श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६५ ☆
व्यंग्य – गर्व करने से न चूकें
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
भारत में हम गर्व करने के मौके तलाशते रहते हैं। कोई कहीं अमेरिका में जन्मा हो या पला-बढ़ा हो, बस उसके नाम के आगे “अरविंद” या “श्रीनिवास” लगा हो तो हम तुरन्त झंडा लहराने लगते हैं, ये तो अपना है!”
Perplexity नाम की कंपनी ने Comet नाम का ब्राउज़र बनाया है। मुख्यालय? सैन फ्रांसिस्को। निवेशक? एनवीडिया, अमेरिकी वेंचर फंड। डेवलपमेंट टीम? आधी अमेरिका में, बाकी दुनिया भर में। लेकिन इसके CEO अरविंद श्रीनिवास तमिलनाडु में पैदा हुए थे, IIT मद्रास पढ़े थे, बस इतना सुनते ही भारत में कुछ अखबार और टेक यूट्यूबर टूट पड़े हैं “भारतीय ब्राउज़र आ गया!”
अगले दिन मोहल्ले के शर्मा जी अपने पड़ोसी से बोले “अब गूगल गया काम से, हमारा अपना ब्राउज़र आ गया है।” जैसे शर्मा जी कल से गूगल छोड़कर कॉमेट पर राशिफल और दाल की रेसिपी खोजने लगेंगे।
ये वैसा ही है जैसे कोई NRI न्यूयॉर्क में रेस्टोरेंट खोले और हम कहें “देखो, यह तो पूरी तरह भारतीय ढाबा है।” अरे भाई, बिरयानी भले आपकी हो, लेकिन दुकान का किराया डॉलर में है।
असलियत यह है कि Comet एक अमेरिकी प्रोडक्ट है जिसमें भारतीय दिमाग का योगदान जरूर है, लेकिन इसे भारतीय ब्राउज़र कहना उतना ही तर्कसंगत है जितना कि क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने पर पड़ोसी मोहल्ले के अंकल अपने आपको टीम का 12वां खिलाड़ी मान ले।
मीडिया को भी मज़ा आता है, क्योंकि “अमेरिकी कंपनी का नया ब्राउज़र” जितना फीका है, उतना ही “भारतीय का बनाया ब्राउज़र” में मसाला, नमक मिर्च है। हम भी गर्व से भर जाते हैं, भले ही वह गर्व किसी और की अलमारी का सूट पहनकर आया हो।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




