हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 8 – आलेख – “वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 8 ☆

☆ आलेख ☆ “वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

अपनों से दूर 93 वृद्धों का परिवार

आज सामाजिक सोच और परिस्थितियां ऐसी हो गईं हैं कि अधिकांश लोगों को अपने घर के बुजुर्ग बोझ लगने लगे हैं। ऐसे समय वृद्धाश्रमों की आवश्यकता और उपयोगिता बढ़ गई है। वृद्धाश्रमों में वृद्धों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। मैंने अपनी पारिवारिक मित्र श्रीमती भारती साहा से अक्सर उनके वृद्धाश्रम जाने और सुख सुविधा से रहते प्रसन्नचित्त वृद्धों के बारे में सुना। मेरा मन भी वृद्धाश्रम जाकर वहां की व्यवस्था देखने और खुशहाल वृद्धजनों से मिलने का हो गया और एक दिन मैं वहां पहुंच गया। भारती जी के साथ ही मेरी पत्नी श्रीमती विमला श्रीवास्तव भी मेरे साथ थीं। जिज्ञासा यह जानने की थी की एक ठिकाने पर इतने सारे बुजुर्गों की इतनी अच्छी देखरेख कैसे होती है कि वे सभी खुश और संतुष्ट रहते हैं।

निराश्रित वृद्ध आश्रम, जबलपुर में वृद्धों के बीच गुंजन संस्था, जबलपुर के सदस्य

नेताजी सुभाषचंद बोस मेडिकल कालेज, जबलपुर के पास स्थित निराश्रित वृद्धाश्रम में हम लोग संध्या 5 बजे के आसपास पहुंचे। वृद्धाश्रम के अहाते का द्वार खोलकर जैसे ही हमने अंदर प्रवेश किया तो लगा जैसे हम शहर के कोलाहल, आपाधापी, राजनीति, स्वार्थ और आपसी खींचतान की दुनिया से निकलकर एक ऐसी दुनिया में पहुंच गए हैं जहां सिर्फ अपनापन है, शांति है, सद्भाव है। वृद्धाश्रम के मुख्य प्रवेश द्वार के अंदर ही दाहनी ओर एक मंदिर बना है यहां अनेक वृद्ध पुरुष/महिलाएं बैठे हुए शांतचित्त से ईश्वर की आराधना में लीन थे। आश्रम के अत्यंत साफ सुथरे अहाते के बड़े छायादार वृक्ष और बगीचे में लगे सुंदर पौधे वहां के वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर रहे थे। आश्रमवासी अनेक वृद्ध नर/नारी अहाते में रखी बैंचों और कुर्सियों में बैठे या तो आपस में वार्तालाप कर रहे थे अथवा आत्म चिंतन में लीन थे, कुछ लोग चहल कदमी करते हुए भी नजर आए। लगा जैसे इन वृद्धों को यहां मिले सेवा, सुख और संतोष ने उनके तमाम दुखों को हर लिया है।

यह वृद्धाश्रम भारतीय रेडक्रास सोसायटी द्वारा 2 अप्रैल 1988 में स्थापित किया गया था। वृद्धाश्रम के पदेन अध्यक्ष जिला कलेक्टर हैं। नगर के विभन्न क्षेत्रों में सक्रिय समाज सेवा से जुड़े 24 व्यक्ति यहां के सम्माननीय सदस्य हैं। ये सभी पूरी चिंता और जिम्मेदारी के साथ समय समय पर वृद्धाश्रम पहुंचकर यहां की व्यवस्थाओं व आवश्यकताओं पर नजर रखते हैं और उन्हें बिना विलंब पूरा करने तत्पर रहते हैं।

एक प्रश्न पर बताया गया कि 96 लोगों के निवास की क्षमता वाले इस वृद्धाश्रम में वर्तमान में 93 वृद्ध हैं जिनमें 36 पुरुष और 57 महिलाएं हैं। यहां रह रहीं रामकली शर्मा सर्वाधिक 92 वर्ष की हैं। शांति साहू आश्रम में विगत 21 वर्षों से रह रही हैं। यहां के पुरुष निवासियों में कुछ सर्वाधिक 75 वर्ष के हैं। वृद्धाश्रम में धर्म जाति जैसा कोई बंधन नहीं है। व्यक्ति जबलपुर का निवासी हो, 60 वर्ष की उम्र हो और निराश्रित व निशक्त हो तभी उसे यहां रहने की पात्रता प्राप्त होती है। यहां रहने का कोई शुल्क नहीं किंतु पेंशन प्राप्त बुजुर्गों से कुछ सहयोग राशि ली जाती है। वृद्धाश्रम में साफ सुंदर विशाल भोजन कक्ष है जहां भोजन करने टेबिल कुर्सी लगी हैं। कार्यक्रमों आदि के लिए एक बड़ा हाल भी है। आश्रम की व्यवस्थाओं हेतु कार्यालय में 3, वृद्धों की देखरेख के लिए 4, भोजन बनाने 3, भोजन कक्ष की सफाई हेतु 1, स्वीपर 1, चौकीदार 1 और 1 एम्बुलेंस चालक है।

आश्रम का रखरखाव एवम खर्च सामाजिक न्याय विभाग से प्राप्त अनुदान से होता है। यहां निवासरत लोगों को भोजन, इलाज, दवा, वस्त्र, मनोरंजन सभी प्राप्त होता है। नगर के समाज सेवी तथा सहृदय लोग भी वृद्धाश्रम में सेवा सहयोग हेतु तत्पर रहते हैं। अनेक लोग अपने परिजनों की स्मृति में आश्रमवासियों को भोजन, चाय नाश्ता अथवा अन्य वस्तुओं का वितरण करते रहते हैं। संपन्न लोगों से आश्रम के लिए उपयोगी वस्तुएं भी प्राप्त होती रहती हैं। समय समय पर आश्रम में भी मनोरंजक, ज्ञानवर्धक कार्यक्रम होते हैं। आश्रमवासियों को नगर में आयोजित विशिष्ट समारोहों में भी ले जाया जाता है। यहां रहने वाले स्वेच्छा से जब तक चाहें अथवा अंत समय तक रह सकते हैं। यहां स्थाई चिकित्सक भी हैं जो हफ्ते में दो दिन स्वास्थ्य परीक्षण हेतु आते हैं। बताया गया कि समाज से आए लोगों से मिलकर आश्रमवासी प्रसन्न होते हैं और उनसे खुलकर बात करते हैं। यहां रहने वाले 70 प्रतिशत लोगों से मिलने उनके रिश्तेदार/परिचित आते रहते हैं किंतु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनसे मिलने कभी कोई नहीं आया। यहां कार्यरत लोग सभी बुजुर्गों में अपने माता पिता के दर्शन करते हूं। उनके दुखी, परेशान अथवा बीमार होने पर उनके पास आत्मीयता से बैठकर बातें कर उन्हें राहत पहुंचाने का प्रयास करते हैं। जबलपुर में 4/5 वृद्धाश्रम और भी हैं। रेडक्रास द्वारा मध्यप्रदेश में 81 वृद्धाश्रम संचालित किए जा रहे हैं। देशभर में बढ़ते वृद्धाश्रमों की संख्या वृद्धों की चिंताजनक स्थिति प्रगट करने पर्याप्त हैं। आवश्कता है वृद्धों की सेवा सुरक्षा के लिए परिवारों के साथ ही सम्पूर्ण समाज को जाग्रत करने और शिक्षा जगत के माध्यम से भी बच्चों में बुजुर्गों के प्रति आदर व प्रेम भाव भरने की। अपने परिजनों की उपेक्षा से दुखी किंतु वृद्धाश्रम की व्यवस्था और कर्मचारियों के स्नेह से तृप्त बुजुर्गों को देखकर हम सुख और दुख के मिश्रित भाव लिए वृद्धाश्रम से बाहर निकलते हुए सोच रहे थे कि क्या फिर ऐसा समय आएगा जब हर वृद्ध सुख शांति से अपने ही घर में रहेगा। वृद्धाश्रम बंद हो जाएंगे।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 705 ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान।)

