हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४३ – बूँदें ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४3 💧 बूँदें… 🌧️

लगभग एक घंटे पहले छिटपुट बारिश हुई है। भोजन के पश्चात घर की बालकनी में आया तो वहाँ का दृश्य देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा। सुरक्षा जाली की सलाखों पर पानी की मोटी बूँदें झूल रही थीं। बालकनी के पार खड़े विशाल पेड़ अपनी फुनगियों पर गुलाबी फूलों से लकदक यों झूम रहे थे मानों सुबह-सवेरे कोई मुनिया अपनी चोटियों पर दो गुलाबी रिबन कसे इठलाती हुई स्कूल जा रही हो। इस दृश्य को कैमरे में उतारने का मोह संवरण न कर सका।

मोबाइल के कैमरे ने चित्र उतारा तो मन का कैमरा चित्र को मस्तिष्क की तरंगों तक ले गया और मन-मस्तिष्क का गठजोड़ विचार करने लगा। क्या हमारा क्षणभंगुर जीवन साँसों का आलंबन लिए इन बूँदों जैसा नहीं है? हर बूँद को लगता है जैसे वह कभी न ढलेगी, न ढलकेगी। सत्य तो यह है कि अपने ही भार से बूँद प्रतिपल माटी में मिलने की ओर बढ़ रही है।

कालातीत सत्य का अनुपम सौंदर्य देखिए कि बूँद माटी में मिलेगी तो माटी उम्मीद से होगी। माटी उम्मीद से होगी तो अंकुर फूटेंगे। अंकुर फूटेंगे तो पौधे पनपेंगे। पौधे पनपेंगे तो वृक्ष खड़े होंगे। वृक्ष खड़े होंगे तो बादल घिरेंगे। बादल घिरेंगे तो बारिश होगी। बारिश होगी तो बूँदें टपकेंगी। बूँदें टपकेंगी तो सलाखें भीगेंगी। सलाखें भीगेंगी तो उन पर पानी की मोटी बूँदें झूलेंगी…!

वस्तुत: सलाखें, बूँदें, पेड़, सब प्रतीक भर हैं। जीवात्मा असीम आनंद के अनंत चक्र की चौरासी कोसी परिक्रमा कर रहा है। बरसाती बादल की तरह छिपते-दिखतेे इस चक्र को अद्वैत भाव से देख सको तो जीवन के ललाट पर सतरंगा इंद्रधनुष उमगेगा।…इंद्रधनुष उमगने के पहले चरण में चलो निहारते हैं सलाखें, बूँदें और पेड़…!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३८ ⇒ इतवार के बहाने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इतवार के बहाने।)

?अभी अभी # १०३८ ⇒ आलेख – इतवार के बहाने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारी दिनचर्या में वर्ष भर में कई वार त्योहार आते जाते रहते हैं, सूरज रोज निकलता, अस्त होता रहता है, लेकिन सिर्फ रविवार ही एक ऐसा छुट्टी का दिन है, जो हर हफ़्ते आता है, और हमारा संडे का मूड बना जाता है। विदेशों में लोग वीक ऐंड मनाते हैं, हम संडे मनाते हैं।

संडे को ही छुट्टी का दिन क्यूं ?जब कि हमारा तो हर दिन ही सूर्य के उदय होने से शुरू होता है। सुना तो यह भी है कि एक जमाना ऐसा भी था जब अंग्रेजों का साम्राज्य इतना फैला हुआ था कि उनके राज में सूरज अस्त ही नहीं होता था, फिर भी ठंडे प्रदेश में रहने वाले फिरंगी बेचारे धूप को तरस जाते थे, और जिस दिन सूरज निकलता, उस दिन को वे संडे, यानी छुट्टी का दिन घोषित कर देते थे। दिन भर पड़े पड़े धूप खाया करते थे। हमारे धूप स्नान को वे basking कहते हैं।।

सूर्य हमारे लिए देवता है। हमने सूर्य को बारह नाम दिए हैं और जब हर सुबह हम सूर्य नमस्कार करते हैं, तो उसे बारह नामों से स्मरण करते हैं। सवेरे का सूरज हमारे लिए है। हमें सूर्य से ही नहीं, गर्मी से भी विशेष प्रेम है।अंग्रेज तो सिर्फ संडे मनाकर रह गए, हमारे यहां तो गर्मी के मौसम में पूरे स्कूलों की ही छुट्टी हो जाती थी।अंग्रेजों की नानी नहीं होती। हमें नानी के यहां जाने के लिए, विशेष रूप से, गर्मी की छुट्टी दी जाती थी। कहां गए वे दिन !अब तो सात दिनों की बड़े दिनों की छुट्टी देने में इनकी नानी मरती है। भला हो कोरोना बला का, भला हो आपदा में अवसर का।

वैसे हमारा संडे का मूड शनिवार से ही बन जाता है। कुछ लोग इस दिन सूर्यवंशी बन जाते हैं। तानकर सोते हैं। जब तक सूरज, पहले सर पर, और बाद में छाती पर नहीं आ जाता, तब तक सोते रहते हैं। महिलाएं तो ब्यूटी पार्लर चली जाती हैं, पुरुष भी आजकल देखादेखी जेंट्स पार्लर जाने लगा है। पहले तो आपले केश कर्तनालय पर ही केश विन्यास, यानी हजामत हो जाती थी। नाई की जबान कैंची की तरह चलती थी, और केंची जबान की तरह। कई न्यूज चैनल्स का प्रसारण एक ही चैनल पर।।

छुट्टी का दिन बहुत छोटा होता है। सुबह होती है, शाम होती है, छुट्टी यूं ही तमाम होती है।कई दिनों से बाहर का घूमना, खाना, सब बंद है, लॉक डाउन ने जीवन में कई अप्स एंड डाउन्स, बोले तो, उतार चढ़ाव ला दिए, लेकिन जिस तरह सूरज रोज निकलता रहा, हमें विटामिन डी प्रदान करता रहा, हमें ऊर्जा प्रदान करता रहा, पुराने दिन भी लौट आएंगे। हम फिर पहले जैसे संडे मनाएंगे।

सप्ताह में सात दिन हैं और कोई कहता है, जिंदगी के सिर्फ चार दिन हैं। तीन दिन और कम क्यों कर रहे हो भाई साहब ! जिंदगी के पूरे सात दिन हैं। संडे को हम चार्ज होते हैं और फिर पूरे सप्ताह काम पर लग जाते हैं।

यह सिलसिला सदियों से चलता चला आ रहा है, और ऐसे ही चलता रहेगा। हर दिन सुहाना दिन, हर शाम सुहानी शाम।आज की शाम इतवार, तुम्हारे नाम। सूर्य देवता, तुम्हें संडे की सुबह का सलाम, प्रणाम, नमस्कार !

