और सब लोग अपने अपने घर चले गए.

लेकिन दादू के मन में संदेह तो बैठ ही गया था और यह संदेह उन्हें परेशान किये था. एक दिन हिम्मत कर के दादू पंडित रघुराज जी के घर चले ही गये. उनका आना जाना तो पहले से ही था. दादू पंडित रघुराज जी के पुराने मित्र थे और परिवार में सब लोग इनको जानते थे. घंटी बजाया,  थोड़ी देर बाद पंडित रघुराज जी की छोटी बेटी पुष्पा ने दरवाजा  खोला. दादू को देखते ही उसने दादू का चरण स्पर्श किया और बैठने के लिए कहा. पुष्पा ने आवाज लगाई कि मम्मी देखो दादू आये हैं. थोड़ी देर में पुष्पा की माँ मालती आ गयी और  दादू से बोली अरे भाई साहब आज इधर कैसे, आप तो लगता है कि मेरे घर का रास्ता ही भूल गए. अब दादू बोलते क्या, पंडित रघुराज जी के समय लगभग हर सप्ताह आना होता था, लेकिन कुछ तो कारण बताना ही था.  बोले अरे बहन जी अब मैं भी तो बूढ़ा हो गया हूँ, फिर कोविड ने और भी निकलना बंद कर दिया, इसीलिए नहीं आ पाया. मालती बोली बात तो आप सही कह रहे हैं.  वैसे बाहर निकलना तो मेरा भी लगभग बन्द ही हो गया है, वैसे आप के परिवार में सब लोग कैसे हैं. आप का छोटा पौत्र तो अब बड़ा हो गया होगा. मुझे भी बहुत दिन हो गया आप के घर गए हुए.

दादू बोले घर पर सब लोग ठीक हैं, छोटका तो अब प्ले स्कूल जाता है. थोड़ी देर बैठने के बाद दादू ने कहा चलता हूँ. मालती बोली नहीं भाई साहब इतने दिनों बाद आये हैं, बिना चाय पिये आप कैसे जा सकते हैं. पुष्पा बेटी दादू के लिए चाय बनाओ, मैं तब तक पकौड़ियां छानती हूँ और भाई साहब तब तक आप अखबार पढ़िये.

खैर दादू बैठ गए, अखबार पढ़ने लगे, लेकिन मन में शंका थी कि घर का खर्चा कैसे चलता होगा. इतने में एक लड़का आया, उसने घंटी बजाया, पुष्पा ने दरवाजा खोला और उससे बोली, रुको. पुष्पा घर के अन्दर गयी और दो टिफिन कैरियर ला कर उसे दे दिया. इसी तरह दो तीन लोग और भी  आये टिफिन कैरियर ले कर चले गए. दादू कुछ- कुछ समझ रहे थे. उन्होंने पुष्पा से पूछा बेटी तुम किस कक्षा में पढ़ती हो. पुष्पा बोली दादू इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दिया और आज कल एक दूकान पर काम करतीं हूँ. इतने में मालती एक बड़े प्लेट में पकौड़ियां और चटनी लेकर आ गयी और बोली भाई साहब लीजिए.

दादू के चाय पीने के दौरान मालती को कई फोन आये, मालती हां , हूँ में जबाब दे कर फोन बन्द कर देती. दादू यह सब बड़े ध्यान से देख रहे थे. दादू के चेहरे का भाव देख कर मालती कुछ समझ गयी. बोली भाई साहब आजकल मैं घर में ही किचन चलाती हूँ और ये जो लोग अकेले रहते हैं , उन्हें खाना बना कर देतीं  हूँ. आजकल वे लोग जो नौकरी या पढ़ाई करते हैं, या पति पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, वे खाना तो बना नहीं सकते, तो ऐसे लोगों को मैं खाना देतीं हूँ. एक बाई भी है, वह भी सहायता करती है. अब क्या किया जाय भाई साहब, पेट  तो भरना ही है. बेटे के अचानक मौत के बाद तो कुछ दिन बुद्धि ही काम नहीं कर रही थी कि कुछ सोच सकुं. फिर धीरे- धीरे अपने मन को समझाया कि जिन्दा तो रहना ही है! दोनों बेटियों ने पैसे के अभाव में पढ़ाई छोड़ दिया और नौकरी करने लगीं. बड़ी वाली तो एक प्राइवेट स्कूल में पढा़ती है और यह पुष्पा एक दूकान पर सेल्सगर्ल का काम करती है. किसी प्रकार परिवार का खर्चा चल रहा है.

