हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१६ ⇒ भाव विरेचन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भाव विरेचन।)

?अभी अभी # १०१६ ⇒ आलेख – भाव विरेचन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

** CATHARSIS **

अगर भाव ना हो, तो शायद इंसान ही ना हो। केवल इंसान में ही नहीं, प्रकृति के हर जीव जंतु में कम अथवा अधिक मात्रा में भाव का समावेश होता ही है। मादा पक्षी अपने अंडों को सेती है, उसकी आँधी तूफान और शिकारी शत्रुओं से रक्षा करती है, उनकी सुरक्षा के लिए नीड़ का निर्माण करती है। ये प्राणी, बस, प्रकट रूप में इंसान की तरह हँसते रोते नहीं हैं, जो खो गया, उसे भुलाते चलते हैं,  लेकिन जो मिल गया वह उनके मुकद्दर का नहीं होता, उन्हें उसको हासिल करना पड़ता है।

नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।

मनुष्य के मन में भाव का भंडार भरा है। जब यह हल्का होता है तो रुई की तरह होता है, और जब भारी होता है, तो मानो किसी ने सर पर पहाड़ रख दिया हो। कोई सागर, दिल को बहलाता नहीं। जब यह अधीर होता है, तो साहिर इसे समझाते हैं, मन रे, तू काहे ना धीर धरे ! वही मन, जो दर्पण होता है, उसे पापी मन भी कहा गया है। देखिए, आशा जी फिल्म गंगा जमना में क्या कह रही हैं ;

तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे।

मिलाए छल बल से नजरिया रे।।

मन के विज्ञान को मनोविज्ञान कहते हैं। जिस मन के हारे,  हार है, और मन के जीते जीत, जो कहीं मनजीत है, तो कहीं जगजीत, किसी के मन का मीत है तो किसी का शत्रु, उसे एक आम इंसान तो क्या, योगी भी अपने बस में नहीं कर पाए। यह एक ऐसे मन का मंत्रिमंडल है, जहां सब मनमानी करते हैं।

कई बार ऐसा होता है, जब मुंह से निकल जाता है, आज मन बड़ा उदास है।।

मन के विकारों को मनोविकार कहते हैं। राग द्वेष, सुख दुःख, हार जीत,  हानि लाभ, यश अपयश, इन सबका प्रभाव हमारे चित्त पर पड़ता है, जिसे हम आम भाषा में मन ही कहते हैं। प्रकृति के द्वारा प्रदत्त संसाधनों को ही हम शुद्ध नहीं रख पा रहे हैं, तो जल को निर्मल और हवा को प्रदूषण रहित कैसे रख पाएंगे। जैसा पर्यावरण, वैसा हमारा मन। चंचल, पापी, विकारग्रस्त, सदा समस्याओं से ग्रस्त, त्रस्त।

देखिए ! हम इतने बुरे भी नहीं ! हम सदा सच बोलते हैं, ईमानदार हैं,  मेहनती हैं, पूजा पाठ, योग, ध्यान,  साधना सब करते हैं। लेकिन यह भी सच है, पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। हर इंसान में अच्छाई भी होती है, और बुराई भी। गुस्सा और क्रोध हमें भी आता है, जब हम कुछ गलत होते देखते हैं। आखिर अन्याय के खिलाफ आवाज भी तो उठानी ही पड़ती है।।

जब क्रोध आता है, तो हम क्या करते हैं ? एक से सौ तक की गिनती गिनते हैं, हाथ में माला लेकर जाप करने लग जाते हैं ? कैसी बातें करते हो,  जो उचित होता है, वही करते हैं। सामने वाले को डांटते हैं, फटकारते हैं, गाली वाली भी बक देते हैं, और अगर फिर भी बात नहीं बनती, तो देते हैं दो मिलाकर। अगर दुर्वासा होते, तो शायद शाप भी दे देते। इससे क्या होता है, वह सुधरे ना सुधरे, हमारा गुस्सा जरूर शांत हो जाता है। शास्त्रों में इसे ही कैथार्सिस, भाव विरेचन अथवा भड़ास निकालना कहा गया है।

जब भी आपको किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति पर गुस्सा आए, तो एक मोटा तकिया ले लें, और उसे तबीयत से पीटें। अगर मुंह से गाली निकलती है, तो सब तकिये पर उगल दें, बेचारा कुछ नहीं बोलेगा। उल्टे रात को आपका सिरहाना ही बनेगा, आपको सुख ही देगा। वह रिएक्ट करना नहीं जानता। जड़ जो है।।

सोचिए अगर हमारे समाज में गालियां नहीं होती तो बेचारा एक गरीब,  कमज़ोर,  शोषित इंसान क्या करता। शायद गुस्से में आग ही लगा देता। बेचारा गाली बककर अपनी भड़ास निकाल लेता है, बीड़ी की आठ दस फूंक ज्यादा मार लेता है। हम सिस्टम तो सुधार नहीं सकते और चाहते हैं, इंसान सुधर जाए। रातों रात रामराज्य आ जाए।

जब भी मन में उमस पैदा होगी, आग भी लगेगी और पानी भी बरसेगा। अगर गम को गटक लिया, अपमान का घूंट पी लिया, तो अवसाद आपको मार डालेगा। भाव विरेचन की साधारण क्रिया कीजिए, अपने गुस्से को शांत कीजिए। बाद में ठंडा पानी पीकर प्रभु को याद कीजिए।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख  अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग )

☆ “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(आज से प्रस्तुत है श्री राघवेंद्र तिवारी जी का अभिनव गीत पर एक शोध परक आलेख अंतर्कथा :अभिनवगीत की..”। इस आलेख को हम तीन भागों (आदि प्रसंग, मध्य प्रसंग और उत्तर प्रसंग) में प्रस्तुत कर रहे हैं.) 

☆ भाग – ३ – उत्तर प्रसंग ☆

गीत को नवगीत का नाम देते हुए राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने इसके लिए पाँच मूलभूत तत्वों की बात कही (जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय)। अनेकांश नवगीतकारों ने इस पंच- सूत्री सूक्त को प्रतिमान की मान्यता दे कर, नवगीतों की सर्जना की। किन्तु, शीर्ष नवगीतकार नचिकेता ने यह कह कर इन्हें नकार दिया कि ये ” वस्तुतः पारंपरिक गीतों के कला-प्रतिमानों और विचार-दृष्टि का नया नामकरण भर थे”(देखें पूर्वाभास अगस्त २०१६ )। अपनी अवधारणा की पुष्टि में वे कहते हैं:” नवगीत ने अपने अंतर्जगत में व्यक्तिनिष्ठता की जगह वस्तुनिष्ठता और नितांत निजी आत्मानुभूति की जगह सामाजिक- चेतना के विविध् रूपों को अभिव्यक्त करने का जोखिम उठाया है। नवगीत की इस सार्थक पहल कदमी ने पारंपरिक गीत की विषयवस्तु को ही नहीं बदला, उसकी अनुभूति की संरचना (भाषा, शिल्प, विचारधारा और अनुभूति का सम्मिलित रूप), अभिव्यक्ति-भंगिमा और रूपाकार को भी बदल दिया”। फिर भी “आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद और क्षणवाद नवगीत की वैचारिक अंतर्वस्तु रहा है और ये सारे प्रत्यय केवल जनविरोधी ही नहीं, मनुष्य विरोधी भी हैं”। नचिकेता की ये अवधारणाएं इस बात का संकेत हैं कि नवगीत को जन पक्षधर होना चाहिए अर्थात इनका मूल स्वर प्रगतिकामी किवां साम्यवादी होना चाहिए। इस सन्दर्भ में वे कार्ल मार्क्स को उद्धृत करते हैं कि मनुष्य की चेतना को सामाजिकता, सृजनशीलता और सौंदर्यबोध् की क्षमता का विकास सामाजिक विकास का परिणाम है। कला और साहित्य का विकास भी इसी का परिणाम है। सामाजिक परिवर्तन के साथ मनुष्य का सौंदर्यबोध बदलता है, सुन्दरता की कसौटी बदलती है। मनुष्य के सौंदर्यबोध का उसकी विश्वदृष्टि से घनिष्ठ संबंध होता है’।