ॐ सूर्याय नमः

ॐ मित्राय नमः

ॐ रवये नम:

ॐ भानवे नमः

ॐ खगाय नमः

ॐ पूष्णे नमः

ॐ हिरण्यगर्भाय नमः

ॐ मारीचाय नम:

ॐ आदित्याय नमः

ॐ सावित्रे नमः

ॐ अर्काय नमः

ॐ भास्कराय नमः

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३७ ⇒ आषाढ़ का एक दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आषाढ़ का एक दिन।)

?अभी अभी # १०३७ ⇒ आलेख – आषाढ़ का एक दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आषाढस्य प्रथम दिवसे पर अगर कालिदास का कॉपीराइट है तो आषाढ़ के एक दिन पर मोहन राकेश का। मुझे संस्कृत नहीं आती, अतः मैं कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल, कुमारसंभव और मेघदूतम् नहीं पढ़ पाया। कालिदास को हिंदी में पढ़ना शेक्सपीयर को हिंदी में पढ़ने जैसा है। जिसे संस्कृत नहीं आती, वह सुसंस्कृत नहीं कहलाता और जिसे अंग्रेजी नहीं आती, आजकल वह पढ़ा लिखा नहीं कहलाता। हमने मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन पढ़ लिया और संस्कृत नहीं आने के अपराध बोध से मुक्त हो गए।

हमारे अभिन्न मित्र श्री हृदयनारायण जी, जब प्रेम के ढाई अक्षरों में भी धाराप्रवाह संस्कृत बहा देते हैं, तो हमारी हिंदी हमें थाम नहीं पाती। जिसे तैरना नहीं आता, उसे भाषा के प्रवाह में बह जाना चाहिए। भाषा का प्रवाह सबको पार लगा देता है। जिसे एक बार भाषा का ज्ञान हो जाता है फिर वह ज्ञान के सागर में डुबकियां लगाता रहता है। ज्ञान के मोती भी उसी के हाथ लगते हैं।।

आषाढ़ के प्रथम दिन का शायद मेघदूत से संबंध है।

इस बार आषाढ़ के पहले दिन ही एक बूंद भी पानी नहीं गिरा। शुक्र है फागुन की तरह, आषाढ़ के दिन चार नहीं होते, अभी आधा आषाढ़ पड़ा है, मेघदूत जल्दी कर, हरी अप।

इस बार आषाढ़ के दिनों में और भी कई दिन मिक्स हो गए। एक दिन तो ऐसा आया जिस दिन कई दिन एक साथ आ गए। आजकल दिन, दिवस हो जाता है, और दिवस, डे।

साल में वैसे तो सिर्फ 365 दिन होते हैं लेकिन अगर मदर्स डे, वेलेंटाइन्स डे और फादर्स डे की तरह अन्य दिवस अर्थात days का हिसाब लगाया जाए, तो वे 365 से अधिक ही बैठेंगे, कम नहीं। फरवरी का तो पूरा सप्ताह days’ week अर्थात् दिवसों का सप्ताह कहा जा सकता है। रोज़ डे, प्रोमिस डे, चॉकलेट डे, दिल दे, दिल ले, इत्यादि इत्यादि।

अभी अभी टाइपराइटर्स डे निकला, फादर्स डे भी अकेला नहीं आया, साथ में योग दिवस भी लेकर आया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, रोज दिन में तीन चार बार चाय पीने वाले हम भारतीय, चाय दिवस भी मनाते हैं। बस मैगी दिवस और पास्ता दिवस की कमी है शायद।।

मेरे लिए ” आषाढ़ का एक दिन ” बहुत महत्वपूर्ण है।

कथाकार और नाटककार स्व.मोहन राकेश का यह पहला नाटक (1958)

है। जो संस्कृत के ज्ञाता हैं, वे कालिदास को पढ़ें, हमारे जैसे हिंदीभाषी लोगों के लिए मोहन राकेश एक बहुत बड़ा काम कर गए। कितने कम समय में कोई इंसान सृजन के क्षेत्र में इतना कुछ कर जाता है ; (1925-1972) कि विश्वास ही नहीं होता। उनके दो और नाटक भी यहां उल्लेखनीय हैं, आधे अधूरे और लहरों के राजहंस

अभी देव सोये नहीं हैं। मेघ हम पर मेहरबान नहीं। आषाढ़ के किसी भी दिन झमाझम हो सकती है। आप भी आषाढ़ के किसी एक दिन फुर्सत निकालकर मोहन राकेश का “आषाढ़ का एक दिन”, पढ़ ही लें। अगर पढ़ भी लिया हो, तो भी बार बार पढ़ने लायक है। जो नाट्य विधा अर्थात् स्टेज से जुड़े हैं, वे इसकी मंचीय खूबियों से भली भांति अवगत होंगे।

स्वागत, अभी आषाढ़ मास के कई दिन बाकी हैं।।

आषाढ़ के एक दिन की तरह शायद एक दिन विश्व नाट्य दिवस का भी अवश्य होगा। संस्कृत में कालिदास के अलावा भास और भवभूति भी नाटककार हैं। उधर अंग्रेजी साहित्य में भी विलियम शेक्सपियर और क्रिस्टोफर मार्लो के अलावा भी कई नाटककार हुए हैं।

हमारे देश में आज हिंदी की अपेक्षा मराठी मंच अधिक सक्रिय है।

कारण अच्छे मंचीय कलाकारों की फिल्मों में मांग। फिलहाल तो लगता है राजनीति साहित्य और संस्कृति को पूरी तरह लील रही है। कहीं हमें ऐसा दिन ना देखना पड़े कि लोग पूछें कौन कवि कालिदास और कौन मोहन राकेश ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२८ ☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सुनना और सहना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये कैसा जग का व्यापार  / स्वर- यश कीर्ति , सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२८ ☆

☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘हालात सिखाते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह ही होता है’ गुलज़ार इस कथन के माध्यम से समय व परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हैं। वैसे यह तथ्य महिलाओं पर अधिक लागू होता है, क्योंकि ‘औरत को सहना है, कहना नहीं और यही उसकी नियति है।’ उसे तो अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्राप्त नहीं है। वैसे कोर्ट-कचहरी में भी आरोपी को अपना पक्ष रखने की हिदायत ही नहीं दी जाती; अवसर भी प्रदान किया जाता है। परंतु औरत की नियति तो उससे भी बदतर है। बचपन से उसे समझा दिया जाता है कि यह घर उसका नहीं है और पति का घर उसका होगा। परंतु पहले तो उसे यह सीख दी जाती थी कि ‘जिस घर से डोली उठती है, उस घर से अर्थी नहीं उठती। इसलिए तुम्हें इस घर में अकेले लौट कर नहीं आना है।’ सो! वह मासूम आजीवन उस घर को अपना समझ कर सजाती-संवारती है, परंतु अंत में उस घर से उस अभागिन को दो गज़ कफ़न भी नसीब नहीं होता और उसके नाम की पट्टिका भी कभी उस घर के बाहर दिखाई नहीं पड़ती।

परंतु समय के साथ सोच बदली है और आठ से दस प्रतिशत महिलाएं सशक्त हो गई हैं– शेष वही ढाक के तीन पात। कुछ महिलाएं समानता के अधिकारों का दुरुपयोग भी कर रही हैं। वे ‘लिव इन व मी टू’ के माध्यम से हंसते-खेलते परिवारों में सेंध लगा रही हैं तथा दहेज व घरेलू हिंसा आदि के झूठे इल्ज़ाम लगा पति व परिवारजनों को सीखचों के पीछे पहुंचा अहम् भूमिका वहन कर रही हैं। यह है परिस्थितियों के परिर्वतन का परिणाम, जैसा कि गुलज़ार ने कहा है कि समानता का अधिकार प्राप्त करने के पश्चात् महिलाओं की सोच बदली है। वे अब आधी ज़मीन ही नहीं, आधा आसमान लेने पर  आमादा हो रही हैं। मुझे स्मरण हो रही हैं स्वरचित पंक्तियां ‘मौसम भी बदलते हैं, हालात बदलते हैं/ यह समाँ बदलता है, जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं, दिल को सुक़ून/  ग़र साथ हो सुरों का, नग़मात बदलते हैं।’ जी हां! यही सत्य है जीवन का– समय के साथ- साथ व्यक्ति की सोच भी बदलती है। वैसे स्मृतियों में विचरण करने से दिल को सुक़ून नहीं मिलता। परंतु यदि सुरों अथवा संगीत का साथ हो, तो उन नग़मों की प्रभाव-क्षमता भी अधिक हो जाती है।

‘संसार में मुस्कुराहट की वजह लोग जानना चाहते हैं; उदासी की वजह कोई नहीं जानना चाहता।’ यहां ‘सुख के सब साथी, दु:ख में ना

कोय।’ सो! इंसान सुखों को इस संसार के लोगों से सांझा नहीं करना चाहता, परंतु दु:खों को बांटना चाहता है। उस स्थिति में वह आत्म- केंद्रित रहते हुए दूसरों से संबंध-सरोकार रखना पसंद नहीं करता। अक्सर लोग सत्ता व धन- सम्पदा व सम्मान वाले व्यक्ति का साथ देना पसंद करते हैं; उसके आसपास मंडराते हैं, परंतु दु:खी व्यक्ति से गुरेज़ करते हैं। यही है ‘दस्तूर- ए-दुनिया।’

‘हौसले भी किसी हक़ीम से कम नहीं होते/ हर तकलीफ़ में ताकत की दवा देते हैं।’ मानव का साहस, धैर्य व आत्मविश्वास किसी वैद्य से कम नहीं होता। वे मानव को मुसीबतों में उनका सामना करने की राह सुझाते हैं। जैसे एक छोटी-सी दवा की गोली रोग-मुक्त करने में सहायक सिद्ध होती है, वैसे ही  संकट काल में सहानुभूति के दो मीठे बोल संजीवनी का कार्य करते हैं। ‘मैं हूं ना’ यह तीन शब्द से उसे संकट-मुक्त कर देते हैं। इसलिए मानव को विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए तथा हार होने से पहले पराजय को नहीं स्वीकारना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला कहते हैं ‘हिम्मतवान् वह नहीं, जिसे डर नहीं लगता, बल्कि वह है जो डर को जीत लेता है’ तथा वैज्ञानिक मैडम क्यूरी का मानना है कि ‘जीवन डरने के लिए नहीं: समझने के लिए है। सकारात्मक संकल्प से ही हम मुश्किलों से बाहर निकल सकते हैं।’ सो! संसार में वीर पुरुष ही विजयी होते और कायर व्यक्ति का जीना प्रयोजनहीन होता है। इसके साथ हम सकारात्मक सोच व दृढ़-संकल्प से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। नैपोलियन का यह संदेश अनुकरणीय है कि ‘समस्याएं भय व डर से उत्पन्न होती हैं। यदि डर की जगह विश्वास ले ले, तो वे अवसर बन जाती हैं। वे विश्वास के साथ आपदाओं का सामना कर उन्हें अवसर में बदल डालते थे।’ इसलिए हर इंसान को अपने हृदय से डर को बाहर निकाल फेंकना चाहिए। यदि आप साहस-पूर्वक यह पूछते हैं–’इसके बाद क्या’ तो प्रतिपक्ष के हौसले पस्त हो जाते हैं। जिस दिन मानव के हृदय से भय निकल जाता है; वह आत्मविश्वास से आप्लावित हो जाता है और आकस्मिक आपदाओं का सामना करने में स्वयं को समर्थ पाता है। हमारे हृदय का भय का भाव ही हमें नतमस्तक होने पर विवश करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यही संदेश दिया है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है।’ हमारी सहनशीलता ही उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। जब हम उसके सम्मुख डटकर खड़े हो जाते हैं, तो वह अपनी झेंप मिटाने के लिए अपना रास्ता बदल लेता है। यह अकाट्य सत्य है कि हमारा समर्पण ही प्रतिपक्ष के हौसलों को बुलंद करता है।