दादू को यह सब सुन कर काटो तो खून नहीं. मन आत्मग्लानि से भर गया. उन्हें ऐसा लगने लगा कि कब जमीन फट जाये और वे उसमें समा जाये. मन तुरन्त उठ कर कमरे से निकलने को कहने लगा. किसी प्रकार से जल्दी- जल्दी चाय पी कर उठ गए और मालती को नमस्ते करते हुए कहा कि अब मैं चलूंगा. फिर बोले कभी समय मिले तो मेरे घर आओ. मालती बोली रविवार को किचन बंद रखतीं हूँ, जरूर आऊंगी. आप भी कभी बहन जी को लेकर आईये. पुराने लोग आतें हैं, तो अच्छा लगता है.

 

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

29.04.2026

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “भरोसा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆

✍ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

शंकर दयाल जी के रिटायर होने में दो साल बाकी रह गए हैं। उनका बड़ा बेटा राम रतन अभी बारहवीं क्लास में है। दसवीं में अच्छे अंक लाने पर भी बारहवीं में बड़ी मुश्किल से एडमिशन हुआ।

बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की और बिना कोचिंग क्लास के पचानवे प्रतिशत अंक लेकर आया। उसके पिता बहुत खुश हुए। साइंस बायोलॉजी में से उसने साइंस और मैथ्स लिया ताकि वह तकनीकी क्षेत्र में यानी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जा सके, परंतु इंजीनियरिंग में एडमिशन से पहले नीट की परीक्षा पास करनी होती है। वह नीट की परीक्षा में शामिल हुआ, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की। उसे पूरी उम्मीद थी की अच्छे अंकों से में पास हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट आने से पहले पता चला की नीट का पेपर लीक हो गया और परीक्षा फल रोक दिया गया। यह देख कर उसका दिल बैठ गया। शंकर दयाल को भी चक्कर आने लगे कि इतना पैसा और मेहनत और नतीजा कुछ नहीं। भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

ऐसी स्थिति में वह क्या करें यह समझ नहीं आ रहा। शंकर दयाल भी बहुत दुखी हुए कि उनके बेटे ने इतनी मेहनत की लेकिन वह किसी काम नहीं आई। व्यवसाय करने के लिए उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वह कोई दुकान खोल सके या कोई अन्य व्यवसाय शुरू कर सके। उनकी समझ में नहीं आ रहा है। बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने बेटी का विवाह टाल दिया। छोटा बेटा जो दसवीं में है उसके लिए क्या करें आगे पढ़ाई किस तरह करें। इसी सोच में डूबे थे कि उनकी पत्नी आई कहा चलो खाना खा लो। ईश्वर सब ठीक करेंगे उनका ही भरोसा है। जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गर्मियों के दिन के 12:00 बजे थे  बालकनी में झूले में बैठकर रामचंद्र जी अखबार पढ़ रहे।

और अपने गांव को और पुराने दिनों को याद कर रहे थे।

तभी उनकी पत्नी कमला ने आवाज दिया- “अंदर आ जाओ दोपहर में बाहर क्यों बैठे हो  लू चल रही है?”

“कच्चे आम का पन्ना बनाया है अंदर आओ बैठकर पी लो यह गाँव नहीं है जो आम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे?”

रामचंद्र जी ने कहा कमल-” तुम्हें तो पता है कूलर, ए.सी सूट नहीं करता।”

रामचंद्र जी ने गंभीर स्वर में कहा- “कमला इधर आओ मेरे पास बैठो चलो हम गाँव चलते हैं कुछ दिनों के लिए।”

कमला ने कहा- “अब गाँव में क्या रखा है घर की साफ सफाई करनी पड़ेगी बेटे बहू के साथ यही जब रहते हैं हम ठंड में चलेंगे। “