सौंदर्यबोध की भारतीय अवधारणा आनंद और लोक- मंगल से जुडी है। लोक- मंगल वर्ग विशेष का नहीं, समस्त मानव समाज का। अपने ‘तुमि जखन गान गायिते बोलो’ में रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं : तूने जब मुझे गीत गाने को कहा \तो गर्व से मेरी छाती फटने को हुई। मेरी आँखें आँसुओं से डबडबा उठीं \और मैं एकटक तेरे चेहरे की ओर देखता रह गया। मेरा जीवन \जितना कटु, विषम और अस्तव्यस्त है, वह सब पिघल कर \तेरी गीत- सुधा में बदल गया। मेरी सब साधना, आराधना, पक्षी की

तरह पंख फैलाकर आनंद से \उड़ने की कामना करने लगी। मेरे गीतों की रागिनी\मुझे श्रुति -मधुर लगती है, कर्ण-प्रिय लगती है। मैं जानता हूँ, \उन गीतों में के बल पर मैं तेरे सामने आने का साहस \कर सकता हूँ। टैगोर का यह गीत कवि की करुणानुभूति और श्रुति- मधुर, कर्ण -प्रिय रागात्मकता से जटिल- विषम जीवन को आनंद से आप्यायित करने की बात करता है। आज कविता में वह करुणानुभूति नहीं रही जो मनुष्य को करुणार्द्र कर, उसे पाशविक वृत्तिओं से मुक्ति दिला सके। सच पूछा जाए तो कविता वह है जो मनुष्य में अंतर्भूत मनुष्यता को उद्भूत कर सके। ऋचा कहती है हम मनुष्य की भांति रहना और जीना चाहते हैं। मनुष्यता से सम्पन्न हम आलोक का अन्वेषण करें (मनुष्वत्वा नि धीमहि मनुष्वत् समिधीमहि। अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान् देवयते यज (ऋक. 5.21.1)। जरूरत है परुष को संवेदन शील बनाने की। मनीषियों ने मनुष्यत्व के लिए कुछ मूल्य निश्चित किए हैं। कुछ यम-नियम अर्थात व्यक्ति की सामाजिक और वैयक्तिक नैतिकता (यम= संयम अर्थात सामाजिक नैतिकता) नियम अर्थात व्यक्तिगत नैतिकता। आधुनिक और वस्तुनिष्ठ बुद्धिवादियों ने इन्हें मनुवादी सोच कह कर नकार दिया। भोगवादी संस्कृति हावी है, जिसमें पदार्थ से परे कुछ नहीं है। एक ओर तीव्र गति से मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। तो दूसरी तरफ बढ़ रहा है संहारक शक्तियों का प्रभुत्व। इससे सृष्टि की सृजनात्मकता दिन पर दिन क्षीण हो रही है। आदमी प्रकृति से कट कर कृत्रिम जीवन जीने को विवश है। विश्व का तापमान बढ़ रहा है। पर्यावरण के विघटन ने ऐसा भयावह वातावरण पैदा कर दिया है, जिसमें मनष्य क्या, समस्त चराचर जगत संकट में है। ऐसे संकटापन्न वातावरण में अभिनव गीतकारों से अपेक्षा है कि वे :

–मानवीय मूल्यों का उन्नयन करें

–भोगवादी अपसंस्कृति से जन्में मनुष्यता के विस्थापन को अवरुद्ध करें

–मनुष्य को निसर्ग के संसर्ग में लाने के लिए कृत -संकल्प हों

–संहारक, विस्तारवादी और नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करें

— वर्गभेद और वर्ग संघर्ष की छद्म नारेवाजी से बच कर वर्ग- सहयोग को समृद्ध करें

— कविता को खंड -खंड होने से बचा कर, उसे समग्र रूप में रूपांकित करें जिससे वैचारिक खेमेबंदी यथा नारी, दलित, आदि वासी, किसान -मजदूर विमर्श जैसी विभाजक रेखाओं से बचा जा सके। अभिनव गीत हर मजबूर आदमी की आवाज हो। आयातित जीवन दर्शन और, वैचारिकी के स्थान पर कविता का मूल उत्स देशज हो। आंचलिक।

मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अभिनव गीत एक ऐसे अभिनव साहित्यिक समाज की निर्मिति में अग्रगामी भूमिका अदा करेगा जहाँ समता और समरसता की अखंड आनंदमयी संस्कृति का अभ्युदय हो (समरस थे जड़ या चेतन सुन्दर साकार बना था \ चेतनता एक विलसती आनंद अखंड घना था–कामायनी)।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१५ ⇒ घृणा व्याख्यान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घृणा व्याख्यान ।)

?अभी अभी # १०१५  ⇒ आलेख – घृणा व्याख्यान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

~ HATE SPEECH ~

अपनी छोटी सी जिंदगी में व्याकरण के नाम पर parts of speech (शब्दभेद) से परिचय हुआ, अलंकार के रूप में figures of speech से भी रूबरू हुए, ढाई आखर प्रेम के भी पढ़े, और सबसे ऊंची प्रेम सगाई भी देख ली । किसे पता था, इस उम्र में आकर भी हम कोरे के कोरे ही रह गए, क्योंकि एक व्याख्यान तो अधूरा ही रह गया, शांति दूतों का अब क्या काम, मोटिवेशनल स्पीच से प्रभावित होते, इंडिया शाइनिंग का गुणगान करते, उसके पहले ही आइना हमसे पूछता है, कभी hate speech की तैयारी की, अपने आपसे प्रेम और पड़ोसी से नफ़रत करना सीखा ? अगर नहीं सीखा तो हेट स्पीच क्या खाक सीखा ।

हम मूर्खों जैसे आज भी रफी साहब का वही गीत गुनगुनाते रहे, नजर वो दुश्मन पर भी मेहरबां हो, और इधर दुश्मन ने हमारा गिरेबां ही पकड़ लिया । कबीरदास जाने किस जमाने में रहते होंगे । होगा शायद वह राम राज, जो कह गए ;

जो तो को कांटा बुवै,

तोहे बोव तू फूल ।

तोहि फूल को फूल है

वाको है तिरशूल ।।

हम बंदर से इंसान तो बन गए, फिर भी बंदरों वाली हरकत नहीं भूले । तीन बंदर हमें ज्ञान बांटते हैं, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो । क्या आंख बंद कर लेने से बुराई खत्म हो जाएगी, क्या कान में रूई ठूंस लेने से ध्वनि प्रदूषण कम हो जाएगा, बुरी बात तो सुनने से पहले ही बुरी लगने लगती है । जब कभी किसी की बुराई होती है, तो कान उधर ही लगे रहते हैं ।

हां, लेकिन तीसरा बंदर बहुत काम का है। बुरा मत कहो । जब हम बात करें तो मुंह से मोती झरने चाहिए। लेकिन अगर वाकई ऐसा होता तो आज के अभी अभी का शीर्षक कुछ और ही होता ।

कबीरदास जी निंदक के बड़े दीवाने हैं । बड़े लोकतांत्रिक आदमी प्रतीत होते हैं ये मिस्टर जुलाहे !

