(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आप किस मिट्टी के बने हैं…“।)
अभी अभी # ९९२ ⇒ आलेख – आप किस मिट्टी के बने हैं श्री प्रदीप शर्मा
माना कि इंसान हाड़ मांस का पुतला है, लेकिन जब तक इस तन में सांस है, तब तक ही जीता जागता वन पीस है, बाद में तो इस मिट्टी में मिल ही जाना है। व्हाट्सएप ज्ञान की तरह ही कुछ ज्ञान इल्मी भी होता है, और कुछ फिल्मी भी। इल्म और फिल्म का जब कॉकटेल बनता है, तब यह कहा जाता है ;
माटी के पुतले
इतना ना कर तू गुमान
पल भर का तू मेहमान …
मतलब इस माटी के पुतले को वापस मिट्टी में ही मिल जाना है। यह शरीर ही तो हमारा घर है। यानी घर भी मिट्टी का और यह शरीर भी मिट्टी का। घर बनाते समय तो हम बढ़िया बिल्डिंग मटेरियल लगाते हैं। छांट छांटकर बढ़िया गारा, ईंट, मिट्टी, सरिया और सीमेंट लाते हैं। कहीं सागौन की लकड़ी तो कहीं शीशम के दरवाज़े। बढ़िया फर्नीचर और बढ़िया कांच का सामान। इंटीरियर पर कितना खर्च करते हैं। मकान कहां जिंदगी में बार बार बनता है। इसलिए जिंदगी भर की कमाई हमने शानदार मकान में लगाई।।
और हमारा यह शरीर किस मिट्टी का बना है, कभी सोचा है। जब हमारा शरीर बन रहा था, तब तो हम आराम से सो रहे थे अथवा रो रहे थे, हमें कुछ नहीं पता। जिस तरह मिट्टी को तराशा जाकर, कुम्हार द्वारा, उसे कोई आकार दिया जाता है, वैसे ही हमें भी एक आकार मिला। किस शक्ति ने हममें प्राण फूंके, हमें पता नहीं। लेकिन हम जब पैदा हुए तब किसी की गोद में, हाथ पांव मारते हुए कभी किलकारी मार रहे थे, तो कभी रो रहे थे।
एक पानी के मटके को देखकर आप भले ही यह अंदाज लगा लें कि वह किस मिट्टी का बना है, लाल अथवा काली मिट्टी का। एक मटके में भले ही जान ना हो, लेकिन जब उस मटके का ठंडा पानी, हलक से नीचे उतरता है, तो ऐसा महसूस होता है मानो किसी ने शरीर में प्राण फूंक दिए हों। जल ही जीवन है।।
अगर किसी माटी के घड़े ने रत्ती भर भी यह गुमान कर लिया कि कुम्हार ने जैसा मुझे घढ़ा है और जिस मिट्टी से घढ़ा है, उससे बेहतर कोई मिट्टी नहीं और उससे बढ़िया कोई घड़ा नहीं, तो घड़े में सिर्फ एक छेद ही काफी है उसके अहंकार को पानी पानी करने के लिए। एक कंकर से मटकी फूट जाती है, और घड़े की किस्मत भी फूट जाती है। जल्द ही उसे परंडे से बेदखल कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
माटी के इस पुतले पर इतना गुमान ठीक नहीं। हम सब एक ही मिट्टी के घड़े हैं। हमारा कुम्हार कोई छोटा मोटा कुम्हार नहीं, उसने पूरी दुनिया बनाई है। अलग मिट्टी के मुगालते मत पाल हे जीव !
उसी मिट्टी से उसने कीड़े मकोड़े बनाए हैं, बस शुक्र मना उस कुम्हार का, जिसने तुझे जीता जागता माटी का पुतला बना डाला। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हम सब एक ही माटी के पुतले हैं। वही मिट्टी तो हमारी भारत माता है। उसका हमारा जन्म जन्मांतरों का नाता है।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धर्म संकट…“।)
अभी अभी # ९९१ ⇒ आलेख – धर्म संकट श्री प्रदीप शर्मा
धर्म संकट का धर्म से कोई संबंध नहीं! एक अधर्मी भी धर्म संकट में पड़ सकता है। हम लोगों का रोज धर्म संकट से वास्ता पड़ता है। बाहर पिक्चर का प्रोग्राम बनाया और कोई अतिथि आ धमके। आदर सत्कार के बाद किसी बीमार को देखने जाने का बहाना ऐसे मौकों पर आम होता है। सबसे बड़ा धर्मसंकट वैसे भी अतिथि तुम कब जाओगे, का ही होता है।
धर्म संकट की काट युक्ति होती है! सुग्रीव-बाली संग्राम में बाली का वध मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम युक्ति से ही करते हैं। एक सी शक्ल वाले दो भाइयों में से बाली को पहचानना इतना आसान नहीं था। बाली को सामने से नहीं मारा जा सकता था, क्योंकि उसके प्रतिद्वंद्वी का आधा बल उसे मिल जाता था। अतः एक भाई को पुष्पहार धारण करा दिया जाता है और बाली वध सम्पन्न हो जाता है। अधर्मी को छल से मारने में कैसा धर्म-संकट।।
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, को आप कंफ्यूज़न कहेंगे, या धर्म संकट! अच्छे और बुरे में से एक को चुनना कोई धर्म संकट नहीं। वहाँ तो बुद्धि और विवेक काम आ जाते हैं। लेकिन जब दोनों बुरों में से किसी एक को चुनना हो तो, सलाह दी जाती है, कम बुरे को चुनो। बस वहीं धर्म संकट आ खड़ा होता है। कम बुरे को भी क्यों चुनो।
लीलाधारी योगेश्वर श्रीकृष्ण के पास महाभारत युद्ध के समय कोई धर्म संकट नहीं था, वे चाहते तो स्पष्ट रूप से धर्मराज युधिष्ठिर का साथ दे सकते थे और कौरवों का विरोध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने दुर्बुद्धि दुर्योधन के सामने एक प्रस्ताव रखा। या तो मुझे ले लो, अथवा मेरी अक्षौहिणी सेना! बस, यहीं विवेक मात खा जाता है! विनाश काले विपरीत बुद्धि। मूर्खों के सामने कोई धर्म संकट नहीं होता। और दुर्योधन ने कृष्ण की चतुरंगिनी सेना माँग ली। अर्जुन चतुर था, उसे बिना मांगे न केवल कृष्ण जैसे सारथि मिल गए, पूरे विश्व को इस बहाने गीता का ज्ञान भी उपलब्ध हो गया।।
हमारे लिए मतदान कब धर्म-संकट सिद्ध हुआ! मतदान प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, लोग शिक्षित, समझदार होते जा रहे हैं। घंटों कतार में खड़े रहकर आत्म-विश्वास से अपने मताधिकार का उपयोग करना ही स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है।
सोशल मीडिया पर जितनी भी उँगली उठाई जा रही है, मतदान के बाद दिखाई गई स्याही वाली उँगली सभी धारणाओं को ध्वस्त करती नज़र आ रही है कि मतदाता के मन में अपने उम्मीदवार को चुनने में कोई संशय है। कोई धर्म संकट नहीं। कोई देवासुर-संग्राम नहीं। महाभारत तो बिल्कुल नहीं! लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है।।
☆ आलेख ☆ ~ मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।
साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज लिखता हूँ या अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।
एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने जब यह जानना चाहा था कि मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी) क्षत्रियों का गांव है।
मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।
इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए, सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला।
यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।
अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।
होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।
वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।
उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है, किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था।
छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे, उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।
गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिणा दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना, मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।
वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।
शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है ।
यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना, उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था ।
विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न, धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।
मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।
अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी । या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।
दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।
आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा। आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।
यद्यपि आजकल मैं उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।
यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है। उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है । पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं, वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।
यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया ।
इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रकृति सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – राह दिखा जाओ / स्वर- डॉ. निशा आग्रवाल, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२० ☆
☆ प्रकृति सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
मानव व प्रकृति का संबंध अनादि व अखंड है। प्रकृति का सामान्य अर्थ है–समस्त चराचर में स्थित सभी वनस्पति,जीव व पदार्थ, जिनके निर्माण में मानव का हाथ नहीं लगा; अपने स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य भी आ जाता है, जो प्रकृति का अंग है और शेष सृष्टि उसकी रंगभूमि है। सो! उसकी अन्त:प्रकृति उससे अलग कैसे रह सकती है? मनुष्य प्रकृति को देखता व अपनी गतिविधि से उसे प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित हो बदलता-संवरता है; तत्संबंधी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। उसी के माध्यम से वह जीवन को परिभाषित करता है। मानव प्रकृति के अस्तित्व को हृदयंगम कर उसके सौंदर्य से अभिभूत होता है और उसे चिरसंगिनी के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है और उसे मां के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है।
मानव प्रकृति के पंचतत्वों पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि, आकाश व सत्,रज,तम तीन गुणों से निर्मित है…फिर वह प्रकृति से अलग कैसे हो सकता है? जिन पांच तत्वों से प्रकृति का रूपात्मक व बोधगम्य रूप निर्मित हुआ है,वे सब इंद्रियों के विषय हैं। इन पांच तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ही असंख्य रूपों में मानव चेतना के कोश को कर्म, चिन्तन, कल्पना, भावना, भावुकता, संकल्प, जिज्ञासा, समाधान आदि से कितना समृद्ध किया है–इसका अनुमान मानव की उपलब्धियों से लगाया जा सकता है। प्रकृति का वैभव अपरिमित एवं अपार है। उसकी पूर्णता को न दृष्टि छू सकती है, न ही उसकी सीमाओं तक कान ही पहुंच सकते हैं और न ही क्षणों की गति को मापा जा सकता है। प्रकाश व शब्द की गति के साथ कौन दौड़ लगा सकता है? प्रकृति के अद्भुत् सामर्थ्य व निरंतर गतिशीलता के कारण उसमें देवत्व की स्थापना हो गयी तथा उसकी अतिन्द्रियता, अद्भुतता, उच्चता, गहनता आदि के कारण उसे विराट की संज्ञा प्रदान की गयी है। विराट में मानव,मानवेतर प्राणी व अचेतन जगत् का समावेश है। अचेतन जगत् ही प्रकृति है और जगत् का उपादान अथवा मूल तत्व है। वह स्वयंकृत, चिरंतन व सत्य है। उसका निर्माण व विनाश कोई नहीं कर सकता। प्रकृति के अद्भुत् क्रियाकलाप व अनुशासनबद्धता को देख कर मानव में भय, विस्मय, औत्सुक्य व प्रेम आदि भावनाओं का विकास हुआ, जिनसे क्रमश: दर्शन, विज्ञान व काव्य का विकास हुआ। सो! मानव मन में आस्था, विश्वास व आदर्शवाद जीवन-मूल्यों के रूप में सुरक्षित हैं और विश्व में हमारी अलग पहचान है। सम्पूर्ण विश्व के लोग भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं। रामायण व महाभारत अद्वितीय ग्रंथ हैं और गीता को मैनेजमेंट गुरू स्वीकारा जाता है। उसे विश्व के विभिन्न देशों में पढ़ाया जाता है। यह एक जीवन-पद्यति है; जिसे धारण कर मानव अपना जीवन सफलतापूर्वक बसर कर सकता है।
प्रकृति हमारी गुरू है, शिक्षिका है, जो जीने की सर्वोत्तम राह दर्शाती है। प्रकृति हमारी जन्मदात्री मां के समान है और हमारी प्रथम गुरू कहलाती है और जो संस्कार व शिक्षा हमें मां से प्राप्त होती हैं, वह पाठ संसार का कोई गुरू नहीं पढ़ा सकता। प्रकृति हमें सुक़ून देती है; अनगिनत आपदाएं सहन करती है और हम पर लेशमात्र भी आँच नहीं आने देती। वह हमारी सहचरी है; सुख-दु:ख की संगिनी है। दु:ख की वेला में यह ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाती भासती है, जो सुख में मोतियों-सम प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, दु:ख में प्रकृति मां के समान धैर्य बंधाती है।
प्रकृति हमें कर्मशीलता का संदेश देती है और उसके विभिन्न उपादान निरंतर सक्रिय रहते हैं।क्षरात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर, अमावस के बाद पूनम व विभिन्न मौसमों का यथासमय आगमन समय की महत्ता व गतिशीलता को दर्शाता है। नदियाँ निरंतर परहिताय प्रवाहशील रहती हैं। इसलिए वे जीवन-दायिनी कहलाती हैं। वृक्ष भी कभी अपने फलों का रसास्वादन नहीं करते तथा पथिक को शीतल छाया प्रदान करते हैं। वे हमें आपदा के लिए संचय करने को प्रेरित करती है। जैसे जल के अभाव में वह बंद बोतलों में बिकने लगा है। बूंद-बूंद से सागर भर जाता है और जल को बचा कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। वायु भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। परंतु मानव की बढ़ती लालसाओं ने जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के महल बनाकर पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत वृद्धि की है, जिसका विकराल रूप हमने कोरोना काल में आक्सीजन की कमी के रूप में देखा है; जिसके लिए लोग लाखों रुपये देने को तत्पर थे। परंतु उसकी अनुपलब्धता के कारण लाखों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। काश! हम प्रकृति के असाध्य भंडारण व असाध्यता का अनुमान लगा पाते कि वह हमें कितना देती है? हम करोड़ों-अरबों की वायु का उपयोग करते हैं; अपरिमित जल का प्रयोग करते हैं; वृक्षों का भी हम पर कितना उपकार है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कार्बन-डॉयोक्साईड लेकर हमें आक्सीजन देते हैं। इतना ही नहीं, वे हमें अन्न व फल-फूल देते हैं, जिससे हमें जीवन मिलता है।
