हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ कथा-कहानी – समवेदना – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

☆ समवेदना – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सई और सचिन, दोनों की ही पिछले चार-पाँच महीनों से भागदौड़ जारी थी। पूरा एक महीना तो बस योजना बनाने में ही निकल गया। दूल्हा-दुल्हन को लाभान्वित करने वाले विवाह का शुभ मुहूर्त तय होने के पश्चात् जब उन्हें ज्ञात हुआ कि, उस दिन उनका पसंदीदा सभागृह उपलब्ध है, तो उन्होंने उसका तत्काल आरक्षण कर लिया। अब उनकी असली भागमभाग की शुरुआत हुई।   

बहुत पहले से ही उन दोनों ने अपनी लाड़ली इकलौती बिटिया का विवाह बड़ी धूमधाम से मनाने का फैसला कर लिया था – लेन -देन, बारातियों का आदर सम्मान जैसे अहम प्रश्नों के उत्तर समधी जी ने बड़े सलीक़े से दे दिए थे, सो उन दोनों के तनावग्रस्त मन को काफी राहत मिली थी। परन्तु अन्य साज सामान की खरीदारी, गहने, घरेलू सामान, पूजा की तैयारी, घर की सजावट एवं कई अन्य चीजें बाकी थी। उस पर निमंत्रण सूची पर काफी विचार-विमर्श चल रहा था, तब कहीं जाकर अंतिम फेहरिस्त तैयार होने वाली थी। ऐसे में निमंत्रण पत्रिका का चयन भी एक समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। आने वाले समय में तो बस काम का अटल पहाड़ सामने उनके इंतजार में था। उन दोनों की अक्सर कई मुद्दों पर गहन चर्चा होती, कभी कभी थोड़ी गर्मजोशी से बहस होती, परन्तु इस जुगाली के अंत में जैसे उनमें मतैक्य हो जाता, वैसे इस बार भी वे कई मुद्दों पर सहमति बना चुके थे। विचारों के धागे उलट पलट कर उलझे तो थे लेकिन धीरे धीरे उनको सुलझाने के निरंतर प्रयास के कारण यह उलझन अंततः समाप्त हो गई, और प्रत्येक कार्य योजना के अनुसार मुकाम हासिल करता रहा।

जल्द ही निमंत्रण देने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया। चाय- नाश्ते का पूरा ऑर्डर ही दिया गया था। अपने सगे सम्बन्धियों को भेंट करने के लिए उपहार पैक करके तैयार कर लिए गए। खाना बनाने एवं ऐन वक्त पर उभरने वाले तमाम आकस्मिक काम काज करने के लिए दो अतिरिक्त कामकाजी महिलाऐं भी गत आठ दिन से जुट गईं थीं। घर की सजावट शुरू हो चुकी थी। जहाँ विवाह संपन्न होने वाला था उस हॉल में ले जाने वाले सामान से भरे बैग पैक होकर तैयार थे—यानी सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं—दोनों में उत्साह की लहरें उमड़ रहीं थीं। उनकी उमंगों का ज्वार मानों उफान पर था। देखते देखते कल आने वाला गणेश और मातृका पूजन का दिन देहलीज पर खड़ा दस्तक दे रहा था।   

तेजी से भागने वाले इतने दिनों तक अपनी बेटी के बिछोह के विचार से विचलित होने तक का समय भी नहीं मिल पाया था – परन्तु आज – आज इस घड़ी में, सिर्फ एक ही अनुभूति उसके मन को कचोट रही थी। – एक नन्हीसी कली जैसी उसकी मासूम बिटिया की हर बात, बढती उम्र के साथ बदलती हुई उसकी खिलखिलाती बाललीलाएँ, उम्र की एक एक दहलीज को पार करता उसका कली से फूल में रूपांतरण! फूल में परिवर्तित होते होते उसके बदलते हठ और मांगें! दूसरी तरफ जाने-अनजाने में वृद्धिंगत होती समझदारी, सब कुछ उसकी स्मृति में शीशे की तरह साफ़ दिखाई देने लगा सई को। नन्ही मासूम सलोनी याद आयी, पर याद करना हो तो भूलना पड़ता है। हालत यह थी कि, सलोनी के नन्हे-नन्हे प्यारे बचपन का एक भी पल वह बिसरी ही कहाँ थी, जो उसे याद करना पड़ता? उन यादगार लम्हों को भूलना वैसे भी असंभव ही था। नन्ही सलोनी की वजह से दोनों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी—जो ज़िंदगी अब तक निरर्थक और उदास लगती थी, उसे एक नया अर्थ प्राप्त हुआ था। उनके जीवन को मानों एक नई दिशा मिल गई थी।

‘सलोनी’… कितना प्यारा और सुन्दर नाम सोचा था उन्होंने उसके लिए। वह नन्हीसी बच्ची थी ही वैसी! मनमोहक गुड़िया जैसी लुभावनी, मुस्कुराती- गेहुँआ रंग, बाएं गुलाबी गाल पर खिली एक छोटीसी डिंपल। बेहद खूबसूरत, पानीदार, भावभीनी मतवाली आँखें – पहली ही नज़र में उसने इन दोनों का मन मोह लिया था। उसे देखते बराबर ही दोनों ने तुरंत फैसला किया, कि वे अब अन्य बालकों का मुआयना नहीं करेंगे। उन्होंने आश्रम प्रबंधक को अपने फैसले की सूचना दी। कानूनी औपचारिकताएँ पूरी की गईं और वे दोनों उसे लाने के लिए कोजागिरी पूर्णिमा के दिन चले गए। मन पर सम्मिश्र भावनाओं का घना कोहरा छा गया था। भय – दबाव- उत्सुकता- बेचैनी – विषाद और मन ही मन उस मासूम बच्ची की असली माँ के लिए एक गहरी सहानुभूति- वह अभागी माँ कभी भी यह नहीं जान पाएगी कि उसके ही पेट से जन्मी उसकी लाड़ली बिटिया हमेशा के लिए कौनसे पराये लोगों के हाथों में पहुँच जाएगी। सई को इस वास्तविकता पर बहुत रंज हो रहा था- परन्तु इसका कोई इलाज नहीं था। आश्रम की यहीं शर्त थी।

 —– आश्रम में पहुँचते बराबर सई ने उस नन्ही कली को गोद में उठा लिया और अनायास ही अपनी ह्रदय से लगा लिया, और बस उसी अंतरंग पल में, मानों उसे विचलित करने वाले विचारों का मन पर हावी हुआ बोझ सदा के लिए उतर गया। वह बच्ची भी सई से लिपट गई। सई का हृदय भर आया। वह बच्ची को बारम्बार चूमती रही। जैसे ही उसने उसके लिए लाए नए झबला-टोपी अपने हाथों से उसे पहनाए, उसका मन एक अनामिक आनंद और अनकही संतुष्टि से प्रफुल्लित हो उठा। यहाँ आते समय वे दोनों आये थे, अब विधि के विधान के अनुसार वे हमेशा हमेशा के लिए ‘तीन’ हो गए थे। वे एक अलग ही उल्लास और उमंग के साथ बाहर आए। मुख्य द्वार पर पहुँचते ही सई सलोनी को लेकर वहीं रुक गई, जबकि सचिन कार लेने चला गया।

उस अबोध बालिका के साथ सई लगातार बातें करती जा रही थी। —– “देखो ये पमपम– पसंद आई? और वहां देखो- उसे पेड़ कहते हैं– कितना बड़ा है न? और पूरा हरा हरा –‘ — जिसे दुनिया की कोई जानकारी तक नहीं थी, उस नवजात बालिका को पेड़ दिखाते दिखते उसकी नजर अनायास ही उस पेड़ के पीछे से झांकती दो व्याकुल आँखों की और आकर्षित हुई–.. ..

वे आँखें उस नन्ही बच्ची को हसरत भरी निगाहों से ताक रही थीं। उन सजल नेत्रों से निरन्तर बहती आंसुओं की धार सई दूर से ही महसूस कर पा रही थी। जैसे ही वह पेड़ की ओर बढ़ीं, एक औरत पेड़ की ओट से धीरे से झाँकी…मटमैली फटी साड़ी पर लगे कई पैबंद के बावजूद वह मुश्किल से ही अपने शरीर को ढक पा रही थी। उसके रूखे बाल बिखरे हुए थे और उसका कमजोर शरीर एकदम निस्तेज लग रहा था।  उसने अपने हाथ से सई को इशारा किया — “आगे मत आओ।” —- वहीं से उसने अपनी उंगलियों को अपने कानों पर मोड़ बड़े प्रेमभाव से उस नन्ही बालिका की बलैया ली, अपना हाथ उठाकर उठाकर, ‘अच्छा है-अच्छा है’ का संकेत कर बच्ची को खूब आशीर्वाद दिए। सई की ओर अप्रत्याशित कृतज्ञता भरी नज़र से देखते हुए, उसने अपने हाथ जोड़ लिए – और पीछे मुड़कर देखते हुए  बड़ी ही तेज़ी इस कदर भाग गई कि देखते देखते सई की आँखों से ओझल हो गई…

.. ..  .. .. सई का मन भावनाओं की उथलपुथल से मचलने तो लगा था, परन्तु इसी बीच कई और अपरिचित भावनाओं का कोहरा उसके मन पर छाने लगा —— “क्या वह इस नन्ही की माँ हो सकती है? इतनी दूर से भी, मैं निश्चित रूप से उन कई एक भावनाओं के अम्बार को महसूस कर सकती थी, जो एक के बाद तेजी से उसके पारदर्शी चेहरे पर महीन बदलियों की भांति छाते और छंट जाते। उसे अपने पेट से जने गोले को ऐसे को इस तरह दुनिया जहाँ के थपेड़े झेलने के लिए छोड़ देने के अपराधबोध से वह शर्म के मारे मानों धरती में धंसे जा रही थी। परन्तु उसकी आँखों ने कई अनकही बातें व्यक्त कर दीं थीं —- भले ही काफी दूर से ही क्यों न हो, अपनी बेटी को देखने की खुशी— अब फिर से उसे कभी न देख पाने का अपार अकथनीय दुःख – और एक अनामिक संतुष्टि। और – और अपने ही हाथों से अपने “मातृत्व” की छाप हमेशा के लिए मिटा देने की असीम मानसिक वेदना –जो किसीको भी लब्जों में बयान नहीं की जा सकती। हृदय को अंदर से बाहर तक तोड़ मरोड़ कर रख देने वाली भयानक पीड़ा के ज्वलंत सत्य का एहसास अनायास सई के चेहरे पर भी उभरकर व्यक्त हो गया था। — “उस पल सई को लगा कि परकोटि की विवशता का मूर्तिमंत रूप उसके सामने खड़ा है। परन्तु सचमुच ही वह अबला स्त्री एवं सई, दोनों ही उस क्षण बेबस थे। आश्रम का एक सख्त नियम था कि एक बार आप अपने बच्चे को आश्रम के दरवाज़े पर छोड़ आए, तो ज़िंदगी में फिर कभी भी उसके समक्ष नहीं आ सकते। और यह जानते हुए भी, जैसे ही उसे भनक लगी कि कोई उसकी बेटी को गोद ले रहा है, तो आज उस असहाय माता ने इतना साहसी निर्णय इसलिए लिया था ताकि, वह अपनी बिटिया को अंतिम बार देख सके, भले ही दूर से ही क्यों न हो! 

—–सई का दिल और आँखें दोनों ही आँसुओं से भर आईं। उससे दूर भागती हुई उस स्त्री को उसने मन ही मन सच्चे दिल से वादा किया कि वह उसकी बेटी की माँ बनेगी, और उसी क्षण वह उस नन्ही बिटिया की असली माँ बन गई——-

—— हॉर्न बजते ही सई की चेतना जागी। धीरे से आँखें पोंछते हुए वह सलोनी को धीरे से अपनी बाँहों में भरकर कार में बैठ गई। शांति से सो रही उनकी नन्हीसी परी को वे दोनों कुछ समय तक अपलक देखते रहे, और फिर वे सलोनी के नए घर की ओर निकल पड़े—- यह जानकर कि वे खुद कभी किसी के भी असली माता-पिता नहीं बन पाएंगे, इस सदमे से थोड़ा उबरने के बाद, उन्होंने बहुत सोच-विचार के बाद यह निर्णय लिया। ससुराल और मायके के सभी सदस्यों ने उसे तहे दिल से स्वीकार कर लिया था। इसलिए, सलोनी का घर पर बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया —-

—- और फिर, जैसे कोई कोमल कली हौले हौले खिलती है, वैसे ही वक्त के साथ सलोनी भी धीरे-धीरे सजीला स्त्रीत्व प्राप्त करती गई — और वे दोनों तुष्टि से उसे देखते रहते। बढ़ती उम्र के साथ, उसकी पसंद, विचार, रहन-सहन-बातचीत, व्यवहार, राय, अभिव्यक्ति—सब कुछ बदल रहा था,— सलोनी में हो रहे इतने सारे  बदलावों को वे दोनों अभिभावक के रूप में सचेतन रूप से महसूस कर रहे थे। वह बुद्धिमान तो थी ही, और उसके व्यक्तित्व में वृद्धिंगत होती प्रगल्भता अक्सर उन दोनों को कृतार्थ होने का एहसास दिलाती थी। उन्हें बार बार अनुभूति होते रहती कि, सलोनी के उनके घर-आंगन में प्रवेश करने मात्र से ही उनका  जीवन परिपूर्ण और सार्थक हो गया है। “गोद लेने की अवधारणा” तो उनके भाव विश्व से कब की लुप्त हो चुकी थी। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। वह पूरी तरह से लाड़प्यार से पल रही थी। उसे अपनी पसंद की शिक्षा लेने की स्वतंत्रता थी। और अब उसने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली थी — देखते देखते वह ब्याह करने योग्य हो गई थी। सब कुछ सुचारु रूप से मन के माफिक चल रहा था — सलोनी के और उन दोनों के भी। परन्तु फिर भी, उससे पहले कई सालों से, उनके मन पर लगातार एक दबाव बना हुआ था— सलोनी को एक दिन खुद के बारे में सत्य पता चल ही जाएगा —- तब क्या होगा? उसका और हम दोनों का भी ——-

जब वह अठारह वर्ष की हुई, तब मनोचिकित्सकों की सलाह और सहायता से सलोनी को सई और सचिन ने बतलाया था कि, वे उसके असली माता-पिता नहीं हैं। अधिकांश बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से टूट जाते हैं जब उन्हें अप्रत्याशित रूप से यह कड़वी सच्चाई पता चलती है कि जिन्हें वे अपने माता-पिता कहते हैं, वे उनके वास्तविक जैविक माता-पिता नहीं हैं, तथा कोई भी नहीं जानता कि उनके वास्तविक माता-पिता कौन हैं। यह सत्य निगलना उनके लिए बहुत कष्टप्रद होता है, इसलिए अधिकतर बच्चे मानसिक रूप से अत्यंत विचलित होकर विचित्र और असंगत व्यवहार करने लगते हैं। डॉक्टर ने उन्हें अच्छी तरह आगाह किया था —-   “यह अनुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है कि, ऐसे बच्चे इस आकस्मिक आघात को ठीक से झेल पाएंगे या नहीं” —- और दोनों ही इस बात को लेकर बेहद तनाव में थे। दोनों के मन में डर था कि सलोनी उनसे दूर हो जाएगी। लेकिन उसे किसी न किसी मोड़ पर यह बात मालूम होना जरुरी था। इस पर सुकून इस बात का था कि, आजतक किसी और ने बेबाकी से उसे यह बात नहीं बताई थी। 