कहते हैं जो निंदा करे उसके लिए आंगन, कुटी, छवाय यानी विपक्ष के नेता के लिए कार, बंगला, और विशेष भत्तों की सुविधाएं मुहैया कराई जाएं । आज अगर कबीर विपक्ष में होते तो तबीयत से सत्ता पक्ष द्वारा बिना साबुन पानी के धो दिए जाते। बड़े निंदा ज्ञान बांटने चले थे ।।

जोक्स अपार्ट, फिर भी इस फकीर को मानना पड़ेगा । निंदक को स्वीकारा, उसे सम्मान दिया लेकिन उसने कभी नफरत की बात नहीं की । बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय ।

धन्य है महात्मा जी । अपने आपको ही भला बुरा कहने वाले हे विचित्र प्राणी, जरा बताना तो, तुम्हारा सीना कितने इंच का है । हमें तो बस हड्डियां ही नज़र आ रही हैं ।

स्पीच का जब जिक्र होता है तो शिकागो में स्वामी विवेकानंद का विश्व धर्म संसद में, ११ सितंबर १८९३ को शून्य पर दिया गया ऐतिहासिक व्याख्यान स्मरण हो आता है । देश के लिए ऐसे पल स्वर्णिम पल होते हैं, जो यश, कीर्ति और गौरव की ऐसी पत्थर की लकीर खींच जाते हैं, जो अमिट और अमर हो जाती है । विश्व गुरु तो तब ही दुनिया ने हमें मान लिया था ।।

विकास और प्रगति का अर्थ अच्छाई को रिवर्स गियर में लेना नहीं होता ।

रेपिडेक्स इंग्लिश ने कई लोगों को इंग्लिश स्पीच में सहायता की। सोशल मीडिया अच्छा बुरा नहीं देखता। सिर्फ नेकी ही नहीं, आजकल लोग हेट स्पीच भी व्हाट्सएप पर डाल देते हैं । हमारी नई पौद वही सीखेगी, जो हम उसे सिखाएंगे।

देखिए हमारी आज की राजनीतिक पार्टियों के आई टी सेल कितनी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहे हैं । कहीं ऐसा न हो कि रेपिडेक्स इंग्लिश कोर्स की तरह कल से विज्ञापन आना शुरू हो जाए, हेट स्पीच कोर्स, केवल पंद्रह दिनों में । स्थान सीमित ।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ माँ का टिफिन बनाम बाज़ार का स्वाद ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ माँ का टिफिन बनाम बाज़ार का स्वाद ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

माँ का टिफिन बनाम बाज़ार का स्वाद: जब सुविधा जीवनशैली बन जाए और भोजन सिर्फ स्वाद तक सिमट जाए

“माँ, टिफिन मत बनाना… स्कूल के बाहर मोमोज खा लूँगा।”

माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस सुबह उठकर बनाई गई सब्जी और पराठों की तरफ देखा।

शाम को वही टिफिन बिना खुले वापस आ गया।

माँ को दुख टिफिन के लौट आने का नहीं था। दुख इस बात का था कि जिस भोजन में उनका प्यार, मेहनत और पोषण छिपा था, वह आज की पीढ़ी को पुराना लगने लगा था।

और शायद यहीं से शुरू होती है फास्ट फूड पीढ़ीकी असली कहानी।

आज के बच्चे और युवा ऐसे दौर में बड़े हो रहे हैं, जहाँ भोजन का अर्थ धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। कभी खाना शरीर को पोषण देने का माध्यम था, आज वह मनोरंजन, सुविधा और त्वरित संतुष्टि का साधन बनता जा रहा है। मोबाइल ऐप पर एक क्लिक कीजिए और कुछ ही मिनटों में बर्गर, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़ या शक्कर से भरे पेय आपके दरवाजे पर हाज़िर हैं।

सुविधा बुरी नहीं है, लेकिन जब सुविधा आदत बन जाए और आदत जीवनशैली, तब उसके परिणाम भी सामने आने लगते हैं।

कुछ दशक पहले तक भारतीय रसोई मौसम के साथ बदलती थी। गर्मियों में छाछ, सत्तू और आम पना शरीर को ठंडक देते थे। सर्दियों में बाजरे की रोटी, सरसों का साग, तिल और गुड़ शरीर को ऊर्जा प्रदान करते थे। भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया जाता था।

आज मौसम बदलता है, लेकिन मेन्यू नहीं बदलता।

पैकेट खोलिए, गरम कीजिए और खा लीजिए।

यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याएँ अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया भर में बचपन का मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और इसका एक बड़ा कारण अत्यधिक प्रसंस्कृत (Processed) और जंक फूड का बढ़ता सेवन है।

विडंबना देखिए, आज बच्चों के पास खाने के विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन उनके शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी भी पहले से अधिक देखने को मिल रही है।

क्यों?

क्योंकि अधिकांश फास्ट फूड में कैलोरी बहुत होती है, लेकिन पोषण बहुत कम।

पेट भर जाता है, लेकिन शरीर भूखा रह जाता है।

लेकिन यह समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। फास्ट फूड संस्कृति ने हमारी सोच और जीवनशैली को भी प्रभावित किया है।

जब हम हर चीज़ तुरंत पाने के आदी हो जाते हैं तो धैर्य धीरे-धीरे कम होने लगता है। हमें दो मिनट में नूडल्स चाहिए, दस मिनट में डिलीवरी चाहिए और कुछ महीनों में सफलता चाहिए।

धीरे-धीरे यह मानसिकता जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगती है।

हम परिणाम चाहते हैं, प्रक्रिया नहीं।

हम उपलब्धि चाहते हैं, तैयारी नहीं।

हम सफलता चाहते हैं, संघर्ष नहीं।

दादी अक्सर कहा करती थीं, धीमी आँच पर पकी दाल का स्वाद ही अलग होता है।”

बचपन में यह बात केवल रसोई की सलाह लगती थी, लेकिन आज समझ आता है कि वह जीवन का दर्शन था।

प्रकृति में कोई भी अच्छी चीज़ जल्दबाज़ी में नहीं बनती। बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। नदी को अपना रास्ता बनाने में समय लगता है। एक खिलाड़ी को चैंपियन बनने में वर्षों की मेहनत लगती है।

फिर हम क्यों मान बैठे हैं कि जीवन की हर उपलब्धि इंस्टेंटहो सकती है?

भोजन की दुनिया में भी यही सच है। घर का बना साधारण भोजन भले सोशल मीडिया पर आकर्षक न लगे, लेकिन वह शरीर को वह ताकत देता है जो किसी चमकदार पैकेट में नहीं मिल सकती।

पहले भोजन परिवार को जोड़ने का माध्यम था। रात के खाने पर पूरा परिवार एक साथ बैठता था। दिनभर की बातें होती थीं। बच्चों को संस्कार मिलते थे। बुज़ुर्गों के अनुभव सुनने को मिलते थे।

आज एक ही घर में चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन के सामने खाना खा रहे हैं।

भोजन बचा है, लेकिन साथ कहीं खो गया है।

यह कहना गलत होगा कि फास्ट फूड पूरी तरह बुरा है। समस्या कभी-कभार खाने में नहीं, बल्कि उसे जीवन का आधार बना लेने में है। यदि हमारी थाली में फल, सब्जियाँ, दालें, मोटे अनाज और घर का बना भोजन पर्याप्त मात्रा में है, तो कभी-कभार का स्वाद कोई नुकसान नहीं पहुँचाता।