?अभी अभी # 705 ⇒ गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है।

हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है।

कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बधाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का।

इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है।

वैसे तो आप आप स्वयं भी गुणों की खान हैं। होते हैं कुछ ऐसे गुणीजन, जो स्वयं के गुणों को पहचान जाते हैं, और उनका गुणगान अपने मुंह से करते नहीं अघाते। जीवन से उदासी, निराशा, अवसाद और नकारात्मकता को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय यही है, सकारात्मक सोच। खुद को किसी से कम नहीं आंकना। यहां आपको अपने दोष नहीं, गुण ही गुण नजर आते हैं। आत्मप्रशंसा उनका स्वभाव बन जाता है। आप स्वयं तो अपना गुणगान करते ही हैं, आप चाहते हैं, लोग भी आपकी तारीफ करें। वैसे भी तारीफ का भूखा कौन नहीं। लेकिन जब ईश्वर के समक्ष प्रार्थना करते हैं, तो यह भी कहना नहीं भूलते,

प्रभु मोरे अवगुन

चित ना धरो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 292 – पाणी केरा बुदबुदा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 292 पाणी केरा बुदबुदा… ?

आयुः पल्लवकोणाग्रलाम्बान्बुकानभंगुरम्

उन्मत्तमिव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरिणम्।

जीवन की क्षणभंगुरता ऐसा विषय है, जिसे हर व्यक्ति प्रति क्षण अनुभव करता है, तथापि प्रति क्षण भूला रहता है। जगत से जाने के सत्य को जानकर भी जानना नहीं चाहता।

योगवासिष्ठम् के वैराग्य प्रकरण के 14वें सर्ग से लिया गया उपरोक्त श्लोक इसी क्षणभंगुरता की पुष्टि करता है।

इस श्लोक का अर्थ है कि जीवन, किसी पल्लव अथवा पत्ते के कोने पर टपकी हुई जल की बूँद के समान क्षणभंगुर है। यह जीवन (प्राण)  देह को बिना किसी पूर्व चेतावनी के, एक विक्षिप्त या नशे में धुत व्यक्ति की भाँति अकस्मात छोड़कर चला जाता है।

क्षणभंगुरता का यह यथार्थ निरी आँखों से दिखता है। हरेक इसे देखता है। इसका आस्तिकता या नास्तिकता से कोई सम्बंध नहीं है। कर्म या कर्मफल के सिद्धांत से भी इसका कोई लेना-देना नहीं है। ‘परलोक के लिए पुण्य संचित करो’ में विश्वास रखने वाले हों या ‘खाओ, पिओ, ऐश करो’ पर  भरोसा करने वाले, मानने-न मानने वाले, सब पर, हरेक पर यह लागू होता है। यूँ भी कोई किसी भी पंथ, सम्प्रदाय का हो, मत-मतांतर का हो, पार्थिव अमरपट्टा नहीं ले सकता।

क्षणभंगुरता के सिक्के का दूसरा पहलू है शाश्वत होना। ‘क्षणं प्रतिक्षणं गच्छति’, में प्रतिध्वनित होता नश्वरता का शाश्वत सत्य, सीमित देहकाल में मनुष्यता के अपार विस्तार की संभावना भी है।

यहाँ से एक विचार यह उठता है कि भोजन, निद्रा, मैथुन तो सभी सजीवों पर समान रूप से लागू है। तथापि मनुष्य देह का वरदान मिला है तो जीवन को  भोगते हुए कुछ ऐसा अवश्य किया जाना चाहिए जिससे मनुष्यता बेहतर फले-फूले। यह हमारा नैमित्तिक कर्तव्य भी है।

कहीं पढ़ा था कि आदिवासियों के एक समूह को नागरी सभ्यता और विकास दिखाने के लिए लाया गया। शहर की विशाल अट्टालिकाएँ देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उनका आश्चर्य यह जानकर बढ़ गया कि इनमें से अधिकांश घर खाली पड़े हैं। कुछ आगे चलकर उन्होंने देखा कि सड़क पर बड़ी संख्या में भिखारी हैं जो मांग कर अपना गुज़ारा कर रहे हैं और उनके सिर पर किसी तरह की कोई छत नहीं है। आदिवासियों ने जानना चाहा कि वे लोग बिना छत के क्यों हैं, जबकि इतने सारे घर खाली पड़े हैं?

उन्हें बताया गया कि यहाँ एक व्यक्ति कई घर खरीदता है। आगे चलकर जब घर की कीमत बढ़ जाती है तो उसे बेच देता है। पैसा इसी तरह कमाया जाता है। आदिवासी आश्चर्यचकित रह गए। उनमें से एक बुज़ुर्ग ने कहा, “कैसे मनुष्य हैं आप? कुछ लोग सड़क पर बिना घर के जी रहे हैं और एक व्यक्ति के पास अनेक घर हैं। जीवन काटने के लिए तो एक घर ही पर्याप्त है। हम आदिवासियों में प्रथा है कि हम सब मिलकर नवयुगल के लिए अपने हाथों से घर बनाते-बाँधते हैं और उनके जीवन का शुभारंभ करते हैं। इस तरह हम, हमारी आनेवाली पीढ़ी को  बसाते हैं।”

इस घटना का संदर्भ सांप्रतिक जीवन में धन या पैसे के महत्व को नकारने के लिए नहीं है। जीवन के केंद्र में इस समय पैसा है। जगत के सारे व्यवहार का कारण और आधार पैसा है। अर्थार्जन हमारे चार पुरुषार्थों  में सम्मिलित है। अत: परिश्रम और बुद्धि से अर्जन तो अनिवार्य है।

यहाँ संदर्भ मनुष्य में वांछित मनुष्यता के लोप अथवा सामुदायिक चेतना के अभाव का है। इस चेतना के उन्नयन का एक श्रेष्ठ उदाहरण महाराज अग्रसेन रहे। माना जाता है कि उन्होंने ‘एक रोटी, एक ईंट’ का मंत्र अपने राज्य की जनता दिया था।

मंत्र का व्यवहार यह था कि बाहर से आकर कोई व्यक्ति यदि  उनके राज्य में बसना चाहे तो अपेक्षित है कि समाज का हर समर्थ व्यक्ति उसके लिए एक रोटी और एक ईंट की व्यवस्था करे। रोटी से नवागत के परिवार का पेट भरता और एक-एक ईंट करके उसका मकान बनता। सामुदायिकता और सामासिकता का यह अनुपम उदाहरण है।

किसी सुपात्र निर्धन को एक रोटी और एक ईंट दे सकने का सामर्थ्य ईश्वर ने बड़ी संख्या में लोगों को दे रखा है। इसका क्रियान्वयन मनुष्यता को प्राणवान रखने के लिए संजीवनी सिद्ध हो सकता है। 

संत कबीर ने लिखा है,

पाणी केरा बुदबुदा, इसी हमारी जाति।

एक दिनाँ छिप जाँहिगे, तारे ज्यूँ परभाति॥

स्मरण रहे कि क्षणभंगुर जीवन  पानी के बुलबुले की भाँति अकस्मात फूट जाएगा। बुलबुले के फूटने से पहले सामुदायिक विकास में थोड़ा-सा हाथ लगा सकें, पंच महाभूतों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकें तो मनुष्य जीवन में कुछ सार्थक कर सकने का संतोष लिए प्रस्थान हो सकेगा।

© संजय भारद्वाज 

अपराह्न 1:05 बजे, 14 जून 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 704 ⇒ गर्दिश के दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गर्दिश के दिन।)

?अभी अभी # 704 ⇒ गर्दिश के दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गर्दिश के दिन अक्सर तब ही याद आते हैं, जब हमारे अच्छे दिन आ जाते हैं। सुख के क्षणों में दुःख के दिनों की दास्तान कितनी अच्छी लगती है न ! दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो।

जिनके सितारे हमेशा ही गर्दिश में रहते हैं उनके लिए गर्दिश स्थायी भाव हो जाता है और वे हनुमान चालीसा की जगह रोजाना मुकेश का, फिल्म रेशमी रुमाल का यह गीत गाना अधिक पसंद करते हैं ;

गर्दिश में हो तारे,

ना घबराना प्यारे

गर तू हिम्मत ना हारे

तो होंगे वारे न्यारे

विरले ही होते हैं, जिनके वारे न्यारे होते हैं, और जो प्रसिद्धि और शोहरत पाने के बाद अपने गर्दिश के दिनों को आत्म दया, आत्म प्रशंसा और आत्म विश्वास के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। उनके गर्दिश के दिन धन्य हो जाते हैं, वे पुनः पुरस्कृत हो जाते हैं।।

जो इंसान गर्दिश में जीता है, वह गर्दिश का महत्व ही नहीं समझता ! अगर किस्मत से उसके अच्छे दिन आ भी गए, तो ईश्वर को धन्यवाद दे, दाल रोटी खा, प्रभु के गुण गाता रहता है। संतोषी सदा सुखी। लेकिन समझदार, सफल और व्यवहारकुशल लोग आपदा में अवसर ढूंढ लेते हैं। सर्व साधन संपन्न होने के बाद, सफलता के कदम चूमने के बाद, गर्दिश के दिनों का ऐसा तड़का लगाकर मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं कि पढ़ने वाले की आँखें भर आती हैं, वह मन में सोचता है, काश मेरे जीवन में भी ऐसा संघर्ष होता। अगर मेरे भी ऐसे ही गर्दिश के दिन होते, तो मैं भी आज एक महान व्यक्ति होता। मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया।

गर्दिश के दिनों में दोस्तों और दुश्मनों दोनों को याद किया जाता है। जो पात्र आज नहीं हैं, उनके बारे में अतिशयोक्ति से भी काम चलाया जा सकता है। किसने आपका मुसीबत में साथ दिया और कौन मुंह फेरकर निकल गया, हिसाब चूकता किया जा सकता है। तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी याददाश्त और थोड़ी कल्पनाशीलता का पुट गर्दिश के दिनों को और अधिक आकर्षित बना सकता है।।

बेहतर तो यह हो, कि कुछ महान चिंतक, विचारकों और साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों का अध्ययन किया जाए, उन पर चिंतन मनन किया जाए, अपनी गर्दिशों में रोचकता ढूंढी जाए, उसके बाद ही गर्दिश के दिनों पर कुछ लिखा जाए। हर महान व्यक्ति अपने गर्दिश के दिन नहीं भूलता। अगर भूल जाए, तो वह महान बन ही नहीं सकता।

लोकप्रिय कथा मासिक सारिका में कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों की एक धारावाहिक श्रृंखला प्रकाशित हुई थी, स्वयं कमलेश्वर जी की पुस्तक “गर्दिश के दिन” तीन खंडों में प्रकाशित हुई है। परसाई जी के अनुसार गर्दिश उनकी नियति है। कुछ ऐसे ही भाव इस गीत के भी हैं ;

रहा गर्दिशों में हरदम

मेरे इश्क का सितारा।

कभी डगमगाई कश्ती

कभी खो गया किनारा।।

अगर आप एक महान व्यक्ति बन चुके हैं, अथवा बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने जीवन में गर्दिश के दिनों को तलाशें, उन्हें तराशें, धो पोंछकर साफ करें और करीने से दुनिया के सामने पेश करें। अगर आपके जीवन में गर्दिश के दिन नहीं, तो आप इंसान नहीं। ऐसा आदमी क्या खाक महान बनेगा। पड़े रहिए गर्दिश के दिनों की तलाश में। क्योंकि गर्दिश के दिनों के बाद ही इंसान के जीवन में अच्छे दिन आते हैं। गर्दिश के दिन भुला ना देना।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #279 ☆ आज ज़िंदगी : कल उम्मीद… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख आज ज़िंदगी : कल उम्मीद। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 279 ☆

☆ आज ज़िंदगी : कल उम्मीद… ☆

‘ज़िंदगी वही है, जो हम आज जी लें। कल जो जीएंगे, वह उम्मीद होगी’ में निहित है… जीने का अंदाज़ अर्थात् ‘वर्तमान में जीने का सार्थक संदेश’ …क्योंकि आज सत्य है, हक़ीकत है और कल उम्मीद है, कल्पना है, स्वप्न है; जो संभावना-युक्त है। इसीलिए कहा गया है कि ‘आज का काम कल पर मत छोड़ो,’ क्योंकि ‘आज कभी जायेगा नहीं, कल कभी आयेगा नहीं।’ सो! वर्तमान श्रेष्ठ है; आज में जीना सीख लीजिए अर्थात् कल अथवा भविष्य के स्वप्न संजोने का कोई महत्व व प्रयोजन नहीं तथा वह कारग़र व उपयोगी भी नहीं है। इसलिए ‘जो भी है, बस यही एक पल है, कर ले पूरी आरज़ू’ अर्थात् भविष्य अनिश्चित है। कल क्या होगा… कोई नहीं जानता। कल की उम्मीद में अपना आज अर्थात् वर्तमान नष्ट मत कीजिए। उम्मीद पूरी न होने पर मानव केवल हैरान-परेशान ही नहीं; हताश भी हो जाता है, जिसका परिणाम सदैव निराशाजनक होता है।

हां! यदि हम इसके दूसरे पहलू पर प्रकाश डालें, तो मानव को आशा का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि यह वह जुनून है, जिसके बल पर वह कठिन से कठिन अर्थात् असंभव कार्य भी कर गुज़रता है। उम्मीद भविष्य में फलित होने वाली कामना है, आकांक्षा है, स्वप्न है; जिसे साकार करने के लिए मानव को निरंतर अनथक परिश्रम करना चाहिए। परिश्रम सफलता की कुंजी है तथा निराशा मानव की सफलता की राह में अवरोध उत्पन्न करती है। सो! मानव को निराशा का दामन कभी नहीं थामना चाहिए और उसका जीवन में प्रवेश निषिद्ध होना चाहिए। इच्छा, आशा, आकांक्षा…उल्लास है,  उमंग है, जीने की तरंग है– एक सिलसिला है ज़िंदगी का; जो हमारा पथ-प्रदर्शन करता है, हमारे जीवन को ऊर्जस्वित करता है…राह को कंटक-विहीन बनाता है…वह सार्थक है, सकारात्मक है और हर परिस्थिति में अनुकरणीय है।

‘जीवन में जो हम चाहते हैं, वह होता नहीं। सो! हम वह करते हैं, जो हम चाहते हैं। परंतु होता वही है, जो परमात्मा चाहता है अथवा मंज़ूरे-ख़ुदा होता है।’ फिर भी मानव सदैव जीवन में अपना इच्छित फल पाने के लिए प्रयासरत रहता है। यदि वह प्रभु में आस्था व विश्वास नहीं रखता, तो तनाव की स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यदि वह आत्म-संतुष्ट व भविष्य के प्रति आश्वस्त रहता है, तो उसे कभी भी निराशा रूपी सागर में अवग़ाहन नहीं करना पड़ता। परंतु यदि वह भीषण, विपरीत व विषम परिस्थितियों में भी उसके अप्रत्याशित परिणामों से समझौता नहीं करता, तो वह अवसाद की स्थिति को प्राप्त हो जाता है… जहां उसे सब अजनबी-सम अर्थात् बेग़ाने ही नहीं, शत्रु नज़र आते हैं। इसके विपरीत जब वह उस परिणाम को प्रभु-प्रसाद समझ, मस्तक पर धारण कर हृदय से लगा लेता है; तो चिंता, तनाव, दु:ख आदि उसके निकट भी नहीं आ सकते। वह निश्चिंत व उन्मुक्त भाव से अपना जीवन बसर करता है और सदैव अलौकिक आनंद की स्थिति में रहता है…अर्थात् अपेक्षा के भाव से मुक्त, आत्मलीन व आत्म-मुग्ध।

हां! ऐसा व्यक्ति किसी के प्रति उपेक्षा भाव नहीं रखता … सदैव प्रसन्न व आत्म-संतुष्ट रहता है, उसे जीवन में कोई भी अभाव नहीं खलता और उस संतोषी जीव का सानिध्य हर व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। उसकी ‘औरा’ दूसरों को खूब प्रभावित व प्रेरित करती है। इसलिए व्यक्ति को सदैव निष्काम कर्म करने चाहिए, क्योंकि फल तो हमारे हाथ में है नहीं। ‘जब परिणाम प्रभु के हाथ में है, तो कल व फल की चिंता क्यों?

वह सृष्टि-नियंता तो हमारे भूत-भविष्य, हित- अहित, खुशी-ग़म व लाभ-हानि के बारे में हमसे बेहतर जानता है। चिंता चिता समान है तथा चिंता व कायरता में विशेष अंतर नहीं अर्थात् कायरता का दूसरा नाम ही चिंता है। यह वह मार्ग है, जो मानव को मृत्यु के मार्ग तक सुविधा-पूर्वक ले जाता है। ऐसा व्यक्ति सदैव उधेड़बुन में मग्न रहता है…विभिन्न प्रकार की संभावनाओं व कल्पनाओं में खोया, सपनों के महल बनाता-तोड़ता रहता है और वह चिंता रूपी दलदल से लाख चाहने पर भी निज़ात नहीं पा सकता। दूसरे शब्दों में वह स्थिति चक्रव्यूह के समान है; जिसे भेदना मानव के वश की बात नहीं। इसलिए कहा गया है कि ‘आप अपने नेत्रों का प्रयोग संभावनाएं तलाशने के लिए करें; समस्याओं का चिंतन-मनन करने के लिए नहीं, क्योंकि समस्याएं तो बिन बुलाए मेहमान की भांति किसी पल भी दस्तक दे सकती हैं।’ सो! उन्हें दूर से सलाम कीजिए, अन्यथा वे ऊन के उलझे धागों की भांति आपको भी उलझा कर अथवा भंवर में फंसा कर रख देंगी और आप उन समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए छटपटाते व संभावनाओं को तलाशते रह जायेंगे।

सो! समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए संभावनाओं की दरक़ार है। हर समस्या के समाधान के केवल दो विकल्प ही नहीं होते… अन्य विकल्पों पर दृष्टिपात करने व अपनाने से समाधान अवश्य निकल आता है और आप चिंता-मुक्त हो जाते हैं। चिंता को कायरता का पर्यायवाची कहना भी उचित है, क्योंकि कायर व्यक्ति केवल चिंता करता है, जिससे उसके सोचने-समझने की शक्ति कुंठित हो जाती है तथा उसकी बुद्धि पर ज़ंग लग जाता है। इस मनोदशा में वह उचित निर्णय लेने की स्थिति में न होने के कारण ग़लत निर्णय ले बैठता है। सो! वह दूसरे की सलाह मानने को भी तत्पर नहीं होता, क्योंकि सब उसे शत्रु-सम भासते हैं। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है तथा किसी अन्य पर विश्वास नहीं करता। ऐसा व्यक्ति पूरे परिवार व समाज के लिए मुसीबत बन जाता है और गुस्सा हर पल उसकी नाक पर धरा रहता है। उस पर किसी की बातों का प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि वह सदैव अपनी बात को उचित स्वीकार कारग़र सिद्ध करने में प्रयासरत रहता है।

