हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “क्रेता…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆

✍ कविता ☆ क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हम सब बिके हुए हैं

किसके हाथों, पता नहीं

शायद,

विचारवानों के, विद्वानों के

सभ्यताओं के, शासनों के

सत्ताओं या सत्ताधीशों के।

 

या कि

अपने अहम् के, मद मोह के

समाज के, संसार के

द्वेष के, आग्रहों के

दुराग्रहों के,

पता नहीं।

 

बस यही पता करना है

हम किसके हाथों बिके हैं

यह पता चल जाए

तो मुक्त हो सकते हैं।

क्रेता से, छुटकारा

पा सकते हैं।

लेकिन, बहुत सजग रहने की

ज़रुरत है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९५ – काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९४ ☆

☆ –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 

और हम

योजनाओं की के पीछे

भाग रहे हैं.

उपकारित कामों से

नींद की गोलियाँ रखी हैं

वे सोने का अभिनय कर रहे हैं।

मगर जान रहे हैं।

कैसी विडम्बना है-

सर्वोदय का दावा करने वाले

समस्याओं की भाषा कह रहे हैं।

सत्ताधारियों का सत्तामोह

आकांक्षियों का द्रोह

और विरोधियों का व्यामोह

देखने वाली नई पीढी

यदि हो रही है सौरभहीन

तो उसका क्या दोष है ?

उसका जो आक्रोश है

वह चाहे ठीक न हो

लेकिन गलत नहीं है.

कौन ऐसा माई का लाल है

जो स्वार्थी से आहत नहीं है।

तो आओ

हम अहिंसा को नई परिभाषा दें.

देश के पथराये मन प्राणों को

समाजवाद की आशा दो

हमें जन्मेजयी यज्ञ में

विषधरों का

हवन करना ही पड़ेगा.

समाजवाद के विध्वंसकों का

सरेआम हमें

दहन करना ही पड़ेगा।

यदि ऐसा नहीं किया

तो फिर क्या उपाय है?

 

सिरफिरे नेताओं

और

पचहत्तर घरानों की खातिर

करोड़ों लोगों को अभावों की भट्टी में

झोंकना कहाँ का न्याय है?

☆

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९२ – “अनंत खुशियों की राशी…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “अनंत खुशियों की राशी...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अनंत खुशियों की राशी...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

रिश्तों की अनुपम नक्काशी

जैसी रही बुआ ॥

जीते हुये किसी प्रत्याशी

जैसी रही बुआ ॥

 

बहुत रहीं खुद्दार कभी

उनने कुछ न चाहा ।

किसी घाव के लिये

रही वे, दवा लगा फाहा ।

 

जो भी सच होता उसको

मुँह पर ही कह देना ।

किन्तु दुआ की मथुरा काशी

जैसी रही बुआ ॥

 

घरकेसभी सदस्यों की

वह अधिक चहेती थीं ।

सदा किसी भी काम काज

को हाँ कह देती थीं।

 

अगर दिखें नाराज तनिक में

खुश हो जाती थीं।

आशुतोष थीं जो अविनाशी

जैसी रहीं बुआ ॥

 

जब भी चाहो उन्हें बुलालो

झट से आ जाती।

आते ही घर के कामों में

झट पट जुट जाती ।

 

हर शंका का समाधान थी

इस घर की जो भी ।

व अनंत खुशियों की राशी

जैसी रही बुआ ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जीवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जीवन ? ?

जुग-जुग जीते सपने,

थोड़े से पल अपने,

सूक्ष्म और स्थूल का

दुर्लभ संतुलन है,

नश्वर और ईश्वर का

चिरंतन मिलन है,

जीवन, आशंकाओं के पहरे में

संभावनाओं का सम्मेलन है… !

 ?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 8.11 बजे , 30.3.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जड़ों से उखड़ रहे हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – जड़ों से उखड़ रहे हैं…!

☆ ॥ कविता॥ जड़ों से उखड़ रहे हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

संवेदना के स्नेह- निर्झर सूख रहे हैं,

हरे-भरे बरगद बारिश में सूख रहे हैं।

 *

सोने के थाल में छप्पन भोग सजे हैं,

लेकिन शरीर ह्रष्ट-पुष्ट सूख रहे हैं।

 *

सदियों से जो उपेक्षा के शिकार रहे,

अब जाकर उनके नसीब जग रहे हैं।

 *

आजतक  जिन्होने ख़ुशी देखी नहीं,

उनके  द्वारे ढोल- नगाड़े बज रहे हैं।

 *

अभिमान में जो सर रस्सी-से तने हैं,

जनता जनार्दन के आगे झुक रहे हैं।

 *

सियासत खिलाफत की बायस हुई,

सियासी  अपनी  मर्यादा भूल रहे हैं।

 *

भौतिकता की ऐसी बयार बही कि,

दरख्त  अपनी जड़ों से उखड़ रहे हैं।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४ ☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “शायद तूफान आने वाला है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४  ☆

☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

आसमान में बादल गरज रहे हैं

धुआंधार बरस रहे हैं

बिजलियाँ कड़क रहीं हैं 

हवाएं बेफाम बह रही हैं

बहते बहते कह रही हैं

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

गगन में यह कैसी जंग है

धरती पर हम सब दंग है

तबाही आ रही संग संग है

टूटती हर मन की उमंग है

टूटते टूटते कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

चारों दिशाओं में शोर है

नदी नालों में भी जोर है

बारिश भी घनघोर है

समंदर की नजरों में

यह तूफान कमजोर है

हर लहर कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

यह पानी का बहाव

 संकेत है बर्बादी का

यह बूंद बूंद का एक होना

संकेत है आजादी का

बादल का फटना

संकेत है जल समाधि का

सब कुछ डूब गया

तो क्या होगा अपराधी का

प्रकृति हम सबसे कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ – मुसाफ़िर – ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – मुसाफ़िर ☆

☆

मैं मुसाफ़िर तू मुसाफ़िर, रास्ते अनजान हैं

आदमी हूँ आदमी की, बस यही पहचान है

* 

आदमी बनकर रहा जो, जिंदगी में खुश रहा

सारे मज़हब के दिवाने, मिट्टी के मेहमान हैं

 *

क्यों बखेडा कर रहे हो, घर के अंदर में यहाँ

भारती है माँ हमारी, उस की हम संतान हैं

 *

माँ के टुकडे करने वाले, देश के गद्दार तुम

आरती का बन चुके हम, बस तेरे सामान है

 *

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब सिपाही हैं यहाँ

देश पे कुर्बान हो तुम, तुम पे हम कुर्बान हैं

 *

उन शहिदों को पुछो, देश पर जो मिट गये

धर्म से बढकर तिरंगा, इस वतन की शान है

 *

आवो मेहनत को बनाएं, एक इज्जत का निशाँ

मुफ्त की रोटी पे पलते, कुछ यहाँ नादान हैं

☆

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११८ – बाबुल के बुलावे पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बाबुल के बुलावे पर…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ११८ ☆

☆ बाबुल के बुलावे पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

तेरी इस दुनिया में, पल का ठिकाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

दिया जले बाती से, तेल का समाना है,

तेल खत्म होते ही, दिया बुझ जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

अंगना में चिड़िया है, जब तक दाना है।

*

दाना खत्म होते ही, चिड़िया उड़ जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

रंगमंच दुनिया है, कला का जमाना है,

रोल खत्म होते ही, पर्दा गिर जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

राज की ये बात कह दूं, राज ये बताना है।

*

अच्छे काम करो जग में, नाम रह जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “सच तो यही है” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – सच तो यही है… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

कह दो इन माटी के पुतलों से

जब इनमें जान ही नहीं 

तो जज़बात कैसे हों

फितरत ही न थी कभी

तो फिर मुलाकात कैसे हो

ये तो जी कर भी निर्जीव रहे

वो कोई और थे जो

गुज़र कर भी सजीव रहे

बहती थी जो सरल सलिल सरिता

अब उसमें न जल न हरियाली है

संबंधों की सुखद कल्पना, रह गयी ख़ाली है

ये दुनिया चलती थी जो कभी

कच्चे धागों के रिश्तों पर

आज स्वार्थ के गठीले बंधनों में भी

सिर्फ़ मिथ्या का जाल है

और तो कुछ भी नहीं..,

बस रह गया ये मलाल है…!!!!!☆

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८७– नवगीत – असमय मँझधार ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – नवगीत – असमय मँझधार।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८७ ☆

☆ नवगीत – असमय मँझधार ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

.

आतंकी आदमी

रेतता गला।

कुतर-काट वृक्ष कहे

शाख का भला।

बरगद की बोनसाई

समय कहे बो न साई

था विराट

वामन अब

हुआ है दईमार।

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

.

छाया से भीत है

आप मनचला।

औरों को देख-देख

दुखी मनजला।

अपनी चुपड़ी न खाए

गैर की रूखी लुभाए

अंधभक्त

चारण वर

सच रहा बिसार।

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

.

नहा रहा पातकी

खून की नदी।

अभिशापित कलप रही

सिसकती सदी।

भाई का सगा न भाई

वृथा प्रेम की दुहाई

खड़ी खाट

अमानव हो

खुद से शर्मशार।

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१०.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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