लेकिन जब स्वाद पोषण पर भारी पड़ने लगे, तब खतरे की घंटी बज जाती है।

आज जरूरत बच्चों को डराने की नहीं, बल्कि जागरूक बनाने की है। उन्हें यह समझाने की आवश्यकता है कि भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि भविष्य का निवेश है। जो भोजन आज उनकी थाली में है, वही कल उनकी ऊर्जा, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और जीवन की गुणवत्ता तय करेगा।

माँ के हाथ का साधारण पराठा शायद किसी विज्ञापन में न दिखे, लेकिन उसमें वह स्नेह, पोषण और संतुलन छिपा होता है जिसे कोई ब्रांडेड पैकेट नहीं दे सकता।

 

फंडा यह है कि-

फास्ट फूड जीभ को कुछ मिनटों की खुशी दे सकता है, लेकिन शरीर को लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रख सकता। जिस पीढ़ी को केवल स्वाद मिलेगा और पोषण नहीं, उसे सुविधा तो मिलेगी, पर शक्ति नहीं। इसलिए अपनी थाली में ऐसा भोजन रखिए जो सिर्फ पेट नहीं, भविष्य भी भर सके।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – २ – मध्य प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख  अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – २ – मध्य प्रसंग )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – २ – मध्य प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(आज से प्रस्तुत है श्री राघवेंद्र तिवारी जी का अभिनव गीत पर एक शोध परक आलेख अंतर्कथा :अभिनवगीत की..”। इस आलेख को हम तीन भागों (आदि प्रसंग, मध्य प्रसंग और उत्तर प्रसंग) में प्रस्तुत कर रहे हैं.) 

☆ भाग – २ – मध्य प्रसंग ☆

महाकवि कालिदास का कथन है:पुरान मित्येव न साधु सर्वं\न चापि काव्यं नवमित्य वद्यम् \सन्तः परीक्षान्यतरद् भजन्ते \मूढ़ परप्रत्यपनेय बुद्धि:(सत समीक्षक रचना की भीतरी पहचान से राय कायम करते है। मूढ़ समीक्षक दूसरों की समीक्षाएं पढ़कर धारणाएं बनाते है)। नवगीत को न सत समीक्षक मिले न मूढ़। इनका मूल्यांकन हुआ ही नहीं। इतिहास लिखा गया। विरूदावलियां लिखी गईं अपनों की। किसी ने विविध आयाम नापे तो किसी ने प्रतिमान गढ़े या बांयी आँख से नवगीतों में मानवतावाद देखने की कोशिश की। ऐसे ग्रंथ आत्मश्लाघा सापेक्ष ही सिद्ध हुए। यदि कहीं निरपेक्ष मूल्यांकन -समालोचन हुआ होता तो बीच में दम तोड़ते नवगीतों को आवश्यक आक्सीजन देकर नया जीवन दिया जा सकता था। अल्प समय में ही ‘ तारसप्तक’ का यशोगान इसलिए हुआ कि उसके कवि काव्य सर्जना के साथ समीक्षा करने में भी निपुण थे। उन्हीं दिनों डॉ. नामवर सिंह ने कहा “किसी काव्यकृति का, कविता होने के साथ नयी/ नया होना अभीष्ट है”। डॉ.जगदीश गुप्त ने नई कविता को व्यतीत लेखन मानते हुए कहा सृजनात्मकता (क्रिएटिविटी) तथा संवेदनीयता (इमोटिविटी) से रहित कथन किसी भी स्तर पर कविता नहीं माना जा सकता। आज जब नवगीतों में नयेपन के नाम पर सिर्फ नाव, गाँव, ठाँव वाली तुकें ही बची हों, तो उसे क्षरण से कौन बचा सकता है ?जहाँ ऐसे ही विचारों का दोहराव हो, शब्द संगति उचित न हो, तथा कथ्य- विपर्यय हो तथा वर्षों से एक ही ढर्रे पर चलने की प्रवृति हो, तो वह नवगीत की श्रेणी में कैसे गिना जा सकता है। जब नई कविता में घिसावट शुरू हुयी तो डॉ. नामवर सिंह ने ‘उत्तर नई कविता’ की बात कही। वे पूछते हैं ‘ नया क्या है’? ‘कविता क्या है’?स्वयं ही उत्तर देते हैं “दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। नवीनता की उत्पत्ति, सच्ची कविता लिखने की आकांक्षा से ही होती है”। मुझे याद है लखनऊ से प्रकाशित ‘शब्द’ नामक पत्रिका(वर्ष 1972-73)में मेरा एक गीत छपा “मैं बहुत उदास हूँ\कभी सुपत्र से निकल दिनांक सा\मै हाशिए के पास हूँ\मैं बहुत उदास हूँ”। इसे मैंने नवगीत के नाम से भेजा था। सम्पादक का प्रश्न यह नवगीत तो नहीं लगता। नवगीत से कुछ अलग है। कुछ मित्रों की भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएं पढ़ने \सुनने को मिलीं। मेरा उत्तर था इसे ‘उत्तर नवगीत’ समझ लीजिए। इसी समय रामचन्द्र ” चन्द्रभूषण” का एक बहुत सुन्दर व असाधारण गीत कादम्बिनी में प्रकाशित हुआ था-फुलवा के माथे से\गिरा माँग टीका \राजा खटवास लिये\रानी पटबॉस लिये’। तब मैंने सोचा ऐसे गीतों को क्यों न ‘अभिनव गीत’ कहा जाए। तब से निरंतर अभिनव गीत ही लिख रहा हूँ। द्रष्टव्य हैं कुछ पंक्तियाँ : सुगढ़ बस्ती थी \बहुत खुशहाल खाकों में \भर गया पानी वहां \निचले इलाकों में \कई चिंताएं लिए दुःख \में खड़े शामिल सभी\लोग हैं भयभीत देखो \बढ़ गई मुश्किल\छूटता जाता है कुछ -\ कुछ समय के संग में \बेबसी में हो रहे \इन बड़े हाँकों में। …

यह छवि ओसारे की मधुबनी \सुबह की कमर पर ज्यों\धूप ओस जड़ी करधनी .. .। जून की\ पीली महकती \यह सुबह \गंध से भीगे करोंदोँ की\उमर पर\ तरस खाती सी हवा \लगती मगर \उभर आती है\ हरी गीली सतह। …. सांझ हुई, पेड़ों के \झुरमुट से झाँक रहे देवदार\ गिरगिट से….। इन गीतों को सोशल मीडिया से जुड़े गीतकारों ने अपनी- अपनी दृष्टि से देखा। डॉ.रवि शंकर पांडेय लिखते हैं शोभनम अति शोभित। ताजा और एकदम टटके बिम्बों के साथ गांव की स्मृतियों का सुन्दर शब्द चित्र। एक सुगढ़ बस्ती बहुत सुन्दर प्रस्तुति। डॉ. कृपा शंकर तिवारी के शब्द हैं: अद्भुत प्रयोग। अद्वितीय रचनाधर्मिता। अद्भुत प्रतिभा को प्रणाम। गीतकार के सी सोनी का कथन :”बहुत सुन्दर, बड़ा ही मर्मस्पर्शी दृश्य प्रस्तुत किया गया है, एक नवेली बहू की ससुराल का। विषय वस्तु का चयन समसामयिक है। प्रकृति के सुन्दर लम्हों को आप ही शब्दों में पिरो सकते हैं”।

यह जानकर प्रसन्नता हुई कि मेरे अभिनव गीत पढ़ कर कुछ नवगीतकार इस विधा में सर्जना करने लगे हैं। डॉ.मक्खन मुरादाबादी ने केवल सूचित ही नहीं किया, बानगी के दस गीत भेज भी दिए।

सब से बड़ी बात यह है कि ये टिप्पणियां तथा डॉ. मुरादाबादी की सर्जना अभिनव गीत पर हैं। किसी को गीत के नाम पर आपत्ति नहीं। यहाँ मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि गीत, अगीत, प्रगीत, एंटीगीत, नयी कविता के गीत, नया गीत, अनुगीत के कवच तोड़ कर जब नवगीत प्रकट हुआ, तो गीत का ऐश्वर्य बढ़ा। उसे किसी प्रकार की क्षति नहीं उठानी पडी। आज जब नवगीत में ठहराव सा दिख रहा है तो आवश्यकता है नए बहाव की। अभिनव गीत इसी की सम्पूर्ति है। नवगीत के आगे का गीत। आगे की गीत यात्रा।

 – क्रमशः

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आकाशवाणी के संग, जीवन के रंग… ☆ श्री अजीत सिंह (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरणीय आलेख आकाशवाणी के संग, जीवन के रंग।)

☆ आलेख – आकाशवाणी के संग, जीवन के रंग…  ☆ श्री अजीत सिंह ☆

आकाशवाणी से मेरा लगाव एक रोचक घटना से हुआ और फिर बढ़ते बढ़ते जीवन भर का प्रेम सम्बन्ध बन गया.

बात 1958-59 की है. मैं 13 साल का सातवीं क्लास का विद्यार्थी था. एक दिन हमारे अध्यापक हमें पास के गांव कोहन्ड ले गए जहाँ उस समय के रेल राज्य मंत्री शाहनवाज़ खान का जलसा था. शाहनवाज़ खान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथी थे. वे आज़ाद हिन्द फ़ौज के अधिकारी रहे थे और लाल क़िले में उन पर अंग्रेज़ों ने देश द्रोह का मुक़दमा चलाया था जिसमे उनकी पैरवी जवाहरलाल नेहरू ने की थीं. ऐसा हमारे अध्यापक ने बता कर कार्यक्रम में विद्यार्थियों की रूचि बढ़ा दी थी.

जलसे का आयोजन आकाशवाणी दिल्ली के एक रेडियो अनाउंसर पंडित ह्रदय राम जी ने किया था. जलसे में पंडित जी ने अपने कोहन्ड गांव के लिए रेलवे स्टेशन की मांग की और लो जी मंत्री जी ने इसे मंज़ूर भी कर लिया. मुझे लगा कि रेडियो का अनाउंसर तो बहुत बड़ा अधिकारी होता है जो अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन तक मंज़ूर करा सकता है. मेरे बालमन में रेडियो अधिकारी बनने की इच्छा का अंकुर सा फूटने लगा जो आने वाले समय में सहज़ रूप से प्रफुल्लित होने वाला था.

रेडियो से मेरी मुलाक़ात वर्ष 1956 में हुई जब हमारे गांव में सरकार द्वारा एक कम्युनिटी रेडियो सेट प्रदान किया गया था.

उस समय गांव के लोग खेती बाड़ी के कार्यक्रम और लोकसंगीत व फ़िल्मी संगीत बड़े ही ध्यान से सुनते थे और नये बीजों के प्रति उनमें बड़ी जिज्ञासा थीं. गांव का सामुदायिक रेडियो सेट हमारी बैठक में ही रखा था और इसके साथ एक लाउड स्पीकर लगता था और लोग खुले चौक में जमीन पर बैठ ध्यान से प्रोग्राम सुनते थे. मुझे याद है उन दिनों नागिन और फागुन फिल्मों के गाने बड़े लोकप्रिय थे.

मैं जब कॉलेज में पहुंचा तो मेरी रूचि समाचारों और  करंट अफेयर्स के programme सामयिकी व स्पॉटलाइट में बन गई. इससे मेरा सामान्य ज्ञान बढ़ा और मैं बी एस सी के बाद यूपीएससी की परीक्षाएं देने लगा. ये मेरा सौभाग्य ही था कि मैं भारतीय सूचना सेवा में सेलेक्ट हो गया और मुझे पहली पोस्टिंग आकाशवाणी के शिमला केंद्र पर मिली. मेरे लिए यह बहुत ही उत्साहवर्धक अवसर था. 1971 में जब भारत पाक युद्ध हुआ तो हमारे न्यूज़ रीडर रामकुमार काले जी बीमार हो गए और मुझे ख़बरें पढ़ने का मौका मिला. शिमला समझौते के लिए प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फी कार भुट्टो अपनी बेटी बेनज़ीर भुट्टो के साथ आए थे. इसकी कवरेज भी एक अनूठा अनुभव था. मैंने देखा कि रेडियो पत्रकार होने के नाते मैं ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शी गवाह बन रहा था. यह सिलसिला बहुत दूर जाने वाला था.

जम्मू कश्मीर में मैंने रेडियो करेस्पोंडेंट के तौर पर करीबन 20 साल काम किया. इसमें अमन और तरक्की का दौर भी था और फिर आतंकवाद का कठिन दौर भी.

इस दौरान करीबन सभी अख़बारों और मीडिया पर आतंक का साया मंडरा रहा था. आम आदमी न तो प्रेस में कोई बयान दे सकता था न वो कैमरे के सामने बोल सकता था. श्रीनगर में मेरे साथी बशीर मलिक ने सदा ए जरस नाम से एक साप्ताहिक रेडियो प्रोग्राम शुरू किया जिसमें मेरा भी कुछ सहयोग रहता था. प्रोग्राम में आम आदमी चिट्ठियां लिखकर आतंकवादियों के ज़ुल्मों की दास्तांनें बयान करते थे. वे फ़ोन पर भी अपने दर्द की कहानियां रिकॉर्ड कराते थे. यह कार्यक्रम बड़ा ही लोकप्रिय हुआ था. आख़िरकार ये रेडियो ही था जिसने आम आदमी की आवाज़ को उठाया था उसकी निजी सुरक्षा को खतरा पहुंचाए बिना.

हज़रतबल दरगाह  और चरार ए शरीफ दरगाह पर आतंकी हमले की कवरेज भी मैंने की थीं.

2002 के विधान सभा चुनाव और फिर कारगिल युद्ध को भी मैंने रिपोर्ट किया था. मुझे जम्मू कश्मीर में कवरेज के लिए आकाशवाणी के बेस्ट करेस्पोंडेंट का पुरस्कार भी मिला था.

यह रेडियो ही था जिसने मुझे तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अमरीका, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड की यात्राओं की कवरेज का मौका दिया. यह अवसर अमरीका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितम्बर 2001 के आतंकी हमले की पहली वर्षगांठ का था.

रेडियो ने मेरे व्यक्तित्व को निखारा है.  सही उच्चारण के साथ धारा प्रवाह बोलना सिखाया है. आवाज़ का उतार चढाव सिखाया है. टेलीविज़न और समाचार पत्र हमारी टोटल अटेंशन मांगते हैँ. रेडियो आप कुछ भी काम करते हुए सुन सकते हैँ.

रेडियो ने लोक संगीत और कला को बढ़ावा दिया है. किसान उन्नत बीजों को रेडियो बीजों के नाम से पुकारते हैँ. यह मनोरंजन का उत्तम माध्यम है. हमारे अकेलेपन का साथी है.

आकाशवाणी के अनाउंसर पंडित हृदय राम की तरह मैं अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन तो नहीं बनवा सका पर हमारे कुछ  प्रयत्नों से पैतृक गांव हरसिंघपुरा में एक केंद्रीय विद्यालय अवश्य खुल गया. पुत्र संजय सिंह और मैं करनाल क्षेत्र के सांसद व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आई डी स्वामी से मिले तो उन्होंने कहा की करनाल ज़िले के लिए सरकार ने एक केंद्रीय विद्यालय मंज़ूर किया है पर कोई पंचायत उसके लिए ज़मीन देने को तैयार नहीं है. केंद्रीय विद्यालय की मांग का प्रस्ताव हमने अपनी ग्राम पंचायत से पास करा कर मंत्री जी को सौंप दिया. और लौ हमारे गांव में केंद्रीय विद्यालय खुल गया जहाँ आज एक हज़ार से ऊपर विद्यार्थी शिक्षा पा रहे हैँ.

