हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 256 ☆ व्यंग्य – भाग्यवादी होने के फायदे ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम और विचारणीय  व्यंग्य – ‘भाग्यवादी होने के फायदे‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 256 ☆

☆ व्यंग्य ☆ भाग्यवादी होने के फायदे 

हमारे देश के ज़्यादातर लोग भाग्यवादी हैं— भाग्य, किस्मत, नसीब, नियति, मुकद्दर, फ़ेट या डेस्टिनी पर भरोसा करने वाले। सभी धर्म के सन्तों ने भी यही कहा है कि इंसान के जीवन में सब कुछ पूर्व-नियत है, प्री-डेस्टाइन्ड। इंसान के हाथ में कुछ भी नहीं है, सब कुछ पहले से लिख दिया गया है। ‘को करि तरक बढ़ावै साखा, हुइहै वहि जो  राम रचि राखा’, ‘विधि का लिखा को मेटनहारा’, ‘विधना ने जो लिख दिया छठी  रैन के अंक, राई घटै ना  तिल बढ़ै रहु रे जीव निश्शंक’, ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गये सब  के दाता राम’, ‘राम भरोसे जो रहें, परबत पै हरियांयं’, ‘जिसने चोंच दी है, वही चुग्गा देगा’, ‘देख  परायी चूपड़ी मत ललचावै जीव, रूखा सूखा खायके ठंडा पानी पीव’, ‘जो आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान।’

दरअसल भाग्यवादी होने के कई फायदे होते हैं। भाग्यवादी दुनिया में चल रहे बखेड़ों से परेशान नहीं होता क्योंकि उसके अनुसार सब कुछ वही हो रहा है जो पहले से लिख दिया गया है। उसे ब्लड-प्रेशर की बीमारी नहीं होती, दुनिया की हलचलों के बीच वह चैन की नींद सोता है। बड़ी से बड़ी घटना के बीच वह शान्त, स्थितप्रज्ञ बना रहता है। उसे न यूक्रेन की चिन्ता सताती है, न गज़ा की। जो मरे वे इतनी ही उम्र लेकर आये थे, जो बच गये उन्हें अभी और जीने का वरदान मिला है। रेल दुर्घटना में मरने वालों के हिस्से में भी इतनी ही उम्र आयी थी।

हमारे समाज में भाग्यवादिता बहुत उपयोगी रही है। जीवन में असफल होने पर असफलता को भाग्य के खाते में डालकर चैन से बैठा जा सकता है। कुछ समय पहले तक लड़कियों का भाग्य माता-पिता के हाथ में रहता था। पढ़ाया तो पढ़ाया, अन्यथा पराये धन पर कौन पैसा बरबाद करे? बड़े होने पर लड़की को, बिना उसकी सहमति लिये, किसी भी एंगे-भेंगे, जुआड़ी, शराबी लड़के से ब्याह दिया जाता था और लड़की इसे अपना भाग्य मानकर गऊ की तरह पतिगृह चली जाती थी। मतलब  यह कि भाग्य के हस्तक्षेप से गृहक्लेश की संभावना कम हो जाती थी।

हमारे देश में जाति-प्रथा है जिसमें आदमी जन्म लेते ही ‘ऑटोमेटिकली’ ऊंचा या नीचा हो जाता है। जो नीचे जन्म लेते हैं उनका सारा जीवन संघर्ष करते और अपमान झेलते ही बीतता है।

समाज में उनका कोई सम्मानजनक स्थान नहीं बनता। परसाई जी  ने अपनी रचना ‘जिसकी छोड़ भागी’ में लिखा, ‘सदियों से यह समाज लिखी पर चल रहा है। लिखा कर लाये हैं तो पीढ़ियां मैला ढो रही हैं और लिखा कर लाये हैं तो पीढ़ियां ऐशो आराम भोग रही हैं। लिखी को मिटाने की कभी कोशिश ही नहीं हुई।’ ऐसे में अपने जीवन को अपना भाग्य मानकर ही ढाढ़स मिल सकता है।

रियासतों के ज़माने में रियाया की स्थिति दयनीय होती थी। राजा साहब के तो दर्शन ही दुर्लभ होते थे, रियाया के लिए उनके दर्शन की इच्छा करना गुस्ताखी से काम नहीं होती थी। उनके मुसाहिब ही मनमाना शासन चलाते थे। रियाया पर हर तरह  के ज़ुल्म होते थे, सुनवाई कहीं नहीं। ऐसे में रियाया के लिए सब कुछ भाग्य के खाते में डाल देना ही एकमात्र उपाय बचता था। भाग्यवादिता ही दुर्दशा के बीच कुछ संबल देती थी।

राजाओं को निष्कंटक शासन करने योग्य बनाने के लिए पुनर्जन्म का सिद्धान्त आया जिसमें पुरोहितों और चर्च का सहयोग मिला। रियाया को बताया गया कि उनकी दुर्दशा उनके पूर्व जन्म के कर्मों के कारण है और उनका अगला जन्म तभी सुधरेगा जब वे अच्छे, आज्ञाकारी नागरिक बने रहें। इस स्थिति  ने रियाया को और भाग्यवादी बनाया।

मज़े की बात यह है कि भाग्य पर भरोसे के बाद भी आदमी अनिष्ट और ‘होनी’ को टालने के लिए दौड़ता रहता है। बाबाओं, ओझाओं, गुनियों, तांत्रिकों, ज्योतिषियों, वास्तु-शास्त्रियों के यहां भीड़ लगती है। भविष्य को जानने के लिए ताश के पत्तों, अंकों, मुखाकृति अध्ययन, कप या गिलास में छोड़ी हुई कॉफी-चाय या शराब की जांच-पड़ताल जैसे अनेक टोटकों को अपनाया जाता है। बहुत से लोग उंगलियों में नाना रत्नों से जड़ी अंगूठियां पहनते हैं। कुछ लोग बायें हाथ की उंगलियों में भी अंगूठियां पहनते हैं जिसे देखकर मुझे सिहरन होती है। शायद वे उन्हें टॉयलेट जाते समय उतार देते होंगे। कहने का मतलब यह है कि आदमी को भाग्य पर यकीन तो है, लेकिन वह दुर्भाग्य को टालने में दिन-रात लगा रहता है।

सत्य यह है कि दुनिया भाग्य के नहीं, श्रम और प्रयास के भरोसे चलती है। दुनिया के सारे अविष्कार प्रयास और मेहनत से हुए हैं। भाग्यवादिता शान्ति तो दे सकती है, लेकिन जीवन के कांटे दूर नहीं कर सकती। दशरथ  मांझी भाग्य के भरोसे बैठे रहते तो पत्नी के लिए पहाड़ काटकर रास्ता न बनाते। बकौल परसाई जी, ‘भाग्य कुछ नहीं है। यह झूठा विश्वास है। सार्थक श्रम पर विश्वास किया जा सकता है।’

अमेरिका के 16 वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने मार्के की बात लिखी है— ‘भविष्य को इंगित करने का सबसे अच्छा तरीका उसका निर्माण करना है।’ अर्थात, हमारा प्रयास भविष्य को खोजने के बजाय उसे निर्मित करने में होना चाहिए।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 460 ⇒ धर्मपत्नी पर व्यंग्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धर्मपत्नी पर व्यंग्य।)

?अभी अभी # 460 ⇒ धर्मपत्नी पर व्यंग्य? श्री प्रदीप शर्मा ?