रामचंद्र जी ने कहा- “देखो कमला तुम बातें मत बनाओ तुम्हें नहीं जाना तो मैं जा रहा हूँ यहाँ तो पेड़ फल हुए आम देखने को तरस जा रहा हूँ।”

वैसे तुम्हारी बातों से मुझे शीतल छाया मिलती है लेकिन यहाँ पर घूमने फिरने भी कहाँ  जाऊॅं पार्क में जाओ तो इतनी भीड़ है।

कमला ने मुस्कुराते हुए कहा-

“क्या तुम्हें गाँव में भी छाँव मिलेगी वहां भी तो विकास हो रहा है।”

रामचंद्र जी ने कहा- इस नव विकास के ऑंधी में जीवन की छाँव खोती जा रही है, उनकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ – 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा 2 जून रोटी समारोह ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ ☆

🌻लघु कथा🌻 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ 

एक शानदार होटल में बड़े – बड़े पोस्टरों में रोटी की सुंदर सुंदर तस्वीरें लगा दिखाई दिया। डीजे बजाये जा रहे थे। बढ़िया डेकोरेशन चमचमाते टेबिल कुर्सीयाँ और मदमस्त लोग।

सुरमई शाम और हल्की सी बारिश के बीच मौसम खुशनुमा हो चला। परिवार सहित लोग आते जाते दिखे।

जो आसपास से निकल रहे थे बस भिन्न- भिन्न सजी रोटियों की तस्वीरें देख ठिठक जा रहे थे।

एक महिला दो बच्चों को लिए धीरे- धीरे दरवाजे पर पहुंच गई।

नया होटल खुला है क्या?

एक जोरदार ठहाका–

किसी ने कहा — इसे कौन बुला लिया। इस सेलिब्रेशन में।

महिला ने फिर पूछा — यदि होटल नया है तो किफायती दाम में आज रोटी मिल जायेगी। थोड़े से पैसे है मेरे पास बच्चों का पेट भर जायेगा।

धक्का देते किसी ने कहा — यहाँ दो जून रोटी सेलिब्रेशन हो रहा है। रोटी नही मिलेगी।

दोनों बच्चे पोस्टर पर ललचाते हुए हाथ फेर रहे थे। उनका पसीना शायद दो जून की रोटी के लायक नही बहा था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

2/4 कुछ दिन पहले सोना (Gold) खरीदने की ताकत नहीं होने पर कड़का होने की शर्मिंदगी महसूस होती थी … अब मुझे देश भक्त होने का अभिमान होता है, गर्व होता है ।

आने वाला कल 🙂

मैं, आप और हम जैसे करोड़ों देशभक्तों के बल पर भारत  फिर से अपने स्वर्णिम युग में लौटेगा। फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा। और एक वर्ष बाद हर कड़के स्वर्णता सैनानी क़ो गोल्ड मेडल दिया जायेगा।

(कृपया इस मेसेज को अपने मोबाइल से पैदल-पैदल फारवर्ड करें।)

डीजल बचाइये और सेहत बनाइये✌️

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३६ ☆ कथा-कहानी – अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘अपना आकाश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३६ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सुकुमार की नौकरी और कमाई अच्छी है। स्थानीय म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में इंजीनियर है। अच्छी तनख्वाह के अलावा खासी ऊपरी आमदनी है। घर में उसके अलावा छोटा भाई दिनकर है, जो कॉर्पोरेशन में  ही क्लर्क है। वह भी खाने पीने लायक कमा लेता है। एक छोटी बहन नंदिनी है, जो शादी के लायक हो रही है।

कमाई बढ़ाने के साथ सुकुमार की पत्नी शोभा को उड़ने की इच्छा होती है। अब इस घर में मन नहीं लगता। नया फर्नीचर, नये पर्दे लेने की इच्छा होती है। अपनी नर्सरी और लॉन बनाने की इच्छा होती है। यह भी इच्छा होती है कि मिलने जुलने वाले आएं तो उसका वैभव देखकर प्रभावित हों। मुख़्तसर यह कि वे सब इच्छाएं  सिर उठाती हैं जो समृद्धि के साथ पैदा होती हैं। अपना अलग आकाश हो और उसमें परवाज़ भरने की पूरी स्वतंत्रता हो।

