(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “रिटायरमेंट”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४५ ☆
🌻लघुकथा🌻 रिटायरर्मेंट 🌻
(पुरस्कृत लघुकथा)
अभी घनश्याम बाबू रिटायरर्मेंट होकर घर पहुंच भी नहीं पाये थे। आलमारी में सहेजे गये मेगजीन, पुराने अखबार को बाहर दालान पर ढेर लगा दिया गया था।
हँसते मुस्कुराते चेहरे का रंग अचानक श्वेत होता चला,
सच तो है अब उन पुरानेअखबारों को कौन देखेगा, जिसमें कभी परीक्षा परिणाम देखने की होड़ लगी होती थी।
पापाजी अच्छे दामों से ले रहा कवाड वाला। अब अलमारी में सोनू अपनी किक्रेट मैच का सामान रख लेगा।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– संस्मरण…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८२ — संस्मरण —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
साठउपन्यासों का ख्यातिलब्ध लेखक आज शर्म और आत्मताप से इस कदर व्यथित था कि उसे लगता था अपने गले में फाँसी की रस्सी डाल कर मर जाए। बात यह थी संस्मरणों की उसकी नवीनतम कृति को विश्व पुरस्कार मिला था। पर उसका अपना तो एक भी संस्मरण नहीं था। अपने संस्मरण दमदार और खास न होने से उसने तीन चार अनपढ़ कर्मठ बूढ़ों से साठ तक संस्मरण सुन कर अपने संस्मरणों के नाम से अपनी कृति तैयार की थी।
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing Short Story “~ Setting Sun and the Earthen Lamp…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
Short Story ~ Setting Sun and the Earthen Lamp… ~
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As the setting sun, draped in fiery splendour, whispered to the world,
‘Who shall now inherit my radiant duty?’
A reverent hush fell upon the universe— mountains bowed in respect, oceans stilled their tides, and even the winds held their breath…
Then, from a solitary threshold, a tremulous voice arose— the gentle flame of a humble diya, an earthen lamp, its glow quivering yet resolute:
‘I shall, my Lord… as much as this small heart can bear!’
And in that moment, the setting sun bestowed a warm smile upon the earth, knowing that light is eternal, merely passing from one beacon to another!
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~Pravin Raghuvanshi
~ अस्ताचल का सूर्य और मिट्टी का दीपक…~
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जब अस्ताचल का सूर्य अरुणिमा ओढ़े गगन से बोला — “अब मेरे प्रकाश का उत्तराधिकारी कौन होगा?”
क्षण भर को थम गई सारी सृष्टि — पहाड़ झुक गए, सागर शांत हो गए, यहाँ तक कि पवन भी थम गई श्रद्धा में।
तभी किसी दहलीज़ से एक कोमल स्वर उठा — मिट्टी के छोटे से दीपक ने, थरथराती लौ में विनम्रता भरकर कहा — “मैं करूँगा, प्रभु… जितना मुझसे संभव होगा।”
और उस क्षण, डूबते सूर्य ने मुस्कराकर भूमि पर निहारा — जानता था, प्रकाश शाश्वत है, वह तो बस हस्तांतरित होता है…!
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “पहचान”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।
कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।
– जरा सरकिए,,,
उसने शान से जमे आदमी से कहा।
– क्यों?
– मुझे बैठना है।
– किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?
– कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।
जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया , फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।
– क्योंकि यह सीट मेरी है।
– कहां लिखा है?
जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।
– हुजूर , आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।
सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला- मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।
– वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?
उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!
एक युवा बेरोजगार से किसी ने पूछा –एक सवाल का जवाब दोगे !
–हां पूछिए
–मान लो आप राजनीति में हो और चुनाव जीत गये। बड़ी पार्टी ने तुम्हें 100 करोड़ ऑफर किये कि तुम्हें उनकी पार्टी में विलय करना होगा अपने विजयी साथियों के साथ तो तुम क्या करोगे !
–ये भी कोई पूछने की बात है ?
मतलब बड़ी शान से विलय कर लूंगा।
और तुम्हारी अपनी पार्टी के प्रति निष्ठा का क्या होगा ?