वैधानिक चेतावनी – पति पत्नी के बीच हँसी मजाक और नोक झोंक आम है, लेकिन पत्नी की हँसी अथवा उसका मजाक उड़ाना गलत है। अपनी धर्मपत्नी पर व्यंग्य लिखने के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

हंसना सेहत के लिए अच्छा है। कोई एक हास्य कवि पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा हैं, जो खुद गंभीर होकर अपनी ही घराड़ी, यानी घर वाली की हंसी उड़ाते हैं, और श्रोताओं से दाद बटोरते हैं। काका हाथरसी ने भी अधिकतर हास्य के कारतूस काकी पर ही छोड़े हैं। इन दोनों की पत्नियों को आपने कार्टून के रूप में ही देखा होगा, कभी पत्नी के रूप में नहीं। हम इसे हास्य बोध नहीं मानते। हां, कभी एक डा.सरोजनी प्रीतम हुआ करती थी, जिनकी हंसिकाएं भी अधिकतर महिलाओं पर ही केंद्रित होती थी और पुरुषों पर कम।

व्यंग्य एक गंभीर विधा है और इसका उपयोग पति पत्नी के नाजुक संबंधों पर नहीं किया जा सकता। विसंगति पर तो व्यंग्य लिखा जा सकता है, लेकिन जो धर्मपत्नी अथवा जीवन संगिनी है, उस पर व्यंग्य लिखना, ना केवल टेढ़ी खीर है, अपितु बड़ी हिम्मत का काम है।।

जिस तरह डायन भी एक घर छोड़ देती है, हर व्यंग्यकार अपनी धर्मपत्नी को छोड़ आन गांव पर व्यंग्य लिख सकता है। उसकी व्यंग्य दृष्टि राजनीति, धर्म, भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही और समाज और विश्व में होने वाली सभी घटनाओं पर पड़ सकती है, लेकिन उसकी पास की दृष्टि जवाब दे जाती है, जब उसकी धर्मपत्नी पास होती है।

और तो और कुछ ऐसे व्यंग्यकार जिन्होंने गृहस्थी का स्वाद ही नहीं चखा, वे भी इस मामले में फूंक फूंक कर कदम रखते हैं।

उनकी तर्क की खान और उनके व्यंग्य बाणों में इतनी ताकत कहां, जो अपनी कलम की धार किसी के घरेलू मामले की ओर भी कर दे।।

अव्वल तो पति की मात्रा ही छोटी होती है, और पत्नी की बड़ी। वजन में भी अक्सर पत्नियां, पति की तुलना में भारी ही होती है।

पति अगर हॉफ तो पत्नी बैटर हॉफ। वैसे आम तौर पर तो हास्य कवि ही मोटे देखे गए हैं, व्यंग्यकार तो बस, किसी तरह ठीकठाक ही होते हैं। अगर कहीं गलती से पत्नी दुबली और वे मोटे निकल गए, तो व्यंग्य की सुई भी पति की ओर ही घूम जाती है।

वैसे हम अगर शब्द बाण और व्यंग्य बाणों की चर्चा करें, तो पत्नी के शब्द अचूक रामबाण होते हैं, जिसके आगे कोई भी धुरंधर धनुर्धर, व्यंग्यकार, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में अपने शस्त्र त्याग शरणागत हो जाता है। पत्नी द्वारा निष्काम व्यंग्य की गीता का श्रवण पाठ सुनने के बाद ही, पति कलम उठाता है। धर्मपत्नी पर केवल प्रेम वर्षा ही संभव है, व्यंग्य बाण के लिए पूरा जगत पड़ा है।।

धर्मपत्नी पर व्यंग्य लिखना अंगारों पर फूंक फूंक कर कदम रखने से भी अधिक जोखम भरा काम है। जब घर में चूल्हा नहीं जलता तब धर्मपत्नी अपने व्यंग्यकार पति की छपी रचनाएं जला जलाकर चाय गर्म करती है। बड़ी अलबेली होती है, व्यंग्यकार के घर की सरकार। यह एक ऐसी सरकार होती है, जो सिर्फ तारीफ और प्रशंसा के बल पर ही चलती है। यहां व्यंग्य सिर्फ चूल्हा जलाने के ही काम आता है।

कभी कभी गंगा उल्टी भी बहने लगती है, जब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है, और घर की पत्नी ही व्यंग्य में डूबी कलम उठा लेती है। तब पतिदेव को घर गृहस्थी के सभी काम दफ्तर के काम की तरह ही करने पड़ते हैं। क्योंकि सैंया कोतवाल नहीं, यहां सजनी व्यंग्यकार जो हो जाती है। पत्नी तो रूठकर मायके जा सकती है, पति तो बेचारा सिर्फ दफ्तर ही जा सकता है।।

व्यंग्यकार की कलम और धर्मपत्नी की जुबां के बीच जब भी युद्ध हुआ है, कलम हमेशा नतमस्तक हुई है। वास्तव में कुछ ना कहने की छटपटाहट ही तो व्यंग्य को जन्म देती है। कालिदास हो अथवा तुलसीदास, सबकी महानता के पीछे उनकी पत्नी का ही तो हाथ है।

आदमी संत, सन्यासी अथवा एक अच्छा व्यंग्यकार यूं ही नहीं बन जाता। जब हर सफल व्यक्ति के पीछे एक महिला का हाथ होता है, तो क्या एक व्यंग्यकार की सफलता का श्रेय उसकी पत्नी नहीं ले सकती। पत्नी की जली कटी सुनने के बाद जो व्यंग्य में पैनापन आता है, वह देखते ही बनता है। धर्मपत्नी की तारीफ से बड़ा कोई व्यंग्य नहीं। जो व्यंग्यकार अपनी बीवी से करे प्यार, वह उसकी तारीफ से कब करे इंकार।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ तोहफा दो तो ऐसा दो… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ तोहफा दो तो ऐसा दो… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

तोहफा दो तो ऐसा दो

… कि दिल गार्डन गार्डन हो जाये।किसी भी “पालतू तोते” से पूछेंगे तो यही जवाब मिलेगा।अगर पूछें कि किताब का तोहफा कैसा रहेगा, तो वह “हरी मिर्च” खाने लगेगा।किताबें पढ़ने के लिये होती हैं कहेंगे तो वह तोतापंती पर उतर आयेगा–नादां!किताबें देखने के लिये होती हैं जैसे अखबार।

सब कुछ उल्टा पुल्टा होते देखकर तोते ने बरबस “जसपाल भट्टी” की याद दिला दी।

साहित्यकार होने के नाते साहित्य जगत में किताबों के ओहदे की छानबीन जरूरी है। “सौजन्य प्रतियों” का हश्र किसी से छिपा नहीं है। पाने वाला भुरभुरी नज़र से छूकर शेल्फ में अनंतकाल के लिये “नज़रबंद” कर देता है। न वो “प्रेयसी “होती है न “पत्नी”। या फिर भड़कीली पैकिंग के साथ अगले की ओर सरका दी जाती है। वह भी यही करता है। महाजनो येन गतः स पंथाः।

सवाल इसलिए भी मौजूं है, क्योंकि सुनते हैं एक उपमुख्य मंत्री ने कहा है कि जनता जनार्दन, मंत्रियों को तोहफे में सिर्फ किताबें और कलम ही प्रदान करें। वे “फिलाॅसफर किंग “की धारणा को बल दे रहे हैं। फूलों का क्या है- वे क्षणजीवी हैं। श्रीफल की चटनी कब तक खायेंगे। ठंडी में गर्मी का एहसास दिलानेवाली शालें  बदन पर लादे कब तक घूमेंगे।

लगता है लेखक पाठक बिरादरी में विचरण करनेवाला विचार मंत्रीजी ने “हाइजैक” कर लिया। समस्त भाषाओं में रचित किताबों के कान खड़े हो गये। उनकी चिन्ता वाजिब थी। क्या पता मंत्री कलंत्री, किताबों के साथ जाने कैसा सलूक करें। लिहाजा उन्होंने विमर्श के लिये एक आपातकालीन गोष्ठी आयोजित की।

“अंग्रेजी-किताब” ने कहा– हमें, पठनीयता का संकट नहीं है। लगभग दो तिहाई दुनिया अंग्रेजी जानती है।और फिर विक्रम सेठ, शशि थरूर,अरुंधति, रस्किन बांड, रूश्दी, नायपाॅल, और चेतन भगत की किताबें हाथों हाथ बिक जाती हैं। सभी पाना चाहते हैं। जनता टनों के हिसाब से खैरात में हमें नहीं बाँटती।