मानव व प्रकृति का संबंध अटूट, चिरंतन व शाश्वत् है। प्रकृति विभिन्न रूपों में हमारे सम्मुख बिखरी पड़ी है। प्रकृति के कोमल व कमनीय सौंदर्य से प्रभावित होकर कवि उसे कल्पना व अनुभूति का विषय बनाता है, जो विभिन्न काव्य- रूपों में प्रकट होती है। यदि हम हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो प्रकृति हर युग में मानव की प्रेरणा-शक्ति ही नहीं रही, उसकी चिर-संगिनी भी रही है। वैदिक-कालीन सभ्यता का उद्भव व विकास प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में हुआ। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने प्रकृति के प्रति जहां अनुराग व्यक्त किया, वहीं उसके उग्र,रम्य व मानवीकरण आदि रूपों को अपनाया। ऋग्वेद मानव सभ्यता का प्राचीनतम ग्रंथ है। प्रकृति के दिव्य सौंदर्य से अभिभूत होकर जहां मानव उसके उन्मुक्त सौंदर्य का बखान करता है; वहीं विराट के प्रति भय, विस्मय श्रद्धा आदि की अनुभूतियों में अनंत सौंदर्य का अनुभव करता है। वाल्मीकि का प्रकृति-जगत् के कौंच-वध की हृदय-विदारक घटना से उद्वेलित आक्रोश व करुणा से समन्वित शोक का प्रथम श्लोक रूप में प्रस्फुरण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भावातिरेक या अनुभूति की तीव्रता ही कविता की मूल संजीवनी शक्ति है। महाभारत में प्रकृति केवल पर्वत, वन, नदी आदि का सामान्य ज्ञान कराती है। नल दमयंती प्रसंग में वह प्रकृति से संवेदनात्मक संबंध स्थापित न कर, स्वयं को अकेला व नि:सहाय अनुभव करती है।
कालिदास को बाह्य-जगत् का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकारा जाता है। उनका प्रकृति-चित्रण संस्कृत साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वे प्रकृति को मूक, चेतनहीन व निष्प्राण नहीं मानते, बल्कि वे उसमें मानव की भांति सुख- दु:ख व संवेदनशीलता अनुभव करते हैं। इस प्रकार अश्वघोष, भवभूति, भास, माघ, भारवि, बाणभट्ट आदि में प्रकृति का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है।
हिन्दी साहित्य के आदिकाल अथवा पूर्व मध्य-कालीन काव्य में प्रकृति का उपयोग पृष्ठभूमि, उद्दीपन व उपमानों के रूप में हुआ। विद्यापति के काव्य में प्रकृति कहीं-कहीं उपदेश देती भासती है और आत्मा परमात्मा में इस क़दर लीन हो जाती है, जैसे समुद्र में लहर और भौंरों का गुंजन नायिका को मान त्यागने का संदेश देता भासता है। वियोग में उनका बारहमासा वर्णन द्रष्टव्य है।
पूर्व मध्यकालीन काव्य में प्रकृति उन्हें माया सम भासती है तथा उन्होंने भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनाया है। कबीरदास जी ‘माली आवत देखि के, कलियन करि पुकार/ फूलि-फलि चुनि लहि, कालहि हमारी बारि’ के माध्यम से मानव को नश्वरता का संदेश देते हैं। दूसरी ओर ‘तेरा सांई तुझ में, ज्यों पुहुपन में वास/ कस्तूरी का मृग ज्यों फिरि-फिरि ढूंढे घास’ के माध्यम से वे मानव को संदेश देते हैं कि ब्रह्म पुष्पों की सुगंध की भाति घट-घट में व्याप्त है, परंतु अज्ञान के कारण बावरा मानव उसे अनुभव नहीं कर पाता और मृग की भांति वन-वन में ढूंढता रहता है। प्रेममार्गी शाखा के प्रवर्त्तक जायसी के काव्य में प्रकृति के उपमान, उद्दीपन व रहस्यात्मक रूपों का चित्रण हुआ है। वे चराचर प्रकृति में ब्रह्म के दर्शन करते हैं। समस्त जड़-चेतन प्रकृति में प्रेमास्पद के प्रतिबिंब को निहारते व अनुभव करते हैं। ‘बूंद समुद्र जैसे होइ मेरा/ मा हिराइ जस मिले न हेरा।’ जिस प्रकार बूंद समुद्र में मिलकर नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार आत्मा भी ब्रह्ममय हो जाती है।
रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास की वृत्ति प्रकृति-चित्रण में अधिक नहीं रमी, तथापि उनका प्रकृति-चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। प्रकृति उनके काव्य में उपमान व उद्दीपन रूप में नहीं आयी, बल्कि उपदेशिका के रूप में आयी है। संयोग में वर्षा व बादलों की गर्जना होने पर पशु-पक्षी व समस्त प्रकृति जगत् उल्लसित भासता है और वियोग में मन की अव्यवस्थित दशा में मेघ-गर्जन भय संचरित करते हैं। मानवीकरण में मनुष्य का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और मानव उसमें अपनी मन:स्थिति के अनुसार उल्लास, उत्साह, आनंद व शोक की भावनाएं- क्रियाएं आरोपित करता है। राम वन के पशु-पक्षियों से सीता का पता पूछते हैं। तुलसी सदैव लोक- कल्याण की भावना में रमे रहे और प्रकृति से उपदेश-ग्रहण की भावना में उन पर श्रीमद्भागवत् का प्रभाव द्रष्टव्य है–’आन छोड़ो साथ जब, ता दिन हितु न होइ/ तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि, तासु रिपु होइ।’ जब कुटुम्बी साथ छोड़ देते हैं, तो संसार में कोई भी हितकारी नहीं रह पाता। कमल का जनक जल जब सूख जाता है, तो उसका मित्र सूर्य भी उसे दु:ख पहुंचाता है।
कृष्ण भक्ति शाखा के अतर्गत सूर, नंददास, रसखान आदि को कृष्ण के कारण प्रकृति अति प्रिय थी। प्रकृति का आलंबन, उद्दीपन व आलंकारिक रूप में चित्रण हुआ है। वियोग में प्रकृति गोपियों को दु:ख पहुंचाती है और वे मधुवन को हरा-भरा देख झुंझला उठती हैं– ‘मधुबन! तुम कत रहत हरे/ विरह-वियोग स्याम सुंदर के ठाढ़ै,क्यों न जरे।’ कहीं-कहीं वे प्रकृति में उपदेशात्मकता का आभास पाते हैं और संसार के मोहजाल को भ्रमात्मक बताते हुए कहते हैं–’यह जग प्रीति सुआ, सेमर ज्यों चाखत ही उड़ि जाय।’ तोते को सेमर के फूल में रूई प्राप्त होती है और वह उड़ जाता है। सूर ने प्रकृति के व्यापारों का मानवीय व्यापारों से अतु्लनीय समन्वय किया है।
उत्तर मध्यकालीन को प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षित नहीं कर पाता। बिहारी को गंवई गांव में गुलाब के इत्र का कोई प्रशंसक नहीं मिलता। केशव को प्राकृतिक दृश्यों के अंकन का अवसर मिला,परंतु वे अलंकारों में उलझे रहे। बिहारी सतसई में जहां मानवीकरण व आलंबनगत रूप चित्रण हुआ, वहीं पर नैतिक शिक्षा के रूप में अन्योक्तियों का आश्रय लिया गया है। इनके प्रकृति-चित्रण में हृदय-स्पर्शिता का अभाव है। सो! प्रकृति उद्दीपन व उपमान रूप में हमारे समक्ष है। ‘ नहीं पराग,नहीं मधुर मधु,नहीं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यौ,आगे कौन हवाल’ के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। ‘जिन-जिन देखे वे सुमन, गयी सो बीति बहार/ अब अलि रही गुलाब की, अपत कंटीली डार।’ यह उक्ति सम्पत्ति-विहीन व्यक्ति के लिए कही गयी है तथा भ्रमर को माध्यम बनाकर प्राचीन वैभव व वर्तमान की दरिद्रावस्था का बखूबी चित्रण किया गया है।
