(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्पेशल…“।)
अभी अभी # 710 ⇒ स्पेशल श्री प्रदीप शर्मा
आज का विषय कुछ स्पेशल है, इसलिए इस अभी अभी के शीर्षक के लिए असाधारण, विशेष, विशिष्ट, अथवा खास शब्दों की जगह इस अंग्रेजी शब्द का सहारा लिया गया है।
सबसे पहले, यह शब्द स्पेशल क्यों है ! जब भी बाज़ार में कहीं दोस्तों के साथ चाय पीने जाते हैं, और जब चाय वाले को कहते हैं, कि यार बढ़िया चाय पिलाओ, तो वह स्पेशल चाय ही पिलाता है। अदरक, इलायची, सौंठ, दालचीनी और न जाने क्या क्या। नमकीन की दुकान हो या मिठाई की, सबसे पहले नजर किसी स्पेशल आइटम पर ही जाती है। साड़ियों की खरीद हो या आभूषण की, कुछ खास, स्पेशल डिज़ाइन की ही फरमाइश की जाती है। अखबारों के पृष्ठ स्पेशल ऑफर के इश्तहारों से भरे रहते हैं। स्पेशल डिस्काउंट पर किसकी नजर नहीं होती।
किसी के चेहरे की मुस्कुराहट से पता चल जाता है, समथिंग स्पेशल ?
बच्चे सभी स्पेशल होते हैं। और अगर उसमें भी बच्चा हमारा होता है, तो वह स्पेशल होता ही है, लेकिन भगवान कुछ बच्चों को स्पेशल बनाता है, इतना स्पेशल, कि उन्हें स्पेशल चाइल्ड कहा जाता है। आज का अभी अभी हर उस स्पेशल चाइल्ड को समर्पित है। हम जब भी अपने आसपास के संसार से रूबरू होते हैं, तो अपने परिचितों, रिश्तेदारों और आत्मीय परिजनों में इन फरिश्तों की उपस्थिति का हमें अहसास ही नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव भी होता है।
जिंदगी के रंग कई रे ! जिसने हमें यह खूबसूरत जिंदगी दी है, हमें जीता जागता, वन पीस बनाया है, हम कब उसके शुक्रगुजार हुए हैं। आपकी इस सुंदर काया को बनाने में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी। अच्छे भले नाक नक्श, आंख, नाक, कान, गला, हाथ पांव, पूरी anatomy और physiology, तेज तर्रार दिमाग और एक धड़कता हुआ दिल। हमने कब उसे शुक्रिया कहा।
आपने सब कुछ अपने पुरुषार्थ से हासिल किया है। किसी ने हम पर कोई अहसान नहीं किया। अहं ब्रह्मास्मि।।
अगर वह जन्म से ही आपको दो की जगह एक आँख देता, या एक कान देता, तो आप क्या कर लेते। आपका एक सामान्य, साधारण इंसान होना ही सबसे बड़ा चमत्कार है। हमारी निगाह अक्सर अभावों पर ही जाती है, जो हमें मिला है, उस पर नहीं।
स्पेशल चाइल्ड वे होते हैं, जिन्हें वह सब नहीं मिला, जो हमें मिला है। बच्चों के शारीरिक विकास के साथ साथ ही उनका मानसिक विकास भी होता है। जब किसी कारण दोनों का विकास साथ साथ नहीं हो पाता, तब इस विसंगति का पता चलता है।।
अगर स्पेशल चाइल्ड है, तो उसकी देखभाल भी स्पेशल ही होती है। उनको अलग से ध्यान देना पड़ता है। उनके मन की भाषा को समझना पड़ता है। वे बड़े तो होते जाते हैं लेकिन उनका औसत मानसिक विकास नहीं हो पाता। उनका बाल मन उनका साथ नहीं छोड़ता। जिन बच्चों में हम ईश्वर को देखते हैं, वह ईश्वर इस स्पेशल चाइल्ड का कभी साथ नहीं छोड़ता। इन बच्चों की सेवा ही ईश्वर की सेवा बन जाती है।
दुनिया में रहते हुए भी ये स्पेशल चाइल्ड दुनिया से दूर रहते हैं। उनकी अपनी एक दुनिया होती है, जिसमें सिर्फ वे ही लोग होते हैं, जो उनके करीबी होते हैं। ये लोग बनावटी जिंदगी नहीं जी सकते। छल कपट, राग द्वेष और गला काट स्पर्था से इनका वास्ता ही नहीं पड़ता, इसलिए इनका भोलापन कायम रहता है। जो इस पाखंडी, खुदगर्ज, स्वार्थी दुनिया से जितना दूर है, वह उतना ही अपने अन्तर में स्थापित है। एक स्पेशल चाइल्ड की दुनिया में प्रवेश पाना एक ऐसे अनूठे, अद्भुत संसार में प्रवेश पाना है, जहां कोई महत्वाकांक्षा नहीं, कोई प्रतियोगी नहीं, कोई शत्रु नहीं, किसी तरह के झूठ का सहारा नहीं, कोई आडंबर नहीं, कोई दिखावा नहीं।।
ये असहज तब होते हैं, जब इनकी सहजता में विघ्न पड़ता है। विज्ञान कितनी भी प्रगति कर ले, इतने मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक भी अब तक न तो मन की थाह ही पा पाए, ना ही जन्म के समय से विकसित किसी विसंगति का इलाज ही कर पाए।
जिस तरह विज्ञान ने पोलियो पर विजय पाई है, कैंसर और पैरालिसिस का समय रहते निदान संभव हुआ है, इन बच्चों को भी स्पेशल की जगह हमारी तरह साधारण जीवन का अनुभव हो, बस इनकी अच्छाइयां हमसे दूर ना हों, हमारी बुराइयों का इनमें प्रवेश ना हो। आमीन।।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – वारी-लघुता से प्रभुता की यात्रा
(वारी यात्रा आज पुणे पहुँच रही है। इस संदर्भ में विशेष आलेख)
भारत की अधिकांश परंपराएं ऋतुचक्र से जुड़ी हुई एवं वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरने वाली हैं। देवता विशेष के दर्शन के लिए पैदल तीर्थयात्रा करना इसी परंपरा की एक कड़ी है। संस्कृत में तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है – पापों से तारनेवाला। यही कारण है कि तीर्थयात्रा को मनुष्य के मन पर पड़े पाप के बोझ से मुक्त होने या कुछ हल्का होने का मार्ग माना जाता है। स्कंदपुराण के काशीखण्ड में तीन प्रकार के तीर्थों का उल्लेख मिलता है – जंगम तीर्थ, स्थावर तीर्थ और मानस तीर्थ।
🙏 जय हरि विठ्ठल🙏