सलोनी को सच्चाई पता चलते ही उसने भी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने सात-आठ दिनों से उन दोनों से बात तक नहीं की थी – न ही ढंग से खाना खाया था – वह घंटों खुद को कमरे में बंद किए रहती थी… इधर-उधर धक्का मुक्की करते हुए छटपटाती रहती थी — बिना किसी वजह के उसका चीखना चिल्लाना जारी था, मानों हवा से लड़ाई झगड़ा कर रही हो — दोनों ही बहुत हतप्रभ और भयाकुल थे। परन्तु मनोचिकित्सक के उपबोधन (काउंसेलिंग) का प्रभाव धीरे धीरे असरदार हो रहा था। 

…… और एक दिन, जैसे ही वह उठी, सई के गले में अपनी बाँहें डाल जोर जोर से निरंतर रोती रही। उसकी सिसकियाँ धीरे धीरे शांत हुईं। उसे लगा जैसे उसके मन पर छाए चिंता के घने बादल छंट गए हो। —- “माँ, मैं समझ गई —चाहे मुझे किसी ने भी जन्म दिया हो, आप ही मेरे सच्चे माता-पिता हैं और हमेशा रहेंगे। मैं जानती हूँ कि आप मन की गहराई से मुझे बहुत प्यार करते हैं। और मैं भी आप दोनों से उतना ही प्यार करती हूँ। आपको छोड़ कोई और मेरे माता-पिता नहीं हो सकते।” — और सलोनी के इन प्रेमभरे बोलों के साथ ही सभी के मन का बाँध टूट गया। उसी अनमोल क्षण को साक्षी मान उन तीनों के बीच एक नया, समृद्ध और दृढ़ रिश्ता अंकुरित हुआ। दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था। आश्रम से उस गुड़िया को घर लाते वक्त उन्हें जो प्रसन्नता हुई थी, वह अधिक थी, या इस क्षण में अनुभव की हुई प्रसन्नता की भावना, यह प्रश्न निरर्थक ही साबित होता था। —–

और देखते ही देखते सलोनी विवाह के उम्र तक बड़ी हो गई। उसने अपना जीवनसाथी खुद ही चुना था — बड़ी समझ बूझ के साथ. रिश्ता बहुत ही अच्छा था। लड़का अमेरिका में नौकरी कर रहा था। उसका संपूर्ण परिवार सर्वार्थ रूप से समृद्ध था। रिश्ते को नकारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। सबसे अहम बात यह थी कि उस लड़के और उसके परिवार वालों ने यह सत्य भी सहजता से स्वीकार लिया था कि सलोनी उनकी गोद ली हुई लड़की है। उन्होंने दिल की गहराई से इस विवाह के लिए हामी भरी थी —      और विवाह की घडी बस चार दिन दूर थी। यह तो मानी हुई बात थी कि शादी के बाद सलोनी अमेरिका जाने वाली थी — यह सोचकर कि अब सलोनी इसके बाद किसी और की होगी, उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे ——- 

— और आज, इतने सालों बाद, उसे अचानक उस स्त्री की याद आ गई — जो पेड़ की ओट से ही सही, अपनी बेटी को अंतिम बार देखने की आस लिए हुए थी—उसे उतनी दूर से आशीर्वाद दे रही थी वह — अपने दिल पर हमेशा के लिए पत्थर रख कर अपनी बेटी से जीवन भर के दूर जा चुकी थी वह —–

.. .. .. सई को गहरा एहसास हुआ —- “उस औरत को समाज ने निष्कासित कर दिया था, और मैं यहाँ बहुत ही सम्मानजनक रूप से जी रही हूँ, सलोनी को नौ महीने अपनी कोख में पाले बिना ही उसकी माँ होने का सुख अनुभव कर रही हूँ — अपने आँचल में कन्यादान का पुण्य बटोर रही हूँ, हम इतिकर्तव्यता का श्रेय लेते हुए आनंदोत्सव मना रहे हैं। लेकिन वह असली जनिता? हम कैसे कह सकते हैं कि सामाजिक रूप से दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है? भले ही किसी को यह ज्ञात न हो कि वह इस लड़की, सलोनी, की जननी है, पर मैं तो यह सत्य कैसे नकार सकती हूँ? बेचारी वह अनामिका माता! उसे तो अपनी बेटी का नाम तक मालूम नहीं है! परन्तु उसकी बेटी कैसी दिखती है – क्या करती है – कहाँ रहती है, सुरक्षित और खुश है या नहीं – ऐसे सब विचार उसके मन में ज़रूर मंडराते होंगे, है ना? — यानि हम दोनों के अंतर्मन की ‘माँ’ बिल्कुल एक जैसी ही तो है —- दोनों की भावनाएं एक जैसी – प्यार की कसक वैसी ही – और बेटी से बिछड़ने की व्यथा का एहसास भी एक जैसा है। क्या इसी को ‘समवेदना’ कहते हैं?   