मौन नव निधियों की खान है; विनम्रता आभूषण है। परंतु जहां आत्म-सम्मान का प्रश्न हो, वहाँ उसका सामना करना अपेक्षित व श्रेयस्कर है। ऐसी स्थिति में मौन को कायरता का प्रतीक स्वीकारा जाता है। सो! वहाँ समझौता करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भले ही सुनना व सहना हमें हालात सिखाते हैं, परंतु उन्हें नतमस्तक हो स्वीकार कर लेना पराजय है।

‘यदि तुम स्वयं को कमज़ोर समझते हो, तो कमज़ोर हो जाओगे। यदि ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो ताकतवर’– स्वामी विवेकानंद जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। हमारी सोच ही हमारा भविष्य निर्धारित करती है। इसलिए जीवन में नकारात्मकता को जीवन में कभी भी घर न बनाने दो। रोयटी बेनेट  के अनुसार चुनौतियाँ व प्रतिकूल परिस्थितियाँ हमें हमारा साक्षात्कार कराने हेतु आती हैं कि हम कहां हैं? तूफ़ान हमारी कमज़ोरियों पर आघात करते हैं, लेकिन तभी हमें अपनी शक्तियों का आभास होता है। समाजशास्त्री प्रौफेसर कुमार सुरेश के शब्दों में ‘अगर हमारा परिवार साथ है, तो हमें मनोबल मिलता है और हम हर संकट का सामना करने को तत्पर रहते हैं।’ अरस्तु के शब्दों में ‘श्रेष्ठ व्यक्ति वही बन सकता है, जो दु:ख और  चुनौतियों को ईश्वर की आज्ञा मानकर आगे बढ़ता है।’ सो! मानव को उन्हें प्रभु-प्रसाद व अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल स्वीकारना चाहिए। माता देवकी व वासुदेव को 14 वर्ष तक काराग़ार में रहना पड़ा। देवकी के कृष्ण से प्रश्न करने पर उसने उत्तर दिया कि इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। आप त्रेतायुग में माता कैकेयी व पिता वासुदेव दशरथ थे। आपने मुझे 14 वर्ष का वनवास दिया था। इसलिए आपकी मुक्ति भी 14 वर्ष पश्चात् ही संभव थी। सो! ‘जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा, अच्छा ही होगा। इसलिए मानव को कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिए और हर परिस्थिति का खुशी से स्वागत् करना चाहिए। समय कभी थमता नहीं; निरंतर गतिशील रहता है। इसलिए मन में कभी मलाल को मत आने दो। यह समाँ भी गुज़र जाएगा और उलझनें भी समयानुसार सुलझ जाएंगी। उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला दें, तो सब अच्छा ही होगा। औचित्य-अनौचित्य में भेद करना सीखें और विपरीत परिस्थितियों में प्रसन्न रहें, क्योंकि शरणागति ही शांति पाने का सर्वोत्तम साधन है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन

परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के द्वंद्व में उलझा आज का युवा मन

“बेटा, अब नौकरी भी लग गई है, उम्र भी हो रही है। शादी की बात आगे बढ़ाएँ?”

रात के खाने के बाद पिता ने सहज भाव से पूछा।

बेटे ने कुछ क्षण चुप रहकर पानी का गिलास रखा और धीमे स्वर में कहा, “पापा, शादी से इंकार नहीं है… बस जल्दबाज़ी से डर लगता है।”

माँ ने हैरानी से पूछा, “डर? शादी से भी कोई डरता है?”

बेटा मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में एक गहरी चिंता छिपी थी।

“डर शादी से नहीं… उस रिश्ते से है जो अगर सही न चला तो दो ज़िंदगियाँ टूट जाएँगी।”

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

 

यह संवाद केवल एक घर की कहानी नहीं है। आज देश के लाखों घरों में इसी तरह की बातचीत अलग-अलग शब्दों में हो रही है। माता-पिता चिंतित हैं कि बच्चे विवाह में देर क्यों कर रहे हैं, जबकि युवा सोच रहे हैं कि जीवन का इतना बड़ा निर्णय केवल समाज की अपेक्षाओं के आधार पर कैसे लिया जाए।

 

समय बदल रहा है और उसके साथ विवाह को देखने का दृष्टिकोण भी।

एक समय था जब विवाह जीवन का स्वाभाविक पड़ाव माना जाता था। एक निश्चित उम्र आई, परिवार ने रिश्ता देखा और विवाह हो गया। उस समय व्यक्तिगत पसंद से अधिक परिवार, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था महत्वपूर्ण होती थी।

 

लेकिन आज का युवा एक बिल्कुल अलग दुनिया में बड़ा हुआ है।

उसने अवसरों की दुनिया देखी है।

उसने स्वतंत्र निर्णय लेना सीखा है।

उसने रिश्तों की सफलता भी देखी है और टूटन भी।

 

शायद इसी कारण वह विवाह को केवल सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि जीवनभर की साझेदारी के रूप में देखता है।

कई बुजुर्ग इसे जिम्मेदारी से बचना मान लेते हैं।

 

लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

शायद नहीं।

वास्तव में आज का युवा जिम्मेदारी से भाग नहीं रहा, बल्कि जिम्मेदारी को पहले से अधिक गंभीरता से समझ रहा है। वह जानता है कि केवल सामाजिक दबाव में लिया गया निर्णय दो लोगों का ही नहीं, दो परिवारों का जीवन भी प्रभावित कर सकता है।

आज के युवाओं की सबसे बड़ी चिंता असफल रिश्तों का बढ़ता अनुभव है।

वे अपने आसपास टूटते विवाह, लगातार झगड़े, मानसिक तनाव और तलाक की घटनाएँ देख रहे हैं। वे समझते हैं कि केवल साथ रहना ही सफल विवाह नहीं होता। साथ में सम्मान, विश्वास, संवाद और मानसिक सामंजस्य भी होना चाहिए।

इसीलिए वे विवाह से पहले व्यक्ति को समझना चाहते हैं। वे जल्दबाज़ी से अधिक सही निर्णय को महत्व देते हैं।

इस बदलाव का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है आर्थिक आत्मनिर्भरता।

आज बेटियाँ भी उतनी ही पढ़ी-लिखी हैं जितने बेटे। दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं। दोनों अपने करियर के लिए मेहनत करते हैं।

ऐसे में विवाह का वह पारंपरिक मॉडल, जिसमें त्याग की अपेक्षा केवल एक पक्ष से की जाती थी, स्वाभाविक रूप से प्रश्नों के घेरे में आ गया है।

आज का प्रश्न यह नहीं है कि “समझौता कौन करेगा?” बल्कि यह है कि “सहयोग दोनों कैसे करेंगे?”