(आलंदी और देहू से हरि दर्शन के लिए पंढरपुर की 265 किमी की पदयात्रा अर्थात महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारी। यह वारी आज पुणे पहुँची। मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने लगभग 14 वर्ष पूर्व वारी का वीडियो शूट किया था। उस आधार पर वारी की जानकारी विशेषकर हिंदीभाषी समाज को देने के लिए एक डॉक्युमेंट्री फिल्म लिखी और उसे स्वर दिया। वारी पर आधारित इस फिल्म को 26 हज़ार से अधिक दर्शक देख चुके।)
स्थावर तीर्थ की पदयात्रा करने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारी इस परंपरा का स्थानीय संस्करण है।
पंढरपुर के विठ्ठल को लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले महाराष्ट्र के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में मान्यता मिली। तभी से खेतों में बुआई करने के बाद पंढरपुर में विठ्ठल-रखुमाई (श्रीकृष्ण-रुक्मिणी) के दर्शन करने के लिए पैदल तीर्थ यात्रा करने की परंपरा जारी है। श्रीक्षेत्र आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की चरणपादुकाएँ एवं श्रीक्षेत्र देहू से तुकाराम महाराज की चरणपादुकाएँ पालकी में लेकर पंढरपुर के विठोबा के दर्शन करने जाना महाराष्ट्र की सबसे बड़ी वारी है।
पहले लोग व्यक्तिगत स्तर पर दर्शन करने जाते थे। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, स्वाभाविक था कि संग से संघ बना। 13 वीं शताब्दी आते-आते वारी गाजे-बाजे के साथ समारोह पूर्वक होने लगी।
वारी का शाब्दिक अर्थ है-अपने इष्ट देवता के दर्शन के लिए विशिष्ट दिन,विशिष्ट कालावधि में आना, दर्शन की परंपरा में सातत्य रखना। वारी करनेवाला ‘वारीकर’ कहलाया। कालांतर में वारीकर ‘वारकरी’ के रूप में रुढ़ हो गया। शनैःशनैः वारकरी एक संप्रदाय के रूप में विकसित हुआ।
अपने-अपने गाँव से सीधे पंढरपुर की यात्रा करने वालों को देहू पहुँचकर एक साथ यात्रा पर निकलने की व्यवस्था को जन्म देने का श्रेय संत नारायण महाराज को है। नारायण महाराज संत तुकाराम के सबसे छोटे पुत्र थे। ई.सन 1685 की ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी को वे तुकाराम महाराज की पादुकाएँ पालकी में लेकर देहू से निकले। अष्टमी को वे आलंदी पहुँचे। वहाँ से संत शिरोमणि ज्ञानेश्वर महाराज की चरण पादुकाएं पालकी में रखीं। इस प्रकार एक ही पालकी में ज्ञानोबा-तुकोबा (ज्ञानेश्वर-तुकाराम) के गगन भेदी उद्घोष के साथ वारी का विशाल समुदाय पंढरपुर की ओर चला।
अन्यान्य कारणों से भविष्य में देहू से तुकाराम महाराज की पालकी एवं आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी अलग-अलग निकलने लगीं। समय के साथ वारी करने वालों की संख्या में विस्तार हुआ। इतने बड़े समुदाय को अनुशासित रखने की आवश्यकता अनुभव हुई। इस आवश्यकता को समझकर 19 वीं शताब्दी में वारी की संपूर्ण आकृति रचना हैबतराव बाबा आरफळकर ने की। अपनी विलक्षण दृष्टि एवं अनन्य प्रबंधन क्षमता के चलते हैबतराव बाबा ने वारी की ऐसी संरचना की जिसके चलते आज 21 वीं सदी में 10 लाख लोगों का समुदाय बिना किसी कठिनाई के एक साथ एक लय में चलता दिखाई देता है।
हैबतराव बाबा ने वारकरियों को समूहों में बांटा। ये समूह ‘दिंडी’ कहलाते हैं। सबसे आगे भगवा पताका लिए पताकाधारी चलता है। तत्पश्चात एक पंक्ति में चार लोग, इस अनुक्रम में चार-चार की पंक्तियों में अभंग (भजन) गाते हुए चलने वाले ‘टाळकरी’ (ळ=ल,टालकरी), इन्हीं टाळकरियों में बीच में उन्हें साज संगत करने वाला ‘मृदंगमणि’, टाळकरियों के पीछे पूरी दिंडी का सूत्र-संचालन करनेवाला विणेकरी, विणेकरी के पीछे सिर पर तुलसी वृंदावन और कलश लिए मातृशक्ति। दिंडी को अनुशासित रखने के लिए चोपदार।
वारी में सहभागी होने के लिए दूर-दराज के गाँवों से लाखों भक्त बिना किसी निमंत्रण के आलंदी और देहू पहुँचते हैं। चरपादुकाएँ लेकर चलने वाले रथ का घोड़ा आलंदी मंदिर के गर्भगृह में जाकर सर्वप्रथम ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन करता है। ज्ञानेश्वर महाराज को माउली याने चराचर की माँ भी कहा गया है। माउली को अवतार पांडुरंग अर्थात भगवान का अवतार माना जाता है। पंढरपुर की यात्रा आरंभ करने के लिए चरणपादुकाएँ दोनों मंदिरों से बाहर लाई जाती हैं। उक्ति है-‘ जब चराचर भी नहीं था, पंढरपुर यहीं था।’
चरण पादुकाएँ लिए पालकी का छत्र चंवर डुलाते एवं निरंतर पताका लहराते हुए चलते रहना कोई मामूली काम नहीं है। लगभग 260 कि.मी. की 800 घंटे की पदयात्रा में लाखों वारकरियों की भीड़ में पालकी का संतुलन बनाये रखना, छत्र-चंवर-ध्वज को टिकाये रखना अकल्पनीय है।
वारी स्वप्रेरित अनुशासन और श्रेष्ठ व्यवस्थापन का अनुष्ठान है। कुछ आंकड़े इसकी पुष्टि करने के लिए कुछ आंकड़े जानना पर्याप्त है-
– विभिन्न आरतियों में लगनेवाले नैवेद्य से लेकर रोज़मर्रा के प्रयोग की लगभग 15 हजार वस्तुओं (यहाँ तक की सुई धागा भी) का रजिस्टर तैयार किया जाता है। जिस दिन जो वस्तुएँ इस्तेमाल की जानी हैं, नियत समय पर वे बोरों में बांधकर रख दी जाती हैं।