परन्तु … परन्तु शायद — शायद नहीं– बिल्कुल निश्चित ही — तब की उसकी ये सारी भावनाएँ – जब वह हतोत्साहित होकर मज़बूरी में अपनी बेटी को अपने ही हाथों से खुद से दूर धकेल रही थी – मेरी अब की भावनाओं से कहीं अधिक तीव्र और दर्दनाक थीं, भले ही उसने उन्हें न दर्शाया न ही बतलाया! बावजूद इसके मैंने तब भी उन्हें महसूस किया था – और अब तो मैं उसे लगातार और भी अधिक प्रकर्ष के साथ अनुभव कर रही हूँ – क्योंकि न केवल उसे इस स्पष्ट सत्य की जानकारी थी कि, वह अपनी बेटी को भविष्य में जीवन में फिर कभी भी, यहाँ तक कि, दूर से भी देख तक नहीं पाएगी, बल्कि उसके पास इस हलाहल को पचाने के अलावा कोई विकल्प तक नहीं था। यह सब झेलते हुए उसने कितनी प्रचंड मात्रा में क्लेश सहे होंगे—

— परन्तु मेरे साथ ऐसा नहीं है। — ऐसा तो तो होगा नहीं कि, सलोनी का विवाह होने के बाद मैं कभी उसे

देख नहीं पाऊँगी। आज मैं ‘बिछोह’ इस शब्द का दर्दनाक अर्थ सही मायने में समझ पा रही हूँ।”

— सई ने अत्यंत दृढ़ता से यह महसूस किया, और मन ही मन उस माँ के सामने हाथ जोड़े – एक बार फिर उस अनजान जनिता माता को उसकी अपनी बच्ची के बारे में आश्वस्त किया, जो उसके लिए हमेशा के लिए अजनबी हो गई थी। उस स्त्री ने सई के आँचल में न केवल अपनी बेटी सौंपी थी, बल्कि एक सम्पूर्ण “मातृत्व” भी प्रदान किया था – आज पहली बार, सई के हृदय में उसके प्रति इतनी गहराई से समाई हुई वास्तविक और असीम कृतज्ञता उसकी आँखों से ऑंसुओं की बरसात का रूप लेकर बह रही थी। और इतने सालों से मन की गहराई में छाया घना कोहरा अप्रत्याशित तेजी से छंट चुका था।

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मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९१ – जीवन का रंग… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)

☆ लघुकथा # ९१ – जीवन का रंग श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“अरे अरे पगली जब अक्ल बंट रही थी तो कहाँ थी तू, बेवकूफी की हद है, तुम्हें अलमारी में ना ठीक से कपड़े रखने आता है और ना ऑफिस जाते समय मेरे खाने का ठीक से टिफिन रखना आता है। कोई नई डिश बना भी नहीं सकती, रोज-रोज वही रोटी सब्जी ही बस बना कर दे देती हो? मेरे ऑफिस का चपरासी तक अच्छे से टिफिन लेकर आता है। जाने क्या तुम एम ए (इकोनॉमिक्स) से हो और घर का हिसाब किताब तक ठीक से संभाल नहीं  सकती।”

सुबह-सुबह जयंती को मनोज बड़बड़ा रहा था।

जयंती ने गंभीर स्वर में कहा – “मनोज तुम्हें मुझसे इतनी ही दिक्कत है तो मुझे छोड़ कर चले क्यों नहीं जाते। अपने परिवार वालों और दोस्तों के सामने हमेशा मेरी बेइज्जती करते रहते हो और यह क्यों भूल जाते हो कि मेरे पिताजी के दिए हुए फ्लैट में ही रह रहे हो तब शादी क्यों कर ली थी?”

