हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२७ – अंतिम नींद ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२७ अंतिम नींद… ?

दूसरे के जागने-सोने, खाने-पीने, उठने-बैठने, हँसने-बोलने, यहाँ तक की चुप रहने में भी मीन-मेख निकालना, आदमी को एक तरह का विकृत सुख देता है।तुलनात्मक रूप से एक भयंकर प्रयोग बता रहा हूँ, विचार करना।

रात को बिस्तर पर हो, आँखों में नींद गहराने लगे तो कल्पना करना कि इस लोक की यह अंतिम नींद है। सुबह नींद नहीं खुलने वाली।…यह विचार मत करना कि तुम्हारे कंधे क्या-क्या काम हैं। तुम नहीं उठोगे तो जगत का क्रियाकलाप कैसे बाधित होगा। जगत के दृश्य-अदृश्य असंख्य सजीवों में से एक हो तुम। तुम्हारा होना, तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हो सकता है पर जगत में तुम्हारी हैसियत दही में न दिखाई देनेवाले बैक्टीरिया से अधिक नहीं है। तुम नहीं उठोगे तो तुम्हारे सिवा किसी पर कोई दीर्घकालिक असर नहीं पड़ेगा।

तुम तो यह विचार करना कि क्या तुम्हारे होने से तुम्हारे सगे-सम्बंधी, तुम्हारे परिजन-कुटुंबीय, मित्र-परिचित, लेनदार-देनदार आनंदी और संतुष्ट हैं या नहीं। बिस्तर पर आने तक के समय का मन-ही-मन हिसाब करना। अपने शब्दों से किसी का मन दुखाया क्या, आचरण में सम्यकता का पालन हुआ क्या, लोभवश दूसरे के अधिकार का अतिक्रमण हुआ क्या, अहंकारवश ऊँच-नीच का भाव पनपा क्या..?… आदि-आदि..। हाँ आत्मा के आगे मन और आचरण को अनावृत्त कर अपने प्रश्नों की सूची तुम स्वयं तैयार कर सकते हो।

प्रश्नों की सूची टास्क नहीं है। प्रश्न तुम्हारे, उत्तर भी तुम्हारे। असली टास्क तो निष्कर्ष है। अपने उत्तर अपने ढंग व अपनी सुविधा से प्राप्त कर क्या तुम मुदित भाव से शांत और गहरी नींद लेने के लिए प्रस्तुत हो?

यदि हाँ तो यकीन मानना कि तुम इहलोक को पार कर गए हो। 

सच बताना उठकर बैठ गए हो या निद्रा माई के आँचल में बेखटके सो रहे हो?

निष्कर्ष से अपनी स्थिति की मीमांसा स्वयं ही करना।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३७ ⇒ अक्षर जगत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अक्षर जगत।)

?अभी अभी # ९३७ ⇒ आलेख – अक्षर जगत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

“अ” से ही शुरू होती अक्षरों की दुनिया ! अम्बर, अवनि, अग्नि, अखिलेश, अमर, अटल, असीम, अनंत, अक्षत, अनिमेष।

शब्द पहले अक्षर था, शब्द ब्रह्म, और जिसका क्षरण न हो वह कहलाया अक्षर।

ब्रह्म की तरह शब्द सब तरफ व्याप्त है, क्योंकि शब्द अपने आप में अक्षरों का समूह है, अक्षर भी सभी ओर व्याप्त है, लेकिन ब्रह्म की तरह दृष्टिगोचर भी नहीं होता।।

ब्रह्म ने अपने आप को व्यक्त किया ! पहले श्रुति, स्मृति और तत्पश्चात पुराण। वेदों की रचना ईश्वर ने की होगी, लेकिन हमारे अक्षर का तो कोई अतीत ही नहीं। एक ॐ से सृष्टि का निर्माण हो जाता है। शब्दातीत अक्षर तो फिर सनातन ही हुआ।

वाणी में वाक्, शब्द अवाक !