भारतेन्दु युग आधुनिक युग का प्रवेश-द्वार है और इसमें नवीन व प्राचीन काव्य-प्रवृत्तियों का समन्वय हुआ है। प्रकृति मानवीय भावनाओं के अनुरूप हर्ष-विषाद को अतिशयता प्रदान करती, वियोगियों को रुलाती तथा संयोगियों को उल्लसित करती है। इनका बारहमासा वर्णन विरहिणी की पीड़ा को और बढ़ा देता है तथा कहीं-कहीं प्रकृति उपदेश देती भासती है। ‘ताहि सो जहाज को पंछी सब गयो,अहो मन होई’ (भारतेन्दु ग्रंथावली)। अत:जीव जहाज़ के पक्षी की भांति पुन: ब्रह्म में मिलने का प्रयास करता है। बालमुकुंद जी के हृदय में प्रकृति के प्रति सच्चा अनुराग है, जो आलंबन, उद्दीपन व उपमान रूप में उपलब्ध है।
द्विवेदी युगीन कवियों ने प्रकृति को काव्य का वर्ण्य-विषय बनाया है तथा प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है। श्रीधर पाठक, रूपनारायण पाण्डेय, रामनरेश त्रिपाठी आदि ने आलंबनगत चित्र प्रस्तुत किए हैं तथा स्वतंत्रतावादी कवियों ने रूढ़ रूपों को नहीं अपनाया, बल्कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में उसके साधारण चित्रमय, सजीव व मार्मिक रूप प्रदान किए हैं। पाठक ने कश्मीर सुषमा, देहरादून आदि कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्र उपलब्ध हैं। शुक्ल जी ने प्रकृति के आलंबन व त्रिपाठी ने पथिक व स्वप्न खंड काव्यों में प्रकृति का मार्मिक चित्रण किया है। हरिऔध ने जहां ऐंद्रिय सुख की अनुभूति की, वहीं प्रकृति से उपादान ग्रहण कर नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत, पंचवटी, यशोधरा आदि काव्यों में मनोरम प्राकृतिक चित्रण उपलब्ध है। पंचवटी में प्रकृति की अपूर्व झांकी दिखाई देती है और प्रकृति मानव के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में संबंध स्थापित करती है। साकेत में प्रकृति का मानव व मानवेतर जगत् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वे प्रकृति को सद्गुणों से परिपूर्ण मानते हैं– ‘सर्वश्रद्धा, क्षमा व सेवा की, ममता की वह धर्म में भी प्रतिमा/ खुली गोद में जो उसकी, समता की वह प्रतिमा।’ प्रकृति ममतामयी मां है, जो समभाव से सब पर अपना प्रेम व ममत्व लुटाती है।उपदेशिका की भांति मानव में उच्च विचार व सदाशयता के भाव संचरित करती है। वे भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना के भाव जाग्रत करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहते हैं—‘पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे काम में/ फिर क्यों तुम्ही खोते हो, व्यर्थ के विश्राम में।’ कवि ने सर्वभूतों को सर्वदा व्यस्त दिखाते हुए देशवासियों को आलस्य त्यागने व जाग्रत रहने का संदेश दिया है। रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में प्रकृति के सुंदर, मधुर, मंजुल रूप प्रकट होते हैं, उग्र नहीं। वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मानव-व्यापारों व मानव- संवेदना का आभास पाते हैं।
छायावाद में प्रकृति को स्वछंद रूप प्राप्त हुआ है और उसका उपयोग आध्यात्मिक भावों के प्रकाशन के लिए हुआ है। प्रकृति कवि की चेतना, प्रेरणा व स्पंदन है। इसलिए छायावाद को प्रकृति काव्य के नाम से अभिहित किया गया है।यदि प्रकृति को छायावाद से निकाल दिया जाए, तो वह पंगु हो जाएगा। प्रसाद ने प्रकृति में चेतना का अनुभव किया और वह मधुर, कोमल व सुकुमार भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बन गयी, परंतु कवि ने कामायनी में प्रकृति के भयावह, विकराल व विराट आदि रूपों का दर्शन किया है। वे प्रकृति को सचेतन व सजीव मानकर उसमें अलौकिक सत्ता का दर्शन करते हैं तथा समस्त सृष्टि के कार्य-व्यापारों को सर्वोत्तम शक्ति द्वारा अनुप्राणित स्वीकारते हैं। प्रसाद ने संसार को रंगभूमि मानते हुए कहा है कि मानव यहां अपनी शक्ति के अनुसार संसार रूपी घोंसले में अपनी शक्ति के अनुसार ठहर सकता है, ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का संदेश देता है। पंत प्रकृति के उपासक ही नहीं, अनन्य मित्र थे। उनके काव्य में मानव और प्रकृति का एकात्म्य हो जाता है। मधुकरि का मधुर राग उन्हें मुग्ध करता है और वे ‘सिखा दो न हे मधुप कुमारि/ मुझे भी अपने मीठे गान'(पल्लविनी)। वे प्रकृति के सहचरी, देवी, सखी, जननी आदि रूपों को काव्य में चित्रित करके उनमें अलौकिक सत्ता का आभास पाते हैं और प्रकृति उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है।
निराला के काव्य में प्रकृति के चित्र दिव्य, समृद्ध व रहस्यात्मक रूप में आए हैं। उनके काव्य में दो तत्वों की प्रधानता है-रहस्यवाद व मानवीकरण। उनके काव्य विराटता व उदात्तता की दृष्टि से सराहनीय हैं। प्रकृति उसे सजीव प्राणी की भांति अपना रूप दिखाती, हाव-भावों से मुग्ध करती, संवेदना प्रकट करती उत्साहित करती है। इस प्रकार प्रकृति व मनुष्य का तादात्म्य हो जाता है। बादल प्रकृति को हरा-भरा कर देते हैं, जिससे प्रेरित होकर प्रकृति कर्त्तव्य- पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है।
महादेवी वर्मा सृष्टि में सर्वत्र दु:ख देखती हैं। प्रकृति उनके लिए सप्राण है तथा वे मानव व प्रकृति के लिए एक प्रकार की अनुभूति, सजीवता, विश्रंखलता, आत्मीयता व व्यापकता का अनुभव करती हैं। वे संसार में प्रियतम को ढूंढती हैं । वे कभी प्रेम भाव में बिछ जाती हैं और जब प्रियतम अंतर्ध्यान हो जाते हैं, वे निराश होकर दु:ख-दैन्य भाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं—‘मैं फूलों में रोती, वे बालारुण में मुस्काते/ मैं पथ में बिछ जाती,वे सौरभ सम उड़ जाते।’ वे प्रकृति के चतुर्दिक प्रियतम के संदेश का आभास पाती हैं और प्रश्न कर उठती हैं — ‘मुस्काता प्रेम भरा नभ,अलि! क्या प्रिय आने वाले हैं?’ वे जीवन को संध्या से उपमित करती हैं ‘प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन’ ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ के माध्यम से वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। वेएक ओर प्रकृति में विराट की छाया देखती हैं और दूसरी ओर अपना प्रतिबिंब पाती हैं। वै छायावाद का आधार स्तंभ-मात्र नहीं हैं, रहस्य व अरूप की साधिका रही हैं।
प्रगतिवाद भौतिकवादी दर्शन है, जिस पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। समस्त सृष्टि का विकास दो वस्तुओं के संघर्ष से होता है, जो द्वंद्व का परिणाम है। यह वैज्ञानिक दर्शन है, जिसमें भावुकता के स्थान पर बुद्धि को स्वीकारा गया है।यह यथार्थवाद पर आधारित है। इन कवियों को जीवन से अनुरक्ति है और प्रकृति से प्रेम है।उन्होंने प्रकृति के उपेक्षित तत्वों व पात्रों को महत्व दिया है और प्रकृति उनके लिए शक्ति- प्रणेता है। वे दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन को देख जीवन के विकास के लिए परिवर्तन-शीलता को अनिवार्य मानते हैं। इनके गीतों पर लोकगीतों कि प्रभाव द्रष्टव्य है।
प्रयोगवादी कविता में प्रकृति के भावात्मक स्वरूप का ग्रहण हुआ अबोध बालक की तरह ईश्वर, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य के विभिन्न स्तरों पर प्रश्न करता है। इन कवियों ने जहां प्रकृति के उपेक्षित व वैज्ञानिक स्वरूपों को ग्रहण किया है,
वहीं प्रकृति में दैवीय सत्ता का आभास न पाकर , भौतिकता के संदर्भ में एक शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। इनका दृष्टिकोण भावात्मक न होकर, बौद्धिक है और प्रकृति के उपेक्षित स्वरूप(कुत्ता, गधा,चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, प्लेटफार्म, धूल, साइरन) को काव्य का विषय बनाया।इन्होंने असुंदर, भौंडे, भदेस आदि में सौंदर्य के दर्शन किए तथि युगबोध के अनुकूल प्रकृति का चित्रण किया। इन्होंने जहां प्रकृति को अपनी मानसिक कुंठाओं की अभिव्यक्ति का साधन बनाया, वहां नवीन उपमानों, बिम्बों को अपने काव्य में प्रतिष्ठित किया तथा मानवीकरण कर मनोरम चित्रण किया है।
नयी कविता प्रयोगवाद का विकसित चरण है तथा इसमें उपलब्ध प्रकृति चित्रण की विशेषता है–ग्राम्य चित्रपटी की अवधारणा। नयी कविता वाद मुक्त है तथा वे जो भी मन में आता है, कहते हैं। वे क्षणवादी हैं और हर पल को जी लेना चाहते हैं,क्योंकि वे भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनमें एक दर्शन का अभाव है। कई बार उन्हें प्रकृति के विभिन्न रूप स्पंदनहीन भासते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में शंका होने लगती है। नये कवियों की विषय-व्यापकता, नया भाव-बोध तथा नवीन दृष्टिकोण सराहनीय है। सो! प्रकृति व मानव का संबंध अनादि काल से शाश्वत् व अटूट रहा है। वह हर रूप में आराध्या रही है। परंतु जब-जब मानव ने प्रकृति का अतिक्रमण किया है, उसने अपना प्रकोप व विकराल रूप दिखाया है, जो प्राकृतिक प्रदूषण व कोरोना के रूप में हमारे समक्ष है। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव नियति के सम्मुख विवश व असहाय भासता है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जियाजी…“।)
अभी अभी # ९९० ⇒ आलेख – जियाजी श्री प्रदीप शर्मा
ज्ञान, बुद्धि और प्रेम तीनों में, कहने को तो ढाई आखर ही है, लेकिन सबसे ऊंची प्रेम सगाई ! ऐसा क्या है कि रिश्तों में ज्ञान और बुद्धि, दोनों की दाल नहीं गलती।
रिश्ते में तो हम उस आठ साल की बच्ची के क्या लगते थे, यह हम तब भी नहीं जानते थे, लेकिन बच्चे जो सुनते हैं, वही दोहरा देते हैं। हमने जगत ताऊ और जगत मामा बहुत देखे हैं। जब पीढ़ी समझदार हो जाती है, तो इन रिश्तों के खिलाफ बगावत कर बैठती है। कैसे चाचा नेहरू और कैसे महात्मा, माय फुट। कहा न ज्ञान और बुद्धि को प्रेम फूटी आंखों नहीं सुहाता।।
रिश्तों में सम्मान नहीं, प्रेम ढूंढा जाता है। जीजी कब जिज्जी हो जाती है, कुछ पता ही नहीं चलता। मां कहते कहते अनायास ही मुंह से अम्मा क्यों निकल जाता है। मम्मी कब मॉम हो गई पता नहीं चला। अच्छे भले डैडी भी डैडू बनने से नहीं बच पाए।
चाची का तो कुछ नहीं बिगड़ा, अच्छे भले चाचा, अचानक चाचू हो गए। खैर है, हम भी रिश्ते में भले ही जियाजी बन गए हों, कभी जीजू नहीं बने। नाम तो बनते बिगड़ते रहते हैं, बस रिश्तों में मिठास कायम रहे।
एक पत्नी जितनी उसके मायके जाकर खुश होती है, मेरा जैसा जालिम पति, कभी उतना ही अपने ससुराल जाकर नाराज़ होता था। बर्नार्ड शॉ कह गए हैं, जो चाहते हैं, वह पा लो। वर्ना जो पाया है, वही चाहने लग जाओगे। अब किसको क्या मिला, ये मुकद्दर की बात है। लेकिन आखिर बुद्धि और ज्ञान की हार हुई और प्रेम की जीत। हमने भी जो पाया, अंततः उसे ही चाहने लग गए।।
कुछ रिश्ते तो हम जन्म से ही ओढ़कर आते हैं और शादी के बाद तो कुछ रिश्ते आप पर बुरी तरह लपेट दिए जाते है। अग्नि के सात फेरों के साथ कुछ शासकीय प्राथमिक/माध्यमिक कन्या विद्यालय की छात्राओं का साली के रूप में प्रवेश हुआ। हम तब बड़े खूसट किस्म के इंसान थे (वैसे, आज भी हैं), रिश्तों के प्रेम और जज्बात नहीं समझते थे। छोटी छोटी सालियां हमें चोर निगाहों से हमें ऐसे देखा करती, जैसे चिड़िया घर में किसी खतरनाक प्राणी को देखा जाता है। हमारी वक्र दृष्टि उन पर पड़े, उसके पहले ही वह सरक कर, वहां से भाग जाती थी। ज्ञान, बुद्धि का तो हमें पता नहीं, लेकिन तब हममें प्रेम का नितांत अभाव था।
यह तो रिश्तों का एक तरह से श्री गणेश ही था। रिश्ते बनते हैं तो बढ़ते भी हैं और परिपक्व भी होते हैं।
एक मुंहबोली साली अन्य सालियों की देखा देखी मुझे भी जियाजी कहने लगी। मुझे उसका यह मासूम अपभ्रंश बहुत पसंद आया। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली यह साली जब स्कूल से आती तो मैं उसकी क्लास लेता। लाओ तुम्हारी हिंदी की किताब दो। सालों से पाठ्य पुस्तकों के दर्शन भी नहीं किए थे। बच्चों की याददाश्त अच्छी होती है। वे पूरा पाठ रट लेते हैं। हमें भी हमारे बचपन का पाठ, अमर घर चल, अनायास याद आ गया।।
मैं उससे कविता सुनाने का कहता, वंदे मातरम् और जन गण मन भी वह मनोयोग से सुनाती। वह बहुत आराम से, धीमी गति के समाचारों की तरह बड़े आराम से अपना एक वाक्य पूरा करती थी। जन गण मन वह बड़े आत्म विश्वास के साथ सुनाती थी। लेकिन बस अंत में तव शुभ नामे जागे, के बाद, तव शुभ आशिष मांगे को वह, अनजाने में, उसी मासूमियत से, तव शुभ आशिक मांगे, बोल जाती थी। और उसी सादगी, और भोलेपन में जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे, के बाद जय हिंद भी बोल देती थी।
कहा भी गया है, Ignorance is bliss. उसका जियाजी बोलना मुझे आज भी अच्छा लगता है लेकिन राष्ट्रगान की भूल मासूम होते हुए भी, उसमें सुधार आवश्यक था। उसे बड़े तरीके से उसकी गलती का अहसास कराया गया। हम सबका बचपन ऐसा ही होता है।।
आज वह बड़ी हो गई है, बाल बच्चे वाली हो गई है। जब भी मिलती है, मैं कहता हूं, अच्छा चलो जन गण मन सुनाओ और वह आज भी उसी अंदाज में जवाब देती है, क्या जियाजी आप भी ..!!