आधुनिक विवाह में बराबरी केवल अधिकारों की नहीं, जिम्मेदारियों की भी होनी चाहिए।

यदि दोनों कमाते हैं, तो दोनों घर भी सँभालें।

यदि दोनों सपने देखते हैं, तो दोनों एक-दूसरे के सपनों का सम्मान भी करें।

यही सोच नए दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेकिन इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष माता-पिता हैं।

उनकी चिंता भी गलत नहीं है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से सीखा है कि जीवन में साथी का होना कितना महत्वपूर्ण है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अकेले न रहें, उन्हें समय पर जीवनसाथी मिले और वे सुरक्षित भविष्य जी सकें।

उनकी चिंता प्रेम से जन्म लेती है। लेकिन कई बार वही चिंता दबाव का रूप ले लेती है। यहीं से पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है।

दरअसल, माता-पिता और बच्चों के बीच केवल उम्र का अंतर नहीं है। यह दो अलग-अलग समयों का अंतर है।

 

एक पीढ़ी ने सीमित अवसरों की दुनिया देखी।

दूसरी पीढ़ी असीमित विकल्पों के बीच बड़ी हुई।

 

एक ने स्थिरता को प्राथमिकता दी।

दूसरी अर्थपूर्ण जीवन और मानसिक संतुलन को भी उतना ही महत्व देती है।

 

इसलिए दोनों की सोच अलग होना स्वाभाविक है।

समस्या सोच के अलग होने में नहीं है। समस्या तब होती है जब दोनों एक-दूसरे को सुनना बंद कर देते हैं।

 

हर रिश्ता संवाद से मजबूत होता है और विवाह पर संवाद तो उससे भी अधिक आवश्यक है।

यदि माता-पिता आदेश देने के बजाय बच्चों के मन की चिंता समझें और यदि युवा भी अपने माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करें तो आधी दूरियाँ स्वयं समाप्त हो सकती हैं।

किसी भी पीढ़ी के पास सारे उत्तर नहीं होते। अनुभव और नए विचार जब साथ चलते हैं, तभी संतुलन बनता है।

 

विवाह न तो केवल परंपरा है और न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न।

विवाह दो व्यक्तियों, दो परिवारों और दो जीवन-दृष्टियों का मिलन है।

 

इसलिए इसमें जल्दबाज़ी भी उचित नहीं और अनावश्यक भय भी नहीं।

आवश्यकता इस बात की है कि हम विवाह को सामाजिक दबाव से निकालकर संवाद, सम्मान और समानता की नींव पर खड़ा करें।

क्योंकि समय बदलता है तो परंपराएँ भी अपना स्वरूप बदलती हैं। लेकिन उनके मूल मूल्य नहीं बदलते। प्रेम आज भी उतना ही आवश्यक है। विश्वास आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ निभाने की भावना आज भी उतनी ही अनमोल है।

बस अब इन मूल्यों को नए समय की संवेदनाओं और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के साथ जोड़ने की आवश्यकता है।

शायद तब विवाह केवल एक सामाजिक संस्था नहीं रहेगा, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तित्वों के बीच ऐसा संबंध बनेगा जहाँ कोई किसी पर हावी न हो, बल्कि दोनों मिलकर एक-दूसरे को बेहतर इंसान बनने का अवसर दें।

और शायद यही बदलते दौर के विवाह की सबसे सुंदर परिभाषा भी है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३६ ⇒ कीड़े मकोड़े ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कीड़े मकोड़े।)

?अभी अभी # १०३६ ⇒ आलेख –  कीड़े मकोड़े ? श्री प्रदीप शर्मा ?

worms & insects 

आप इन्हें कीड़े मकोड़े कहें, या कीट पतंग, रेंगने वाले, उड़ने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, ये जीव बेचारे इस सत्य से अनभिज्ञ हैं, कि ये नर्क का जीवन भोग रहे हैं। भोग में रस होता है और इनकी भी यह भोग योनि है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच पसरी माया का भेद, एकमात्र केवल मानव ही जान पाया है, क्योंकि उसमें भेद बुद्धि है।

प्राणी मात्र में ईश्वर का वास होते हुए भी, वह ईश्वर तत्व से कोसों दूर है। मनुष्य जन्म हमें कितनी भोग योनियों के बाद प्राप्त हुआ है, विज्ञान इस सत्य को आज तक नहीं जान पाया। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक अलग कहानी कहता है तो हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथ कुछ और। कोई मनु की संतान है तो कोई adam eve और आदम हौवा की। लेकिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और इसीलिए वह अपने आप को ईश्वर के अधिक करीब पाता है।।

सृष्टि के जन्म और प्रलय अथवा कयामत की भी कई गाथाएं हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का जन्मदाता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना गया है। एक अज्ञात शक्ति है, उसे आप जितना चाहे नाम और स्वरूप दे सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।

एक समझदार प्राणी होने के कारण आज इंसान विश्व की जनसंख्या को लेकर चिंतित और परेशान है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी वह इंसान को ही जिम्मेदार मानता है। सभ्यता की कीमत प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करके ही चुकाई जा सकती है। मनुष्य को अभी और विकसित होना है, उसे मानव से महामानव और खुद से खुदा यानी इंसान से भगवान बनना है।।

वह आज भी अवतारवाद में विश्वास करता है। वो मसीहा आएगा, और हमें कल्कि अवतार की इतनी आस है कि हम हर महान इंसान में उसे ढूंढने लग जाते हैं। भक्तों के अनुसार तो कई कल्कि अवतार अभी भी इस धरा पर विचर रहे होंगे।