अक्षर में बीज, बीजाक्षर मंत्र।

बगुलामुखी, त्रिपुरा-सुंदरी, सौन्दर्य-लहरी, कुंडलिनी माँ जगदम्बे। कहीं भैरव तंत्र तो कहीं जन जन का गायत्री-मंत्र। और सभी मंत्रों में श्रेष्ठ सद्गुरु का गुरु-मंत्र।।

कितनी संस्कृति, कितनी भाषाएँ, कितने ग्रंथ ! अक्षर ही अक्षर। सौरमंडल में व्याप्त शब्द और गुरुवाणी का सबद। हमने-आपने बोला, वह शब्द, और एक नन्हे अबोध बालक में, परोक्ष रूप से विराजमान परम पिता, लीला रूप धारण कर, कोरे कागद पर छोटी छोटी उँगलियों में कलम पकड़े, मुश्किल से अक्षर- ज्ञान प्राप्त करता हुआ, जगत को यह संदेश देता हुआ, कि ज्ञान की परिणति अज्ञान ही है।

आज वही अक्षर कागज़ कलम का मोहताज नहीं ! एक नया संसार आज हमारी मुट्ठी में है। यह गूगल की अक्षरों की दुनिया है। शब्दों का भंडार है उसके पास ! पर प्रज्ञा नहीं, वाक् नहीं ! यहाँ श्रुति, स्मृति नहीं, सिर्फ मेमोरी है। कोई किसी का गुरु नहीं, कोई किसी का शिष्य नहीं ! कोई रिसर्च नहीं, केवल गूगल सर्च और गूगल गुरु को दक्षिणा, डेटा रिचार्ज।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३६ ⇒ कंधा और बोझ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंधा और बोझ ।)

?अभी अभी # ९३६ ⇒ आलेख – कंधा और बोझ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाथ जहां से शुरू होते हैं, उसे कंधा कहते हैं जितने हाथ उतने ही कंधे।

अक्सर हम जिन हाथों को मजबूत करने की बात करते हैं, वे खुद मजबूत कंधों पर आश्रित होते हैं।

अगर कंधा कमजोर हुआ, तो हाथ किसी काम का नहीं। फिल्म नया दौर में दिलीप साहब हाथ बढ़ाने की बात करते हैं। साथी हाथ बढ़ाना साथी रे। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। यहां पूरा बोझ तो कंधों पर है, और श्रेय हाथ ले रहे हैं।

एक फिल्म आई थी जागृति। उसमें भी कुछ ऐसा ही गीत था। हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के। इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। यानी पूरा बोझ बेचारे मासूम बच्चों पर। क्या आपको उनके कंधों पर लदे भारी बस्ते का बोझ नजर नहीं आता। और पूरे देश का बोझ उन पर लादने चले हो। बच्चे की जान लोगे क्या।।

हम जब छोटे थे तो कुछ औरतों को सर पर टोकनी उठाए देखते थे। किसी में सब्जी तो किसी में बर्तन।

ये मोहल्ले में फेरी लगाती थी। बर्तन वाली औरतें घर के पुराने कपड़ों के एवज में नए घर गृहस्थी के बर्तन देती थी। एक तरह का एक्सचेंज ऑफर था यह।

कपड़े दे दो, बर्तन ले लो, पैसे दे दो, जूते ले लो, की तर्ज पर। याद कीजिए फिल्म, हम आपके हैं कौन।

ऐसी ही कोई कपड़े बर्तन वाली औरत राह चलते, हमें रोक लेती थी। बोझा जब जमीन पर होता है, तो उसे सर पर लादने के लिए किसी की मदद लेनी पड़ती है। जब वह हमसे मिन्नत करती, बेटा जरा हाथ लगा दो, बहुत भारी है, तो हम पहले आसपास देखते थे, लेकिन फिर अनिच्छा से ही सही, हाथ लगा ही देते थे। वाकई, बोझा बहुत भारी होता था। कुछ समय के लिए हम सोच में भी पड़ जाते थे, इतना वजन, यह औरत कैसे उठा लेती है, लेकिन फिर सजग हो, अपने रास्ते चल पड़ते थे। उसकी दुआ जरूर हमें सुनाई देती थी, जिसे हम भले ही अनदेखा कर देते थे, लेकिन मन में किसी को मदद की संतुष्टि का भाव फिर भी आ ही जाता था।।

किसके कंधों पर कितनी जिम्मेदारियों का और कितनी मजबूरियों का बोझ है, यह केवल वह ही जानता है। शरीर के बोझ से मन का बोझ अधिक भारी होता है, लेकिन आप मानें या ना मानें, वह बोझ भी यही कंधे ढोते रहते हैं।

किसी के झुके हुए कंधों से ही पता चल जाता है, यह बेचारा, काम के बोझ का मारा, कुछ लेते क्यों नहीं, हमदर्द का सिंकारा।

जब बच्चे थे, तो पिताजी के कंधे पर बैठकर घूमने जाते थे। बड़े खुश होते थे, हम कितने बड़े हो गए हैं। जब असल में बड़े हुए तो असलियत पता चली, हमारे कंधों पर कितना बोझ है।।