धन्यवाद आकाशवाणी. यह भी खूब रही.

दस वर्ष की आयु में शुरू हुआ आकाशवाणी प्रेम आज 80 साल की उम्र में भी जारी है. मैं सुबह 8 बजे के समाचार मोबाइल पर निश्चित रूप से सुनता हूँ. दिन भर विविध भारती से जुड़ाव रहता है. अन्य काम साथ चलते रहते हैँ.

अपने मोबाइल में आकाशवाणी का कोई app डाउनलोड कर लीजिए. जो स्टेशन चाहें सुनिए.

मेरी तरह. हाँ मैं जम्मू के डोगरी लोकगीत सुनता रहता रहता हूँ. रोहतक और हिसार केंद्रों से हरयाणवी लोकगीत सुनता हूँ.

रेडियो ठंडी हवा का झोंका जैसे है. तरो ताज़ा कर देता है.

Radio आवाज़ के जादू का medium है. मोबाइल फ़ोन में भी अब यह आपके साथ रहता है. जब तक इंसान की आवाज़ है, रेडियो ज़िंदा रहेगा.

देश विदेश से समाचार भेजते हुए मैं कहता था, फलां शहर से मैं अजीत सिंह आकाशवाणी समाचार के लिए.

आज मैं कहना चाहता हूँ :

आकाशवाणी के प्रेम की 70 वर्षीय यादों के झुरमुट के साथ हरियाणा के हिसार  से मैं 80 वर्षीय अजीत सिंह.

आकाशवाणी के इतिहास के 90 साल वाकई

बाकमाल, बाकमाल.

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१४ ⇒ परिचय अपरिचय ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परिचय अपरिचय।)

?अभी अभी # १०१४  ⇒ आलेख – परिचय अपरिचय ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अजनबी, तुम जाने पहचाने से लगते हो !

अपरिचय से ही परिचय का जन्म होता है । पहचान ही परिचय है । बच्चे बिना परिचय के ही पहचान कर लेते हैं । हमारा परिचय नाम से होता है लेकिन प्रकृति में पहचान रंग और खुशबू से होती है, आँखों देखी से होती है । अगर हमें पशु पक्षियों की भाषा आती तो क्या हम उनसे उनका नाम पूछते और वे बेचारे क्या जवाब देते । बहुत कुछ रहस्य प्रकृति अपने गर्भ में छुपाकर रखती है,क्योंकि हम केवल इंसानों की भाषा जानते हैं,प्रकृति की नहीं ।

मनुष्य ने पहले अपनी एक अलग पहचान बनाई ,अभिव्यक्ति हेतु भाषा और व्याकरण का आविष्कार किया । अंधा बांटे रेवड़ी,पहले अपना नाम इंसान रख लिया और कुत्ते को कुत्ता और गधे को गधे का नाम दे दिया । और तो और उसने ही भगवान को भी एक नाम दिया । शेक्सपीयर कह तो गए कि गुलाब तो गुलाब ही रहेगा,उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए,लेकिन अपना नाम बदलना भूल गए ।।

जानने और पहचानने में अंतर होता है ! कई बार ऐसे अपरिचित चेहरे सामने आ जाते हैं,और प्रश्न कर बैठते हैं,पहचाना ? आप अगर मुंहफट हुए तो मना भी कर सकते हैं और अगर शालीन हुए तो यही कहेंगे,कहीं देखा तो जरूर है,लेकिन याद नहीं आ रहा । वे आपको कुछ पुरानी घटनाएं याद दिलाने की कोशिश करते हैं और आप अनायास कह उठते हैं,अरे आप तो हमारे पुराने पड़ोसी हैं,अब याद आया । बहुत दिनों बाद आपको देखा । कितना बदल गया न सब कुछ इस बीच ।

विशिष्ट व्यक्ति याने सेलिब्रिटीज को ही ले लीजिए,उन्हें कौन नहीं जानता ! लेकिन क्या वे हर एक को व्यक्तिगत रूप से पहचान सकते हैं । मोदी जी का लोगों ने चेहरा देखा है,आवाज भी सुनी है,कई ने साक्षात दर्शन भी किए होंगे,लेकिन क्या वे आपसे रुबरू होने पर आपको पहचान सकते हैं ? कतई नहीं ! क्योंकि जान-पहचान पारस्परिक होती है । It’s a two way traffic. जब तक आप किसी से मिलते नहीं,आपस में संवाद नहीं होता,हम एक दूसरे को नहीं जान सकते । जान – पहचान इतनी आसान भी नहीं होती ।।

फिल्म आनंद में जॉनी वाकर का एक किरदार था,वे रास्ते में चलते हुए किसी भी अजनबी व्यक्ति को रोककर पूछ लेते थे,अरे जयचंद कैसे हो ? वह अजनबी एकदम सकपका जाता और जवाब देता, मैं जयचंद नहीं हूं,गुलाबचंद हूं । जॉनी भाई उसकी पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहते,तो अच्छा नाम भी बदल लिया ।अपरिचय का दायरा तोड़कर परिचय के संसार में प्रवेश करना इतना आसान भी नहीं होता ।

हम आखिर किसी को जान ही कितना पाते हैं । एक समय था जब नौकरियों के लिए चरित्र प्रमाण पत्र मांगा जाता था । कोई विशिष्ट अथवा प्रमुख व्यक्ति अंग्रेजी में प्रमाणित करते थे ;

I know him since last ten years. He bears a good moral character. I wish him every success in life.आज भी वैक्सीन के मेरे प्रोविविजन सर्टिफिकेट पर मोदीजी की तस्वीर है । पहचान जरूरी है । कहीं आधार कार्ड,कहीं पैन कार्ड ,कहीं पासपोर्ट ,तो कहीं बी .पी. एल.कार्ड । पहचान नहीं,तो आदमी इंसान नहीं ।।

हम ईश्वर को कितना जानते हैं,और ईश्वर हमें कितना जानता है । हम जिसे नहीं जानते,और जो हमें नहीं जानता,उसका भी अस्तित्व होता है,ठीक उसी प्रकार,जैसे हम अपने आपको कितना जानते हैं,पहचानते हैं,फिर भी दंभ भरते हैं,हम किसी से कम नहीं । हम से है जमाना ।

हमें हाथ नहीं लगाना । वर्ना पड़ेगा पछताना ।

पहले किताबों से परिचय हुआ,बाद में फेसबुक के जरिये फेसबुक फ्रेंड्स से परिचय हुआ ! अपरिचय में सब कुछ अजाना,अस्तित्वविहीन रहता ही है,परिचय में जिज्ञासा होती है,बहुत कुछ जानने की लालसा होती है । जब जिज्ञासा शांत हो जाती है,तब जानने के लिए कुछ बाकी नहीं रह जाता । अगर दिल के तार जुड़ गए,सार्थक संवाद कायम हो गया,तो समझिए , जीवन में एक और खूबसूरत दोस्त का प्रवेश हो गया,अन्यथा परिचय को ढोते रहने से अच्छा उससे छुटकारा पा लिया जाए और अखबारों की रद्दी की तरह छंटनी शुरू हो जाती है ।।

