श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९८ ☆
☆ रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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आम नीम बरगद संग, पीपल की छाँव ।
महुआ और जामुन से, महकेगा गाँव ।।
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टेसू के लाल फूल, चंपा सुहाय ।
गुलमोहर सेमल मन, सबका लुभाय ।।
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रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति और जीवन-मूल्यों से जुड़ने का भी सुंदर अवसर है। जिस तरह राखी का धागा भाई-बहन के रिश्ते को प्रेम और जिम्मेदारी से बाँधता है, उसी तरह एक पौधा हमें धरती के साथ अपने रिश्ते की याद दिलाता है।
आज जब पेड़-पौधों की संख्या घट रही है और पर्यावरण अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब रक्षाबंधन को हरियाली से जोड़ना एक सार्थक पहल हो सकती है। इस वर्ष हम अपने भाई या बहन की कलाई पर राखी बाँधने के साथ एक पौधा भी लगा सकते हैं और उसे अपने रिश्ते की तरह सहेजने का संकल्प ले सकते हैं। नीम, पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला या कोई फलदार पौधा—हर पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा प्रेम-पत्र बन सकता है।
कल्पना कीजिए, जिस दिन भाई-बहन साथ मिलकर एक पौधा लगाएँ और कहें—“जैसे यह पौधा बढ़ेगा, वैसे ही हमारा स्नेह भी बढ़ता रहे”—तो रक्षाबंधन का अर्थ कितना व्यापक हो जाएगा। राखी का धागा कुछ समय बाद उतर जाएगा, लेकिन लगाया हुआ पेड़ वर्षों तक उस प्रेम की स्मृति बनकर खड़ा रहेगा।
प्रकृति भी तो हमारी बहन जैसी है—वह हमें छाया देती है, हवा देती है, फल-फूल देती है और बिना किसी अपेक्षा के हमारा जीवन सँवारती है। उसकी रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, इस रक्षाबंधन एक नई परंपरा शुरू करें—एक राखी रिश्ते के नाम और एक पौधा प्रकृति के नाम। क्योंकि जब रिश्तों में प्रेम और धरती पर हरियाली होगी, तभी जीवन सचमुच सुंदर होगा।
भाव यही जन-जन के , मन में जगाएँ।
एक- एक पौधे को, घर में लगाएँ ।।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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