हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३० ☆ हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३० ☆

?  आलेख – हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी दिवस पर हम प्रायः एक ही बात कहते हैं, हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी पहचान है, हमें हिंदी का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को बचाने की आवश्यकता नहीं बची है। फिल्मी गीतों में , लोक व्यवहार में वह सुरक्षित है। आज हिंदी को सक्षम बनाने की आवश्यकता है।

लेकिन एक प्रश्न अवश्य है, क्या हिंदी भविष्य की भाषा बन रही है?

इसका उत्तर हमारी भावनाओं में नहीं, हिंदी की उपयोगिता में छिपा है।

आज यदि किसी बच्चे को हिंदी में अच्छी शिक्षा मिले, किसी युवा को हिंदी में रोजगार मिले, किसी वैज्ञानिक को अपना शोध हिंदी में दुनिया तक पहुँचाने का अवसर मिले, किसी उद्यमी को हिंदी में अपना बाजार मिले और किसी नागरिक को तकनीक अपने ही शब्दों में उपलब्ध हो , तभी हिंदी का वास्तविक विस्तार होगा।

इसलिए हिंदी के लिए हमें तीन काम करने होंगे।

पहला, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाना होगा।

विज्ञान, चिकित्सा, कानून, तकनीक, प्रबंधन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में तैयार करनी होगी। केवल अंग्रेजी शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में मौलिक ज्ञान-सृजन करना होगा।

दूसरा, हिंदी को डिजिटल भाषा की पूरी ताकत देनी होगी।

आज भाषा का भविष्य पुस्तकालयों से अधिक मोबाइल और स्क्रीन पर तय हो रहा है। हमें अच्छे हिंदी ब्लॉग, पॉडकास्ट, वीडियो, ई-पुस्तकें, डिजिटल पाठ्यक्रम और एआई आधारित हिंदी उपकरण बनाने होंगे।

हिंदी जितनी अधिक टेक्नोलॉजी फ्रेंडली होगी, उतनी ही अधिक भविष्य की भाषा होगी।

तीसरा, हमें हिंदी का बाजार बनाना होगा।

 यह बात थोड़ी कठोर लग सकती है, लेकिन जरूरी है।

 जिस भाषा में आर्थिक अवसर नहीं होंगे, युवा उस भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़कर भी व्यावहारिक जीवन में दूसरी भाषा की ओर चले जाएंगे।

 इसलिए हिंदी में कंटेंट क्रिएशन, अनुवाद, प्रकाशन, विज्ञापन, सॉफ्टवेयर, शिक्षा और एआई, इन सबको रोजगार से जोड़ना होगा।

 और एक बात और।

हिंदी का विस्तार दूसरी भाषाओं को हटाकर नहीं होगा।

हमें अंग्रेजी से डरने की नहीं, उससे संवाद करने की आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा की नहीं, सहयोग की आवश्यकता है।

 हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहणशीलता है। वह संस्कृत से लेती है, उर्दू से लेती है, अंग्रेजी से लेती है और लोकभाषाओं से भी सीखती है।

 हम हिंदी के केवल अच्छे वक्ता न बनें,

हिंदी के अच्छे निर्माता बनें।

एक अच्छी किताब लिखें।

एक अच्छा डिजिटल पाठ तैयार करें।

एक उपयोगी हिंदी ऐप बनाएँ।

एक वैज्ञानिक विषय को सरल हिंदी में समझाएँ।

एक बच्चे को हिंदी में कुछ नया सिखाएँ।

क्योंकि भाषा केवल बोलने से नहीं बढ़ती।

भाषा तब बढ़ती है, जब उसमें नया ज्ञान, नया विचार और नया भविष्य लिखा जाता है।

 

आइए, हिंदी को केवल अपनी पहचान न बनाएँ।उसे अपनी सृजन-शक्ति, अपनी तकनीक और अपने भविष्य की भाषा बनाएँ।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९३ ⇒ विचार और शून्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार और शून्य…“।)

?अभी अभी # १०९३ ⇒ आलेख – विचार और शून्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या हम हमेशा ही सोचते, विचारते रहते हैं! होते होंगे कुछ चिंतक और विचारक, लेकिन लगातार कौन सोचते रहता होगा। मेरी मां अक्सर शांत रहा करती थी, वह मितभाषी और मृदुभाषी थी। उनका चेहरा शांत था, लेकिन लगता था, जैसे वह हमेशा कुछ सोचती रहती हो। अगर पूछो तो यही जवाब मिलता था, नहीं कुछ नहीं!

लेकिन साफ नजर आ जाता था कि उनके सोचने की प्रक्रिया में मैने कुछ व्यवधान उत्पन्न कर दिया है। मुझे मालूम था, वह क्या सोचती थी। उन्हें सबकी चिंता रहती थी, वह सदा सबका भला ही सोचते रहती थी।

शायद सबकी मां ऐसी ही हो। हमें अपने आपके बारे में ही सोचने से फुर्सत नहीं मिलती, क्या हम किसी के बारे में सोचें। फिर भी हम सोचते ही रहते हैं, लोगों से