“हिन्दी-किताब”  लाल पीली होकर बोली- तुमने तो ऐसा हमला किया कि सवाल ही गायब हो गये। ऑफेन्स इज़ द बेस्ट डिफेंस। यहां पठनीयता के संकट पर नहीं मंत्रीजी के विचार पर मंथन हो रहा है। महान मंत्रीजी अपनी भाषा में शपथ तक नहीं पढ़ पाते वो अंग्रेजी किताबें पढ़ेंगे। उनपर नज़र डालने की जहमत तक न उठायेंगे।

—-वे चाहे जो करें। पोस्टमार्टम करें या बेच दें। उनकी मर्जी।

—–कैसी मर्जी। किताबों का घोर अपमान। किताबों के लिये जंगल कटते हैं। स्याही खर्च होती है। लेखक दिल की ढिबरी जलाकर उजाला करता है फिर लिखता है।मंत्रियों को पढ़ना होगा।

—-उन्हें रिबन काटने, लंबी लंबी फेंकने और घूमा घूमी से फुर्सत मिले तब ना।

—-“प्रादेशिक भाषा की किताबें “अब तक “साइलेंट मोड” में पड़ी थीं। अकस्मात उनमें हलचल होने लगी। वे बोलीं–हमारी हालत तो तुम सबसे ज्यादा खस्ता है।

अंग्रेजी ने उन्हें तुच्छ नज़र से देखा।

हिन्दी- किताब ने चर्चा को पटरी पर लाने के लिये कहा–भैंस के आगे बीन बजाना, साँप को दूध पिलाना, जैसे मुहावरे हमने इसी दिन के लिये सहेजे हैं।

प्रादेशिक किताब बोली– हम क्यों चिन्ता में घुलकर सींक हुये जा रहे हैं। हमने सुना– वो कहते हैं “न पढ़ेंगे न पढ़ने देंगे।” जनता भारी मात्रा में किताबें भेंट करेगी तो हो सकता है उन्हें “साइलोज” बनाने पड़ें। न बना पाये तो दीमकें खा खाकर बुद्धिजीवी बन जायेंगी।

हिन्दी किताब ने कहा– अरे कुछ कलम पर भी तो बोलो।मंत्रियों को चवन्नी छाप कलम तो कोई देगा नहीं। सोने की होगी या हीरे जड़े होंगे। मंत्री इन्हें बाँटने से रहे।

——गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुये “कोरी किताब” ने  ध्यानपूर्वक सारे प्वाइंट्स नोट किये और इस नतीजे पर पहुंची कि– मंत्रीजी को” टेलीप्राॅम्प्टर” भेंट किये जायें। और पेनों (कलम) को राष्ट्र हित में बेच देना चाहिए।

सभी की सहमति पाकर कोरी -किताब ने अपनी सिफारिशें उप मुख्य मंत्रीजी तक पहुंचा दीं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 19 – चोरों की फैक्ट्री: उज्ज्वल भविष्य की गारंटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना चोरों की फैक्ट्री: उज्ज्वल भविष्य की गारंटी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 19 – चोरों की फैक्ट्री: उज्ज्वल भविष्य की गारंटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

एक छोटे से कस्बे में, रात के अंधेरे में, एक अजीबोगरीब स्कूल का उद्घाटन हुआ। कोई शासकीय स्कूल नहीं, कोई अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं, बल्कि यह था ‘चोरों की पाठशाला’। यहां का नारा था, “प्लेसमेंट गारंटी, परमानेंट जॉब्स!” फीस सिर्फ 2 से 3 लाख रुपए, और उम्र की सीमा? बस 12 से 13 साल। यह वह स्कूल था जहां ‘चोर बनने का सपना’ देखा जाता था, और उसे हर कीमत पर पूरा किया जाता था।

पाठशाला के दरवाजे पर कदम रखते ही छात्रों के चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई देती है। कोई कक्षा के भीतर कुर्सी तोड़ रहा है, तो कोई दरवाजा। शिक्षक भी कम नहीं, उन्हें 20 साल का अनुभव था, लेकिन वह किसी विद्यालय में नहीं, बल्कि पुलिस के हवालात में। उनकी एक ही सीख थी, “शादी-ब्याह के मौके पर चुराना है तो हाथ में चूड़ी पहनना जरूरी है, ताकि ध्वनि सुनकर पता चल सके कि कंगन की आवाज कितनी मीठी है।”

पहली कक्षा में दाखिल होते ही विद्यार्थी सीखते हैं, “सिल्क की साड़ी कैसे पहचानें और कैसे उसे तेजी से गायब करें।” दूसरी कक्षा में उन्हें यह सिखाया जाता है कि “जेवर कैसे पहचानें और कैसे उसे जेब में डालें।” यहां किताबें नहीं, बल्कि तिजोरियों की नकली चाबियां और ताले होते हैं। बच्चों को सिखाया जाता है कि, “सफल चोर वही है जो खुद चोरी करता है और चोरी का इल्जाम दूसरों पर डालता है।”

शिक्षा का स्तर ऐसा था कि पाठशाला के विद्यार्थियों के लिए कोई भी शास्त्र अपरिचित नहीं था। संस्कृत के ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को उन्होंने ‘सर्वे भवन्तु चोरीनः’ में बदल दिया था। शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सिखाते, “किसी भी शादी में दूल्हे की बहन का हार सबसे महंगा होता है, इसलिए पहले उसी पर हाथ साफ करो।”

कक्षा के अंत में एक वरिष्ठ विद्यार्थी ने उठकर कहा, “गुरुजी, अगर किसी शादी में हमारे अपने रिश्तेदार हों तो क्या करना चाहिए?” गुरुजी ने हंसते हुए जवाब दिया, “बेटा, रिश्तेदारों से ही शुरुआत करो, ताकि तुम सीख सको कि धोखा क्या होता है।”

फिर आया प्लेसमेंट का समय। यह वह क्षण था जब हर विद्यार्थी का सपना साकार होने जा रहा था। हर विद्यार्थी के चेहरे पर गर्व की भावना थी, क्योंकि 100 प्रतिशत प्लेसमेंट गारंटी के साथ वह अब एक प्रोफेशनल चोर बनने जा रहे थे। नौकरी की पहली पेशकश नामी गिरामी शहर में थी। पहला वेतन पैकेज? रुपए 5 लाख। गुरुजी ने कहा, “बेटा, अब तुम उड़ने के लिए तैयार हो। याद रखना, जीवन में ईमानदारी सिर्फ पुलिस की डायरी में ही अच्छी लगती है।”

एक दिन, पाठशाला के एक शिक्षक ने एक नया अध्याय शुरू किया, “किसी भी विवाह में मौजूद लोगों का ध्यान कैसे बांटना है?” उन्होंने बताया, “बेटा, जब दूल्हा और दुल्हन फेरे ले रहे हों, तो तुम चुपके से दूल्हे की जेब से उसका पर्स निकालो। अगर तुम यह कर सके, तो समझो तुम्हारी डिग्री पूरी हो गई।”

एक और विद्यार्थी ने पूछा, “गुरुजी, अगर पकड़े गए तो क्या करें?” गुरुजी ने अपनी मुठ्ठी बांधते हुए कहा, “बेटा, अगर तुम पकड़े गए तो यही तुम्हारा फाइनल एग्जाम होगा। याद रखना, जमानत पर बाहर आना कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात यह है कि जेल से बाहर आकर अगले दिन फिर से शादी में चुराने जाना।”

दिन ब दिन, यह पाठशाला पूरे प्रदेश में मशहूर हो गई। लोग दूर-दूर से अपने बच्चों को यहां भेजने लगे। वैसे भी किस माता-पिता का सपना नहीं होता कि उनका बच्चा भी ‘सफल’ हो?