लोग दीवाली की सफाई की तरह फेसबुक की सफाई करते हैं । जब हम अपने चेहरे को साफ सुथरा रखते हैं,तो फेसबुक को क्यों नहीं रखें । एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है । बड़े प्यार से फेसबुक का फिश पॉट तैयार किया था । रंग बिरंगी मछलियों से उसे सजाया था ।फेसबुक हमारी पहचान है,हमारा परिचय है ।

अधिक और अनावश्यक परिचय से अपरिचय बेहतर है । अपरिचय में राग द्वेष,स्वार्थ और खुदगर्जी नहीं होती । परिचय की जड़ों में अगर प्रेम के बीज हों,तो पौधा पनपता है । अब तो बेलि फैल गई ,आनंद फल होई ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८० – देश-परदेश – अंतरराष्ट्रीय पोहा दिवस : 7 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८० ☆ देश-परदेश – अंतरराष्ट्रीय पोहा दिवस : 7 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अस्सी के दशक तक उतर भारत के लोग पोहा को चिवड़ा के नाम से जानते थे। सूखे पोहे को तलने के पश्चात चिवड़े के नाम से सेवन किया जाता था।

संचार माध्यमों की सुगमता, टीवी, फिल्मों आदि ने पोहे को संपूर्ण भारत में प्रचारित कर दिया। प्रत्येक क्षेत्र में अलग अलग खाद्य पदार्थ उपयोग किए जाते हैं।

हमारी आज के प्रातःकालीन उद्यान सभा में भी इस पर खूब चर्चा हुई। सभा में विभिन्न प्रांतों के रहने वाले सेवानिवृत साथी हैं। इन सब लोगों को अनर्गल विषयों पर घंटों चर्चा करने का शौक है।

पोहे के समर्थन में भी बहुत सारी दलीलें पेश की गई, हल्का खाद्य और फास्ट फूड की श्रेणी में आता है। एक और साथी ने तो सारी हदें पार कर, वर्षों से इंदौर के सफाई वर्चस्व के लिए पोहे को ही वज़ह बताया। क्या पोहा खाने से मन में सफ़ाई के विचार आते हैं ?

पंजाब राज्य के साथी बोले, सिर्फ पोहे का ही अंतरराष्ट्रीय वर्ष क्यों मनाया जाता हैं ? हमारी लस्सी किसी से कम हैं, क्या ? एक पटना निवासी बोले हमारे “लिट्टी चोखे” का भी दिवस मनाया जाना चाहिए।

त्रिवेन्द्रम निवासी बोले हमारी इडली तो वर्षों से पूरे भारत को भाती हैं। हम पोहा दिवस इस शर्त पर मनाएंगे, जब हमारी इडली को भी ऐसी ही मान्यता मिले।

जयपुर निवासी बोले, जिस जमीन पर बैठे हो, उसकी कचौरी को मत भूलना। हर नुक्कड़ पर मिलती है। मामला आगे बढ़ता, ये तय हुआ हर सात तारीख़ को अलग अलग प्रांतों के उपलब्ध खाद्य पदार्थों का दिवस मनाया जाएगा।

तय कार्यक्रम के अनुसार नजदीक के “इंदौर पोहा” वाले ठेले पर सबने कांदा पोहा, जिस में रतलामी नमकीन सेव भी था, का भरपूर सेवन किया।

पोहा काग़ज़ की प्लेट में परोसा गया था, लेकिन ठेले पर “कचरा पात्र” उपलब्ध नहीं था, इसलिए सब अपनी अपनी उपयोग की गई प्लेट को साथ ले कर आए और उचित स्थान पर फेंका। कुल मिला कर पोहा खाने के बाद “सफाई का कीड़ा” अपना असर दिखाता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “अंतर्कथा :अभिनव गीत की… भाग – १ – आदि प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख  अंतर्कथा :अभिनव गीत की… भाग – १ – आदि प्रसंग )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

अंतर्कथा :अभिनव गीत की… भाग – १ – आदि प्रसंग☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(आज से प्रस्तुत है श्री राघवेंद्र तिवारी जी का अभिनव गीत पर एक शोध परक आलेख अंतर्कथा :अभिनवगीत की..”। इस आलेख को हम तीन भागों (आदि प्रसंग, मध्य प्रसंग और उत्तर प्रसंग) में प्रस्तुत कर रहे हैं. यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह आलेख अभिनव गीत पर एक ऐतिहासिक दस्तावेज है.) 

☆ भाग – १ – आदि प्रसंग ☆

मैं उस कालखंड की बात कर रहा हूँ, जब हिंदी के कुछ उभरते और कुछ प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रयोगधर्मिता के पीछे पड़े हुए थे। जो लिखा जा चुका है, उस से इतर लिखा जाये, नया- नया सा। फिर क्या था साहित्य की हर विधा के आगे जुड़ गया नया या नव जैसा विशेषण। नई कहानी, नई कविता, नए या ललित निबंध। नईकविता अर्थात अतुकांत(छान्दसिक नहीं)की भरमार। लिखने वाले छांदिक कविता(विशेषत:गीत) लिख रहे थे जिनकी भंगिमा बदली हुई थी। ऐसे गीतों को नवगीत की संज्ञा देते हुए ‘गीतांगिनी’ के सम्पादक राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने पत्रिका के १९५८ के अंक में लिखा था :”नयी कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे धातव्य कवियों का अभाव नहीं है, जो मानव जीवन के ऊंचे और गहरे, किन्तु सहज नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता, मार्मिकता, विच्छित्ति और मांगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज -संवार कर नयी ‘टेकनीक’ से, हार्दिक परिवेश की नयी विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं। प्रगति और विकास की दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नयी कविता की प्रगति का पूरक बनकर ‘नवगीत’ का निकाय जन्म ले रहा है। नवगीत नयी अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयता पूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा”। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने एक तरह से इन गीतों का नामकरण कर दिया ‘नवगीत’। नया नाम मिलते ही नवगीत शृंखला प्रारम्भ हुई। निरंतर विस्तृत होती गई। उधर प्रबुद्ध रचनाकार नचिकेता ने कहा नई भंगिमा वाले गीतों को समकालीन- गीत कहा जाए। नवगीत और समकालीन गीत की ऊहापोह के बीच साठ के दशक में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में महेश संतोषी का एक गीत छपा ( सुबह कहीं ऊगेगा\ शाम कहीं डूबेगा\सूरज वीरानों में \आधा इन प्रानों में \आधा उन प्रानों में)। साप्ताहिक ने इसे मात्र गीत के रूप में छापा। नवगीत की मान्यता नहीं दी। फिर भी नवगीतों का सृजन होता रहा। स्वयं गीतकारों ने समवेत संकलन प्रकाशित किए, नवगीत को परिभाषित करते हुए। एक ओर डॉ शंभूनाथ सिंह ने चुने हुए गीतकारों को लेकर नवगीत दशक की शृंखला में तीन समवेत संकलन प्रकाशित किए। दूसरी ओर शीर्ष नवगीतकवि निर्मल शुक्ल ने ‘शब्दपदी’ शृंखलाके अंतर्गत एक हजार से अधिक पृष्ठों का ग्रंथ (शब्दायन )प्रकाशित किया। इस में मेरे गीतों को भी स्थान मिला। उनकी अनियत- कालीन पत्रिका ‘उत्तरायण’ में भी अन्य प्रतिष्ठित नवगीतकारों के साथ मेरे नवगीत भी प्रकाशित होते रहे। इसी क्रम में ढाई सौ पृष्ठों का ग्रंथ ‘शब्दपदी :अनुभूति और अभिव्यक्ति’ नाम से प्रकाशित हुआ। ग्रंथ के अर्थबोध में शुक्लजी ने कहा ‘शब्दपदी एक शीर्षक है, और एक अभियान भी। गीत की स्थापना एवं उसकी प्रतिष्ठा हेतु समय -समय पर निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जो निश्चित रूप से अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं’।

