हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५५ – बुन्देली कविता – ”तुम काऊ की खोट न देखौ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे गुस्सा सें हेरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५५ ☆

☆  बुन्देली कविता – तुम काऊ की खोट न देखौ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तुम काऊ की खोट न देखौ

तनक छिले हैं, चोट न देखौ

*

कैसे कौन बटोर रओ है ये चुनाव में वोट न देखौ

रातों-रात बाँट दय ऊ ने दारू, उन्हा, नोट न देखौ

*

दंगल में ललकार रओ है ऊ कौ लाल लँगोट न देखौ

साँठ-गाँठ कर लइ बैरी सें बिठा लई है गोट न देखौ

*

श्रम के चना-चबैना नोंने अब काजू अखरोट न देखौ

भगवतसुख सें खाव मलीदा कैसें बन रव रोट न देखौ

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२९) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२९)  ? ?

चुप्पी के रंग

गिनते-गिनते

सोया था,

चुप्पी के रंग

गिनते-गिनते

उठा हूँ,

पलकों में

मुंदी हैं

सागर की लहरें

सूरज की किरणें,

देखता हूँ

मन की तरंगें

सृष्टि के रंग-बिरंगे,

कोई याद दिलाए

मैं गिनती

भूल गया हूँ मित्रो!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 11:37 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२७ – हर मानव को खुद तपना है ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर मानव को खुद तपना है। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२७ ☆

☆ हर मानव को खुद तपना है…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

हर मानव को खुद तपना है।

सद्कर्मों को करना है।।

*

पंछी सभी सिखाते हमको।

पर फैला कर उड़ना है।।

*

साथ निभाती प्रकृति हमेशा ।

फल-फूलों सा खिलना है।।

*

वृक्ष हमें छाया-फल देते।

पर-उपकारी गहना है।।

*

सही धर्म सिखलाता हमको।

नहीं किसी से कुढ़ना है।।

*

ज्ञानीजन से शिक्षा पाकर।

अमृत कलश को चखना है।।

*

संतों का सानिध्य मिले तो।

बैर-भाव को तजना है।।

*

भ्रष्टाचार बढ़ा है यारो।

नाग-कालिया नथना है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभी अभी # १०४० ⇒ चुप्पी और मौन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुप्पी और मौन ।)

?अभी अभी # १०४० ⇒ कविता – चुप्पी और मौन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चुप्पी और मौन में

वही अंतर होता है

जो अपराध बोध

और

आत्म बोध में होता है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९२ – पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९२ ☆

☆ –  पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१  ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

पद्मा का क्रंदन

दस्तकें दे रहा है,

हिमालय के कानों पर,

और बाँधकर वज्र

प्राणों पर

हिमालय विन्ध्याचलहो रहा है।

हम नहीं करेंगे

अगस्त्य की प्रतीक्षा,

नहीं फलने देंगे कोई छल,

हिमालय हिमालय ही रहेगा

नहीं होने देंगे उसे विन्ध्याचल

बात पर्वतों की कर रहा हूँ

मगर, पर्वत आदमी नहीं होता,

हाँ, आदमी चाहे तो

पर्वत बन सकता है,

मुसीबत के मानसूनों के आगे

उसका सीना तन सकता है।

तो आओ,

हम पहाड़ों का पहाड़ा पढ़ें,

इंसानियत की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ें,

और देखें कि कहाँ क्या हो रहा है।

हाय !

