हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 270 – गुरुत्वाकर्षण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 270 ☆ गुरुत्वाकर्षण… ?

आदमी मिट्टी के घर में रहता था, खेती करता था। अनाज खुद उगाता, शाक-भाजी उगाता, पेड़-पौधे लगाता। कुआँ खोदता, कुएँ की गाद खुद निकालता। गाय-बैल पालता, हल जोता करता, बैल को अपने बच्चों-सा प्यार देता। घास काटकर लाता, गाय को खिलाता, गाय का दूध खुद निकालता, गाय को माँ-सा मान देता। माटी की खूबियाँ समझता, माटी से अपना घर खुद बनाता-बाँधता। सूरज उगने से लेकर सूरज डूबने तक प्रकृति के अनुरूप आदमी की चर्या चलती।

आदमी प्रकृति से जुड़ा था। सृष्टि के हर जीव की तरह अपना हर क्रिया-कलाप खुद करता। उसके रोम-रोम में प्रकृति अंतर्निहित थी। वह फूल, खुशबू, काँटे, पत्ते, चूहे, बिच्छू, साँप, गर्मी, सर्दी, बारिश सबसे परिचित था, सबसे सीधे रू-ब-रू होता । प्राणियों के सह अस्तित्व का उसे भान था। साथ ही वह साहसी था, ज़रूरत पड़ने पर हिंसक प्राणियों से दो-दो हाथ भी करता।

उसने उस जमाने में अंकुर का उगना, धरती से बाहर आना देखा था और स्त्रियों का जापा, गर्भस्थ शिशु का जन्म उसी प्राकृतिक सहजता से होता था।

आदमी ने चरण उटाए। वह फ्लैटों में रहने लगा। फ्लैट यानी न ज़मीन पर रहा न आसमान का हो सका।

अब आदमियों की बड़ी आबादी एक बीज भी उगाना नहीं जानती। प्रसव अस्पतालों के हवाले है। ज्यादातर आबादी ने सूरज उगने के विहंगम दृश्य से खुद को वंचित कर लिया है। बूढ़ी गाय और जवान बैल बूचड़खाने के रॉ मटेरियल हो चले, माटी एलर्जी का सबसे बड़ा कारण घोषित हो चुकी।

अपना घर खुद बनाना-थापना तो अकल्पनीय, एक कील टांगने के लिए भी कथित विशेषज्ञ  बुलाये जाने लगे हैं। अपने इनर सोर्स को भूलकर आदमी आउटसोर्स का ज़रिया बन गया है। शरीर का पसीना बहाना पिछड़ेपन की निशानी बन चुका। एअर कंडिशंड आदमी नेचर की कंडिशनिंग करने लगा है।

श्रम को शर्म ने विस्थापित कर दिया है। कुछ घंटे यंत्रवत चाकरी से शुरू करनेवाला आदमी शनैः-शनैः यंत्र की ही चाकरी करने लगा है।

आदमी डरपोक हो चला है। अब वह तिलचट्टे से भी डरता है। मेंढ़क देखकर उसकी चीख निकल आती है। आदमी से आतंकित चूहा यहाँ-वहाँ जितना बेतहाशा भागता है, उससे अधिक चूहे से घबराया भयभीत आदमी उछलकूद करता है। साँप का दिख जाना अब आदमी के जीवन की सबसे खतरनाक दुर्घटना है।

लम्बा होना, ऊँचा होना नहीं होता। यात्रा आकाश की ओर है, केवल इस आधार पर उर्ध्वगामी नहीं कही जा सकती। त्रिशंकु आदमी आसमान को उम्मीद से ताक रहा है। आदमी ऊपर उठेगा या औंधे मुँह गिरेगा, अपने इस प्रश्न पर खुद हँसी आ रही है। आकाश का आकर्षण मिथक हो सकता है पर गुरुत्वाकर्षण तो इत्थमभूत है। सेब हो, पत्ता, नारियल या तारा, टूटकर गिरना तो ज़मीन पर ही पड़ता है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥  मार्गशीर्ष साधना 16 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक चलेगी। साथ ही आत्म-परिष्कार एवं ध्यान-साधना भी चलेंगी💥

 🕉️ इस माह के संदर्भ में गीता में स्वयं भगवान ने कहा है, मासानां मार्गशीर्षो अहम्! अर्थात मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस साधना के लिए मंत्र होगा-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

  इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दत्त जयंती मनाई जाती है। 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 557 ⇒ बादाम के दाम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बादाम के दाम।)

?अभी अभी # 557 ⇒ बादाम के दाम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सभी जानते हैं, यह आम का नहीं, बादाम का मौसम है, और बादाम का जन्म आम आदमी के लिए नहीं हुआ है। जब से यह आम भी कुछ खास हुआ है, बादाम भी थोड़ा थोड़ा आम हुआ है। आम आदमी भी आजकल, कम से कम, मैंगो शेक और बादाम शेक तो पीने लायक हो ही गया है।

आम अगर फलों का राजा है, तो बादाम सिर्फ़ एक ड्राई फ्रूट यानी सूखा मेवा! ड्राई फ्रूट मतलब रस हीन फल! जिनका जीवन वैसे ही नीरस है, उनका काम ड्राई फ्रूट अथवा सूखे मेवे से नहीं चलता, और जिन्हें अपना गला तर करना होता है, वहाँ देश, काल और परिस्थिति नहीं देखी जाती और अंगूर की बेटी का हाथ थाम लिया जाता है। एक बार जब गला तर होता है, तो कुछ चखना भी पड़ता है। जिन्होंने कभी चखी ही नहीं, वे क्या जानें चखना का स्वाद! हां, जहां माले मुफ़्त बेरहम होता है वहां भुने हुए काजू बादाम भी चखना का ही काम करते हैं।।

लेकिन जो रसिक और शौकीन चखने में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए अगर ठंड में बादाम के जलवे हैं, तो गर्मी में हमारे आम के भी ठाठ निराले हैं। गर्मी में अगर आमरस पूड़ी, तो ठंड में बादाम का हलवा। लेकिन बस आम आदमी बादाम के दाम सुनकर ही बिदक जाता है।

आम के आम और गुठलियों के दाम! लेकिन आम आदमी गुठलियों के दाम की चिंता नहीं करता, आम चूसता है और छिलका और गुठली फेंक देता है। बेचारी बादाम, क्या नहाए और क्या निचोड़े! उसका तो छिलका क्या निकला, वह सिर्फ बादाम की गिरी बनकर रह गई। लेकिन उसके दाम के कारण ही उसे समाज में वह इज्जत और सम्मान प्राप्त है जो फलों के राजा को भी नहीं।।

बादाम के दाम चुकाने के बाद भी अगर हम बादाम के गुणों की तारीफ नहीं करें, तो हम उसके साथ न्याय नहीं कर रहे। पांच वर्ष की उम्र से हम सुनते आ रहे हैं कि रोज सुबह पांच भीगी हुई बादाम खाना चाहिए उससे सेहत और मस्तिष्क दोनों स्वस्थ रहते हैं। आम आपको एक आम इंसान ही बनाए रखता है जब कि बादाम आपको बुद्धिमान भी बनाती है।।

जब हमारे बादाम खाने के दिन थे, तब हम भुने हुए चने और मूंगफली खाकर ही अपनी सेहत बनाते थे। जब सर पर बाल ना हों, और मुंह में दांत, और याददाश्त भी जवाब दे गई हो, तब बादाम की याद आ ही जाती है। देर आयद दुरुस्त आयद।

क्या आप जानते हैं, बादाम का भी तेल निकलता है। कैसा लगता होगा इतनी महंगी बादाम को, जब उसका भी तेल निकलता होगा। हम तो यह सोचकर ही हैरान हैं कि जो बादाम ही इतनी महंगी है, उसका तेल कितना महंगा होगा।

यहां तो सरसों, मूंगफली और सोयाबीन के तेल के भाव ही आसमान छू रहे हैं। लेकिन अगर कॉस्मेटिक्स के विज्ञापन देखें तो वहां ककड़ी, आंवला, मेंहदी, क्रीम और बादाम साथ साथ नजर आयेंगे। कहीं फेसवॉश तो कहीं मॉइश्चराइजर। पूरा समाजवाद है सौंदर्य जगत के उत्पादों में।।

भले ही इंसान का तेल निकल जाए फिर भी कुछ लोग नियमित रूप से बादाम का तेल सर में लगाते हैं और उसी तेल से बदन की मालिश भी करते हैं। जान है तो जहान है। यह जनम ना मिलेगा दोबारा। पैसे को हाथ का मैल यूं ही नहीं कहा गया है। अगर आप अफोर्ड कर सकते हैं तो हम कोई आपको फोर्ड खरीदने का नहीं कह रहे, सिर्फ एक चम्मच बादाम का तेल गर्मागर्म दूध में लेकर देखें। बादाम में दम है ..! !

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 556 ⇒ समय सीमा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “समय सीमा।)

?अभी अभी # 556 ⇒ समय सीमा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

समय को भी क्या कोई, कभी बांध पाया है। समय अपने आप में सीमातीत भी है और समयातीत भी। हमें समय थोक में नसीब नहीं होता, टुकड़ों टुकड़ों में परोसा जाता है समय हमें। समय अपनी गति से चलता रहता है, हम समय देखते ही रह जाते हैं, और समय हमसे आगे निकल जाता है। समय की गति तो इतनी तेज है कि वह पलक झपकते ही गुजर जाता है। बहता पानी है समय।

हमें अक्सर लगता है, कि हमारे पास बहुत समय है, लेकिन हम समय को न तो ताले में ही बंद कर सकते हैं, और न ही उसे किसी बैंक में फिक्स्ड डिपॉज़िट करवा सकते हैं। समय वह जमा राशि है, जिसे जमा करो तो ब्याज पर ब्याज लगने लगता है, और जो मूल है, वह भी खतरे में पड़ जाता है।।

समय को न तो हम बचा सकते और न ही खर्च कर सकते, बस केवल इन्वेस्ट कर सकते हैं। पैसे की ही तरह, अगर समय को भी अच्छे काम में लगाया जाए, तो समय अच्छा चलता है। लोग अक्सर हमसे थोड़ा समय मांगा करते हैं। क्या उनके पास अपना समय नहीं है। क्या करेंगे, वे हमारा समय लेकर। हम भी उदार हृदय से अपना थोड़ा समय उन्हें दे भी देते हैं और फिर शिकायत करते हैं, फालतू में हमारा समय खराब कर दिया। मानो, समय नहीं, शादी का सूट हो। जिसे आप कम से कम ड्राइक्लीन तो करवा सकते हैं। खराब समय का आप क्या कर सकते हैं।

क्या हुआ, अगर उसने आपका थोड़ा सा समय खराब कर दिया। आपने जिंदगी में कौन सा समय का अचार डाल लिया। समय को तो खर्च होना ही है। आदमी पहले समय खर्च करके पैसे कमाता है और फिर खराब समय के लिए पैसे बचाकर रखता है। क्या पैसे बचाने से अच्छा समय आता है। कुछ भी कहो, खराब समय में पैसा ही काम आता है।।

पैसा बचाया जाए कि समय बचाया जाए ! समय तो निकलता ही चला जा रहा है। अच्छे समय में समझदारी इसी में है, पैसा कमाया जाए और बचाया जाए। समय तो पंछी है, समय का पंछी उड़ता जाए ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #260 ☆ शब्दों की सार्थकता… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शब्दों की सार्थकता। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 260 ☆

☆ शब्दों की सार्थकता… ☆

‘सोच कर बोलना व बोलकर सोचना/ मात्र दो शब्दों के आगे-पीछे इस्तेमाल से ही उसके अर्थ व परिणाम बदल जाते हैं’ बहुत सार्थक है। मानव को ‘पहले तोलो, फिर बोलो’ अर्थात् बोलने से पूर्व सोचने-विचारने व चिंतन-मनन करने का संदेश प्रेषित किया गया है। जो लोग आवेश में आकर बिना सोचे-समझे बोलते हैं तथा तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं; वे अपने लिए मुसीबतों का आह्वान करते हैं। मानव को सदैव मधुर वचन बोलने चाहिए जो दूसरों के मन को अच्छे लगें, प्रफुल्लित करें तथा उनका प्रभाव दीर्घकालिक हो। कटु वचन बोलने वाले से कोई भी बात करना पसंद नहीं करता। रहीम के शब्दों में ‘वाणी ऐसी बोलिए, मनवा शीतल होय/ औरों को शीतल करे, ख़ुद भी शीतल होय’ सबको अपनी ओर आकर्षित करता है तथा हृदय को शीतलता प्रदान करता है। कटु वचन बोलने वाला दूसरे को कम तथा स्वयं को अधिक हानि पहुंचाता है–जिसका उदाहरण आप सबके समक्ष है। द्रौपदी के एक वाक्य ‘अंधे की औलाद अंधी’ से महाभारत का भीषण युद्ध हुआ जो अठारह दिन तक चला और उसके भयंकर परिणाम हम सबके समक्ष हैं। इन विषम परिस्थितियों में भगवान कृष्ण ने युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र से गीता का संदेश दिया जो अनुकरणीय है। इतना ही नहीं, विदेशों में गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में पढ़ाया जाता है। निष्काम कर्म के संदेश को अपनाने मात्र से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है, क्योंकि यह मानव को अपेक्षा-उपेक्षा के व्यूह से बाहर निकाल देता है। वास्तव में यह दोनों स्थितियाँ ही घातक हैं। इनसे हृदय को आघात पहुंचता है और मानव इनके व्यूह से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। यदि आप किसी से उम्मीद रखते हैं तो उसके पूरा न होने पर आपको दु:ख होता है और दूसरों द्वारा उपेक्षा के दंश के व्यूह से भी आप आजीवन मुक्त नहीं हो सकते।

‘एक चुप, सौ सुख’ मुहावरे से तो आप सब परिचित होंगे। बुद्धिमानों की सभा में यदि कोई मूर्ख व्यक्ति मौन रहता है तो उसकी गणना बुद्धिमानों में की जाती है। इतना ही नहीं, मौन वह संजीवनी है, जिससे बड़ी-बड़ी समस्याओं का अंत सहज रूप में हो जाता है। प्रत्युत्तर अथवा तुरंत प्रतिक्रिया न देना भी उस स्थिति से निज़ात पाने का अत्यंत कारग़र उपाय है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि ‘बुरी संगति से अकेला भला’ अर्थात् मौन अथवा एकांत मानव की भीतरी दिव्य शक्तियों को जागृत करता है तथा समाधिवस्था में पहुंचा देता है। वहाँ हमें अलौकिक शक्तियों के दर्शन होते हैं तथा बहुत से प्रक्षिप्त रहस्य उजागर होने लगते हैं। यह मन:स्थिति मानव की इहलोक से परलोक की यात्रा कहलाती है।