चलो रे, डोली उठाओ कहार, पीया मिलन की रुत आई। लेकिन आजकल कहां कहार भी डोली उठाते हैं। चार पहियों की चमचमाती कार से, ब्यूटी पार्लर से सज धजकर आई दुल्हन, विवाह मंडप में प्रवेश करती है। कंधों से अधिक, कानों पर डायमंड इयररिंग्स का बोझ।

जमाना कितना भी आगे बढ़ जाए, जब इंसान यह संसार छोड़ता है तो चार कंधों की अर्थी पर ही जाना पड़ता है। यानी जन्म से अंतिम समय तक कंधे का साथ नहीं छूटता। अर्थी का बोझ भी मजबूत कंधे ही उठा पाते हैं। हमने तो जिधर भी कंधा लगाया है, अर्थी उधर ही झुकी है। कहीं से लपककर मजबूत कंधे आते हैं, और अर्थी से अधिक हमें राहत महसूस होती है। ईश्वर ना करे, हमें कभी किसी को कंधा देना पड़े, बोझ के मारे, हमारा कंधा उतर भी सकता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१२ ☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख “क्या प्रॉब्लम है…?”। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१२ ☆

☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆

‘क्या प्रॉब्लम है’… जी हां! यह वह शाश्वत् प्रश्न है,जो अक्सर पूछा जाता है छोटों से; बराबर वालों से– परंतु आजकल तो ज़माना बदल गया है। अक्सर हर उम्र के लोग इन प्रश्नों के दायरे में आते हैं और हमारे बुज़ुर्ग माता-पिता तथा अन्य परिवारजन– सभी को स्पष्टीकरण देना पड़ता है। सोचिए! यदि रिश्ते में आपसे बहुत छोटी महिला यह प्रश्न पूछे,तो क्या आप सकते में नहीं आ जाएंगे? क्या होगी आपकी मन:स्थिति… जिसकी अपेक्षा आप उससे कर ही नहीं सकते। वह अनकही दास्तान आपकी तब समझ में तुरंत आ जाती है,जब चंद लम्हों बाद आपका अहं/ अस्तित्व पलभर में कांच के आईने की भांति चकनाचूर हो जाता है और उसके असंख्य टुकड़े आपको मुंह चिढ़ाते-से नज़र आते हैं। दूसरे शब्दों में आपको हक़ीक़त समझ में आ जाती है और आप तत्क्षण अचंभित रह जाते हैं यह जानकर कि कितनी कड़वाहट भरी हुई है सोमा के मन में– जब आपको मुजरिम की भांति कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और इल्ज़ामों की एक लंबी फेहरिस्त आपके हाथों में थमा दी जाती है। वह सोमा,जो आपको मान-सम्मान देती थी; सदैव आपकी तारीफ़ करती थी; जिसने इतने वर्ष एक छत के नीचे गुज़ारने के पश्चात् भी पलट कर कभी जवाब नहीं दिया था। वह तो सदैव परमात्मा का शुक्र अदा करती थी कि उसने उन्हें पुत्रवधु नहीं,बड़ी शालीन बेटी दी थी। परंतु जब विश्वास टूटता है; रिश्ते सहसा दरक़ते हैं तो बहुत तकलीफ़ होती है। हृदय कुलबुला उठता है,जैसे अनगिनत कीड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हों और वह प्रश्नों के भंवर से चाह कर भी ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाती।

‘आपको क्या प्रॉब्लम है?’ यदि बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ एकांत में समय गुज़ारना चाहते हैं; खाने के लिए नीचे नहीं आते तो…परंतु हम सबके लिए यह बंधन क्यों? वह वर्षों से अपने कौन-से दायित्व का वहन नहीं कर रही? आपके मेहमानों के आने पर क्या वह उनकी आवभगत में वह कमी रखती है,जबकि वे कितने-कितने दिन तक यहाँ डेरा डाले रहते हैं? क्या उसने कभी आपका तिरस्कार किया है? आखिर आप लोग चाहते क्या हैं? क्या वह इस घर से चली जाए अपने बच्चों को लेकर और आपका बेटा वह सब अनचाहा करता रहे? हैरान हूं यह देखकर कि उसे दूध का धुला समझ उसके बारे में अब भी अनेक कसीदे गढ़े जाते हैं।

वह अपराधिनी-सम करबद्ध प्रार्थना करती रही थी कि उसने ग़लती की है और वह मुजरिम है,क्योंकि उसने बच्चों को खाने के लिए नीचे आने को कहा है। वह सौगंध लेती है कि  भविष्य में वह उसके बच्चों से न कोई संबंध रखेगी; न ही किसी से कोई अपेक्षा रखेगी। तुम मस्त रहो अपनी दुनिया में… तुम्हारा घर है। हमारा क्या है,चंद दिन के मेहमान हैं। वह क्षमा-याचना कर रही थी और सोमा एक पुलिस अफसर की भांति उस पर प्रश्नों की बौछार कर रही थी।