 सच कहूँ तो उन दिनों मैं नवगीतों का निष्ठवान पक्षधर था। इस बीच नवगीतों का मेरा पहला संकलन प्रकाश में आया। सुधी साहित्य सेवियों \पाठकों से व्यपक सराहना भी मिली। लेकिन, सच्चाई यह रही कि दो दशक बीतने पर भी न तो अकादमियों के प्रकाशनों में नवगीत को स्थान मिला, न धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में। नवगीत अगर छपे भी तो गीत के नाम से। अस्सी के दशक में सरस्वती जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में डॉ. राजेंद्र गौतम का वर्षा गीत(घन कुंतल मेघ घिरे) छपा। अप्रैल १९८१ में साप्ताहिक हिंदुस्तान ने अपने केंद्रीय पृष्ठ पर डॉ. देवेंद्र शर्मा इंद्र का नवगीत(हम पाटिलीपुत्र हुए)छपा। नवगीत शब्द का नामो निशान नहीं। तदन्तर सम्पादक मनोहर श्याम जोशी ने उन्हें चाय पर आमंत्रित किया। लम्बी चर्चा हुई नवगीत की गुणात्मकता और प्रामाणिकता पर। निश्चय हुआ कि दिल्ली के आस- पास के कवियों के नवगीत श्रृंखलाबद्ध रूप में छापे जाएंगे। बीस कवियों को स्थान मिला। नवगीत शब्द फिर भी गायब। गीत के नाम से जरूर प्रकाशित होते रहे नईम, उमाकांत मालवीय, रामदरश मिश्र, ओम प्रभाकर, शलभ श्री राम सिंह, छविनाथ मिश्र आदि के नवगीत। ।

मैं आज तक समझ नहीं पाया कि स्थापित और प्रतिष्ठित सरकारी – गैरसरकारी पत्रिकाओं में तो नवगीतों को मान्यता दी और क्यों न उन पर कोई चर्चा हुई। साहित्य अकादमी ‘समकालीन भारतीय साहित्य ‘नामक पत्रिका निकालती है। कविता, कहानी, आलेख न जाने क्या -क्या नहीं छपता, उस में। किन्तु नवगीत नहीं। इधर नवगीतकार मोह- मग्न हैं कि नवगीत आज कविता की केंद्रीय विधा है। मुझे तो लगता है केंद्रीय विधा न होकर, क्षयग्रस्त विधा है। कहने को मैंने छठे दशक के उत्तरार्ध में कादम्बिनी (सम्पादक: रामानंद दोषी )में प्रकाशित प्रेम शर्मा के गीत से असहमति व्यक्त की थी कि नवगीत विदाई की देहरी पर है। उनका नवगीत था (ना वे रथवान रहे\ना वे बूढ़े प्रहरी\कहती टूटी दीवट\सुन री ! उखड़ी देहरी)। यह नवगीत की जर्जर स्थिति को स्पष्ट करता है। आज मुझे लगता है कि प्रेम शर्मा के गीत में समय की सच्चाई थी। इस गीत का जिक्र किये बिना, डॉ.शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत दशक एक, दो, तीन, प्रकाशित कर नवगीत को नया जीवन देने के प्रयत्न किये। नवगीतकारों के चयन की उनकी प्रक्रिया ऐसी थी कि अनेक श्रेष्ठ रचनाधर्मी ‘नवगीत दशक’ में इसलिए स्थान नहीं पा सके कि उनके आचरण से वे संतुष्ट नहीं थे। यहां रचना की गुणात्मकता से अधिक महत्वपूर्ण थी व्यक्ति की जीवन -शैली। अंत में निराशा ही हाथ लगी। नवगीत निराश ही करता रहा। इस के क्षरण से बचाने के लिये डॉ. सिंह ने ‘ नवगीत अर्धशती’ का प्रकाशन किया किन्तु नवगीत को नव- जीवन नहीं मिल सका। जिस तरह कोई फैशन कुछेक साल चल कर क्षीण हो जाती है, लगता है वही हाल नवगीतों का हुआ। फैशन की तरह ही कला, संस्कृति, साहित्य आदि भी अब अधिक चल नहीं पाते। वर्ष 1965 तक हिन्दी सिनेमा के गीतों में ‘मेलोडी’ चरम पर थी। यह समय नवगीतों के लिए भी उत्कर्ष का सिद्ध हुआ (देखें ‘कविता’64’)। इसके बाद सिनेमा से संगीत की वह स्वर माधुरी विलुप्त हो गई और नवगीत भी गड़बड़ाने लगा।

सोशल मीडिया में डॉ.राजेंद्र गौतम की टिप्पणी चर्चा में है : ‘गीतकारों और नवगीतकारों की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि हिंदी के बड़े आलोचक गीत-नवगीत की उपेक्षा कर रहे हैं। लेकिन कुछ सवाल हमें खुद से भी पूछने होंगे। हम प्रासंगिक कितना लिख रहे हैं? कितना कैलेंडर को देख कर लिख रहें? हम कितने अतीत-जीवी हैं? वर्तमान घटनाओं से हमारा कितना सरोकार है? मौसम की निरापद बातें करना आसान है। समय के सवालों से टकराना मुश्किल। इस तरह की “रंजनकारी” रचनाएँ सत्ता को बहुत भाती हैं। नवगीत कोरा रूपवाद नहीं है। हमारी प्रासंगिकता हमारे कथ्य से तय होगी। कहीं हम पलायन की गुफा में जाकर तो नहीं सो गए हैं?यथास्थितिवाद कभी प्रासंगिक नहीं हो सकता’।

मुझे लगता है इस कथन में वजन है। नवगीत जिस ऊर्जा को लेकर चला था, लगता वह कहीं गुम हो गई। आवश्यकता है बदलाव की। नवगीतों में नयापन भरने की।

 – क्रमशः

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभिव्यक्ति # -११० – धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख  धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान।)

☆ अभिव्यक्ति # ११० ☆

☆  आलेख – धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 बचपन से धार्मिक ग्रंथो में पढ़ते आए हैं, कि हनुमान जी ने बचपन में ही सूर्य को निगल लिया था, थोड़े बड़े हुए, तो शंका होने लगी, अभी भी बहुत से लोग अंधविश्वास कहते हैं और बहुत से लोग इसे आदिशक्ति कहते हैं. सनातन धर्म के मानने वाले, इस बात को ईश्वर की लीला कहते हैं, आखिर धर्म में ऐसा क्या बताया कि हम इसे नहीं मानते या मानते हैं, तो ईश्वरीय महिमा बताते हैं. धार्मिक कथाओं के दो स्तर होते हैं –

  1. श्रद्धा का स्तर
  2. ज्ञान का स्तर

वास्तव में हनुमान जी चेतना के प्रतीक हैं, और सूर्य ज्ञान के प्रतीक हैं, जब चेतना जागृत होती है तो वह ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जब वह ज्ञान प्राप्त करने लगती है या ज्ञान प्राप्त करती है तो हम साधारण भाषा में कहते हैं कि उसने तो पुस्तकों को निगल लिया, घोंट लिया, पुस्तक ज्ञान का भंडार होती हैं, ज्ञान को निगल लिया, और इसी क्रम में आगे चला, यह शब्द कि, हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया, यह सिंबॉलिज्म है और यह बताता है कि हनुमान जी में जब चेतना जागृत हुई तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया और ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया. इसे प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो सारी बात समझ में आ जाती है.

सनातन धर्म की खूबसूरती यही है. वह कथा, प्रतीक और दर्शन को एक साथ लेकर चलता है..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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