‘दुनिया की सबसे अच्छी किताब हम स्वयं हैं… ख़ुद को समझ लीजिए; सब समस्याओं का अंत स्वत: हो जाएगा।’ ऐसा व्यक्ति दूसरे की बातों व नसीहतों को अनुपयोगी व अनर्गल प्रलाप तथा अपने निर्णय को सर्वदा उचित उपयोगी व श्रेष्ठ ठहराता है। वह इस तथ्य को स्वीकारने को कभी भी तत्पर नहीं होता कि दुनिया में सबसे अच्छा है–आत्मावलोकन करना; अपने अंतर्मन में झांक कर आत्मदोष-दर्शन व उनसे मुक्ति पाने के प्रयास करना तथा इन्हें जीवन में धारण करने से मानव का आत्म-साक्षात्कार हो जाता है और तदुपरांत दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: शमन हो जाता है; हृदय सात्विक हो जाता है और उसे पूरे विश्व में चहुं और अच्छा ही अच्छा दिखाई पड़ने लगता है… ईर्ष्या-द्वेष आदि भाव उससे कोसों दूर जाकर पनाह पाते हैं। उस स्थिति में हम सबके तथा सब हमारे नज़र आने लगते हैं।

इस संदर्भ में हमें इस तथ्य को समझना व इस संदेश को आत्मसात् करना होगा कि ‘छोटी सोच शंका को जन्म देती है और बड़ी सोच समाधान को … जिसके लिए सुनना व सीखना अत्यंत आवश्यक है।’ यदि आपने सहना सीख लिया, तो रहना भी सीख जाओगे। जीवन में सब्र व सच्चाई ऐसी सवारी हैं, जो अपने शह सवार को कभी भी गिरने नहीं देती… न किसी की नज़रों में, न ही किसी के कदमों में। सो! मौन रहने का अभ्यास कीजिए तथा तुरंत प्रतिक्रिया देने की बुरी आदत को त्याग दीजिए। इसलिए सहनशील बनिए; सब्र स्वत: प्रकट हो जाएगा तथा सहनशीलता के जीवन में पदार्पण होते ही आपके कदम सत्य की राह की ओर बढ़ने लगेंगे। सत्य की राह सदैव कल्याणकारी होती है तथा उससे सबका मंगल ही मंगल होता है। सत्यवादी व्यक्ति सदैव आत्म-विश्वासी तथा दृढ़-प्रतिज्ञ होता है और उसे कभी भी, किसी के सम्मुख झुकना नहीं पड़ता। वह कर्त्तव्यनिष्ठ और आत्मनिर्भर होता है और प्रत्येक कार्य को श्रेष्ठता से अंजाम देकर सदैव सफलता ही अर्जित करता है।

‘कोहरे से ढकी भोर में, जब कोई रास्ता दिखाई न दे रहा हो, तो बहुत दूर देखने की कोशिश करना व्यर्थ है।’ धीरे-धीरे एक-एक कदम बढ़ाते चलो; रास्ता खुलता चला जाएगा’ अर्थात् जब जीवन में अंधकार के घने काले बादल छा जाएं और मानव निराशा के कुहासे से घिर जाए; उस स्थिति में एक-एक कदम बढ़ाना कारग़र है। उस विकट परिस्थिति में आपके कदम लड़खड़ा अथवा डगमगा तो सकते हैं; परंतु आप गिर नहीं सकते। सो! निरंतर आगे बढ़ते रहिए…एक दिन मंज़िल पलक-पांवड़े बिछाए आपका स्वागत अवश्य करेगी। हां! एक शर्त है कि आपको थक-हार कर बैठना नहीं है। मुझे स्मरण हो रही हैं, स्वामी विवेकानंद जी की पंक्तियां…’उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक तुम्हें लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।’ यह पंक्तियां पूर्णत: सार्थक व अनुकरणीय हैं। यहां मैं उनके एक अन्य प्रेरक प्रसंग पर प्रकाश डालना चाहूंगी – ‘एक विचार लें। उसे अपने जीवन में धारण करें; उसके बारे में सोचें, सपना देखें तथा उस विचार पर ही नज़र रखें। मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों व आपके शरीर के हर हिस्से को उस विचार से भरे रखें और अन्य हर विचार को छोड़ दें… सफलता प्राप्ति का यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।’ सो! उनका एक-एक शब्द प्रेरणास्पद होता है, जो मानव को ऊर्जस्वित करता है और जो भी इस राह का अनुसरण करता है; उसका सफल होना नि:संदेह नि:शंक है; निश्चित है; अवश्यंभावी है।

हां! आवश्यकता है—वर्तमान में जीने की, क्योंकि वर्तमान में किया गया हर प्रयास हमारे भविष्य का निर्माता है। जितनी लगन व निष्ठा के साथ आप अपना कार्य संपन्न करते हैं; पूर्ण तल्लीनता व पुरुषार्थ से प्रवेश कर आकंठ डूब जाते हैं तथा अपने मनोमस्तिष्क में किसी दूसरे विचार के प्रवेश को निषिद्ध रखते हैं; आपका अपनी मंज़िल पर परचम लहराना निश्चित हो जाता है। इस तथ्य से तो आप सब भली-भांति अवगत होंगे कि ‘क़ाबिले तारीफ़’ होने के लिए ‘वाकिफ़-ए-तकलीफ़’ होना पड़ता है। जिस दिन आप निश्चय कर लेते हैं कि आप विषम परिस्थितियों में किसी के सम्मुख पराजय स्वीकार नहीं करेंगे और अंतिम सांस तक प्रयासरत रहेंगे; तो मंज़िल पलक-पांवड़े बिछाए आपकी प्रतीक्षा करती है, क्योंकि यही है… सफलता प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग। परंतु विपत्ति में अपना सहारा ख़ुद न बनना व दूसरों से सहायता की अपेक्षा करना, करुणा की भीख मांगने के समान है। सो! विपत्ति में अपना सहारा स्वयं बनना श्रेयस्कर है और दूसरों से सहायता व सहयोग की उम्मीद रखना स्वयं को छलना है, क्योंकि वह व्यर्थ की आस बंधाता है। यदि आप दूसरों पर विश्वास करके अपनी राह से भटक जाते हैं और अपनी आंतरिक शक्ति व ऊर्जा पर भरोसा करना छोड़ देते हैं, तो आपको असफलता को स्वीकारना ही पड़ता है। उस स्थिति में आपके पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य कोई भी विकल्प शेष रहता ही नहीं।

सो! दूसरों से अपेक्षा करना महान् मूर्खता है, क्योंकि सच्चे मित्र बहुत कम होते हैं। अक्सर लोग विभिन्न सीढ़ियों का उपयोग करते हैं… कोई प्रशंसा रूपी शस्त्र से प्रहार करता है, तो अन्य निंदक बन आपको पथ-विचलित करता है। दोनों स्थितियां कष्टकर हैं और उनमें हानि भी केवल आपकी होती है। सो! स्थितप्रज्ञ बनिए; व्यर्थ के प्रशंसा रूपी प्रलोभनों में मत भटकिए और निंदा से विचलित मत होइए। इसलिये ‘प्रशंसा में अटकिए मत और निंदा से भटकिए मत।’ सो! हर परिस्थिति में सम रहना मानव के लिए श्रेयस्कर है। आत्मविश्वास व दृढ़-संकल्प रूपी बैसाखियों से आपदाओं का सामना करने व अदम्य साहस जुटाने पर ही सफलता आपके सम्मुख सदैव नत-मस्तक रहेगी। सो! ‘आज ज़िंदगी है और कल अर्थात् भविष्य उम्मीद है… जो अनिश्चित है; जिसमें सफलता-असफलता दोनों भाव निहित हैं।’ सो! यह आप पर निर्भर करता है कि आपको किस राह पर अग्रसर होना चाहते हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 703 ⇒ फूल और पत्थर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और पत्थर।)

?अभी अभी # 703 ⇒ फूल और पत्थर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बच्चे फूल से नाजुक होते हैं, फूल से भी नाजुक नन्हीं नन्हीं कलियां होती हैं। फूलों का राजा गुलाब होता है, गुलाब में कांटे भी होते हैं और खुशबू भी। सार सार को ग्रहण करने वाला चतुर इंसान गुलाब से तो प्रेम करता है लेकिन कांटों में नहीं उलझता। वह किसी कली के फूल बनने का इंतजार भी नहीं करता। गुलाब की कलियां बारातियों को पेश की जाती हैं जो बाद में मसल दी जाती हैं। जिन फूलों को मंदिर में अपने आराध्य को चढ़ाया जाता है, वे ही फूल नेताओं के स्वागत में भी बरसाए जाते हैं। फूल को कोई ऐतराज नहीं, उसकी बनी माला इष्ट को समर्पित की जाए अथवा किसी मुख्य अतिथि के गले में अर्पित कर दी जाए। जन्म से विवाह, और विवाह से अंतिम यात्रा तक पुष्प को अनासक्त रूप से अर्पित और समर्पित ही होना है।

आप चाहें गुलाब को पांवों तले रौंदें अथवा उसका गुलाब जल अथवा गुलकंद बना लें, चम्पा, चमेली, जूही का गजरा बना लें, वेणी की तरह बालों में सजा लें, राजेंद्रकुमार की तरह एक फूल किसी के जूड़े में सजा दें, पुष्प को कोई ऐतराज नहीं। एक कवि भले ही पुष्प की अभिलाषा को अभिव्यक्त कर दे, पुष्प का समर्पण तो अव्यक्त और अहैतुक ही होता है। ।

जो रास्ते का एक पत्थर है, अथवा एक राहगीर के लिए मील का पत्थर है, जिस पत्थर की सीढ़ियों पर चलकर हम पहाड़ चढ़े हैं, जिस पत्थर ईंट से हमने घर बनाया है, उसी पत्थर की मूरत की जब मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है, तो वह भगवान हो जाता है।

फूल पत्थर की मूर्ति पर माला बन प्रतिष्ठित हो जाता है। फूल और पत्थर दोनों धन्य हो जाते हैं।

जिस पत्थर से हमने कभी ठोकर खाई है, उसी पत्थर को जब हम भगवान के रूप में पूजते हैं, तो वहां मत्था टेकते हैं, विनती करते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, प्रेमाश्रु बहाते हैं और पूछते हैं ;

ओ रूठे हुए भगवान

तुझको कैसे मनाऊं

तुझको कैसे मनाऊं ?

फूल जहां भी गया, सबके चेहरों पर खुशियाँ बिखेरते गया, गम और खुशी दोनों में फूल ने हमारा साथ निभाया लेकिन पत्थर बड़ा पत्थर दिल निकला। ऐसा क्यों है, जब हमें गुस्सा आता है, हम कोई फूल नहीं तोड़ते, रास्ते पर पड़ा कोई पत्थर उठा लेते हैं। पत्थर एक ऐसा सर्वगुण संपन्न अस्त्र है जो फेंककर मारा जाता है। सिर्फ पत्थर फेंकने से भी गुस्सा शांत हो जाता है। मैने बचपन में अपने कई साथियों को, जब घर में मार पड़ती थी, तो उसका गुस्सा उन्हें सड़क पर राह चलते कुत्ते और सुअर को पत्थर मारकर उतारते देखा है। पहले गुस्सा किया जाता है, फिर किसी पर उतारा जाता है।

हमने भी बचपन में बहुत पत्थर फेंके हैं। गणेश चतुर्थी की रात को पहले चंद्रमा को देखना, फिर दूसरों की छत पर पत्थर फेंककर, चोरी के इल्जाम से बचने के लिए, प्रायश्चित करना। ।

कौन जानता था, जो पत्थर कभी बचपन में, बचपने में, अनजाने में, बिना किसी का अहित किए फेंके गए, समय के साथ ऐसा विकराल रूप धारण कर लेंगे। दुष्यंत ने तो यूं ही कह दिया था, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों, कौन कहता है, आसमान में सूराख नहीं होता। क्या एक फेंका गया पत्थर इतना बड़ा सूराख कर सकता है कि वहां से पत्थरों की बारिश ही होने लग जाए।

अगर किसी ने गलती से मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ा भी है तो अब सिर्फ आग और धुआं ही हमें मधुमक्खी के हमले से बचा सकता है। जिन हाथों में फूल होने चाहिए वहां पत्थर शोभा नहीं देते।

पत्थर तो खैर पत्थर है, लेकिन पत्थर फेंकने वाला नादान नहीं। कोई क्षमादान नहीं। हम अगर पत्थर को पूजना जानते हैं तो पत्थर फेंकने वालों की पूजा करना भी जानते हैं।

आज दुष्यंत होते तो शायद वे भी यही कहते, इन पत्थर फेंकने वालों का तबीयत से इलाज करो यारों। ।

जो जग को जीतना जानते हैं, मनजीत भी हैं, उनका स्वागत है, आगे आएं, कुछ ऐसा कर पाएं, कि जहां से पत्थरों की बारिश हो रही है वहां से कल पुष्प वर्षा हो।

प्रेम से पत्थर को पिघलते जिन्होंने देखा है, उन्होंने ही बियाबान में फूलों को भी खिलते देखा है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 702 ⇒ राजनीति और व्यंग्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “राजनीति और व्यंग्य।)

?अभी अभी # 702 ⇒ राजनीति और व्यंग्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

राजनीति एक शास्त्र है और व्यंग्य एक सहित्यिक विधा ! जो कभी शास्त्र था, वह एक शस्त्र कब से बन गया, कुछ पता नहीं चला। वैसे तो अरस्तु को राजनीति शास्त्र का जनक माना जाता है, लेकिन भारत के संदर्भ में चाणक्य पर आकर सुई अटक जाती है। कौटिल्य शब्द से ही कूटनीति टपकती है, और कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र के बिना सभी शास्त्र अधूरे हैं।

विडंबना देखिये, अर्थशास्त्र पर अर्थ हावी हो गया, और राजनीति शास्त्र पर राजनीति। बुद्धि पर बुद्धिजीवी भारी पड़ गया और ज्ञान पर ज्ञानपीठ। और व्यंग्य जो शास्त्र नहीं था, हास्य की पगडंडियों से चलता चलता साहित्य की प्रमुख धारा में शामिल हो गया। अगर कल का राजनीति शास्त्र आज अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है, तो व्यंग्य भी किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं। ।