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘श्री राम ‘।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ९ ☆
आलेख – केरलम का मुकुट रत्न ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
भारत भिन्न भिन्न संस्कृतियों का देश है l और यही कारण है कि यहाँ का हर धर्म, हर जाति एक दूसरे की संस्कृति से परिचित है l
भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि चातुर्मास में भगवान सो जाते हैं जिसे हम देव शयनी ग्यारस कहते हैं और भगवान देव उठनी ग्यारस पर उठ जाते हैं l देव शयनी ग्यारस के पूर्व केरलम राज्य त्रिशूर पूरम नाम का उत्सव मनाता है l कहते हैं कोच्ची महाराज के समय से इस उत्सव को मनाने की परम्परा चली आ रही है l यह उत्सव केरलम की संस्कृति के भिन्न पहलुओं को दर्शाता है साथ ही यह वार्षिक उत्सव इस राज्य की संस्कृति में चार चांद भी लगा देता है l
जब चन्द्रमा और फाल्गुनी नक्षत्र एक रेखा में आते हैं उस दिन से इसकी शुरुवात होती है l यह सात दिन का उत्सव होता है l इसकी विशेषता हाथियों की परेड होती है l इसमें करीब 30-35 गजराज सम्मिलित होते हैं l सभी सोने के जाल से, आभूषणों से सजे होते हैं l
त्रिशूर के पश्चिमी क्षेत्र से भगवान श्रीकृष्ण और त्रिशूर के पूर्वी क्षेत्र से माँ भगवती ऐसे पूरे दस मंदिर इस उत्सव में आमंत्रित होते हैं l ये सभी अपने अपने देवदूतों अर्थात गजराजों पर बैठकर शोभायात्रा के साथ वड़क्कूनाथन मंदिर में विराजमान हो जाते हैं l
एक एसी संस्कृति जहाँ हम हाथी को गणेश के रूप में भी पूजते हैं, हर अच्छे कार्य की शुरुवात हम गणेश वंदन से करते हैंउसी तरह इस उत्सव की शुरुवात भी एक राजसी हाथी से होती है l यह हाथी अपनी पीठ पर भगवान अयप्पा का फोटो रख वड़क्कूनाथन मंदिर के दक्षिणी दरवाजे को हौले से अपने पैर से खोलता है और ये उत्सव शुरु हो जाता है l उसी समय आकाश में सुंदर आतिशबाजी की शुरुवात होती है जो सात दिन तक निशा को होने से रोकती है l वड़क्कूनाथन मंदिर भगवान शिवजी का है l यह उत्सव भगवान शिव को समर्पित होता है l पूरे सात दिन पंच पकवानों का नैवैद्य लगाया जाता है l
15-15 गजराज मंदिर के पूर्वी और पश्चिमी दरवाजे पर सजधज कर परेड के लिये खड़े होते हैं l इन पर बैठने वाले छत्रधारी अपने हाथों में सजे हुए खम्बे लिये होते हैं जो की सुपाडी के पेड़ से बने होते हैं l इन खम्बो पर सुंदर सुंदर चमकीले रंगों से सजे रेशम के कपड़ों के बने छाते होते हैं l साथ में मोरपंखो से बने पंखे होते हैं l सभी गजराज ड्रम, तुरही, पाइप, झाँज, कोम्बू इन पाँच वादयों की धुन पर एकएक कर आगे आते हैं और छत्रधारी इन रंगबिरंगी छातों की अदला बदली करते हैं l साथ में लोगों की तालियों की गदगडाहट की आवाज भी शामिल हो जाती है l
इस उत्सव के सातवे दिन आतिश बाजी के साथ ही सभी देवता एक दूसरे से विदा लेते हैं l पुनः अपने वाहनों पर सवार होकर अपने अपने मंदिरों में प्रतिष्ठित हो जाते हैं l
इस उत्सव में हिन्दु ही नहीं अपितु सभी धर्म के लोग शामिल होते हैं जो एकता का प्रतीक दर्शाता है l
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता पारिवारिक सन्नाटा… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“माँ, इस बार नहीं आ पाऊँगा… ऑफिस में बहुत काम है।”
कुछ पल चुप्पी रही।
“कोई बात नहीं बेटा, काम ज़रूरी है…”
फोन कट गया।
माँ ने दरवाज़े की ओर देखा – जो कई दिनों से नहीं खुला था।
पापा धीरे से बोले, “इस बार भी त्योहार… खाली ही रहेगा।”
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आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ दो दुनियाएँ आमने-सामने हैं – एक तरफ पारंपरिक पारिवारिक संस्कार, और दूसरी तरफ आधुनिक जीवनशैली। इस टकराव में सबसे ज्यादा जो चुपचाप प्रभावित हो रहा है, वह है – परिवार का भावनात्मक ताना-बाना। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर एक अनकहा सन्नाटा धीरे-धीरे गहराता जा रहा है।
पारंपरिक परिवारों में पले-बढ़े माता-पिता के लिए बच्चे केवल जिम्मेदारी नहीं होते, वे उनका पूरा संसार होते हैं – उनकी पहचान, उनका सपना, उनका सहारा। उन्होंने बच्चों को सिर्फ बड़ा नहीं किया, बल्कि अपनी इच्छाओं, अपने समय और कई बार अपने सपनों को भी उनके नाम कर दिया। उनके लिए परिवार का अर्थ था – साथ रहना, एक-दूसरे का सहारा बनना और हर परिस्थिति में एकजुट खड़े रहना।
लेकिन समय के साथ रिश्तों की परिभाषाएँ बदलने लगीं।
आज के युवाओं के लिए जीवन का केंद्र उनके सपने, उनका करियर और उनकी स्वतंत्रता बन गए हैं। वे आगे बढ़ना चाहते हैं, अपनी पहचान बनाना चाहते हैं – और इसके लिए घर से दूर जाना भी उन्हें सही लगता है। यह बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन इसे स्वीकार करना हर माता-पिता के लिए आसान नहीं होता।
यहीं से शुरू होता है वह मौन संघर्ष, जो अक्सर शब्दों में सामने नहीं आता।
माता-पिता कई बार खुद से सवाल करते हैं –
“क्या हमने अपने बच्चों को यही सिखाया था कि वे हमसे दूर हो जाएं?”