एक कीड़ा मकोड़ा बेचारा इन सबसे अनजान है। उसका तो जन्म ही कितने समय के लिए हुआ है, वह नहीं जानता। उसे कहीं भी कहीं भी, मक्खी और मच्छर की तरह मसल दिया जाता है। जीवः जीवस्य भोजनम्, कौन कब किसका आहार बन जाए, क्या पता।।

रेंगने वाले कीड़े अक्सर ज़मीन के अंदर ही रहते हैं, इधर दिन में बाहर आए और किसी का शिकार बने। बेचारे इसलिए रात में ही बाहर आते हैं। मक्खी मच्छर तो गंदगी में ही पनपते हैं, ईश्वर इन पर इतना मेहरबान है कि इनके जनसंख्या नियत्रण की चिंता तो इंसान भी नहीं कर पाता। ये थोक में पैदा होते हैं, और थोक में मुक्ति पाते हैं। ईश्वर जाने उनकी यात्रा कब शुरू हुई और कब तक चलेगी। कितने जन्म उन्हें और लेने पड़ेंगे, अभी इंसान बनने के लिए। क्या पता कभी बन पाएंगे भी या नहीं।

देवताओं को दुर्लभ यह मानव जन्म हमें तो मिल गया, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के बाद किसको मिलेगा, किसको नहीं मिलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इंसान एक समझदार प्राणी है, वह कीड़े मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करके नहीं छोड़ सकता। वह भी जानता है, बच्चे दो ही अच्छे।।

कीड़े मकोड़ों में किसी तरह के विकास की संभावना नहीं, फिर भी वे सृष्टि का एक आवश्यक अंग हैं, वे कभी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते, केवल मनुष्य मात्र ही ऐसा प्राणी है, जो उनका दोहन और शोषण करता है।

जिस दिन हम ईश्वर की अहैतुकी कृपा और इन कीट पतंगों और कीड़े मकोड़ों के अस्तित्व का कारण जान जाएंगे, शायद इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को भी पहचान पाएंगे। सुबह की इस अमृत वेला में एक कॉकरोच मुझे देखकर मुंह छुपा रहा है, और एक मैं हूं, जो उसे देख यह सोच रहा हूं, क्या इसमें भी परमेश्वर का वास है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९२ ☆ हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९२ ☆

हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

आषाढ़ की पहली फुहार के साथ ही धरती की गोद में सोए बीज जाग उठते हैं। सावन उन्हें हरियाली का आशीर्वाद देता है और भादों तक वे नवजीवन का उत्सव बन जाते हैं। यही ऋतु हमें सिखाती है कि प्रकृति में किया गया प्रत्येक निवेश समय के साथ चक्रवृद्धि होकर लौटता है।

पेड़-पौधों में लगाया गया श्रम, समय और प्रेम केवल एक पौधा नहीं उगाता, बल्कि शुद्ध वायु, शीतल छाया, वर्षा, उपजाऊ मिट्टी, पक्षियों का संगीत और आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य भी रचता है। धन का निवेश सीमित लाभ देता है, किंतु हरियाली का निवेश जीवन का विस्तार करता है। एक पौधा वर्षों बाद हजारों बीजों में बदलकर प्रकृति की संपदा को निरंतर बढ़ाता रहता है।

आषाढ़, सावन और भादों केवल ऋतुएँ नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और संवर्धन का संदेश हैं। यह समय हमें याद दिलाता है कि यदि आज हमने एक पौधा रोपा, तो उसका फल केवल हमें नहीं, उन पीढ़ियों को भी मिलेगा जिनसे हमारा कभी परिचय भी नहीं होगा। यही प्रकृति का सबसे बड़ा चक्रवृद्धि प्रतिफल है।

आइए, इस हरित ऋतु में केवल वृक्षारोपण का संकल्प ही न लें, बल्कि हर पौधे को अपने भविष्य की अमूल्य पूँजी मानकर उसका संरक्षण भी करें। क्योंकि प्रकृति का यही निवेश ऐसा है, जो कभी समाप्त नहीं होता—वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन, आशा और समृद्धि का ब्याज देता रहता है।

“धरती की सबसे समृद्ध तिजोरी बैंक का लॉकर नहीं, बल्कि वह मिट्टी है जिसमें प्रेम से रोपा गया एक पौधा आने वाले कल का वटवृक्ष बनकर पीढ़ियों को जीवन लौटाता है।”

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१९ ☆ लन्दन से >> सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१९ ☆

?  लन्दन से >> आलेख – सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्यिक विमर्श में यह प्रश्न एक अनुत्तरित पहेली की भाँति उपस्थित रहता है, कि क्या आलोचना वास्तव में सृजन है?

सृजन (रचनाकर्म) क्रिएटिव और मौलिक होता है, जबकि आलोचना उसी सृजन का प्रतिबिंब। किंतु, यदि हम ‘सृजन’ शब्द को केवल ‘कुछ नया रचने’ के संकुचित अर्थ से मुक्त कर ‘अर्थ के नए आयाम उद्घाटित करने’ के व्यापक संदर्भ में देखें, तो समालोचना का स्वरूप नितांत भिन्न हो जाता है।

समालोचक भी अनुवादक की तरह मूल लेखक में परकाया प्रवेश कर एक दार्शनिक और वैचारिक यात्रा करता है।

आलोचना केवल रचयिता की त्रुटियों का लेखा-जोखा या ‘नीर क्षीर’ विवेक करने वाली कोई दंडात्मक प्रक्रिया नहीं है। यह एक जटिल और रचनात्मक अनुशासित प्रक्रिया है। एक आलोचक के लिए केवल प्रखर बुद्धि या भाषाई सामर्थ्य ही पर्याप्त नहीं है, उसे गूढ़ गंभीर साहित्यिक दृष्टि, प्रभूत ज्ञान, तार्किक क्षमता और उच्च स्तरीय संवेदनशीलता का धनी होना पड़ता है।