सोचकर व सार्थक बोलना मानव के लिए अत्यंत उपयोगी है और वह मात्र पद-प्रतिष्ठा प्रदाता ही नहीं, उसे सिंहासन पर भी बैठा सकता है। विश्व के सभी प्रबुद्ध व्यक्ति चिंतन-मनन करने के पश्चात् ही मुख खोलते हैं। सो! उनके मुख से नि:सृत वाणी प्रभावमयी होती है और लोग उसे वेद वाक्य समझ हृदय में धारण कर लेते हैं। यह उनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देता है। बड़े- बड़े ऋषि मुनि व संतजन इसका प्रमाण हैं और उनकी सीख अनुकरणीय है–’यह जीवन बड़ा अनमोल बंदे/ राम-राम तू बोल’ लख चौरासी से मुक्ति की राह दर्शाता है।

इसके विपरीत बोलकर सोचने के उपरांत मानव  किंकर्तव्यविमूढ़ की भयावह स्थिति में पहुंच जाता है, जिसके  प्रत्याशित परिणाम मानव को चक्रव्यूह में धकेल देते हैं और वहाँ से लौटना असंभव हो जाता है। हमारी स्थिति रहट से बंधे उस बैल की भांति हो जाती है जो दिनरात चारों ओर चक्कर लगाने के पश्चात् लौटकर वहीं आ जाता है। उसी प्रकार हम लाख चाहने पर भी हम अतीत की स्मृतियों से बाहर नहीं निकल पाते और हमारा भविष्य अंधकारमय हो जाता है। हम सिवाय आँसू बहाने के कुछ नहीं कर पाते, क्योंकि गुज़रा समय कभी लौटकर नहीं आता। उसे भुला देना ही उपयोगी है, लाभकारी है, श्रेयस्कर है। यदि हमारा वर्तमान सुखद होगा तो भविष्य अवश्य स्वर्णिम होगा। हमें जीवन में पद-प्रतिष्ठा, मान- सम्मान आदि की प्राप्ति होगी। हम मनचाहा मुक़ाम प्राप्त कर सकेंगे और लोग हमारी सराहना करेंगे।

समय निरंतर चलता रहता है और वाणी के घाव नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। इसलिए मानव को सदा सोच-समझ कर बोलना चाहिए ताकि वह निंदा व प्रशंसा के दायरे से मुक्त रह सके। अकारण प्रशंसा उसे पथ-विचलित करती है और निंदा हमारे मानसिक संतुलन में व्यवधान डालती है। प्रशंसा में हमें फिसलना नहीं चाहिए और निंदा से पथ-विचलित नहीं होना चाहिए। जीवन में सामंजस्य बनाए रखना अत्यंत आवश्यक व कारग़र है। समन्वय जीवन में सामंजस्यता की राह दर्शाता है। इसलिए हर विषम परिस्थिति में सम रहने की सीख दी गई है कि वे सदैव सम रहने वाली नहीं हैं, क्योंकि वे तो समयानुसार परिवर्तित होती रहती हैं। ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के सा-साथ/ फूल और पात बदलते हैं’ उक्त भाव को पोषित करते हैं।

इसलिए मानव को सुख-दु:ख, हानि-लाभ, प्रशंसा-निंदा अपेक्षा-उपेक्षा को तज कर सम रहना चाहिए। अंत में ‘ज्ञान दूर, कुछ क्रिया भिन्न है/ इच्छा क्यों पूरी हो मन की/ एक-दूसरे से मिल न सके/ यह विडंबना है जीवन की।’ सो! मानव को ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही किसी कार्य को प्रारंभ करना चाहिए। तभी वह अपने मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और सपनों को साकार कर सकता है। इसलिए मानव को बीच राह आने वाली बाधाओं-आपदाओं व उस के अंजाम के बारे में सोचकर ही उस कार्य को करना चाहिए। सोच-समझ कर यथासमय कम बोलना चाहिए, क्योंकि निर्रथक व अवसरानुकूल न बोलना प्रलाप कहलाता है जो मानव को पलभर में अर्श से फर्श पर लाने का सामर्थ्य रखता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 555 ⇒ कुंटे साहब ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुंटे साहब ।)

?अभी अभी # 555 ⇒ कुंटे साहब ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यूं तो वे हमारे फैमिली डॉक्टर थे, फिर भी हम सभी उन्हें कुंटे साहब ही कहते थे। मोहल्ला क्लीनिक की धारणा हमारे यहां बहुत पुरानी है। हर मोहल्ले में आपको एक दो किराने की दुकानें, दूध की दुकान, और साइकिल की दुकान के साथ एक छोटा मोटा डॉक्टर का दवाखाना भी नजर आ ही जाता था।

आज भले ही इलाज बहुत महंगा हो गया हो, इस शहर में डॉ अकबर अली जैसे चिकित्सक केवल दो रुपए में मरीजों को देखते थे।

डॉ मुखर्जी की ख्याति तो पूरे प्रदेश में थी। पांच और दस रुपए वाले डॉक्टर बहुत महंगे डॉक्टर माने जाते थे।।  

कुंटे साहब का दवाखाना हमारे घर से एक डेढ़ किलोमीटर दूर, सुतार गली में था, लेकिन गली मोहल्लों की घनी बस्ती के बीच इतना दूरी आम तौर पर पैदल ही तय की जाती थी। पहले मेरी मां मुझे उंगली पकड़कर डॉ कुंटे के पास लाती थी, और बाद में मैं मां को उंगली पकड़कर दवाखाने लाता था।

तब हम डॉक्टरों को डिग्री से नहीं आंकते थे, उनके इलाज और स्वभाव पर ही हमारा ध्यान केंद्रित होता था। डॉक्टर कुंटे के सर पर मैने कभी बाल नहीं देखे, लेकिन उनके शांत और गंभीर चेहरे पर मूंछ जरूर थी। वे बहुत कम बोलते थे।।  

उनका एक कंपाउंडर भी था, जो लकड़ी के काउंटर के पीछे से पर्ची के अनुसार दवाइयां दिया करता था। दुबले पतले, चिड़चिड़े, स्वभाव के चश्माधारी इन सज्जन का नाम जोशी जी था। दुबले पतले लोग चिड़चिड़े और मोटे लोग हंसमुख क्यों होते हैं, यह पहेली मैं आज तक सुलझा नहीं पाया।

हर डॉक्टर गोलियों के साथ पीने की दवा भी देता था, इसलिए खाली शीशी साथ में लानी पड़ती थी। आजकल तो पीने की दवा भी बाजार से लेनी पड़ती है। गोलियों की भी पुड़िया बनाई जाती थी, आज भी कई चिकित्सक पॉलीथिन का प्रयोग कम ही करते हैं।।  

पैसे अक्सर मां ही दिया करती थी, फिर भी कुंटे साहब का इलाज इतना महंगा नहीं था। समय के साथ हम बड़े होते चले गए, और कुंटे साहब बूढ़े।

क्लीनिक के ऊपर ही उनका निवास था। उनका एक पुत्र मेरा कॉलेज का सहपाठी था। उनसे कुंटे साहब के हालचाल मिलते रहते थे।।  

एक बार मेरे मित्र के आग्रह पर उनसे मिलने उनके घर गया था। उनके घुटने जवाब दे चुके थे। सीढियां चढ़ना उतरना उनके लिए संभव नहीं था। तब तक घुटने का प्रत्यारोपण इतना आम नहीं हुआ था, केवल मालिश और व्यायाम से ही काम चल रहा था।

उनका शरीर कसरती था।

जब तक आप कसरत करते रहते हैं, शरीर काम करता रहता है। तब देसी व्यायाम ही कसरत कहलाता था। दंड बैठक लगा ली, और शरीर की मालिश कर ली। योगासन में स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजे़स होती हैं, जिससे शरीर लचीला बना रहता है। इस उम्र में कुंटे साहब को सलाह देना मुझे उचित नहीं लगा।।  

घर जाकर मां को भी कुंटे साहब का हाल बताया। मां को भी अफसोस हुआ। मां ने बताया कुंटे साहब हमारे परिवार के लिए डॉक्टर नहीं भगवान थे। एक दर्द का रिश्ता ही तो मरीज और डॉक्टर को करीब लाता है। तब इस पेशे में पैसा और लालच प्रवेश नहीं कर पाया था।

कुंटे साहब को मेरी मां की तरह कितने मरीजों की दुआ लगी होगी। आज अनायास ही मां की स्मृति के साथ कुंटे साहब का भी स्मरण हो आया। उनकी तस्वीर आज सिर्फ मेरी यादों में है, केवल शब्द चित्र ही पर्याप्त है उनके लिए तो।।  

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 554 ⇒ मरने-जीने की शर्तें ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मरने-जीने की शर्तें ।)

?अभी अभी # 554 ⇒ मरने-जीने की शर्तें ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ ही लोग ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जी पाते हैं। अधिकांश बीमारियों का तो शर्तिया इलाज हो सकता है, कुछ बीमारियाँ फिर भी लाइलाज भी रह ही जाती हैं। ज़िंदा रहने की कोई शर्त नहीं होती, समयावधि नहीं होती। चलो मान लिया, हम अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी नहीं जी सकते, तो क्या अपनी शर्तों पर हमें मरने का भी अधिकार नहीं।

हम ज़िन्दगी जीना कब शुरू करते हैं, सिर्फ हमारे अलावा कौन जानता है। जब तक इंसान ज़िन्दगी का मतलब समझे, मौत का बुलावा आ जाता है। ढंग से जीना शुरू भी नहीं किया, और ऊपर से बुलावा आ गया। मरना कौन चाहता है ! कुछ की जिजीविषा और आत्म-विश्वास उन्हें सौ साल तक जिंदा रखता है, तो कुछ कम उम्र में ही टूट जाते हैं।।

बहुत दुख होता है, किसी को असमय ज़िन्दगी को अलविदा कहते देख ! ज़िन्दगी के बाद बहुत कुछ होगा, लेकिन ज़िन्दगी नहीं। जब हमें मौत को गले ही लगाना है, तो क्यों न पहले से ही खरी-पक्की कर ली जाए। ज़िन्दगी भर तो पछताते रहे, कम से कम मौत तो अपनी शर्तों के अनुसार मिले।

क्या मौत से पहले एक चार्टर ऑफ डिमांड्स नहीं दिया जा सकता ! जिस तरह इंसान की जीने की कुछ मूल-भूत आवश्यकताएं हैं, क्या मरने के बाद नहीं हो सकती। चलो ! मान लिया, हम मर गए, लेकिन हमारा रखवाला, वह ऊपर वाला भगवान तो अभी नहीं मरा। जीते जी चलो हमारी नहीं सुनी, अब मरने के बाद तो सुनवाई कर लो।।

हमारा सिर्फ़ शरीर ही मरता है, आत्मा तो अमर है ही ! हमारी इच्छाएँ कहाँ मरती है। आज, ठंड में एक प्याला जो चाय हमें नसीब होती है, क्या मरने के बाद उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं ! मानवाधिकार जैसा, क्या मृतकों का कोई अधिकार नहीं ? ईश्वर का विधान तो भारत के संविधान से भी ज़्यादा कड़क दिखाई देता है। क्या राइट टू इनफार्मेशन (RTI) के तहत हमें ईश्वर से यह जानने का अधिकार नहीं, कि हमें कहाँ, कौन से लोक में, स्वर्ग अथवा नर्क में भेजा जा रहा है।

न्याय का सिद्धांत यह भी दलील दे सकता है कि एक मृत व्यक्ति पर इस लोक का क्षेत्राधिकार, jurisdiction, लागू नहीं होता। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि मरने के बाद हमारी कोई नहीं सुनने वाला। ( जीते जी किसने सुन ली थी ) जितनी भी खरी-पक्की करना है, शर्तें रखना है, अब ही रख सकते हैं। ताकि सनद रहे, मृत्यु पश्चात वक्त ज़रूरत काम आवे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 224 ☆ सुखद संदेश… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना सुखद संदेश। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 224 ☆ सुखद संदेश…

विनम्रता का भाव जीत का आधार बनता है। विकट समस्या भी एक समय के बाद स्वयं हल हो जाती है। जहाँ एक ओर लोग इसे सहजता से स्वीकार करते हैं तो वहीं दूसरी ओर लोग रो पीट कर, थक हार कर इसे ईश्वर की नियति मानकर अपनाते हैं। भाव कोई भी हो वक्त हर मरहम की दवा बन सबको जीने का पाठ पढ़ाता है। जिस वातावरण में हम रहते हैं वहाँ का असर पड़ना स्वाभाविक है, बुद्धिमानी तो इसमें है कि हमें अपनी संगति का सतत ध्यान रखना चाहिए, किसी कीमत पर इससे समझौता न हो। आध्यात्मिक शक्ति हमको जीवन मूल्यों के साथ अपने उद्देश्यों से भी परिचित कराती है इसलिए इसके साथ रहिए…अर्चना, वंदना, भक्ति की शक्ति को अपनी ताकत बना ब्रह्मांड से जुड़ें।

*

करें हम आराधना

नित्य सरस साधना

भेदभाव दूर होवे

प्रार्थना तो कीजिए।

*

वंदना करेंगे सभी

काज पूरे होंगे तभी

मिलजुल कर रहें

शुभाशीष लीजिए। ।

*

कोई न विश्वास दूजा

धर्म कर्म सत्य पूजा

आनन्द में डूबकर

भक्ति रस पीजिए।

*

धार के उम्मीद सारे

प्रेमभाव जो निहारे

ज्ञान भरी ज्योति जले

ये संदेश दीजिए। ।

*

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 553 ⇒ लेखन और अवचेतन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेखन और अवचेतन।)

?अभी अभी # 553 ⇒ लेखन और अवचेतन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लेखन का संबंध सृजन से है, चेतना और विचार प्रक्रिया से है। पठन पाठन, अध्ययन, चिंतन मनन, अनुभव और अनुभूति के प्रकटीकरण का माध्यम है लेखन, जिसमें वास्तविक घटनाओं एवं कल्पनाशीलता का भी समावेश होता है। एक अच्छे लेखक के लिए, एक अच्छी याददाश्त और अनुभवों का खजाना बहुत जरूरी है। अगर चित्रण रुचिकर ना हुआ, तो लेखन नीरस भी हो सकता है।

जिन लोगों का चेतन अधिक सक्रिय होता है, वे अच्छे लेखक बन जाते हैं लेकिन जिनका अवचेतन अधिक प्रबल होता है, वे केवल सपने ही देखते रह जाते हैं।।

लेखन की ही तरह एक संसार सपनों का भी होता है, जहां कथ्य भी होता है, घटनाएं भी होती है, सस्पेंस, रोमांस और मर्डर मिस्ट्री, क्या नहीं होता अवचेतन के इस संसार में ! लेकिन अफसोस, यहां कर्ता केवल दृष्टा बनकर सोया होता है, मानो किसी ने उसके हाथ पांव बांधकर पटक दिए हों। जब इस लाइव टेलीकास्ट वाले एपिसोड का अंत आने वाला होता है, तब उसे सपने के अवचेतन के चंगुल से मुक्त कर होश में ला दिया जाता है। ना कोई डायरी ना कोई वीडियो शूटिंग, सब कुछ सपना सपना।

सपना मेरा टूट गया। जागने पर चेतन मन अवचेतन की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन कामयाब नहीं होता, क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। जागृत और सुषुप्तावस्था में यही तो अंतर है। सोते समय बहुत कुछ याद रहता है, जो अवचेतन को प्रभावित करता है, लेकिन जागने के बाद अवचेतन मन इतना प्रभावित नहीं करता। सपनों के सहारे कोई लेखक नहीं बना। केवल जाग्रत प्रयास से ही कई लेखकों के सपने सच हुए हैं और वे एक अच्छा लेखक बन पाए हैं।।

लेखन साहित्य का विषय है मनोविज्ञान का नहीं, सपने और अवचेतन, मनोविज्ञान का विषय है, लेखन का नहीं। लोग कभी सपनों को गंभीरता से नहीं लेते, उनकी अधिक रुचि सपनों को सच करने में होती है, जो जाहिर है, कभी कभी सपने में भी सच हो जाती है, जब वे कहते हैं, मैने तो सपने में भी नहीं सोचा था, मैं एक सफल लेखक बन पाऊंगा।

सपनों का एक लेखक के जीवन में कितना योगदान होता है, यह तो कोई लेखक ही बता सकता है। सुना है लेखन में एक लेखक को इतना आत्म केंद्रित होना पड़ता है कि भूख प्यास और नींद सब गायब हो जाती है। मुर्गी की तरह विचार अंडा देने को बेताब होते हैं और तब तक देते रहते हैं, जब तक सुबह मुर्गा बांग नहीं दे देता। उधर सूर्योदय और इधर हमारे सूर्यवंशी जी ऐसी तानकर सोते हैं कि आप चाहो तो घोड़े बिकवा लो।

सपना तो पास ही नहीं फटक सकता उनके और गहरी नींद के बीच।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 112 – देश-परदेश – मुंह धो कर आना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 112 ☆ देश-परदेश – मुंह धो कर आना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सामान्य भाषा में मित्रों और परिचितों को हमने ये कहते हुए अनेक बार सुना है, “जाओ  मुंह धो कर आओ” जब कभी हमें ऐसा प्रतीत होता है, कि सामने वाला व्यक्ति किसी कार्य कर सकने के काबिल नहीं है, या उसमें इतनी क्षमता नहीं है, कि वो ये कार्य सम्पन्न कर सकें, उसको मज़ाक में कह दिया जाता है, जाओ पहले मुंह धो कर आओ।

हमारे चाचा जब कभी घर में कुछ खानें के लिए बात करते थे, तो पिताजी कहते थे। पहले हाथ मुंह धो लो, फिर भोजन ग्रहण करो। चाचा हाजिर जवाबी और अधिक भूख के कारण कह देते थे, “शेर कहां मुंह धोते हैं” ऐसा कहकर वो भोजन पर टूट पड़ते थे।

उपरोक्त फोटो में तो पुलिस वाले ही हाइवे पर ट्रक ड्राइवरों के मुंह धो रहे हैं, ताकि उनकी नींद खुल जाए, और सड़क दुर्घटनाओं में कमी की जा सके, नींद भगाने का पुराना फॉर्मूला है। वैसे, रात के समय भीषण ठंड के दिनों में, ये घोर जुल्म हो रहा है।

दसवीं की बोर्ड परीक्षा के समय माता जी ठंड के दिनों में प्रातः चार बजे जगा दिया करती थी। हम भी चटाई/ कुर्सी पर कंबल में बैठे बैठे सो जाते थे। पिता जी की दृष्टि जब भी हम पर पड़ती, वो शब्दों के बाण छोड़ दिया करते थे। हम भी जिद्दी और ढीठ प्रवृति के थे, पिताजी के शब्द बाण को अनसुना कर निद्रा में खो जाते थे।

बाप तो बाप ही होता है, कड़कती ठंड में खुले हौद से लौटा भर कर पानी के छींटे हमारे मुंह पर डाल कर नींद भगाने का फार्मूला, पिता जी ने भी अपने बाप से ही सीखा था। हमारी पीढ़ी ने इस प्रथा को लुप्त प्रायः सा कर दिया है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ आता केवळ… अविश्रांत नाद… – लेखिका : सौ. नीलकांती पाटेकर ☆ प्रस्तुती – डाॅ.भारती माटे ☆

डाॅ. भारती माटे

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☆ आता केवळ… अविश्रांत नाद… – लेखिका : सौ. नीलकांती पाटेकर 

सौ. नीलकांती पाटेकर

कुकरच्या शिट्ट्या…

वरणाला दिलेली लसणाची फोडणी…

परतलेल्या बटाट्याच्या भाजीचा खमंग दरवळ…

…… मल्हारच्या खोलीचा दरवाजा वाजला… म्हटलं आला हा …

… पावलं झपझप …कधी नव्हे ते हात न धूताच ताटावर …

…. झाकीर भाई गेले…

का sss य…

Heart चा problem…

तेव्हढ्यात फोन वाजला…

मल्हार… San Francisco ला होते…

 

इथं आणणार का??? त्याच्या डोळ्यातून … अवरोधलेलं पाणी…खळखळा…न दिसणारं…

माझं मन वहायला लागलं…

आणणार असतील…तर सांगशील…आणतीलही …

नक्की आणतील… अब्बाजींच्या शेजारी …मी पुटपुटले…माझ्याच मनात…

 

८० च्या दशकाची अखेर… माझं एज्युकेशनल प्रोजेक्ट…

मुंबईचे asst commissioner… ‘ एक खाजगी महफिल आहे… झाकीर आणि अब्बाजी…जुगलबंदी…

याल का???’ 

‘ नक्की !!! ‘

 

भारतीय बैठक… लॉन वर!!!. वाळकेश्र्वर… तो १ ला प्रोग्राम मी पाहिलेला… त्याचा..

जेमतेम ७-८ फूट दुरीवर…  अब्बाजींच्या डोळ्यात कौतुक… अमाप…

 

नंतरच्या कॉफीपानामध्ये… अब्बाजींचे छोटे छोटे शिष्य… मला कौतुक वाटलं…

पार्काच्या समोर…म्युनिसिपल swimming pool आहे ना…तिथं शिकवतात… अब्बाजी … 

दर रविवारी… सकाळी 9 ला…

…. खरं वाटेना… रविवारी गेले…दुरूनच बघितलं… छोटी छोटी मुलं… अर्धगोलाकार बसलेली…

आणि अब्बाजी…  मध्ये…अब्बाजींची दोन मुलं… त्यात एक झाकिर…थोडं अंतर राखून …अदबशीर बैठक…

 

केव्हातरी तेव्हा… रुपारेल ला प्रोग्राम… हाकेच्या अंतरावर … एकटीच गेले होते…शेजारीच तर आहे… असं म्हणत…

वाह उस्ताद… गाजत होतं… चण लहानखुरी … नाजूक चेहरेपट्टी… Decent पेहेराव…झब्बा.  … तुमान…

वर शाल… मनसोक्त वाजवलं…तब्येत बरी नसावी… 

अचानक ट्रॅक बदलून… वेगवेगळे इफेक्ट्स… तबल्यावर…

आश्चर्य वाटण्याऐवजी… हे काय मधेच … असं झालं…  तार तुटल्यासम… नाही जचलं…

अरे…. तुझ्या तबल्याच्या नाद काय… टणत्कार काय…

मी एकटक बघत हेच बोलतेय… मनात… पापणी लवेना… पडदा पडायला सुरुवात झाली…

उठलेच… स्टेजच्या मागे गेले…गर्दी व्हायची होती त्याच्या भवताल… तरी…त्याच्या जापनीज शिष्या… चिवचिव… तो अस्खलित जापनीज मध्ये सांगत होता…. 

 

मी लांब… विंगेपाशी… ये sss स …

“ आप…” 

मी काही पावलं पुढं… अंतर राखून … पावलं आपच थबकली…माझी …

“ कहिये…” 

… काय सांगणार…आवडलं नाही… जे इफेक्ट्स वाजवले ते…वाजवले चांगले… पण हे अपेक्षित नाही …

“ कुछ अच्छा नहीं लगा… “ … 

 

एक शब्द फुटेना…

“ जी… “  शब्द फुटला…एकच.. कसाबसा…’ Diversion  Effects ??? ‘

जी… शब्द सापडेनातच…खुर्चीपासून विंगेपर्यंत…केवढी बडबडत आले होते…मनातल्या मनात…

आणि अचानक…काय बोलणार…असं झालं…

 

आपका सोलो …कहीं और था मन…अचानक…ये इफेक्ट्स… 

You have a class…

Masses के लिये…

 …. एव्हाना तो चार सहा पावलं चालत पुढं आला होता …सहज हातावर हात ठेवत … 

“ अच्छा लगा…आपको जो जंचा नहीं…आपने साफ बताया…”

 

माझ्यातली अस्वस्थता… विरघळली…

अशी कोण मी…ना त्यानं विचारलं…ना मी सांगितलं…महत्वाचं नव्हतंच… ते…

जे होतं… ती जाण…

 

माझे हात जुळले… त्याचेही… दोन पावलं … तशीच मागे जात… मी वळणार…

“ येत रहा…” अस्खलित मराठी…

माझा हात माझ्या मनाजवळ… ओठ म्हणत होते…  अस्फुट…” येईन… की… नक्की…”

 

त्यानंतरही प्रोग्रॅम्सना गेले…पण कधी विंगेत नाही गेले… गरजच नाही पडली…

 

एक अश्रांत कलावंत…

….. आता केवळ…

    ……. अविश्रांत नाद..

लेखिका : सौ. नीलकांती पाटेकर

संग्रहिका : डॉ. भारती माटे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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