– 15-20 हजार की जनसंख्या वाले गाँव में 10 लाख वारकरियों का समूह रात्रि का विश्राम करता है। ग्रामीण भारत में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में अद्वैत भाव के बिना गागर में सागर समाना संभव नहीं।
– सुबह और शाम का भोजन मिलाकर वारी में प्रतिदिन 20 लाख लोगों के लिए भोजन तैयार होता है।
– रोज़ाना 10 लाख लोग स्नान करते हैं, कम से कम 30 लाख कपड़े रोज धोये और सुखाये जाते हैं।
– रोज़ाना 50 लाख कप चाय बनती है।
– हर दिन लगभग 3 करोड़ लीटर पानी प्रयोग होता है।
– एक वारकरी दिन भर में यदि केवल एक हजार बार भी हरिनाम का जाप करता है तो 10 लाख लोगों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले कुल जाप की संख्या 100 करोड़ हो जाती है। शतकोटि यज्ञ भला और क्या होगा?
– वारकरी दिनभर में लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलता है। विज्ञान की दृष्टि से यह औसतन 26 हजार कैलोरी का व्यायाम है।
– जाने एवं लौटने की 33 दिनों की यात्रा में पालकी के दर्शन 24 घंटे खुले रहते हैं। इस दौरान लगभग 25 लाख भक्त चरण पादुकाओं के दर्शन करते हैं।
– इस यात्रा में औसतन 200 करोड़ का आर्थिक व्यवहार होता है।
– हर दिंडी के साथ दो ट्रक, पानी का एक टेंकर, एक जीप, याने कम से कम चार वाहन अनिवार्य रूप से होते हैं। इस प्रकार 500 अधिकृत समूहों के साथ कम से कम 2 हजार वाहन होते हैं।
– एकत्रित होने वाली राशि प्रतिदिन बैंक में जमा कर दी जाती है।
रथ की सजावट के लिए पुणे से रोज़ाना ताज़ा फूल आते हैं।
हर रात 7 से 8 घंटे के कठोर परिश्रम से रथ को विविध रूपों में सज्जित किया जाता है।
– एक पंक्ति में दिखनेवाली भक्तों की लगभग 15 किलोमीटर लम्बी ‘मूविंग ट्रेन’ 24 घंटे में चार बार विश्रांति के लिए बिखरती है और नियत समय पर स्वयंमेव जुड़कर फिर गंतव्य की यात्रा आरंभ कर देती है।
– गोल रिंगण अर्थात अश्व द्वारा की जानेवाली वृत्ताकार परिक्रमा हो, या समाज आरती, रात्रि के विश्राम की व्यवस्था हो या प्रातः समय पर प्रस्थान की तैयारी, लाखों का समुदाय अनुशासित सैनिकों-सा व्यवहार करता है।
– नाचते-गाते-झूमते अपने में मग्न वारकरी…पर चोपदार का हो का एक स्वर और संपूर्ण नीरव …… इस नीरव में मुखर होता है-वारकरियों का अनुशासन।
वारकरी से अपेक्षित है कि वह गले में तुलसी की माला पहने। ये माला वह किसी भी वरिष्ठ वारकरी को प्रणाम कर धारण कर सकता है। वारकरी संप्रदाय के लोकाचारों में शामिल है- माथे पर गोपीचंदन,धार्मिक ग्रंथों का नियमित वाचन, शाकाहार, सदाचार, सत्य बोलना, हाथ में भगवा पताका, सिर पर तुलसी वृंदावन, और जिह्वा पर राम-कृष्ण-हरि का संकीर्तन।
राम याने रमनेवाला-हृदय में आदर्श स्थापित करनेवाला, कृष्ण याने सद्गुरु-अपनी ओर खींचनेवाला और हरि याने भौतिकता का हरण करनेवाला।
राम-कृष्ण-हरि का अनुयायी वारकरी पालकी द्वारा विश्रांति की घोषणा से पहले कहीं रुकता नहीं, अपनी दिंडी छोड़ता नहीं, माउली को नैवेद्य अर्पित होने से पहले भोजन करता नहीं।
वारकरी कम से कम भौतिक आवश्यकताओं के साथ जीता है। वारी आधुनिक भौतिकता के सामने खड़ी सनातन आध्यात्मिकता है। आधुनिकता अपरिमित संसाधन जुटा-जुटाकर आदमी को बौना कर देती है। जबकि वारी लघुता से प्रभुता की यात्रा है। प्रभुता की यह दृष्टि है कि इस यात्रा में आपको मराठी भाषियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में अमराठी भाषी भी मिल जायेंगे। भारतीयों के साथ विदेशी भी दिखेंगे। इस अथाह जन सागर की समरसता ऐसी कि वयोवृद्ध माँ को अपने कंधे पर बिठाये आज के श्रवण कुमार इसमें हिंदुत्व देखते हैं तो संत जैनब-बी ताउम्र इसमें इस्लाम का दर्शन करती रही।
वारी, यात्री में सम्यकता का अद्भुत भाव जगाती है। भाव ऐसा कि हर यात्री अपने सहयात्री को धन्य मान उसके चरणों में शीश नवाता है। सहयात्री भी साथी के पैरों में माथा टेक देता है।
जे-जे पाहिले भूत, ते-ते मानिले भगवंत……हर प्राणी में, हर जीव में माउली दिखने लगे हैं। किंतु असली माउली तो विनम्रता का ऐसा शिखर है जो दिखता आगे है , चलता पीछे है। यात्रा के एक मोड़ पर संतों की पालकियाँ अवतार पांडुरंग के रथ के आगे निकल जाती हैं। आगे चलते भगवान कब पीछे आ गये ,पता ही नहीं चलता।
संत कबीर कहते हैं-
कबीरा मन ऐसा भया, जैसा गंगा नीर पाछे-पाछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर।
भक्तों की भीड़ हरिनाम का घोष करती हैं जबकि स्वयं हरि भक्तों के नाम-संकीर्तन में डूबे होते हैं।
भक्त रूपी भगवान की सेवा में अनेक संस्थाएँ और व्यक्ति भी जुटते हैं। ये सेवाभावी लोग डॉक्टरों की टीम से लेकर कपड़े इस्तरी करने, दाढ़ी बनाने, जूते-चप्पल मरम्मत करने जैसी सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं।
वारी भारत के धर्म सापेक्ष समाज का सजीव उदाहरण है। वारी असंख्य ओस कणों के एक होकर सागर बनने का जीता-जागता चित्र है। वस्तुतः ‘वा’ और ‘री’ के डेढ़-डेढ़ शब्दों से मिलकर बना वारी यात्रा प्रबंधन का वृहद शब्दकोश है।
– आनंद का असीम सागर है वारी..