जब जिह्वा साथ नहीं देती,वाणी मूक हो जाती है तो अजस्र आंसुओं का सैलाब बह निकलता है और इंसान किंकर्त्तव्य- विमूढ़ स्थिति में कोई भी निर्णय नहीं ले पाता। उस स्थिति में उसके मन में केवल एक ही इच्छा होती है कि ‘आ! बसा लें अपना अलग आशियां… जहां स्वतंत्रता हो; मानसिक प्रदूषण न हो; ‘क्या और क्यों’ के प्रश्न उन पर न दाग़े जाएं और वे उन्मुक्त भाव से सुक़ून से अपनी ज़िंदगी बसर कर सकें। इन परिस्थितियों में इंसान सीधा आकाश से अर्श से फ़र्श पर आन पड़ता है; जब उसे मालूम होता है कि इस करिश्में की सूत्रधार हैं कामवाली बाईएं–जो बहुत चतुर, चालाक व चालबाज़ होती हैं। वे मालिक-मालकिन को बख़ूबी रिझाना जानती हैं और बच्चों को वे मीठी-मीठी बातों से खूब बहलाती हैं। परंतु घर के बुज़ुर्गों व अन्य लोगों से लट्ठमार अंदाज़ से बात करती हैं,जैसे वे मुजरिम हों। इस संदर्भ में दो प्रश्न उठते हैं मन में कि वे उन्हें घर से निकालना चाहती हैं या घर की मालकिन उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहती है? छुरी हमेशा खरबूज़े पर ही पड़ती है,चाहे किसी ओर से पड़े और बलि का बकरा भी सदैव घर के बुज़ुर्गों को ही बनना पड़ता है।

वैसे आजकल तो बाईएं ऐसे घरों में काम करने को तैयार भी नहीं होती,जहां परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य लोग भी रहते हों। परिवार की परिभाषा वे अच्छी तरह से जानती हैं… हम दो और हमारे दो,क्योंकि आजकल पति-पत्नी दोनों अक्सर नौकरी करते हैं। उनके घर से जाने के पश्चात् वे दिनभर अलग-अलग पोशाकों में सज-संवर कर स्वयं को आईने में निहारती हैं। यदि बच्चे छोटे हों, तो सोने पर सुहागा… उन्हें डाँट-डपट कर या नशीली दवा देकर सुला दिया जाता है और वे स्वतंत्र होती हैं मनचाहा करने के लिए। फिर वे क्यों चाहेंगी कि कोई कबाब में हड्डी बन कर वहां रहे और उनकी दिनचर्या में हस्तक्षेप करे? इस प्रकार उनकी आज़ादी में खलल पड़ता है। इसलिए भी वे बड़े बुज़ुर्गों से खफ़ा रहती हैं। इतना ही नहीं,वे उनसे दुर्व्यवहार भी करती हैं,जैसे मालिक नौकर के साथ करता है। जब उन्हें इससे भी उन्हें संतोष नहीं होता; वे अकारण इल्ज़ाम लगाकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर देती है और घर की मालकिन को तो हर कीमत पर उनकी दरक़ार रहती है,क्योंकि बाई के न रहने पर घर में मातम-सा पसर जाता है। उस दारुण स्थिति में घर की मालकिन भूखी शेरनी की भांति घर के बुज़ुर्गों पर झपट पड़ती है,जो अपनी अस्मत को ताक़ पर रख कर वहां रहते हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबीपन का एहसास उन्हें नासूर-सम हर पल सालता रहता है। उस घर का हर प्राणी नदी के द्वीप की भांति अपना-अपना जीवन ढोता है। वे अपने आत्मजों के साथ नदी के दो किनारों की भांति कभी मिल नहीं सकते। वे उनकी जली-कटी सहन करने को बाध्य होते हैं और सब कुछ देखकर आंखें मूँदना उनकी नियति बन जाती है। वे हर पल व्यंग्य-बाणों के प्रहार सहते हुए अपने दिन काटने को विवश होते हैं। उनकी यातना अंतहीन होती है,क्योंकि वहाँ पसरा सन्नाटा उनके अंतर्मन को झिंझोड़ता व कचोटता है। दिनभर उनसे बतियाने वाला कोई नहीं होता। वे बंद दरवाज़े व शून्य छतों को निहारते रहते हैं। बच्चे भी उन अभागों की ओर रुख नहीं करते और वे अपने माता-पिता से अधिक स्नेह नैनी व कामवाली बाई से करते हैं।

