हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८९ ⇒ स्टॉप वॉच ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्टॉप वॉच…“।)

?अभी अभी # १०८९ ⇒ आलेख – स्टॉप वॉच ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

समय रुकता नहीं, कभी किसी के लिए ठहरता नहीं! घड़ी रुक सकती है, ठहर सकती है, खराब हो सकती है। जो घड़ी रुक सकती है, उसे स्टॉप वॉच कहते हैं। आप घड़ी को रोक सकते हो, जब तक चाहो, उसे रोके रख भी सकते हो, क्योंकि वह सिर्फ घड़ी है, समय नहीं।

आपके पास आज समय है, घड़ी भी है, और आपकी घड़ी में स्टॉप वॉच भी है। अगर आपका मोबाइल बोलता होता तो शायद यही कहता, मैं ही समय हूँ, मैं ही घड़ी और मैं ही कैमरा। मैं ही कलयुग का संजय हूँ, महाभारत का ही नहीं, पूरे विश्व का आँखों देखा हाल आप तक पहुंचाने की दिव्य-दृष्टि मुझे प्राप्त है।।

दौड़ते समय को रुकते हुए देखना कैसा लगता है! सुबह सवेरे जब मैं साँसों का हिसाब रखता हूँ, तो स्टॉप वॉच मेरी साँसों की निगरानी करती है। मैं अपनी मर्ज़ी से स्टॉप वॉच शुरू करता हूँ, अपनी मर्ज़ी से ही उसे रोक भी सकता हूँ। कुछ सेकंड के लिए साँस रोककर, मैं यह खुशफहमी पाल लिया करता हूँ, कि मैंने इतने समय तक, समय को रोक लिया। साँस को रोका नहीं जाता, थामा जाता है। साँस है तो जिंदगी है। घड़ी की सुई मेरी साँसों का आना जाना देखती रहती है। कुछ मिनिट का योगासन करने में स्टॉप वॉच मुझे सहयोग करती है। प्राण ही समय है, साँसों का चलना ही ज़िन्दगी है। कुछ समय के लिए साँसों को थामिए, और देखिए! स्टॉप एंड वॉच।

साँसों का ठहराव ही समय का ठहराव है। गिनती की साँसें लेकर हम इस संसार में आए हैं, और गिनती के ही पल। जल्दी खर्च करें, या आराम से। स्वास्थ्य ही वह धन है, जिस पर नोटबन्दी का असर नहीं होता, सीबीआई का छापा नहीं पड़ता।।

वॉच को हम घड़ी भी कहते हैं! ज़िन्दगी की न बीते घड़ी। वॉच का एक अर्थ निगरानी भी होता है। एक वॉचमैन होता है जो पी एम भी हो सकता है और एक वॉच होती है, जिसमें am और pm दोनों होते हैं। वॉच-मेकर कभी घड़ी सुधारा करता था। घड़ी भी एक तरह का साज ही तो है। शायद इसीलिए वॉच-मेकर को घड़ीसाज भी कहते हैं। एक घड़ीसाज ने तो अपनी दुकान का नाम ही, समाज सुधारक की तर्ज पर, घड़ी-सुधारक रख लिया था।

स्टॉप वॉच की तरह अपने समय पर हमें ही निगरानी रखनी पड़ेगी। जिसे हम पल कहते हैं, वह कीमती है! बेशकीमती घड़ियाँ क्या कीमती समय बताया करती हैं ? ज़िन्दगी की रेस 100 मीटर भी हो सकती है, और 1000 मीटर भी। यह वह मैराथन है, जिसमें वक्त ठहरता नहीं। रेडी, स्टेडी एंड गो के साथ ज़िन्दगी की दौड़ शुरू होती है। हर कोई आगे भी निकलना चाहता है, प्रथम भी आना चाहता है, लेकिन दौड़ से कभी बाहर नहीं होना चाहता। स्टॉप वॉच स्टॉप होती है, और आपका स्टॉप आ जाता है।

घड़ी को रुकने न दें, लंबी रेस का घोड़ा है इंसान, कभी थकता नहीं, थमता नही।।

Don’t stop!

Wait and watch the

Stop Watch!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ शिक्षक की असली पहचान: अंक नहीं, आत्मविश्वास ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ शिक्षक की असली पहचान: अंक नहीं, आत्मविश्वास ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

परिणाम घोषित होने के बाद पूरी कक्षा में हलचल थी। कोई अपने नब्बे प्रतिशत पर खुश था, कोई एक-दो अंकों के लिए उदास।

पीछे की सीट पर बैठा अर्जुन अपनी उत्तर-पुस्तिका बंद किए चुप था।

शिक्षिका उसके पास आईं और बोलीं, “क्या हुआ?”

“मैम, सिर्फ़ 52 आए हैं। मुझसे नहीं होगा।”

शिक्षिका ने उत्तर-पुस्तिका खोली, कुछ उत्तर देखे और मुस्कुराईं, “52 अंक यह बताते हैं कि इस बार कहाँ कमी रह गई। यह नहीं बताते कि तुम कहाँ तक जा सकते हो।”

अर्जुन ने पहली बार उनकी ओर देखा।

“लेकिन मैम, सब मुझसे आगे हैं।”

शिक्षिका ने कहा, “तुम्हारी दौड़ उनसे नहीं है। अगली बार बस आज वाले अर्जुन से थोड़ा आगे निकलना।”

वर्षों बाद उसी छात्र ने एक समारोह में उनसे मिलकर कहा—

“मैम, उस दिन आपने मेरे अंक नहीं बदले थे… आपने मेरे बारे में मेरी सोच बदल दी थी।”

शायद शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता इसी एक वाक्य में छिपी है।

हर वर्ष शिक्षक दिवस पर फूल, संदेश और शुभकामनाएँ शिक्षकों तक पहुँचती हैं। लेकिन यह दिन केवल सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि एक गहरा आत्ममंथन भी है- क्या हम विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए तैयार कर रहे हैं, या जीवन के लिए भी?

आज जानकारी की कमी नहीं है। पुस्तकें हैं, इंटरनेट है, वीडियो हैं और कुछ ही क्षणों में किसी भी विषय पर उत्तर मिल सकता है। इसलिए शिक्षक की भूमिका अब केवल जानकारी देने वाले व्यक्ति की नहीं रही। उसका असली काम है-विद्यार्थी को सोचना सिखाना, प्रश्न पूछने का साहस देना और असफलता के बाद भी स्वयं पर विश्वास बनाए रखना सिखाना।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था—“सच्चे शिक्षक वे हैं, जो हमें अपने लिए सोचने में सहायता करते हैं।”

हर कक्षा में प्रतिभा एक जैसी दिखाई नहीं देती। कोई बच्चा तुरंत उत्तर देता है, कोई धीरे समझता है। कोई मंच पर सहज बोलता है, कोई उत्तर जानते हुए भी हाथ उठाने से डरता है। कई बार सबसे अधिक जरूरत उसी बच्चे को होती है, जो चुपचाप पीछे बैठा है और मन ही मन यह मान चुका है कि वह दूसरों जितना अच्छा नहीं है।

यहीं शिक्षक की संवेदनशीलता की परीक्षा होती है।

एक वाक्य-

“तुमसे नहीं होगा”

किसी बच्चे के भीतर वर्षों तक बैठ सकता है।

और एक दूसरा वाक्य-

“अभी नहीं हुआ, लेकिन तुम सीख सकते हो”

उसी बच्चे की दिशा बदल सकता है।

शिक्षक शायद अगले दिन वह बात भूल जाए, लेकिन विद्यार्थी उसे जीवन भर याद रख सकता है।

इसीलिए शिक्षक की शक्ति केवल विषय के ज्ञान में नहीं, उसके शब्दों के चयन में भी होती है।

विद्यार्थी वर्षों बाद शायद यह भूल जाए कि किस अध्याय में कौन-सा सूत्र था, लेकिन उसे याद रहता है कि गलती करने पर शिक्षक ने उसे पूरी कक्षा के सामने शर्मिंदा किया था या अलग बुलाकर समझाया था। उसे यह भी याद रहता है कि असफल होने पर किसी ने उसकी क्षमता पर प्रश्न उठाया था या उसके भीतर फिर कोशिश करने की हिम्मत जगाई थी।

कई बार शिक्षक अनजाने में विद्यार्थी की भीतरी आवाज़ बन जाता है।

जीवन की किसी मुश्किल घड़ी में वही आवाज़ भीतर से कहती है-

“एक बार और कोशिश करो।”

“गलती अंत नहीं है।”

“तुम सीख सकते हो।”

“तुम्हारी एक असफलता तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है।”

शिक्षक का काम आसान नहीं है। पाठ्यक्रम, परीक्षाएँ, परिणाम, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ और हर विद्यार्थी की अलग गति—इन सबके बीच स्वयं शिक्षक भी थकता है। लेकिन शायद शिक्षक दिवस उसे यही याद दिलाता है कि उसकी मेहनत का पूरा मूल्य केवल परिणाम-पत्र में नहीं दिखता।

किसी बच्चे ने पहली बार मंच पर बोलना शुरू किया।

किसी ने असफलता के बाद पढ़ाई नहीं छोड़ी।

किसी ने तुलना से बाहर निकलकर अपनी क्षमता पहचानी।

किसी ने केवल सफल पेशेवर नहीं, अच्छा इंसान बनने की कोशिश की।

इन सबमें कहीं न कहीं शिक्षक की छाप होती है।

इसलिए शायद हर शिक्षक को कभी-कभी स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या मेरी कक्षा में बच्चे गलती करने से डरते हैं या सीखने के लिए तैयार रहते हैं?

क्या मैं केवल अच्छे अंक लाने वालों को पहचानता हूँ, या उस विद्यार्थी को भी देखता हूँ जो अंदर ही अंदर हार मान रहा है?

और सबसे महत्वपूर्ण-

मेरे विद्यार्थी मेरी कक्षा से केवल अंक लेकर निकलते हैं, या अपने भीतर थोड़ा अधिक विश्वास लेकर भी?

क्योंकि शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके कितने विद्यार्थियों ने सौ में सौ अंक पाए।

उसकी असली पहचान शायद उस विद्यार्थी में होती है जो वर्षों बाद लौटकर कहता है—

“जब मुझे खुद पर भरोसा नहीं था, तब आपने मुझे भरोसा करना सिखाया था।”

ज्ञान रास्ता दिखाता है।

लेकिन आत्मविश्वास उस रास्ते पर चलने का साहस देता है।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८८ ⇒ मा मू ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मा मू …“।)

?अभी अभी # १०८८ ⇒ आलेख – मा मू ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

नाम बड़े और दर्शन खोटे!

मामू में ऐसा कुछ नहीं था, वह एक साधारण इंसान था, जो अपने नाम के अनुरूप उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुका था, जहां उसे मामू कहकर ही पुकारा जा सकता था।

गेहूंआ रंग, दमकता चेहरा, आधा सपाट और आधे सर पर, मिले जुले काले सफेद बाल, दोहरा, औसत कद काठी का कसरती बदन, आंखों में अनुभव की चमक, बस एक नज़र में यही उसकी पहचान थी।

मेरे पूर्व निवास ४४, नारायण बाग के गृह स्वामी के यहां उसका आना जाना था। बैंक, सरकारी दफ्तर और कार्यालयों के अधिकारियों के घरों में उसकी हैसियत एक प्लंबर कम इलेक्ट्रीशियन कम कारपेंटर की थी। उसे घर अथवा दफ्तर की मरम्मत का कोई भी कार्य निश्चिंत होकर सौंपा जा सकता था। जानकार लोगों की निगाह में मामू एक ऐसे हरफन मौला इंसान का नाम था, जो आपका कोई भी काम जिम्मेदारी के साथ पूरा करने की क्षमता रखता था।।

मामू कोई अलादीन का चिराग तो था नहीं, कि घिसा और हाजिर, लेकिन बिजली के उपकरण फ्रिज, मिक्सर, पानी की मोटर, फ्यूज, और शॉर्ट सर्किट के अलावा घर की मरम्मत, और रंग रोगन में भी उसी को हाजिर होना पड़ता था। छोटी मोटी तोड़फोड़ और कारीगरी में भी वह उस्ताद था। मजदूरों को लाना, मोलभाव करना और उनकी निगरानी का दायित्व भी वह स्वेच्छा से ही उठाता था।

मामू पर घर के हर सदस्य का अधिकार था, क्योंकि मामू भी एक तरह से हमारे घर का ही सदस्य जो हो गया था। फुर्सत में बातों बातों में इंसान जब खुलता है तो उसकी खूबियां भी उजागर होती है। मामू B.Sc. पास आउट था, और अपने जमाने का एक अच्छा फुटबॉल खिलाड़ी था। बीड़ी, सिगरेट, पान गुटका और शराब जैसे व्यसनों से कोसों दूर, एक औसत मुस्लिम परिवार का होते हुए भी उसने अपने एक लड़के को सॉफ्टवेयर इंजिनियर और एक को वकालात के काबिल बनाया।।

मामू, जब तुम्हारे बच्चे इतने काबिल हैं, फिर तुम्हें क्यों अब इस तरह काम करना पड़ता है, जैसे प्रश्नों का उसके पास एक ही जवाब होता था, ऊपर वाले ने हाथ पांव काम करने के लिए दिए हैं। अपना काम तो सभी करते हैं। दूसरों के काम तो केवल खुशनसीब ही आते हैं। इतनी बड़ी दुनिया अब मेरा परिवार हो गया है। आप सबकी समस्या, मुझे अपनी समस्या लगती है।

बस पांव उठ जाते हैं और मैं चला आता हूं। Work is worship! काम ही मेरे लिए इबादत है।

सब दिन समान नहीं होते।

मामू को घुटनों की समस्या हो गई। आंखों में भी अब वह रोशनी नहीं रही। हमारा भी वह आशियाना छूट गया। इल्म और ईमान जहां मिल जाते हैं, वहीं एक इंसान पैदा हो जाता है। हम सबके जीवन में भी मामू, बाबू भाई और जफर भाई जैसे इंसान आते रहते हैं। कौन कहता है दुनिया में अच्छे लोग नहीं, अच्छाई नहीं। आज भी हर कारीगर में मेरी आंखें मामू को तलाशती हैं, लेकिन ऊपर वाला एक जैसे दो इंसान कहां बनाता है। कामयाब इंसान तो बहुत देखे, लेकिन मामू जैसा नेकदिल, ईमानदार इंसान नहीं देखा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५० – आलेख – बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५० ☆

☆ आलेख – बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

“कल से प्रार्थना सभा में एक लड़के को एक कहानी सुनानी होगी। ” शिक्षक ने यह कहा मगर पहले दिन एक ही लड़के ने नाम लिखवाया। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में पहले लड़के ने कहानी सुनाई। तब दूसरा बोल उठा, ” सर! मैं भी कहानी सुना सकता हूं?”

” हां। क्यों नहीं,” शिक्षक ने कहा और लड़के ने कहानी सुना दी।

तीसरे दिन 5 बच्चे कहानी सुनाने के लिए तैयार हो गए। अंतत शिक्षक को कहना पड़ा, ” एक दिन में तीन से ज्यादा लड़के कहानी नहीं सुनाएंगे। “

बच्चों को स्वप्रेरित कीजिए—

बच्चे एक दूसरे से हौड़ करते हैं। उन्हें एक दूसरे से बढ़-चढ़कर काम करने में मजा आता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इसे हम स्वप्रेरणा भी कह सकते हैं। जिसकी वजह से बच्चे बढ़-चढ़कर कहानी सुनाने में भाग लेने लगे थे।

इस स्वप्रेरणा की बदौलत बच्चे अगले दिन से पुस्तकों में से कहानी ढूंढने लगे थे। कुछ माता-पिता से कहानी सुनकर आते। धीरे-धीरे बच्चों में एक से बढ़कर एक कहानी सुनाने की होड़ होने लगने लगी। जो बेहतर कहानी सुनाता उसे शिक्षक शाबाशी देते। हरेक बच्चे की कहानी सुनाने की किसी ना किसी बात की शिक्षक प्रशंसा करते। इससे सभी बच्चे स्व प्रेरित हो रहे थे।

इस तरह प्रार्थना सभा में कहानी सुनाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया। इसका असर यह हुआ कि जो बच्चे पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते थे वे कहानी सुनाने में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे।

उन्हें पुस्तकालय तक स्वतः ले जाइए—

कुछ बच्चे तो स्वयं पुस्तकालय में जाने लगे। कुछ बच्चों ने शुरु-शुरु प्रश्न किया था, ” सरजी! कहानी कहां मिलेगी ? हम भी सुनाना चाहते हैं,” तब शिक्षक ने कहा, ” अपनी पाठ्यपुस्तक में या पुस्तकालय की किसी पुस्तक में मिलेगी। चाहो तो मम्मी-पापा या दादा-दादी से भी कहानी सुनकर यहां सुना सकते हो। “

बचे हुए बच्चे शिक्षक की इस प्रेरणा से पुस्तकालय तक पहुंचने लगे। उन्हें यह नहीं कहना पड़ा कि तुम पुस्तकालय की पुस्तकें पढ़ो। वह स्वयं पुस्तकालय की पुस्तकें टटोलने व पढ़ने लगे। उन्हें अब पढ़ने में मजा आने लगा था। क्योंकि उन्हें एक-दूसरे से बेहतर कहानी प्रार्थना सभा में सुनानी थी।

बच्चों में प्रतियोगिता करवाइए—

कौन बढ़िया कहानी सुना सकता है? जैसे प्रश्न उन्हें प्रतियोगिता के लिए उकसाते हैं। तब वे स्वयं ही एक दूसरे से प्रतियोगिता करने लगते हैं। एक छात्र ने अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई तो दूसरा उससे अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाने की चेष्टा करता है। यही स्वत: चलने वाली प्रक्रिया है। प्रार्थना सभा में इसकी होड़ को आसानी से देखा जा सकता है।

मोहल्ले को आनंद का मैदान बनाइए—

शाम के समय मोहल्ले में इस तरह की गतिविधियां कराई जा सकती है। कभी चुटकुले प्रतियोगिता रखी जा सकती है। बच्चे चुटकुले ढूंढने या पढ़ने के लिए किताबों का सहारा ले सकते हैं। ऐसे समय पर प्रतियोगिता स्थल पर कुछ पुस्तकें, अखबार, चुटकुले की पुस्तकें रखी जा सकती है। आधे घंटे का यह कार्यक्रम मोहल्ले को आनंद से भर सकता है। बच्चों में उत्साह और संचार के लिए बहुत ही बढ़िया गतिविधि है।

बच्चों का कवि सम्मेलन करें—

आप साप्ताहिक या मासिक रूप से इस गतिविधि का आयोजन किया जा सकता है। किसी भी कवि की रचना या कविता उसके नाम सहित सुनाना होगी। यह शर्त रखी जा सकती है। मोहल्ले के दो चार व्यक्ति को जज बनाया जा सकता है। प्रतियोगिता में पांच ₹ का प्रवेश शुल्क लिया जा सकता है। यह एकत्रित शुल्क प्रतियोगिता इनाम के तौर पर विजेता को भी दिया जा सकता है।

सुंदर लेखन प्रतियोगिता करवाएं—

हर बार अलग-अलग प्रतियोगिता करवाने से रोचकता व उत्साह बना रहता है। कभी सुंदर-लेखन प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इसमें सबसे सुंदर लिखने वाले को विजेता घोषित किया जा सकता है। कभी आप श्रुत-लेखन प्रतियोगिता करवा सकते हैं। इसमें सबसे अच्छे अक्षर, जिसमें कम से कम गलती हो उसे विजेता घोषित कर सकते हैं।

नाटक का आयोजन करवाएं—

बच्चों को नाटक के लिए तैयार करें। उनसे कहे- उनके लिए नाटक प्रतियोगिता आयोजन किया जा रहा है। उन्हीं में से एक निर्देशक बनाएं। वही अपना काम निभाए।

इस तरह अलग-अलग प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इन सब बातों से बच्चों की नजर बदल जाएगी। पांच-छह माह इसे करके देखिए। उसका नजरिया बदल जाएगा। तब आप यह कभी नहीं कहेंगे कि बच्चे पढ़ने से दूर हो रहे हैं। बस, पहल आपको करनी है। चाहे आप रचनाकार हो, शिक्षक हो, माता-पिता हो या अभिभावक हो। तब देखिए आप कहेंगे कि बालक पढ़ने से दूर नहीं हुए हैं आपने उन्हें पढ़ने से दूर कर दिया था।

—– 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

17-04-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल साक्षरता: बदलते समय के साथ कदमताल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल साक्षरता: बदलते समय के साथ कदमताल।)

☆ आलेख – वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल साक्षरता: बदलते समय के साथ कदमताल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

इक्कीसवीं सदी में डिजिटल साक्षरता मानव जीवन की एक आवश्यकता बन चुकी है। इस तकनीक ने बैंकिंग,चिकित्सा, शिक्षा, संचार,सरकारी सेवाएँ, टिकट बुकिंग, खरीददारी आदि सभी क्षेत्रों में कार्यप्रणाली को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। भले ही इस कार्यप्रणाली ने सुविधाओं के नये द्वार खोले हों लेकिन वरिष्ठ नागरिक इससे विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि वरिष्ठ नागरिकों ने अधिकांश अपना जीवन उस युग में व्यतीत किया है जब संचार सेवाएँ कागजी माध्यमों पर निर्भर थीं,अत: इनके लिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल स्मार्टफोन चलाना सीख लेना ही नहीं अपितु इनको उपकरणों का सुरक्षित, विवेकपूर्ण उपयोग करने के साथ सामाजिक रूप से जुड़े रहने, आवश्यक सेवाओं तक पहुँच बनाने, आर्थिक गतिविधियों को सरल करने और बदलते युग के साथ आत्मविश्वासपूर्वक संवाद स्थापित करने में सक्षम बनाती है। डिजिटल साक्षरता आत्मनिर्भर बनाती है। इसकी सही जानकारी होने पर अन्य व्यक्ति पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो जाती है, सामाजिक सम्पर्क बनाए रखना आसान हो जाता है, सार्वजनिक और निजी सेवाएँ डिजिटल माध्यम से होने के कारण उपयोग की क्षमता बढ़ जाती है।

प्राय: वरिष्ठ नागरिकों एवं डिजिटल विभाजन के पीछे तकनीकी अनुभव एवं भाषा का अभाव, आर्थिक बाधाएँ, छोटे-छोटे अक्षर, दृष्टि एवं श्रवण सम्बन्धी कठिनाइयाँ, तकनीकी भय एवं आशंका कि कहीं गलत बटन दबाकर कोई नुकसान न हो जाए आदि अनेक कारण हैं,अत: वरिष्ठ नागरिकों को साक्षर बनाने की प्रक्रिया में उनके मन से यह धारणा हटना आवश्यक है। उनको यह समझाना आवश्यक है कि सीखने की प्रक्रिया धीमी होती है। यदि किसी वरिष्ठ को सर्वप्रथम अपने परिवार के दूर बैठे सदस्य से वीडियोकाॅल से सफलतापूर्वक बात करना सिखाएँ तो तकनीक के प्रति उनका विश्वास निश्चित रूप से बढ़ेगा। सिखाने की दिशा में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। परिवारीजन गलती होने पर उपहास न करें, पासवर्ड सुरक्षित रखने के तरीके सिखाएँ, ओटीपी, पिन साझा न करने की आदत को विकसित करें। सिखाने वाले को चाहिए कि वह भय पैदा न करे और सतर्कता व विवेक विकसित करें। बैंकिंग सेवाओं में डिजिटल तकनीक की जानकारी देते समय ‘ कैसे भुगतान करें ‘ नहीं बल्कि ‘ कब भुगतान न करें ‘ भी सिखाया जाना चाहिए।

भारतीय ज्ञान परम्परा में सीखने की प्रक्रिया को श्रेयस्कर बताया गया है। डिजिटल तकनीक वरिष्ठ नागरिक की रुचि के अनुसार साहित्य, संगीत, इतिहास,दर्शन, भाषा, कला, अध्यात्म व सामान्य ज्ञान जैसे विभिन्न विषयों तक पहुँच सकते हैं। डिजिटल समावेशन में परिवार, समाज, सरकारी संस्थाओं, स्थानीय निकायों, बैंकों आदि सभी की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। तकनीक निर्माताओं का उत्तरदायित्व है कि वे बड़े और स्पष्ट अक्षरों, सरल मेनू, आसानी से समझ आने वाले सुरक्षा संदेश आदि विशेषताओं को महत्व दें। डिजिटल साक्षरता सुविधा ही नहीं, यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, सामाजिक सहभागिता के साथ बदलते समय में समान अवसर का माध्यम भी है। यह तकनीक पीढ़ियों के बीच संवाद का माध्यम बन सकती है। यदि बच्चे बुजुर्गों को स्मार्टफोन चलाना सिखाते हैं तो बुजुर्ग भी धैर्य तथा जीवन के अनुभव सिखाते हैं इसलिए यह तकनीकी प्रशिक्षण दो पीढ़ियों में ज्ञान-विनिमय बन जाता है।

अंतत: हम कह सकते हैं कि डिजिटल क्रांति ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है लेकिन इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब समाज का कोई वर्ग पीछे न छूटे। वरिष्ठ नागरिक इस डिजिटल परिवर्तन में दर्शक नहीं, सक्रिय सहभागी बन सकते हैं। इस आधुनिक व्यवस्था को वरिष्ठ नागरिकों के लिए अधिक समावेशी बनाना होगा,अत: आवश्यकता है ऐसी डिजिटल संस्कृति निर्माण की , जिसमें तकनीक सुविधा बने, निर्भरता नहीं। ज्ञान शक्ति बने, भय नहीं। सुरक्षा आदत बने, औपचारिकता नहीं और डिजिटल साक्षरता उम्र की सीमा नहीं, जीवनपर्यंत सीखने का अवसर बने।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८७ ⇒ एम. फिल् की महफिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एम.फिल् की महफिल …“।)

?अभी अभी # १०८७ ⇒ आलेख – एम.फिल् की महफिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एम फिल् की महफिल सजी है, चले आइए, आपकी बस कमी है, चले आइए! M.Phil. कोई बीमारी नहीं, मास्टर ऑफ फिलोसॉफी की डिग्री है, जिसे अब यूजीसी ने अमान्य कर दिया है। जो एम फिल हो गए, सो हो गए, खेल खतम, पैसा हजम।

डिग्रियों का खेल है ये, डिग्री पर डिग्री लिए जा रहे हो। खुद डॉक्टर होकर, अपनी नब्ज़ नहीं पहचान पा रहे हो। जी हां, एक ढूंढो हजार मिलेंगे, कोई डी लिट्, तो कोई पीएचडी, कोई एमबीबीएस तो कोई एमडी और एमएस! बेचारे दांत वाले की डिग्री अलग है, बीडीएस, मानो कोई बीएएमएस चला आ रहा हो। हमारे जमाने में तो एलएमपी भी डॉक्टर होते थे, यानी लोकल मेडिकल प्रैक्टिशनर। मेरा एक मित्र तो आज भी अपने आपको गर्व से L.M.P. ही कहता था, लोकल मिडिल पास।।

हमारे लिए केबीसी, केवाईसी और यूजीसी में कोई अंतर नहीं। हमें जीवन में ना तो कभी कोई ग्रांट अथवा स्कॉलरशिप मिली और ना ही कोई कमीशन। जब से उच्च शिक्षा में पदोन्नति के लिए पीएचडी अनिवार्य हो गया, सभी बड़े, बूढ़े पीएचडी की दौड़ में शामिल हो गए। पढ़ना और पढ़ाना सबके बस का नहीं होता। या तो हमसे पढ़वा लो, या फिर हमको पढ़ने दो। एक वेतन में दो दो दायित्व क्या तन और मन का शोषण नहीं।

हमें थीसिस, शोध, शोध प्रबंध, डिजर्टेशन अथवा पीएचडी की एबीसी भी नहीं आती क्योंकि हम कोई डिग्रीधारी बुद्धिजीवी भी नहीं। शिक्षा और चिकित्सा के अलावा साहित्य में भी डॉक्टरों का बड़ा सम्मान है। पहले साहित्य रत्न और विशारद से ही काम चल जाता था, लेकिन डॉक्टरेट की एक अलग ही गरिमा है। अब तो साहित्य में आपको टू इन वन डॉक्टर भी मिलेंगे। यानी डिग्री चिकित्सा की और फितरत से साहित्यकार और व्यंग्यकार। ऐसी विलक्षण प्रतिभाओं के आगे तो चार वेदों का ज्ञान भी फीका पड़ जाता है।।

डी लिट मतलब डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर, पीएचडी यानी डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी यहां तक तो आसानी से हजम हो जाता है लेकिन एमफिल यानी मास्टर ऑफ फिलोसॉफी कभी हमारे गले नहीं उतरी। वैसे ऐसी कई विवादित डिग्रियां हैं, जिन पर जनहित और देशहित में चुप रहना ही बेहतर है।

एक आयोजन प्रेमी हाल ही में एक संगीत के प्रोग्राम में जबरदस्ती टकरा गए, परिचय की लपेट में उन्होंने अपने आपको कवि, साहित्यकार, अभिनेता और एंकर के साथ एमफिल भी बता दिया। तब शायद पहली बार यह एमफिल की डिग्री हमारी नजरों से गिरी क्योंकि वे तो बहुत पहले से ही गिर चुके थे।।

जो शिक्षाशास्त्री हैं, शिक्षाविद् हैं वे ही इस मामले कुछ कहने का हक रखते हैं, हम तो मुंह नहीं चला पाए, इसलिए यूं ही कलम चला दी। दुख तो होता है, जब कोई विदा होता है। एमफिल की महफिल को हम दुखी मन से अलविदा कहते हैं ;

हम छोड़ चले हैं एमफिल को ;याद आए कभी तो मत रोना ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५१ – तस्मै श्रीगुरवै नम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५१ ☆ तस्मै श्रीगुरवै नम:… ?

गुरु ऐसा शब्द जिसके उच्चारण और अनुभूति के साथ एक प्रकार की दिव्यता जुड़ी है, सम्मान की प्रतीति जुड़ी है। गुरु का शाब्दिक अर्थ है अंधकार को दूर करने वाला।

प्रायः हरेक के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या जीवन में एक ही गुरु हो सकता है? इसका उत्तर दैनिक जीवन के क्रियाकलापों और सांस्कृतिक परम्पराओं में अंतर्भूत है।

वैदिक संस्कृति में भिन्न-भिन्न गुरुकुलों में अध्ययन की परंपरा रही। गुरुकुल में शिक्षा और विचार की भिन्नता भी मिलती है। इन्हें विभिन्न- ‘स्कूल्स ऑफ थॉट’ कहा जा सकता है। वर्तमान में मुक्त शिक्षा का मॉडल काम कर रहा है। छात्र, विज्ञान के साथ कला और वाणिज्य का विषय भी पढ़ सकते हैं। शिक्षा ग्रहण करते हुए कभी भी अपना ‘स्कूल ऑफ थॉट’ बदल सकते हैं।

वर्णमाला का उच्चारण विद्यार्थी के.जी. में सीखता है। प्री-प्राइमरी में वर्ण लिखना सीखता है। शिक्षा के बढ़ते क्रम के साथ शब्द, तत्पश्चात  शब्द से वाक्य, फिर परिच्छेद जानता है, अंततोगत्वा धाराप्रवाह लिखने लगता है। के.जी. से पी.जी. तक के प्रवास में कितने गुरु हुए? जिनसे के.जी. में पढ़ा, उन्हीं से पी.जी. में क्यों नहीं पढ़ते? उलट कर भी देख सकते हैं। जिनसे पी.जी. में पढ़ा, उनसे ही के.जी. में पढ़ाने के लिए क्यों नहीं कहते? यही नहीं भाषा की शिक्षा के लिए अलग शिक्षक, चित्रकला के लिए अलग, शारीरिक शिक्षा, विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र हर एक के लिए अलग शिक्षक। उच्च शिक्षा में तो विषय के एक विशिष्ट भाग में स्पेशलाइजेशन किया हुआ शिक्षक होता है। कोई एम.डी.मेडिसिन, कोई स्त्रीरोग विशेषज्ञ,  कोई हृदयरोग विशेषज्ञ तो एम.एस. याने शल्य चिकित्सक।

काव्य में कोई गीत का विशेषज्ञ है,  कोई ग़ज़ल कहने का व्याकरण बताता है तो कोई मुक्त कविता में लयबद्ध होकर बहना सिखाता है। सभी विधाएँ एक ही से क्यों नहीं सिखी जा सकती? खननशास्त्र का ज्ञाता, गगनशास्त्र नहीं पढ़ा सकता, हवाई जहाज उड़ाने का प्रशिक्षण देनेवाला, पानी का जहाज चलाना नहीं सिखा सकता। भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, मणिपुरी की साधना एक ही नृत्यगुरु के पास नहीं साधी जा सकती।

गुरु और शिक्षक की भूमिका को लेकर भी अनेक के मन में ऊहापोह होता है। यह सच है कि एक समय गुरु और शिक्षक में अंतर था। शिक्षक अपना पारिश्रमिक स्वयं निर्धारित करता था जबकि गुरु को प्रतिदान शिष्य देता था। कालांतर में बदलती  परिस्थितियों ने इस अंतर-रेखा को धूसर कर दिया। वर्तमान में गुरु और शिक्षक न्यूनाधिक पर्यायवाची हैं। शिक्षक, जीवन को अक्षर और व्यवहार के ज्ञान का प्रकाश देनेवाला गुरु  है।

गुरुदेव दत्त अर्थात भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव का अवतार माना जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समन्वित अवतार की यह आस्था अनन्य है। उन्होंने  चौबीस गुरु बनाये थे। राजा यदु को इन गुरुओं की जानकारी देते हुए भगवान दत्तात्रेय ने आत्मा को सर्वोच्च गुरु घोषित किया। साथ ही  बताया कि चौबीस चराचर को गुरु मानकर उनसे जीवनदर्शन की शिक्षा ग्रहण की है। भगवान के ये चौबीस गुरु हैं,  पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, समुद्र, अजगर, कपोत, पतंगा, मछली, हिरण, हाथी, मधुमक्खी, शहद निकालने वाला, कुरर पक्षी, कुमारी कन्या, सर्प, बालक, पिंगला नामक वैश्या, बाण बनाने वाला, मकड़ी, और भृंगी कीट।  प्रत्येक गुरु से उन्होंने जीवन का भिन्न आयाम सीखा।

बहुआयामी ज्ञानदाता माँ प्रथम गुरु होती हैं। माँ प्रथम होती हैं अर्थात द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम गुरु भी होते हैं। इनमें से कोई किसीका स्थान नहीं ले सकता वरन हरेक का अपना स्थान होता है।

शिक्षक दिवस के संदर्भ में विनम्रता से कहता हूँ कि प्रत्येक का मान करो। ज्ञान को धारण करो, जिज्ञासानुसार एक अथवा अनेक गुरु करो।

..तस्मै श्रीगुरवै नम:।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८६ ⇒ दोषारोपण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोषारोपण…“।)

?अभी अभी # १०८६ ⇒ आलेख – दोषारोपण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दोष एक ऐसा पौधा है, जिसे कभी अपने आँगन में लगाया नहीं जाता, इसके लिए किसी दूसरे के घर की मिट्टी तलाशी जाती है। वहाँ यह बहुत फलता-फूलता है। कौन कब किसी पड़ोसी के घर पौधारोपण करता है। हाँ, अगर दोष का पौधा हो, तो खाद मिट्टी की व्यवस्था भी की जाती है।

हम हरे भरे उपवन को उजाड़ कंक्रीट का जंगल बना देते हैं, खेती की जगह औद्योगिकरण को बढ़ावा देते हैं, मज़दूर की जगह मशीन से काम लेने लगते हैं, तो पर्यावरण दूषित होता है। अधिक सड़कें, मॉल और फ्लाईओवर बनाने पड़ते हैं। जब यह सब हो जाता है, तब हमें पौधारोपण का ख्याल आता है और हम भावुक होकर पितृ पर्वत की ओर दौड़ पड़ते हैं।।

दोष किसमें नहीं ! लेकिन जिस तरह आईना सिर्फ चेहरे को देखता है, गुण दोषों को नहीं, हमें भी स्वयं में दोष नज़र नहीं आते। कबीर इंसान नहीं थे ! उन्हें दूसरों में नहीं, स्वयं में दोष नज़र आते थे। वे कहते हैं;

बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय

लो जी ! कोई खुद पर भी दोषारोपण करता है ? दोषारोपण और करारोपण हमेशा दूसरों पर ही किया जाता है। सभी दोषमुक्त और करमुक्त होने की फिराक में रहते हैं।।

भारत रत्न सचिन जैसे क्रिकेट-रत्न पर लोग आरोप लगाते हैं कि झुमाकर द्वारा भेंट की गई फरारी वे करमुक्त करवाकर ले आए। लो जी ! ये भी कोई बात हुई। फर्राटा कार चलाने वाले झुमाकर ने फर्राटेदार रन बनाने वाले सचिन को सम्मान-स्वरूप जो फर्राटा-फरारी कार भेंट की, उस पर भी करारोपण ? घोर कलयुग ! सचिन कार कमाकर नहीं लाए, भेंट में लाए। केबीसी को छोड़कर बहुत से राष्ट्रीय पुरस्कार करमुक्त होते हैं। सम्मान और करारोपण कभी साथ साथ नहीं चलते। मनोजकुमार की अधिकांश देशभक्ति की फिल्में मनोरंजन कर से मुक्त रहती थी। एक तो फ़िल्म में मनोरंजन नहीं, ऊपर से मनोरंजन कर। और जो इसका विरोध करे, उस पर दोषारोपण।

कुछ तो लोग कहेंगे ! लोगों का काम है कहना। आप तो करते रहिए, आपको जो करना। हाथी जब वन-वे में बाज़ार में चलता है, तब उसका चालान नहीं कटता। कोई ट्रैफिक का सिपाही अगर उसको देख सीटी बजाता है, तो लोग हँसते हैं।

हाथी को कानून सिखा रहा है। ज़रा उसके पास तो जाकर देख।।

हमारे देश में पिछले 70 वर्षों से विपक्ष, सत्ता-पक्ष पर दोषारोपण कर रहा था। दोष का वृक्ष इतना पनपा, कि विपक्ष ही सत्ता-पक्ष हो गया। आज सत्ता-पक्ष विपक्ष पर दोषारोपण कर रहा है। एक दूसरे पर दोषारोपण को हम आगे चलकर राष्ट्रीय दोषारोपण दिवस के रूप में मना सकते हैं।

अगर एक नेता और कुशल प्रशासक, विपक्ष के विरोध और दोषारोपण की ओर ध्यान देगा तो उसे कभी अनुच्छेद 370 और 35-ए नज़र नहीं आएँगे। अगर राजनीति में द्रोणाचार्य जैसा गुरु होगा तो अर्जुन को सिर्फ़ मछली की आँख ही नज़र आएगी। कश्मीर अब स्वर्ग हुआ है, Let opposition go to hell. द्रोणाचार्य उवाच।।

दोस्तों के साथ पौधारोपण हो, लेकिन अगर कभी दुश्मन के घर जाएँ, तो दोषारोपण अवश्य करके आएँ। इस मामले में आनंद बख्शी साहब कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ थे।

मेरे दुश्मन, तू मेरी दोस्ती को तरसे !

तू फूल बने पतझड़ का,

तुझ पर बहार न आए कभी।

लगता था, मानो पाकिस्तान में दोषारोपण करके आए हों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९१ – देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९१ ☆ देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विगत सप्ताह यूनाइटेड नेशन्स जिसको हम यू एन के नाम से भी जानते हैं, ने एक प्रस्ताव के जरिए विश्व का नया मानचित्र जारी किया है। पूर्व में बनाया गया मानचित्र यूरोप के इटली देश द्वारा सन 1600 से पूर्व काल का है।

अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक क्षेत्रफल से कम अनुपात में दिखाया गया है, ऐसी शिकायत के कारण, नए मानचित्र की आवश्यकता आन पड़ी है।

यू एन जैसी संस्था की बात आज के समय कोई मानता ही नहीं है। उसका हाल घर के सबसे बड़े बुजर्ग के समान है, जिसने परिवार के लिए सब कुछ निछावर कर साम्राज्य स्थापित कर, बच्चों के नाम कर दिया था, अब घर के उसके अपने बच्चे ही उसको पूछते ही नहीं है। वो कुछ भी बोले, उसकी बात अनसुनी ही रहती है।

नए मानचित्र को लेकर हमारे एक मित्र जिनका स्टेशनरी सामान का व्यापार है, से लम्बी वार्तालाप हुई, उनको ये शंका हो रही है, इस नए मानचित्र के चक्कर में उनके एक खाली प्लॉट की जमीन कहीं कम ना हो जाय। हमने उनसे कहा ऐसा कैसे हो सकता है, उनका ये मानना है, कि शहर के नए मास्टर प्लान में उनके प्लॉट का साइज एक चौथाई कम हो गया था, अब तो पूरी दुनिया का ही नक्शा बदल रहा है, सरकार इस नाम से उनकी जमीन का कुछ भाग, डकार जाएगी।

हमने उनके दर्द को कम करते हुए कहा, अब सभी स्कूलों, सरकारी दफ्तरों आदि में दुनिया का नए मानचित्र लगाया जाएगा, बच्चे नए “ग्लोब”, गत्ते के स्टेंसिल आदि भी खरीदेंगे। आपकी तो दीवाली हो जाएगी।

इंतजार करें, हमें कब विस्तृत नया नक्शा देखने को मिलेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९९ ☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९९ ☆

☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

ग्वाल-बाल के संग नंदलाला,

मुरली मनोहर आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

*

भक्त तिहारी राह तके हैं,

यशोदा प्यारे आ जाओ।

माखन-मिश्री के मतवाले,

माधव न्यारे आ जाओ।।

*

कुंज-गलिन में राधा रानी

के मतवाले आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

☆

जब भाद्रपद की अँधेरी रात आस्था के दीपों से जगमगाने लगती है, तब मन के आकाश पर एक अनुपम छवि आकार लेती है—मोरपंख मुकुट धारण किए नटखट नंदलाल, अधरों पर सजी बाँसुरी और चारों ओर पसरा हुआ हरा-भरा वृंदावन। यह वही वृंदावन है, जहाँ प्रकृति केवल कृष्ण की लीलाओं की साक्षी नहीं थी, बल्कि स्वयं उनकी लीला का अभिन्न अंग थी।

कदंब की डालियाँ उनके झूलों की सखी थीं, यमुना उनकी चिर-सहचरी और गौवंश उनके वात्सल्य का विस्तार। वन-पथों पर बिखरी दूब, कुंजों की छाया, फूलों की सुगंध और पक्षियों का कलरव—इन सबके बीच कृष्ण का बालपन जैसे प्रकृति के हृदय पर लिखी कोई मधुर कविता था।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें उस आत्मीय संबंध की स्मृति कराता है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं। उनकी बाल लीलाओं में मिट्टी की सोंधी गंध है, यमुना की कल-कल है, वृक्षों की शीतल छाया है और जीव-जंतुओं के प्रति सहज करुणा है। इसलिए कृष्ण को जानना केवल उनके दर्शन को जानना नहीं, उस प्रकृति को भी समझना है, जिसमें उनकी चेतना ने आकार पाया।

आज हमारे चारों ओर कंक्रीट के जंगल फैलते जा रहे हैं और वास्तविक वन सिमट रहे हैं। नदियाँ अपना निर्मल स्वर खो रही हैं और पक्षियों का कलरव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ऐसे समय में यह पर्व हमारे भीतर एक सहज प्रश्न जगाता है—क्या हमारी भक्ति केवल मंदिरों और झाँकियों तक सीमित रहेगी, या हम कृष्ण के उस वृंदावन को भी अपने जीवन में स्थान देंगे, जहाँ हरियाली स्वयं उत्सव थी?

उत्सव की सजावट में यदि जीवित पौधों, पत्तियों, फूलों, मिट्टी के दीपों और प्राकृतिक सामग्री को स्थान दिया जाए, तो सौंदर्य के साथ संवेदना भी जुड़ती है। लड्डू गोपाल के समीप रखा गया एक छोटा-सा पौधा केवल सजावट नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए जीवन का संकल्प बन सकता है।

क्यों न इस अवसर पर ‘एक पौधा कान्हा के नाम’ का संकल्प लिया जाए? पौधा लगाएँ, उसे सींचें, उसकी छाया बढ़ते देखें और उसके साथ अपने भीतर प्रकृति के प्रति प्रेम को भी अंकुरित होने दें।

कृष्ण ने हमें प्रेम का विस्तार सिखाया—मनुष्य से प्रेम, जीव-जंतुओं से करुणा और धरती से आत्मीयता। उनकी बाँसुरी की मधुर तान तभी सार्थक होगी, जब यमुना निर्मल बहे, वृक्षों पर फिर पक्षियों के बसेरे हों और हमारी धरती हरियाली की साँस लेती रहे।

कान्हा को केवल झूले में न झुलाएँ,

उनके वृंदावन को भी अपने जीवन में उतारें।

ऐसी भक्ति हो, जिसमें दीप भी जले और कोई पौधा भी रोपा जाए; ऐसी आराधना हो, जिसमें घंटियाँ भी गूँजें और पक्षियों का कलरव भी सुनाई दे; ऐसा उत्सव हो, जिसमें मंदिर ही नहीं, हमारी धरती भी मुस्कुराए।

☆

राह तके हैं गोपी सारी,

रास-रचैया आ जाओ।

संकट की घड़ियों में कृष्णा,

लाज-बचैया आ जाओ।।

*

भक्तों के हिय आन समाने,

मीरा-मोहन आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

☆

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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