इस पाठशाला की एक छात्रा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “यहां आकर मुझे एहसास हुआ कि जीवन में सफल होने के लिए सिर्फ मेहनत की जरूरत नहीं होती, बल्कि सही मौके की भी। शादी में जाने के लिए अब मैं तैयार हूं, और मुझे यकीन है कि मैं वहां से खाली हाथ नहीं लौटूंगी।”

इस पाठशाला के शिक्षकों की यही सीख थी, “सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, लेकिन चोरी करना एक बेहतरीन शॉर्टकट है।”

पाठशाला के हर छात्र ने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से साबित कर दिया कि वह यहाँ सिर्फ चोर बनने नहीं, बल्कि ‘मास्टर चोर’ बनने आए थे। आखिरकार, जब शादी में सैकड़ों लोग मौजूद हों, तो कौन सोचता है कि उनमें से एक-दो चोर भी होंगे?

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पाठशाला के एक विद्यार्थी ने, जिसने हाल ही में अपनी डिग्री प्राप्त की थी, किसी बड़ी शादी में चोरी की। उसने अपने शिक्षक की बताई हुई हर बात को ध्यान में रखा। जैसे ही वह शादी के समापन पर जा रहा था, उसने अपनी जेब से एक चूड़ी निकाली, और मुस्कुराते हुए बोला, “गुरुजी सही कहते थे, जीवन में असली मजा चुराने में है, पकड़े जाने में नहीं।”

इस कहानी का अंत क्या होगा? यह तो समय ही बताएगा, लेकिन एक बात तो तय है, इस पाठशाला के हर छात्र ने साबित कर दिया कि वह असली चोर है, और किसी भी शादी में जाने से पहले उन्हें याद रखना चाहिए, “सावधान! चोरों की पाठशाला के छात्र आ रहे हैं।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # 44 ☆ व्यंग्य – “मोमबत्ती से मोमबत्ती का संवाद…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  मोमबत्ती से मोमबत्ती का संवाद…” ।)

☆ शेष कुशल # 44 ☆

☆ व्यंग्य – “मोमबत्ती से मोमबत्ती का संवाद…” – शांतिलाल जैन 

सड़क पर निकले एक केंडल मार्च में कुछ देर पहले ही जलाई गई एक मोमबत्ती ने दूसरी से कहा – “थोड़ी-थोड़ी बची रहना.”

“वो किसलिए?” – जलती पिघलती मोमबत्ती ने प्रतिप्रश्न किया.

“ये आखिरी रेप नहीं है बहन, न ही आखिरी मार्च. जो मार डाली गई है वो आखिरी स्त्री नहीं है. आगे भी जलना है, जलते जलते सड़कों पर निकलना है. हमें लेकर निकलनेवाले हाथ बदल जाएँगे मगर जलनेवाला हमारा नसीब और रौंद दी जानेवाली स्त्री की नियति बदलनेवाली नहीं है.”

“डोंट वरी, हमें दोबारा तुरंत निकलने की नौबत नहीं आएगी. ये सदमे,  ये संवेदनाएँ,  ये आक्रोश,  ये बहस मुबाहिसे,  ये प्रदर्शन,  ये मेरा-तुम्हारा जलना, जलते हुए सड़कों पर निकलना तब तक ही है जब तक अभया खबरों में है. मिडिया में हेडलाईन जिस दिन बदली उस दिन मोमबत्तियाँ और मुद्दे दोनों किसी कोने-कुचाले में पटक दिए जाएँगे. हादसे उसके बाद भी रोज़ ही होंगे मगर जब तक न पड़े मेन स्ट्रीम मीडिया की नज़र धरना-प्रदर्शन अधूरा रहता है. तब वो लोग निकलेंगे जो उस समय विपक्ष में होंगे, वे ही मार्च करेंगे. स्त्री के पक्ष में सत्ता का प्रतिपक्ष ही क्यों खड़ा होता है हर बार ?” 

“सत्ता तक पहुँचने का रास्ता उसे प्रदर्शन की केंडल-लाईट में एकदम क्लियर दिखाई पड़ता है. शहर मेट्रोपॉलिटन हो, मुख्यधारा के मिडिया की उपस्थिति सुलभ हो और रेप हो जाए, बांछें खिल आती है प्रतिपक्ष की. उसे अपने तले का अँधेरा दिखलाई नहीं पड़ता. बहरहाल, जितना कवरेज उतना जोश. हमने जलने से कभी मना नहीं किया मगर दूर गाँव में,  झुग्गी बस्ती में,  ऑनर किलिंग में,  दलित स्त्री, छोटी बच्ची के लिए कब वे सड़कों पर उतरे हैं ?  अंकल, कज़िन,  पड़ोसी के विरूद्ध कौन उतर पाता है सड़कों पर. पुलिस के रोजनामचे में स्त्री, बच्चों के विरूद्ध सौ से ज्यादा यौन अपराध हर दिन दर्ज होते हैं. रोज़ाना कौन निकलता है सड़कों पर ? एक राह चलती अनाम-अदृश स्त्री के मारे जाने पर हम नहीं निकले हैं,  मज़बूत इरादों वाली सशक्त डॉक्टर स्त्री के लिए निकले हैं. वो भीड़ भरे अस्पताल के अन्दर निपट अकेली पड़ गई थी.” 

“गरिमा और जान दोनों से हाथ धोना पड़ा है उसे. छत्तीस घंटे काम करने के बाद ऐसी दो गज जमीन उसके पास नहीं थी जहाँ वह महफूज़ महसूस करती हुई आराम कर पाती. उस रात वो पूज्यंते नहीं थी इसीलिए देवता भी कहीं और रमंते रहे. सवेरे फिर तीमारदारी में जुटना था मगर वो सवेरा आया ही नहीं. सुलभ ऑन-कॉल रूम की कमी ने अभया की जान ली है.” 

“एक बार अस्पताल की लाईट जाने पर वहाँ ऑपरेशन तुम्हारी रोशनी में करना पड़ा था. तुमने तो देखा है अन्दर का मंज़र. क्या देखा तुमने बहन ?”

“जितनी जगह में एक ऑन-कॉल रूम बनता है उतनी जगह में तो एक ट्विन शेयरिंग वाला प्रायवेट वार्ड निकल आता है. करोड़ों के इन्वेस्टमेंट से बने हॉस्पिटल में महिलाकर्मी की आबरू और जान की क्या कीमत है!! सरकारी अस्पताल तो और भी भीड़ भरे, मरीज के लिए ठीक से बेड मयस्सर नहीं स्टाफ की कौन कहे. दड़बेनुमा नर्सिंग स्टेशन में सिकुड़कर सोई रहती हैं सुदूर केरल से आईं चेचियाँ. साफ शौचालय और चेंजिंग रूम किस चिड़िया का नाम है ? अभया डॉक्टर थी,  मेट्रो के सरकारी अस्पताल में थी,  मिडिया की नज़र पड़ गई तो मार्च निकाल लिया गया है. सफाईकर्मी,  आया,  दाई,  मेनियल वुमन स्टाफ के बारे तो न कोई सोचता है न उनके प्रति अपराध रिपोर्ट ही हो पाते हैं.”

“जानती हो बहन – हम जल तो सकती हैं चल नहीं सकती. जब तक जलाकर ले जाते हैं देर हो जाती है.”

“कभी कभी इतनी देर भी कि एक स्त्री बेंडिट क्वीन बन जाती है. वो मोमबत्ती जलाकर निकलनेवालों का इंतज़ार नहीं करती, मशाल फूंकती है और पूरा गाँव जलाकर खाक कर देती है, बहरहाल..”

“अभया की उम्र तीस-इकत्तीस रही होगी ?”

“रेपिस्ट उम्र-निरपेक्ष होते हैं,  वे तीन साल की लड़की से भी उतनी ही     नृशंसता से पेश आते हैं जितनी कि सत्तर साल की प्रौढ़ा से. अपराधबोध नहीं होता उन्हें. वे संसद में भी मर्दानगी का वही तमगा सीने पर लगाए विराजते हैं जिसे लगाए हुए गली-कूचे से गुजरते हैं.” 

