हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विशेष – ओपन डब्बा लाइब्रेरी: एक अनूठी पहल ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विशेष ☆

(पुस्तक मित्र लाइब्रेरी – एक किताब रखो – एक ले जाओ – पढो पढाओ – सौजन्य – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव)

?  आलेख – ओपन डब्बा लाइब्रेरी: एक अनूठी पहल ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भोपाल के मीनाल रेजीडेंसी में एक अनोखी और प्रेरणादायक पहल ने जन्म लिया है, जिसका नाम है “ओपन डब्बा लाइब्रेरी”। कालोनी में प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी जब 2021 में शिफ्ट हुए, तो उन्होंने अपनी ढेर सारी किताबों के साथ तथा उनके साहित्य को कालोनी के साहित्य में अभिरुचि रखने वाले लोगों के साथ साझा किया।

उनकी इसी आकांक्षा की पूर्ति करता यह पुस्तकालय पारंपरिक पुस्तकालयों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि यह न तो किसी बड़े भवन में स्थित है और न ही इसमें कोई ताला-चाबी है। न ही किसी लाइब्रेरियन से किताबें इशू करवानी पड़ती हैं। यह एक साधारण-सा बुक शेल्फ है, जो श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव के घर की बाउंड्री वाल पर लगा हुआ है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 24 घंटे खुला रहता है और सड़क से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति कभी भी यहां से किताब ले सकता है या अपनी किताब इसमें रख सकता है। इस पुस्तक मित्र लाइब्रेरी की शुरुआत श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ने की है। इस छोटे से बुक शेल्फ में शुरुआत में लगभग 4000 रुपये मूल्य की पुस्तकें रखी गईं, जो विभिन्न लेखकों और प्रकाशकों की ओर से संग्रहित की गई थीं। इनमें प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध, श्री सुरेश पटवा, स्वयं विवेक रंजन श्रीवास्तव और ज्ञानगंगा प्रकाशन की किताबें शामिल हैं। ये पुस्तकें साहित्य, ज्ञान और मनोरंजन का खजाना लेकर आई हैं, जो हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए उपयोगी हैं।इस लाइब्रेरी का मूल मंत्र है- “एक किताब रखो, एक ले जाओ”। यह सिद्धांत न केवल किताबों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है, बल्कि “पढ़ो और पढ़ाओ” के सुविचार को भी बढ़ावा देता है। आज के दौर में, जब डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के कारण किताबों की पठनीयता में कमी देखी जा रही है, यह पहल एक ताजी हवा के झोंके की तरह है। लोग अक्सर अपने घरों में पढ़ी हुई किताबों और पत्रिकाओं को इधर-उधर रख देते हैं या उन्हें बेकार समझकर रद्दी में बेच देते हैं या फेंक देते हैं। ऐसे में ओपन डब्बा लाइब्रेरी इन किताबों को नया जीवन दे रही है, जिससे वे दूसरों के लिए उपयोगी बन रही हैं।इस अभियान की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मीनाल रेजीडेंसी के निवासी और आसपास के लोग इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं। कॉलोनी में किताबों के प्रति उत्सुकता और उत्साह साफ देखा जा सकता है। लोग न केवल किताबें लेने आते हैं, बल्कि अपनी पढ़ी हुई किताबें भी इस शेल्फ में रखकर दूसरों के साथ साझा कर रहे हैं। यह एक ऐसा चक्र बन गया है, जो ज्ञान और साहित्य के प्रेम को बढ़ावा दे रहा है।

सामने ही पानी की टंकी के निकट सिक्यूरिटी गार्ड, मिनाल रेजीडेंसी के सफाई , जल , कर्मचारियों का जमघट रहता है, वे इस पुस्तकालय का खूब लाभ उठाते दिखते हैं। छुट्टियों में जो मेहमान मिनाल रेजीडेंसी में आते हैं, और घूमने निकलते हैं वे इस अनूठे प्रयोग का लाभ तो लेते ही हैं ,फोटो लिए बगैर नहीं रहते। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव का यह प्रयास समाज के लिए एक मिसाल बन गया है। इस छोटी-सी पहल ने न केवल किताबों को घरों की अलमारियों से बाहर निकाला है, बल्कि लोगों को पढ़ने और साझा करने की आदत को भी पुनर्जनन दिया है। इस डब्बा लाइब्रेरी की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है और यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में ऐसी और भी पहलें देखने को मिलेंगी, जो समाज में ज्ञान के प्रकाश को फैलाने में सहायक होंगी।

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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५४ ⇒ || रे व ड़ी || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रे व ड़ी ||“।)

?अभी अभी # १०५४ ⇒ आलेख – || रे व ड़ी || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

SWEET MEAT

जो बांटा जाता है, वह प्रसाद कहलाता है। जिसका अपने इष्ट को भोग लगाया जाए, वह प्रसाद बन जाता है। प्रसाद का श्रीगणेश अक्सर लड्डू से ही किया जाता है क्योंकि गणेश जी मोदक प्रिय हैं। सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन बजरंग बली के मंदिर में चने चिरोंजी का प्रसाद चढ़ाया जाता है। थोड़ा मीठा और थोड़ा पौष्टिक हो जाए। भुने हुए चने और चिरोंजी, वाह क्या जोड़ी है प्रसाद की।

आरती हो अथवा कथा, प्रसाद की यही कथा ! कहीं रवे का हलवा, तो कहीं पिसे धनिये की पंजेरी, जिसमें शकर की मिठास भी शामिल होती है। पांच तरह का अमृत, जिसे हथेली में ग्रहण किया जाता है, पंचामृत कहलाता है। दूध, घी, दही, शहद और शक्कर। इसके अलावा अगर आपने कोई संकल्प लिया हो अथवा मन्नत मांगी हो, तो सवा रुपए से लगाकर सवा मनी तक की लिमिट होती है प्रसाद की। प्रसाद बांटना और ग्रहण करना पुण्य का काम होता है। ।

हमें अभी तक इसमें कहीं रेवड़ी यानी sweetmeat, नजर नहीं आई। आखिर क्या है यह रेवड़ी, जो इतनी मशहूर भी है और बदनाम भी। आइए, थोड़ा रेवड़ी चिंतन करें।

तिल गुड़ का जीवन में बहुत महत्व है। एक पर्व आता है, मकर सक्रांति, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर जाता है। आप चाहे पतंग उड़ाएं, अथवा किसी की पतंग काटें, लेकिन तिल गुड़ खाएं जरूर। मीठा गुड़ भी होता है और शकर भी। तिल और गुड़ के लड्डू भी बनते हैं और गजक भी। जैसे जैसे सर्दी बढ़ती जाती है, गजक की मांग बढ़ती जाती है। बस, रेवड़ी भी और कुछ नहीं, तिल गुड़ के लड्डू अथवा गजक का बोनसाई स्वरूप ही है। गुड़ अथवा शकर की गोली और उस पर तिल्ली का लेप। बस, यही तो है हमारी रेवड़ी जो अब बंटने के लिए तैयार है। ।

किसी भी प्रसाद में रेवड़ी भी, अन्य प्रसाद के साथ शामिल भी कर ली जाती है, अथवा रेवड़ी का प्रसाद का स्वतंत्र प्रभार भी होता है। महिलाओं में पहले शुभ अवसरों पर, सामूहिक रूप से गीत गाया जाता था, जिसके पश्चात शकर के बतासों का वितरण किया जाता था। हमारे यहां इन गीत वाले बताशों का एक कांच की बरनी में संग्रह किया जाता था, जो हम बच्चों के लिए चॉकलेट का काम भी करती थी और घर में शकर के अभाव में चाय में शकर का भी करती थी। इसी तरह प्रसाद के रूप में एकत्रित रेवडियों का भी संग्रह किया जाता था। रेवड़ी का स्वाद, खुद खाओ, खुद जान जाओ।

रेवड़ी में कुछ तो ऐसी खूबी है जो यह केवल अपनों अपनों में ही बांटी जाती है। महाराज धृतराष्ट्र को भी जब सत्ता रूपी रेवड़ियों का बंटवारा करना पड़ा, तो उन्हें केवल अपने सौ कौरव पुत्र ही याद आए।

कौन जानता था कि अपने अपनों को रेवड़ी बांटने के कारण महाभारत भी हो सकता था। ना रेवड़ियां बंटती, और ना महाभारत होता। ।

जब रेवड़ियों को लेकर बंदर बांट और लूटमार मचने लगे तो बेहतर है, रेवड़ियां बांटी ही ना जाएं। लेकिन भक्तों में तो तब तक रेवड़ियां बंटती रहेंगी, जब तक भगवान है, पूजा है, आरती है, और प्रसाद है। पंडित जी बांटें रेवड़ी, अपनों अपनों को दें। बच्चा लोग, रेवड़ी का प्रसाद खतम, अब कल आना ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३१ ☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द की इंतहा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – कब रे मिलोगे राम / स्वर/ प्रस्तुति – योगाश्रम धाम भिवानी, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३१ ☆

☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो/ जिन्हें मिल गया है दोबारा ना मिले’ बहुत मार्मिक उद्गार, क्योंकि दर्द हमसफ़र है; सच्चा जीवन-साथी है; जिसका आदि-अंत नहीं। ‘दु:ख तो अपना साथी है’ गीत की ये पंक्तियां मानव में आस्था व विश्वास जगाती हैं; मन को ऊर्जस्वित व संचेतन करती है। वैसे तो रात्रि के पश्चात् भोर, अमावस्या के पश्चात् पूर्णिमा व दु:ख के पश्चात् सुख का आना निश्चित है; अवश्यंभावी है। सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं और एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है।

समय निरंतर अबाध गति से चलता रहता है; कभी रुकता नहीं। सो! जो आया है अवश्य जाएगा। इसलिए ऐ मानव! तू किसी के आने की ख़ुशी व जाने का मलाल मत कर। ‘कर्म-गति अति न्यारी/ यह टारे नहीं टरी।’ इसके मर्म को आज तक कोई नहीं जान पाया। परंतु यह तो निश्चित् है कि ‘जैसा कर्म करता, वैसा ही फल पाता इंसान’ के माध्यम से मानव को सदैव सत्कर्म करने की सीख दी गयी है।

अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु भविष्य सदैव वर्तमान के रूप में दस्तक देता है। वर्तमान ही शाश्वत् सत्य है, शिव है और सुंदर है। मानव को सदैव वर्तमान के महत्व को स्वीकारते हुए हर पल को ख़ुशी से जीना चाहिए। चारवॉक दर्शन में भी ‘खाओ-पीओ, मौज उड़ाओ’ का संदेश निहित है। आज की युवा पीढ़ी भी इसका अनुसरण कर रही है। शायद! इसलिए ‘वे यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखते हैं और ‘लिव इन’ व ‘मी टू’ की अवधारणा के पक्षधर हैं। वे पुरातन जीवन मूल्यों को नकार चुके हैं, क्योंकि उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी है। वे अहंनिष्ठ क्षणवादी सदैव हर पल को जीते हैं। संबंध-सरोकारों का उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं तथा रिश्तों की अहमियत को भी वे नकारने लगे हैं, जिसका प्रतिफलन पति-पत्नी में बढ़ते अजनबीपन के एहसास के परिणाम-स्वरूप तलाक़ों की बेतहाशा बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उनके आत्मज भुगत रहे हैं। वे मोबाइल व मीडिया में आकण्ठ डूबे रहते हैं और नशे की लत के शिकार हो रहे हैं जिसका विकराल रूप मूल्यों के विघटन व सामाजिक विसंगतियों के रूप में हमारे समक्ष है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपहरण, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या के हादसों में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। चहुंओर संशय व अविश्वास का वातावरण व्याप्त है, जिसके कारण इंसान पल भर के लिए भी सुक़ून की साँस नहीं ले पाता।

दूसरी ओर अमीर-गरीब की खाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है और हमारा देश इंडिया व भारत दो रूपों में विभाजित परिलक्षित हो रहा है। एक ओर मज़दूर, किसान व मध्यमवर्गीय लोग, जो दिन-भर परिश्रम करने के पश्चात् दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते और आकाश की खुली छत के नीचे अपना जीवन बसर करने को विवश हैं। दूसरी ओर बाल श्रमिक शोषण व बाल यौन उत्पीड़न का घिनौना रूप हमारे समक्ष है। एक घंटे में पांच बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं; बहुत भयावह व चिंतनीय स्थिति है। दूसरी ओर धनी लोग और अधिक धनी होते जा रहे हैं, जिनके पास असंख्य सुख-सुविधाएं हैं और वे निष्ठुर, संवेदनहीन, आत्मकेंद्रित व निपट स्वार्थी हैं। शायद! इसी कारण गरीब लोग दर्द को आधार-कार्ड से जोड़ने की ग़ुहार लगाते हैं, ताकि छल-कपट से लोग पुन: वे सुविधाएं प्राप्त न कर सके। उनके ज़हन में यह भाव दस्तक देता है कि यदि ऐसा हो जायेगा तो उन्हें जीवन में पुन: अभाव व असहनीय दर्द सहन नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि वे अपने हिस्से का दर्द झेल चुके हैं। परंतु इस संसार में यह नियम लागू नहीं होता। भाग्य का लिखा निश्चित् होता है, अटूट होता है, कभी बदलता नहीं। सो! उन्हें इस तथ्य को सहर्ष क़ुबूल कर लेना चाहिए कि कृत-कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर तक मानव के साथ-साथ चलता है और उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए सुंदर भविष्य की प्राप्ति हेतू सदैव अच्छे कर्म करें ताकि भविष्य उज्ज्वल व मंगलमय हो सके।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १८ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # १८ ☆

? कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

1 कोरी = 2 अधियो = 4 पयालो = 8 ढाबू = 16 ढिगलो = 24 दोकड़ो = 48 त्राम्बियो

जी हाँ ये सारी कच्छ रियासत की अपनी स्वयं की मुद्राएं थींl ये सोने, चांदी और ताँबे के सिक्कों से बनी होती थींl इन सभी सिक्कों के एक तरफ कच्छ के राजा का नाम देवनागरी लिपी में और राजघरानों के चिन्ह त्रिशूल, कटार और अर्धचंद्र उकेरे होते थेl

कच्छ का मांडवी तट जो अरब सागर का एक तट था यहाँ चौरासी देश की ध्वजाएं लहराती थींl इसी कारण से इसे चौरासी झंडो का बंदरगाह भी कहते थेl ये झंडे कच्छ के व्यापारिक साम्राज्य को दर्शाते थेl यहाँ हाथी दाँत, खजूर, लकड़ी, मसाले आदि आयात होते थेl और हस्तशिल्प, घी, चमड़ा, नमक आदि निर्यात होते थेl

उन दिनों वस्तु विनिमय होता था परन्तु कच्छ में व्यापारियों को प्रवेश करने से पहले इन मुद्राओं को खरीदना होता था, तभी वो मुद्राओं से व्यापार कर सकते थेl

सिर्फ समुद्री मार्ग से नहीं अपितु सडक मार्ग से भी व्यापार राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और मुंबई में भी होता थाl सड़क व्यापार अधिकतर ऊँट से होता थाl ये खराई ऊँट होते थेl ये पानी में भी तैर सकते थेl ये ऊँट समुद्र के आसपास के मैंग्रोज खाते थेl ये कई दिनों तक मीठे पानी के बिना भी जीवित रह सकते थेl