“क्या हमारी परवरिश में कहीं कमी रह गई?”
असल में ये सवाल बच्चों से ज्यादा खुद से होते हैं – और शायद इसलिए ज्यादा पीड़ा देते हैं।
जब बच्चे अपने सपनों की ओर बढ़ते हैं, तो माता-पिता के लिए यह गर्व का क्षण भी होता है और एक गहरी खालीपन की शुरुआत भी। घर वही रहता है, दीवारें वही रहती हैं – लेकिन आवाजें कम हो जाती हैं, और खामोशी बढ़ जाती है। कभी जो घर हंसी और बातचीत से गूंजता था, वह अब सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनता है।
बदलता सामाजिक ढांचा इस स्थिति को और जटिल बना देता है। पहले संयुक्त परिवारों में कई रिश्ते साथ होते थे – जिससे भावनात्मक सहारा बना रहता था। आज के एकल परिवारों में माता-पिता अक्सर अकेले रह जाते हैं। उनके पास बात करने वाला कोई नहीं होता, और जो कहना चाहते हैं, वह भी कह नहीं पाते।
फोन पर वे हंसते हैं –
“हाँ बेटा, हम बिल्कुल ठीक हैं…”
लेकिन फोन रखने के बाद वही सन्नाटा उन्हें फिर से घेर लेता है।
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सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यह दर्द अक्सर अनकहा रह जाता है। माता-पिता अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनना चाहते, इसलिए अपनी भावनाओं को चुपचाप दिल में ही दबा लेते हैं।
यह कहना आसान है कि “समय बदल गया है, हमें भी बदलना चाहिए” – लेकिन भावनाएँ इतनी सरल नहीं होतीं। सालों की परवरिश, जुड़ाव और उम्मीदों को एक झटके में बदलना संभव नहीं है।
फिर भी, इस बदलते दौर में संतुलन ही समाधान है।
माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों का आगे बढ़ना उनकी परवरिश की सफलता है, असफलता नहीं। वहीं, बच्चों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भावनाओं से भरे इंसान हैं – जिन्हें समय, संवाद और साथ की आवश्यकता होती है।
अंततः, यह टकराव परंपरा और आधुनिकता का नहीं, बल्कि समझ और संवेदना का है। अगर दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करें, तो यह दूरी कम हो सकती है।
क्योंकि घर की खामोशी को तोड़ने के लिए बड़ी आवाज़ नहीं,
बस थोड़ा समय… और सच्चा अपनापन ही काफी होता है।
और सच तो यह है – माता-पिता का दिल कभी खाली नहीं होता, वह हमेशा अपने बच्चों से भरा रहता है…
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “च्युइंगम…“।)
अभी अभी # ९८९ ⇒ आलेख – च्युइंगम श्री प्रदीप शर्मा
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आप खुशी खुशी कुछ भी चबा सकते हो,लेकिन क्या आपने कभी गम को चबाया है ! हमारे साहित्य के वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ फरमाते हैं ;
हम सब काल के दांतों तले
चबते चले जाते हैं
च्युइंगम की तरह
कच,कच कच
बड़ा कठोर सच …
और उधर सभी पीड़ाओं का संगीत से उपचार करने वालों का मानना है कि ;
जब दिल को सताये गम
तू छेड़ सखि सरगम
सा रे ग म पा …..
हमारे जगजीत सिंह बड़े भोले हैं। वे नहीं जानते आज की पीढ़ी को। जब भी किसी खूबसूरत युवा चेहरे को मुस्कुराता देख लेते हैं,बेचारे बड़ी मासूमियत से पूछ लेते हैं ;
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या गम है, जिसको चबा रहे हो !
उन्हें कौन बतलाए। आज की पीढ़ी इतनी खुश है ,इतनी खुश है, कि कभी खुशी,कभी च्युंइगम। वह मस्ती में झूमते हुए सिर्फ किशोर के ही मस्ती भरे नगमे गाना चाहती है। गम छोड़ के मनाओ रंगरेली।
जिस तरह हाथी के दांत खाने के, और दिखाने के अलग होते हैं, ठीक उसी तरह गम भी दो तरह का होता है,खाने का और चिपकाने का। ठंड में अन्य सूखे मेवों के साथ गोंद के लड्डू बड़े स्वास्थ्य वर्धक होते हैं। नवजात शिशुओं की माता को भी कई औषधीय गुणों से युक्त,शक्तिवर्धक जापे के लड्डू खिलाए जाते हैं। बचपन में हमने भी चखे हैं। हमें तो च्युइंगम से बेहतर लगे। पसंद अपनी अपनी। ।
जुगाली के भी सबके अपने अपने तरीके होते हैं। वैसे तो मुंह चलने और जबान चलने में अंतर है,लेकिन कुछ लोग इस भ्रम में रहते हैं कि च्युइंगम से मुंह तो चलता रहता है,लेकिन जबान पर ताला लग जाता है। कुछ सयाने लोग इसे जबड़ों के व्यायाम की संज्ञा भी देते हैं। चोर,चोरी से जाए,लेकिन हेराफेरी से ना जाए। पान आप उसे खाने नहीं दो,यहां वहां थूकने नहीं दो। गुटखा हमारे स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही,जो इनका विज्ञापन कर रहे हैं,हमारी नजर में, वे भी कम खतरनाक नहीं। खुद तो पैसा कमाओ और हमारी आदत बिगाड़ो,यह नहीं चलेगा। हम भले ही अपनी आदत नहीं सुधार पाएं,लेकिन ठीकरा तो आपके माथे पर ही फोड़ेंगे। बॉयकॉट पद्मश्री की त्रिमूर्ति।
च्युंइगम को देख,हमें अपना बचपन याद आ गया। सुबह जब टहलने जाते थे ,तो किसी भी नीम के पेड़ की नाजुक टहनियों को तोड़,उसकी दातून बना लेते थे और फिर,बस,उसे दांतों से चबाया करते थे। मसूड़ों और दांतों का व्यायाम होता था और नीम का कसैलापन शरीर में प्रवेश कर जाता था। करैला नीम चढ़े ना चढ़े, तब तो नीम ही हमारा हकीम भी था। ।
मुखशुद्धि से मन की भी शुद्धि होती है। तन और मन अगर स्वस्थ रहे सौंफ,इलायची और लौंग का सेवन बुरा नहीं। लेकिन सिर्फ खुशी के खातिर,ऐसा भी क्या किसी गम को चबाना, जो बाद में तकलीफदेह साबित हो।
आप ही आपके चिकित्सक भी हो और निःशुल्क परामर्शदाता भी। गम को चबाना,अथवा गम को गलत करना,दोनों ही गलत है। हमारे होठों पर तो आज सिर्फ तलत है। हमारे सारे गम दूर करती सरगम। हमारी प्यारी कानों के जरिए आत्मा में प्रवेश करती असली च्युइंगम। ।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७६ ☆ देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पिछले कुछ दिनों से चारों दिशाओं में “मदर्स डे” (मातृ दिवस) की चर्चा हो रही हैं। विगत एक दशक से मदर्स डे शब्द सुनना आरंभ किया है।