जब कोई आलोचक किसी कृति का विश्लेषण करता है, तो वह केवल शब्दार्थ नहीं करता, बल्कि वह उस कृति के पीछे के मनोविज्ञान, तत्कालीन परिवेश, निहित सिद्धांतों और अपनी पांडित्यपूर्ण अंतर्दृष्टि के माध्यम से उस कृति को एक नई दृष्टि प्रदान करता है। यहाँ आलोचक का कार्य एक ‘व्याख्याता’ से ऊपर उठकर एक ‘सह-स्रष्टा’ का हो जाता है। वह मूल रचना के अंतर्निहित भावों को अपनी विवेचना से  उन ऊँचाइयों पर ले जाता है जहाँ तक शायद सामान्य पाठक की दृष्टि न पहुँच सके। अतः, आलोचना, सृजन का प्रति सृजन (Re-creation) है।

साहित्य के क्षेत्र में अक्सर यह विवाद उठता है कि क्या आलोचक का मत अंतिम होता है? इस संदर्भ में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का मंतव्य आज भी  प्रासंगिक और वैचारिक रूप से प्रबुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि

“आलोचक हंस नहीं है। नीर-क्षीर की तरह सत्य-असत्य पर दिया हुआ उसका निर्णय ही अंतिम निर्णय नहीं हो सकता।”

यह कथन एक आलोचक की विनम्रता और उसके कार्य की सीमा को किसी हद में निर्धारित करता है। आलोचना का उद्देश्य किसी कृति पर ‘अंतिम मोहर’ लगाना नहीं, बल्कि समालोचना के पाठकों तथा मूल रचना के बीच एक ‘संवाद’ स्थापित करना है। साहित्य का प्रवाह निरंतर होता है। जैसे-जैसे समय बदलता है, समाज की दृष्टि बदलती है, और उसी के साथ एक ही कृति के नए अर्थ निकलकर सामने आते हैं। आलोचक का काम उस अर्थ की यात्रा को दिशा देना है, उसे किसी एक बिंदु पर स्थिर कर देना नहीं होता ।

भगवत गीता, रामायण, मानस, भागवत जैसे अमर ग्रन्थ इसीलिए अमर हैं, क्योंकि उन पर लगातार जाने कितने ही विद्वान सतत युग परिवर्तन के अनुरूप इन महान ग्रंथों की समालोचनाएं करते हुए इनके कथ्य और संस्कृति के संवाहक बने हुए हैं। गंभीरता से विचार करें, तो सृजन और आलोचना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक रचनाकार जब लिखता है, तो वह अनजाने में ही अपनी ही आलोचना भी रच रहा होता है । वह शब्दों का चयन करता है, काटता है, सँवारता है। दूसरी ओर, एक अच्छा आलोचक जब किसी कृति को परखता है, तो वह उस कृति की आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करता है।

आलोचना का ‘सृजन’ होना इस बात में निहित है कि वह पाठक और कृति के बीच एक सेतु बनाती है। वह साहित्य के सिद्धांतों, दर्शन और समाजशास्त्र के उपकरणों से सुसज्जित होकर रचना को व्यापक फलक प्रदान करती है। वह स्वयं एक साहित्यिक विधा के रूप में ‘ललित’ और ‘गंभीर’ दोनों है।

“आलोचना”, यदि “समालोचक” हो तो उसे ‘सृजन’ मानने में संकोच का अर्थ साहित्य को संकुचित दृष्टि से देखना है।

समालोचना न केवल साहित्य की सुरक्षा करती है, अपितु उसे नवाचार की ऊर्जा भी देती है। समालोचक वह दीपक है जो कृति के उन कोनों को प्रकाशित कर देता है जहाँ तक लेखक की स्वयं की दृष्टि नहीं पहुँच सकी थी, या जिसे पाठक उपेक्षित कर बैठे थे।

अंततः, हम यह कह सकते हैं कि आलोचना का कार्य अंतिम निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि प्रश्नों की एक शोध श्रृंखला खड़ी करना है। और जहाँ प्रश्न होते हैं, वहीं जिज्ञासा होती है, और जहाँ जिज्ञासा है, वहीं सृजन की अनंत संभावनाएं निहित हैं। समालोचना, इस अर्थ में, एक सतत चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है जो साहित्य को जड़ होने से बचाती है।

आलोचक को यदि उसकी विवेचना को सृजन के समानांतर बनाना है तो उसे लेखक की चाटुकारिता एवं रचना के प्रति पूर्वाग्रह, से बचना चाहिए। उसे स्वयं विषय का विद्वान बनना चाहिए, उसे लेखकीय काया प्रवेश का गुण धर्म आना चाहिए, तभी वह ऐसी समालोचना कर सकता है, जिसे विधा के स्वरूप में मान्यता है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३५ ⇒अंतर्ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतर्ज्ञान।)

?अभी अभी # १०३५ ⇒ आलेख – अंतर्ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

= INTUITION =

जानने की प्रक्रिया को ज्ञान कहते हैं। इसके लिए ईश्वर ने हमें एक नहीं पांच पांच ज्ञानेंद्रियां प्रदान की हैं। पांच ही कर्मेंद्रियों से मिल जुलकर इस मनुष्य का यह विलक्षण व्यक्तित्व बना है। चेतन शक्ति, आप जिसे चाहें तो प्राण भी कह सकते हैं, हमारे पंच तत्वों से निर्मित शरीर में सतत प्रवाहित होती रहती है। हमारा उठना, बैठना, सोना, जागना, ऊंघना, हंसना, रोना, देखना, सुनना, बोलना, चखना, छूना जैसी सभी नियमित क्रियाएं मन मस्तिष्क द्वारा संचालित होती है। हमें लगता है, हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जब कि सब कुछ अपने आप ही ही रहा है।

अगर आप ही कर्ता हैं, सब कुछ कर रहे हैं, तो रोक दीजिए सब कुछ। आँखें खुली रखिए और कुछ मत देखिए, मत सुनिए कुछ भी इन दोनों कानों से, सांस तो आप ही ले रहे हैं न। मत लिजिए एक दो दिन सांस, क्या बिगड़ जाएगा।

भूख प्यास का क्या है, रह लेंगे कुछ दिन भूखे प्यासे।

आते जाते विचारों पर भी पहरा बिठा दीजिए। अगर विचार अतिक्रमण करते हैं, तो उन पर बुलडोजर चला दीजिए।।

मन, बुद्धि और अहंकार भी आपका नहीं है। इसलिए अब मान भी जाइए, आपका अपना कुछ भी नहीं है। आपको इस पावन धरा पर उतारा गया है और आप अपने आप में एक सर्वगुण संपन्न, एक मानव हैं।

A perfect human being creation of God, The Almighty!