प्रदर्शनकारी गंतव्य तक पहुँच गए थे, मंजिल न मिलना थी, न मिली. मोमबत्तियाँ जल कर पूरी तरह पिघल जाने के कगार पर थीं. पहली ने कहा – “चाहकर भी अगले जुलूस तक के लिए बच नहीं पाए हम, तब भी कोई गम नहीं, एक नोबल कॉज़ के लिए जलकर मरे हैं.” 

“अपनी अगली पीढ़ी को कहूँगी मैं – तैयार रहना, आर्यावर्त की सड़कों पर निकलनेवाले ऐसे मार्च अभी ख़त्म नहीं होनेवाले, अलविदा”, दम तोड़तीं मोमबत्तियाँ वहीं प्रस्थान कर गईं हैं जहाँ अभया चली गई है. 

-x-x-x-

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 255 ☆ व्यंग्य – मालदारों का दु:ख ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य नाटिका – ‘मलदारों के दुःख‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 255 ☆

☆ व्यंग्य ☆ मालदारों का दु:ख

देश के मालदारों के बीच कुछ दिनों से इस मामले को लेकर सुगबुगाहट थी। जब भी कहीं मालदारों का जमावड़ा होता, वह बात उछल कर सामने आ जाती। मुद्दा यह था कि देश के मालदार शिद्दत से यह महसूस कर रहे थे कि वे अपना माल इकट्ठा करने के चक्कर में ज़िन्दगी भर जिल्लतें झेलते हैं, ई.डी., सी. बी. आई., इनकम टैक्स के छापों का सामना करते हैं, सांप की तरह अपनी संपत्ति की रक्षा करते हैं, लेकिन एक दिन सबको सिकन्दर की तरह हाथ पसारे दुनिया  से रुखसत होना पड़ता है। अरबों की संपत्ति में से एक धेला भी साथ नहीं जाता। ऊपर वाले की भी ऐसी नाइंसाफी है कि बिना कोई नोटिस दिये आदमी को अचानक पलक झपकते उठा लिया जाता है।

जमावड़ों में यह बात भी सामने आयी कि अक्सर मालदार के स्वर्गवासी या नरकवासी होने के बाद उसकी सन्तानें बाप की संपत्ति को विलासिता में उड़ा देती हैं या खुर्द-बुर्द  कर देती हैं, जिससे निश्चय ही मरहूम की आत्मा को घोर कष्ट का अनुभव होता होगा।

नतीजतन एक जमावड़े में यह निर्णय लिया गया कि सरकार से दरख्वास्त की जाए कि नई टेक्नोलॉजी का उपयोग करके ऐसा इन्तज़ाम करे  कि मालदारों की मौत के बाद उनकी संपत्ति उनकी इच्छानुसार स्वर्ग या नरक ट्रांसफर की जा सके। कहा गया कि लगता है अभी तक सरकार ने स्वर्ग और नरक को खोजने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की। जब वैज्ञानिक चांद और दूसरे ग्रहों तक पहुंच सकते हैं तो स्वर्ग और नरक का पता क्यों नहीं लगा सकते? हर धर्म की किताबें स्वर्ग और नरक के बयानों से पटी हैं। बताया जाता है कि नरक में आत्मा को उबाला या गोदा जाता है और स्वर्ग में उसकी खिदमत के लिए सुन्दरियां या हूरें उपलब्ध रहती हैं। वैसे हमारे अज़ीम शायर ‘दाग़’ देहलवी इस बाबत फरमा गये हैं— ‘जिसमें लाखों बरस की हूरें हों, ऐसी जन्नत का क्या करे कोई?’ फिर भी बहुत से लोग इन हूरों से मुलाकात की उम्मीद में उम्र भर ऊपर की तरफ टकटकी लगाये रहते हैं। यह समझना मुश्किल है कि शरीर-विहीन आत्मा को कैसे उबाला और गोदा जाता है। कोई ‘वहां’ से लौट कर आता भी नहीं है कि कुछ पुख्ता जानकारी मिले। बता दें कि भगवद्गीता ने आत्मा को अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य कहा है।

ऐसा लगता है कि ऊपर कोई सुपर कंप्यूटर है जिसमें आदमी के ज़मीन पर उतरते ही उसकी ज़िन्दगी का लेखा-जोखा अंकित हो जाता है। फिर आदमी को ‘राई घटै,न तिल बढ़ै’ के हिसाब से चलना पड़ेगा। यह प्रश्न उठता है कि पूरी दुनिया के आदमियों के लिए एक ही सुपर कंप्यूटर है या अलग-अलग धर्म के अलग कंप्यूटर हैं? इस भारी-भरकम काम को अकेले चित्रगुप्त संभालते हैं या अलग-अलग धर्म के अलग-अलग चित्रगुप्त हैं? यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या हर धर्म के अपने अलग स्वर्ग और नरक हैं?

जमावड़े के निर्णय के लीक होते ही मालदारों के परिवारों और रिश्तेदारों के बीच हड़कंप मच गया। मालदारों की अनेक संतानें  मायूस होकर ‘डिप्रेशन’ में चली गयीं। बहुत सी बहुओं ने सुबह-शाम ससुर जी के पांव छूना और उनकी आरती उतारना शुरू कर दिया। कुछ बेटों से पिताजी को धमकी मिलने लगी कि अगर उनको अपनी संपत्ति अपने साथ ही ले जाना है तो वे अपना अलग इंतजाम कर लें और उनसे सेवा- ख़िदमत की उम्मीद न रखें। कई परिवारों में बुज़ुर्गों पर नज़र रखी जाने लगी कि वे कहां जाते हैं और किससे मिलते हैं।

उधर सरकार के पास बात पहुंची तो उसकी तरफ से मालदारों को समझाया गया कि इस मांग को छोड़ दें क्योंकि यहां की मुद्रा वहां चलती नहीं है। वहां ‘बार्टर’ या वस्तु-विनिमय चलता है या स्वर्ण का आदान-प्रदान होता है। इस पर मालदारों का जवाब था कि यहां की मुद्रा वहां चले न चले, उनका इरादा उसे बरबादी से बचाना था।

दबाव ज़्यादा बढ़ा तो सरकार की तरफ से निर्णय लिया गया कि तत्काल एक ताकतवर अंतरिक्ष-यान पर काम शुरू किया जाए जो स्वर्ग और नरक तक पहुंच सके और फिर वहां कुछ बैंकों की शाखाएं खोली जाएं जहां मालदारों का माल ट्रांसफर किया जा सके। इसके लिए ऊपर पहुंचे हुए बैंक कर्मचारियों, अधिकारियों की मदद ली जा सकती है।

सरकार से निर्देश पाकर वैज्ञानिक एक पावरफुल अंतरिक्ष-यान के निर्माण में जुट गये हैं जो स्वर्ग और नरक को ढूंढ़ निकालेगा। दूसरी तरफ मालदारों के परिवार-रिश्तेदार ऊपर वाले से प्रार्थना करने में जुट गये हैं कि वैज्ञानिकों की कोशिश कारगर न हो।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 18 – आलस्य का नया युग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना आलस्य का नया युग)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 18 – आलस्य का नया युग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

एक दिन, हमारे देश के नेताओं ने एक नई योजना बनाई। उन्होंने सोचा कि अब पुराने नारे जैसे ‘वंदेमातरम’ और ‘जयहिंद’ आउट-ऑफ डेट हो चुके हैं। अब समय आ गया है कि हम अपने नागरिकों को एक नया नारा दें – ‘सुस्त बनो, मस्त रहो’।

नेताओं ने एक बड़ी सभा बुलाई और जनता को संबोधित किया। “भाइयों और बहनों,” नेता जी ने कहा, “आज हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। अब हमें आलस को अपनाना होगा। यह हमारे समाज का नया विकास मंत्र है।”

सभा में बैठे लोग पहले तो चौंक गए, लेकिन फिर तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूंज उठा।

नेता जी ने आगे कहा, “हम सदा शरीर को कष्ट देने वाले नारे लगाते आ रहे हैं, लेकिन अब इन नारों का कोई अर्थ नहीं रहा। अब हमें श्री श्री 1008 श्री आलस्य ऋषि का लिखा आलस्य पुराण पढ़ना चाहिए।”

सभा में बैठे एक बुजुर्ग ने कहा, “नेता जी, यह आलस्य पुराण क्या है?”