नंदिनी के विवाह की ज़िम्मेदारी सामने है, लेकिन सुकुमार और शोभा के लिए यह बड़ी अड़चन है। इस काम में ज़्यादा सहयोग देने के लिए अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर अंकुश लगाना पड़ेगा, अपने कुछ सपने स्थगित करने पड़ेंगे। इसलिए बेहतर यह है कि घर से जल्दी से जल्दी निकल जाया जाए। उसके बाद जो सहयोग बने, देकर मुक्ति पाई जा सकती है।

अब घर छोड़ने के लिए बहाने ढूंढ़े जा रहे हैं। जिसे घर छोड़ना ही है उसके लिए बहानों की क्या कमी? शोभा, सास और ननद को सुना कर अपने असंतोष को ज़ाहिर करती रहती है ताकि घर छोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। कभी बच्चों का स्कूल दूर होने का रोना रोया जाता है, कभी ज़रूरत के हिसाब से जगह कम होने की शिकायत की जाती है। सुना सुना कर परिवार वालों को उनकी विदाई के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है।

फिर ‘क्लाइमेक्स’ की तैयारी की जाती है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े किये जाते हैं, कभी ननद के द्वारा भाभी का साबुन इस्तेमाल कर लेने पर, कभी देवर द्वारा सब्ज़ी-भाजी न लाने पर। जिसे विवाद करना है उसके लिए मुद्दों की क्या कमी? सुकुमार ने बिना किसी को बताये एक  घर किराये पर ले लिया था। जब सब तैयारी हो गयी तो शोभा ने एक दिन बात का बतंगड़ बनाकर घर सिर पर उठा लिया और फिर गुस्से के नाटक के साथ फटाफट घर छोड़ दिया। बात सिर्फ इतनी थी कि ननद ने उसके छोटे बच्चे को शरारत करने पर थप्पड़ लगा दिया था। घर से बाहर निकल कर शोभा को खूब राहत और खुशी महसूस हुई। अब उड़ान भरने के लिए सामने खुला आकाश है।

पिता के घर से निकल कर सुकुमार और शोभा अपना घोंसला सजाने में लग गये। नया फर्नीचर आया, नये पर्दे, नया फ्रिज। अब अपने और अपने बच्चों के लिए खाने पीने का सामान बेहिचक लाया जा सकेगा, किसी के साथ बांटने की समस्या नहीं रहेगी। शोभा के लिए साड़ी लाते वक्त मां या बहन का ख़याल उलझन पैदा नहीं करेगा। अब  सुकुमार-शोभा को लगता कि उनका कोई वजूद है, उनकी भी कोई हस्ती है। परिवार के साथ रहने पर ऐसा गहरा संतोष, ऐसी तृप्ति कहां मिलती है?

परिवार से अलग होने पर सुकुमार के लिए कई बंदिशें भी ख़त्म हुईं। अब देर रात तक कहीं रुकने पर मां-बाप के परेशान सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा। पहले सुकुमार कभी-कभी दोस्तों के साथ थोड़ी शराब ले लेता था। अब लड़खड़ाने की हद तक भी पी जा सकती थी। शोभा से उसे डर नहीं लगता था क्योंकि उसने शोभा को समझा दिया था कि शराबख़ोरी अब हर ऊंचे समाज में आम है और बिना शराबख़ोरी ऊंचे समाज में गुज़र नहीं हो सकती।

इस सारे सुख के बावजूद शोभा को कभी-कभी अड़चन होती है। अब तबियत ख़राब होने पर भी बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से लेकर सारे काम निपटाने पड़ते हैं। समय से खाना न मिले तो सुकुमार चिड़चिड़ाने लगता है। पहले अस्वस्थ होने पर सास और ननद से मदद मिल जाती थी। अब किसी का सहारा नहीं है। पड़ोसियों से सलाम-दुआ से ज़्यादा संबंध नहीं हैं। इन दिक्कतों के बावजूद शोभा के लिए अपनी गृहस्थी की मालकिन होने का सुख और गर्व बहुत बड़ा है। उस सुख के सामने सभी दिक्कतें छोटी पड़ जाती हैं।