बचपन से बुढ़ापे की दहलीज तक का जीवन तो बिना मदर्स डे मनाए ही व्यतीत हो गया था। अब जीवन की अंतिम पायदान पर ये सब देखने/ सुनने को मिल रहा है।
बाज़ार सज चुके है, पश्चिम में खुशियां मानने का आरंभ कार्ड भेज का शुभकामनाएं प्रेषित करने से होता हैं। नाना प्रकार के उपहार मां के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। ऑनलाइन व्यापार के चतुर खिलाड़ी भी इस रेस में अग्रणी रहते है।
“कुछ मीठा हो जाए” के नाम से ज़हर परोसने वाले भी सक्रिय हो जाते हैं। बाज़ार को भुनाने में सबसे आगे रहते है। आज भुने हुए चने की दुकान मुश्किल से मिलती है, लेकिन चॉकलेट/ केक हर दुकान पर मिल जाता है। किसी भी दिन, कभी भी, कुछ भी हो केक काट कर खुशियां मनाया जाना अब हमारे समाज में भी एक रिवाज़ बन चुका है।
हमारी संस्कृति जहां मां अपने पूरे जीवन में बच्चों को सभी तरह की खुशियां ही नहीं देती वरन उनके सब कष्ट/दुःख का निवारण भी करती है। उसको वर्ष में एक दिन का सम्मान देना कदापि न्यायोचित नहीं हो सकता है।
प्रतिदिन प्रातः काल मां के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की हमारी परंपरा अब विलुप्तता की कगार पर है। एक दिन मां को भगवान बना देने से मातृत्व ऋण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता हैं। इसलिए अपनी संस्कृति का अनुपालन कर जब मौका मिले मां से आशीर्वाद प्राप्त करते रहें।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हमारा आदर्श समाज…“।)
अभी अभी # ९८८ ⇒ आलेख – हमारा आदर्श समाज श्री प्रदीप शर्मा
किसे पता था कि व्यावहारिक जीवन से आदर्श शब्द अचानक पलायन कर शब्दकोश में दुबककर बैठ जाएगा और उसके दर्शन केवल गीताप्रेस गोरखपुर की आदर्श नारी और आदर्श बालक जैसी पुस्तकों में ही संभव हो पाएँगे।
हमने बचपन में आदर्शों को ऐसे ही ढोया है जैसे आज की पीढ़ी कथित रूप से भ्रष्टाचार और आतंकवाद को ढो रही है। अगर मैं यह कहूँ कि उस ज़माने में लोग आदर्श ही ओढ़ते और आदर्श ही बिछाते थे, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।।
आज के समय की नर्सरी और kg 1 kg 2 तब कच्ची और पक्की पहली और अ-खण्ड, ब-खण्ड कहलाती थी। रोते हुए बच्चों को पकड़-पकड़कर स्कूल भेजा जाता था। हमारी पहली नर्सरी का नाम भी आदर्श बाल मंदिर ही था। एक आदर्श खंडहरनुमा ढाँचा स्कूल कहलाता था, जो समय के साथ विवादित ढाँचे के पहले ही ढह गया। आदर्शों का टिका रहना इतना आसान भी नहीं होता।
हमारे आदर्श शिक्षक, आजीवन नैतिकता और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति ही रहे। कई चेले शक्कर निकल गए, लेकिन गुरु गुड़ ही रह गए। उनकी ईमानदारी गूँगे का गुड़ थी, जो होते हुए भी, आँखों से नज़र नहीं आती थी। आज केवल उनके स्मरण मात्र से ही आँखें नम हो जाती हैं।।
गाइड और ट्यूशन जैसे शब्द शिक्षा में प्रचलित नहीं थे। शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श शिशु विहार, आदर्श कन्या विद्यालय
और आदर्श महाविद्यालय, शिक्षा के आदर्श केंद्र थे। हम आदर्श नगर में ही रहते थे और एक आदर्श को-ऑपरेटिव सोसाइटी में ग़बन भी हमारे ही सामने हुआ था।
आदर्श का इतना बोलबाला था कि आदर्श पुस्तक भंडार, आदर्श किराना स्टोर तो ठीक, रहने के लिए आदर्श लॉज और खाने के लिए आदर्श भोजनालय तक उपलब्ध था।।
बीच में आदर्श से थोड़ी राहत मिली ज़रूर, जब अंग्रेज़ी ने सर उठाया। फिर दौर चला आइडियल कॉफ़ी हाउस और आइडियल पैथोलॉजी का।
शिक्षा का आरंभ भी आइडियल प्रिपप्रेटरी स्कूल से होने लगा। लेकिन आइडियल शब्द आदर्श का विकल्प नहीं बन पाया।
नैतिकता, ईमानदारी और आदर्श को आप अलग अलग नहीं कर सकते। पुस्तकों के ज्ञान ने हमेशा सच बोलने को बाध्य कर दिया। झूठ बोलने से पाप लगता है, यह डर, कई बार झूठ बोलने के बाद जाता रहा। पाप के डर से नहीं, पकड़े जाने के डर से कभी चोरी करने की हिम्मत नहीं हुई और हम शरीफ बनकर रह गए।
नैतिकता साहस का काम है। जिनमें दुस्साहस होता है, वे आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी को ताक में रख देते हैं ! जब सम्पन्न, सुखी और इज़्ज़तदार बन जाते हैं, तब टोपी और कोट की तरह आदर्श और नैतिकता ओढ़कर समाज में प्रकट हो जाते हैं। समाज उन्हें चिंतक, विचारक और समाज सुधारक जैसे विशेषणों से अलंकृत एवं पुरस्कृत करता है। उनके सम्मान में फलाने आदर्श पुरुष के नाम से अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन होता है।
सफलता के रास्ते में आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी बड़े बड़े स्पीड ब्रेकर हैं। जो इनमें उलझकर पिछड़ गया, वह समय से पिछड़ गया। आगे बढ़ने वाले कब ऐसे अवरोधक से घबराते हैं। वे समय के साथ चलते हैं, और अपनी मंज़िल पर पहुँच ही जाते हैं। समय के साथ चलना ही समझदारी है।।
क्या आपने इतना उन्नत समाज पहले कभी देखा है ? चुनाव घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है। इतने आदर्श चुनाव 70 साल में पहले कभी नहीं हुए। हिंसा, बूथ पर कब्ज़ा और बोगस वोटिंग से पूरी तरह छुटकारा। अब आप अपने आदर्श उम्मीदवार को बिना भय और लालच के मत दे सकते हैं। इससे अधिक आदर्श वातावरण की तो शायद आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
अब हम विकासशील देश नहीं रहे। पूरी तरह विकसित हो गए हैं। क्यों न बरसों से ताक में रखा ईमानदारी का तावीज़ पुनः गले में पहन लिया जाए। यह हमारी बेईमानी और भ्रष्टाचार से रखवाली तो करेगा ही, हमें एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद भी करेगा।।