नेता जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “आलस्य पुराण में आलसी बनने के तरीके, उससे फायदे और आधुनिक युग में आलसी बने जिंदा रहने के तरीके बताए गए हैं।”

सभा में बैठे लोग हंस पड़े।

नेता जी ने कहा, “स्व. आलसी बाबा ने कहा था कि मैं कोई काम जल्दी नहीं करता। ऐसा करने से बदन दर्द देने लगता है। फाइल खुद चलकर आए तो काम करने का मजा आता है, टेबल पर रखी फाइल देख लेंगे तो हमारी तौहीन नहीं होगी क्या।”

सभा में बैठे लोग अब पूरी तरह से सहमत हो गए थे।

नेता जी ने कहा, “अब हमें ‘आलस्य परमो गुणः’ जैसे गबन-राग छेड़ते हुए आलस्य बढ़ाने के आंदोलन करने चाहिए। हमें अधिकतम आलस्य करना चाहिए और अपने देश को इस मामले में सिरमौर का दर्जा दिलवाना चाहिए।”

सभा में बैठे लोग अब पूरी तरह से उत्साहित हो गए थे।

नेता जी ने कहा, “आलस्य धर्म-जाति-वर्ग निरपेक्ष होता है। यह हमारे समाज को एकीकृत करने में बहुत काम आएगा।”

सभा में बैठे लोग अब पूरी तरह से आलस्य को अपनाने के लिए तैयार हो गए थे।

नेता जी ने कहा, “आइए, अति आलसी बनकर अति मस्त बनें।”

सभा में बैठे लोग अब पूरी तरह से आलस्य को अपनाने के लिए तैयार हो गए थे।

लेकिन, इस आलस्य के चलते समाज में अराजकता फैल गई। लोग एक-दूसरे को धोखा देने लगे। कामचोरी और खर्राटे लेना आम हो गए।

एक दिन, जब एक सेवानिवृत्त बूढ़ा अपनी पेंशन की फाइल के बारे में पूछा, तो देखा कि उसकी फाइल चूहों की भेंट चढ़ चुकी थी।

बूढ़े ने रोते हुए कहा, “मैंने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत से काम किया, लेकिन अब मुझे समझ आ गया कि इस समाज में मेहनत की कोई कीमत नहीं है।”

बूढ़े की आंखों में आंसू थे और उसने अपनी खोई फाइल की याद में रोते हुए कहने लगा, “अब मैं भी अपने बच्चों को आलसी बनाऊँगा, ताकि उन्हें मेहनत करके कोई नौकरी न करना पड़े।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 254 ☆ व्यंग्य नाटिका – चढ़ता रिश्तेदार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य नाटिका – ‘चढ़ता रिश्तेदार‘ इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 254 ☆

☆ व्यंग्य नाटिका ☆ चढ़ता रिश्तेदार

 (एक कमरा। खिड़की से धूप आ रही है। कमरे में एक पलंग पर मुंह तक चादर ताने एक आदमी सोया है। गृहस्वामी का प्रवेश।)

मेज़बान- उठिए भाई साहब, धूप चढ़ आयी। आठ बजे का भोंपू बज गया। फैक्टरी वाले काम पर गये।

मेहमान- (कुनमुनाकर चेहरे पर से चादर हटाता है। आंखें मिचमिचाकर) अभी नहीं उठूंगा। कल बात-बात में मुंह से निकल गया कि मेरा आज सवेरे लौटने का विचार है तो आप मुझसे पीछा छुड़ाने में लग गये? मुझे टाइम मत बताइए। मुझे अभी नहीं जाना है।

मेज़बान- (क्षमा याचना के स्वर में) आप मुझे गलत समझे। मैं भला क्यों चाहूंगा कि आप लौट जाएं? आपके पधारने से तो मुझे बड़ी खुशी हुई है। कितने दिन बाद पधारे हैं आप। मैं तो यही चाहता हूं कि आप हमें और कुछ दिन अपने संग का सुख दें।

मेहमान- साहित्यिक भाषा मत झाड़िए।  मैं आपके मन की बात जानता हूं। मेहमानदारी करते मेरी उमर गुज़र गयी। हर तरह के मेज़बानों से निपटा हूं। आप तो रोज पूजा के वक्त घंटी हिलाने के साथ प्रार्थना करते हैं कि मैं जल्दी यहां से दफा हो जाऊं। आपकी पत्नी रोज आपसे झिक-झिक करती है कि मैं अंगद के पांव जैसा जमकर बैठा  आपका राशन क्यों नष्ट कर रहा हूं। लेकिन मैं अभी जाने वाला नहीं। आपकी प्रार्थना से कुछ नहीं होने वाला।

मेज़बान- हरे राम राम। आप तो मुझे पाप में घसीट रहे हैं। मैं तो रोज यही प्रार्थना करता हूं कि आप बार-बार हमारे घर को पवित्र करें। मेरी पत्नी आपकी सेवा करके कितना सुख महसूस करती है आपको कैसे बताऊं। यकीन न हो तो आप खुद पूछ लीजिए।

मेहमान- रहने दीजिए। वह सब मैं समझता हूं। मुंह के सामने झूठी मुस्कान चमका देने से कुछ नहीं होता। मैं पूरे घर का वातावरण भांप लेता हूं। चावल के एक दाने से हंडी की हालत पकड़ लेता हूं। मेरे सामने पाखंड नहीं चलता।

मेज़बान- पता नहीं आपको ऐसा भ्रम कैसे हो गया। हां, हम लोग कभी-कभी यह चर्चा जरूर करने लगते हैं कि आपको आये इतने दिन हो गये, घर के लोग चिंतित हो रहे होंगे।

मेहमान- छोड़िए, छोड़िए। आपकी चिंता को मैं समझता हूं। आपकी चिंता यही है कि मैं आपके घर की देहरी क्यों नहीं छोड़ता। जहां तक मेरे घर वालों का सवाल है, वे मेरी आदत जानते हैं इसलिए चिंतित नहीं होते। मेरा जीवन इसी तरह लोगों को उपकृत करते बीत गया। वे जानते हैं कि मैं जहां भी हूंगा सुख से हूंगा।

मेज़बान- बड़ी अच्छी बात है। हम भी यही चाहते हैं कि आप यहां पूरे सुख से रहें। लीजिए, चाय पीजिए।

मेहमान- पीता हूं। आपसे कहा था कि एक-दो दिन मुझे यहां के आसपास के दर्शनीय स्थल दिखा दीजिए, लेकिन आप झटके पर झटका दिये जा रहे हैं। कभी छुट्टी नहीं मिली तो कभी स्पेशल ड्यूटी लग गयी।

मेज़बान- आपको गलतफहमी हुई है, भाई साहब। इस शहर में कुछ देखने लायक है ही नहीं। लोग यों ही अपने शहर के बारे में शेखी मारते रहते हैं।

मेहमान- उड़िए मत। यहां की संगमरमर की चट्टानें पूरे हिन्दुस्तान में मशहूर हैं। रानी दुर्गावती का एक किला भी है जिसकी लोग चर्चा करते हैं। दरअसल आप चाहते हैं कि मैं अकेला ही चला जाऊं ताकि आपका पैसा बचे और मेरा खर्च हो।

मेज़बान- कैसी बातें करते हैं आप! असली बात यह है कि रानी दुर्गावती का किला अब इतना पुराना हो गया है कि आम आदमी को उसमें कुछ दिलचस्प नज़र नहीं आता और संगमरमर की चट्टानों में इतनी तोड़फोड़ हो गयी है कि उनका नाम भर रह गया है।

मेहमान- जो भी हो। मुझे अपने शहर लौट कर लोगों को बताना है कि मैंने यह सब देखा। इसलिए मुझे यहां से जल्दी विदा करना चाहते हों तो दफ्तर से छुट्टी लीजिए और मुझे ये जगहें घुमाइए।

मेज़बान- ज़रूर घुमाऊंगा। लेकिन आप विदा होने की बात क्यों करते हैं? मुझे इससे पीड़ा होती है।

 

मेहमान- पीड़ा होती है या खुशी होती है यह मैं जानता हूं। ये सब जगहें घूमने के बाद आप अपने पैसे से मेरा रिजर्वेशन करा दीजिए। संगमरमर की एक अच्छी सी मूर्ति भेंट भी कर दीजिएगा। घर जाकर क्या दिखाऊंगा? मैं आपके चढ़ते समधी का फुफेरा भाई हूं।चढ़ता रिश्तेदार हूं। इतना हक तो मेरा बनता ही है। रोज-रोज थोड़े ही आता हूं।

मेज़बान- सब हो जाएगा। हम पर आपका हक तो पूरा है ही। यह भी कोई कहने की बात है?

