हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३११ ☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय मुक्तक – प्यार और ऐतवार आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३११ ☆

☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा ☆

आजकल लड़कियों पर  ऐतवार  कौन करे

बदलते  हालात  में सच्चा  प्यार  कौन करे

जिस कदर करतीं हैं विश्वास घात लडकियाँ

साथ  इनके  अब  सद  व्यबहार कौन करे

*

प्यार  में  इतने  जुनूनी  हो  गए

चाह में प्रेमी की मगनूनी हो गए

प्रेम में  अंधे  हुए वो  इस  कदर

हत्या  कर के  खुद खूनी हो गए

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३० – कविता – बारिश की बूंदे… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता बारिश की बूंदे।)

☆ शशि साहित्य # ३० ☆

? कविता – बारिश की बूंदे…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

छम छम करके बरसें बूंदे,

नाचे जैसे संग सितार…

मन नाच रहा संग में,

सुनकर राग मल्हार…

 

सर से अपने हटा के छतरी,

सुन लो मेघों की प्रेम पुकार…

भीग जाने दो तन को,

मन को हो जाने दो तर,

लंबा रास्ता तय कर आई बरखा,

तुमसे मिलने, धर बूंदों का आकार…

 

बहुत समय तक तरसे नैना,

तब जाकर हुआ दीदार…

साकार होते देख लो,

अब अपना यह इंतजार…

कुछ अपनी कहो, कुछ उनकी सुनो…

मन की बातें करो हज़ार…

 

बसा के माटी की भीनी खुशबू…

सांस महक, हो जाए खुशगवार…

छमक कर लाई, प्रीत संदेशा,

जैसे हरसू बरसे,

खुशियों का उपहार…

हटा के छतरी, गले लगा लो,

स्वीकार करो यह अमोल बौछार…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अक़्ल मारी गई है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक वक्रोक्ति युक्त रचना – अक़्ल मारी गई है…!

☆ ॥ कविता॥ अक़्ल मारी गई है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

प्यादा बादशाह के सम्मुख खड़ा है,

कहता कि वह बादशाह से बड़ा है।

*

लोग दाँतों तले उँगली दबाए हुए हैं,

प्यादे की हिम्मत, हौसला तगड़ा है।

*

प्यादे- बादशाह  के बीच दरअसल,

झूठे गुरूर,आधिपत्य का झगड़ा है।

*

प्यादे  और बादशाह की यलगार में,

कुल जहां का समीकरण बिगड़ा है।

*

लगता, दोनों की अक़्ल मारी गई है,

चूँकि बादशाह सूर, प्यादा लंगडा है।

*

प्यादा औक़ात भूलकर बादशाह के,

उद्दण्ड साँड की मानिंद पीछे पड़ा है।

 

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सिकुड़न ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सिकुड़न ? ?

किसी सिकुड़े हुए

आदमी से मिलो

तो कुछ देर

बतियाओ उससे,

वह कुछ खिल-सा जाएगा..,

बार-बार मिलना उससे,

लगातार मिलना उससे,

धूप, खाद, पानी पाकर

वह निरंतर खिलता जाएगा..,

सनद रहे-

अकेलेपन का दायरा

जब फैलता जाता है,

बेबस आदमी तब

सिकुड़ता जाता है…!

?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 9:05 बजे, 31.05.25

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कभी सोचा है ऐसा भी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – कभी सोचा है ऐसा भी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मन से रोये या आंसुओं से

भीगता तो कुछ न कुछ है

अच्छा है यह, जीवन में

कहीं न कहीं

शुष्कता को आद्रित कर

नमी को पोषित करता है

और याद रखिये

किसी अंकुरण से नव-विचार,

नवजीवन प्रस्फुटित होने को

आद्रता और नमी तो चाहिए ही

चाहे आंसुओं से रोयें

या भावुकता में, हृदय से रोयें,

फर्क नहीं पड़ता..