मनुष्य जब पैदा होता है तो एक अबोध बालक होता है। शारीरिक विकास के साथ साथ ही उसका मानसिक विकास भी होता चला जाता है। सीखने की प्रवृत्ति उसकी जन्मजात ही होती है। परिवार और परिवेश के अलावा स्कूल वह स्थान होता है, जहां से वह सीखता है, ज्ञान अर्जित करता है। अनुशासित ज्ञान को अध्ययन कहते हैं। ज्ञान के स्तर को डिग्री में विभाजित किया गया है। आप पढ़ते रहें, डिग्रियां हासिल करते रहें।

अध्ययन के लिए हमें ट्यूशन भी लेनी पड़ती है जो आज की भाषा में कोचिंग कहलाती है। सीखना एक सतत प्रक्रिया है जो अनुशासित डिग्रियां हासिल करने के पश्चात भी कभी खत्म नहीं होती। बाहरी ज्ञान की कोई सीमा नहीं। नौकरी धंधे और कामकाज में लग जाने के बाद कौन इंसान बाल भारती भाग १ और फिजिक्स केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी पढ़ता है। अब काहे की पढ़ाई, काहे की ट्यूशन और काहे की परीक्षा। अब तो गाड़ी चल निकली। ।

ट्यूशन अगर बाहरी ज्ञान है, तो इन्ट्यूशन अंतर्ज्ञान ! एक ज्ञान का भंडार हमारे अंदर भी है जिसका बाहरी ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। हम सोचते, समझते ही नहीं, चिंतन मनन भी करते हैं। हमारी कुछ आंतरिक प्रतिभाएं समय और परिस्थिति के साथ उभरकर बाहर आती हैं।

साहित्य, संगीत और अन्य ललित कलाओं को बस एक बार अवसर मिला और टूटे बांध की तरह वह प्रवाहित होने लगती है।

धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान को आप अलग नहीं कर सकते। बाहरी प्रकृति और हमारे अंदर की सृजन की प्रवृत्ति का जब मेल होता है तो एक महाकाव्य की रचना होती है। संगीत की कोई धुन किसी किताब अथवा साज से नहीं निकाली जाती, वह धुन अंदर से प्रकट होती है बाहर तो सिर्फ उसका स्वरूप ही दिखाई देता है।

टैगोर की गीतांजलि किसी शब्दकोश अथवा थिसारस या इनसाइक्लोपीडिया की उपज नहीं, यह कवि का अंतर्ज्ञान है जो सरिता की तरह सतत प्रवाहित होता रहता है।।

विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक प्रयोग, खोज हों या अविष्कार, धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान का ही परिणाम हैं। कितनी विचित्र विधा है यह अंतर्ज्ञान ! ज्ञान पहले अंदर गया और बाद में कोई सिद्धांत बनकर बाहर निकला। एक चेतन मन तो है ही, एक अवचेतन मन भी है, जिसकी स्मृति के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। चेतना के ऊपर पराचेतना का भी अस्तित्व है। अंतर्दृष्टि और अंतर्ज्ञान असीमित है।

एक गीत है, एक आवाज है, एक धुन है। हमें सिर्फ सुनाई देती है लेकिन उसका प्रभाव देखिए, आंख खोलकर नहीं, आंख बंद कर कर, कान खोलकर ;

मेरी आंखों में बस गया कोई रे, मैं क्या करूं…

क्या यह अतिक्रमण नहीं। रोक सकें तो रोकिए इसे। चलाइए बुलडोजर। यह धुन है, ध्यान है, अंतर्ज्ञान है। नमन उन अनंत विलक्षण प्रतिभाओं को जिनका प्रकाश सूर्य की तरह सदा, सर्वत्र दैदीप्यमान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३४ ⇒ ज्ञान-गंगा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ज्ञान-गंगा।)

?अभी अभी # १०३४ ⇒ आलेख – ज्ञान-गंगा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज्ञान का गंगा से वही संबंध है, जो संगीत का सरिता का ! सङ्गीत अगर सरिता की तरह कलकल बहता है, तो ज्ञान वह पवित्र धारा है, जिसमें स्नान से अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है।

ज्ञान का कॉपीराइट गंगा को ही क्यूँ ! और भी नदियाँ हैं, वे सब भी पवित्र हैं। कालिंदी, गोदावरी की तो छोड़िए, अमरकंटक से निकली नर्मदा भी किसी से कम नहीं। ठीक है, हिमालय की बेटी है, शिवजी की जटाओं से निकली है, सर्व-गुण-सम्पन्न और लाडली भी तो है। जिस गंगा में स्नान मात्र से समस्त पापों का क्षय हो जाता हो, ज्ञान की गंगा में भी

यही सब गुण समाहित हैं।।

जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री है, और विसर्जन गंगासागर में, उसी प्रकार विवेक ज्ञान की गंगोत्री है और ज्ञान की परिणति ज्ञानसागर ! ज्ञान के साथ गुण का जब भी साथ हुआ है, वही तो, “ज्ञान-गुण-सागर” हुआ है।

लंका यूँ ही नहीं लाँघ ली जाती।

गंगा क्यूँ न इतराए, जब वह शिवजी की जटाओं में लहराए !

जिसका कोई आदि न अंत, वह जो आशुतोष अनंत, जिन्हें ध्यावै सभी देव-नर-मुनि-श्रेष्ठ-संत, कैलाशवासी कहलाएं नीलकंठ।

सतगुरु में ज्ञान और गंगा दोनों का वास है। गुरु और गंगा दोनों मोक्ष प्रदान करते हैं। जहाँ ज्ञान, त्याग, वैराग्य, असीम करुणा और संपूर्ण सृष्टि के कल्याण की भावना सनातन रूप से बह रही है, ऐसी गंगा में क्यों न स्नान किया जाय !

धारा सतगुरु !

लेत नहाए क्यों न ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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