अब सुकुमार और शोभा उस घर में मेहमानों की तरह जाते हैं। अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं। अब माता-पिता, भाई-बहन के लिए थोड़ा बहुत जो कर दिया, उस पर कोई सवालिया निशान  नहीं लगता। माता-पिता स्वाभिमानी हैं, वे बेटे बहू से कुछ मांगते नहीं। सुकुमार-शोभा जब उस घर में जाते हैं तो अपनी दिक्कतों का ऐसा दफ्तर खोलते हैं कि किसी दूसरे को अपना दुख प्रकट करने की हिम्मत नहीं होती।

सुकुमार अब रात को देर से सोता है और सवेरे देर से उठता है। पहले देर से और देर तक सोने पर पिताजी की बातें सुननी पड़ती थीं। अब रोकने वाला कोई नहीं। नये घर में आकर उसकी तोंद बढ़ गयी है। खर्च बढ़ने के साथ वह ऊपरी आमदनी के नये-नये साधन ढूंढ़ रहा है। आमदनी बढ़ने के साथ उसकी आदतें बिगड़ती जा रही हैं।

मुश्किल यह है कि सुख के घी में कभी न कभी मक्खी पड़ती ही है। कई दिनों से सुकुमार रात को देर से लौटता था और अक्सर वह नशे की हालत में होता था। शोभा उसका इंतज़ार करते-करते सो जाती थी। एक रात लौटते वक्त कॉलोनी के छोर पर सुकुमार का स्कूटर लुढ़क गया। ख़ासी चोट खाकर वह बेहोश हो गया। सौभाग्य से कॉलोनी के कुछ लड़कों की नज़र उस पर पड़ गयी। वे उसे लाद-फांद कर घर ले आये।

ज़िन्दगी में पहली बार शोभा को इतने बड़े संकट का सामना अकेले करना था। वह बदहवासी की हालत में थी। सुकुमार ख़ून से सना पलंग पर पड़ा था और दोनों बच्चे नींद में ग़ाफ़िल थे। सुकुमार के सिर और चेहरे में चोट थी। कमीज़ फट गयी थी और शरीर कई  जगह से छिल गया था। कॉलोनी के लड़के भले थे, दौड़कर डॉक्टर को बुला लाये। डॉक्टर ने आंखों की जांच की, हाथ- पांव  की दुरुस्ती देखी और घावों को साफ कर उनमें  दवा लगायी। फिर कहा, ‘हेड इंजरी हो सकती है। इन्हें दो दिन के लिए किसी नर्सिंग होम में रख दीजिए। मैं चिट्ठी लिख देता हूं।’

अब और बड़ा संकट था। कॉलोनी के लड़के सुकुमार को नर्सिंग होम ले जाने के लिए तैयार थे, लेकिन शोभा के सामने समस्या यह थी कि कौन रात भर बच्चों के पास रहे और कौन सुकुमार के साथ नर्सिंग होम जाए। रात के बारह बज चुके थे और पूरी कॉलोनी नींद में डूबी थी। किसी परिवार से ऐसे संबंध नहीं बन पाये थे कि किसी को बच्चों की देखभाल के लिए बुलाया जा सके।

अंत में वही विकल्प चुनना पड़ा जो सबसे ज़्यादा भरोसेमंद था और जिसमें सबसे कम धर्मसंकट था। उसने ससुराल को फोन लगाकर सारी जानकारी दी।

खबर पाते ही ससुर, सास, ननद और देवर हाज़िर हो गये। शोभा को बड़ी देर के आत्मनियंत्रण के बाद रोने को कंधा मिला। परिवार के इन चारों सदस्यों को देखकर उसकी जान में जान आयी। अब न सुकुमार की देखभाल की चिन्ता रही, न बच्चों की देखभाल की। बड़ी देर से उसे जकड़े रखने वाला अकेलापन एक झटके में छंट गया।

ससुर को साथ लेकर वह सुकुमार को नर्सिंग होम ले गयी। कॉलोनी के लड़कों ने इसमें पूरी मदद की। नर्सिंग होम पहुंचने के बाद शोभा ने लड़कों को भरे दिल से विदा किया। नर्सिंग होम में जल्दी ही सुकुमार की हालत काबू में आ गयी, लेकिन अड़तालीस घंटे ऑब्ज़र्वेशन में रखना ज़रूरी था।