–निष्ठा का अचार डालना है ! निष्ठा को आजकल पूछता कौन है।
—ठीक है लेकिन इतने पैसों का करोगे क्या ?
दुनिया घूमूंगा। गरीबों की मदद करुंगा। आखिर पैसा ही तो सब कुछ है।
—गांधीजी कहते थे साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए।
— गांधीजी—! उन्हें तो मैं ही नहीं सारा देश जेब में लेकर घूमता है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – मकान, मार्केटिंग और मार्मिकता।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७० – लघुकथा – मकान, मार्केटिंग और मार्मिकता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
शहर के “मजबूरी नगर” में रहते हुए मुझे वो पुराना सरकारी क्वार्टर छोड़ना पड़ा, जिस पर चिड़ियों से लेकर बिल्ली-बिल्लों तक, सबका कानूनी हक था। मेरा बेटा बहादुर “बंटी” अब यू-ट्यूबिया एंटरप्रेन्योर बन गया था—घर से लाखों की कमाई का दावा करता, लेकिन बिल के समय अजीब गूंगी मछली बन जाता। बेशक, मैंने भी कभी पायलट बनने का सपना देखा था, मगर सरकारी दफ्तर की फाइलें उड़ाते-उड़ाते बाल सफेद हो गए। इन दिनों बैंक बैलेंस की ‘डोंगी’ कंटीले बजरे जैसी हिल रही थी। मजबूरी ने मुझे संकटमोचन बना दिया—अब या तो लोन लेकर बुढ़ापा फाइनेंस करूं, या पुराने घर के खूंटे खोल दूँ। उसी उहापोह में मेरी बेटी डिजिटल-दीदी “रीता” का कॉल आया—”पापा, कभी घर आओ, हम सब मिलकर मूँग की दाल के पकोड़े खाएँगे।” मोबाइल के वीडियो कॉल पर रिश्ते अब रेसिपी से ज्यादा लुभावने लगते हैं। दीदी-बाकी मुद्दों पे कभी बोलती ही नहीं, बस वही चुटकुले—”घर बेचो… लोन मत लो… एक सुपरहिट आईडिया दूँगी!”
शाम को बहू-बेटे को बुलाया—”सवाल पेंचीदा है, राय मशविरे दो।” बेटा बोला—”पापा, लोन छोड़िए, घर बेचिए, ईएमआई की औकात नहीं बची, मार्केटिंग के मामले में दीदी टॉप पर है।” दीदी के बैंकर पति—जिनका नाम सुनते ही मोहल्ले वाले बचे हुए क्रेडिट कार्ड छुपाने लगते हैं—मुस्कुराए, “घर का ग्राहक मैं हूं! रजिस्ट्री से बैंक तक सब देख लूंगा।” बंटू हैरान—”दीदी! ये तो अपना ही घर ख़रीद रही है!” दीदी बोली—”पापा, तुम्हें बुढ़ापे में अकेला नहीं छोड़ेंगे। अब हम किरायेदार नहीं, मकान मालिक हैं—लेकिन किराया मांगेंगे नहीं!” हॉल में चुप्पी छा गई… मैंने खिड़की से बाहर झांककर उस गुलमोहर को देखा जिसे कभी माँ ने लगाया था। यादें आंखों की कोर तर कर गईं। फिर दीदी बोली—”पापा, इस घर में बचपन की किलकारियां थीं, अब इसमें आपकी साँझ ढलेगी—बैंक के नए कॉम्प्लेक्स की आकांक्षा साथ में है, और मीठे पकोड़े भी!” मैं कुछ कह न सका। सिर्फ इतना कर पाया कि दोनों बच्चों को अपने डबडबाए गले से लगा लिया—मन ही मन सोचा—घर, रिश्ते और बाज़ार… सबसे बड़े फाइनेंसियल इंस्ट्रूमेंट हैं— ईएमआई और आंसू किस्तों में ही निकलते हैं!
