श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भाव विरेचन…“।)
अभी अभी # १०१६ ⇒ आलेख – भाव विरेचन
श्री प्रदीप शर्मा
** CATHARSIS **
अगर भाव ना हो, तो शायद इंसान ही ना हो। केवल इंसान में ही नहीं, प्रकृति के हर जीव जंतु में कम अथवा अधिक मात्रा में भाव का समावेश होता ही है। मादा पक्षी अपने अंडों को सेती है, उसकी आँधी तूफान और शिकारी शत्रुओं से रक्षा करती है, उनकी सुरक्षा के लिए नीड़ का निर्माण करती है। ये प्राणी, बस, प्रकट रूप में इंसान की तरह हँसते रोते नहीं हैं, जो खो गया, उसे भुलाते चलते हैं, लेकिन जो मिल गया वह उनके मुकद्दर का नहीं होता, उन्हें उसको हासिल करना पड़ता है।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।
मनुष्य के मन में भाव का भंडार भरा है। जब यह हल्का होता है तो रुई की तरह होता है, और जब भारी होता है, तो मानो किसी ने सर पर पहाड़ रख दिया हो। कोई सागर, दिल को बहलाता नहीं। जब यह अधीर होता है, तो साहिर इसे समझाते हैं, मन रे, तू काहे ना धीर धरे ! वही मन, जो दर्पण होता है, उसे पापी मन भी कहा गया है। देखिए, आशा जी फिल्म गंगा जमना में क्या कह रही हैं ;
तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे।
मिलाए छल बल से नजरिया रे।।
मन के विज्ञान को मनोविज्ञान कहते हैं। जिस मन के हारे, हार है, और मन के जीते जीत, जो कहीं मनजीत है, तो कहीं जगजीत, किसी के मन का मीत है तो किसी का शत्रु, उसे एक आम इंसान तो क्या, योगी भी अपने बस में नहीं कर पाए। यह एक ऐसे मन का मंत्रिमंडल है, जहां सब मनमानी करते हैं।
कई बार ऐसा होता है, जब मुंह से निकल जाता है, आज मन बड़ा उदास है।।
मन के विकारों को मनोविकार कहते हैं। राग द्वेष, सुख दुःख, हार जीत, हानि लाभ, यश अपयश, इन सबका प्रभाव हमारे चित्त पर पड़ता है, जिसे हम आम भाषा में मन ही कहते हैं। प्रकृति के द्वारा प्रदत्त संसाधनों को ही हम शुद्ध नहीं रख पा रहे हैं, तो जल को निर्मल और हवा को प्रदूषण रहित कैसे रख पाएंगे। जैसा पर्यावरण, वैसा हमारा मन। चंचल, पापी, विकारग्रस्त, सदा समस्याओं से ग्रस्त, त्रस्त।
देखिए ! हम इतने बुरे भी नहीं ! हम सदा सच बोलते हैं, ईमानदार हैं, मेहनती हैं, पूजा पाठ, योग, ध्यान, साधना सब करते हैं। लेकिन यह भी सच है, पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। हर इंसान में अच्छाई भी होती है, और बुराई भी। गुस्सा और क्रोध हमें भी आता है, जब हम कुछ गलत होते देखते हैं। आखिर अन्याय के खिलाफ आवाज भी तो उठानी ही पड़ती है।।
जब क्रोध आता है, तो हम क्या करते हैं ? एक से सौ तक की गिनती गिनते हैं, हाथ में माला लेकर जाप करने लग जाते हैं ? कैसी बातें करते हो, जो उचित होता है, वही करते हैं। सामने वाले को डांटते हैं, फटकारते हैं, गाली वाली भी बक देते हैं, और अगर फिर भी बात नहीं बनती, तो देते हैं दो मिलाकर। अगर दुर्वासा होते, तो शायद शाप भी दे देते। इससे क्या होता है, वह सुधरे ना सुधरे, हमारा गुस्सा जरूर शांत हो जाता है। शास्त्रों में इसे ही कैथार्सिस, भाव विरेचन अथवा भड़ास निकालना कहा गया है।
जब भी आपको किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति पर गुस्सा आए, तो एक मोटा तकिया ले लें, और उसे तबीयत से पीटें। अगर मुंह से गाली निकलती है, तो सब तकिये पर उगल दें, बेचारा कुछ नहीं बोलेगा। उल्टे रात को आपका सिरहाना ही बनेगा, आपको सुख ही देगा। वह रिएक्ट करना नहीं जानता। जड़ जो है।।
सोचिए अगर हमारे समाज में गालियां नहीं होती तो बेचारा एक गरीब, कमज़ोर, शोषित इंसान क्या करता। शायद गुस्से में आग ही लगा देता। बेचारा गाली बककर अपनी भड़ास निकाल लेता है, बीड़ी की आठ दस फूंक ज्यादा मार लेता है। हम सिस्टम तो सुधार नहीं सकते और चाहते हैं, इंसान सुधर जाए। रातों रात रामराज्य आ जाए।
जब भी मन में उमस पैदा होगी, आग भी लगेगी और पानी भी बरसेगा। अगर गम को गटक लिया, अपमान का घूंट पी लिया, तो अवसाद आपको मार डालेगा। भाव विरेचन की साधारण क्रिया कीजिए, अपने गुस्से को शांत कीजिए। बाद में ठंडा पानी पीकर प्रभु को याद कीजिए।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈












