हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२७ – व्यंग्य- बने रहो पगला – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य बने रहो पगला।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२७

☆ व्यंग्य – बने रहो पगला ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

“वह पागल है!” जैसे ही उसने कहा. मैं बोला, “भाई! इतना समझदार आदमी पागल कैसे हैं?” तब मेरे उसे मित्र ने मुझे ही पूछ लिया, “भाई! पागल किसे कहते हैं?”

मैं उसकी और यह प्रश्न समझ नहीं पाया. इसलिए मैंने पूछ लिया, “तू ही बता दे. पागल किसे कहते हैं?”

वह हंसा. तब मैंने जवाब दिया, “जो अपना काम ढंग से ना करें, वही पागल है.”

यह अचानक मेरे मुंह से निकल गया था. 

“यह तो बहुत अच्छी परिभाषा है. तभी हम व्यवहार में कह देते हैं. क्या तुझ से यह भी काम ठीक से नहीं होता है. क्या तू पागल है?”

इस तरह एक सामान्य व्यक्ति को पागल कहना पागल की तौहीन है. इसका आशय तो यह है कि आप पागल को पागल नहीं कह रहे हैं, एक सामान्य व्यक्ति को पागल कह रहे हैं जो बहुत ही समझदार हैं. तब पागल को क्या कहेंगे?

मेरे लिए बहुत ही गहन प्रश्न था. जिसका चिंतन मैं मन ही मन करता रहा. मगर पागल की परिभाषा मेरे समझ से परे थी. इसी उधेड़बुन में मैं बैठा था कि तभी वरिष्ठ कार्यालय से एक ‘अर्जेंट डॉक’ आ गई. क्योंकि मैं काम में व्यस्त था इसलिए एक सहकर्मी से कहा, “भाई साहब! यह डाक बना दीजिए. बहुत ही अर्जेंट है. अभी पहुंचाना है.”

बड़े साहब ने मेरा समर्थन किया. तब वह सहकर्मी बोला, “आप प्रारूप बना दीजिए. मैं डाक भर दूंगा.” यह सुनकर मैं एक बार झलाया. कैसा पागल है? साला! मैं इसे डाक बनाने की कह रहा हूं. और यह मुझे ही प्रारूप बनाने की कह रहा है. मगर साहब के आदेश देने पर मैंने उसे प्रारूप बना दिया.

उसने प्रारूप में जानकारी भरी. दो और तीन की जोड़ छह लिख दी. फिर मेरे सामने आकर बोला, “अरे भाई! गलती हो गई.” फिर दो-तीन साथ बोलते हुए छह को काटकर सात कर दिए.

उसकी यह हरकत देखकर मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ गया. मैंने कहा, “अरे भाई! यह क्या करते हो? दो और तीन पांच होते हैं.” मेरा यह जवाब सुनते उसने कहा, “अरे भाई! माफ करना. जल्दी में था. अभी दो और तीन पांच कर देता हूं.” और उसने वापस छह को काटकर पांच कर दिया.

पांच उसने इतनी बार काटा था कि वह नजर ही नहीं आ रहा था. वह छह, सात है या पांच है. इसी तरह उसने दूसरे कॉलम में भी बहुत कांटपिट की थी. यानी पूरा प्रारूप खराब कर दिया था.

यह देखकर वास्तव में मुझ में पागलपन का दौरा पड़ गया. मैं मन ही मन भड़क पड़ा, “साला! पागल! फोकट की तनख्वाह लेता है. एक अक्षर ठीक से लिखना नहीं आता. कामचोर कहानी का.”

मगर मैं प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोला. उससे कहा, “साहब के पास ले जाकर साइन करा दीजिए. तब उसने तपाक से जवाब दिया, “साहब के पास तो आप ही जाइए,” कहते हुए उसने कागज वहीं पटक दिया.

आखिर कागज साहब के पास मुझे ले जाना पड़ा. फिर वही हुआ जिसका मुझे अंदेशा था. साहब ने मुझे कागज दिखाते हुए कहा, “यह क्या है? यह कागज अधिकारी को भेजूंगा तो मुझे पागल समझेंगे. इसे दोबारा बनाओ.”

तब मेरे इस सहकर्मी ने कहा, “आप प्रारूप बना दीजिए. इस बार में अच्छी तरह भर दूंगा. मैंने दोबारा प्रारूप बनाकर उसे दिया. फिर उसने वही गलती दोहरा दीं. तब मजबूर होकर तीसरी बार मैंने प्रारूप बनाकर स्वयं ही भर दिया. मैं नहीं चाहता था कि चौथी बार मुझे प्रारूप बनाना पड़े.

इसके बाद मैंने सहकर्मी को कभी काम करने को नहीं कहा. क्योंकि मुझे पता था एक बार उससे काम कराया तो दोबारा मुझे ही करना पड़ेगा. इसलिए स्वयं ही काम करने में अपनी भलाई थी. ताकि एक बार में वह काम हो जाए.

मगर, वह वास्तव में वह पागल था या मुझे पागल बना रहा था. वह मुझे जल्दी ही पता चल गया. उसकी एक बस चलती थी. जिसमें वह सुबह शाम पैसे कलेक्ट किया करता था. उसी बस से मुझे एक बार गांव जाने पड़ा.

मैं बस में पीछे बैठा था. सहकर्मी कंडक्टर से एक सीट पर हिसाब लिख रहा था. तब उसकी गणित देखकर मैं दंग रह गया. यहां पर वह रूपए पैसे का हिसाब बिल्कुल एक्यूरेट लिख रहा था. चाहे जितना भी बड़ा अमाउंट हो, उससे वह गलत नहीं हो रहा था.”

यह देखकर मुझे बहुत ताजुब हुआ. वास्तव में वह पागल नहीं था. वह मुझे पागल बना रहा था. ताकि मैं पागल बनकर उसका और मेरा काम करता रहूं. तभी मुझे मालूम हुआ कि यह मंत्र कितना अच्छा है~ बने रहो पगला, काम करेगा अगला.

अब मुझे समझ आया था कि पागल बनने के कितने फायदे हैं. एक तो आपको काम नहीं करना पड़ता. दूसरा, एक ही काम को बार-बार करने से आप व्यस्त दिखते हो. लोगों को लगता है कि आप बहुत काम करते हो. आपके पास समय नहीं है. यदि आपसे काम करवाना है तो फुर्सत में मिलना पड़ेगा.

दूसरा, कोई व्यक्ति बेवजह आपके पास नहीं आता है. जिसको भी काम होगा वह आपको चाय की कैंटीन में ले जाएगा. साहब जी चाय पीकर आते हैं. आप बहुत काम कर रहे हो. इसलिए थोड़ा थक गए होंगे. थोड़ा आराम कर लीजिए.

तीसरा, काम करते हुए साहब भी आपको डिस्टर्ब करना पसंद नहीं करते हैं. वे सोचते हैं कि यह व्यक्ति तो काम करता रहता है. किसी दूसरे व्यक्ति को काम देना चाहिए. इसलिए उल्टा सीधा लिखने का, यह तीसरा सबसे बड़ा फायदा है.

चौथा फायदा मेरे मित्र ने बताया था. उसने कहा था, “यदि आपको सभी के बीच बहुत ही मेहनती और वर्कर बना रहना है तो आपको एक मंत्र अपनाना होगा.”

तब मैंने तपाक से पूछा, “आप भी बता दीजिए.”

तब उसने कहा कि वह मंत्र है कि काम की फिक्र करो. काम का जिक्र करो. बार-बार जोर-जोर से कहो. मगर काम मत करो.

यह फायदा सुनकर मेरे मुंह से निकल गया, “वाह मित्र! बहुत ही बेहतरीन नुस्खा बताया है. शायद मैं अमल में ला सकूं. इसकी कोशिश करूंगा.” मैंने यह अपनाने की कोशिश भी की. पर मेरा पागल मन इसे अपने को तैयार नहीं हुआ. वह कहने लगा तू इतना भी पागल नहीं है कि पागल बनने का ढोंग कर सके.

मगर, जब धीरे-धीरे मैंने अपने आसपास निगाहें दौड़ना शुरू किया तब मालूम हुआ कि इतने कामगारों की बीच में ही अकेला पागल हूं. जो अपना काम पूरे पागलपन से करता हूं. वे सब समझदार व बुद्धिमान लोग, मुझे हिकारत की नजर से देखते हैं.

मेरे एक तीसरे मित्र को देखा. वह अपने आसपास फाइलों का ढेर लगा लेता है. बीच में अपना कागज निकाल कर अपना निजी काम करता है. जब भी कोई साहब आए, झट से फाइल में लिखना शुरू कर देता है. तब अपना कागज नीचे दबा देता है.

मैं कई दिनों से उसे देख रहा था. तब मुझे लगा कि वास्तव में इस जैसा समझदार कोई नहीं है. तब मुझे एक नई परिभाषा सूझ गई. जो दूसरे को पागल बना दे वह सबसे बड़ा समझदार है. इस परिभाषा के मद्देनजर मैं ही  दूसरों को सबसे बड़ा पागल दिखाई दे रहा था.

मैं अभी यही सोच रहा था कि उसे सहकर्मी के पास एक व्यक्ति आकर सामने बैठ गया. उसने झट से उसकी तरफ देखा. वह कुछ बोलना चाहता था कि सहकर्मी ने रोक दिया. अभी एक मिनट रुक जाइए. मुझे बहुत अर्जेंट काम है. उसके बाद में आपका काम सुनता हूं.

यह  इशारा कर के वह फाइल में अपना काम करने लगा. सामने वाला आधे घंटे तक उसके सामने बैठा रहा. उसके बाद मजबूरन में उसे कहना पड़ा, “साहब! मेरी सुन लीजिए मुझे बहुत जरूरी काम है. दुकान छोड़कर आया हूं.”

“ठीक है. बताइए,” कहकर सहकर्मी मित्र ने उसकी बात सुनी. और हां~ हूं करते हुए फाइल को देखता रहा. जिससे लगे कि वह सबसे व्यस्ततम सहकर्मी है. उसे सांस लेने तक की फुर्सत नहीं है.

यह देखकर संक्षिप्त में उसे मित्र ने कुछ बात कही और मेरे सहकर्मी को एक लिफाफा पकड़ कर चल दिया. यह देखकर मुझे लगा कि वास्तव में लिफाफा कमाना हो और अपने को व्यस्त दिखाना जरूरी हैं. नहीं तो इस पागलपन से बढ़कर कोई दूसरा चारा नहीं.

तब मैं ने भी सोचा कि मैं भी इस मंत्र को अपनाने की कोशिश करूं. बने रहो पगला, काम करेगा अगला. मगर, जब इसमें कामयाब नहीं हुआ तो मैं दूसरे मंत्र को अपनाने की कोशिश की. काम की फिक्र करो, काम का जिक्र करो, उसकी खूब चर्चा करो, पर काम ना करो. मगर मैं उसमें अभी तक कामयाब नहीं हुआ हूं. लगता है कभी ना कभी तो कामयाब होऊंगा.

यदि आप भी चाहे तो इसका उपयोग करके अपना जीवन सफल बना सकते हैं.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

20/07/2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १६ – हास्य-व्यंग्य – “गधा और गधत्व के सुख – दुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “यहां सभी भिखारी हैं

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १६

☆ व्यंग्य ☆ “यहां सभी भिखारी हैं” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

पशु – पक्षियों में भले ही मनुष्यों के गुण न पाए जाते हों पर मनुष्यों में पशु-पक्षियों के गुणों के दर्शन अवश्य ही होते हैं। यदि कुछ लोगों के क्रियाकलापों और चाल ढाल से हमें उनमें चतुर, फुर्तीले, साहसी वनराज “शेर” के दर्शन होते हैं तो राजनीति में अथवा हमारे आसपास ऐसे भी अनेक लोग हैं जिनमें हमें गधा, कुत्ता, बंदर, उल्लू, बाज अथवा चालाक लोमड़ी के गुण कूट कूट कर भरे हुए दिखाई देते हैं। आप सभी इस तरह की वर्तमान राष्ट्रीय विभूतियों से परिचित हैं इसलिए मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता।

पर्यावरणविद और पशु – पक्षी प्रेमी अनेक प्रजातियों के जीव – जंतुओं की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट के कारण चिंतित हैं। विज्ञान के माध्यम से विलुप्त हो चुके जीवों को पुनर्जीवित करने और घट रहे जीवों को बचाने के तरह – तरह के उपाय खोजे जा रहे हैं। सनातन मान्यता है कि आत्मा सभी प्राणियों में एक ही है जो कभी नहीं मरती वरन कर्मों के आधार पर क्रमशः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करती है। मुझे तो लगता है कि विलुप्त हो रहे प्राणी मनुष्यों के रूप में जन्म ले रहे हैं तभी तो मनुष्यों की संख्या में अपार वृद्धि हो रही है। आपको ऐसा नहीं लगता जैसे धरती से बिल्कुल समाप्त हो चुके डायनासोरों का पुनर्जन्म अमेरिका, रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के रूप में हो रहा है ?

खैर, अभी हाल ही में मैंने जब एक समाचार पढ़ा कि मध्य प्रदेश में गधों की संख्या में भारी गिरावट आई है तो गधों के प्रति मेरा हृदय पीड़ा से भर गया। जब मध्य प्रदेश जैसा सौजन्यता व शांति से भरा क्षेत्र गधों को पसंद नहीं आ रहा और उनकी संख्या घट रही है तो देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसमें अवश्य ही गिरावट दर्ज हुई होगी। समाचार में बताया गया है कि 27 वर्ष पहले मध्य प्रदेश में 49 हजार गधे थे जो आज घटकर मात्र 3052 रह गए हैं। प्रदेश के 9 जिले तो गधा विहीन घोषित हो चुके हैं। अब यहां किसी को ढेंचू – ढेंचू की आवाज सुनाई नहीं देती। नर्मदापुरम में सर्वाधिक 335 गधे हैं जबकि संस्कारधानी जबलपुर में मात्र 4 गधे बचे हैं। “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” भाव से शांति पूर्वक जीवन यापन करने वाले गधों के प्रति मेरे हृदय में गहरी संवेदना है। आखिर गधा कब तक और कितना अपमान सहे ? यदि किसी महिला या पुरुष को गाय की तरह सीधा कह दो तो वह इसे अपनी प्रशंसा अथवा सम्मान समझता है किंतु अगर उसे गधा कह दिया जाए तो उसका घोर अपमान समझा जाता है। शासन-प्रशासन ने तो गधा शब्द को असंसदीय शब्दों की सूची में डाल दिया है। शिक्षकों पर प्रतिबंध है कि वह किसी विद्यार्थी को गधा न बोले वरना उसे जेल भी जाना पड़ सकता है। मैं समझता हूं कि गधे में राग – द्वेष, मान-अपमान से परे पवित्र आत्मा का वास होता है। वह ईमानदार, कर्मठ, सहनशील और अहिंसक होता है। यदि गधा मोटी चमड़ी का असंवेदनशील प्राणी नहीं होता तो इतने घनघोर अपमान से अब तक तो इसकी पूरी नस्ल ही समाप्त हो गई होती। सरकार अनेक विलुप्त हो रहे हिंसक पशु – पक्षियों तक के संरक्षण के लिए चिंतित व प्रयासरत है। मेरा सरकार सहित पशु प्रेमियों से आग्रह है कि संसार के इस सीधे साधे प्राणी को बचाने के लिए भी युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू करें क्योंकि यदि गधा नहीं होगा तो बुद्धिमानों की पहचान करना कठिन हो जाएगा। गधों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि गधा बलिष्ठ होता है, यह 10 किलोमीटर दूर की गंध भी सूंघ सकता है, अपने चेहरे से भाव प्रकट करने की क्षमता भी इसके पास होती है। चीन में गधे की खाल से “एजियाओ” नामक दवा बनाई जाती है जिसके कारण हर साल लाखों गधों की हत्या की जाती है।

एक बात और है, कुछ चतुर लोग स्वेच्छा से “गधत्व” अपना लेते हैं उन्हें स्वयं को गधा घोषित करने अथवा कहलाने में कोई शर्म-संकोच नहीं होता। लोगों के बीच गधा घोषित हो जाने के फायदे भी हैं। काम के जानकार चतुर लोगों या कर्मचारियों के बीच ये आराम से रहते हैं, इन्हें कभी जिम्मेदारी से भरे महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपे जाते। भोंदू बने रहने वाले, सार्वजनिक रूप से “गधा” घोषित इन लोगों की उपस्थिति को हानि रहित मानकर लोग खुलकर अधिकारियों की या अन्य महत्वपूर्ण लोगों की निंदा और गोपनीय बातें करते रहते हैं। गधे की खाल ओढ़े ऐसे व्यक्ति सुनी हुई इन बातों को इधर से उधर करके मौका मिलने पर चतुरों के कान काट लेते हैं। ऐसे बने बनाए गधों को ही “पंजीरी का भोग” प्राप्त होता है। वह जमाना गया जब गधे को शेर की खाल पहनना पड़ती थी, अब लोग गधे की खाल पहन कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। शायद आपको मालूम न हो कि गधों के कल्याण की भावना से 8 मई को विश्व गधा दिवस मनाया जाता है। भाइयो गधों की उपेक्षा नहीं करें, उनसे नफरत नहीं, प्रेम करे।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०९ – व्यंग्य – मानव शरीर के फालतू अंग ☆ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मानव शरीर के फालतू अंग ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मानव शरीर के फालतू अंग

कुछ दिनों से ख़बर गर्म थी कि बाबा जी ने परलोक के साथ ‘हॉटलाइन’ स्थापित कर ली है और देवताओं से उनकी रोज़ बातचीत होती है। उनका कहना है कि चित्रगुप्त जी से उनका हंसी- मज़ाक भी हो जाता है और अगर कोई भक्त चाहे तो वे स्वर्ग में ‘रिज़र्वेशन’ के लिए उसकी सिफारिश कर सकते हैं।

ऊपर वालों के साथ बाबा के रसूख के बारे में सुनकर उनके दरबार में भक्तों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। इसी क्रम में एक दिन पांच छः लोग कुछ शिकायतें और सुझाव लेकर बाबा के दरबार में हाज़िर हुए। वे बाबा के मार्फत अपनी शिकायतें और सुझाव ऊपर पहुंचाने की मुराद लेकर आये थे।

समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि वे देश की एक बड़ी संख्या की भावनाएं लेकर आये हैं। उन्होंने कहा कि देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर व्यथित हैं कि आदमी को जन्म के समय अनेक ऐसे अंग दे दिये जाते हैं जिनका उसके जीवन में कोई उपयोग नहीं होता। इस तरह बहुमूल्य कच्चा माल ‘वेस्ट’ होता है, उसका दुरुपयोग होता है। लोगों की भावना है कि अगर उपयोग में न आने वाले अंगों की पूर्ति सीमित कर दी जाए तो बड़ी बचत हो सकती है। अंग उन्हीं को दिये जाएं जिन्हें उनकी ज़रूरत है।

समूह की बात सुनकर बाबा विस्मित हुए। पूछा कि कौन से अंग आदमी के लिए फालतू हैं। समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि बहुत से लोगों को अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं होती। पॉलिटिक्स में यही हो रहा है। जहां पार्टी कहे वहीं हाथ उठाना पड़ता है। ऐसा ही कई संगठनों में भी होता है। वहां भी अनुयायियों को अपना दिमाग अलमारी में रख देना होता है। धर्मगुरुओं के शिष्यों को भी अपने दिमाग के इस्तेमाल की मुमानियत होती है। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ का सिद्धान्त चलता है। गुरू जो रास्ता  दिखाये उसी पर चलो।

वही बात आंखों पर भी लागू होती है।  पहले बताये गये सभी संगठनों में छुटभैये या अनुयायी को नेता या गुरू की आंखों से ही देखना पड़ता है। इसलिए अपनी आंखें फालतू हो जाती हैं।

समूह ने बाबा जी को बताया कि एक और अंग जो फालतू और असुविधाजनक साबित हुआ है आदमी की रीढ़ है। राजनीति समेत सभी संगठनों में रीढ़ बड़ी अड़चन पैदा करती है। समूह ने बताया कि बहुत से लोगों ने उन्हें जानकारी दी कि किसी बड़के आदमी के सामने झुकते वक्त उनकी रीढ़ उनके आड़े आ गयी और उन्हें शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। लोगों का मत है कि वैसे भी रीढ़ शरीर में छिपी रहती है, इसलिए उसे आसानी से हटाया जा सकता है।

समूह ने बताया कि एक और अड़चन पैदा करने वाली चीज़ अंतरात्मा या ज़मीर है जो शरीर में पता नहीं कहां रहती है, लेकिन आदमी जब भी कोई दो नंबर का काम करना चाहता है आत्मा उसे कोंचने लगती है। कुछ लोग अंतरात्मा को सुलाने में सफल होते हैं, लेकिन कई लोग आत्मा के द्वारा बार-बार कोंचे जाने से परेशान रहते हैं। कई लोग आत्मा के कोंचने से परेशान होकर आत्महत्या की सोचने लगते हैं। इसलिए अंतरात्मा नाम की चीज़ से मुक्ति ज़रूरी है।

समूह ने बाबा जी को बताया कि बहुत से लोग इन अंगों से तो मुक्त होना चाहते हैं, लेकिन वे एक अंग की वापसी भी चाहते हैं। लोगों का कहना है कि वानर की औलाद होने के कारण कभी मनुष्य के भी दुम थी, लेकिन वह कालांतर में झड़ गयी। शायद पहले का आदमी ख़ुद्दार रहा होगा, इसलिए उसे दुम हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी और इसीलिए वह धीरे-धीरे गायब हो गयी। लेकिन अब आदमी को एक अदद दुम की सख्त ज़रूरत है क्योंकि जो काम खुशामद के दस जुमलों से नहीं होता वह एक बार दुम हिलाने से हो जाता है। इसलिए ज़रूरतमंद लोगों के लिए तत्काल दुम की व्यवस्था करके उन्हें राहत दी जाए।

अन्त में एक और बात समूह ने बाबा को बतायी कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी ज़बान बीच से काट दी जाए, जैसी सांप या मेंढक की होती है, जिसे अंग्रेजी में ‘फ़ोर्क्ड टंग’ कहते हैं। इससे उन्हें एक ही समय दो तरह की बात कहने में  आसानी होगी। यह राजनीतिज्ञों के लिए बड़े काम की सिद्ध होगी।

बाबा ने समूह की बात सुनकर उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी भावनाएं बाबा की सिफारिश के साथ वायु-वेग से ऊपर पहुंचा दी जाएंगीं। समूह बाबा के चरणों में पर्याप्त दक्षिणा अर्पित कर विदा हुआ।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८०  ☆ व्यंग्य – पहचाना आप ने? ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८०  ☆

?  व्यंग्य – पहचाना आप ने? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 पहचाना आप ने? अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद, वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए? दरअसल, नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था।

एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।

किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए “कैसे हैं आप” कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से “अरे आप!” कह देते हैं। इस “आप” के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है, और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।

शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, “हाय, आई एम शशि कपूर। ” सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।

कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे “भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!” अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं “भाभी जी”, “भाई साहब”, “चाचा जी”। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।

हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, “बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए। ” अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।

नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है “अरे आप!” और “जी, वही!”

ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है “वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?” तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं, अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी।

वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है।

सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब “अरे आप” या “भाई साहब” जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।

अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा “ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता। ” क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना। आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।

मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था, भोजन कर आया। उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी। सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं। अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है। मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली, अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही, झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं। दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है। सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया।

खैर आप ही बताइए, किस को कितना पहचाना आप ने?

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२६ – व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२६

व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)

जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।

वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।

मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।

उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।

मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।

मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।

जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?

यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।

तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।

तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/05/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १५ – हास्य-व्यंग्य – “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १५ 

☆ व्यंग्य ☆ “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं सुबह अपने कम्पाउन्ड में टहलता हुआ टी वी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की भांति अपने दांतों पर टूथब्रश रगड़ रहा था। अचानक मुझे अपने पड़ोसी वर्मा जी का दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई दी। वे जल्दी में अपना स्कूटर बाहर निकल रहे थे। मैने उन्हें जोरदार नमस्कार ठोंकते हुए कहा “भाई जी आज रविवार को छुट्टी के दिन इतनी सुबह कहां की सैर पर निकल पड़े ?” स्कूटर में किक मारने को तैयार वर्मा जी मेरी बात सुनकर रुक गए, बोले “भैया क्यों मजाक उड़ा रहे हो ? आपको तो मालूम है कि इसी माह मुझे यह मकान खाली करना है अतः किराए के नए मकान की तलाश में निकल रहा हूं। ” उनकी बात सुनकर मैंने आश्चर्य से कहा – अरे, अभी सूरज भी नहीं उग पाया है, आदमी की संगत और शहरी आबोहवा में बिगड़ चुके पशु – पक्षी भी अभी सो कर नहीं उठे हैं, सड़क पर झाड़ू मारने वाला और दूध वाला भी अभी नहीं आ पाया है, सामने लगे सरकारी नल पर पानी का इंतजार करने वाली भीड़ भी अभी इकट्ठी नहीं हुई है, रेडियो का प्रसारण भी अभी शुरू नहीं हो पाया है और आप किराए का मकान ढूंढने निकल पड़े!

वे मेरे निकट आते हुए बोले – आप ठीक कहते हैं बड़े भाई, अभी सूरज भले ही नहीं उगा और सरकारी नल से दूध वाले तक जो भी आपने गिनाए हैं वे भी नहीं आए, लेकिन मेरे घर समाचार पत्र आ चुका है और मैं उसमें छपे किराए के मकानों संबंधी सभी विज्ञापन पढ़ कर नोट कर चुका हूं। अब यदि आपने अपनी बातों के जाल में फंसा कर मुझे निकलने में देर करवा दी तो निराशा ही हाथ लगेगी, इसलिए मेरा नमस्कार स्वीकार करें और मुझे जाने दें।

मैं फुर्सत में था अतः बात को आगे बढ़ाता हुआ बोला – “प्यारे भाई मैं आपको कहां रोक रहा हूं ? आप जाएं और आज किराये का मकान ढूंढने में अवश्य सफल हों ऐसी मेरी कामना है, लेकिन अनुरोध केवल इतना है कि मेरे साथ एक प्याली चाय पीने से इंकार न करें। ” चाय प्रेमी वर्मा जी मेरा अनुरोध नहीं ठुकरा पाए और स्कूटर में ताला मारते हुए बोले – ” चलिए, लेकिन चाय के बाद सिगरेट भी पियूंगा। ” मैंने कहा – ऐसी भी क्या बात है भाई जी आप थोड़ा रुकें तो आपको नाश्ता भी करवाता हूं। नाश्ते के आग्रह से उन्हें मकान ढूंढने का काम फिर याद आ गया। वे चिंतामग्न होकर बोले – बड़े भाई नाश्ता भले ही न कराएं , किराए का मकान दिलवा दें। मैंने कहा चिंता न करें किराए का मकान आपको अवश्य मिलेगा और वर्तमान मकान से अच्छा मिलेगा। जब खाली मकानों की सूची आपकी जेब में है तो चिंता किस बात की ? वर्मा जी से इतना कहते हुए मैंने अपने कम्पाउन्ड में लगे नल से मुंह धोया और चेहरे पर तौलिया फिराता हुआ पुनः उनकी ओर घूमा। वर्मा जी वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ चुके थे और मेरी पत्नी के हाथों से चाय का प्याला ग्रहण करते हुए उनसे किराए के मकानों की समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे। मैंने भी चाय का प्याला उठाया और चुस्की मारता हुआ अपनी पत्नी से बोला – देखो तो इन्हें, ये किराए के मकानों की सूची जेब में रखकर भी इतना परेशान हो रहे हैं। मेरी बात सुनकर वर्मा जी झुंझला उठे, कहने लगे बड़े भाई – चूंकि आप स्वयं अपने मकान के मालिक हैं अतः आपको किरायेदारों की तकलीफें, खासकर जिन्हें शीघ्र ही नया मकान खोजना हो समझ में नहीं आ सकतीं।

मैंने कहा, यार मेरे ही घर में मेरी ही चाय पीते हुए मेरी “समझ” पर शक कर रहे हो जबकि तुम्हें अभी मुझसे मांगकर सिगरेट भी पीना है। मेरी बात पर उन्होंने हें – हें करते हुए खाली प्याला नीचे रखा और मेरे द्वारा बढ़ाई गई सिगरेट झटकते हुए बोले – बड़े भाई, किराए के खाली मकानों की सूची अवश्य मेरी जेब में है और मैं उन्हें देखने भी जा रहा हूं, लेकिन उम्मीद नहीं है कि उनमें से मुझे कोई मकान मिलेगा।

मैंने माथे पर बल डालते हुए, आँखें सिकोड़ कर आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा – भाई जी कार्य शुरू करने के पहले ही आप निराशा में जकड़े जा रहे हैं, यह तो अच्छी बात नहीं है। हौसला रखकर जाइए कि आपको मकान मिलेगा। वे बोले – जा तो हौसले से ही रहा हूं लेकिन बात यह है कि सामान्यतः अखबारों में छपे किराए के खाली मकानों के विज्ञापन बैंक, एल आई सी तथा सरकारी कर्मचारियों के लिए होते हैं और मैं सिर्फ कर्मचारी हूं, सरकारी कर्मचारी नहीं। मैंने कहा, भाई जी गजब करते हैं आप भी! क्या आम आदमी को किराए का मकान मिलता ही नहीं है ? आखिर अभी तक भी आप किराए के मकानों में ही रह रहे हैं। वर्मा जी बोले – आपने सही फरमाया भाई साहब, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुझे मात्र तीन माह में यह मकान क्यों छोड़ना पड़ रहा है और पिछले 10 वर्षों में मुझे 12 मकान क्यों बदलना पड़े ?

मैंने कहा, भाई मुझे कैसे मालूम होगा। न कभी मैंने आपसे आपके किराए के मकानों का इतिहास पूछा और न ही आपने बताया। न तो मुझे किसी किरायेदार का मकान मालिक होने का अनुभव है न ही किसी मकान मालिक के किरायेदार होने का। पिछले किसी जनम का पुण्य रहा होगा सो पिताजी मकान बनवा गए। मेरी वर्मा जी से हो रही रोचक बातचीत में रुचि लेते हुए न जाने कब मेरे पीछे मेरी पत्नी भी आकर खड़ी हो गई, अचानक वो बीच में बोल उठी – भाई साहब ये इतना अच्छा मकान आप क्यों छोड़ रहे हैं। इसके तो मकान मालिक भी यहां नहीं रहते, किसी से कोई ख़िटखिट नहीं। वर्मा जी ने कहा – ये मकान मालिक भी अजीब होते हैं भाभी जी! आज तक इनके नियम – कानून, धाराएं, इच्छाएं कोई किरायेदार नहीं समझ सका फिर मैं क्या चीज हूं। आप मेरे वर्तमान मकान छोड़ने का कारण सुनेंगी तो आश्चर्य करेंगी। अगर मकान मालिक पहले ही अपनी मंशा प्रगट कर देता तो मैं यह मकान किराए पर लेता ही क्यों ? अपने मकान मालिक के प्रति वर्मा जी की बातें  यद्यपि मेरी उत्सुकता बढ़ा रही थीं तथापि मैंने उसे प्रगट न करते हुए कहा – ऐसी क्या विशेष बात हो गई वर्मा जी, किरायेदारों के लिए तो सभी मकान मालिकों के नियम एक जैसे होते हैं जो अनुबंध पत्र के साथ – साथ किराए की मासिक रसीद के पीछे भी छपे रहते हैं। जैसे किरायेदार सुबह 8 के पहले और रात्रि 9 बजे के बाद रेडियो – टी वी नहीं चलाएगा। ज्यादा बिजली – पानी खर्च नहीं करेगा। घर में ऊंची आवाज में बात नहीं करेगा। किराएदार के बच्चे शोर नहीं करेंगे। उसके घर अक्सर और अधिक मेहमान नहीं आएंगे। वह घर की दीवारों पर कील नहीं ठोकेगा। ठीक समय पर किराया देगा। जब कहा जाएगा तब मकान खाली कर देगा आदि आदि। एक अलिखित नियम भी रहता है – मौका आने पर अकेली विवाहित/अविवाहित महिला को मकान किराए पर दिया जा सकता है किंतु अविवाहित अथवा अकेले पुरुष को नहीं। आपने अपने मकान मालिक के इसी तरह के किसी कानून को ठेंगा दिखा दिया होगा अथवा उसकी धज्जियां उड़ा दी होंगी, बस हो गई मकान मालिक की भृकुटि टेढ़ी और आप निकल पड़े नए मकान की तलाश में। भाई मेरी समझ में तो मकान मालिक – किरायेदार का सम्बन्ध भी सास – बहू या ननद – भौजाई की तरह ही है जिनमें ज्यादा देर नहीं पटती।

वर्मा जी पूरी शांति से मेरी बात सुन रहे थे। मेरी बात में विराम लगता देख वे फुर्ती से बोल पड़े – बड़े भाई यदि आपकी बात पूरी हो गई हो तो अब मैं अर्ज करूं। मैंने कहा, जरूर करिए। आप जितने विस्तार से अर्ज करेंगे, मेरा मकान मालिक – किरायेदार सम्बन्धी ज्ञान उतना ही बढ़ेगा। वर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले – भाई साहब वास्तव में अभी आप मकान मालिकों की नियमावली व चरित्र से आंशिक रूप से ही परिचित हैं। मेरी पत्नी ने वर्मा जी की बात में हस्तक्षेप करते हुए कहा – ठीक है भाई साहब आप ही उनकी नियमावली पूरी करते हुए उनके विविध चरित्रों पर प्रकाश डाल दीजिए। बताइए आप यह मकान इतनी जल्दी क्यों छोड़ रहे हैं, कौन किससे और किस कारण से अलसेट में आ गया। वर्मा जी बोले – भाभी जी अलसेट में तो आमतौर पर किरायेदार को ही आना पड़ता है, उदाहरण के रूप में मैं आपके सामने हूं। मेरे मकान मालिक अभी 15 दिन पहले तक मुझसे शुद्ध घी में तली और शक्कर में पगी वाणी में बोलते थे। कारण था मेरा छोटा भाई, जिससे वे अपनी बेडौल और मंदबुद्धि लड़की की शादी करना चाहते थे। उनका प्रस्ताव था कि वे यह मकान भी छोटे भाई के नाम लिख देंगे। उनका बार बार का यह प्रस्ताव जब मैंने ठुकरा दिया तभी उन्होंने मुझसे कह दिया कि अब आप जल्दी ही दूसरा मकान ढूंढ लें। इसके पहले वाला मकान भी मुझे मकान मालिक की लड़की से भाई की शादी न करने के कारण ही छोड़ना पड़ा था। उसके पहले मैं जिस मकान में रहता था वहां के मालिक ने मुझे इसलिए निकाल दिया कि वे टेलीफोन वाले किरायेदार को रखना चाहते थे, मैं टेलीफोन नहीं लगवा सका। एक मकान सिर्फ इसलिए छूटा की मैंने मकान मालिक की बूढ़ी माता जी को रामायण सुनाने में नागा करना शुरू कर दिया था और उन्हें प्रतिदिन रात्रि में रामायण सुनना मकान मालिक की शर्त थी। इसके पहले तो एक मकान केवल इसलिए छोड़ना पड़ा कि मकान मालिक के कुत्ते को मैं पसंद नहीं आया। वहां रहते हुए महीनों हो जाने के बाद भी वह मुझे देखकर दुश्मनों की भांति भोंकता और मौका मिलते ही दौड़ा भी देता था। मुझे कुत्ते से डरता देख कर मकान मालिक की बीबी व बच्चे हंसते और ताली बजाते, किंतु मुझे गुस्सा आता। जब मैंने कुत्ते वाला मकान छोड़ने का फैसला किया तब मकान मालिक ने अपनी बीबी – बच्चों और अपने कुत्ते की खुशी के लिए किराया कम करने का लालच देकर मुझे रोकने का प्रयास भी किया था, लेकिन मैं भयभीत था। वर्मा जी की बात सुनकर मैं ठहाका लगाकर हंस पड़ा। मुझे हंसता देख कर वर्मा जी नाराज होकर जाने के लिए उठ खड़े हुए, किंतु उसी समय मेरी पत्नी नाश्ता लेकर प्रगट हुई। गर्म नाश्ते की खुशबू ने वर्मा जी का गुस्सा दूर कर दिया वे पुनः कुर्सी पर बैठ गए और एक पकौड़ा मुँह में डालते हुए बोले – भाई साहब, 5/6 वर्ष पूर्व मुझे एक मकान सिर्फ इसलिए छोड़ना पड़ा कि मेरे लिए मेरी  मकान मालकिन की मुस्कानें बढ़ती जा रहीं थीं यह बात मेरी बीबी को बिल्कुल पसंद नहीं आई। इससे भी पहले वाले मकान में हम किरायेदार के साथ – साथ मकान मालिक के बच्चों की देखरेख करने वाले नौकर भी हो गए थे। मकान मालिक एक जवान जोड़ा था जो अपने दो छोटे बच्चों को रोज हमें थमा कर घूमने – फिरने या सिनेमा देखने चला जाता था। वर्मा जी की प्लेट के पकौड़े खत्म हो गए थे अतः उन्हें याद आ गया कि वे अखबार में छपे किराए के खाली मकानों की सूची साथ लेकर मकान खोजने निकले हैं। उन्होंने घड़ी देखते हुए मुझसे नमस्कार किया और निकल पड़े नए मकान की खोज में।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६८ – लघुकथा – रिश्तों की शवपेटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – रिश्तों की शवपेटी।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६८  – लघुकथा  – रिश्तों की शवपेटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

रिश्ते कभी मंदिर की घंटियों की तरह मधुर बजते हैं और कभी अस्पताल की मॉर्चरी की चुप्पी की तरह डरावने हो जाते हैं; शुरुआत में उनका स्पर्श हर पल खिले गुलाब की पंखुड़ी जैसा नर्म लगता है, लेकिन समय के साथ वही पंखुड़ियाँ सूखकर काँटे बन जाती हैं और भीतर तक चुभने लगती हैं। पहले मैं उसकी बातों में मिठास खोजता था, उसके नखरों में अपनापन और उसके तुनकमिजाजी को मासूमियत का आवरण मान लेता था; पर यह सब धीरे-धीरे शक, उसके बाद कड़वाहट और अंततः दमघोंटू कैद में बदल गया। मैंने जब उसे एक कैफे में बुलाया तो आसपास संगीत बह रहा था पर मुझे लग रहा था जैसे हत्या के बाद खून धोने के लिए नल खुला हो और पानी फालतू बह रहा हो। मैंने शांत स्वर में कहा—“जब इस ब्रह्मांड में असंगति ही अंतिम लय है तो रिश्ते कैसे निष्कलंक संगीत हो सकते हैं! सांस बिना जीवन नहीं और विश्वास बिना रिश्ता नहीं, और जब ये टूटते हैं तो सिर्फ शरीर बाकी रह जाता है, आत्मा कब्र में चली जाती है।” उसका चेहरा देखने में उतना ही सरल था जितना किसी निर्दोष भक्त का, मगर उसकी आँखों में वही भय था जो पेशी पर खड़े अपराधी की पुतलियों में लिखा होता है। उसने ठंडी आवाज़ में पूछा—“क्यों?” और यह ‘क्यों’ पेट की अंदरूनी आंतों को निचोड़ने वाला होता है, क्योंकि इसका जवाब मृत्यु प्रमाणपत्र के हस्ताक्षर जैसा अंतिम होता है। मैंने हल्की हँसी के व्यंग्य में कराह छिपाते हुए कहा—“इसे ‘नैचरल डेथ’ समझो; ताकि किसी पर दोष न चढ़े।” और यह कहकर मैं बाहर निकल आया, जैसे कोई डॉक्टर लाश के पास से निकल जाए और घोषणा कर दे कि इलाज संभव नहीं था। बाहर की सड़क पर अनगिनत लोग आ-जा रहे थे, हज़ारों रौशनी जल रही थीं, पर मुझे लगा पूरी दुनिया अंधेरी हो गई है और जो रौशनी थी, वह किसी शवपेटिका में रखे शरीर पर जलते बल्ब की तरह निर्बल और अर्थहीन। भीतर व्यंग्य मुस्कुरा रहा था कि देखो, हमने बड़े सलीके से एक मौत को ‘प्राकृतिक’ बता दिया, पर आत्मा कराह रही थी कि यह मौत प्राकृतिक नहीं, निर्मम हत्या थी—और हत्यारा भी वही था जिसने इसे ‘स्वाभाविक’ लिखकर सच से चुप्पी का सौदा कर डाला।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७९ ☆ व्यंग्य – “लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो !” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७९ ☆

?  व्यंग्य – लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो ! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वो जमाना गया जब लोग अख़बार में “आज का विचार” पढ़कर दिन की शुरुआत करते थे। अब लोग सुबह उठते ही मोबाइल उठाकर “आज की वायरल रील” देखते हैं  जिसमें कोई बाल सुखा रहा है, कोई नाच रहा है, और कोई तो बिना वजह ही होंठ चबा कर भद्दे इशारे रही है। गोया कि होंठ चबाना भी कोई राष्ट्रीय खेल बन गया हो। टिकटॉक और रील्स ने दुनिया को ऐसा उलझाया है कि लोग अब रील्स पर दिखाने के लिए कपड़े बदलते हैं। एक आउटफिट से तीन-तीन रील्स!  कपड़ों की एक्सपायरी डेट नहीं होती पर रील्स की होती है । “अरे ये वाला तो कल ही पोस्ट किया था, आज दूसरा पहनना पड़ेगा, नहीं तो लोग ट्रोल करेंगे।”

एक जमाना था जब लोग खाने से पहले “बिस्मिल्लाह” कहते थे, अब “वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन” करते हैं। यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ये खा रहे हैं, या इंस्टाग्राम पर दिखाने के लिए खाने की एक्टिंग  कर रहे हैं? खाना ठंडा हो जाए तो चलेगा, पर रील का एंगल परफेक्ट होना चाहिए। “अरे ज़रा चम्मच ऐसे पकड़ो, लाइट इधर से आ रही है… हाँ! परफेक्ट! अब चबाओ स्लो मोशन में।” खाना अब पेट नहीं, फोन भरता है। रील की इनकम पेट भर सकती है।

घर की दादी, जो पहले तक ‘व्हाट्सएप’ को ‘व्हाट्शैप’ कहती थीं, अब खुद ‘रील क्वीन’ बन चुकी हैं। चश्मा चढ़ाकर ट्रेंडिंग साउंड सुनती हैं और बोलती हैं  “बहू, ये वाला गाना तो हमारे ज़माने का है, इस पर हम भी रील बनाएंगे!” और फिर शुरू होता है परिवार का सामूहिक प्रोडक्शन हाउस। पोते कैमरामैन बनते हैं, बेटा डायरेक्टर, पति कैमरामैन और दादी हीरोइन। “दादी, एक बार और! इस बार हाथ थोड़ा ऊपर उठाना।” दादी की फिटनेस एक्सरसाइज अब योग से नहीं, रीटेक से हो रही है।

“आज ये डायलॉग ट्रेंड में है, इसका वीडियो बना दो ज़रा”, पत्नी कहती हैं, और फिर शुरू होता है उनका गायन सह अभिनय जिसे यदि शंकर महादेवन देख लें तो सुर की समाधि में चले जाएं। “अरे सुनो न, लिप सिंक गड़बड़ हो गया, एक बार और!” पति जो पहले ऑफिस में बॉस की डाँट खाते थे, अब घर में ‘डायरेक्टर बीवी’ की सुनते हैं। “तुमने फोन हिला दिया! फोकस बिगड़ गया! तुमसे एक काम सही से नहीं होता!” अब शादी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पति कितनी अच्छी रील बना देता है।

दुनिया हकीकत से अधिक, कैमरे में जी रही है। कभी लोग पार्क में टहलने जाते थे, अब ट्राइपॉड लेकर रील्स बनाने जाते हैं। पेड़-पौधों से बात नहीं करते, उनके पीछे खड़े होकर डांस करते हैं। वो  पेड़ भी सोचता होगा  “मुझे ऑक्सीजन देने दो या बैकड्रॉप बनने दो, कुछ एक तो तय करो!” और अगर गलती से कोई इनकी शूटिंग के बीच से निकल जाए, तो उसे ऐसे घूरते हैं जैसे उसने फ़िल्मफेयर अवार्ड छीन लिया हो। “अरे भाई, दिखता नहीं शूटिंग चल रही है? अब पूरा फिर से बनाना पड़ेगा!” वो बेचारा सोचता है  “ये पार्क है या मल्टीप्लेक्स शूट स्टूडियो?”

अब रील्स ही असली हैं,ज़िंदगी बैकग्राउंड में चल रही है। शादी हो तो पहले पंडित नहीं, कैमरामैन बुलाओ। “बेटे की शादी में तो पाँच रीलमेकर रखे थे, हर एंगल से कवर हो!” लड़का लड़की एक दूसरे को नहीं, कैमरे को देख रहे होते हैं। फेरे ले रहे हैं, पर निगाह फोन पर होती हैं । लाइव पर “कितने व्यूज आए?” मेहमान खाना नहीं खा रहे, रील बना रहे हैं। “अरे पनीर  टिक्का कैसा लग रहा है फ्रेम में?”

टिकटॉक बंद हुआ तो लगा कुछ चैन मिलेगा, पर इंस्टाग्राम छा गया। और यूट्यूब शॉर्ट्स ने तो जैसे कसम खा ली है “हर इंसान को कम से कम एक वीडियो ज़रूर बनवा कर ही मानेंगे।” अब तो फेसबुक भी रील्स लेकर आ गया। यानी, भागो कहीं भी, रील्स का भूत पीछा करेगा ही। लिंक्डइन पर भी लोग प्रोफेशनल रील्स बना रहे हैं “देखिए कैसे मैं ऑफिस में कॉफी पीते हुए प्रोडक्टिव रहता  हूँ।”

बुद्धिजीवी अब ‘बुक क्लब’ नहीं, ‘रील क्लब’ में शामिल हैं। “कैसे बनाएं वायरल वीडियो?” पर सेमिनार होते हैं। “लाइक नहीं आए तो आत्ममंथन करें”  ये आज का गंभीर विषय है। प्रकाशक मुझसे बोला सर कविता कहां ले आए ? कुछ युवाओं के लायक लिखी पांडुलिपि लाइये मसलन ” रील से पैसे कैसे बनाएं”

इंजिनियरिंग कॉलेज  में पहले इंजीनियरिंग पढ़ाई जाती थी, अब “वायरल मार्केटिंग 101” कोर्स शुरू होने वाला है। MBA की डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है “10 लाख फॉलोअर्स”। नौकरी के इंटरव्यू में अब पूछा जाता है  “आपके इंस्टाग्राम पर कितने फॉलोअर्स हैं?” बायोडाटा में लिखा होता है ,  “अनुभव: 5 साल, वायरल रील्स: 12″।

अब लोग परीक्षा में कम नंबर आने पर नहीं, वीडियो पर कम लाइक्स आने पर बच्चे डिप्रेशन में जाने लगे हैं। “मम्मी, मेरी रील पर सिर्फ 200 लाइक्स आए!” माँ दिलासा देती है “बेटा, टाइमिंग गलत थी, शाम को पोस्ट करना था।” पहले बच्चे बोर्ड एग्ज़ाम के रिज़ल्ट से डरते थे, अब रील के व्यूज से। काउंसलर भी अब नई समस्याओं से जूझ रहे हैं “डॉक्टर साहब, मेरी रील वायरल नहीं हो रही, मुझे लगता है मैं असफल हूँ।”

सोचता हूँ, ये रील बनाने वाले आखिर करते क्या हैं? तो जवाब आता है  “रील बनाते हैं, और वही करते हैं।” दिन की शुरुआत रील से, अंत रील से। सुबह उठे  “गुड मॉर्निंग “। नाश्ता किया  “ब्रेकफास्ट रील”। ऑफिस गए  तो भी रील”। लंच किया  “फूड रील”। शाम को जिम किया तो “वर्कआउट रील”। रात को सोए  “गुडनाइट रूटीन रील”। यानी, ज़िंदगी एक बड़ी रील है और हम सब उसमें महज एक्स्ट्रा किरदार हैं।

घर में बर्तन गिरते हैं तो पत्नी चिल्लाती नहीं, कहती है  “सुनो न, मैं फिर से गिराती हूं, जरा इसका स्लो मोशन बना लो!” नया आइडिया है। है न! बच्चा रो रहा है तो पहले फोन उठाओ। “अरे रुको, रिकॉर्डिंग ऑन करने दो, ये ‘क्यूट बेबी क्राइंग’ रील बनेगी।” बच्चा चुप हो गया तो बोलो “बेटा, फिर से रो ले, एंगल गड़बड़ हो गया था।” प्यार भी अब रिहर्सल माँगता है।

पढ़ाई छोड़, करियर छोड़, रिश्तेदार छोड़ ,  सब छोड़ कर लोग अब केवल “वायरल होने” की साधना कर रहे हैं। गुरुकुल में अब योगासन नहीं, “कंटेंट स्ट्रैटेजी” सिखाई जाती है। संन्यासी भी अब हिमालय नहीं, स्टूडियो में वर्चुअल ध्यान करते हैं  “फॉलोअर्स बढ़ाने का मंत्र, अगली रील में।” गलती से जो कोई वीडियो चल गया, तो समझो  “ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया।” तब फिर क्या, बाकी ज़िंदगी वही फॉर्मूला रिपीट करो। “वो वाला ही डांस फिर करो, वही बैकग्राउंड, वही ओछे चमकीले  कपड़े!”

हाल यह है कि दुनिया के बड़े-बड़े सवालों के जवाब हमें शॉर्ट वीडियो में मिलते हैं। चाहे जीवन का उद्देश्य हो, या सिक्स पैक ऐब्स बनाने की शिक्षा । सब कुछ 30 सेकंड में समझा दिया जाता है। “क्वांटम फिजिक्स समझें 60 सेकंड में!” “महाभारत की पूरी कहानी  एक रील में!” ज्ञान की गहराई अब 30 सेकंड की है। पहले गुरु कहते थे  “बेटा, वर्षों लगेंगे समझने में”, अब रील गुरु कहते हैं  “बस एक मिनट दो, सब क्लियर हो जाएगा।” यानी, ज्ञान अब ज्ञान नहीं  कंटेंट बन गया है। और सबसे बड़ी बात  “फॉलो करना मत भूलना!”

ऊपर की ओर स्क्रॉल करते हुए समय कब बीत जाता है, किसे पता चलता है। सुबह 10 बजे फोन खोला  सोचकर  “बस एक रील देखूँ।” अचानक नज़र घड़ी पर  दोपहर के 2 बज गए! ये कौन-सी आइंस्टीन की थ्योरी है जिसमें 10 मिनट    4 घंटे के बराबर हो रहे हैं? रील्स में टाइम ट्रैवल होता है, बस भविष्य की तरफ ही। वापस नहीं आ सकते। लोगों की नींद उड़ गई है, टाइम पास हो रहा है। सोने जा रहे हो  “चलो सोते हैं, पर पहले एक रील।” फिर एक, फिर एक, और सुबह की नमस्ते! रात 2 बजे अचानक याद आता है  “अरे, कल मीटिंग है!” पर फिर सोच “चलो एक और लास्ट देख लेते हैं।”

हम सब डिजिटल कंटेंट क्रिएटर बनकर उस डॉलर की प्रतीक्षा में हैं जो हमारी रील्स के व्यूज, लाइक, रीपोस्ट और सब्सक्राइब से टोटल टाइम ऑफ वॉचिंग से आएगा। बच्चे अब डॉक्टर इंजीनियर से अधिक बड़े  “इन्फ्लुएंसर” बनना चाहते हैं। “मम्मी, मैं बड़ा होकर यूट्यूबर बनूँगा!” पहले माता-पिता कहते थे  “बेटा, पढ़-लिख कर कुछ बनो”, अब बच्चे कहते हैं  “पापा, आपको नहीं पता, मेरे 5000 फॉलोअर्स हैं!” और पापा गर्व से कहते हैं “हमारा बेटा इन्फ्लुएंसर है!”

जिस दिन इंटरनेट डाउन हो गया, उस दिन ये पूरी रील असेंबली पूछेगी , “अब मैं क्या करूं, जाऊं तो जाऊं कहाँ?” लोग सड़कों पर भटकेंगे, हाथ में फोन लिए, निगाह खाली स्क्रीन पर। “नेटवर्क कब आएगा?” ये नया राष्ट्रीय प्रश्न बन जाएगा। बच्चे रोएंगे, बड़े घबराएंगे, और दादी बोलेंगी  “हमारे ज़माने में तो बिजली जाती थी, फिर भी हम  रहते थे।” पर कोई सुनेगा नहीं, क्योंकि बिना रील्स के सुनने की आदत ही खत्म हो गई है।

असली ज़िंदगी अब “अनस्क्रिप्टेड कंटेंट” लगने लगी है , बोरिंग, बिना एडिट का, बिना फिल्टर का। “अरे ये तो रियल लाइफ है, कौन देखेगा इसे?” रिश्ते अब “कोलैबोरेशन” हैं। “चलो मिलते हैं और एक साथ मस्त रील बनाते हैं।” दोस्ती की परिभाषा बदल गई  “जो तुम्हारी हर रील पर पहला कमेंट करे, वही सच्चा दोस्त।”

और हाँ, सबसे बड़ी बात,  अब तो शादियों में भी लड़के लड़की एक दूसरे के इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखते हैं। “लड़की है तो अच्छी, पर फॉलोअर्स कम हैं।” “लड़का कमा तो अच्छा रहा है, पर एस्थेटिक सेंस नहीं है, रील्स देखो इसकी।” बायोडाटा में अब लिखा होता है  “नेट वर्थ: 50 लाख, फॉलोअर्स: 1 लाख”। और सास-बहू की पहली बातचीत “बेटा, तुम रील्स बनाती हो? हमारे घर की पारंपरिक पोशाक पहनकर एक बना देना, वायरल हो जाएगी!”

@ कैमरा ऑफ. लेखक ऑफ. दिमाग स्टैंड बाई मोड पर।

पर रुकिए… ये आर्टिकल तो बहुत लंबा हो गया। अब इसे भी 30-30 सेकंड के पार्ट में बाँटना पड़ेगा। क्योंकि अब कोई पूरा आर्टिकल पढ़ता ही कहाँ है? सब रील में चाहिए। तो अगली रील में मिलते हैं  “व्यंग्य, पर शॉर्ट फॉर्म में!”लाइक करो, शेयर करो, और हाँ… फॉलो करना मत भूलना!

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७८ ☆ व्यंग्य – “जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७८ ☆

? व्यंग्य – जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

जेन जी ने एक ऐसी भाषा गढ़ी है जिसने व्याकरण नामक चीज को सीधे तौर पर चैलेंज कर दिखाया है। यह भाषा नहीं, एक क्रांति है, जिसे हम ‘जेन जी’ यानि जनरेशन जी की ‘लोल’ भाषा कह सकते हैं। यह भाषा मोबाइल और चैट की दुनिया की वह शॉर्टहैंड है जहां शब्दों का मतलब बदल जाता है, वर्ण विलीन हो जाते हैं और इमोजी एक पूरी वाक्य की भूमिका निभाने लगते हैं। इसे समझने के लिए आपको किसी डिक्शनरी की नहीं, बल्कि संदर्भ के अनुरूप एक विशेष समझ की जरूरत होती है।

इस भाषा का मूल सिद्धांत है ‘जो दिखे सो नहीं, जो लिखे सो है’। मसलन, ‘यू’ ‘आप’ नहीं, ‘तू’ हो जाता है। ‘आर’ ‘हैं’ नहीं, ‘हो’ बन जाता है। और ‘लोल’? अरे भाई, ‘लोल’ तो हंसने की आवाज़ नहीं, जीवन जीने का एक तरीका है! लाफ आउट लाउडली। यह भाषा इतनी लचीली है कि इसमें ‘थैंक्यू’ ‘थेंक्स’ बनता है, फिर ‘थैंक्स’ से ‘टी.एन.एक्स’ और फिर सीधे ‘टी.क्यू’ तक पहुंच जाता है। यानी, जाकी रही भावना जैसी , वह समझे बोली वैसी।  शब्दों में अक्षरों का वजन घटता चला जाता है। क्लासिक टेस्ट क्रिकेट, फिफ्टी फिफ्टी, 20 .. 20 से होते हुए इस भाषा में सुपर ओवर बन जाता है। युवाओं की इस भाषा में अक्षरों की बलि चढ़ाना आम बात है। स्वरों को तो जैसे दरबार से निकाल बाहर किया गया है। ‘व्हाट आर यू डूइंग?’ जैसा भद्दा और लंबा वाक्य इस नई भाषा में ‘व्हाट आर यू डूइंग?’ न रहकर ‘वट आर यू डूइंग?’ बन जाता है और फिर धीरे-धीरे ‘वट आर यू डूइन’ और अंततः ‘डूइन वट?’ तक सिमट चुका है। यह एक तरह से भाषा का मिनिमलिज्म है, जहां कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा भाव अभिव्यक्त हो रहे हैं।

रही सही कसर असर दार इमोजी निकाल रहे हैं। इमोजी इस मजेदार भाषा की आत्मा हैं। एक हंसता हुआ चेहरा जिसकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं (एल.ओ.एल.) वह खुशी, गम, हैरानी, या फिर सिर्फ ‘यार, मजाक था’ तक का संदेश दे सकता है।

एक लाल दिल (लव) प्यार, दोस्ती, शुभकामना या फिर ‘ओके, बाय’ का इशारा कर सकता है। यह एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है जो देश, काल, जाति, धर्म के बंधन तोड़कर सीधे दिल से दिल तक रात बिरात बात पहुंचाती नजर आती है।

इस भाषा ने एक नए प्रकार के सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है। वे जो इस कोड को समझते हैं और वे जो नहीं समझते। एक मां का अपने बेटे के मैसेज ‘पी.सी.एम., जी.एन., टी.सी., आई.एल.वाय’ को देखकर हैरान होना और फिर उसे समझने के लिए इंटरनेट की मदद लेना, आज के दौर की एक सामान्य घटना है। ‘पी.सी.एम.’ यानी ‘पेरेंटल कंट्रोल मच’, ‘जी.एन.’ यानी ‘गुड नाइट’, ‘टी.सी.’ यानी ‘टेक केयर’ और ‘आई.एल.वाय’ यानी ‘आई लव यू’। यह एक छोटा सा संदेश एक पूरी भावनात्मक बातचीत को समेटे हुए है। इसके सम्मुख बंद हो चुके मार्स कोड वाला टेलीग्राम पानी भर रहे हैं।

निष्कर्ष के तौर पर, यह ‘लोल’ भाषा महज शब्दों का संक्षिप्तिकरण नहीं है। यह एक सांस्कृतिक बदलाव है, जो तकनीक और समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश है। युवाओं के पास समय का अभाव हो सकता है, या उनकी आयोडीन नमक सेवन वाली बुद्धि की कुशाग्र समझ का परिणाम हो सकता है ।  पुरानी पीढ़ी को यह अजीब लगे, लेकिन यह नई पीढ़ी की अपनी मौलिकनपहचान है।

इसलिए अगली बार जब कोई आपको ‘आई.डी.के.’ (आई डोंट नो) लिखे, तो नाराज न हों। बस ‘एस.एम.एच.’ (शेकिंग माय हेड) करते हुए ‘टी.टी.वाय.एल.’ (टॉक टू यू लेटर) लिख दें। क्योंकि अगर आपने इस भाषा का विरोध किया, तो ‘जी.ओ.ए.टी.’ (ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम) जनरेशन आपको ‘टी.एल.डी.आर.’ (टू लॉन्ग, डिड नॉट रीड) कहकर नजरअंदाज कर देगी। और हां, ‘एफ.वाय.आई’ (फॉर यूअर इनफार्मेशन), इस पूरे लेख को पढ़ने के लिए ‘टी.वाय’ (थैंक यू)!

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ – हास्य-व्यंग्य – “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  उई… छिपकली…

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

उस दिन मैं अपने कार्यालय के स्टाफ रूम में सहकर्मियों के बीच बैठा कहकहों के साथ चाय पी रहा था कि अचानक ऊपर से एक छिपकली मेरे सिर पर आ गिरी। छिपकली का मेरे सिर पर गिरना इतना अप्रत्याशित था कि मैं सिर को झटका देता हुआ उठ खड़ा हुआ। छिपकली जिस ओर भागी उस ओर बैठे लोग कुर्सियों से उचक कर किनारे खड़े हो गए। शरीर से हट्टी – कट्टी किंतु हृदय से कमजोर कुछ महिलाओं की चीख निकल गई – उई…. छिपकली….।

लोग अपनी घबराहट छिपाने हंसते हुए छिपकली को देख रहे थे जो पुनः दीवार पर चढ़ कर एक कीड़े को पकड़ने के लिए शिकारी की मुद्रा बना चुकी थी। छिपकली के लिए आदमी के ऊपर गिर जाना भले ही कोई उल्लेखनीय घटना न हो किंतु आदमी के लिए छिपकली का उसके ऊपर गिरना विशेष बात है।

छिपकली कितने बजे गिरी, उस समय का चौघड़िया क्या था, छिपकली शरीर के किस अंग में गिरी, किस दिशा से गिरी, गिर कर किस दिशा में भागी, उसका रंग – रूप क्या था, आदि – आदि बहुत सी ऐसी बातें हैं जो छिपकली के गिरते ही आदमी के मन में उठती हैं क्योंकि इन तमाम बातों के गणित से ही छिपकली के गिरने पर प्राप्त होने वाला शुभ – अशुभ फल निकाला जाता है।

बुजुर्गों का कहना है कि छिपकली के ऊपर गिरते ही स्नान करके भोले शंकर की स्तुति करना हितकर होता है। भोले के स्मरण से जहरीली छिपकली के गिरने से उत्पन्न होने वाले अशुभ फलों की आशंका समाप्त हो जाती है। यों पहले भी मेरे ऊपर दो – चार बार छिपकली गिर चुकी है किंतु यह पहला अवसर था जब कोई छिपकली दस लोगों की उपस्थिति में मेरे ऊपर गिरी और तरह – तरह के प्रश्न खड़े कर गई। मैं सोचता हूं कि न जाने उस छिपकली की मुझसे क्या दुश्मनी थी अथवा इतने लोगों के बीच उसने मुझमें क्या पाया जो वह सबके सामने मेरे सिर पर आ गिरी, अरे उसे गिरना ही था तो पूर्व छिपकलियों की भांति अकेले में मुझ पर गिर कर अपनी इच्छा पूरी कर लेती। जब से मुझ पर छिपकली गिरी है मैं बहुत परेशान हूं। मुझे तरह – तरह के सुझाव मिलना प्रारम्भ हो गए।

सर्वप्रथम मुझे अपने स्टाफ की महिला सदस्यों से सलाह मिली कि जहां भी बैठना हो पहले ऊपर देख लेना चाहिये कहीं ऊपर छिपकली तो नहीं है। कुछ महिलाओं ने तो यह भी कहा कि हम जहां भी बैठें थोड़ी – थोड़ी देर में ऊपर देखते रहें तो छिपकली के ऊपर गिरने से बच सकते हैं। मैं उनकी सूझबूझ और दूरदर्शिता पर हैरान था कि जिनके ऊपर जीवन में कभी छिपकली नहीं गिरी वे भी छिपकली को लेकर कितनी सतर्क हैं और एक मैं हूं जिस पर अनेक बार छिपकली गिर चुकी है फिर भी उससे बचने का उपाय नहीं सोच पाया।

लंच का समय समाप्त होने के कुछ ही देर बाद पूरे ऑफिस में यह खबर फैल चुकी थी कि आज स्टाफ रूम में मेरे सिर पर छिपकली गिर गई। मेरा अपनी कुर्सी पर बैठ कर कार्य करना मुश्किल हो रहा था। दो – दो, तीन – तीन के दल में सहकर्मी मुझसे मुलाकात करने आ रहे थे और मेरे प्रति मंगलभाव व्यक्त करते हुए मुझसे विस्तार में छिपकली प्रसंग सुनना चाह रहे थे। कुछ लोग छिपकली के ऊपर गिरने संबंधी स्वतः के अनुभव मुझे सुना रहे थे। कुछ महिलाएं और उनके स्वभाव से मेल खाते पुरुष स्टाफ रूम में जा जाकर उस दुस्साहसी छिपकली को देख रहे थे जो कुछ देर पहले मुझ पर गिरी थी। पूरे ऑफिस में छिपकली कांड गूंज रहा था। बड़े बाबू अपने आसपास बैठने वाले कर्मचारियों को बता रहे थे कि हम भारतीय हर मामले में पीछे हैं। हमारे यहां की छिपकलियां भी कोई छिपकलियां हैं अरे, छिपकलियां तो अफ्रीका में होती हैं जो गिरना नहीं उड़ना जानती हैं।

कुछ देर बाद मेरे सामने कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष व कुछ अन्य पदाधिकारी खड़े थे। अध्यक्ष महोदय मुझसे कह रहे थे – प्यारे भाई, चिंता मत करो छिपकली क्या चीज है यदि पहाड़ भी तुम्हारे ऊपर गिर जाए तो भी हम तुम्हारा बाल बांका नहीं होने देंगे। छिपकली शायद हमारी एकता और ताकत से परिचित नहीं थी। उन्होंने आवाज लगाई – कर्मचारी एकता, साथियों ने जवाब दिया – जिंदाबाद, जिंदाबाद। उन्होंने फिर आवाज लगाई – जो हमसे टकराएगा, साथियों ने जवाब दिया – चूर चूर हो जाएगा। मैंने अपने सुख – दुख के साथियों को चाय पिलाकर विदा किया।

इतने में मेरे एक बुजुर्ग साथी जो घर पर होमियोपैथी द्वारा लोगों का इलाज करते थे और दवाओं की एक इमरजेंसी पेटी ऑफिस में भी रखते थे मेरे पास आ पहुंचे। उन्होंने मुझे दवा की एक पुड़िया देते हुए कहा – यह लो इसे अभी एक गिलास पानी के साथ पी लो और किसी भी तरह के इन्फेक्शन की ओर से निश्चिंत हो जाओ। मैं दवा लेने से बचना चाहता था किंतु वे दवा देने का हाथ आया मौका खोना नहीं चाहते थे। अंततः वे विजयी हुए। इसी समय चपरासी ने आकर मुझसे कहा कि आपको फौरन साहब ने बुलाया है।

मैं हाथ जोड़े साहब के सामने खड़ा था। “सुना है तुम्हारे ऊपर छिपकली गिर गई”, साहब ने प्रश्न किया। मैंने कहा जी हां। वे बोले – यह बात तुम्हें सबसे पहले मुझे बताना थी। मेरे ऑफिस में क्या हो रहा है इसकी जानकारी मुझे इतनी देर से दूसरों के द्वारा मिल रही है। आप जानते नहीं कि मुझसे जानकारी छुपाने पर मैं आपको सस्पेंड भी कर सकता हूं। मैने कहा – सर मामूली सी घटना थी इसलिए….। वे बोले – घटना मामूली है या गंभीर यह तुम तय करोगे तो फिर मैं यहां किसलिए हूं। मैंने कहा, क्षमा करें सर गलती हो गई। उन्होंने कहा ध्यान रखिए आइंदा ऐसी गलती न हो। मैं जी सर कहकर वापस जाने को मुड़ा। वे बोले,  ठहरो आधे दिन के अवकाश का आवेदन देकर घर जाओ, स्नान करो, भगवान को अगरबत्ती लगाओ। छिपकली गिरने के बाद किसी को स्पर्श तो नहीं किया। मैंने कहा, जी नहीं सर। वे बोले – गुड। मैं आधे दिन का अवकाश लेकर घर की ओर बढ़ चला। डोरवेल सुनकर अम्मा जी ने दरवाजा खोला। “बेटा आज जल्दी आ गए”। हां अम्मा सिर पर छिपकली गिर गई थी इसलिए, ऐसा कहते हुए मैंने घर के अंदर प्रवेश करने कदम बढ़ाए ही थे तभी अम्मा ने कड़क आवाज में कहा – बहू से पानी भेज रही हूं बाहर से नहाकर ही घर के अंदर घुसना। मैं नहाने के लिए घर के बाहर दरवाजे पर खड़ा छिपकली को कोसता हुआ पानी आने की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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