मेहमान- अगले साल बाल-बच्चों को लेकर आऊंगा। आठ दस दिन रुकूंगा।

मेज़बान- ज़रूर ज़रूर। मेरा अहोभाग्य। हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे। आने से पहले सूचित कर दीजिएगा ताकि मैं कहीं इधर-उधर न चला जाऊं।

मेहमान- बिना सूचित किये ही आऊंगा। सूचित करुंगा तो आप जानबूझकर लिख देंगे कि इधर-उधर जा रहा हूं। आप नहीं भी रहेंगे तो आपका परिवार तो रहेगा।

मेज़बान- आप बहुत विनोदी हैं। आपके आने से हमें सचमुच बड़ी खुशी होगी

मेहमान- अब आपको खुशी हो या रंज, हम तो आएंगे। आप में हमें बाहर निकालने की हिम्मत तो है नहीं क्योंकि हम चढ़ते रिश्तेदार हैं। साल भर भी डेरा डाले रहें फिर भी आप चूं नहीं कर सकते। मुझे पता है कि हमारा रहना-खाना आपको अखरेगा क्योंकि महंगाई बढ़ रही है, लेकिन आपको चढ़ते भावों और चढ़ते रिश्तेदारों में से एक का चुनाव करना होगा।

मेज़बान- मैं पहले आज छुट्टी लेकर आपके घूमने-घामने की व्यवस्था करता हूं।

मेहमान-देखा! मैंने रिजर्वेशन की बात कही तो आप फौरन हरकत में आ गये। ठीक है, यहां से विदा होकर मुझे एक और उतरते रिश्तेदार के यहां जाना है। दो-तीन साल से उनका आतिथ्य ग्रहण नहीं किया। कुछ दिन उन्हें भी सेवा का मौका देना है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 17 – गरीबी का ताना-बाना ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना सत्ता का नया फार्मुला।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 17 – गरीबी का ताना-बाना ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गरीबी, हां वही, जिसे हम सभी ने सहेज कर रखा है, जैसे पुराने जमाने की बेमिसाल विरासत। इसे किसी बर्तन में ढक कर रखा जाए, या फिर दरवाजे पर लटका दिया जाए, इससे फर्क नहीं पड़ता। गरीबों की झुग्गी में सब कुछ मस्त था, बशर्ते खाने-पीने का कोई इंतजाम न हो।

भोलू नामक एक गरीब किसान, जो कि अपने खेत में कुछ भी न उगाकर रोज़ की खिचड़ी पकाता था, अपने हालात पर हमेशा हंसता रहता। एक दिन वह अपनी गगरी लेकर पानी भरने चला, जैसे गगरी से पानी निकालकर अमीर बन जाएगा। लेकिन भोलू का तो पूरा दिन इसी फिक्र में निकल जाता था कि पानी किस तरह उसकी झुग्गी में आए।

“पानी भरने का काम बहुत आसान है, बस हाथ और गगरी चाहिए, बाकी सब तो आ जाएगा,” उसने खुद से कहा, लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। पानी भरने के बाद, भोलू को एक महात्मा का दर्शन हुआ जो उसके घर में आकर बोले, “गरीबी दूर करने के लिए तुमने कोई शास्त्र पढ़ा?”

“नहीं बाबाजी, मैंने तो गगरी भरने के बाद सिर्फ गगरी ही पढ़ी है,” भोलू ने जवाब दिया। महात्मा ने उसकी यह प्रतिक्रिया सुनकर कहा, “तुम्हारी गरीबी अब भी कायम रहेगी।”

फिर भोलू के विचारों में उथल-पुथल मच गई। उसने सोचा, “गरीबी हटाने का तरीका अब यही है कि हर बात में केवल हंसी ही हंसी करूँ। किसी ने पूछा, ‘भोलू, क्या हाल है?’ मैंने कहा, ‘अरे, हर रोज़ नया हो जाता है।’ यह भी सच है कि गरीबों का चेहरा हमेशा नए नारे सुनने के लिए तैयार रहता है।”

इस बीच, गांव में एक बड़ी दावत हुई, जिसमें भोलू भी गया। वहाँ, महात्मा ने फिर से उसकी सराहना की, “भोलू, तुमने बड़ा काम किया है, दावत में आए हो।”

“हां बाबाजी, लेकिन दावत में तो गरीब के लिए भी जगह नहीं मिलती,” भोलू ने कहा। महात्मा हंस पड़े और बोले, “गरीब का स्थान तो दावत में हमेशा खाली रहता है।”

भोलू दावत की हर चीज़ को देखकर सोचने लगा कि गरीब का दिल भी हमेशा खाली रहता है, जैसे दावत के थालों में कभी-कभी जगह नहीं होती। फिर भोलू ने सोचा कि गरीबी के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए। उसने गांव में भाषण देना शुरू किया, “सभी लोग सुनो, गरीब को ही सच्चा अमीर समझो। अमीर तो सिर्फ दिखावा करते हैं, असली अमीरी तो गरीबों की झोपड़ी में है। यहाँ न कोई टैक्स है, न कोई ब्याज। सब कुछ मुफ्त में मिल रहा है।”

इस भाषण के बाद, गांव के अमीरों ने भोलू को अपनी चाय पर बुलाया। भोलू ने सोचा, “अब तक अमीरों की चाय की आदत थी, अब गरीबों की चाय की आदत बनानी पड़ेगी।” चाय पीते हुए, अमीरों ने भोलू से पूछा, “क्या योजना है तुम्हारी गरीबी मिटाने की?”

भोलू ने जवाब दिया, “गरीबी मिटाने की योजना है, अमीरों की चाय पीकर। जब अमीरों की चाय खत्म हो जाएगी, तो गरीबी भी ख़त्म हो जाएगी। अमीरों की चाय पीकर गरीबों की भूख भी मिटेगी।”

भोलू की बातों पर सब हंसी में फूट पड़े। भोलू की हर बात में गरीबी का ही मजाक था, जैसे गरीबी अपने आप में एक हंसी का विषय हो। वह जानता था कि गरीबी पर हंसी ही हंसी ही एकमात्र इलाज है।

एक दिन भोलू की झुग्गी में आग लग गई। गांव वालों ने देखा कि भोलू तो हंसते-हंसते जल रहा है। लोग बोले, “भोलू, तुम्हारे घर में आग लगी है।”

भोलू ने जवाब दिया, “अरे, आग लगी है तो क्या हुआ, गरीबी का घर ही तो जल रहा है। अगली बार तो इसी जलन के साथ नया घर बनाऊँगा।”

इस तरह, भोलू की हर बात में गरीबी की झलक दिखाई देती थी। उसका जीवन गरीबी से ही ताना-बाना बुनता था, और वह इसी ताने-बाने को हंसी में बदलने में माहिर था। गरीबी पर हंसी ही उसका सबसे बड़ा हथियार थी, और इसी हथियार से वह हर दिन गरीबी को पराजित करने की कोशिश करता था। 

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # 43 ☆ व्यंग्य – “ये सवाल हैं जोख़िम भरे…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  ये सवाल हैं जोख़िम भरे.…”।) 

☆ शेष कुशल # 43 ☆

☆ व्यंग्य – “ये सवाल हैं जोख़िम भरे…” – शांतिलाल जैन 

इसीलिए अपन तो रिस्क लेते ही नहीं.