‘हाँ! प्रॉब्लम क्या है’ ये शब्द बार-बार उनके मनोमस्तिष्क पर हथौड़े की भांति का प्रहार करते हैं और वे हर पल स्वयं को अपराधी की भांति दयनीय दशा में पाते हैं। परंतु वे आजीवन इस तथ्य से अवगत नहीं हो पाते कि उन्हें किस जुर्म की सज़ा दी जा रही है? उनकी दशा तो उस नारी की भांति होती है,जिसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है; जो उसने किया ही नहीं। उन्हें तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान ही नहीं किया जाता। कई बार ‘क्यों का मतलब’ शब्द उन्हें हांट करते हैं अर्थात् बाई का ऐसा उत्तर देना…क्या कहेंगे आप? सो! उनकी मन:स्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। सो! चिंतन-मनन कीजिए कि आगामी पीढ़ी का भविष्य क्या होगा?

वैसे इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है,क्योंकि जैसा वह करता है,वही लौटकर उसके पास आता है। लोग चिंतित रहते हैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में और यह सोचकर वे हैरान-परेशान रहते हैं। आइए! यह समझने का प्रयास करें कि प्रॉब्लम क्या है और क्यों है? शायद! प्रॉब्लम आप स्वयं हैं और आपके लिए उस स्थान को त्याग देना ही उस भीषण समस्या का समाधान है। सो! मोह-ममता को त्याग कर अपनी राह पर चल दीजिए और उनके सुक़ून में ख़लल मत डालिए। ‘जीओ और जीने दो’, की अवधारणा पर विश्वास रखते हुए दूसरों को भी अमनोचैन की ज़िंदगी बसर करने का अवसर प्रदान कीजिए। उस स्थिति में आप निश्चिंत होकर जी सकेंगे और ‘क्या-क्यों’ की चिंता स्वत: समाप्त हो जाएगी। फलत: इस दिशा में न चिंता होगी; न ही चिंतन की आवश्यकता होगी।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३५ ⇒ उधार प्रेम की कैंची है ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उधार प्रेम की कैंची है !।)

?अभी अभी # ९३५ ⇒ आलेख – उधार प्रेम की कैंची है ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

आज नक़द, कल उधार और उधार प्रेम की कैंची है, लिखने वाले दुकानदार, कितना नकद से प्रेम करते हैं, और कितना भगवान समान ग्राहक से, यह छुपा नहीं है ! मैंने हमेशा नक़द ही सौदा लिया है, लेकिन किसी दुकानदार ने प्रेम के वशीभूत हो, मुझे गले नहीं लगाया। ऐसा कई बार हुआ है कि मैं नकद पैसे लिए, सौदे के लिए खड़ा रहा, और एक बहनजी उधारी का सामान और अपने सुंदर से बच्चे के लिए मुफ़्त में एक्लेयर्स ले, रवाना हो गई और दुकानदार मेरी उपेक्षा करते हुए उधारी के सामान को डायरी में नोट करता रहा। बाबूजी ! उधारी का मामला है, बाद में भूल जाता हूँ। यानी उधार की कैंची मुझ पर, और प्रेम बहनजी के लाड़ले पर।

यूँ तो नकद का मतलब रोकड़ा ही होता है, लेकिन जब से नोटबन्दी के पश्चात कैशलेस का चक्कर चला है, सरकारी भीम और paytm, कैश काउंटर पर विराजमान हो गए हैं। न सड़े गले, फटे-टूटे नकली नोटों की चिंता, न चोर-डाकुओं का डर ! रात को कैश घर ले जाते समय का खतरा, और घर पर भी भारी भरकम नकदी रखने के खतरे से तो बचे ही, ग्राहक को भी डिस्काउंट का फ़ायदा। हुआ न एक पंथ दस काज।।

लेकिन जब कोई दोस्त या रिश्तेदार उधार माँगता है तो वह यह नहीं कहता कि भैया मेरे खाते में हज़ार-पांच सौ जमा कर देना। बाकायदा भाव-ताव होता है। पाँच हज़ार की माँग नीचे आते आते पाँच सौ तक आ जाती है और वह आप पर एक तरह से अहसान जताता हुआ, उक्त राशि स्वीकार कर ही लेता है। मुझे मालूम था, आप इससे ज़्यादा नहीं दे पाओगे। अब किसी और के आगे हाथ पसारने पड़ेंगे।