थोड़ी देर में सुकुमार को नींद आ गयी और शोभा ज़मीन पर उसकी बगल में कंबल बिछाकर सो गयी। सुकुमार के पिता बाहर बरामदे में सोने चले गये।

सवेरे सुकुमार पूरी तरह होश में था। ससुर को उसकी देखभाल के लिए छोड़कर शोभा घर आ गयी। उस दिन बच्चे स्कूल नहीं गये थे। वे  बुआ और दादी से मां और पिता की अनुपस्थिति के बारे में पूछताछ में लगे थे। दादी और बुआ उन्हें गोलमोल जवाब देकर बहला रही थीं।

घर आकर शोभा ने देवर को चाय नाश्ता लेकर नर्सिंग होम भेज दिया। अचानक आये संकट ने उसके स्नायुओं को बिल्कुल थका दिया था। वह पस्ती की हालत में पलंग पर लेट गयी। थकान ज़रूर थी, लेकिन अब चिन्ता दूर हो गयी थी।

पलंग पर आंखें बन्द किये लेटी शोभा भीतर से बच्चों जैसी बेचारगी महसूस कर रही थी। उसे किसी ऐसे हमदर्द की ज़रूरत महसूस हो रही थी जो उसके सिरहाने बैठकर उसके उद्विग्न  माथे पर हाथ रखे और उसे सुकून दे। वह बीच बीच में आंखें खोलकर बड़ी उम्मीद से अपनी सास की तरफ देख रही थी। उधर सास, उसकी हालत  से  बेख़बर, बच्चों को नहलाने धुलाने में मशगूल थी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०८ – अनिवार्य निर्णय… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अनिवार्य निर्णय…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०८ — अनिवार्य निर्णय — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक सुनी सुनायी कहानी पर मेरा विश्वास होने से उसे लिख रहा हूँ ताकि वह सुनी सुनायी न रह कर शब्दों के घेरे में सदा के लिए अडिग रह जाए। धरती रहने से मनुष्य भी तो रहेंगे। यह कहानी मनुष्य के साथ रहे और रह कर उन्हें विवेचन के लिए विवश करे कि किस तरह उन्हें ठगा जाता है और वे होते हैं कि ठगी को शायद भगवानी प्रसाद मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नीच अधम साधु नदी के किनारे बैठ कर अपने पाँव धो रहा था। वह आत्म केन्द्रित भाव से इस चिंतन में पड़ा हुआ था कि क्या लोगों से विश्वासघात करने के लिए वह पैदा हुआ था? तभी नदी में एक विशाल धारा प्रकट हुई जो उसे बहा ले गयी। वक्त को यही इंतजार था वह किसी मोड़ पर कमजोर तो पड़े। अन्यथा भक्तों के घेरे में वह बहुत बलिष्ठ होता था। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ मातृत्व ☆ मोहम्मद जिलानी ☆

मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मातृत्व.)

🌱 लघुकथा – मातृत्व🌷

“मां! आखिर तू नाराज़ किस बात से है? दो साल हो गए, तेरा गुस्सा किसी न किसी बहाने हम दोनों पति-पत्नी पर फूटता है। तू चाहती क्या है?” 

सुरेंद्र के स्वर में झुंझलाहट से ज़्यादा थकान थी।

“मैं क्या चाहती हूं, ये तुझे बखूबी मालूम है।” कह कर कमला ने मुंह फेर लिया।

“मां, जो हो नहीं सकता, उसे बार-बार दुहराने से क्या फायदा?” 

“तो सुन ले बेटा! मैं चाहती थी कि तू मेरी पसंद की लड़की से ब्याह करें। पर तूने अपनी ज़िद में उससे शादी की, जिसे मैं पहले ही दिन से नकार चुकी थी।”

“मां, सुनिधि शुरू से तुम्हारी सेवा में दिन रात लगी रहती है… फिर भी तुम हर दिन उसे किसी न किसी बात पर कोसती हो।” 

“बात तो सही है। पर छुरी कितनी भी तेज़ हो, उससे कोई अपना गला तो नहीं कटवाता न?”