ऊन दिनों मांडवी बंदरगाह पर जहाजों को दिन और रात के समय रास्ता दिखाने की बड़ी ही अनोखी तकनीक होती थीl दिन में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ से दूरबीन की सहायता से समुद्री जहाजों को देखकर अधिकारी रंगीन झंडे लहराते थेl ज्वार का इंतजार करते ये किनारे से लग जाते थेl

वहीं रात्रि में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ पर बहुत बड़ी सी मशाल जलती थी जो लाइट हाउस का काम करती थीl जब दूर से आने वाले जहाज की लाइट दिखती तब मांडवी के नाविक अपनी नावों में मशालें जलाकर उनके पास पहुंचते और उन्हें अपने साथ सुरक्षित ले आते थेl जब ठंड के दिनों में कोहरा होता तब एक समयावधि पर तोप दागते थे और विशाल नगाड़े भी बजाते थेl जिससे जहाजों को बंदरगाह की दिशा मालूम हो जाती थीl

जब 1947 में हमें आजादी मिली तब कच्छ को भी भारत में मिला लिया गयाl उस समय के अंतिम शासक मदनसिंह जी ने अंतिम सिक्का बनवाया जिसपर देवनागरी लिपि में जयहिंद लिखवाया थाl

स्वतंत्रता के पश्चात कच्छ को मुंबई के एक जिले रूप में सम्मिलित कियाl तब कच्छ की सरकार मुंबई से चलती थीl पर भाषाओं को ध्यान में रखकर मुंबई का विभाजन हुआ तब कच्छ को मुंबई से अलग कर गुजरात में शामिल कर दिया गयाl

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५३ ⇒ झोला, भीख और भिखारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “झोला, भीख और भिखारी…“।)

?अभी अभी # १०५३ ⇒ आलेख – झोला, भीख और भिखारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(BAG, BEG & BEGGAR)

झोला शब्द कितना सात्विक और यायावर लगता है, लेकिन भीख और भिखारी उतना ही दीन, हीन और दरिद्र। लेकिन अगर इसी में दर्शन और वैराग्य के दर्शन करने हों तो हरि ओम की शरण में आवें ;

भिखारी सारी दुनिया

दाता एक राम ..

उस दाता से मांगने में कैसी शर्म। जिसने उस भोले भंडारी से मांगने में शरम की, समझो उसके फूटे करम।

झोला और झोली शब्द में फर्क है। झोले में आवश्यक सामान रखा जाता है, जब कि झोली फैलाई जाती है। झोला यह दर्शाता है कि जीवन की आवश्यकता उतनी अधिक नहीं जितनी हम सोचते हैं। सच्चा वैरागी वही, जो झोला उठाकर चल दे। जब कि जो झोली फैलाई जाती है, उसकी आवश्यकता की कोई सीमा नहीं होती। एक बार आपने किसी के सामने झोली फैलाई, तो वह कभी भर नहीं सकती। पूरा संसार भी अगर उस झोली में डाल दिया जाए तब भी तृष्णा की झोली हमेशा खाली ही खाली रहती है। ।

भीख से कभी पेट नहीं भरता। मांगने की भीख कभी शांत नहीं होती। रहीम कहते हैं ;

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।

ये तीनों तब ही गए, जबहि कहा कछु देहि। ।

स्वाभिमान और मेहनत पसीने की कमाई ही पुरुषार्थ है। लेकिन जब इंसान अपना स्वार्थ छोड़ परमार्थ की राह पर चल निकलता है, तब उसके भोग और संचय की वृत्ति पर विराम लग जाता है और उसके कदम अनायास ही सन्यास की ओर उठ जाते हैं। तब वह रहीम को छोड़ राम की शरण में चला आता है। एक शरणागति का अपना कुछ नहीं होता। कैसा मान और कैसा अपमान।

राम की चिड़िया राम का खेत और सबै भूमि गोपाल की।

सन्यास वृत्ति का शुभ मुहूर्त भी भिक्षा से ही होता है। पहले अपना अहंकार और अस्मिता गलाओ, अपनी उपाधि गलाओ। जब संसार ही त्याग दिया तो काहे की पद प्रतिष्ठा और घर परिवार। बुद्धं शरणं गच्छामि। बस जितनी झोली में समाए, उतनी ही भिक्षा। ।

हमारे समाज में आज भी भिक्षावृत्ति अपराध है। लेकिन सुना नहीं आपने, दूसरों के लिए मांगने में परमार्थ है। किसी भले और अच्छे कार्य के लिए चंदा मांगना और रसीद काटना क्या बुरा है। परमार्थ का दूसरा नाम चैरिटी है और क्या आप नहीं जानते, सन्यास तो मन से लिया जाता है, तन से नहीं।

अगर एक बार आपकी सन्यास वृत्ति जाग गई और आपमें वैराग्य भाव जाग गया तो फिर तो समझिए, सभी मठ, आश्रम और एनजीओ के द्वार आपके लिए खुल गए।

कीजिए शान से गौसेवा और दीन हीन, दिव्यांगों की सेवा !आपकी पद, प्रतिष्ठा वहां बहुत काम आती है। फिर आप झोला नहीं, रसीद बुक लेकर शान से कार में जाएं, अपनी झोली फैलाएं, नेक, अच्छे और आदर्श उद्देश्य के लिए भीख मांगे, गिड़गिड़ाएं। बेफिक्र रहें, आपका मान बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं। आप उठें, आगे बढ़ें, सिर्फ मठ और आश्रम ही नहीं, परमार्थ की राह में, अनासक्त सेवा की राह में, रोटरी क्लब और लायंस इंटरनेशनल के द्वार भी आपके लिए खुले हैं।

तू दयालु दीन हों

तू दानी हों भिखारी

जय श्री राम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९५ ☆ गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९५ ☆

☆ गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

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चरण वंदना आपकी , करता सकल जहान ।

तीन लोक भी कर रहे, नित्य सतत गुणगान ।।

*

बिन गुरुवर नहि मिल सके,कभी किसी को ज्ञान ।

प्रीत हृदय प्रिय धारते, शिष्य लगा कर ध्यान ।।

*

काज सहज बनने लगे, जब हो  गुरु आशीष ।

इनके पूजन से मिलें, जगदीश्वर जगदीश ।।

*

 सम्पूरण विश्वास से, सहज साधना साध्य।

ज्योतित जलती लौ रहे, गुरुवर को आराध्य।।

☆

गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह उस दिव्य चेतना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है, जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करती है। गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं देते, वे जीवन को देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। उनके सान्निध्य में व्यक्ति स्वयं को पहचानता है, अपने भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत करता है और सत्य की ओर अग्रसर होता है।

भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष स्थान इसलिए मिला है, क्योंकि वे मनुष्य के व्यक्तित्व का पुनर्जन्म कराते हैं। वे केवल शब्दों से नहीं, अपने आचरण, तप, त्याग और करुणा से शिक्षा देते हैं।

आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने जीवन के प्रत्येक गुरु—माता-पिता, शिक्षक, प्रकृति और उन सभी अनुभवों—के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें, जिन्होंने हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दी। यही सच्ची गुरु वंदना है, और यही ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का श्रेष्ठ मार्ग भी।

साचे मन आराधिए, गुरुवर गुण की खान ।

पूरण सारे काज हों,  बढ़े मान सम्मान ।।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

☆ आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

नेतृत्व वह प्रक्रिया है जिसमें एक दूसरों को प्रभावित करके, प्रेरित करके और मार्गदर्शन देकर किसी साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करता है। नेतृत्व सिर्फ़ बाॅस बनना नहीं, पद नहीं बल्कि प्रभाव है, भरोसे और सम्मान से लोगों के साथ मिलकर मंज़िल को पाना है। एक प्रभावशाली नेतृत्व हमेशा ही अपनी क्षमता, निर्णयशक्ति और व्यक्तित्व के कारण लोगों का विश्वास अर्जित करता है किन्तु जब यही नेतृत्व अहंकार से ग्रस्त हो जाता है तब वही गुण संगठन, समाज और राष्ट्र के लिए संकट का कारण बन जाता है। अहंकार नेतृत्व की विवेकशीलता को कुंठित करता है, संवाद को बाधित करता है, आलोचना को अस्वीकार करता है और स्वयंभू बनकर निर्णयों को एकांगी बना देता है। अहंकार नेतृत्व का सबसे खतरनाक शत्रु है। प्रारम्भ में नेतृत्व अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है फिर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है और अंतत: वह स्वयं को अचूक समझ बैठता है, यही अवस्था नेतृत्व के पतन का आरम्भ होती है। नेतृत्व जब आलोचना को अस्वीकार करे, दूसरों की उपलब्धियों का सम्मान न करे, निर्णयों में एकाधिकार स्थापित करे, सलाहकारों की उपेक्षा करके,स्वयं को अपरिहार्य समझे, सफलता का पूरा श्रेय स्वयं लेने लगे, असफलता का दोष दूसरों पर थोपने लगे तो समझ लेना चाहिए कि अहंकार की शुरुआत हो चुकी है।

नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती अहंकार ही होता है। अहंकारी नेतृत्व अपने निर्णय को अंतिम सत्य मानता है। वह वैकल्पिक विचारों और विशेषज्ञों की सलाह को महत्व नहीं देता, इससे निर्णय प्रक्रिया एकपक्षीय हो जाती है और त्रुटियों की सम्भावना बढ़ जाती है। प्रभावशाली नेतृत्व सदैव ही दूसरों के विचारों को सुनता है। नेतृत्व का आधार विश्वास है जबकि अहंकार विश्वास को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। किसी भी समाज या समुदाय की प्रगति नए विचारों पर निर्भर करती है किन्तु जब कोई व्यक्ति अपने को सर्वज्ञ समझने लगता है तब नई सोच को प्रोत्साहन नहीं मिलता, रचनात्मकता का स्थान चापलूसी ले लेती है। अहंकारी व्यक्ति को भ्रम होता है कि उसके लिए नैतिक नियम लागू नहीं होते! ऐसी स्थिति में पारदर्शिता घटती है, पक्षपात बढ़ता है, सत्ता का दुरूपयोग होने लगता है, टीम भावना विघटित हो जाती है।

नेतृत्व में अहंकार के आ जाने का दुष्परिणाम यह होता है कि व्यक्ति स्तर पर आत्ममूल्यांकन की क्षमता कम हो जाती है और वास्तविक मित्रों का दायरा सीमित हो जाता है, मानसिक तनाव बढ़ता है। संगठन के स्तर पर साथियों का मनोबल गिरता है, निर्णयों की गुणवत्ता में कमी आती है, भ्रष्टाचार में वृद्धि होने लगती है, समाज और राष्ट्र स्तर पर जनविश्वास में कमी आ जाती है, संवाद और सहमति की संस्कृति प्रभावित होती है। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में विनम्र नेतृत्व को विशेष महत्व दिया जाता है। गीता का कर्मयोग यही सिखाता है कि नेतृत्व का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं, लोकसंग्रह और कर्तव्य पालन होना चाहिए। केवल बड़ा पद या प्रतिष्ठा पर्याप्त नहीं, यदि उससे समाज को लाभ नहीं मिलता तो उसका महत्व सीमित है। नेतृत्व में अहंकार के समाधान हेतु व्यक्तिगत आत्मानुशासन, संगठनात्मक संस्कृति तथा नैतिक मूल्यों का समन्वय आवश्यक है। आत्मचिंतन और आत्ममूल्यांकन त्रुटियों का बोध कराता है तथा अहंकार को नियंत्रित रखने में सहायक होता है। विनयी व्यक्ति सफलता का श्रेय टीम को देता है, असफलता की जिम्मेदारी स्वयं लेता है। संगठन में नियमित संवाद, खुली चर्चा, रचनात्मक आलोचना की संस्कृति अहंकार को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नेतृत्व का उद्देश्य आदेश देना नहीं, लोगों की क्षमता का विकास करना होना चाहिए। सत्य, ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे मूल्य नेतृत्व को स्थायी सम्मान प्रदान करते हैं।

सारत: प्रभावशाली नेतृत्व वही है जो अपने व्यक्तित्व से नहीं, अहंकार से ऊपर उठकर अपने चरित्र, सेवा और प्रेरणा से लोगों के हृदयों में स्थान बनाता है। अहंकार क्षणिक विजय दे सकता है किन्तु विनम्रता स्थायी सम्मान दिलाती है। आधुनिक प्रबंधन और भारतीय दर्शन दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि पद या नेतृत्व वह बड़ा नहीं होता जो स्वयं को बड़ा समझे अपितु महानता इसी में है कि नेतृत्व दूसरों को भी बड़ा बनने का सुअवसर प्रदान करे। हमारी ज्ञान परम्परा का संदेश भी यही है कि विद्या से विनय प्राप्त होती है, विनय से पात्रता, पात्रता से समृद्धि, समृद्धि से धर्म  और अंतत: सुख की प्राप्ति होती है। यही सूत्र आदर्श नेतृत्व का भी शाश्वत आधार है।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५२ ⇒ चातुर्मास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चातुर्मास …“।)

?अभी अभी # १०५२ ⇒ आलेख –  चातुर्मास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घंटा, मिनिट और सेकंड करते करते, दिवस, मास और बारहमास व्यतीत हो जाता है। इसी तरह पल करते हमने ज़िन्दगी के कितने वर्ष गुज़ार दिए। क्या खोया, क्या पाया, इस पर सोचने का वक्त अभी नहीं आया।

एक समय था, जब बारिश के समय में जीवन ठहर सा जाता था। आवागमन के साधन सीमित रहते थे। सड़कें पक्की नहीं थी। फ्लाई ओवर, रेलवे की सुविधा और आकाश मार्ग केवल महानगरों तक के ही लिए उपलब्ध था। विदेश यात्रा को bon voyage यानी शुभ विदेश यात्रा कहा जाता था, जिसमें समंदर पार बाहर जाया जाता था।।

साधु संत, महात्मा इस चातुर्मास में एक ही स्थान पर रहकर साधन भजन, ध्यान धारणा, कथा प्रवचन किया करते थे, जिसका लाभ श्रद्धालु जनता को मिल जाया करता था। सभी व्रत, उपवास, सत्संग इसी दौरान संपन्न होते थे। यही सनातन परम्परा आज भी अनवरत चली आ रही है।

लेकिन प्रकृति के इस क्रम में इस बार एक ऐतिहासिक बदलाव आया, जिसका न तो किसी को पूर्वानुमान था न ही किसी भविष्यदृष्टा की कोई चेतावनी। अचानक कोविड 19 ने हमला बोला और पूरी दुनिया को घर बैठा दिया। आप इसे आपातकालीन चातुर्मास भी कह सकते हैं। जिनका एक एक मिनिट कीमती था, वे बीस सेकंड तक केवल हाथ ही धोते रहते थे। वह भी एक बार नहीं, दिन में कई बार।

अगर कोरोना नहीं होता, तो उनके लिए मानसिक चिकित्सालय के दरवाज़े खुले हुए होते।।

मेरा चातुर्मास अभी भी कायम है ! नदी नारे न जाओ श्याम पैंया पड़ूं की तर्ज पर अनावश्यक बाहर न जाओ श्याम पैंया पड़ूं वाला निवेदन रोज सुनने को मिलता है। ध्यान धारणा बहुत हो गई, शायद यही एक सच्चे वानप्रस्थी की निशानी भी है। यानी बिना कुछ किए आसानी से तीसरे आश्रम में प्रवेश।

केश, जटा, दाढ़ी और वक्त किसी का इंतजार नहीं करते। इधर केश बढ़े, उधर सन्यास शुरू ! घर पर ही केश कर्तनालय खुल गए हैं, कोई बाबा नहीं बनना चाहता। सन्यासी तो कतई नहीं। भला हो राजनीति का, जिसने एक नया आश्रम सबके लिए उपलब्ध करवा दिया है। सोच रहा हूं, वानप्रस्थ के स्थान पर यह आश्रम कैसा रहेगा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५१ ⇒ पेइंग गेस्ट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेइंग गेस्ट…“।)

?अभी अभी # १०५१ ⇒ आलेख – पेइंग गेस्ट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अतिथि भगवान होता है, बैंक का एटीएम नहीं ! साईं इतना दीजिये, जा में कुटुंब समाय,

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए। साधु भी अतिथि ही होता है, लेकिन भरपेट भोजन के बाद संतुष्ट होकर आशीर्वाद देकर विदा ले लेता है। अतिथि क्या लेकर आया था, और क्या देकर जाता है, भगवान ही जाने।

जो अतिथि कुछ देकर जाता है, उसे पेइंग गेस्ट कहते हैं। कीमत हमेशा कैश अथवा काइंड ही नहीं होती ! दूर की चाची, दस रोज रुकने के बाद जब भरे मन से वापस जाती थी, तो मुन्नू के हाथ में गुड़ा-मुड़ा बीस का नोट रखकर ज़रूर जाती थी। बहू ! तेरा अचार बहुत पसंद आया, थोड़ा बरनी में बाँध दीजो। लेकिन उन्हें आप पेइंग गेस्ट नहीं कह सकते।।

1957 में देवानंद और नूतन की एक फ़िल्म आई थी, पेइंग गेस्ट ! बॉलीवुड की नगरी मुम्बई में कई डिसूजा और परेरा टाइप परिवार रहते थे, जिन्हें आप एंग्लो-इंडियन कह सकते हैं। ये सब बूढ़ी आंटियां रहती थीं, जिनके एक अथवा दो लड़कियां रहती थीं। कोई सुंदर सा नवयुवक इनके यहाँ नौकरी ढूँढने के बहाने आता, इनके यहाँ पेइंग गेस्ट बनकर रहता, और पिक्चर चल निकलती। किसी एक लड़की से उसका प्यार होता और छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा, गाना शूट हो जाता। कहीं से एक विलेन आ जाता, ढिशुम, ढिशुम और बाद में मालूम पड़ता कि वह नवयुवक अपने पिता रायबहादुर की करोड़ों की जायदाद को ठुकराकर चला आया है। एक सुखांत फ़िल्म का अंत हो जाता।

मुम्बई जब बम्बई था, तब वहाँ पेइंग गेस्ट रहा करते थे। छोटे कस्बों से नौकरी की तलाश में आए युवकों को पेइंग गेस्ट रखने वाले मिल भी जाया करते थे। तब के मुम्बई में बहुत से एंग्लो-इंडियन और पारसी परिवार ऐसे होते थे जहाँ एक निश्चित राशि में रहने को छत, भोजन और मकान मालिक का ढेरों प्यार मिल जाता था। बहुत से किस्से हैं पेइंग गेस्ट के। कई लोगों की ज़िंदगी यहीं रहकर बनी है।।

आज यह हालत है कि अगर किसी को मकान किराये से दो, तो पहले थाने में सूचित करो। छः महीने का एडवांस, महीने के महीने किराया, कहीं भी खाओ, कुछ भी खाओ अपनी बला से।

कितने उदार दिल होते होंगे वे लोग, जो किसी को अपने यहाँ पेइंग गेस्ट रखते होंगे। आजकल दो भाई एक साथ घर में नहीं रह सकते, ऐसी स्थिति में माँ-बाप की तरह प्यार देना, अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाना। बीमारी और मुफ़लिसी में भी हर तरह की मदद करना, यह काम कोई फरिश्ता ही कर सकता है।।

संघर्ष के दिनों के सबके अपने अपने अनुभव होते हैं। घर से बाहर की अनजान दुनिया में भी कई फरिश्ते बसते हैं, समय निकल जाता है, उनकी यादें नहीं जाती। नौकरी धंधे के कारण, जो व्यक्ति जितना घर के बाहर रहा है, उसके जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों का उतना ही समावेश रहा है।

जीवन के शुरुआती दौर में नौकरी ! घर से बाहर ट्रांसफर। नई जगह, नया परिवेश। बिना शादीशुदा को किराए का मकान नहीं मिलता। क्या जाने कैसा इंसान हो। फिर भी येन केन प्रकारेण छत का जुगाड़ तो हो ही जाता। तब कहाँ का टिफिन ! किसी ढाबे में जाकर खा लो, या अपने हाथों से खाना बनाओ। मकान मालिक अच्छा दयालु हुआ, तो कभी कभी चाय पानी भी हो जाता था।।

आप किसी के पेइंग गेस्ट रहे हों या किरायेदार, लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते, कि हमारे आसपास आज भी इंसानियत बिखरी पड़ी है। जीवन में फूल ही नहीं, काँटे भी होते हैं। हो सकता हो, किसी के अनुभव कटु भी हों, लेकिन पेइंग गेस्ट की कल्पना मात्र ही, आज भी मुझे रोमांचित कर देती है। मेरी आँखों के सामने एक बूढ़ी आंटी तैर जाती है, जो यह पूछती नज़र आती है। बेटा! तूने आज दो रोटी कम क्यों खाई।।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ दान और चंदा का दुरुपयोग: चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – दान और चंदा का दुरुपयोग: चुनौतियाँ एवं समाधान ।)

☆ आलेख – दान और चंदा का दुरुपयोग: चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भारतीय संस्कृति दान और चंदा को धर्म, करुणा, परोपकार और लोकमंगल की भावना का मूर्तरूप माना गया है। दान का तात्पर्य केवल धन देना नहीं बल्कि किसी योग्य व्यक्ति या संस्था को निष्काम भाव से संसाधन, ज्ञान, समय अथवा सेवा प्रदान करना है। अन्नदान, विद्यादान, ज्ञानदान, जलदान, भूमिदान, वस्त्रदान, औषधिदान, रक्तदान, अंगदान, समय व श्रमदान को सात्विक सर्वोत्तम दान माना गया है, इसी के साथ आर्थिक सहयोग सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु लिया जाता है। वेद,उपनिषद, रामायण, महाभारत में दान को मनुष्य के श्रेष्ठतम गुणों में स्थान दिया गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानशु:’ अर्थात् त्याग और दान के माध्यम से ही अमरत्व की प्राप्ति सम्भव है। इसी प्रकार चंदा भी सामाजिक सहयोग का एक सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा समाज सामूहिक रूप से धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय कार्यों को सम्पन्न करता है। आधुनिक समय में जिस प्रकार दान और चंदे की राशि में वृद्धि हुई है,उसी अनुपात में उसके दुरुपयोग की घटनाएँ भी सामने आईं हैं। कई बार तो फर्जी संस्थाओं,अनधिकृत व्यक्तियों, अपारदर्शी प्रबंधन,निजी स्वार्थ,राजनीतिक लाभ अथवा आर्थिक अनियमितताओं के कारण दान और चंदा अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है। इससे न केवल दानदाता का विश्वास कमजोर होता है बल्कि वास्तविक जरूरतमंदों तक सहायता भी नहीं पहुँच पाती।

समय के साथ दान और चंदे के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आया है। ऑनलाइन, यूपीआई, बैंक ट्रांसफर आदि तकनीकी विकास ने दान को सरल बनाया है। दान और चंदा सामाजिक असमानता को कम करते हैं,प्राकृतिक आपदाओं में त्वरित राहत उपलब्ध कराते हैं,सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते हैं,शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करते हैं। इस कारण दान और चंदा दोनों को ही सभ्य समाज की नैतिक पूँजी माना जाता है किन्तु अनेक बार इनका दुरुपयोग फर्जी संस्थाओं द्वारा धनसंग्रह, एकत्रित राशि का निजी उपयोग,लेखा-जोखा में पारदर्शिता का अभाव, धार्मिक या सामाजिक भावनाओं का अनुचित दोहन, आपदा के नाम पर धोखाधड़ी,नकली ऑनलाइन,दान खर्च का सार्वजनिक विवरण न देना आदि अनेक चुनौतियाँ हैं जिनके कारण समाज में दान और चंदे के प्रति अविश्वास बढ़ने लगता है। कुछ संस्थाएँ तो कागज पर विद्यालय,अस्पताल,अनाथालय,गौशाला चलाने का दावा करतीं हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। धार्मिक आयोजनों में रसीद प्रणाली, लेखा परीक्षण न होने से भी दुरुपयोग की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

दान और चंदा विश्वास पर आधारित व्यवस्था है। जब दुरुपयोग सामने आता है तो लोग सहायता देने से हिचकते हैं। सबसे अधिक हानि उन लोगों को होती है जो गरीब, रोगग्रस्त,अनाथ,दिव्यांग, आपदा पीड़ित हैं। जब दान का दुरुपयोग होता है तो लोगों में यह धारणा बनने लगती है कि दान देने से कोई लाभ नहीं। यह सोच समाज की सेवा- संस्कृति को कमजोर कर देती है। यद्यपि हमारे देश में इण्डियन ट्रस्ट एक्ट 1882, सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860,आयकर अधिनियम आदि व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं तथापि पारदर्शिता होने से दानदाताओं का विश्वास बढ़ता है। यदि कोई संस्था फर्जी चंदा जुटाती है, दान का दुरुपयोग करती है, झूठे दस्तावेज प्रस्तुत करती है तो उसके विरुद्ध त्वरित निष्पक्ष कार्यवाही होनी चाहिए। जनजागरूकता अभियान से लोगों को जानकारी दी जानी चाहिए कि केवल पंजीकृत संस्थाओं को दान दें,विवेकपूर्ण दान ही प्रभावी दान है। प्रत्येक संस्था को ईमानदारी अपनानी चाहिए, जनहित को सर्वोच्च रखना चाहिए,समय पर लेखा प्रस्तुत करना चाहिए। जब दान श्रद्धा से और चंदा उत्तरदायित्व के साथ संचालित होगा, तभी वह समाज में विश्वास, न्याय और समावेशी विकास का सशक्त माध्यम बन सकेगा।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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