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “प्रभाव… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆
लघुकथा – प्रभाव… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
सीताराम जी बचपन से नियम के पाबंद रहे हैं और आज भी हैं। नियम व न्याय उन्हें बेहद पसंद है। अब किराने की दूकान बेटों ने संभाल ली है, परंतु जब वे दूकान पर बैठते थे तब भी नियम से चलते थे, न कम तौलते न ज्यादा देते। परिचित गरीब को उधार दे दिया करते, यह सोचकर कि प्रभु ने उन्हें यह अवसर दिया है कि किसी की मदद कर सकें, इसलिए करते रहते। उधारी वे लोग चुकाते भी थे पर उनके पास पैसा आने पर। लेकिन उधारी का पैसा आ जाता। सीताराम जी पैसे के पीछे ज्यादा भागने वाले इंसान नहीं थे। पुश्तैनी घर था रहने के लिए। उनकी पत्नी ईश्वर भक्ति में डूबी रहतीं और घर में आने वालों की मन से आवभगत करतीं। बच्चों को शिक्षा देना लाजमी था तो वे इसके लिए पीछे नहीं हटे।
दोनों बेटों और बेटियों को अच्छे स्कूलों में अच्छी शिक्षा दिलवाई। पढ़ लिख कर वे योग्य भी बने। बेटियों का विवाह भी अच्छे घरों में हुआ और उन्होंने अपनी मां की ससुराल में भी अच्छी तरह गृहस्थी संभाली। दोनों बेटे उनकी तरह परिश्रमी निकले और माता पिता की सेवा को ही ईश्वर सेवा मानते। एक ने पुश्तैनी किराने की दूकान संभाल ली तो दूसरे ने कपड़े की दूकान खोल ली परन्तु हिसाब किताब अलग होते हुए भी एक था। संयुक्त परिवार। शाम को भेजन के समय दोनों भाई सीताराम जी को अपनी अपनी दूकान के बारे में बताते। कोई समस्या आती तो मिल कर सामना करते। सभी बहुत संतुष्ट और खुश थे।
दोनों बेटों के दो दो बेटे थे। वे जवान हो रहे थे। सीताराम जी उनकी बातों को कुछ समझते और कुछ नहीं। पूछने पर सुनने को मिलता कि दादा जी, “अब जमाना बदल गया है, वह नहीं रहा जो आपके युवा काल में था।अब जमाना एआई का है। आप तो बस आराम से रहिए। ” सीताराम जी चुप रह जाते परंतु सोचते अवश्य कि यह कौन सी शिक्षा है जो आदमी से ऊपर है। इस शिक्षा से क्या आदमी के जीने पर भी असर पड़ेगा।
अखबार पढ़ने में उनका काफी समय व्यतीत होता। अखबार में सब तरह की खबरें रहती हैं और वे बड़े मन से पढ़ते। एआई और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के बारे में भी समाचार पढ़ते। समझने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। पर जब बच्चे कहते हैं कि आप नहीं समझेंगे तो उन्हें हैरानी होती। बच्चे ऐसा क्यों सोचते हैं। वे बच्चों की व्यस्तता, सोचने का ढंग और बातचीत से अनुमान लगाते कि क्या वह समय आ गया है जब युवाओं का जीवन एक कृत्रिम जीवन बन जाएगा जैसा कि वे लोगों से सुनते आ रहे हैं। मनुष्य ही तो सृष्टि का ऐसा प्राणी है जिसमें सोचने की क्षमता है। इस क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है? यही सोचते विचारते उनकी आंख लग गईं।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लाजवंती।)
हमारी कॉलोनी के लोगों ने एक गेट टूगेदर ग्रुप बनाकर रखा था।
व्हाट्सएप पर रोज गुड मॉर्निंग तो चलती थी 15 दिन में या हम यूं भी कह सकते हैं कि महीने में दो बार सभी कॉलोनी के लोग एक-एक करके सभी के घरों में इसी बहाने आते जाते मिलते थे। एक दूसरे का दुख-सुख भी बाँटते थे। कुछ दिन तो यह सब ठीक चला पर अब तो जाने का मन नहीं करता। पुष्पा जी मन ही मन बड़बड़ा रही थी। तभी अचानक उनके घर उनकी सखी जूही आ गई।
क्या बात है बहन बड़ी उदास दिख रही हो? दरवाजा भी खोल कर बैठी थी क्या मेरा इंतजार कर रही थी?
हां सखी, तुम्हारे आने से फूलों की तरह महक इस कमरे में भर गई, जैसे तुम्हारा जूही नाम है इस तरह तुम जूही हो।
वह तो मैं हूं।
पर अब तुम कहो आज तो हम सभी को मिसेज शर्मा के यहां जाना है। क्या पहन कर जाओगी अच्छे से थोड़ा क्लासी लुक में जाना है वे अमीर तो नहीं है लेकिन दिखावा बहुत करती हैं।
हां हां बहन सखी दिखावा क्यों ना करें उनका बेटा अमेरिका में काम करता है।
पति का क्या ? जो दूसरी औरत के साथ चला गया ।
जूही लेकिन क्या हुआ?
इन्हें भी तो ₹50,000 महीने के फ्री में देता है बढ़िया फ्लैट है अपने मन से जी रही है।
ठीक है बहन जाने दो चलो इसी बहाने थोड़ा सा हम घूम फिर लेंगे पुष्पा ने कहा।
जूही ने कहा- लेकिन कल अचानक कुछ आवाज तुम्हारे पड़ोस से आ रही थी लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।
कैसी बातें कर रहे हैं लोग?
लोगों को कंफ्यूजन है कि तुम्हारे घर में झगड़ा हो रहा था या पड़ोस में।
मैंने सुना मुझे रहा नहीं गया मेरा जी मुंह को आ गया इसलिए मैं चली आई।
ठीक किया सखी जूही ने कहा।
कल मेरी बहू आई थी पोती को लेकर। एक तो कभी हाल-चाल नहीं पूछते। मुझे 15000 पेंशन मिलती है।
उसमें भी इन लोगों को कुछ पैसे चाहिए थे। वही जोर-जोर से झगड़ा कर रही थी। घर परिवार में उसने ऐसी गुट बाजी कर ली है कि सबको अपनी तरफ कर लिया है और मुझे बुरा बना दिया है। जिसको जैसा दिखती है वैसे ही बात करती है बहुत ही चालाक औरत है और आजकल यह मोबाइल क्या आ गया है पहले तो मुझे गुस्सा दिलाती है फिर मेरी सारी बातें चुपचाप रिकॉर्ड कर लेती है और जाकर मेरे बेटे अमित को सुना देती है अपने अनुसार और पता नहीं क्या-क्या एडिटिंग भी कर लेती है।
इसी शर्म के मारे तो मैं लाजवंती के पुष्प की तरह हो गई हूं लाजवंती हां कभी छुआ है तुमने उसे छूकर देखना तो मेरे मन की दशा को अपने आप तुम समझ जाओगे चलो शाम को मिलते हैं।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “गोवर्धन पूजा 🌻”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆
🌻लघुकथा🌻 गोवर्धन पूजा 🌻
भगवान गोवर्धन की पूजा, गाय गोबर को प्रतीक बनाकर, उसे गोवर्धन गिरिराज मान पूजा करना सनातनी धर्म रीति रिवाज प्रथा चली आ रही है।
अरे मंजू कल याद से गाय का गोबर ले आना।
जी दीदी ले आऊंगी। दूसरे दिन विधि विधान से पूजन 56 प्रकार के व्यंजनों से गिरिराज जी को भोग।
अन्न कूट का प्रसाद देते मेम साहब बोली – – देख कितना सुन्दर सजाया हमने जो तुम गोबर लाई थीं।
मंजू ने कहा–जी दीदी हम तो सिर्फ गोबर लाये थे। गोवर्धन तो आपके घर बना। हमारे यहाँ तो आँगन लीपापोती।
गोबर धन आप सभी के यहाँ बनता है। हमारे यहाँ तो लीपापोती।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– राग – विराग…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८१ — राग – विराग —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
कवि पूरी तैयारी से अपनी आत्मा और अपनी कविता के सारे शब्द बेचने गया था। खरीदने वाली वक्त की चालाक राजनीति थी। उसने राजनीति से वादा किया था अब वह केवल दरबारी कवि होगा। कवि आगे – आगे गया था। उसके शब्द न चाह कर किसी तरह उसके पीछे — पीछे गए थे। पर खरीदारी शुरु होने पर उसके शब्द उसके पीछे तो थे ही नहीं। उसके शब्दों ने तो आपस में मिल कर सामूहिक आत्म हत्या कर ली थी।