कितने दुःख का विषय है, राजनीति से व्यंग्य है, और तो और व्यंग्य में राजनीति भी है, लेकिन राजनीति में आज व्यंग्य का नितांत अभाव है। याद आते हैं वे दिन जब संसद में ज़ोरदार बहस होती थी, शायरी होती थी, नोंकझोंक होती थी, हंगामे भी होते थे, लेकिन किसी का अपमान नहीं होता था। शून्यकाल में बहस चलती थी। प्रश्नोत्तर काल में मंत्री महोदय पर विपक्ष द्वारा प्रश्नों की बौछार कर दी जाती थी। सत्ता से अधिक लोगों में विपक्ष के लिए सम्मान था।

यूँ कहने को तो व्यंग्य और राजनीति का चोली दामन का साथ है, लेकिन दोनों की आपस में बोलचाल तक बंद है। व्यंग्य बंद कमरे में फलता-फूलता है, राजनीति सड़क पर उतर आती है। व्यंग्य पर कोई कीचड़ नहीं उछाल सकता, लेकिन अगर किसी व्यंग्यकार ने राजनीति पर कीचड़ उछाला, तो यह आपे में नहीं रहती। राजनीति को नहीं दोष परसाई। ।

राजनीति में पार्टी होती है, हर पार्टी का झंडा होता है, नेता होता है, पार्टी का कोई नाम होता है। व्यंग्य इस बारे में बहुत कमजोर है। उसके पास कोई नाम नहीं, नेता नहीं, झंडा नहीं, कोई नारा नहीं। वह विघ्नसन्तोषी है ! नेता, नारे, पार्टी और झंडे किसी को नहीं बख्शता। अतः उसे समाज में वह सम्मान प्राप्त नहीं होता जो राजनीति को होता है।

जनता नेता की दीवानी होती है, किसी व्यंग्यकार की नहीं। हमारा व्यंग्यकार कैसा हो, परसाई जैसा हो, कोई नहीं कहता।

गुटबाजी और अवसरवाद राजनीति और व्यंग्य में समान रूप से हावी है। वंशवाद के बारे में एक व्यंग्यकार पूरा कबीर है। कमाल के पूत होते हैं उसके ! एक व्यंग्यकार का लड़का कितना भी बड़ा हो जाए, अपने पिता के जूते में पाँव डालना पसंद नहीं करता। राजनीति में तो पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं। ।

शेक्सपियर के शब्दों में राजनीति और व्यंग्य Strange bedfellows हैं। राजनीति का काम व्यंग्य के बिना आसानी से चल जाता है, लेकिन व्यंग्य को राजनीति की बैसाखी की ज़रूरत पड़ती है। लेकिन व्यंग्यकार जब उसी बैसाखी से राजनीति की पिटाई कर देता है, तो बात बिगड़ जाती है। मेरी बिल्ली मुझ पर म्याऊँ ! लेकिन बिल्ली बड़ी चालाक है। वह किसी के टुकड़ों पर नहीं पलती। जहाँ भी मलाई मिलती है, मुँह मार लेती है।

ज़िन्दगी में हास परिहास हो, व्यंग्य विनोद हो !राजनीति में कटुता समाप्त हो। सहमति-असहमति का नाम ही पक्ष-विपक्ष है। घर घर में विवाद होते हैं, कहासुनी होती है, स्वभावगत विरोध भी होते हैं। लेकिन जब गृहस्थी की गाड़ी आसानी से चल सकती है, तो राजनीति की क्यों नहीं। सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिये हैं। दोनों समान रूप से मज़बूत हों। राजनीति में जब व्यंग्य का समावेश होगा, तब ही यह संभव है। आईना साथ रखें। किसी को आइना दिखाने के पहले अपना मुँह अवश्य देखें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 246 ☆ उम्मीद जाग्रत रखें… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना उम्मीद जाग्रत रखें। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 246 ☆ उम्मीद जाग्रत रखें

हरियाली हो हर मौसम में,

रंग बिरंगी क्यारी हो।

बागों की डाली- डाली भी

अनुपम अद्भुत न्यारी हो।।

*

संस्कार अरु संस्कृतियों का

संगम प्यारा- प्यारा है।

आओ मिल सब सृजन करेंगे

ये संसार हमारा है।।

संसार रूपी बगिया में फूलों की तरह खिलना, महकना और मुस्कुराहट बिखेरने आना चाहिए। जो हो रहा है उसे स्वीकार कर आगे बढ़ते जाना, कदम से कदम मिलाते हुए जो भी निरंतर चला है उसे न केवल अपनों का साथ मिला है वरन प्रकृति ने भी उसके लिए अपने दोनों हाथ खोल दिये हैं। कहते हैं जो सोचो वो मिलेगा, बस सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ ऊर्जान्वित रहिए। यही सब तो आस्था, संस्कार, श्रद्धा, विश्वास व संस्कृति सिखाती है। बस मनोबल कम नहीं होना चाहिए। उम्मीद की डोर थामे अच्छा सोचें अच्छा करें।

गंगा की बहती धारा से,

मन पावन हो जाता है।

सुख -दुख सब इसमें तजकर के,

मनुज मनुज बन पाता है।।

*

अहंकार परित्याग करें तो,

चमन चमन बन जायेगा।

ऋषि मुनि सारे हवन करेंगे

स्वर्ग धरा पर आयेगा।।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ब्रह्मांड ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ब्रह्मांड ? ?

– इस दुनिया के अलावा मेरे भीतर एक और दुनिया बसती है, समुद्री जीव-जंतुओं की दुनिया। खारे पानी के भीतर की दुनिया मुझे बेहद आकर्षित करती है। रंग-बिरंगी मछलियाँ, व्हेल, शार्क, डॉलफिन, ऑक्टोपस, शैवाल, कवक, कोरल और जाने क्या-क्या…, पहले ने कहा।

– मेरे भीतर की दुनिया में अंतरिक्ष है, आकाशगंगा हैं। उल्का पिंड हैं, धूमकेतु हैं। इस दुनिया में सौरमंडल है। सूर्य है, बृहस्पति है, शनि है, शुक्र है, मंगल है, बुध है, यूरेनस है, नेपच्यून है, और भी घूमते अनेक ग्रह हैं, ग्रहों पर बस्तियाँ हैं, बस्तियों में रहते एलियंस हैं…, दूसरे ने कहा।

– मेरे भीतर तो अपनी धरती के जंगल हैं जो लगातार मुझे बुलाते हैं। घने जंगल, तरह-तरह के जंगली जानवर, जानवरों का आपसी तालमेल! सोचता हूँ कि इस जंगल के इतने भीतर चला जाऊँ कि किसी दिन डायनासोर को वहाँ टहलता हुआ देख सकूँ…, तीसरे ने कहा।

– मेरे भीतर की दुनिया कहती है कि मैं पर्वतों पर चढ़ने के लिए पैदा हुआ हूँ। चोटियाँ मुझे आवाज़ लगाती हैं। हर ग्लेशियर में जैसे मेरी आत्मा का एक टुकड़ा जमा हुआ हो। पैर उठते हैं और चोटियाँ नापने लगते हैं।

– मेरे भीतर की दुनिया में है भूगर्भ…मेरी दुनिया में पेड़-पत्ते हैं….मेरी दुनिया तो पंछी हैं…मैं चींटियों की सारी प्रजातियों और उनकी जीवनशैली के बारे में जानना चाहता हूँ…।

अनगिनत लोग, हरेक के भीतर अपनी एक दुनिया..!

– एक बात बताओ, यह आदमी जो हमेशा खोया-खोया-सा रहता है, इसके भीतर भला कौनसी दुनिया बसती होगी?

– उसके भीतर दुनिया नहीं, पूरा ब्रह्मांड है। इसकी दुनिया, उसकी दुनिया, हमारी दुनिया, तुम्हारी दुनिया, हरेक की दुनिया उसके भीतर है। आँखों से दिखती दुनिया के साथ आदमी के अंतर्मन की दुनिया उसके भीतर है। आदमी को देखने, जानने, खंगालने की दुनिया है। उसकी अपनी दुनिया है, उसका अपना सौरमंडल है। वह अपनी दुनिया बनाता है, अपनी दुनिया चलाता है, वही अपनी दुनिया में प्रलय भी लाता है। उसके भीतर सृजन है, उसीके भीतर विसर्जन है।…वह कर्ता है, लेखनी से नित अपनी सृष्टि रचता है। वह लेखक है।

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© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

 

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 701 ⇒ पाठकनामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पाठकनामा।)

?अभी अभी # 701 ⇒ पाठकनामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हम सब पढ़े लिखे इंसान हैं। जो पढ़ता है, वह पाठक कहलाता है, और जो लिखता है, वह लेखक कहलाता है। हम पहले पढ़ना सीखते हैं और बाद में लिखना ! अक्षर ज्ञान में हम पहले अक्षर को पहचानते हैं फिर उसे लिखने की कोशिश करते हैं। एक अनार से हिंदी के पहले अक्षर की पहचान होती है और एक apple से अंग्रेजी के पहले word की। इस तरह शुरू होता है जिंदगी का पहला पाठ ! एक अनार सौ बीमार और An apple a day, keeps the doctor away.

हर पढ़ने वाला एक पाठक हो सकता है, लेकिन हर लिखने वाला लेखक नहीं हो सकता।

पढ़ने के लिए तो खैर पाठ होता है, लेकिन लिखने के लिए सिर्फ सुंदर लेखन होता है। जब देश में टाइपराइटर नहीं थे, तब सुंदर लिखने वाले अच्छे अर्जीनवीस बन जाते थे, जिन्हें दस्तावेज़ लेखक अथवा पिटीशन राइटर भी कहते थे। हनुमंत राव, मार्तण्ड राव भुसारी एक ऐसे ही पिटीशन राइटर थे, जिनके हाथ के लिखे दस्तावेज़ आज धरोहर बन गए हैं। ।

हर लेखक एक अच्छा पाठक होता है। पाठक का लेखक होना जरूरी नहीं ! सुरेंद्र मोहन पाठक एक अच्छे लेखक हैं इसलिए उनके करोड़ों पाठक हैं। प्रेमचंद, यशपाल और शरद बाबू के पाठकों की संख्या कोई नहीं गिनता। किसने उन्हें नहीं पढ़ा ? मैने अच्छे लेखकों को पढ़ा है, लेकिन सुरेंद्र मोहन पाठक को नहीं पढ़ा। मैं जानता हूं, मेरे नहीं पढ़ने से उनकी पाठक संख्या नहीं घटने वाली।

हर पाठक की अपनी पसंद होती है, और अपनी पसंद का लेखक ! आप अपनी पसंद किसी पर थौंप नहीं सकते। हर अच्छा लेखक, एक अच्छा पाठक ढूंढा करता है, और हर अच्छा पाठक, एक अच्छा लेखक। बस यहीं से पाठक, लेखक का रिश्ता कायम हो जाता है। लेखक अपनी कृतियों के कारण अमर हो जाते हैं, पाठकों की पीढ़ियां आती रहती हैं, जाती रहती हैं। कुछ तो है उनके लेखन में, यूं ही नहीं दिल लगाता कोई। ।

हर अच्छे पाठक में एक लेखक की संभावना होती है। कहीं इस संभावना को अवसर और प्रोत्साहन मिल जाता है तो कहीं इसकी भ्रूण हत्या हो जाती है। जो अपनी लेखनी को निरंतर मांजते रहते हैं, कुछ ना कुछ लिखते और छपते रहते हैं, उन्हें आखिरकार सफलता हाथ लगती ही है। अखबारों में पत्र संपादक के नाम लिखने वाले कई सुधी पाठक आगे चलकर अच्छे लेखक साबित हुए हैं। एक अच्छी शुरुआत अच्छे ही परिणाम देती है।

जिस तरह आप एक पाठक को पढ़ने से नहीं रोक सकते, एक लेखक अपने आपको लिखने से नहीं रोक सकता। विचारों का सृजन, उसकी अभिव्यक्ति और उसके कद्रदान जब तक मौजूद हैं, यह सिलसिला अनवरत चलता रहेगा, नदी के प्रवाह की तरह, क्योंकि सृजन का आकाश कभी सूना नहीं होता, और पाठक रूपी चातक, अपनी प्यास बुझा ही लेता है। सृजन की धारा ही अमृत धारा है। ।

लेखक की अपनी सीमाएं हैं और पाठक की अपनी ! लेखक वही लिखता है, जो पाठक चाहता है, और पाठक वही पढ़ता है, जो लेखक चाहता है। जब दोनों के बीच बाज़ार आ जाता है, तो दोनों मजबूर हो जाते हैं। जो बिकेगा वही लिखा जाएगा। पाठकों की रूचि के अनुसार जब लेखन होगा, तो वह स्वांत: सुखाय हो ही नहीं सकता। प्रेमचंद, रेणु, जैनेंद्र ने जो लिखा, पाठकों ने पसंद किया, उन्हें सर माथे बिठाया, क्योंकि उनके लेखन में सामाजिक चेतना थी, सच्चाई थी।

हर पीढ़ी कुछ नया चाहती है। अच्छे पाठक ही आगे चलकर अच्छे लेखक बनते हैं। काश मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव जैसी तिकड़ी फिर कथादेश में अवतरित हो, कोई आवारा मसीहा, कोई गुनाहों का देवता फिर से सुधी पाठकों पर मेहरबान हो, पुनः नीड़ का निर्माण हो, फिर कोई मनोहर श्याम कुरु कुरु स्वाहा करे, बहुत हुआ राग दरबारी और महाभोज, अब कुछ आपके बंटी के लिए भी हो जाए। पाठक की भी कुछ अपनी पसंद हो जाए, तो लेखन में भी नीर क्षीर विवेक पुनः स्थापित हो जाए। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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