(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघु व्यंग्य – ‘उधार के रिश्ते’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०७ ☆
☆ लघु व्यंग्य ☆ उधार के रिश्ते ☆
‘किराने का सामान कहां से लेते हो?’
‘सुल्तान किराना स्टोर से।’
‘उसकी दूकान से मत लो। वह दूसरे धरम का है। गुरूजी ने इन लोगों की दूकान का सामान लेने से मना किया है।’
‘हमें नहीं मालूम। कभी उसका धरम पूछा नहीं। आदमी ठीक है।’
‘तो क्या गुरूजी की बात नहीं मानोगे?’
‘मान लेंगे। फिर सामान कहां से खरीदें?’
‘हमारी दूकान से खरीदो। एकदम खालिस माल मिलेगा। दाम भी सही।’
‘ठीक है, लेकिन उसके यहां हमारा उधार चलता है। कभी टोकता नहीं। तुम्हारे यहां चलेगा क्या?’
‘ना भइया, अपने यहां उधार वुधार नहीं चलता। तुम उसी दूकान से खरीदो। ये गुरू लोग तो फालतू बरगलाते रहते हैं। इनके फेर में मत पड़ो।’
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “बुरा जो देखन मैं चला ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७७ ☆
व्यंग्य – बुरा जो देखन मैं चला श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कबीर दास जी ने कहा था ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’ सीधा सा अर्थ है कि दुनिया में बुराई ढूंढने निकलोगे तो शायद ही मिले, लेकिन अगर अपने अंदर झांकोगे तो पाओगे कि सबसे बड़ी बुराई तो हमारे भीतर ही विद्यमान है। पर आज का मनुष्य इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं। वह दुनिया को कोसता है, व्यवस्था को गाली देता है, पर अपने अंदर झाँककर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।
श्रीमान सच्चिदानंद जी की आईने की दुकान सूनी पड़ी थी, जबकि ठीक सामने, ‘मॉडर्न मुखौटा एम्पोरियम’ में भीड़ ही भीड़ है ।
एक दिन मैं सच्चिदानंद जी से मिलने पहुँचा। दुकान के अंदर अलग अलग आकार प्रकार के आईने लटके हुए थे, जिन पर धूल की हल्की परत जम गई थी। सच्चिदानंद जी चश्मे के पीछे से किसी किताब का अध्ययन कर रहे थे, दुनिया की इस भीड़-भाड़ से कोसों दूर वे खुद से साक्षात्कार कर रहे थे।
मेरे पूछने पर कि व्यवसाय कैसा चल रहा है, उन्होंने गहरी सांस ली और एक तीखी, परन्तु शांत मुस्कान के साथ बोले, “आजकल लोगों को अपना चेहरा देखने से डर लगता है। वे आईने में नहीं, सेल्फी तक ‘फिल्टर’ में देखने के आदी हो गए हैं।”
सामने वाली दुकान में तरह-तरह के मुखौटे सजे थे। ‘सेल्फी-रेडी स्माइल’ वाला मुखौटा सबसे ज्यादा बिक रहा था, जो हमेशा एक जैसी, बिना दिल की चमकती हुई हंसी दिखाता। फिर था ‘सोशल मीडिया संजीदगी’ का मुखौटा, जिसे पहनकर लोग दुनिया को ज्ञान बाँटते नज़र आते, भले ही अंदर से खोखले हों। ‘कार्यालयीन कर्मयोगी’ का मुखौटा, ‘शादी-पार्टी में रिश्तेदारी का भाव’ वाला मुखौटा, और तो और छोटे-बड़े का भेद भाव हटाता मुस्कुराता मुखौटा भी खूब चलन में था। लोग बड़े चाव से अपने लिए वक्त जरूरत के हिसाब से उपयोग के लिए कई कई मुखौटे चुन रहे थे, उसे पहनते, देखते और संतुष्ट होकर ले जाते।
सच्चिदानंद जी ने बताया, “पहले लोग आते थे। आईने के सामने खड़े होते, अपने चेहरे पर पड़ रही झुर्रियों, आँखों के नीचे के काले घेरों, या फिर मन के भावों को निहारते। कभी शर्मिंदा होते, कभी खुश। अपने आप से मिलते, अपनी कमियाँ सुधारने का संकल्प लेते। अब तो लोग अपनी सच्चाई से ही भाग रहे हैं। असली चेहरा तो शायद याद ही नहीं रहता।”
यह विसंगति सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं है। यह तो हमारे सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन गई है। हम सुबह उठते ही मुखौटे पहनना शुरू कर देते हैं। ऑफिस जाते वक्त ‘आदर्श कर्मचारी’ का मुखौटा, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ वाला मुखौटा, दोस्तों के बीच ‘हैप्पी-गो-लकी’ का मुखौटा। हमने इतने मुखौटे ओढ़ लिए हैं कि असली चेहरा कौन सा था, यह भूल रहे हैं। आईना दिखाने वाले को हम दुश्मन समझने लगते हैं, क्योंकि वह हमें हमारा वह रूप दिखा देता है, जिसे हमने कब का दफन कर दिया है।
खुद की सच्चाई से सामना सबसे डरावना काम है।
मुखौटों की इस दुकान ने एक नया धंधा खोल दिया है , ‘मुँह देखी बातों’ का। यहाँ हर मुखौटे के लिए एक प्री रिकॉर्डेड बातें भी हैं। ‘कैसे हो?’ के जवाब में ‘बढ़िया’ की रिकॉर्डिंग, ‘काम कैसा चल रहा है?’ के उत्तर में’ऑल इज वेल’ की आवाज। असलियत चाहे जो भी हो, मुखौटे और उसकी आवाज़ हमेशा लगभग एक जैसी रहती है। लोग इसी बनावटीपन में खुशी महसूस करते हैं। सच्चाई का सामना करने के लिए साहस चाहिए वह गुमशुदा है।
सच्चिदानंद जी की दुकान सूनी है, लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनका कहना है, “जिस दिन किसी का मुखौटा टूटेगा, जब उसे अपनी असलियत का अहसास होगा, तो वह जरूर यहाँ आएगा। शायद तब वह खुद से मिल पाएगा।”
आज भले समाज का यह सामान्य चरित्र बन गया है कि हम दिखावे की इमारत खड़ी करने में मशगूल हैं, जबकि भीतर से हम टूट रहे है। आईना हमें वास्तविकता से वाकिफ कर टूटने से बचा सकता है, लेकिन हमने तो मुखौटों के सहारे जीना सीख लिया है। सवाल यह है कि क्या हम कभी अपने वास्तविक चेहरे को देखने की हिम्मत जुटा पाएंगे? या फिर मुखौटों की यह भीड़ ही हमारी पहचान बनकर रह जाएगी? शायद, जब तक हम कबीर की उक्ति को अपने ऊपर लागू नहीं करेंगे, तब तक हम सच्चिदानंद जी की दुकान तक नहीं पहुँच पाएंगे। और तब तक, मुखौटे की दुकान की भीड़ बढ़ती ही जाएगी।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२४ ☆
☆ व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)
जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।
वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।
मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।
उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।
मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।
मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।
जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?
यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।
तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।
तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि जूता नाइकी, रीबोक, बाटा या अडीडास का है। मकसद सिर्फ एक है पाँवों की रक्षा करना। झाड़ झंखाड़ , काँटे, तपती रेत कीचड़,आदि से अलिप्त रखना।फिर वह मखमली, हीरेमोती जड़ित, चमड़े प्लास्टिक या कैनवास का साधारण कारीगर द्वारा बनाया गया भी हो सकता है। रूप रंग और कीमत में भेद हो सकता है।ये अलग बात है कि कुछ लोग रंगों से उलझते हैं , कुछ रूप में तो कुछ कीमत के अहंकार में।
जूता अपने निर्माता की मंशा जानता है।जूते का दर्द , मुकुट किरीट या ताज नहीं अनुभव कर सकता क्योंकि वह सिर पर सवार होकर हुकूमत का नशा महसूस करवाता है। जो संसार के हर नशे में अव्वल है।ये भी उतना ही सच है कि हर मुकुटधारी का काम जूते के बिना नहीं चल सकता।पाँव उसके भी होते हैं।तलुए उसके भी चोटिल हो सकते हैं।ये और बात है कि वह मखमली कालीन पर चलते हुए भी चुभन महसूस कर सकता है।तब भी उसे लाखों के जूते चाहिए।
जूता केवल वस्तु नहीं है।उसका भी दिल है।वह बेहद खुश था जब जैदी ने उसे जाॅर्ज बुश पर उछाला था।इराक में मचाए गये महानाश का प्रतिशोध फिर भी कम था।जूता तब बेहद गर्वित अनुभव कर रहा था,इराकी मजलूमों की आवाज़ बनकर।फेंकनेवाले की नीयत का पता था उसे।पहली बार खुद के बेशकीमती होने का एहसास हुआ था उसे।अपने निर्माता को मन ही मन धन्यवाद किया था उसने।
पर अब—-जूता उदास है, दुःखी है कि वह न्याय की आसंदी पर उछाला गया है।उसकी सिसकी हवाओं में घुल गयी है।इस गुजारिश के साथ कि कारीगरों ,शिल्पियों, शोषितों की आखिरी उम्मीद को सूली पर मत चढ़ाओ।
अजीब बात है।थोड़ा वक्त ही बीता है न्याय की देवी को आँखों पर चढ़ाई गयी काली पट्टी को हटाए हुये।उसके दिव्य ही नहीं चर्म चक्षु भी खुल गये हैं।हैरानी है , फिर भी वह पहले से बेहतर नहीं देख पा रही है।वह देखना नहीं चाहती या देखकर भी अनदेखा कर रही है।वैसे भी प्रतिमाओं में न दिल होता है, न धड़कन।
सर्वत्र फैले तमस ने दृष्टि को बाधा पहुँचाई है।ऐसे में आँखों का क्या कसूर ?दिन में चिरागों की जरूरत पड़ रही है।बचपन में पढ़ी हुई पंक्तियां बेसाख्ता याद आ रही हैं—मोरक्को के–
“इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में।
थोड़ी हवा नाक में घुस गयी
थोड़ी घुस गई कान में।।”
इसमें तूफान शब्द सांय सांय कर रहा है।हड़कंप मचा रहा है।
तूफान और जूते के संबंध और आदतों के बारे में कुछ भी छिपा हुआ तो नहीं है।तूफान शान्तिदूत बनकर तो आते नहीं।।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य ““मूड” की बीमारी”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 13 ☆
☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूड” की बीमारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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दुनिया के सभी डाक्टरों, वैद्यों, हकीमों, मनोवैज्ञानिकों और जादू – टोना जानने वालों से “मूड नामक बीमारी” से पीड़ित मुझ जैसे लाखों करोड़ों भाई – बहिनों का हाथ जोड़ कर निवेदन है कि वे जल्दी से जल्दी इस बीमारी का सस्ता और टिकाऊ इलाज ढूंढें। आज के युग में हृदय रोग और कैंसर की भांति “मूड” नामक बीमारी भी बड़ी तेज गति से फैलती हुई लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ रही है। इसके लिए लिंग और उम्र का बंधन नहीं है। बच्चे, जवान, बूढ़े सभी महिलाएं और पुरुष इसका शिकार हो रहे हैं। प्रेमी अथवा प्रेमिका के खराब मूड के कारण न जाने कितने प्रेमी जोड़े बिछुड़ के विरह गीत गाने लगते हैं तो अच्छा मूड लोगों को मिला भी देता है।
ख़िलाफ़-ए-मा’मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूं
फिर कभी मुझसे करते रहना ये भाव – ताव मुझे मनाओ
मजे की बात तो यह है कि मूड से जो पीड़ित हैं उन्हें तो नुकसान होता ही है, जो उनके संपर्क में आते हैं उन्हें भी नुकसान उठाना पड़ता है। घर के मुखिया का मूड खराब तो सारा घर परेशान, ऑफीसर का मूड खराब तो सारे कर्मचारी और यदि नेता का मूड खराब तो जनता परेशान। सब जानते हैं कि जनता का अच्छा/बुरा मूड यदि किसी को नेता बना देता है तो उसे गद्दी से उतार भी देता है। न जाने क्या बला है यह, कहां से आती है यह मूड की बीमारी और काम बनाकर अथवा बिगाड़ कर कहां चली जाती है।
कितनी भी कोशिश कर लो
खुश रहने की…..
मगर कोई न कोई कुछ कह कर…..
मूड ऑफ कर ही देता है…..
मूड नहीं है तो आफत, मूड है तो आफत, दोनों तरफ से आफत। यदि मूड है तो पता नहीं आदमी क्या कर डाले, यदि मूड नहीं है तो भी पता नहीं आदमी क्या कर डाले। आजकल बिना मूड के कोई कुछ करना ही नहीं चाहता। काम तभी होगा जब मूड होगा।
प्रश्न उठता है कि मूड कब होगा, कैसे होगा ? कुछ लोग भाग्यवादी होते हैं। ऐसे लोग उस समय तक के लिए काम बंद कर देते हैं जब तक “मूड” नहीं आता, जब भूले भटके कहीं से मूड आता है और ऐसे लोगों के दिमाग की सांकल खटखटाता है तब ये लोग काम करते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो भाग्यवादी नहीं कर्मवादी हैं। ऐसे लोग मूड के आने का रास्ता नहीं देखते बल्कि तरह – तरह के उपायों से मूड बनाने का प्रयत्न करते हैं। कोई गीत – संगीत सुनकर, कोई चाय – कॉफी, सिगरेट पीकर, तमाखू खाकर, कोई एकांत में, कोई भीड़ में, तो कोई किसी बार में 2/4 पैग पीकर अपना मूड बनाते हैं। किसी का मूड किसी व्यक्ति विशेष, अपने परिजनों अथवा अपने पड़ोसियों या अधीनस्थों को डांटने – फटकारने, चीखने – चिल्लाने से ठीक हो जाता है तो कुछ लोगों का उछल – कूद करता मूड किसी से अपमानित होकर, जूते खाकर ठीक हो जाता है। कुछ बेचारे ऐसे भी हैं जिन्हें हर मानसिक परिस्थिति में काम करना पड़ता है –
जिंदगी ऐसी गुजर रही है कि
मूड ऑफ़ होने पर भी…..
हंसना पड़ता है ताकि किसी….
को पता न चले…..!!
जी हां भाईयो, इस कठिन जीवन में तमाम अवरोधों और तनावों के बाद भी यदि आपका मूड अच्छा है तो आप भाग्यशाली हैं और यदि किसी कारण से आपका मूड खराब हो जाए तो अपनी मुख मुद्रा और वाणी से किसी को अपने खराब मूड का पता न लगने दें। सामने वाले को खुश और सामान्य दिखते हुए सहज व्यवहार करें। कहते हैं कि फायदा उठाने का मौका आने पर लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं। चापलूस और चमचों से सीखना चाहिए वे कितना अपमान सहकर लातें खाकर भी अपना मूड ठीक रखते हैं और काम के व्यक्ति की चरण वंदना जारी रख कर अपनी सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। हम और आप न जाने कितने ऐसे अयोग्य व्यक्तियों को जानते हैं जो अपने मूड को वश में करके शीर्ष पर पहुंच गए और इसके विपरीत न जाने कितने योग्य व्यक्ति मूड के वशीभूत होकर खाक में मिल गए। सावधान, यदि आप “मूड” के वश में आ गए तो नुकसान पक्का है और यदि “मूड” को वश में कर लिया तो सफलता की राह भी पक्की है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक व्यंग्य – “रावण के पुतले की शर्त” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७६ ☆
व्यंग्य – रावण के पुतले की शर्त श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
विजयादशमी की शाम थी, बस्ती बस्ती दशहरा मैदान, रामलीला ग्राउंड, स्टेडियम जैसे मैदानों में रावण, कुंभकरण, मेघनाथ के ऊंचे से ऊंचे पुतले खड़े थे। हर ऐसे तमाशे में बिना बुलाए भीड़ जुट ही जाती है। बच्चे गुब्बारों के लिए पिता से जिद कर रहे थे, चाट के ठेले के गिर्द महिलाओं की भीड़ थी। चाट वाला चुनावी बजट में वित्त मंत्री के प्रलोभन भरी घोषणाओं जैसी फुलकियां बांट रहा था। आसमान में बादल छाए थे और रामलीला मैदान में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले हेकड़ी और अकड़ के साथ खड़े थे। ज्यों ही मुख्य अतिथि ने रावण दहन की कोशिश की कहीं तेज बारिश ने उत्सव को भीगो दिया, तो कहीं हवा ने मंच उड़ा दिए लोग हैरान थे दियासलाई की तीलियां जल नहीं रही थी। किसी न किसी कारण से रावण जलने का नाम ही नहीं ले रहा था।
परेशान आयोजकों ने रावण को निहारा तो
रावण के पुतले से आवाज आई “मैं तो जलने को तैयार हूँ, हर साल जला तो लेते ही हो मुझे, पर इस बार मेरी एक छोटी सी शर्त है।
वह क्या? आयोजक पूछ बैठा।
रावण ने कहा मुझे तो स्वयं श्रीराम विद्वान मान चुके हैं, पता है न।
हां तो, आयोजक बोले।
मेरी शर्त यह है कि मुझमें आग वही लगाए जिसमें राम की सी मर्यादा का अंश तो हो!”
मेघनाथ का पुतला झनझनाया “हाँ, हमें जलाना है तो लक्ष्मण-सा कोई लक्षण तो दिखे जलाने वाले में!”
यह सुनकर मैदान में हलचल मच गई। एक नेता जी आगे बढ़े, जो हमेशा धर्म की बात करते थे। उन्होंने माचिस उठाई, रावण हँसा “अरे नेता जी, आपके भाषणों भर में राम हैं पर स्वयं तय कर लें यदि आपके काम में भी राम हो तो ही तीली जलाना।
वरना आग लगते ही मैं तुम पर गिर पड़ूंगा और मेरे पुतले की सारी आतिश बाजी तुम्हें समेट लेगी, नेताजी बगलें झांकते खिसक लिए। एक बड़ा कारोबारी सामने आया, उसने पुतले पर नोट उड़ाते हुए, आग लगाने की कोशिश की तो भी पुतला नहीं जला, नोटो के बंडल जरूर जल गए। रावण बोला अपने हर काम रुपए की ताकत से करवाने वाले अभिमानी सेठ, मैं तो कुबेर से उसका पुष्पक विमान छीन चुका हूं, तुम क्या मुझे काले रुपयों से आग लगाने की कोशिश कर रहे हो।
सारा दिन सोशल मीडिया पर धार्मिक पोस्ट करने वाला एक जेन जी पीढ़ी का नौजवान आगे बढ़कर रावण दहन को उद्यत हुआ पर उसकी माचिस भी काम नहीं आई, कुंभकरण उबासी लेते हुए बोला “तुम तो मुझसे भी बडे सोने वाले निकले, नौजवान तुम सोशल मीडिया के सपनों की गहरी नींद सो रहे हो।
तुम कुंभकरण सरकारों को आग लगाकर जगाना चाहते हो, असंभव है।
आयोजक गिड़गिड़ाए हे रावण आप तो असाधारण विद्वान हैं, स्वयं भगवान राम आपकी विद्वता का लोहा मानते हैं, हम निरीह आयोजक हैं जो साल दर साल राम लीला दोहराते हैं, हमारी लाज अब आपके हाथ है, आप साल दर साल जलते आए हैं, आप ही बताइए आप कैसे जलेंगे ?
रावण की आवाज गूँजी “आह, दिन पर दिन बुराइयों के लंबे, रंगीन रावण के पुतले तो बना लेते ही, पर अपने अंदर के अहंकार के रावण को पनपने देते हो। बिजली की चकाचौंध और आतिशबाजी में तो लाखों रुपए उड़ा देते हैं, पर पड़ोसी की मदद के लिए समय नहीं निकाल पाते। विजयादशमी का असली अर्थ है बुराइयों पर विजय! अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को नहीं जलाओ, पुतले वाले बाहरी रावण का दहन तो सहज रस्म मात्र है। वास्तविक विजय तो तब होगी जब राम हमारे व्यवहार में दिखेंगे, सिर्फ मुखौटों में नहीं। नीलकंठ के दर्शन की दार्शनिकता समझो। जब लक्ष्मण का संयम और समर्पण हमारे व्यवहार में झलकेगा, मर्यादा हमारे चरित्र का हिस्सा बनेगी, तभी रावण दहन सार्थक होगा। विजयादशमी का पर्व ऐसा तमाशा बनकर न रह जाए जहाँ रावण जलने से पहले हमारी नैतिकता जलती नजर आती है। आखिर आयोजकों ने प्रतिकूल मौसम के बावजूद किसी तरह कपूर आदि तेज ज्वलनशील पदार्थों से किसी तरह रावण दहन कर ही डाला, एक और साल सार्वजनिक रामलीला पूरी हुई।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना वीज़ा का चक्कर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६६ – वीज़ा का चक्कर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
वह सुबह कुछ अलग थी। सूरज ने जैसे तय कर लिया था कि आज वह अमेरिका के कॉर्पोरेट टावरों पर नहीं, भारत के वीज़ा एप्लिकेशन फॉर्म पर चमकेगा। श्रीमान चिराग वर्मा, जो पिछले तीन साल से न्यू जर्सी की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में “टेक्निकल एसेट” की तरह काम कर रहे थे, आज अपने बॉस के केबिन में बुलाए गए थे। बॉस का नाम था मिस्टर ग्रेग थॉर्न—चेहरा ऐसा जैसे नैतिकता को पेंशन पर भेज चुका हो।
“चिराग, हमें तुमसे एक बात करनी है,” ग्रेग ने कहा, जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन से पहले मरीज को बताता है कि एनेस्थीसिया महंगा है।
चिराग ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान वीज़ा की शर्तों में अटक गई।
“तुमने उस ट्वीट को देखा?” ग्रेग ने पूछा।
“जी सर, देखा,” चिराग ने कहा, जैसे कोई छात्र परीक्षा में वही सवाल देखता है जो उसने नहीं पढ़ा।
“तो तुम्हें क्या लगता है?” ग्रेग बोले।
“सर, मुझे लगता है कि पीड़िता की बात सुननी चाहिए,” चिराग ने कहा।
ग्रेग ने खिड़की की ओर देखा, जैसे नैतिकता बाहर खड़ी हो और अंदर आने की इजाज़त मांग रही हो।
“देखो चिराग, हम एक कंपनी हैं। हमें टैलेंट चाहिए, ट्रायल नहीं,” ग्रेग बोले।
“लेकिन सर, कोर्ट ने उसे दोषी माना है,” चिराग ने कहा।
“कोर्ट? कोर्ट तो कानून देखता है, हम तो प्रॉफिट,” ग्रेग ने कहा, और पानी का गिलास उठाया।
चिराग चुप रहा। उसकी चुप्पी में वीज़ा की वैधता, नैतिकता की असहमति और नौकरी की मजबूरी एक साथ बैठी थीं।
“तुम्हें समझना चाहिए, चिराग, कि हम सबको साथ लेकर चलते हैं। चाहे वह आरोपी हो या एच-1बी वीज़ा धारक,” ग्रेग ने कहा।
“सर, अगर पीड़िता मेरी बहन होती?” चिराग ने पूछा।
ग्रेग ने गिलास को होंठों से लगाया, जैसे कोई नेता सवाल सुनकर पानी पीने लगता है।
खांसी उठी। नाक से पानी निकला। मगर जवाब नहीं निकला।
“देखो चिराग, तुम इमोशनल हो रहे हो। ये कॉर्पोरेट है, यहाँ इमोशन नहीं, एक्सेल शीट चलती है,” ग्रेग बोले।
“सर, मुझे लगता है कि हम नैतिक रूप से गलत कर रहे हैं,” चिराग ने कहा।
“नैतिकता? वो तो छुट्टी पर है। और तुम भी चले जाओगे अगर ज्यादा बोले,” ग्रेग ने कहा, और मुस्कुराया।
चिराग ने सोचा, क्या यही वह देश है जहाँ सपनों को बुलाया जाता है, और फिर उन्हें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में बाँध दिया जाता है?
बाहर बारिश शुरू हो गई थी। जैसे नैतिकता रो रही हो।
चिराग ने अपना लैपटॉप बंद किया, जैसे कोई उम्मीद का दरवाज़ा बंद करता है।
“सर, मैं इस्तीफा देना चाहता हूँ,” चिराग ने कहा।
ग्रेग ने चौंक कर देखा, जैसे कोई बैंक मैनेजर देखे कि ग्राहक ने लोन चुकता कर दिया।
“तुम्हें पता है, तुम्हारा वीज़ा इसी कंपनी से जुड़ा है?” ग्रेग ने कहा।
“जी सर, पता है। लेकिन अब आत्मा को भी तो कहीं जुड़ना चाहिए,” चिराग ने कहा।
ग्रेग चुप रहा। पहली बार उसकी चुप्पी में हार थी।
चिराग बाहर निकला। बारिश तेज़ हो गई थी। मगर अब वह भीगने से नहीं डर रहा था।
उसने सोचा, शायद अब कोई नया सूरज उगेगा—जो वीज़ा नहीं, विवेक देगा।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना चोरों की महिमा अनंत।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६५ – चोरों की महिमा अनंत☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
एक शहर का किस्सा है। वहीं की एक स्कूल टीचर ने अपनी नवीं क्लास के बच्चों को होमवर्क दिया—”कल चोरी पर निबंध लिखकर लाना।” अब बच्चे सोच में पड़ गए। कोई सोच रहा था “चोरी पाप है”, कोई “चोरी से समाज मिटता है” लिखने वाला था। लेकिन क्लास का एक लड़का था—वो चालाक भी था और जरा-सा परसाई जी का ‘प्रश्नों का उत्तर अपने हिसाब से देना’ वाला वायरस भी उसमें घुसा था। उसने कलम उठायी और तय कर लिया—“सब तो चोरी को गाली देंगे, मैं चोरी की आरती गाऊँगा।”
दूसरे दिन जब बच्चे कॉपी लेकर पहुँचे तो वही लड़का सीना तानकर खड़ा हो गया—“मैडम, मैं अपना निबंध पढ़ना चाहता हूँ।” मैडम ने कहा, “हाँ बेटा, सुनाओ।” और फिर पूरे क्लासरूम में ऐसा निबंध गूँजने लगा कि खिड़की पर बैठे कौए भी ताली पीटने लगे।
उसने शुरू किया: “चोर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। चोर अगर न हों तो देश का आधा उद्योग बंद पड़ जाए।” मैडम का मुँह खुला का खुला रह गया। बच्चों ने सोचा ये तो फँस गया—मैडम ज़बरदस्त डाँट लगाएंगी। मगर लड़के ने आगे जो तर्क दिए, सुनकर सबकी हँसी छूट गई। “सोचिए मैडम, अगर चोर न होते, तो ताले कौन बनाता? तिजोरियाँ किसके लिए बनतीं? गरीब लोहार भूख से मर जाते। गोडरेज जैसा ब्रांड तो पैदा ही नहीं होता।” क्लास तालियाँ पीटने लगी।
वो रुका नहीं। बोला—“और मकान निर्माण उद्योग देखिए। चोरों ने ही मज़दूरों को रोजगार दिया है। वर्ना कौन इतनी ऊँची-ऊँची दीवारें बनवाता? कौन अपने घर की खिड़कियों पर लोहे की सलाखें लगवाता? काँटेदार तार की फैक्ट्री चल रही है तो चोरों का ही आशीर्वाद है। चोर ही असली ‘रोजगार मेला’ आयोजित करते रहते हैं।”
मैडम अब हँसते-हँसते सोच रही थीं—”ये बच्चा निबंध नहीं, अर्थशास्त्र का नया पाठ पढ़ा रहा है।” बच्चा और धारदार हुआ। बोला—“मैडम, चौकीदार और पुलिस वालों की नौकरी भी चोरों पर ही टिकी है। अगर चोरी बंद हो जाए तो चौकीदार कहेगा—भाड़ में जाओ, मैं क्यों रात भर ‘जागते रहो’ चिल्लाऊँ? पुलिसवाले पूरे दिन थाने में ऊंघते रहेंगे, और उनकी साइड इनकम भी छिन जाएगी। दरअसल, चोर ही हैं जिनके कारण पुलिस की डंडी अब तक सीधी खड़ी है।”
क्लास फिर हँस पड़ी। कुछ बच्चों ने तो नारा लगा दिया—”चोरों की जय!”
मैडम ने आँखें तरेरीं—“चुप रहो, पढ़ने दो।” लड़का बोला—“अब देखिए तकनीक। चोर अगर न हों तो सीसीटीवी कैमरे कौन लगाए? मेटल डिटेक्टर कौन खरीदे? बर्गलर अलार्म कौन बजाए? सारा सिक्योरिटी इंडस्ट्री चोरों की कृपा पर पल रहा है। पिछले साल हमारे मोहल्ले में चोरी हुई थी, नतीजा ये निकला कि पच्चीस घरों ने सीसीटीवी लगवा लिया। इसने करोड़ों का बिज़नेस खड़ा कर दिया। मतलब साफ है—भारत में टेक्नोलॉजी मिशन असल में चोरों के बिना चल ही नहीं सकता।”
मैडम अपना माथा पीटने लगीं, पर हँसी रोक भी नहीं पा रही थीं। अब बारी थी हथियार उद्योग की। लड़का बोला—“मैडम, पहले आदमी हल पकड़े खेत जोतता था। अब उसी हल चलाने वाले किसान के पास लाइसेंस वाली बंदूक है। क्यों? क्योंकि पास वाले गाँव में चोरी हुई थी। गन-बुलेट का बिज़नेस भी चोर ही चला रहे हैं। उनके बिना तो ये कंपनियाँ बंद हो जातीं। चोर दरअसल सुरक्षा-उद्योग के लिए वही हैं जो गाय दूध उद्योग के लिए है—लगातार सप्लाई…”
क्लास बेतहाशा हँसने लगी। मैडम ने चिलाते हुए कहा—“बैठो चुपचाप।” मगर उनके होंठ भी मुस्करा रहे थे। लड़का हठी था। बोला—“मैडम, न्यायालय तो चोरों की कृपा पर पल रहे हैं। अरे अगर चोर न हों तो जज लोग किसे सज़ा देंगे? वकील किसके लिए बहस करेंगे? कोर्ट-चपरासी किसकी फाइल उठाएगा? चोरी पर आधा-कानून विभाग टिका हुआ है। और चैनल वालों को देखिए—एक चोर पकड़ा जाओ तो ब्रेकिंग न्यूज़ दो दिन चलेगी। फिर वही चोर भाग जाए तो फिर दो दिन। यही टीवी की टीआरपी का असली मंत्र है। चोर असल में लोकतंत्र के भी न्यूज़-मेकर हैं।”
अब पूरी क्लास लोट-पोट हो रही थी। मैडम बोलीं—“तुम तो पूरे पत्रकार लगते हो।” आखिरी वार करते हुए उसने कहा—“मैडम, सेकंड-हैंड मार्केट भी चोरों की देन है। चोरी हुए मोबाइल, लैपटॉप, साइकिल—यही तो नया व्यापार चलाते हैं। इंश्योरेंस कंपनियों की तो दाल रोटी चोर ही पकाते हैं। यानी, अर्थव्यवस्था के हर पायदान पर चोर खड़े हैं। बिना चोरों के देश की जीडीपी गिरकर ज़मीन में धँस जाए। इस नजर से देखें तो चोर असल में राष्ट्र निर्माता हैं। हमें तो इन्हें ‘पद्म भूषण’ देना चाहिए।”
पूरा क्लास तालियाँ ठोक रहा था। मैडम दुविधा में थीं—”मार्क्स दूँ या इस बच्चे की कॉपी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय भेज दूँ।” टीचर ने कॉपी बंद कर दी और बोलीं—“बेटा, तेरे निबंध में व्यंग्य का स्वाद है। तू सच्चाई को घुमा-फिराकर कहता है, लेकिन काटता गहरा है। तू झूठ सच में, और सच झूठ की शक्ल में दिखाता है। यही असली साहित्य है। जा, पूरे सौ में सौ नंबर।” और पूरी क्लास चिल्ला उठी—
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बुरा जो देखन मैं चला” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७४ ☆
व्यंग्य – बुरा जो देखन मैं चला श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कबीर दास जी ने कहा था ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’ सीधा सा अर्थ है कि दुनिया में बुराई ढूंढने निकलोगे तो शायद ही मिले, लेकिन अगर अपने अंदर झांकोगे तो पाओगे कि सबसे बड़ी बुराई तो हमारे भीतर ही विद्यमान है। पर आज का मनुष्य इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं। वह दुनिया को कोसता है, व्यवस्था को गाली देता है, पर अपने अंदर झाँककर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।
श्रीमान सच्चिदानंद जी की आईने की दुकान सूनी पड़ी थी, जबकि ठीक सामने, ‘मॉडर्न मुखौटा एम्पोरियम’ में भीड़ ही भीड़ है ।
एक दिन मैं सच्चिदानंद जी से मिलने पहुँचा। दुकान के अंदर अलग अलग आकार प्रकार के आईने लटके हुए थे, जिन पर धूल की हल्की परत जम गई थी। सच्चिदानंद जी चश्मे के पीछे से किसी किताब का अध्ययन कर रहे थे, दुनिया की इस भीड़-भाड़ से कोसों दूर वे खुद से साक्षात्कार कर रहे थे।
मेरे पूछने पर कि व्यवसाय कैसा चल रहा है, उन्होंने गहरी सांस ली और एक तीखी, परन्तु शांत मुस्कान के साथ बोले, “आजकल लोगों को अपना चेहरा देखने से डर लगता है। वे आईने में नहीं, सेल्फी तक ‘फिल्टर’ में देखने के आदी हो गए हैं।”
सामने वाली दुकान में तरह-तरह के मुखौटे सजे थे। ‘सेल्फी-रेडी स्माइल’ वाला मुखौटा सबसे ज्यादा बिक रहा था, जो हमेशा एक जैसी, बिना दिल की चमकती हुई हंसी दिखाता। फिर था ‘सोशल मीडिया संजीदगी’ का मुखौटा, जिसे पहनकर लोग दुनिया को ज्ञान बाँटते नज़र आते, भले ही अंदर से खोखले हों। ‘कार्यालयीन कर्मयोगी’ का मुखौटा, ‘शादी-पार्टी में रिश्तेदारी का भाव’ वाला मुखौटा, और तो और छोटे-बड़े का भेद भाव हटाता मुस्कुराता मुखौटा भी खूब चलन में था। लोग बड़े चाव से अपने लिए वक्त जरूरत के हिसाब से उपयोग के लिए कई कई मुखौटे चुन रहे थे, उसे पहनते, देखते और संतुष्ट होकर ले जाते।
सच्चिदानंद जी ने बताया, “पहले लोग आते थे। आईने के सामने खड़े होते, अपने चेहरे पर पड़ रही झुर्रियों, आँखों के नीचे के काले घेरों, या फिर मन के भावों को निहारते। कभी शर्मिंदा होते, कभी खुश। अपने आप से मिलते, अपनी कमियाँ सुधारने का संकल्प लेते। अब तो लोग अपनी सच्चाई से ही भाग रहे हैं। असली चेहरा तो शायद याद ही नहीं रहता।”
यह विसंगति सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं है। यह तो हमारे सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन गई है। हम सुबह उठते ही मुखौटे पहनना शुरू कर देते हैं। ऑफिस जाते वक्त ‘आदर्श कर्मचारी’ का मुखौटा, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ वाला मुखौटा, दोस्तों के बीच ‘हैप्पी-गो-लकी’ का मुखौटा। हमने इतने मुखौटे ओढ़ लिए हैं कि असली चेहरा कौन सा था, यह भूल रहे हैं। आईना दिखाने वाले को हम दुश्मन समझने लगते हैं, क्योंकि वह हमें हमारा वह रूप दिखा देता है, जिसे हमने कब का दफन कर दिया है।
खुद की सच्चाई से सामना सबसे डरावना काम है।
मुखौटों की इस दुकान ने एक नया धंधा खोल दिया है , ‘मुँह देखी बातों’ का। यहाँ हर मुखौटे के लिए एक प्री रिकॉर्डेड बातें भी हैं। ‘कैसे हो?’ के जवाब में ‘बढ़िया’ की रिकॉर्डिंग, ‘काम कैसा चल रहा है?’ के उत्तर में’ऑल इज वेल’ की आवाज। असलियत चाहे जो भी हो, मुखौटे और उसकी आवाज़ हमेशा लगभग एक जैसी रहती है। लोग इसी बनावटीपन में खुशी महसूस करते हैं। सच्चाई का सामना करने के लिए साहस चाहिए वह गुमशुदा है।
सच्चिदानंद जी की दुकान सूनी है, लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनका कहना है, “जिस दिन किसी का मुखौटा टूटेगा, जब उसे अपनी असलियत का अहसास होगा, तो वह जरूर यहाँ आएगा। शायद तब वह खुद से मिल पाएगा।”
आज भले समाज का यह सामान्य चरित्र बन गया है कि हम दिखावे की इमारत खड़ी करने में मशगूल हैं, जबकि भीतर से हम टूट रहे है। आईना हमें वास्तविकता से वाकिफ कर टूटने से बचा सकता है, लेकिन हमने तो मुखौटों के सहारे जीना सीख लिया है। सवाल यह है कि क्या हम कभी अपने वास्तविक चेहरे को देखने की हिम्मत जुटा पाएंगे? या फिर मुखौटों की यह भीड़ ही हमारी पहचान बनकर रह जाएगी? शायद, जब तक हम कबीर की उक्ति को अपने ऊपर लागू नहीं करेंगे, तब तक हम सच्चिदानंद जी की दुकान तक नहीं पहुँच पाएंगे। और तब तक, मुखौटे की दुकान की भीड़ बढ़ती ही जाएगी।
(सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री धर्मपाल जी का जन्म रानापुर, झाबुआ में हुआ। वे अब कैनेडियन नागरिक हैं। प्रकाशन : “गणतंत्र के तोते”, “चयनित व्यंग्य रचनाएँ”, “डॉलर का नोट”, “भीड़ और भेड़िए”, “इमोजी की मौज में” “दिमाग वालो सावधान” एवं “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” (7 व्यंग्य संकलन) एवं Friday Evening, “अधलिखे पन्ने”, “कुछ सम कुछ विषम”, “इस समय तक” (4 कविता संकलन) प्रकाशित। तीस से अधिक साझा संकलनों में सहभागिता। स्तंभ लेखन : चाणक्य वार्ता (पाक्षिक), सेतु (मासिक), विश्वगाथा व विश्वा में स्तंभ लेखन। नवनीत, वागर्थ, दोआबा, पाखी, पक्षधर, पहल, व्यंग्य यात्रा, लहक, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती आदि में रचनाएँ प्रकाशित। श्री धर्मपाल जी के ही शब्दों में “अराजकता, अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता का विरोध प्रकट करने का प्रभावी माध्यम है- व्यंग्य लेखन।” आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य खिसियानी बिल्ली जूता नोचे।)
☆ व्यंग्य – खिसियानी बिल्ली जूता नोचे ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆
भगवान किस रूप में कहाँ आते हैं, कब आते हैं और वहाँ क्या छोड़ जाते हैं, कौन जान सकता है! उनकी लीला आरपार है, वे ही जानें। दशरथ पुत्र भरत उनकी पादुकाएँ उठा लाए थे तो वे संसार सागर से तिर गए थे। बस इसी आशा में मैं नई चरण पादुकाएँ उठा लाता हूँ, और अपनी जीर्ण-शीर्ण पादुकाओं को वहाँ सेवानिवृत्त कर आता हूँ।
अब जो पादुकाएँ मिलती हैं वे काष्ठ की नहीं होतीं, चाम्र की होती हैं। वे भले अपवित्र हों पर चमकदार होती हैं। माल चमकदार हो तो उसकी पवित्रता कौन देखता है। भगवन् पादुकाओं को पॉलिश करवा-करवा कर इतना भव्य रखते हैं कि मेरी एक नज़र उन पर पड़ती है तो फिर नहीं उठती। मैं अपने पाँवों में चरण पादुकाएँ धारण करने के बाद ही नज़र उठा पाता हूँ, ताकि मैं यह सुनिश्चित कर सकूँ कि जो प्रसाद मैंने ग्रहण किया है, उस पर किसी और की नज़र तो नहीं है। यदाकदा ही ऐसा होता है कि उन मनभावन पादुकाओं को और कोई क्लेम करने आता हो। पर कोई आ भी जाए तो मैं जी भर कर हँसता हूँ। कहता हूँ ‘सॉरी सर’। धन्य हो अंग्रेज़, हमें सॉरी कहना सिखा गए। अन्यथा ऐसे मौकों पर खिसियानी बिल्ली को जूता नोचना पड़ता।
नई चरण पादुकाएँ पहन कर प्रभु निवास पर जाना मुझे नहीं सुहाता। पिछले सप्ताह जब अपने नए ‘हश पपीज़’ जूते पहन मैं प्रभु दर्शन को पहुँचा तो मैंने दायाँ जूता पूर्व दिशा में और बायाँ जूता पश्चिम दिशा में खोला। ताकि किसी दर्शनार्थी का मन नए जूते पर डोल भी जाए तो उसे दूसरा जूता सहज सुलभ नहीं हो। यद्यपि यह तरकीब काम कर गई, जूते यथास्थान ही रहे पर प्रभुदर्शन में मेरा चित्त न लगा। बार-बार मेरा चित्त प्रवेश द्वार के पूर्व और पश्चिमी कोनों में भटकता रहा। प्रभु ने पूछा भी, वत्स क्या बात है आज तुम व्यथित हो, कुछ माँग नहीं रहे? मैं इतना ही कह पाया – प्रभु मेरे नए जूतों का ध्यान रखना। प्रभु हँस कर चले गए। मैंने मूर्खतावश ऐसा दुर्लभ अवसर जूतों की रक्षा में गवाँ दिया। तब मैं प्रभु से जूतों का भरा-पूरा स्टोर भी माँग लेता तो प्रभु तथास्तु कह देते। बाबा को जब यह वाकया बताया तो वे बहुत खिन्न हुए। उपदेश देने लगे, ‘बेटे तुम्हें स्वर्ग मिल सकता था, तुम जूतों की रखवाली में यह जनम गवाँ आए मूर्ख।’ अब कोई मैं अकेला मूर्ख तो हूँ नहीं जो जूतों के चक्कर में स्वर्ग गवाँ रहा हूँ। उस दिन के बाद से मैं कभी नए जूते पहन कर प्रभु दर्शन के लिए नहीं गया, न प्रभु वहाँ आए। प्रभु बड़े नटखट हैं, भक्तों की कैसी परीक्षा लेते हैं! नए जूतों में मन रमा था तो आशीर्वाद देने प्रकट हो गए। अब उनसे मिलने जाते-जाते जूते घिस गए हैं, वे प्रकट ही नहीं होते।
जूतों के चक्कर में मैंने प्रभु को खो दिया तब से जूतों से वितृष्णा हो गई है। अब घर से बिना जूते पहने प्रभुदर्शन को जाता हूँ। रुआँसा घर लौटता हूँ तो ध्यान कहीं और होता है। घर आ कर पता लगता है कि मैं नंगे पाँव गया था, ढँके पाँव आया हूँ। घर में समान नंबर के जूतों का स्टोर बन रहा है, सब प्रभु की माया है। प्रभु मैं तो पुण्य कमाने आ रहा था, जूते कमा रहा हूँ। बाबा पूछते हैं कितनी पनौती इकट्ठी करेगा? जिसे मैं प्रभु प्रसाद समझ रहा था वह पनौती कैसे हो गई?
आज लौट रहा था तो एक सज्जन ने पूछा, “बड़े अच्छे जूते हैं, कहाँ से ख़रीदे?”
“यहीं से लिए थे।”
“ये तो मेरे जूते हैं।”
“आप ले लीजिये।”
“फिर आप क्या करेंगे?”
“मैं खाली हाथ आया था, खाली पैर चला जाऊँगा।”
मैंने एक वाक्य में उन्हें सारा जीवन दर्शन समझा दिया।
नई चरण पादुकाओं ने मुझे हमेशा धर्म संकट में डाला है। मुझे याद है, मेरे पाँवों में नए जूते थे, विवाह वेदी पर बैठने के लिए जूते खोलने थे। प्रियतमा वरमाला लिए खड़ी थीं पर मेरा सारा ध्यान जूतों पर ही था। जूते खोलूँ तो लूट जाऊँ, न खोलूँ तो कुआँरा रह जाऊँ। जूतों के चक्कर में सर्वप्रिय सलोनी सालियाँ खूँखार शेरनियाँ लग रही थीं। उनकी हँसी ने मेरे दिल को और उनकी तीखी निगाहों ने मेरे नए जूतों को छलनी-छलनी कर दिया था। मैंने सोचा भी दुल्हन को जाने दूँ, अपनी इज्ज़त, जूतों को बचा लूँ। भला हो बाबा का, मेरी दुविधा ताड़ गए और जूते उतरवा दिए। अन्यथा पहले भगवान गवाएँ थे, अब दुल्हन को गवाँ देता।
जैसे ऑफिस में घुसते ही बॉस अपनी कुर्सी पर बिराज जाते हैं, घर में घुसते ही जूते अपना नियत स्थान सम्हाल लेते हैं। पहली फुरसत में आदमी उन्हें कीचड़-माटी रहित कर, पुनः पॉलिश से चमका देता है। मुख और मन मलिन हो तो कुछ नहीं, जूते और बाल चमचमाते रहना चाहिए।
हमारे गाँव और शहर के बीच एक नदी है। प्रभु की जटा से जितनी सिमटी गंगा निकलती है, उसकी धारा यहाँ वैसी ही पतली है। पर नदी का पाट सरकारी आश्वासनों जैसा चौड़ा है। गर्मी में जब पानी चाहिए नदी सूखी पड़ी होती है। झमाझम बारिश में जब चारों तरफ पानी ही पानी होता है, नदी भी पूरे आवेग में बहती है। बाढ़ में पुलिया बहा ले जाती है। ग्रामवासी अपनी चरण पादुकाएँ सिर पर रख या दिल से लगा कर नदी पार कर रहे होते हैं। तब भी आदमी को ख़ुद से ज़्यादा अपनी चरण पादुकाओं का ध्यान रहता है।
चरण अब पादुकाओं में बंद रहते हैं। आशीर्वाद की ज़रूरत में मैं बड़े-बूढ़ों के चरण स्पर्श करना चाहता हूँ तो उनकी पादुकाएँ ही दिखती हैं। आशीर्वाद की जगह जूते ही मिलते हैं। लगता है जूते मिलने की परम्परा हमारी संस्कृति से जुडी है। मेरे कवि मित्र बिना बुलाए ही कवि सम्मेलनों में नंगे पाँव जाते हैं। बिना मानदेय के जाते हैं और जब लौटते हैं तो जूतों की चार-छः जोड़ियाँ उपहार में ले कर आते हैं। उपहार का उपहास करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। उनका मानना है कि प्रसिद्ध व्यक्तियों को ही जूते पड़ते हैं। वे बताने लगे, “पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने जॉर्ज बुश के ऊपर जूता दे मारा, पहला निशाना चूका तो उसने दूसरा जूता भी दे मारा। दो जूते पा कर अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश दुनिया भर में इतने प्रसिद्ध हो गए कि कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, राष्ट्रपति ट्रम्प भी नहीं। पत्रकार की चर्चा तो कुछ महीनों में बंद हो गई पर जॉर्ज बुश जूते खाने के लिए अमर हो गए। याद रखें, जूते मारने वाले से जूते खाने वाला बड़ा होता है और उसे हमेशा याद रहता है कि उसे जूता पड़ा था।”
मुझे कवि मित्र की बात में दम लगा। दुनिया भर में लाखों व्यंग्यकार रोज ही तमाम विसंगतियों तथा कुप्रवृत्तियों पर तंज कसते हैं। देर रात तक कॉमेडी शोज़ चलाते हैं। लोग व्यंग्य को भी हँस कर टाल देते हैं, इन सबका कोई गंभीर नोटिस नहीं लेता। व्यंग्यकार ने शाब्दिक जूतों की बजाय भौतिक जूते चलाए होते तो दुनिया अलग हो सकती थी।
कुछ भी हो, इन दिनों फटे-पुराने जूतों की माँग बढ़ गई है, बड़े चुनाव आने वाले हैं। विरोधियों को जूते की माला पहना कर सम्मानित करने के लिए फटे-पुराने जूते ही चाहिए। नए जूतों से सम्मान को गरिमा नहीं मिलती।
क्या कहा आपने, आपके जूते नहीं मिल रहे। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, मैं आता हूँ।
बुश दुनिया भर में इतने प्रसिद्ध हो गए कि कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, राष्ट्रपति ट्रम्प भी नहीं। पत्रकार की चर्चा तो कुछ महीनों में बंद हो गई पर जॉर्ज बुश जूते खाने के लिए अमर हो गए। याद रखें, जूते मारने वाले से जूते खाने वाला बड़ा होता है और उसे हमेशा याद रहता है कि उसे जूता पड़ा था।”
मुझे कवि मित्र की बात में दम लगा। दुनिया भर में लाखों व्यंग्यकार रोज ही तमाम विसंगतियों तथा कुप्रवृत्तियों पर तंज कसते हैं। देर रात तक कॉमेडी शोज़ चलाते हैं। लोग व्यंग्य को भी हँस कर टाल देते हैं, इन सबका कोई गंभीर नोटिस नहीं लेता। व्यंग्यकार ने शाब्दिक जूतों की बजाय भौतिक जूते चलाए होते तो दुनिया अलग हो सकती थी।
कुछ भी हो, इन दिनों फटे-पुराने जूतों की माँग बढ़ गई है, बड़े चुनाव आने वाले हैं। विरोधियों को जूते की माला पहना कर सम्मानित करने के लिए फटे-पुराने जूते ही चाहिए। नए जूतों से सम्मान को गरिमा नहीं मिलती।
क्या कहा आपने, आपके जूते नहीं मिल रहे। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, मैं आता हूँ।