नतीजा अच्छा आने की चाह में , न सही

कभी तो रो लीजिये एकांत में या

सबके सामने ही सही , बेझिझक होकर

“कुछ” तो धुल जाएगा और

“कुछ” तो हल्का हो जाएगा

ज़िंदगी के दिल पर भारी,कुछ बोझ ढ़ोने से

लाख बेहतर है उनसे निजात पाना

यही सूत्र उचित लगता है अपनाना…!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०२ ☆ बाल कविता – जीवन है अनमोल… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०२ ☆ 

☆ बाल कविता – जीवन है अनमोल ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

टमटम में बैठे हम सब ही

चले शहर की ओर

पों – पों – पीं – पीं गाड़ी करतीं

अति का होता शोर।।

भालू जी की बाइक की थी

बहुत तेज रफ्तार

मोबाइल से बात कर रहे

जा टकराए कार

बाइक टूटी गिरे जोर से

      दुखी है पोर- पोर।।

 **

शेर, लोमड़ी गीदड़ उनको

अस्पताल में लाए

हाल अजब अपना था पाया

जब वे होश में आए

नहीं करूँ मनमानी अब मैं

      जीवन है अनमोल।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५१ ☆ गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय “गीतिका” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५१ ☆

☆ गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

 नदिया सूखी भरी हुई सी

धूप बिचारी मरी हुई सी ।

 *

बरखा बूँद हुई मतवाली

गर्मी अबला डरी हुई सी।

 *

खेत अघाने पानी पीकर

मेंड़ लगे कुछ हरी हुई सी।

 *

छप्पर छानी बतियाते हैं

लगे बदरिया झरी हुई सी।

 *

गंध सुवासित व्यापी तन-मन

हुलस प्रीति मरमरी हुई सी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चिरंजीव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चिरंजीव ? ?

अदल-बदल कर

समय ने किए

कई प्रयोग, पर

निष्कर्ष वही रहा,

धन, रूप, शक्ति,

जुगाड़ सब खेत हुए,

हर काल में किंतु

ज्ञान चिरंजीव रहा!

 ?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 12:08, 21.10.2018

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५८ ☆ ख़्वाहिशें बेहिश हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ख़्वाहिशें बेहिश हुई है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५८ ☆

✍ ख़्वाहिशें बेहिश हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ख़्वाब की ताबीर मेरे और पूरी आरज़ू

होश ग़ाफ़िल हो गया है जब वो आया रूबरू

 *

उम्र की दहलीज पर जब सांझ की दस्तक हुई

ख़्वाहिशें बेहिश हुई है चैन की है ज़ुस्तज़ू

 *

कब रकम अखबार में कब है मुनादी की गई

प्यार की चर्चा हमारे हो रही है कू-ब-कू

 *

गिर गया किरदार से इंसान कितना देखिए

है हवस यूँ ज़र ज़मीं की बेच देता आबरू

 *

दोस्त है गद्दार की पहचान ये सबसे बड़ी

हो वतन को जब ज़रूरत तब नहीं खौले लहू

 *

अम्न का कैसे मसीहा ज़ह्न नादिर शाह का

हर चमन पे चाहे कब्ज़ा सबका मालिक तू ही तू

 *

शेर सर्कश का किया है समझा जो जंगल का शेर

सिद्ध ईरानी किये है किस तरह है जंग-जू

 *

कामयाबी के नहीं इमकान के आसार है

दोगले के घर करोगे अम्न की गर गुफ़्तगू

 *

अय अरुण ओढ़ी तबस्सुम सच छुपा सकती नहीं

आपकी नाराज़गी आँखें दिखाती सुर्खरू

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६२ – मकीं तो मुंतज़िर हैं… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम रचना – मकीं तो मुंतज़िर हैं।)

☆ हेमंत साहित्य # ६२ ☆

✍ मकीं तो मुंतज़िर हैं… ☆ श्री हेमंत तारे  

हमें मालूम ही न था, कि बेज़ार हैं लोग

ग़लत समझे थे हम, कि ग़मगुसार हैं लोग

हमें इल्म ही न था ‘बेगाना-ए-अलम’ रहकर

कि लोमड़ी की ख़ाल में, रंगे सियार हैं लोग

*

मकीं तो मुंतज़िर हैं, कि कोई घर को मेरे आए

सुना है इन दिनों मगर, खुद-हिसार हैं लोग

*

ज़रूरत के वक्त जब, इमदाद न मिल सकी

तब जाना कि दिखावे के लिए दिलदार हैं लोग

*

पैकर की चमक तो, महज़ भुलावा है मेरे यार

अपनों से ही कटकर, बड़े लाचार हैं लोग

*

शिकवों के बोझ तले, दबे रहते हैं इस कदर

कि रिश्तों की हरारत से, बेख़बर हो जाते हैं लोग

*

‘हेमंत’ इस दौर में, कोई अपना नहीं दिखता

अब आसां रहा न कहना, कि वफ़ादार हैं लोग

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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