मैंने किसी बैंक में उधार प्रेम की कैंची है, जैसी तख्ती लगी नहीं देखी ! आकर्षक दरों पर ऋण लीजिये के अंतर्गत, अगर बीवी को छोड़ दिया जाए, तो घर की हर चल, अचल सम्पत्ति पर प्रेम से उधार मिल सकता है। घर से लगाकर फ्रिज, टीवी, गीज़र, फर्नीचर और मोबाइल से ऑटो-मोबाइल तक ! पत्नी चल सम्पत्ति है या अचल, यह तो अटलजी भी नहीं जान पाए।।

कैंची से कपड़े कटते हैं, पार्लर में बाल कटते हैं, जिनकी ज़बान कैंची जैसी चलती है, वे सामने वाले की बात तक काट देते हैं, लेकिन उधार एक ऐसी कैंची है जो प्रेम के रिश्ते को काटती है।

पैसा रिश्ते को जोड़ता है, फिर चाहे वह नकद का हो, या उधारी का। कहने वालों का क्या, वे तो दहेज को भी प्रेम की कैंची कहने लग गए। अंगूर खट्टे हों, तो आदर्शवाद बुरा नहीं।

मैं न उधार देता हूँ, न लेता हूँ। फिर भी माथे पर इतना कर्ज़ है कि कितने ही जन्म ले लूँ, उतार नहीं पाऊँगा। माटी का कर्ज़, माता पिता, गुरुजन, समाज, परिजन, हितैषी और सद्गुरु के ऋण से कौन उऋण हो पाया है। यह ऋण उधार नहीं, प्रेम की कैंची नहीं, प्रेम का सागर है। लेकिन हमारी मज़बूरी यही कि हमारे पास सिर्फ़ एक गागर है।

प्रेम की यह गागर कभी खाली न हो। प्रेम के रिश्तों को भुनाया नहीं जाता, और अधिक मजबूत किया जाता है। किसी पर अहसान जताया नहीं जाता, अहसान चुकाया जाता है। उस ऊपर वाले के ही इतने कर्ज़ हैं, इतने अहसान हैं, लेकिन वह कोई साहूकार नहीं, सिर्फ मेहरबान है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(ई-अभिव्यक्ति में बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी का स्वागत.  गद्य एवं छंद विधा में अभिरुचि के साथ ही महिला उद्यमी। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लेख सपने बड़े देखें।)

? आलेख – सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

हम हमारे जीवन की जो अवधारणा रखते हैं, उसका हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव होता है l यदि जीवन की अवधारणा बड़ी है, तो हमारे सपने बड़े होंगे l

सोलह वर्ष की उम्र में व्यक्ति जिंदगी जीने के लिये जो सपने देखता है उन्हें पूरा करने की लिये वो जी जान लगा देता है l इसीलिये कहते भी हैं कि युवा पीढ़ी का रहन सहन, उनकी भाषा, उनके अधरों पर गाने सुनकर उस राष्ट्र का भविष्य बताया जा सकता है l जीने के लिये यदि विशाल और सृजनशील सपने देखें तो हम स्वयं का, समाज का और राष्ट्र का नक्शा बदल सकते हैं l

बाबा आमटे के अनुसार ऐसे सृजनशील व साहसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो जो अच्छी योजनाएं बनाये और उस पर काम भी करे l

चादर देखकर पैर पसारो इस कहावत को भूल कर पैर कितने पसारने हैं उसके हिसाब से चादर का निर्माण करना जरूरी है l

आज की दौर में नई राहें, नये सपने पूरे करने हेतु संघर्ष करना पड़े तो करो l बिपदाओं का सामना कर आगे बढ़ो l

अपयश अपराध नहीं बल्कि आगे जाने की सीढ़ी है l हमारा लक्ष्य बड़े सपने देखना होना चाहिए l उन सपनों को पूरा करने की जिद होनी चाहिए l उन सपनों को कैसे साकार करें इसका चिंतन होना चाहिए l

जीजा माता की प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिर्फ सोलह वर्ष की आयु में हिन्दवी स्वराजय का सपना देखा था और उसे साकार भी किया l स्वातंत्र वीर विनायक दामोदर सावरकर जी ने सोलह वर्ष की उम्र में अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करने का इतिहास लिख दिया l

कहने का तातपर्य है कि ऐसे बड़े सपने जीवन की हर क्षेत्र में देखे जाते हैं और उन्हें पूरा करने हेतु अथक प्रयास भी करने होते हैं l एक समय कि बात हैं कि एक पेट्रोल पम्प पर एक लड़का पेट्रोल भरने का काम करता था l एक दिन किसी ने उससे कहा कि पूरी जिंदगी ऐसे पेट्रोल भरता रहेगा कि कोई सपने भी देखें हैं तूने जिंदगी में?

