श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म – मुग्धता…“।)
अभी अभी # १०७५ ⇒ आलेख – आत्म – मुग्धता
श्री प्रदीप शर्मा
COMPLACENCY
दर्पण झूठ ना बोले ! अगर झूठ बोलता तो कौन दर्पण देखता ? बार बार आइना कौन देखता है, वही जो खूबसूरत होता है, सुंदर होता है। फिर भी जब विश्वास नहीं होता, तब ही यह प्रश्न किया जाता है, मैं कैसी लग रही हूं ? और अगर फिर भी जवाब संतोषजनक नहीं मिलता, तो मूड खराब हो जाता है। दो घंटे की तैयारी पर पानी फिर जाता है।
दूसरे आप पर मुग्ध हों, उससे पहले यह जरूरी है कि आप अपने आप पर मुग्ध हों। लता जी का एक खराब गाना है, शायद आपको अच्छा लगे, उसके बोल हैं ; आज मैं जवान हो गई हूं, गुल से गुलिस्तान हो गई हूं। ये दिन, ये साल ये महीना, ओ मिट्ठू मियाँ, भूलेगा मुझको कभी ना। नायिका आखिर क्या करे, किसी से तो अपने मन की बात शेयर करे। ये पपीहा भी बहुत काम आता है ऐसे वक्त।।
हमें यह तो पता है, हमारा निवास कहां है, लेकिन हमारे शरीर में स्थित आत्मा का निवास कहां है, कोई नहीं जानता। हम अक्सर आत्म संतोष, आत्म बल, आत्म निरीक्षण और आत्मा के दुखी होने की बात करते हैं, वह आत्मा जो नित्य है, शुद्ध है। लेकिन शरीर में रहकर वह भी सुखी दुखी होती रहती है। क्या हमें उसे संतुष्ट रखने का अधिकार नहीं। जब हम आत्म मुग्ध होते हैं, तो हमारी आत्मा कितनी प्रसन्न होती है, क्या कभी आपने सोचा है।
एक बच्चे में राग द्वेष नहीं होता। वह कितना आत्म मुग्ध होता है। मैं मम्मा का राजा बेटा हूं। मैं कितना सुंदर हूं। मैं दुनिया का सबसे बहादुर बच्चा हूं। अच्छे बच्चे कभी झूठ नहीं बोलते। अच्छाई का दूसरा नाम ही आत्म मुग्धता है। हम यही तो चाहते हैं कि हमारे बच्चे में अच्छाई कूट कूटकर भरी जाए। इससे उसके आत्म विश्वास में वृद्धि होती है। निराशा की भावना बच्चे को हतोत्साहित करती है, उसके विकास में बाधा बनती है।
आत्म मुग्धता, खुद की तारीफ़ है। अपने मुंह से अपनी तारीफ़ अच्छी नहीं लगती, लेकिन जब सभी गुण बाजार में बिकने लगे, तो उनकी भी मार्केटिंग जरूरी हो जाती है। आजकल आदमी भी एक उत्पाद की तरह हो गया है। उसकी भी मार्केट वैल्यू है। प्रचार, दिखावा और अतिशयोक्ति के बिना कहां किसी के गुणों की आजकल पहचान होती है। साक्षात्कार, जिसे हम इंटरव्यू कहते हैं, बिना तैयारी के नहीं दिए जाते। अपना एक बायोडाटा तैयार करना पड़ता है, खुद को श्रेष्ठ साबित करना पड़ता है।।
आत्म मुग्धता कहीं वरदान है तो कहीं अभिशाप, लेकिन अगर आपको अवसाद और नकारात्मकता से बचना है, तो आत्म मुग्ध बनें। एक राजनेता जितना आत्म मुग्ध होता है, वह उतना ही आगे बढ़ता है, लोकप्रिय होता जाता है। अपने गुणों का प्रचार करने का भी एक तरीका होता है। आपकी तारीफ आपके आगे आगे चले, और आप पीछे पीछे। और आपके पीछे आपके तरफदार।
अवसाद, हीन भावना और पराजय की काट है, आत्म मुग्धता। आप स्वयं ही अपने गुणों से संतुष्ट नहीं, तो लोग क्या खाक होंगे। पहले अपनी तारीफ के पुल बाधिये, फिर उस पर अपने गुणों की चादर बिछाइए, और मौका आने पर प्रायोजकों से उस पर रेड कार्पेट बिछवाइए और शान से चलिए। जो जितना आत्म मुग्ध होता है, दुनिया उस पर उतनी ही मुग्ध होती है। मायूस चेहरों पर तो मक्खी भी नहीं बैठती।
अपनी आत्मा की सुनें। अगर आपकी आत्मा को आलोचना पसंद नहीं, तो ऐसे लोगों से दूर रहें जो आपमें कमियां ढूँढते हैं। जो गुण के पारखी हैं, वे आपकी ओर खिंचे चले आएंगे। अपने व्यक्तित्व को विशाल बनाइए, यही आत्मोत्थान की निशानी है।।
जाने वालों, जरा होशियार, आगे पीछे हमारी सरकार, यहां के हम हैं राजकुमार। सारी दुनिया में अपनी जय जयकार, यहां के हम हैं राजकुमार। आत्म मुग्ध हैं हम फिर काहे का गम …!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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