विचार विमर्श भी करते ही रहते हैं।।

लिखने के लिए पहले विचार आता है, फिर उस विचार पर हम सोचना शुरू कर देते हैं। वह विचार हमारा विषय बन जाता है। आप सोचते रहें, विचार आते चले जाएंगे, कितनों को आप अपने शब्दों अथवा लेखनी में कैद कर सकते हैं, आप ही जानो। कोई अगर बोलता है तो उसे रेकॉर्ड करना अथवा लिखना फिर भी आसान है, लेकिन हर सोचा हुआ विचार अथवा शब्द मूर्त रूप नहीं ले सकता। मन की गति और सोचने की गति से हम बराबरी नहीं कर सकते।

जब हम कुछ सोचते, विचारते नहीं, तब हम क्या करते हैं। क्या चुपचाप बैठे रहते हैं! जो भी हमें उस अवस्था में देखता है, यही कहता है, किस सोच में डूबे हुए हो ? तो क्या वाकई हम कभी कभी सोच में इतने डूब जाते हैं, कि हमें यह भी पता नहीं चलता, हम क्या सोच रहे थे।।

होती है एक विचार शून्य अवस्था, जिसमें हमारा चित्त शांत रहता है, और विचारों का आवागमन भी बंद सा हो जाता है, मानो विचारों पर कर्फ्यू लगा हो। पलट, तेरा ध्यान किधर है। सामने वाला नहीं जानता, आपकी अवस्था क्या है, क्योंकि उस समय आपका ध्यान उसकी ओर भी नहीं है।

योग में ध्यान की अवस्था बड़ी विचित्र है। अष्टांग योग में ध्यान का स्थान सातवां है, यानी यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहारऔर धारणा के बाद ध्यान का नंबर आता है, जिसके बाद तो सीधे समाधि ही लग जाती है। नहीं भाई, नहीं उलझना हमें इस योग के झंझट में, खास कर यम नियम की बात तो हमसे करो ही मत। अपने तो आसन वासन भले और बाबा रामदेव वाला अनुलोम विलोम और कपालभाति। और पते की बात बताऊं, साधो, सहज समाधि भली।।

सोचते सोचते कभी हम शून्य में चले जाते हैं, बस वही अवस्था तो विचार शून्य अवस्था है। दो विचारों के बीच कुछ समय ऐसा आ जाता है, जब हम कुछ भी नहीं सोचते, एक शून्य सा व्याप्त हो जाता है, अंदर, बस वही ध्यान है, लेकिन उसका समय बहुत कम होता है। जितनी शून्य की अवस्था बढ़ती जाएगी, उतना ध्यान का समय भी बढ़ता जाएगा।

साधन, चिंतन, मनन और स्वाध्याय सृजन के उत्तम सोपान हैं। शरीर और मन का निरोगी होना ही सहजावस्था है। इस अवस्था में हम खुद से ऊपर उठकर कुछ सोच विचार सकते हैं, कई अच्छे विचार इस समय मन में प्रवेश करते हैं, जिन शुभ संकल्पों का जीवन में क्रियान्वन संभव है। विचार की तरह, शून्य भी एक अनूठी उपलब्धि है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९२ – देश-परदेश – त से तोता ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९२ – देश-परदेश ☆

☆ त से तोता ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज प्रातः फ्लैट की बालकनी से पास के एक घर की छत पर तोतों का झुंड बैठा हुआ देखकर, हमारी दादी द्वारा पाले गए तोते की याद आ गई। घरों में पाला जाने वाला सबसे प्रिय पक्षी हमारा तोता। प्यार से इसको मिट्ठू भी बुलाया जाता है। “हरे रंग का है, ये तोता” बच्चों की एक पसदीदा कविता हुआ करती थी, अब तो “जैक एंड जिल” का समय भी जा चुका है।

पौराणिक कथाओं में राक्षस की जान तोते में हुआ करती थी। हमारे बॉलीवुड ने भी तोते का उपयोग अधिकतर “तोता मैना” के रूप में किया था। कहानियों में भी बहेलिये और तोते के बहुत सारे किस्से पढ़े और सुने थे।

तोते की संगत उसको राम राम कहना या फिर भद्दे शब्द भी सिखा देती है। कार्यालयों में जो लोग, उच्च अधिकारियों के करीब रहते है, उनको भी तोता कहा जाता है। जब किसी कार्यक्रम में जो लोग आयोजकों की तारीफ़ में कशीदे पढ़ने लग जाते हैं, उनको भी तोते की संज्ञा मिल जाती है।

यदि मुहावरों की बात करें, तो तोते के ऊपर बहुत सारे मुहावरे बन चुके हैं, जैसे कि तोता पालना, हाथ के तोते उड़ जाना, तोते की तरह आंखें फेरना, रट्टू तोता आदि। महिलाओं ने भी तोते के नाम से ही “तोतिया” रंग ईजाद कर दिया है। “तोतिया नाक” शब्द भी व्यक्ति के नयन नक्श की जानकारी देने के लिए उपयोग होता हैं।

तोते द्वारा पेड़ों पर कुछ फलों को चोंच मार दी जाती है। फल विक्रेता उसको सबसे मीठा होने का सर्टिफिकेट देकर, क्रेता को उल्लू बना देते हैं। तोतापरी आम की एक किस्म का रंग तोते जैसा ही होता हैं।

तोता पुराण को अब विराम देते हैं, वर्ना कुछ लोग हमें भी तोते का तोता कहने लग जायेंगे।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मेरी भाषा… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मेरी भाषा… ? ?

आज 14 सितम्बर अर्थात हिन्दी दिवस है। विभिन्न सरकारी कार्यालयों में हिन्दी पखवाड़ा मनाया भी जा रहा /है।

वस्तुत: भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। कूटनीति का एक सूत्र कहता है कि किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भाँति समझा और संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएँ लादने की कोशिश की।

असली मुद्दा स्वाधीनता के बाद का है। राष्ट्रभाषा को स्थान दिए बिना राष्ट्र के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने की  प्रवृत्ति के परिणाम भी विस्फोटक रहे हैं।

यूरोपीय भाषा समूह के प्रयोग से ‘कॉन्वेंट एजुकेटेड’ पीढ़ी, भारतीय भाषा समूह के अनेक  अक्षरों का उच्चारण नहीं कर पाती। ‘ड़’, ‘ण’  अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। ‘पूर्ण’, पूर्न हो चला है, ‘शर्म ’ और ‘श्रम’ में एकाकार हो गया है। हृस्व और दीर्घ मात्राओं के अंतर का निरंतर होता क्षय, अर्थ का अनर्थ कर रहा है। ‘लुटना’ और ‘लूटना’ एक ही हो गये हैं। विदेशियों द्वारा की गई ‘लूट’ को ‘लुटना’ मानकर हम अपनी लुटिया डुबोने में अभिभूत हो रहे हैं।

लिपि नये संकट से गुजर रही है। इंटरनेट खास तौर पर फेसबुक, एक्स, वॉट्सएप, इंस्टाग्राम पर अनेक लोग देवनागरी के बजाय रोमन में हिन्दी लिखते हैं। ‘बड़बड़’ के लिए barbar/ badbad  (बर्बर या बारबर या बार-बार) लिखा जा रहा है। ‘करता’, ‘कराता’, ‘कर्ता’ में फर्क कर पाना भी संभव नहीं रहा है। जैसे-जैसे पीढ़ी पेपरलेस हो रही है, स्क्रिप्टलेस भी होती जा रही है।

संसर्गजन्य संवेदनहीनता, थोथे दंभवाला कृत्रिम मनुष्य तैयार कर रही है। कृत्रिमता की  पराकाष्ठा है कि मातृभाषा या हिन्दी न बोल पाने पर व्यक्ति संकोच अनुभव नहीं करता पर अंग्रेजी न जानने पर उसकी आँखें स्वयंमेव नीची हो जाती हैं। शर्म से गड़ी इन आँखों को देखकर मैकाले और उसके वैचारिक वंशजों की आँखों में विजय के अभिमान का जो भाव उठता होगा, ग्यारह अक्षौहिणी सेना को परास्त कर वैसा भाव पांडवों की आँखों में भी न उठा होगा।

हिन्दी पखवाड़ा, सप्ताह या दिवस मना लेने भर से हिंदी के प्रति भारतीय नागरिक के कर्तव्य  की इतिश्री नहीं हो जाती। आवश्यक है कि नागरिक अपने भाषाई अधिकार के प्रति जागरुक हों। समय की मांग है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ एकसाथ आएँ।

बीते सात दशकों में पहली बार भाषा नीति को लेकर  वर्तमान केंद्र सरकार संवेदनशील और सक्रिय दिखाई दे रही है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता, भारत और भारतीयता के पक्ष में स्वयं प्रधानमंत्री ने पहल की है। नयी शिक्षा नीति में भारत सरकार ने पहली बार प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने को प्रधानता दी है। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय भाषाओं का प्रवेश हो चुका है,  यह सराहनीय है।

केदारनाथ सिंह जी की प्रसिद्ध कविता है, जिसमें वे कहते हैं,

जैसे चींटियाँ लौटती हैं/ बिलों में,

कठफोड़वा लौटता है/ काठ के पास,

वायुयान लौटते हैं/ एक के बाद एक,

लाल आसमान में डैने पसारे हुए/

हवाई-अड्डे की ओर/

ओ मेरी भाषा/ मैं लौटता हूँ तुम में,

जब चुप रहते-रहते/

अकड़ जाती है मेरी जीभ/

दुखने लगती है/ मेरी आत्मा..!

अपनी भाषाओं के अरुणोदय की संभावनाएँ तो बन रही हैं। नागरिकों से अपेक्षित है कि वे इस अरुण की रश्मियाँ बनें।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ हिंदी भाषा का बदलता स्वरूप: परम्परा से डिजिटल युग तक ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – हिंदी भाषा का बदलता स्वरूप: परम्परा से डिजिटल युग तक।)

☆ आलेख – हिंदी भाषा का बदलता स्वरूप: परम्परा से डिजिटल युग तक ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम नहीं बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना, जीवन दृष्टि और सामाजिक सम्बन्धों की संवाहिका होती है। हिंदी भाषा ने भी भारतीय समाज के बदलते सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी परिवेश के साथ निरंतर अपना स्वरूप बदला है। संस्कृत, प्राकृत,अपभ्रंश और विभिन्न लोकभाषाओं की विकास परम्परा से निर्मित आधुनिक हिंदी ने भक्ति आंदोलन,औपनिवेशिक काल, राष्ट्रवादी आंदोलन, स्वतंत्रता प्राप्ति, जनसंचार माध्यमों और भूमंडलीकरण के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए आज डिजिटल युग में प्रवेश किया है। आज हिंदी का स्वरूप मुद्रित पुस्तकों और औपचारिक लेखन तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, ब्लॉग, बेबसाइट, डिजिटल पत्रकारिता, मोबाइल संदेश, वीडियो मंच, पाॅडकास्ट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे तकनीकी माध्यमों ने हिंदी के प्रयोग की नई संभावनाएँ खोली हैं, साथ ही रोमन लिपि में हिंदी लेखन, हिंग्लिश,संक्षिप्त शब्दावली,इमोजी और त्वरित संचार ने हिंदी की पारम्परिक भाषिक संरचना के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं,इसलिए आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि हिंदी किस दिशा में बदल रही है और इस परिवर्तन का  उसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

भाषा में परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कोई भी जीवित भाषा पूर्णत: स्थिर नहीं रह सकती। समाज में नए विचार आते हैं तो नए शब्दों की आवश्यकता होती है। नई तकनीक विकसित होती है तो नए शब्द आते हैं। सामाजिक सम्बन्धों में बदलाव होता है तो सम्बोधन और अभिव्यक्ति के तरीके भी बदलते हैं, अत: भाषा की जीवंतता का प्रमाण उसका परिवर्तन है। समस्या परिवर्तन में नहीं, उस समय उत्पन्न होती है जब परिवर्तन के कारण भाषा की अभिव्यक्तिगत क्षमता, व्याकरणिक स्पष्टता या सांस्कृतिक स्मृति कमजोर होने लगे। हिंदी की शक्ति उसके आधुनिक शब्दकोश में नहीं अपितु उसकी व्यापक लोक सांस्कृतिक जड़ों में है। भारतीय समाज में भाषा और लोकजीवन का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें-मुहावरे आदि परम्पराएँ हिंदी के भाषिक संसार को समृद्ध करती रहीं हैं। ‘ जैसा देश, वैसी भाषा ‘ केवल कहावत नहीं, हिंदी के विकास की वास्तविकता है। अलग-अलग क्षेत्रों ने हिंदी को अपनी ध्वनि, शब्द और मुहावरे प्रदान किए। ब्रजभाषा ने हिंदी साहित्य की कृष्णभक्ति और शृंगार की समृद्ध अभिव्यक्ति दी। अवधी ने रामकथा और लोकजीवन को स्वर दिया। भोजपुरी, बुंदेली, मैथिली आदि ने हिंदी की शब्द सम्पदा और सांस्कृतिक चेतना को व्यापक बनाया। भक्तिकाल में तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, रैदास आदि ने हिंदी का लोकव्यापीकरण किया। आधुनिक हिंदी के निर्माण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने आधुनिक पत्रकारिता, नाटक और गद्य को नई दिशा दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा के परिष्कार और अनुशासन पर बल दिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भाषा का प्रश्न राष्ट्रीय चेतना से जुड़ गया। समाचार पत्रों की भाषा, टेलीविजन, डिजिटल पत्रकारिता ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया। शीर्षक छोटे हो गए, समाचार प्रस्तुति त्वरित हुई है और पाठक टिप्पणी के माध्यम से भाषिक संवाद का हिस्सा बन गया है।

इंटरनेट ने हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत किए हैं। पहले हिंदी में प्रकाशन के लिए मुद्रण की आवश्यकता होती थी अब कोई भी व्यक्ति ब्लॉग, बेबसाइट या सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी में सामग्री प्रकाशित कर सकता है। डिजिटल युग ने हिंदी को अवसर तो दिए हैं लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से लिखने के कारण वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ दिखाई देतीं हैं। रोमन लिपि के अत्यधिक प्रयोग से देवनागरी लेखन अभ्यास प्रभावित हो सकता है। हिंग्लिश का अतिरेक भाषिक अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। त्वरित डिजिटल संचार के कारण गंभीर और चिंतनपरक लेखन के लिए समय कम होता जा रहा है। इन सभी चुनौतियों के बावजूद हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन पत्रकारिता, ई-पुस्तकें, ऑडियो-वीडियो साहित्य, पाॅडकास्ट, डिजिटल शोध, मशीन अनुवाद, भाषा तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक हिंदी शिक्षण आदि विस्तार का अवसर बन सकते हैं।

अंतत: कहा जा सकता है कि हिंदी भाषा का वर्तमान स्वरूप उसकी हजारों वर्षों की परिवर्तनशील यात्रा का परिणाम है। डिजिटल युग ने हिंदी को अभूतपूर्व विस्तार दिया है, सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, यूनिकोड ने देवनागरी को डिजिटल आधार दिया है, ऑनलाइन शिक्षा ने हिंदी में ज्ञान की नई सम्भावनाएँ पैदा की हैं। इन परिस्थितियों में हिंदी के प्रति न तो अंध परम्परावाद उचित है और न ही अंध आधुनिकतावाद। आवश्यक है कि हिंदी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक तकनीक को स्वीकार करे। हिंदी की शक्ति उसके परिवर्तन में है और उसकी पहचान परम्परा में निहित है, इसलिए हिंदी के भविष्य की सही दिशा यही होगी,जिसमें परम्परा से संस्कार,आधुनिकता से विस्तार, तकनीक से गति और साहित्य से संवेदना प्राप्त हो।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९२ ⇒ गुड़ और शक्कर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुड़ और शक्कर…“।)

?अभी अभी # १०९२ ⇒ आलेख – गुड़ और शक्कर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुड़ तो गुणों की खान है। शक्कर के अवगुणों से हम लोग अब भी अनजान हैं। जब भी कोई खुशी का मौका आया, लोग झट से बोल उठते हैं, आपके मुँह में घी-शक्कर! ऐसे मौकों पर किसी को आहत नहीं किया जाता। वह मीठा बोल ही रहा है न, कोई खिला तो नहीं रहा।

शक्कर कोई आसमान से नहीं टपकती! वह भी गुड़ से ही बनती है। गुड़ गन्ने से बनता है। गन्ना खेत में उगता है। बचपन में हम जब शहर के आसपास के गाँवों में जाते थे, तो गन्ने के खेत लहलहाया करते थे और गाँव गाँव में कड़ाहों में गुड़ बनाया जाता था। गुड़ हम वहाँ खा जाया करते थे, और गन्ने घर ले आया करते थे।।

एक समय, हमारे प्रदेश के ही निमाड़ और धार जिले में कई शुगर मिलें थीं। जनता पार्टी के राज में गन्ने का मूल्य इतना सस्ता हो गया था कि लोग गन्ना बेचने के बजाए जलाने लग गए थे। आज भी महाराष्ट्र प्रदेश गन्ना और शक्कर उत्पादन में अग्रणी है।

शकर को हम चीनी भी कहते हैं। गन्ने को अंग्रेज़ी में भले ही शुगर-कैन कहते हों, गुड़ को अंग्रेज़ी में jaggery कहते हैं, शुगर नहीं। और यह भी जान लीजिए, लोगों को शकर की बीमारी होती है, गुड़ और शहद की नहीं। आज से चीनी कम।।

हर भारतीय रसोई में आज भी गुड़ ज़रूर मिलेगा। हर भारतीय थाली में एक गुड़ का टुकड़ा अवश्य रखा जाता था। प्रसाद में पहले गुड़-चने का प्रचलन था, जो कालांतर में चने-चिरौंजी का प्रसाद कहलाने लगा। आज बच्चे गुड़ को dairy milk के नाम से पहचानते हैं। कई सब्जियों में मिठास के लिए गुड़ का ही प्रयोग होता है, शकर का नहीं। सक्रांति के त्योहार पर तिल गुड़ खाकर मीठा बोला जाता है और ठंड में गुड़ की गजक के क्या कहने।

यही हाल नमक का है। पहले घरों में डल्ले वाला नमक आता था। सरकार आज भी iodized नमक का विज्ञापन कर रही है, जिससे थायरॉइड जैसी बीमारी पर रोक लगती है और दूसरी ओर प्राकृतिक चिकित्सक सफ़ेद नमक को ज़हर घोषित करने पर तुले हैं। टाटा शान से अपना नमक यह कहकर बेच रहा है, कि आपने देश का नमक खाया है। किसी को अपना नमक खिलाकर देशभक्त बनाना कोई टाटा से सीखे और अपने मंदिर में घंटी बजाकर भक्त बनाना बिड़ला मंदिर से।।

शुगर और बीपी दोनों ही बीमारियां शकर और नमक से होती हैं अतः आपसे करबद्ध निवेदन है कि आप भले ही गुड़ खाएँ और गुलगुले से परहेज करें, लेकिन अपने भोजन में नमक और शकर की मात्रा अवश्य घटाएँ।

अंत में एक और काम की बात! जब गुणवत्ता में गुड़, शक्कर से बेहतर है, तो गुरु भी गुड़ ही रहेगा और चेला उससे कमतर, यानी शक्कर। गुरु गुड़ की मिठास है और चेला शक्कर, यानी मधुमेह बीमारी की जड़। किसी ने ग़लत नहीं कहा, अगर गुरु को गुड़ कहा, और चेले को शक्कर। गुरु गुड़ ही रहेगा, और चेला, शक्कर।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४७ ☆ आलेख – फ्रांस में भारत का डंका (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘फ्रांस में भारत का डंका  (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४७ ☆

☆ आलेख ☆ फ्रांस में भारत का डंका  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

इस समय फ्रांस के पेरिस नगर में भारत का डंका गूंज रहा है। प्रसिद्ध ऐफ़िल टावर के कर्मचारी हड़ताल पर चले गये हैं। पेरिस के पास हिंदुओं के स्वामीनारायण संप्रदाय के एक विशाल मंदिर का उद्घाटन हुआ और उसके बाद संप्रदाय के बड़े गुरु जी ने एफ़िल टावर देखने की इच्छा प्रकट की, साथ ही यह निर्देश कि उनकी  उपस्थिति के समय टावर पर से महिला कर्मचारियों को हटा दिया जाए। टावर के प्रबंधक भी ऐसे आज्ञाकारी निकले कि उन्होंने इस निर्देश का पालन किया। फ्रांस जैसे लिंग-भेद से मुक्त देश में यह कदम अभूतपूर्व था।इसी पर बाद में पूरे देश और पूरी दुनिया में जो हल्ला मचा वह अभी तक चल रहा है। सारी दुनिया में हमारे महान देश की जो छवि बन रही है वह बताने की ज़रूरत नहीं है।

स्वामीनारायण संप्रदाय के विश्व में हज़ारों मंदिर है जो अपनी भव्यता और स्थापत्य के लिए जाने जाते हैं। यह बताना ज़रूरी है कि भारत में जो हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण मंदिर हैं उनका स्थापत्य बहुत साधारण है।

वर्तमान घटना के संदर्भ में यह समझना मुश्किल है कि धार्मिक लोगों को नारी से इतना परहेज़ क्यों है। हमारे देश में नारी सभी रूपों में पूज्य है— चाहे वह मां हो, बहन हो या बेटी। पत्नी के रूप में सीता, पार्वती हमारी आदर्श हैं तो देवी के रूप में हम दुर्गा, काली, लक्ष्मी या सरस्वती के आराधक हैं। वस्तुत: संसार में रौनक स्त्री से ही है। स्त्री का मधुर कंठ, उसके वस्त्रो का रंग, अपने घर को सजाने संवारने की उसकी उत्कंठा, सभी प्राणियों के प्रति उसका स्नेह इसे प्रमाणित करते हैं। जो आज स्त्रियों से दूर रहने का ढोंग करते हैं वे कहां होते अगर स्त्री उन्हें नौ महीने अपनी कोख में आश्रय नहीं देती और अपने पैरों पर खड़े होने तक हर वक्त उनकी देखभाल नहीं करती। हर युग में स्त्रियां संतानों के लिए अपने जीवन को होम करती रही हैं।

अभी एक भावुक कर देने वाला वीडियो देखा जिसमें बेटा मां से पूछता है, ‘यदि तुम्हें एक घंटे बाद मृत्यु होने की सूचना मिले तो कौन सा काम पूरा करना पसंद करोगी?’ और मां का जवाब है, ‘तेरे लिए चार रोटियां सेंक जाऊंगी ताकि तू भूखा न सोये।’

लगे हाथ हम एक और देवी को याद कर लें जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को सुख और सुकून से भर दिया। ये देवी लता मंगेशकर थीं जो आज भी करोड़ों लोगों के कानों में अमृत टपकाती रहती हैं। सदियां गुज़र जाएंगीं लेकिन लता हमारे बीच में रहेंगीं। वे हमेशा हमारे दुःख-सुख में हमारे बगल में खड़ी रहेंगीं। हमारी देवियों की तरह लता जी भी अमर हो गयीं।

आदि शंकराचार्य ने कभी नारी को ‘नरक का द्वार’ कहा था। भाष्यकारों ने समझाया कि उनका आशय यह था कि स्त्री का संसर्ग साधकों में वासना को जागृत करता है, उसे मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग से विचलित करता है। यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि संन्यासी को इंद्रयजित कहा जाता है, यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों पर विजय पा ली हो। फिर साधक के विचलन की गुंजाइश कहां रह जाती है? अर्थ यह निकलता है कि साधक को अपने ऊपर भरोसा नहीं होता, इसीलिए वह स्त्री से दूर भागता है। यानी रोग कहीं और है और दवा कहीं और लगायी जाती है। नारी सृष्टि में पुरुष की पूरक है, उसके बिना सृष्टि की कल्पना असंभव है। सृष्टि के परिचालन का जितना बोझ स्त्री के हिस्से में आता है उसका सौवां अंश भी पुरुष के हिस्से में नहीं आता। इसके बावजूद भी पुरुष स्त्री को अपमानित करने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता।

इस प्रसंग में परसाई जी की एक बहुत दिलचस्प रचना ‘राग विराग’ याद आती है। बस यात्रा का वर्णन है। बस में दो-दो की सीटें हैं। एक पर एक सन्यासी विराजते हैं, 40-50 की उम्र। थोड़ी देर में उनके बगल वाली सीट पर एक महिला बैठ जाती है। सन्यासी परेशान हो जाते हैं। स्त्री से कहीं अन्यत्र बैठने का अनुरोध करते हैं, लेकिन कोई सीट खाली नहीं है। सन्यासी कहते हैं, ‘मैं स्त्री के साथ नहीं बैठ सकता। स्त्री का संग मुझे वर्जित है।’ यह भी कहते हैं, ‘माता और पुत्री का संग भी हमारे लिए निषिद्ध है। धर्म का आदेश है।’ लेखक सन्यासी से कहता है, ‘बैठ जाने दीजिए। आप तो वीतराग हैं।’

बस चल पड़ती है और थोड़ी देर बाद स्त्री परेशान होने लगती है। सन्यासी जी जो श्लोक पढ़ रहे थे वे गड़बड़ाने लगते हैं। स्त्री बार-बार सन्यासी से ठीक से बैठने को कहती है। अंत में वह उठकर सन्यासी जी को एक थप्पड़ मारती है, कहती है, ‘लुच्चा बदमाश कहीं का’। सिद्ध हुआ कि जो संयम मन से न होकर कृत्रिम उपायों से होता है, उसका यही हाल होता है। गांधी जी ने स्त्रियों के संसर्ग में अपने संयम की बाकायदा परीक्षा ली थी और उसमें सफल हुए थे, यद्यपि उनका यह प्रयोग विवाद का कारण भी बना था।

कई वर्ष पहले मुझे एक धार्मिक भोज में एक युवा साधु मिले थे। वे मेरे ही नगर के थे, वहीं शिक्षा प्राप्त की थी। भोजन के लिए दूर से पैदल चलकर आये थे। बात बात में उन्होंने बताया कि उन्हें स्त्रियों के साथ एक ही आसन पर बैठने से परहेज़ है। मुझे लगा उनकी दृष्टि में स्त्रियों के शरीर में कोई ‘करंट’ होता है जो आसन के मार्फ़त उन तक पहुंच कर उनकी साधना को खंडित कर देता है।

पता चला है कि स्वामी नारायण संप्रदाय के बड़े गुरु जी की उम्र 93 साल है। इस उम्र में तो वैसे ही आदमी के लिए स्त्री-पुरुष का भेद ख़त्म हो जाता है। फिर ऐसे स्त्री-विरोधी विचार क्यों?

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५२ – जीव, वन, जीवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५२ ☆ जीव, वन, जीवन… ?

एक पाठशाला के परिसर की दीवार खड़ी करने का काम चल रहा है। इस प्रक्रिया में उसकी सीमा पर उगे छोटे-बड़े‌ पौधे उखाड़ दिए गए हैं। वर्षों से खड़े कुछ वृक्ष भी काट दिए गए हैं। यद्यपि इन वृक्षों को सुरक्षित रखते हुए भी दीवार बनाई जा सकती थी। वृक्षों को काटने का कारण पूछने पर उत्तर मिला “जंगली थे, इसलिए हटा दिए। यहाँ आर्नामेंटल ट्री लगाएँगे। सुंदर दिखेंगे।”

‘जंगली’ शब्द सुनकर मैं हँस पड़ा। संस्कृत में ‘अरण्य’ या ‘वन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसी के चलते ‘नैमिषारण्य’ शब्द का उल्लेख हमारे ग्रंथों में मिलता है।

जीवन पर विचार करें। जीव और वन के अतर्संबंध को प्रतिपादित करने के लिए यह शब्द पर्याप्त है। वन है तो जीव है। जीव के लिए वन अनिवार्य है। दोनों का सम्मिलन ही जीवन है। विज्ञान इसे कुछ इस तरह से कहता है कि ऑक्सीजन है तो जीवन है। ऑक्सीजन के लिए वृक्ष महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र या इकोसिस्टम के लिए वृक्ष अनिवार्य हैं। वृक्ष, जिन पर पक्षी घोंसले बना सकें। वृक्ष, जो वर्षा को आकर्षित कर सकें। वृक्ष जिनके तनों पर जाने कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े जीव अपना निवास बनाते हैं। वृक्ष जिनके फल खाकर  कितने ही पंछी अपना पेट भरते हैं। वृक्ष जिनकी छाया के नीचे पथिक विश्राम करते हैं। वृक्ष जिनसे जंगल बनते और बसते हैं।

वस्तुत: ‘जंगली’ शब्द का उपयोग ऑक्सीजन से घिरे वातावरण में रहने वाले के लिए किया जाना चाहिए था, प्रकृति के सानिध्य में निवास करने वालों के लिए किया जाना चाहिए था। बाज़ारवाद ने जंगली शब्द को अनुपयोगी, क्रूर, हिंसक और असभ्य के संदर्भ में परिवर्तित कर दिया।

यूँ देखें तो न्यूनाधिक जंगली तो हम सब हैं। जिन्हें ‘जंगली’ शब्द अपशब्द लगता है, उन्हें ज्ञात हो कि हम सब के पूर्वज भी कथित जंगली ही थे। हम सब ने विद्यालयीन जीवन में ‘रेफरेंस टू कॉन्टेक्स्ट’ अर्थात संदर्भ के अनुसार आकलन करने को समझा है।  इस प्रक्रिया के अंतर्गत देखें हमारे लिए अंडमान-निकोबार के वनों में निर्वस्त्र रहने वाली जारवा जाति के लोग जंगली हैं। सिक्के का दूसरा पहलू है कि बहुत हद तक संभव है कि उनके लिए हम वस्त्रधारी जंगली हों। अपनी छोटी-सी त्रिज्या से एक वृत्त खींचकर उसे अंतरिक्ष मान लेना हास्यास्पद है। प्रकृति ने देह के कर्म सबके लिए समान रखे हैं। आहार, निद्रा, मैथुन, आभिजात्य  और कथित आदिम दोनों के लिए समान हैं। प्रकृतिगत समानता को अपनी सुविधा के आधार पर वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता।

‘जंगली’ कहकर हम आज ऑक्सीजन के स्रोतों का नाश कर रहे हैं। कल जब हमारे गले प्राणवायु के अभाव में सूखेंगे तो जंगली बहुत याद आएँगे।

अपनी एक कविता स्मरण हो आ रही है-

काट दिये गए हैं

पेड़ों के मुंड,

छील दी गई है

पूरी की पूरी छाल,

धरती को

पच्चीस-पचास मीटर तक

घनी छाँव से ढकनेवाले,

अब स्वयं खड़े हैं

निर्वस्त्र और विवश,

इनकी असहाय देह पर

घातक रंगों से

पोती जा रही हैं

रंग- बिरंगी पत्तियाँ,

उकेरे जा रहे हैं

कई तरह के फूल,

एल.ई.डी.की रोशनी में

प्रदर्शन के लिए रखी

अनावृत लाज पर

चस्पां हो रहे हैं

कई स्लोगन,

और इनके इर्द-गिर्द

फल-फूल रही है

बेख़ौफ़ ब्यूरोक्रेटिक घास,

सारा माज़रा

आशंका मिश्रित भय से

निहार रहे हैं

जवानी की दहलीज़ पर खड़े

आसपास के कच्चे पेड़,

मैं लिखता हूँ ख़त

आयोजकों को-

माफ कीजियेगा

हरित शहर अभियान के

उद्घाटन के लिए

नहीं आ पाऊँगा।

मतभिन्नता हो सकती है तथापि मनुष्य जाति की  अब तक की यात्रा के अनुभव से स्थूल रूप से यह देखने में आया है कि आभिजात्य के प्रदर्शन के विरुद्ध जंगली का दर्शन, जीवन से अधिक जोड़े रखता है। इति‌।

 

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 7:36 बजे, 14 जून 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९१ ⇒ विचारक और प्रचारक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक…“।)

?अभी अभी # १०९१ ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।

पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।

चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।

एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।

आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।

हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।

आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९० ⇒ खो जाने का सुख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खो जाने का सुख…“।)

?अभी अभी # १०९० ⇒ आलेख – खो जाने का सुख ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ खो जाने, और सब कुछ खो जाने में बड़ा अंतर होता है। सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया! खो जाने पर कौन खुश होता है। तुझे खो दिया हमने, पाने के बाद, तेरी याद आए। जिंदगी में हमने क्या खोया, क्या पाया, आखरी वक्त, कौन हिसाब रख पाया।

अब चैन को ही लें! जहाँ चैन नहीं, वहाँ बैचेनी है। सब चाहते हैं, चैन की सांस लें। जहां सुख है, वहाँ चैन है। सोने में सुख है, सोने की चेन में भी सुख है। जब चेन गुम हो जाती है, कोई सुख चैन भी चुरा ले जाता है और नैन से नींद भी। खोने में दुख ही दुख है। कौन कहता है, सोने में सुख है। सोने में दुख ही दुख है। चैन से सोने में ही असली सुख है।

बच्चे अक्सर मेले में, भीड़ में, खो जाते हैं। एक गाय का बछड़ा, जब अपनी मां से बिछड़ जाता है, तो उसकी दशा और दिशा देखने लायक होती है। उसकी पुकार बड़ी मार्मिक होती है। जब कभी दुख में, तकलीफ में, विषाद में, हम ईश्वर को पुकारते हैं, वही दर्द उस जीव में अपनी वत्सला मां के लिए होता है। एक बछड़े की तरह, जब जीव को अहसास होता है, कि वह भी परमात्मा से बिछुड़ा हुआ है, उसकी पुकार में भी वही दर्द महसूस किया जा सकता है। लेकिन हम अब बच्चे नहीं, दूध पीते, गाय से बिछड़े, बछड़े नहीं, एक बड़े, समझदार इंसान हैं। अब हमारे पास खोने और पाने के लिए बहुत कुछ है। परमात्मा का क्या है। मंदिर में, आते जाते, वार त्योहार पर, हाय हैलो, दुआ सलाम होती रहती है। सुख संपत्ति घर आए, कष्ट मिटे तन का। जीने को और क्या चाहिए।

पाने में सुख ही सुख है। क्या खोने में भी सुख है! आपने बहुत खोया होगा, लेकिन क्या कभी आप खुद भी खोए हैं ? वाह, हम क्यों खोएं, खोएँ हमारे दुश्मन। आओ खो जाएँ कहीं, छोड़ दें, दुनिया ये ज़मीं! अरे, वह तो प्यार की, फिल्मों की बातें हैं। कभी कभी किसी के प्यार में खोना अच्छा भी लगता है। अच्छा, तो आप उस खोने की बात कर रहे हैं।।

कई बार खोएं हैं, अपने काम में, बीवी बच्चों और परिवार के प्यार में। यार दोस्तों के बीच, गीत संगीत की महफिलों के बीच! वही खोना ही तो जिंदगी को पाना है। जब एक बार तैरना आ जाए, तब ही डूबने का मज़ा आता है। पानी सर से ऊपर बहे, तब भी डर नहीं लगता।

कई बार ऐसा होता है, अकेले बैठे बैठे, हम कहीं खो जाते हैं। एकाएक, भीड़ में भी अकेले हो जाते हैं। हमें आसपास कुछ सुनाई नहीं देता, बस हम हां में हां किए जाते हैं। सामने वाला समझ जाता है। भाई साहब, कहाँ खो गए हैं। हम एकदम जागते हुए कहते हैं, नहीं तो। हां तो आप क्या कह रहे थे।।

अकेले में, एकांत में, शांत वातावरण में, कुछ सोचते सोचते, चिंतन मनन करते, अनायास कुछ पल ऐसे आ जाते हैं, जब हम अपने आप में खो जाते हैं। कोई विचार आता जाता नहीं है, कोई आवाज़ कानों तक नहीं पहुंचती, आँखें खुली होती हैं, लेकिन देखते हुए भी खोई खोई सी रहती है। नींद नहीं, खुमारी नहीं, पूरी जाग्रत अवस्था, फिर भी कहीं खोए खोए। ध्यान कह लें, भाव समाधि कह लें। कुछ पाने की चाह न होना ही वास्तविक खोना है।

बहुत खो लिया जिंदगी में, बहुत पा लिया। कभी खुद को खोकर देखें, हम कब अंदर से खाली हुए हैं। बाहर से इतना अंदर आता है, आखिर यह जाता कहां है। हमारी साँस पूरा हिसाब रखती है इस आवागमन का। सांस कभी नहीं रुकती, कभी नहीं थमती। कितनी खोई रहती है सांस हममें। चलती रहती है और हमें पता ही नहीं चलता। आइए, खो जाएं कहीं, इन साँसों से परे, एक ऐसे संसार में, जिसमें और किसी का प्रवेश नहीं। वहाँ न मैं है, न तू। बस तू ही तू! अलख निरंजन।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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