उसने कहा पेट्रोल केमिकल क्षेत्र में मेरी मालिकी की एक बड़ी कम्पनी खोलूंगा ऐसा मेरा सपना है l वहाँ खड़े लोग उसपर हसे l इतना बड़ा सपना?

लोगों ने मजाक उड़ाया कि पहले पेट्रोल तो भर ले….

और वह सपने देखने वाला लड़का और कोई नहीं बल्कि धीरुभाई अम्बानी था जिन्होंने सिद्ध किया कि सपने बड़े देखना चाहिए और उन्हें पूरा करने शिद्द्त से जोर लगा देना चाहिए l

हम सभी अपने कार्य क्षेत्र में ऐसे बड़े सपने देख, उन्हें पूरा कर अपने जीवन को एक नया रूप नया आकार दे सकते हैं l इस बात का मुझे भी स्वानुभव है और पूरा विश्वास भी है कि बड़े सपने देखना जरूरी है और वो पूरे भी होते हैंl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०२ ☆ आलेख – “डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०२ ☆

?  आलेख – डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।

उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे,  सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई  रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।

उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद “मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना” आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति “विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा” विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है।

उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास  मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है “प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है” जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।

डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है ।

पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।

उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।

धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।

एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला, रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था।

पुष्पा जी ने लिखा है, “मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं – महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है…

तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य  स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना फागुन की चिट्ठी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी

मेरे प्रकृति-मित्रों,

मैं फागुन हूँ। हर साल चुपचाप तुम्हारे आँगन में उतर आता हूँ—कभी हल्की हवा बनकर, कभी फूलों की खुशबू बनकर, कभी किसी पेड़ की नई कोपल में छिपकर। जब तुम Holi के रंगों में भीगते हो, तब मुझे सबसे ज़्यादा आनंद होता है।

रंग उड़ते हैं, हँसी गूँजती है, और मन जैसे थोड़ी देर के लिए फिर से बच्चा हो जाता है।

पर इस बार मैं तुमसे एक छोटी-सी विनती करना चाहता हूँ।

जब तुम अपने प्रियजनों को गुलाल लगाओ, तो एक चुटकी गुलाल अपने आँगन के किसी पौधे के नाम भी रख देना। उस तुलसी के पास, उस छोटे से नीम या अमरूद के पेड़ के पास, या उस बेल के पास जो चुपचाप तुम्हारी दीवार थामे खड़ी है।

हल्के से उसके तने को छूकर कहना—

“तुम भी हमारे उत्सव के साथी हो।”

क्योंकि पौधे केवल हरियाली नहीं होते।

वे हमारी साँसों की शांति हैं,

हमारी थकान की छाया हैं,

और हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।

हमारी परंपराओं में उन्हें कभी देवता माना गया, कभी पूर्वजों का रूप। शायद इसलिए कि वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, हमें जीवन देते रहते हैं।

अगर इस होली तुम एक चुटकी गुलाल पौधों को भी लगा दोगे, तो यह केवल एक प्रतीक नहीं होगा—यह प्रकृति से दोस्ती का एक छोटा-सा वचन होगा।

और तब शायद तुम्हें महसूस होगा कि हवा भी थोड़ी और मधुर हो गई है,

पत्ते भी हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे हैं,

और तुम्हारे आँगन में खड़ा हर पेड़ मन ही मन कह रहा है—

“अब सच में फागुन आया है।”

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३४ ⇒ आत्म-स्वीकृति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म-स्वीकृति।)

?अभी अभी # ९३४ ⇒ आलेख – आत्म-स्वीकृति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आत्म, आत्मा का स्थूल स्वरूप है। आत्म-कथा में आत्मा को छोड़कर स्थूल देह का महिमामंडन किया जाता है। केवल स्वामी परमहँस योगानंद की ” योगी की आत्म-कथा (An Autography of a Yogi) ही एक ऐसी आत्मकथा है जिसमें जीवात्मा के साथ परमात्मा का भी विवेचन किया गया है, स्थूल के साथ सूक्ष्म शरीर की व्याख्या की गई है। वहाँ मैं से अधिक आत्म-तत्व की चर्चा की गई है।