सुरेंद्र की आंखें सख्त हो गईं।

“तू अच्छी तरह से जानती है कि मैं तेरा एकलौता बेटा हूं। आज तक तेरी हर बात मानी है। पर इस बार तेरी ज़िद नहीं मान सकता।”

कमला गुस्से में खड़ी हो गई। आवाज़ में अंगारे थे—

“तो सुन सुरेंद्र, अब इस घर में या तो वो रहेगी या मैं।”

यह सुनकर सुरेंद्र भीतर तक हिल गया। खुद को संभालकर धीमे से बोला— 

“ठीक है। मैं कल ही वकील से मिलकर सुनिधि से तलाक की कार्रवाई शुरू करवाता हूं।” 

एक पल रुककर, डूबे हुए स्वर में आगे कहा— “पर मां, इस वक्त उस पर ये सब करना घोर अन्याय होगा… क्योंकि वो मां बनने वाली है। कभी भी खुशखबरी आ सकती है।”

‘मां बनने वाली है’ — ये चार शब्द कमरे की गरम हवा में ठंड़े झोंके की तरह लहरा गये। कमला के चेहरे पर हास्य के रंग छा गये। कड़क आवाज़ एकदम से शांत हो गयी।

आधी रात को सुरेंद्र का मोबाइल बजा। दूसरी तरफ से उसकी सास की आवाज़ आई— “जवाई बाबू… अभी-अभी सुनिधि ने बेटे को जन्म दिया है। तुम बाप बन गए हो।”यह सुनकर सुरेंद्र खुशी से उछल पड़ा। “क्या? यह सच?” 

“अरे! क्या हुआ?” कमला ने हड़बड़ाकर पूछा। 

सुरेंद्र की आंखें चमक उठीं। गर्व से भरकर बोला— “मां, तू दादी बन गई है।”

यह सुनते ही कमला का बुझा चेहरा ऐसे दमक उठा, जैसे किसी ने दिया जला दिया हो। सारा गुस्सा, सारी कड़वाहट एक पल में बह गई। 

“चल उठ! अभी के अभी अस्पताल चलना है। मुझे मेरे पोते का मुंह देखना है।” खुशी से अधीर कमला ने बेटे को लगभग धकेल ही दिया।

अस्पताल पहुंचते ही कमला लपककर वार्ड में घुसी। अपने नन्हे पोते को गोद में उठाया और उसका माथा चूमने लगी.

अपने पति और सास को यूं खुशी से सराबोर देख सुनिधि के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। पर उसकी आंखें भर आईं और

मन ही मन सोच रही लगी—”क्या एक नारी को परिवार और समाज में इज़्ज़त, प्यार और मान पाने के लिए ‘मां’ बनना  ज़रूरी है?”यह

सोचते-सोचते उसकी नज़रे सामने दीवार पर टंगी बाल-कृष्ण और यशोदा मैया की तस्वीर पर जाकर ठहर गई।

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हमारा जानने वाले परिवार पर आफत आ गयी। कोई ट्रक उनके घर के पास से निकलता हुआ उनकी चारदीवारी तोड़ गया। चारों ओर समाचार। पुलिस ने कार्यवाही शुरू की। कुछ दिन बाद हम उनके गर गये। पूछा क्या बना पुलिस कार्यवाही का?

-हमने अपनी अर्जी वापस ले ली।

-क्यों?

-पुलिस कार्यवाही के नाम पर आती और चार पानी पीकर चली जाती। हम काम काज करें कि इनकी आवभगत? बस। इसीलिए हमने अर्जी वापस ले ली। अर्जी वापस लेने में ही हमारी भलाई थी।

हम उनकी समझ व अनुभव पर मुस्कुरा दिए।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५३ – लघुतम कथा – जिंदा गुड़िया  ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५३ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ जिंदा गुड़िया ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

वह भीड़ में अपने बाबूजी के अंगुली को पकड़े खड़ी लड़की, खिलौनो की दुकान की तरफ देखने में मग्न थी l  जब उसका ध्यान टूटा, तो उसने  देखा कि अब वह किसी अजनबी के हाथों की  उँगुली पकडे खड़ी है l  उसने जोर से चिल्लाते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं l अबकी बार जब उसकी आंख खुली तो उसने खुद को खिलौनों के दुकान में पाया, जहां सिर्फ जिंदा गुड़ियाँ ही बिक रही थीं l

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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