– समर्पण की अथाह चाह है वारी…
– वारी-वारी, जन्म- मरणा ते वारी..
– जन्म से मरण तक की वारी…
– मरण से जन्म तक की वारी..
– जन्म-मरण की वारी से मुक्त होने के लिए भी वारी……
वारी देखने- पढ़ने या सुनने की नहीं अपितु अनुभव करने की यात्रा है। इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए महाराष्ट्र की पावन धरती आपको संकेत कर रही है। विदुषी इरावती कर्वे के शब्दों में -महाराष्ट्र अर्थात वह भूमि जहाँ का निवासी पंढरपुर की यात्रा करता है। जीवन में कम से कम एक बार वारी करके महाराष्ट्रवासी होने का सुख अवश्य अनुभव करें।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी
इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।
इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख रिश्तों की तपिश। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 280 ☆
☆ रिश्तों की तपिश… ☆
‘सर्द हवा चलती रही/ रात भर बुझते हुए रिश्तों को तापा किया हमने‘– गुलज़ार की यह पंक्तियां समसामयिक हैं; आज भी शाश्वत हैं। रिश्ते कांच की भांति पल भर में दरक़ जाते हैं, जिसका कारण है संबंधों में बढ़ता अजनबीपन का एहसास, जो मानसिक संत्रास व एकाकीपन के कारण पनपता है और उसका मूल कारण है…मानव का अहं, जो रिश्तों को दीमक की भांति चाट रहा है। संवादहीनता के कारण पनप रही आत्मकेंद्रितता और संवेदनहीनता मधुर संबंधों में सेंध लगाकर अपने भाग्य पर इतरा रही है। सो! आजकल रिश्तों में गर्माहट रही कहां है?
विश्व में बढ़ रही प्रतिस्पर्द्धात्मकता के कारण मानव हर कीमत पर एक-दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है। उसकी प्राप्ति के लिए उसे चाहे किसी भी सीमा तक क्यों न जाना पड़े? रिश्ते आजकल बेमानी हैं; उनकी अहमियत रही नहीं। अहंनिष्ठ मानव अपने स्वार्थ-हित उनका उपयोग करता है। यह कहावत तो आपने सुनी होगी कि ‘मुसीबत में गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।’ आजकल रिश्ते स्वार्थ साधने का मात्र सोपान हैं और अपने ही, अपने बनकर अपनों को छल रहे हैं अर्थात् अपनों की पीठ में छुरा घोंपना सामान्य-सी बात हो गयी है।
प्राचीन काल में संबंधों का निर्वहन अपने प्राणों की आहुति देकर किया जाता था… कृष्ण व सुदामा की दोस्ती का उदाहरण सबके समक्ष है; अविस्मरणीय है…कौन भुला सकता है उन्हें? सावित्री का अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए यमराज से उलझ जाना; गंधारी का पति की खुशी के लिए अंधत्व को स्वीकार करना; सीता का राम के साथ वन-गमन; उर्मिला का लक्ष्मण के लिए राजमहल की सुख- सुविधाओं का त्याग करना आदि तथ्यों से सब अवगत हैं। परंतु लक्ष्मण व भरत जैसे भाई आजकल कहां मिलते हैं? आधुनिक युग में तो ‘यूज़ एण्ड थ्रो’ का प्रचलन है। सो! पति-पत्नी का संबंध भी वस्त्र-परिवर्तन की भांति है। जब तक अच्छा लगे– साथ रहो, वरना अलग हो जाओ। सो! संबंधों को ढोने का औचित्य क्या है? आजकल तो चंद घंटों पश्चात् भी पति-पत्नी में अलगाव हो जाता है। परिवार खंडित हो रहे हैं और सिंगल पेरेंट का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। बच्चे इसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा भुगतने को विवश हैं। एकल परिवार व्यवस्था के कारण बुज़ुर्ग भी वृद्धाश्रमों में आश्रय पा रहे हैं। कोई भी संबंध पावन नहीं रहा, यहां तक कि खून के रिश्ते, जो परमात्मा द्वारा बनाए जाते हैं तथा उनमें इंसान का तनिक भी योगदान नहीं होता …वे भी बेतहाशा टूट रहे हैं।
परिणामत: स्नेह, सौहार्द, प्रेम व त्याग का अभाव चहुंओर परिलक्षित है। हर इंसान निपट स्वार्थी हो गया है। विवाह-व्यवस्था अस्तित्वहीन हो गई है तथा टूटने के कग़ार पर है। पति-पत्नी भले ही एक छत के नीचे रहते हैं, परंतु कहां है उनमें समर्पण व स्वीकार्यता का भाव? वे हर पल एक-दूसरे को नीचा दिखा कर सुक़ून पाते हैं। सहनशीलता जीवन से नदारद होती जा रही है। पति-पत्नी दोनों दोधारी तलवार थामे, एक-दूसरे का डट कर सामना करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का प्रचलन तो सामान्य हो गया है। बीस वर्ष तक साथ रहने पर भी वे पलक झपकते अलग होने में जीवन की सार्थकता स्वीकारते हैं, जिसका मुख्य कारण है…लिव-इन व विवाहेतर संबंधों को कानूनी मान्यता प्राप्त होना। जी हां! आप स्वतंत्र हैं। आप निरंकुश होकर अपनी पत्नी की भावनाओं पर कुठाराघात कर पर-स्त्री गमन कर सकते हैं। ‘लिव-इन’ ने भी हिन्दू विवाह पद्धति की सार्थकता व अनिवार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। कैसा होगा आगामी पीढ़ी का चलन? क्या इन विषम परिस्थितियों में परिवार-व्यवस्था सुरक्षित रह पाएगी?
मैं यहां ‘मी टू’ पर भी प्रकाश डालना चाहूंगी, जिसे कानून ने मान्यता प्रदान कर दी है। आप पच्चीस वर्ष पश्चात् भी किसी पर दोषारोपण कर अपने हृदय की भड़ास निकालने को स्वतंत्र हैं। हंसते-खेलते परिवारों की खुशियों को होम करने का आपको अधिकार है। सो! इस तथ्य से तो आप सब परिचित हैं कि अपवाद हर जगह मिलते हैं। कितनी महिलाएं कहीं दहेज का इल्ज़ाम लगा व ‘मी टू’ के अंतर्गत किसी की पगड़ी उछाल कर उनकी खुशियों को मगर की भांति लील रही हैं।
इन विषम परिस्थितियों में आवश्यक है– सामाजिक विसंगतियों पर चर्चा करना। बाज़ारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण जीवन- मूल्य खण्डित हो रहे हैं और उनका पतन हो रहा है। सम्मान-सत्कार की भावना विलुप्त हो रही है और मासूमों के प्रति दुष्कर्म के हादसों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। कोई भी रिश्ता विश्वसनीय नहीं रहा। नब्बे प्रतिशत बालिकाओं का बचपन में अपनों द्वारा शीलहरण हो चुका होता है और उन्हें मौन रहने को विवश किया जाता है, ताकि परिवार विखण्डन से बच सके। वैसे भी दो वर्ष की बच्ची व नब्बे वर्ष की वृद्धा को मात्र उपभोग की वस्तु व वासना-पूर्ति का साधन स्वीकारा जाता है। हर चौराहे पर दुर्योधन व दु:शासनों की भीड़ लगी रहती है, जो उनका अपहरण करने के पश्चात् दुष्कर्म कर अपनी पीठ ठोकते हैं। इतना ही नहीं, उनकी हत्या कर वे सुक़ून पाते हैं, क्योंकि वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि वे सबूत के अभाव में छूट जायेंगे। सो! वे निकल पड़ते हैं–नये शिकार की तलाश में। हर दिन घटित हादसों को देख कर हृदय चीत्कार कर उठता है और देश के कर्णाधारों से ग़ुहार लगाता है कि हमारे देश में सऊदी अरब जैसे कठोर कानून क्यों नहीं बनाए जाते, जहां पंद्रह मिनट में आरोपी को खोज कर सरेआम गोली से उड़ा दिया जाता है; जहां राजा स्वयं पीड़िता से मिल तीस मिनट में अपराधी को उल्टा लटका कर भीड़ को सौंप देते हैं ताकि लोगों को सीख मिल सके और उनमें भय का भाव उत्पन्न हो सके। इससे दुष्कर्म के हादसों पर अंकुश लगना स्वाभाविक है।
इस भयावह वातावरण में हर इंसान मुखौटे लगा कर जी रहा है; एक-दूसरे की आंखों में धूल झोंक रहा है। आजकल महिलाएं भी सुरक्षा हित निर्मित कानूनों का खूब फायदा उठा रही हैं। वे बच्चों के लिए पति के साथ एक छत के नीचे रहती हैं, पूरी सुख-सुविधाएं भोगती हैं और हर पल पति पर निशाना साधे रहती हैं। वे दोनों दुनियादारी के निर्वहन हेतू पति-पत्नी का क़िरदार बखूबी निभाते हैं, जबकि वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि यह संबंध बच्चों के बड़े होने तक ही कायम रहेगा। जी हां, यही सत्य है जीवन का…समझ नहीं आता कि पुरुष इन पक्षों को अनदेखा कर कैसे अपनी ज़िंदगी गुज़ारता है और वृद्धावस्था की आगामी आपदाओं का स्मरण कर चिंतित नहीं होता। वह बच्चों की उपेक्षा व अवमानना का दंश झेलता, नशे का सहारा लेता है और अपने अहं में जीता रहता है। पत्नी सदैव उस पर हावी रहती है, क्योंकि वह जानती है कि उसे प्रदत्त अधिकार से कोई भी बेदखल नहीं कर सकता। हां! अलग होने पर मुआवज़ा, बच्चों की परवरिश का खर्च आदि मिलना उसका संवैधानिक अधिकार है। इसलिए महिलाएं अपने ढंग से जीवन-यापन करती हैं।
यह तो सर्द रातों में बुझते हुए दीयों की बात हुई।
जैसे सर्द हवा के चलने पर जलती आग के आसपास बैठ कर तापना बहुत सुक़ून देता है और इंसान उस तपिश को अंत तक महसूसना चाहता है, जबकि वह जानता है कि वे संबंध स्थायी नहीं हैं; पल भर में ओझल हो जाने वाले हैं। इंसान सदैव सुक़ून की तलाश में रहता है, परंंतु वह नहीं जानता कि आखिर सुक़ून उसे कहाँ और कैसे प्राप्त होगा? इसे आप रिश्तों को बचाने की मुहिम के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, परंतु ऐसा है नहीं, क्योंकि ‘मानव खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखता है। वह आज को जी लेना चाहता है; कल के बारे में चिन्ता नहीं करता।
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्हें 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान से नवाजा गया। उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
कोई प्रेम पे काव्य नहीं ना ही किसी दूसरे के द्वारा बल्कि मैं वह सारी बातें तुम से सुनना चाहती हूँ”
मन के अतंस में अक्सर अपने जीवन साथी से बस दो पल और दो बातें को तरस जाती स्त्रियों चुप्पी साधे निहारती रहतीं है उन्हे सांत्वना या दु:ख नहीं होता बल्कि घुटन होती है वह अपने जीवन साथी से बहुत कुछ कहना चाहती है, सुनना चाहती हैं लेकिन शायद उसके पति के पास इस सब के लिए वक़्त होता है और अगर वक़्त नहीं होता है तो केवल पत्नी के लिए नहीं होता।
ना जाने कितनी स्त्रियाँ अजीब सी जिदंगी जीने पे मजबूर हैं, जो कहती नहीं लेकिन जी रहीं हैं। इस रिश्तों में पति-पत्नी एक छत के नीचे बैठते उठते हैं लेकिन बातें बस औपचारिकतावश करते हैं। उनके लिए बच्चे एक प्राथमिकता हैं जो उन्हें जोड़कर रखे हैं समाज में सुखी कपल्स दिखते हैं, जबकि उनका रिश्ता बिलकुल उस पेड़ के जैसे होता है जो अंदर ही अंदर खोखला हो चुका होता है।
यह अलगाव ज्यादातर संयुक्त परिवार में नज़र आ रहा है। कारण है पति पत्नी को खुद के लिए वक़्त ना मिलना। पत्नी का घर के कार्य में व्यस्त और पति चाकरी में। दोनों साथ होकर भी साथ नहीं होते। परिवार में आपसी तालमेल नहीं होने के कारण दोनों के रिश्तों में तनाव उभरने लगता है। कुछ रिश्ते बच्चों के लिए बचा लेते हैं, तो कुछ तलाक़ लेकर अलग अलग हो जाते हैं।
समाज को दिखावे के लिए कुछ कपल्स जोड़ी चुपचाप साथ रहते हैं और अवसाद तनाव झेलते है, कुछ तनाव में आकर सुसाइड तक कर लेते हैं।
इस सब के पीछे बस एक ही कारण है ‘पति पत्नी के रिश्तों में वक़्त की कमी’।
मैं यह नहीं कह रही कि आप पत्नी या पति को की-रिंग बना कर घुमाये लेकिन आत्मिक सुख चैन शांति संवाद जरूर बनाकर रखें।
अपनी जीवनसंगिनी को संयुक्त परिवार के साथ सास-ससुर के घर में नहीं बल्कि अपने हृदय में रखने की कोशिश करें ताकि आप की पत्नी आपके साथ साथ आपके घर में निवास करे।
अरे पत्नी को समझने के लिए उसके पति को ज्यादा कुछ नहीं बस एक स्नेह भरा स्पर्श देते हुए एक वाक्य कहना पड़ता है ‘पगली मैं हूँ न तेरे साथ’।
बस यही एक वाक्य पति पत्नी के रिश्तों को अटूट विश्वास प्रेम में बांधकर जिंदा रहने के लिए मजबूर कर देता है।
वक्त रहते अगर संभाल सकते हैं तो संभाल लीजिए वरना तस्वीरें संभालने में देर नही लगती।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “प्रेरणादायक…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 247 ☆प्रेरणादायक… ☆
सत्य निष्ठ व्यक्ति जब पूर्ण मनोयोग से कोई कार्य करता है तो निश्चय ही उसे मंजिल मिलती है। बस एक दिशा में सही मार्गदर्शक के साथ जुटे रहिए…
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेट लतीफ…“।)
अभी अभी # 708 ⇒ लेट लतीफ… श्री प्रदीप शर्मा
किसी और का नाम किसी व्यक्ति पर आरोपित करना कहां की समझदारी है। वक्त के बाद आप पहुंचते हैं, गलती आपकी है, लेट आप हो रहे हैं, और बदनाम बेचारा लतीफ हो रहा है। अजीब लतीफा है।
वियोगी होगा पहला कवि की तरह शायद लतीफ पहला इन्सान ऐसा हुआ होगा, जो बेचारा कहीं वक्त पर नहीं पहुंचा होगा, उसकी कुछ मजबूरी रही होगी। लेकिन बद अच्छा, बदनाम बुरा। लतीफ अच्छा, लेट लतीफ, ना बाबा ना।।
जो आदतन लेट होते हैं, उन्हें इस विशेषण से सम्मानित किया जाता है। राजा महाराजाओं की सवारी की तरह, लोग उन्हें देखते ही कह उठते हैं, लो आ गए, महाराज लेट लतीफ। वे भी आदत से मजबूर हैं अथवा उनकी भी कोई मजबूरी रहती होगी।
हर दफ्तर में लेट लतीफ पाए जाते हैं। महिलाओं में भी लेट लतीफी होती होगी, लेकिन कोई लता अथवा ललिता कभी लेट नहीं हुई, इसलिए उनके लिए कोई लेट लता अथवा लेट ललिता जैसा आदर्श स्थापित नहीं हो सका। घर गृहस्थी भी संभालना, बच्चों को स्कूल भेजना, पतिदेव का टिफिन तैयार करना, कितने कामकाज होते हैं उनके पास, हम समझते हैं। मैडम, कोशिश कीजिए, थोड़ा समय पर आने की।।
जो आदतन लेट होते हैं, उनका आत्म विश्वास बड़ा गज़ब का होता है। हमारा एक साथी घड़ी से पंद्रह मिनट लेट आता था, इसे कहते हैं वक्त की पाबंदी। आप अपनी घड़ी मिला लो। उसके पास कोई बहाना नहीं था। आधी हकीकत, आधा फसाना था। उसके और दफ्तर के बीच रेलवे क्रॉसिंग आते थे, ट्रेन का भी अपना टाइम था, और उसका भी दफ्तर का। बस अक्सर टकराहट हो जाती थी। अगर कभी शंटिंग शुरू हो गई, तो गए काम से। उससे आग्रह किया जाता, अपना समय थोड़ा एडजस्ट कर लिया करो। लेकिन एडजस्ट दफ्तर को ही करना पड़ता था।
एक हमारे वरिष्ठ मित्र के बारे में शर्त लगाई जाती समय पर आने की। खुद से अधिक दूसरा आप पर भरोसा करे। लगा लो शर्त, अगर वे कभी समय पर आ जाएं ! किसी दिन अगर वे समय से आ जाते, तो उनका अभिनंदन किया जाता। उन्हें सफाई देनी पड़ती, आज वे समय से कैसे आ गए।।
चलिए लेट लतीफ को छोड़िए, जो दफ्तर से जल्दी घर जाते हैं, बताइए, उन्हें क्या कहते हैं ! देखिए, यह आपसी मामला है, अगर इंसान अपना काम खत्म करके, किसी जरूरी काम से, जल्दी घर जाना चाहता है, तो जा सकता है। इसके लिए लतीफ की तरह किसी हनीफ को बीच में लाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जो आदतन जल्दी घर जाते हैं, जरा उनके भी तो जलवे देखिए।
एक सज्जन अपने वरिष्ठ अधिकारी की सदाशयता का लाभ उठाकर दफ्तर से रोजाना शाम दो घंटे पहले ही घर खसक जाते थे। बाबू अफसर राजी, तो इससे हमें क्यों आपत्ति जी ! लेकिन एक दिन तो गजब हो गया। जल्दी जाने वाले सज्जन के घर से उनकी धर्मपत्नी का फोन आ गया। फोन दरियादिल अफ़सर ने ही उठाया। उधर से दहाड़ सुनाई दी। वे रोज तो अब तक घर आ जाते हैं, आज ऐसा क्या हो गया जो अभी तक नहीं आए, हमें चिंता हो गई, इसलिए फोन लगाया है। अगले ही दिन पहले उनकी खिंचाई हुई और उसके बाद से वे भी, दफ्तर के नियत समय पर ही घर जाने लगे। अति सर्वत्र वर्ज्यते।।
हमारे एक पुराने पड़ोसी थे, संयोग से उनका नाम भी मिस्टर लतीफ ही था। बड़े मिलनसार भले इंसान। बरसों से उनसे भेंट नहीं हुई। कहीं से उनका फोन नंबर तलाशा और संपर्क किया तो पता चला he is mo more.
मिस्टर लतीफ अब late लतीफ हो गए, इस दुनिया में नहीं रहे। बड़ा बुरा लगा।
इन सत्तर वर्षों में बहुत कुछ बदला है। प्राइवेट दफ्तरों में समय की और काम की भी बहुत
सख्ती है। लेट लतीफों के दिन अब हवा हुए। अब तो दफ्तरों में भी मस्टर नहीं, ई – अंगूठे चलते हैं। समय की पाबंदी और अनुशासन से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जो बेहतर है, उसका स्वागत है। लेट लतीफ कहीं अब एक लतीफा बनकर ही न रह जाए। यह कहावत अब शायद ही उनके काम आए ;
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि
अहं ब्रह्मास्मि।…सुनकर अच्छा लगता है न!…मैं ब्रह्म हूँ।….ब्रह्म मुझमें ही अंतर्भूत है।
ब्रह्म सब देखता है, ब्रह्म सब जानता है।
अपने आचरण को देख रहे हो न!…अपने आचरण को जान रहे हो न!
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी
इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।
इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दास – बोध…“।)
अभी अभी # 707 ⇒ दास – बोध श्री प्रदीप शर्मा
अगर सबका मालिक एक हुआ, तो हम सब उसके दास हुए। जो अपनी मर्ज़ी का मालिक है, वह किसी का दास नहीं। जिसे अपने कदमों पर सबको झुकाने में मज़ा आता है, उसे मालिक नहीं तानाशाह कहते हैं। शाब्दिक अर्थ को लिया जाए तो दास एक तुच्छ सेवक है। हर भक्त ईश्वर का एक तुच्छ सेवक है, दास है।
ईश्वर के सभी भक्त दास हैं, कबीरदास, सूरदास, रैदास और भगवान राम के तुलसीदास। सभी भक्त समर्थ हैं, रामदास हैं। दास में अहंकार नहीं, सात्विक अपराध-बोध है, तभी वह कह पाता है –
प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो !
यही दासबोध है।।
सामंती युग में दास दासियाँ हुआ करती थीं। कैकई की भी एक दासी थी, जिसके नाम से ही मन थर्रा जाता है। दासों के साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता था। देवदास अगर सिर्फ पारो का दास था तो एक देवदासी आराधना गृह की एक समर्पित दासी।
समय के साथ दास की कालिख घुलने लगी। सभी दास लोकतंत्र में सेवक हो गए। भगवानदास पढ़-लिखकर डॉ भगवानदास हो गए और श्यामसुन्दर डॉ श्यामसुंदर दास। अंग्रेजों ने सेवक को सर्वेंट कर दिया तो वे सभी सिविल सर्वेंट हो गए। सर्वेंट अफसर बन गए, तुच्छ-सेवक बाबू-चपरासी बन गए। जनता के सेवक मंत्री बन गए, उदास जनता फिर उनकी दास बन गई, चेरि बन गई।।
दास भक्ति का प्रतीक है, समर्पण की मिसाल है।
हम अगर आज भी अपने अवगुणों के दास हैं, तो ऐसी दास-प्रथा की जंजीरों को तत्काल तोड़ना होगा। हम केवल मात्र परम-पिता परमेश्वर के दास हैं। उनकी शरण मे जाते ही हम अतुलित बलधारी भक्त शिरोमणि, दासों-के-दास हनुमान के समान हो सकते हैं। ईश्वर का दास न अन्याय सहता है, न किसी का अपमान करता है। वह सर्व-गुण-सम्पन्न है, समर्थ है, राम का दास है। और यही सच्चे अर्थों में “दास-बोध” है।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोस्ती बढ़ाना…“।)
अभी अभी # 706 ⇒ दोस्ती बढ़ाना श्री प्रदीप शर्मा
जब दोस्ती बढ़ती है, तब वह दोस्ताना कहलाती है। किसी से दोस्ती बढ़ाना इतना आसान नहीं होता। पहले परिचय, हैलो हाय से औपचारिक मेल-मिलाप होता है। कच्ची उम्र में दोस्ती, प्यार जैसी, अनायास ही हो जाती है। एक दूसरे का नाम भी नहीं जानते और दोस्ती हो जाती है।
आजकल दोस्ती का प्रबंधन फेसबुक ने अपने ज़िम्मे ले लिया है। किसी परिचित/अपरिचित की प्रोफाइल में जाओ, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजो, उधर से मंजूरी आई और we are friends! भले ही रिश्ते में वो आपका बाप लगता हो।।
फेसबुक के पास एक ही दर्ज़ा है, एक ही क्लास है, all are friends! हमारे शहर में एक लॉज थी, उसका नाम भी फ्रेंड्स लॉज ही था। वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा फेसबुक ने साकार कर दी।
स्कूल का एक साथी था, राम नाम था उसका, राम पाहूजा। खतीपुरे पर सायकल की दुकान थी उसकी। एक ही स्कूल, एक ही क्लास में थे, घर भी आसपास ही थे। दोस्ती हो गई। वह सायकल से मुझे घर लेने आता। डबल सवारी स्कूल जाते। उसकी सायकल की दुकान पर रेडियो सीलोन और विविध भारती सुनते। हफ़्ते में एक फ़िल्म ज़रूर देखते।
हम अच्छे दोस्त थे। फिर भी दोस्ती बढ़ाया करते थे। हमारा एक मौखिक करार था, खिलाओ पिलाओ, दोस्ती बढ़ेगी। कभी मुझे दोस्ती बढ़ाना पड़ती, कभी उसे। जिसकी जेब में पैसे होते, वह दोस्ती बढ़ा देता।।
कभी कभी नोंकझोंक भी हो जाती ! आज दोस्ती कौन बढ़ाएगा। दोनों के पास पैसे नहीं ! जेब की तलाशी ली जाती। दुकान के पैसे हैं, खर्च नहीं कर सकता। आज से दोस्ती खत्म।
दूसरे ही दिन ! चलो दोस्ती बढ़ाते हैं। दोनों की जेब में पैसे होते थे। कभी दामू अण्णा की कचोरी और एक फुल चाय से दोस्ती बढ़ती थी तो कभी प्रशांत के उसल पोहे अथवा दही मिसल से। इतना सस्ता, सुंदर लेकिन टिकाऊ तरीक़ा था हमारा दोस्ती बढ़ाने का।।
रामकथा हम बड़े भाव और श्रद्धा से सुनते हैं लेकिन किसी की रामकहानी में हमें कब दिलचस्पी होती है। मेरे इस दोस्त राम की भी बहुत अग्नि-परीक्षा ली गई। इसके भी लक्ष्मण और भरत जैसे दो भाई थे। राम का भी वनवास शुरू हुआ। पिताजी के शांत होते ही जहाँ पहले राम सायकल स्टोर्स था, वहाँ पहले ऑटो गैरेज और बाद में कपड़े की दुकान खुल गई। कलयुग के लक्ष्मण और भरत ने भ्राता राम को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बड़ा परेशान रहा मेरा दोस्त ! चार लड़कियों की शादी की। मर्यादा में रहा, लेकिन किसी अफसर, नेता से मतलब की दोस्ती नहीं बढ़ाई। दोस्ती बढ़ाई भी तो मुझ जैसे साधारण आदमी से, निःस्वार्थ निश्च्छल।
आज भी संघर्षरत है मेरा राम ! बहुत ठोकरें खाई लेकिन कभी निराश, हताश नहीं हुआ, डगर डगर भटका, लेकिन कभी कदम नहीं भटके। अपना छोटा मोटा धंधा करता है। कम मिलता है आजकल, लेकिन जब भी मिलता है, यही कहता है, चलो दोस्ती बढ़ाते हैं।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 136 ☆ देश-परदेश – खिड़की ☆ श्री राकेश कुमार ☆
खिड़की कही भी हो अच्छी लगती है। मानव हमेशा से ही उत्सुकता लेकर जीता है। उसके मन में हमेशा एक जिज्ञासा रहती है, नया देखने, महसूस करने की। घर में भी सुबह सुबह खिड़की ही तो खोलते हैं।
रेलगाड़ी की खिड़की सपनों का दरवाजा लगती है मुझे, जब भी रेलगाड़ी में खिड़की वाली सीट मिलती है तब एक नई दुनिया में चले जाते हैं हम!
भले वह दुनिया हकीकत में कोसों दूर है लेकिन एक खिड़की हमें उस दुनिया में जीने की अनुमति देती है|
हम गुनगुनाते हैं तराने, अपना हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर उसे हवा के साथ बहने देते हैं, पर अचानक किसी के डर से वह हाथ भीतर कर लेते हैं।
पर उस वक्त बेखबर हो जाते हैं हम, रेल गाड़ी की शोर भरी दुनिया में भी हम अपने लिए बना लेते हैं एक सपनो भरा शहर!!
हम सपने बुनने लगते हैं पर सपनों में किसी धीमी नदी के लहर से बहते चले जाते हैं, अचानक हम पाते हैं कि हमें मुस्कुरा रहे हैं। मुस्कुराहट के साथ कुछ आँसू भी चेहरे पर चिपक जाते हैं, हमें अपनी उस दुनिया में होते हैं जहा हम सच में खुश होते हैं और हम वास्तव में तब तक वास्तविक दुनिया में वापस नही आते जब तक हमारे कंधे पर किसी का हाथ आकर हमें जगा ना दे।
हवाई यात्रा में भी खिड़की की सीट किसी का जीवन रक्षक बन कर पुरानी मान्यता “जाको राखे साइयां मार सके ना कोय” को चरितार्थ करती है, को हालिया विमान दुर्घटना से साबित हो गया हैं।