मोहनदास करमचंद गाँधी की आत्म-कथा में हम ऐसी आत्म-स्वीकृति पाते हैं, जिन्हें आप स्वीकारोक्ति अथवा कॉन्फेशन कह सकते हैं। अपने गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन और अवगुणों पर पर्दा ही अधिकतर आत्म-कथा की विषय- वस्तु होती है। ग़रीबी और अभाव का वर्णन इफ़राती से किया जाता है। उपलब्धियों का बखान भी नई नवेली दुल्हन के समान लजाकर किया जाता है। महात्मा-गाँधी की आत्म-कथा का शीर्षक, सत्य के प्रयोग है। जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक My Confessions with Truth है। सत्य कोई प्रयोग की वस्तु नहीं, आचरण में उतारने वाली नैतिकता है। आप कुछ भी सोचें करें, नैतिकता की मर्यादा में रहकर करें। प्रयोग का प्रदर्शन अथवा स्वीकारोक्ति नैतिकता के दायरे में नहीं आती। शायद इसीलिए बापू की आत्म-कथा आज भी उनके लिए आत्म-घाती ही सिद्ध हो रही है। कहाँ का महात्मा, राष्ट्रपिता, लंपट कहीं का ! जैसे विशेषण भी उपहार-स्वरूप अनादर सहित प्रेषित किये जाते रहे हैं।।

जब हम आत्म-स्वीकृति की बात करते हैं, तो उसमें आत्म-मंथन भी समाहित है। गुण-दोषों का अवलोकन, अन्तरावलोकन का विषय है, जिसके आधार पर आत्म-शुद्धि संभव है। यह चित्त-शुद्धि का एक सूक्ष्म प्रयास है। आत्म-बल इसी चित्त-शुद्धि की देन है।

आत्म-बल, आत्म-विश्वास का परिष्कृत स्वरूप है, जहाँ स्वयं से अधिक उस सर्व-शक्तिमान पर भरोसा किया जाता है। यह आस्था, विश्वास और समर्पण की वह चरम अवस्था है, जिसे नारद-भक्ति-सूत्र में आत्म-निवेदन की संज्ञा दी गई है।।

आत्म-स्वीकृति स्वयं को, अपने गुण-दोषों सहित पहचानने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। ईश्वर तो हमें हमारे गुण-दोषों सहित स्वीकार कर लेता है लेकिन संसार दोषमुक्त नहीं, दोषयुक्त है। वह आपके दोषों को स्वीकार नहीं करता, केवल गुणों का गाहक है। फलस्वरूप हम अपनी बुराइयों और अवगुणों को छुपा लेते हैं और अच्छाइयों को जग-जाहिर कर देते हैं। और इससे ही हमें मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और प्रशंसा हासिल होती है। यह सतही अच्छाई ही संसार है, जो आपकी नित्य शुद्ध, बुद्ध आत्मा से कोसों दूर है।

आत्म-स्वीकृति मान्यता प्राप्त धर्म नहीं, सहज, सरल अध्यात्म है, चित्त शुद्धि का एकमात्र ऐसा उपाय है, जहाँ निंदा-स्तुति, छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं। केवल निष्ठा, प्रेम और समर्पण है, जिसके बिना स्वयं का, एवं जगत का वास्तविक कल्याण संभव नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रंगोत्सव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – रंगोत्सव ? ?

होली अर्थात विभिन्न रंगों का साथ आना। साथ आना, एकात्म होना। रंग लगाना अर्थात अपने रंग या अपनी सोच अथवा विचार में किसी को रँगना। विभिन्न रंगों से रँगा व्यक्ति जानता है कि उसका विचार ही अंतिम नहीं है। रंग लगानेवाला स्वयं भी सामासिकता और एकात्मता के रंग में रँगता चला जाता है। रँगना भी ऐसा कि रँगा सियार भी हृदय परिवर्तन के लिए विवश हो जाए। अपनी एक कविता स्मरण हो आती है,

सारे विरोध उनके तिरोहित हुए,

भाव मेरे मन के पुरोहित हुए,

मतभेदों की समिधा,

संवाद के यज्ञ में,

सद्भाव के घृत से,

सत्य के पावक में होम हुई,

आर-पार अब

एक ही परिदृश्य बसता है,

मेरे मन के भावों का

उनके ह्रदय में,

उनके विचार का

मेरे मानसपटल पर

प्रतिबिंब दिखता है…!

होली या फाग हमारी सामासिकता का इंद्रधनुषी प्रतीक है। यही कारण है कि होली क्षमापना का भी पर्व है। क्षमापना अर्थात वर्षभर की ईर्ष्या मत्सर, शत्रुता को भूलकर सहयोग- समन्वय का नया पर्व आरंभ करना।

जाने-अनजाने विगत वर्षभर में किसी कृत्य से किसी का मन दुखा हो तो हृदय से क्षमायाचना। आइए, शेष जीवन में हिल-मिलकर अशेष रंगों का आनंद उठाएँ, होली मनाएँ।

शुभ धूलिवंदन।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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