दिलों पर लकीरें खींचकर

सौंपा जा रहा है

प्रतिबंधित रिवेश,

कैसी विडम्बना है-

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८९ – “अब लौटे रुदित पिता…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत अब लौटे रुदित पिता ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८९ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अब लौटे रुदित पिता...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

डूबे हैं आकंठ कर्ज में

फिर भी मुदित पिता ।

कर्जे को बनिये की चौखट

बैठे क्षुधित पिता ॥

 

शिक्षण – शुल्क पुत्र का

लगता, टिड्डी का हमला –

खड़ी फसल पर, या उनसे

अब रूठ रही कमला ।

 

जगहजगह जो चमका

करते थे जग-आँगन में –

बुझे बुझे आ लगे शाम को

रवि से उदित पिता ॥

 

बिखरा बिखरा लगा आज

फिर घरका चौमासा ।

आँखों का पानी रिस रिस

कर बना एक भासा ।

 

चेहरे पर करुणा का क्रन्दन

पसर गया उनके –

ऐसा ही होगा ‘, घटनाक्रम –

से थे विदित पिता ॥

 

उन्हें सुबह से वही कबायद

करनी ही होगी ।

जब कि रहे थे वह अतीत में

बस रमता जोगी ।

 

यह अनुबंध पारिवारिक वह

ढोते आये थे –

जो विचार से थे बलिष्ठ

अब लौटे रुदित पिता ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

02-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२८) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२८)  ? ?

चुप्पी के रंग

गिनते-गिनते

सोया था,

चुप्पी के रंग

गिनते-गिनते

उठा हूँ,

पलकों में

मुंदी हैं

सागर की लहरें

सूरज की किरणें,

देखता हूँ

मन की तरंगें

सृष्टि के रंग-बिरंगे,

कोई याद दिलाए

मैं गिनती

भूल गया हूँ मित्रो!

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© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 11:37 बजे)

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३९ ⇒ सुख दुःख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुख दुःख।)

?अभी अभी # १०३९ ⇒ कविता –  सुख दुःख  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिंदगी को निचोड़ा

और सुखा दिया

दुख लिया,सुख दिया

फिर दुख में से भी

सुख सोख लिया

कुछ इस तरह हमने

जीना सीख लिया ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७१ ☆ # “तुम आ रही हो…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता तुम आ रही हो…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७१ ☆

☆ # “तुम आ रही हो…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

यह मेंघों का गरजना

धरती का तरसना

पानी का बरसना

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

यह ठंडी ठंडी हवाएं

भीगी हुई फिजाएं

मौसम मदहोश बनाए

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

यह खिलती हुई कलियां

वर्ष में डूबी हुई गलियां

बूंदों में छुपा हुआ छलिया

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

अमराई में कोयल की कूक

जवां दिलों में उठती हुई हूक

याद दिलाती प्रियतम की चूक

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

वर्षा की रिमझिम फुहारें

जुल्फों में चमकते हुए तारे

भीगे हुए वस्त्र सारे

देखकर

ऐसा लगता है

कि तुम आ रही हो

 

यह वर्षा की लंबी झड़ी

बूंदों की रंगीन लड़ी

बीतती हुई मदहोश घड़ी

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

अब तो तुम आ भी जाओ

प्यासे दिल को और ना सताओ

रूत बेईमान है देर ना लगाओ

चिड़ियों की चहचहाहट

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

अपना किया हुआ वादा

निभा रही हो /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११४ – कुहू कुहू,कुहू कुहू गाए कोयलिया… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कुहू कुहू,कुहू कुहू गाए कोयलिया।)

☆ अभिव्यक्ति # ११४ ☆

☆ कुहू कुहू,कुहू कुहू गाए कोयलिया☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

छम छम छम छम बरसे बदरिया,

कुहू कुहू कुहू कुहू गाए कोयलिया,

 

मेघ मल्हार में बदरा बरसे,

बारिश में मन प्यासा तरसे,

क्या देखे है,मन की नजरिया,

कुहू कुहू कुहू कुहू गाए कोयलिया,

 

साँसों की ये लय कैसी है,

सागर की लहरों जैसी है,

झूम के बरसे प्यासी बदरिया,

कुहू कुहू कुहू कुहू गाए कोयलिया,

 

घुमड़ घुमड़ कर बदरा आए,

बिरहन के मन को तरसाए,

तड़प तड़प बेचैन बावरिया,

कुहू कुहू कुहू कुहू गाए कोयलिया.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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