रिस्क रहती है श्रीमान् साड़ी पसंद करवाने के काम में. ताज़ा ताज़ा हाथ जला बैठे हैं डिज़ाइनर तरूण तहिलियानी. पेरिस ओलंपिक के लिए उनकी डिज़ाइन की गई साड़ी विवाद के केंद्र में आ गई है. मुर्गे की जान गई और खानेवाले को मज़ा नहीं आया. ओलंपिक दल की महिला सदस्यों ने पहन भी ली, ओपनिंग सेरेमनी में पहन कर चलीं भी, अब कह रहे हैं साड़ी पसंद नहीं आई. आजकल छोटे-छोटे आयोजनों में प्रिंटेड साड़ी तो कामवाली बाई नहीं पहनतीं, तरूणबाबू आपने ओलंपिक में पहनवा दी. ‘इकत’ प्रिंट है. तो क्या हुआ इकत प्रिंट का चलन तो इन दिनों बेडशीट में भी नहीं रहा! घर जैसे टंटे पेरिस में भी. होता है – जब साड़ी ननद लाई हो – ‘ऐसी तो दो-दो सौ रूपये में सेल में मिल जाती है’. एक्जेक्टली यही ओलंपिक साड़ी के लिए कहा जा रहा है – ‘दो सौ रूपये में दादर स्टेशन के बाहर मिलती है.’ जो पीहर से वैसी ही साड़ी आ जाए तो ट्रायल रन में ही केटवॉक, ऑन दी सेम-डे, किचन टू पोर्च वाया ड्राईंगरूम एंड बैक, हुज़ूर इस कदर भी न इतरा के चलिए. तो श्रीमान कहानी का पहला मोराल तो ये कि तारीफ़ करने या खोट निकालने से पहले सुनिश्चित कर लीजिए साड़ी आई कहाँ से है. बेचारे तरूणबाबू को इल्म भी नहीं रहा होगा कि सेम-टू-सेम एटीट्यूड इंटरनॅशनल लेवल पर नुमायाँ हो जाएगा. काश! उन्होंने सप्लाय करने से पहले इंडियन ओलंपिक असोसिएशन से पूछ लिया होता – ‘देनेलेने में दिखाऊँ ?’ तो उनकी इतनी आलोचना न होती. कस्बे के दुकानदार को पता होता है इस तरह की साड़ियों का कपड़ों में वही स्थान होता है जो दिवाली की मिठाई में सोन-पपड़ी का होता है. कभी कभी तो वही की वही साड़ी आठ-दस घरों में लेनदेन निपटाकर फिर से वहीं आ जाती है. ऐसे में बेचवाल सेफ हो जाता है, साफगोई से उसने पहले ही बता दिया कि ये देनेलेने के काम की है, पहनकर ट्रैक पर चलने को किसने कहा था!

रिस्क साड़ी खरीदवाने के काम में ही नहीं रहती, ‘आज क्या पहनूँ ?’ को रिस्पांड करने में भी रहती है. ऐसा करो वो एरी सिल्क की देख लो. कौन सी एरी सिल्क ? वही जो अभी अभी खरीदी है मूँगिया ग्रीन. अभी कभी? अरे अभी तो कुछ समय पहले तो खरीदी तुमने. सालों गुजर गए जो आपने एक साड़ी भी दिलाई हो. क्यों, अपन जोधपुर चले थे तब नहीं खरीदी तुमने, महिना भर भी नहीं हुआ है. वो तो मैंने मेरी मम्मी के पैसों से खरीदी थी, कौनसी आपने दिला दी है. कब से कह रही हूँ आइसी-ब्लू शेड में एक साड़ी लेनी है. आपके पास सबके लिए बजट है मेरे लिए नहीं. लगा कि अब और कुछ कहा तो मौसम बदल जाएगा. रिस्क तो रहती है श्रीमान, डर लगता है, बेध्यानी में भी सच न निकल जाए मुँह से.  बेटर हॉफ की मम्मी ने तो खाली पाँच सौ रूपये भिजवाए थे साड़ी के, फॉल-पिको में निकल गए. पूरी फंडिंग अपन की लगी है. फिर सात वचन से बंधा जो हूँ, त्याग तो करना ही पड़ता है. वैसे असल त्याग तो रेशम के कीड़ों का है श्रीमान, उबलते पानी में जान देकर भी….

बहरहाल, ‘आज क्या पहनूँ ?’ अपन के दिए सारे ऑप्शंस रिजेक्ट हो चुके हैं. टसर सिल्क, कोसा सिल्क, मैसूर सिल्क, चंदेरी सिल्क हर ऑप्शन खारिज़. उधर उत्तर में बनारस से लेकर सुदूर दक्षिण में कांजीवरम तक कुछ जम नहीं रहा. पता नहीं कौन लोग हैं जो भारत को विकसित राष्ट्र मानते हैं. एक साड़ी तो ऐसी आज तक बना नहीं पाए जो पहली नज़र में पसंद आ सके चलें हैं विश्व का नेतृत्व करने. ‘अलमारी में कपड़े जमाकर कैसे रखें जाएँ’ – मैरी-कोंडो ये तो दुनिया को सिखा सकती हैं, मगर ‘आज क्या पहनूँ ?’ रिस्पांड करने में भारतीय पति की मदद नहीं कर सकती. कुदरत ने आर्यावर्त में महिलाओं को एलिफेंट मेमोरी की नेमत बख्शी है. दस साल पहले किसी परिवार में, किसी आयोजन में कौनसी साड़ी पहनी थी, याद रहता है उन्हें. याद रखना पड़ता है. उसी परिवार में, वैसे ही आयोजन में साड़ी रिपीट न हो जाए, कांशियस बना रहता है. ओवरफ्लो होते तीन तीन वार्डरोब. खोलने के लिए दरवाजा थोड़ा सा स्लाइड करते ही साड़ियाँ कोरस में सवाल करने लगती हैं – ‘क्या मुझे दूसरी बार कभी पहना जाएगा?’ वे आज फिर रिजेक्ट हो चुकी हैं. थकहार कर अगले ने उसी साड़ी को पहनना नक्की किया है जिसे वे शुरू में मना कर चुकी हैं – एरी सिल्क का मूँगिया ग्रीन. रिस्क गाड़ी छूट जाने की भी है – एरी की मूँगिया ग्रीन ड्रेप-रेडी नहीं है, तैयार होने में अभी टाईम लगेगा. 

उधर ओलंपिक का साड़ी विवाद इस पर भी बढ़ गया कि तरूणबाबू ने डिज़ाइंड साड़ी पर अपनी कंपनी तस्व का लोगो ही छाप डाला. ‘ये साड़ी आपने कहाँ से ली ?’ ऐसे सवालों के जवाब सचाई से नहीं दिए जाते तरूणबाबू, नंदिता अय्यर जैसियों को तो बिलकुल भी नहीं, और आपने कंपनी का लोगो छाप कर सीक्रेट ख़त्म कर दिया. आलोचना तो होनी ही थी. वैसे भी कपड़े का नौ वार लम्बा यह टुकड़ा भारतीयों को इस कदर लुभाता है कि हम पदकों से ज़्यादा खिलाड़ियों की साड़ी के बारे में चिंतित होते हैं, गोया कि स्टेडियम का रेसिंग ट्रेक न हो, फैशन शो का रैम्प हो. ओलंपिक तो 11 अगस्त को ख़त्म हो जाएगा, साड़ी पसंद करवाने के काम में रिस्क तो ताउम्र बनी रहेगी. आप नज़र पदक पर रखिए, अपन साड़ी विवाद पर रखते हैं.

-x-x-x-

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares