हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८४ ⇒ कविता – ईमानदारी की अकड़ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “ईमानदारी की अकड़ …“।)

?अभी अभी # १०८४ ⇒ कविता – ईमानदारी की अकड़ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ऐसा क्या हो गया

जो तुम्हारी कमर झुक गई

क्या ईमानदारी,

तुम्हारी अकड़ निकल गई ?

एक ज़माना था

ईमानदारी का रुतबा बुलंद था !

आवाज़ में जोश था

बाजुओं में ज़ोर था।

कोई बेईमान, ईमानदारी

से आँख नहीं मिला सकता था !

ईमानदारी का बोलबाला था

बेईमान का मुँह काला था।।

ईमानदारी कड़क थी, सख्त थी

बेईमान उसके आगे

थर थर काँपता था !

ईमानदारी के डर के आगे

बेईमान उल्टे पाँव भागता था।

ईमानदारी निडर थी, निर्भय थी

बेईमान डरपोक था, कायर था !

ईमानदारी सड़क पर शान से,

सीना तानकर चलती थी।

ईमानदारी की इज़्ज़त थी

बेईमान बेइज़्ज़त होता था।।

कैसी समय ने पलटी खाई

ईमानदारी ने मुँह की खाई

बेईमान की बन आई !

आज ईमानदारी की आँख में

जब बेईमान झाँकता है,

ईमानदारी शर्म से आँख

नीची कर लेती है।

ईमानदारी आज घरों में

दुबकी हुई है !”

बेईमान शान से रथ पर

हो रहा सवार।

ईमानदारी को सब रहे धिक्कार

बेईमान की हो रही जय-जयकार।।

ईमानदारी !

आखिर तुम्हें हो क्या गया है ?

क्या तुम्हारा ईमान खो गया है

या ये बेईमान कुछ कुछ

ईमानदार हो गया है !

ऐसा कुछ नहीं है भाई !°

ईमानदारी फरमाई।

ईमानदारी की परिभाषाएं

बदल गई हैं।

जैसे हो, वैसे मत दिखो !,

बेईमान से कुछ सीखो।

बाज़ार में कई मुखोटे मिलते हैं

मुख में राम, बगल में छुरी रखो।

लोग तुम्हें ईमानदार समझें

तुम बेईमानी का दामन

थामे रखो।।

बस इसी तरह ईमानदारी

पिटती चली गई

उसकी पकड़ ढीली होती

चली गई और

बेईमान अकड़ता चला गया

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६० – बुन्देली दिवस विशेष – ”तुम धोरखा धरदारी बारे” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “तुम धोरखा धरदारी बारे“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६० ☆

☆  बुन्देली कविता – “तुम धोरखा धरदारी बारे“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

तुम धोरखा धरदारी बारे 

हम यारों की यारी बारे 

* 

तुम नइ कविता, और इतै हम 

राई, करमा, गारी बारे 

 *

हम हैं बरसा की बौछारें 

तुम दंगा, चिन्गारी बारे 

 *

तुम हौ स्वर्ण भसम के आदी 

हम भूखे बीमारी बारे 

 *

हम हैं पेड़, छाँव, फल देउत 

तुम हौ बका, कुल्हारी बारे 

 *

तुमइ नामवर, मुक्तिबोध तुम 

हम रसखान, बिहारी बारे 

 *

तुम्हें चाउने दारू, गाँजा 

‘भगवत’ पान-सुपारी बारे

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३२ – बुन्देली दिवस विशेष – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुन्देली गीत – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३२ ☆

☆  बुन्देली गीत – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

धज्जी खें तो साँप बता रये,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

जी खों देखो हाँक रहो है,

ज्ञान बघारें साँचन में ।

इनखों तो भूगोल रटो है,

झूठी-मूठी बातन में ।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

धरम के पंडा सबई बने हैं,

मंदिर, मस्जिद, गिरजा में।

जी खों देखो राह बता रये,

छोटी-ओटी बातन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

बऊ-दद्दा ने पढ़वे भेजो,

बडे़-बडे़ कॉलेजन में ।

बे तो ढपली ले कें गा रये,

उल्टी-टेढ़ी रागन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

आजादी बे कैसी चाहत,

कौनऊँ उनसे पूछो भाई।

पढ़वो-लिखवो छोड़कें भैया ,

धूल झोंक रहे आँखन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

पढ़वे खें कालेज मिलो है,

रहवे खों कोठा भी दे दये।

पढ़वे में मन लगत है नईयाँ,

जोड़-तोड़ की बातन में ।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

नेता सबरे कहत फिरत हैं,

हम तो जनता के सेवक हैं।

जीत गए तो पाँच बरस तक,

घुमा देत हैं बातन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

राजनीति में झूठ-मूठ की ,

खबर छपीं अखबारन में ।

नूरा-कुश्ती रोजइ हो रही,

गली-मुहल्लै आँगन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

कोनउ नें कओ सुनरै भैया

तोरो कान है कऊआ ले गओ।

अपनों कान तो देखत नैयाँ,

दौर गये बस बातन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

धज्जी खें तो साँप बता रये,

जरा-जरा सी बातन में ।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – काला पानी… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – काला पानी… ? ?

सुख-दुख में

समरसता,

हर्ष-शोक में

आत्मीयता,

उपलब्धि में

साझा उल्लास,

विपदा में

हाथ को हाथ,

जैसी कसौटियों पर

कसते थे रिश्ते,

परम्पराओं में

बसते थे रिश्ते,

संकीर्णता के झंझावात ने

उड़ा दी सम्बंधों की धज्जियाँ,

रौंद दिये सारे मानक,

गहरे गाड़कर अपनापन

घोषित कर दिया

उस टुकड़े को बंजर..,

अब-

कुछ तेरा, कुछ मेरा,

स्वार्थ, लाभ,

गिव एंड टेक की

तुला पर तौले जाते हैं रिश्ते..,

सुनो रिश्तों के सौदागरो!

सुनो रिश्तों के ग्राहको!

मैं सिरे से ठुकराता हूँ

तुम्हारा तराजू,

नकारता हूँ

तौलने की

तुम्हारी व्यवस्था,

और स्वेच्छा से

स्वीकार करता हूँ

काला पानी

कथित बंजर भूमि पर,

तुम्हारी आँखों की रतौंध

देख नहीं पायी जिसकी

सदापुष्पी कोख…,

जब थक जाओ

अपने काइयाँपन से,

मारे-मारे फिरो

अपनी ही व्यवस्था में,

तुम्हारे लिए

सुरक्षित रहेगा एक ठौर,

बेझिझक चले आना

इस बंजर की ओर,

सुनो साथी!

कृत्रिम जी लो

चाहे जितना,

खोखलेपन की साँस

अंतत: उखड़ती है,

मृत्यु तो सच्ची ही

अच्छी लगती है..!

 

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 10:16 बजे, 10 जुलाई 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥 

आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९९ – प्रायमरी का मास्टर…४ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९९ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…४ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

आप जानते हैं

समाज के रजिस्टर में

प्राथमिक शिक्षक

सबसे निचली श्रेणी में दर्ज है?

 

किसी ने कहा था-

इसमें क्या हर्ज है,

वो तो छोटे बच्चों को पढ़ाता है

इसलिये छोटी रकम पाता है,

बेवकूफ है,

क्यों चिल्लाता है।

 

मैं नहीं जानता कि

ऐसी बेतुकी बात कौन कहता

या कि लिखता होगा,

ये बात तय है कि

ऐसा कहने वाला

स्कूल के दिनों में

खूब पिटता होगा।

खैर !

 

उस कमबख्त से क्या लेना है

मुझको या आपको

चलने दें वार्तालाप को।

 

ये सही है कि

वो ‘ग‘ गधे का पढ़ाता है।

पर ये गलत नहीं है कि

वो गधे को आदमी बनाता है,

उसे दिल्ली, भोपाल या विदेशों में,

पहुँचाता है

कभी गौर किया है कि

वो बदले में क्या पाता है।

जी,

वो लहू के घूँट पीता है।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९६ – “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

चला डूबने हो पश्चिम में

ज्यों दिनमान, पिता ।

गया उतारा बड़े मंच से

वह विद्वान, पिता ॥

 

बने रहे गम्भीर थमे जल से

तो थे लेकिन ।

लहर गरीबी की न थका

पायी थी उनका मन ।

 

हर कठिनाई में वे ढूँड

लिया करते अवसर ।

थे हरेक विपदा को सहने

का अभिमान, पिता ॥

 

यह उनका अदम्य साहस

सबको आदर्श रहा।

लोगों में उन के चरित्र

का बड़ा विमर्श रहा ।

 

उनके पदचिन्हों पर

चलने होड़ लगी रहती ।

घर के सारे सभी जनों के

थे सम्मान,  पिता ॥

 

परिचित, रिश्तेदार कभी

जब आपस में मिलते ।

अपने सम्वादों में चर्चा

उनकी ही करते ।

 

उनके सद्कर्मों की छाया

बनी हुई हम पर ।

इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के

थे प्रतिमान, पिता ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

05-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जलप्रलय… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जलप्रलय… ? ?

चम्मच, कटोरी,

प्याली, कड़छी,

हरेक, आदिग्रंथों में

वर्णित जलप्रलय

की धमकी देता रहा,

उधर अथाह समंदर,

पेट में पानी लिए,

चुपचाप मुस्कराता,

मंद-मंद बहता रहा..!

?

© संजय भारद्वाज   

3:15 बजे दोपहर, 17.10.2018

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८ ☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पवित्र बंधन…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८ ☆

☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

रक्षाबंधन

सिर्फ धागों का नहीं

दिलों का बंधन है

इस पवित्र बंधन को

शत-शत वंदन  है

इसमें छुपा है

भाई बहन का प्यार

सदियों से गवाह है

यह सारा संसार

कितने स्नेहमय लगें

यह रेशम के धागें

जिनकी कोई बहन नहीं

वे हैं कितने अभागे

इसमें छुपी है

बचपन से

यौवन तक की

साथ बिताई बातें

भूखे प्यासे रहकर

साथ काटी रातें

अभाव में भी खुश रहकर

कैसे पड़ता है जीना

एक दूजे का सहारा बनकर

हर दुख पड़ता है जीना

बहन के सुख दुख में

शामिल होता है भाई

राखी बंधवाकर

रक्षा करने की

उसने कसम है खाई

काल का चक्र भी

यह खुशियां ना लूटें

भाई बहन का रिश्ता

जन्म जन्म तक ना टूटें

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२२ – भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘भारत मां का ये प्रहरी…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२२ ☆

☆ भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

याद नहीं करते हम,

सीमा पर त्योहारों को.

अपने खून से होली खेलें,

बचा रहे परिवारों को.

*

स्त्रोत नहीं पूछा करते,

शूरों का और तारों का.

हथियार उठाते हैं जब,

ख्याल नहीं है वारों का.

*

खुद के अरमाँ, खुद के सपने,

दूर हो गए, सारे अपने.

बच्चों की किलकारी भी,

लगती जैसे हों सपने.

*

देश की पावन मिट्टी का,

माथे पर तिलक लगाता हूं.

भारत माता की पुकार पर,

हाथों पर शीश, सजाता हूं.

*

देश की सीमा को अपने,

खून से अपने सजाया है.

दुश्मन कैसे भी आया हो,

हमने उसे दूर भगाया है.

*

सर्दी हो या गर्मी की लू,

दिन हो या, रातें गहरी.

सजग सतर्क हमेशा है,

भारत मां का ये प्रहरी..

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दावे हवा हुए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – दावे हवा हुए…!

☆ ॥ कविता॥ दावे हवा हुए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

हर  तरफ  हाहाकार है,

लहरों की फुँफकार है।

*

प्रकृति तबाही पर तुली,

त्राहिमाम औ’ गुहार है।

*

मुखर जीवन मौन हुआ,

हर  जगह बिछी गार है।

*

प्रगति के दावे हवा हुए,

सरिता  हुई पारावार है।

*

ठौर  सैलाब में बह गए,

हुकूमत  हुई लाचार है।

*

बड़ी  बेरहम है कुदरत,

मदाँधता देती उतार है।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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