मनोज ने गुस्से में कहा- “अच्छा सुबह- सुबह लड़ाई झगड़ा बंद करो? बस अब आंसू बहाने लगोगी, बस रो रोकर जीती हो। चलो अब जल्दी से नाश्ता लगा दो? ”

तभी फोन की घंटी बजती है।

अब देखो किसका फोन है जयंती?

“मनोज मैं तुम्हारे लिए नाश्ता लग रही हूं?”

मोबाइल की घंटी बजती रही थोड़ी देर बाद जयंती ने फोन उठाया।

फोन मनोज की बहन का था “क्या बात है भाभी तुम्हें फोन उठाने तक की फुर्सत नहीं है घर तो बुलाती नहीं हो और ध्यान भी नहीं रखती हो?”

जयंती ने फोन मनोज को थमा दिया।

“भैया क्या है सुबह-सुबह आप भी फोन नहीं उठा रहे हो अपनी बहन को भूल गए हो क्या?”

“नहीं नहीं मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं? कड़वे झूठ का जहर पी रहा हूं जीवन का सारा रंग ही बेरंग हो गया है।”

“कोई बात नहीं भैया तुम्हारे जीवन में मैं रंग भर देती हूं आज शाम को मैं कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास रहने को आ रही हूं?”

“ठीक है बहन तुम आ जाओ, कम से कम तुम्हारे आने से खाना तो ढंग से मिलेगा।”

मनोज तेज गति से ऑफिस की ओर चला जाता है। जयंती मन ही मन विचार करती रहती है कि सारा दिन मैं सेवा करती हूं जीवन का रंग तो मेरा फीका हो गया है और इन दोनों  बहन भाई के नाटक खत्म ही नहीं हो रहे हैं। अब ये दोनों मिलकर बातों के तीर चलाएंगे।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४६ – पहचान ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा पहचान”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४६ ☆

🌻लघु कथा🌻 पहचान 🌻

कमल पुष्प जैसी पवित्रता, सुंदरता, आध्यात्मिक ज्ञान, और सृजन का प्रतीक अरविंद यथा नाम तथा गुण को व्यक्तित्व में उतारते डॉक्टर अरविंद सरल सहज भाव से भरे हुए।

क्लीनिक पर लगातार भीड़ को नियंत्रित करते उनके सहयोगी। अचानक अफरा-तफरी, भागा दौड़ी। समझ में आता तब तक क्लीनिक में लगभग बीस व्यक्तियों का समागम।

डॉक्टर साहब – – जल्दी कीजिए इनको बचा लीजिए, हमारी दुनियाँ है हम लुट जाएंगे, हम तो परदेसी हैं।

आज एक समारोह में आए हैं तबीयत थोड़ी खराब थी पर इतनी खराब हो जाएगी यह पता नहीं था, प्लीज हेल्प मी!!!!!!

सहायकों ने दूर हटने का ईशारा किया। आपके पास कोई कागज  दवाई पर्चा है? ऐसे कोई डा नहीं देखता। सच ही तो है – – आज की दुनिया में डॉक्टरों की क्लीनिक को तोड़फोड़ करते देर नहीं लगती सारा दोष डा पर डाल दिया जाता है।

चश्मे से झाँकते डॉ साहब अपनी कुर्सी से उठते हुए बोले – “कुछ नहीं होगा हम है न शांति बनाएं!!! पेशेंट का नब्ज जाने किस भाव से उन्होंने देखा और दवाइयां इंजेक्शन का इशारा।“

तत्काल इलाज मिलते ही सब कुछ उठते हुए तूफान की जगह शांत होती लहरें चेहरे पर मुस्कुराहट।

तब तक गर्म चाय लिए एक साहसी आदमी सभी को चाय दे रहा था।

इससे पहले कुछ बात होती मरीज के सिर पर हाथ फेरते कहा– हम डॉक्टर लोगों का जीवन सदैव कर्तव्यों का पालन करते हुए निकलता है। हम वचनबद्ध रहते हैं। बाकी प्रभु की इच्छा। हाथ जोड़ रिश्तेदार डॉक्टर साहब आपकी फीस???

पूरे कमल की तरह खिलखिलाते उन्होंने जवाब दिया सिर्फ मेडिसिन का बिल दे देना है और हाँ जब कभी मैं आपके शहर आया मुझे याद रखिएगा। यह रहा मेरा कार्ड।

पीछे से किसी ने कहा– आज भी भगवान किसी न किसी रूप में आते हैं। डॉक्टर अरविंद की पहचान, सदैव के लिए बन गई मुस्कान 😊

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८३ – फिलहाल इतना ही… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– फिलहाल इतना ही…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८३ — फिलहाल इतना ही — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मेरी मातृभूमि की एक अद्भुत सी कथा है। कभी एक नामी धर्मनेता और एक राजनेता सूखे कुएँ में एक साथ गिर गए थे। दोनों अपने – अपने भविष्य के प्रति चिंतित थे। धर्मनेता धर्म के मामले में गोबर हो जाने से राजनीति में जाना चाहता था। राजनेता चुनाव हार जाने पर धर्म का रास्ता लेने के लिए विकल था। उन दिनों धोती का जमाना होने से उन्होंने आपस में धोती बदल ली। “फिलहाल इतना ही” बदलने से उनका काम चल जाता।

© श्री रामदेव धुरंधर

24 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com
संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३११ – संघे शक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३११ संघे शक्ति… ?

कुछ घटनाएँ ऐसी घटती हैं जो नेत्रों को खारी बूँदों से भर देती हैं। उस सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ। कलेवर में छोटी पर प्रभाव में बड़ी घटना का साक्षी बना।

प्रात:कालीन भ्रमण से लौट रहा था। बस स्टॉप के पास वाले फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे दो-तीन वर्ष से एक फ़कीर का बसेरा है। फुटपाथ के एक ओर पार्क की दीवार है, दूसरी ओर सड़क और सड़क के उस पार चाय की छोटी-सी गुमटी। आते-जाते लोगों से फ़कीर की कभी चाय की मांग हो तो केवल पैसे देकर काम नहीं चलता। सड़क पार से एक प्याला चाय लाकर देना पड़ता है। शायद पैरों से लाचार से हैं यह वृद्ध क्योंकि उन्हें कभी चलते नहीं देखा।

सहसा दृष्टि पड़ी कि वृद्ध को घेरकर पास के उर्दू माध्यम के विद्यालय में पढ़नेवाली आठ-दस छात्राएँ खड़ी हैं। सिर पर स्कार्फ बाँधे, छठी-सातवीं में पढ़नेवाली बच्चियाँ। उत्सुकता के शमन के लिए अवलोकन किया तो नेत्र सजल हो उठे। भिक्षुक को पीने के लिए पानी चाहिए था और हर बच्ची अपनी वॉटर बॉटल में से थोड़ा-थोड़ा पानी फ़कीर के जलपात्र में डाल रही थी। अद्भुत, अलौकिक दृश्य! देखता ही रह गया मैं!

इच्छा हुई दौड़कर जाऊँ और इनके माथे पर हाथ रखकर कहूँ, “वेल डन बेटियो! सबाब का काम किया।” फिर लगा इस कच्ची उम्र को पाप-पुण्य के जटिल समीकरण से मुक्त ही रहने दूँ, रहने दूँ इन्हें सहज। सहजता जो जानती है कि प्यास है तो पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

फ़कीर की पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए एक साथ बढ़े इन नन्हे हाथों ने एक बात और सिखाई कि प्रयास सामूहिक हों तो पानी का पात्र ही नहीं, सूखी नदियाँ और रूठी बावड़ियाँ भी भरी जा सकती हैं।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३१ – लघुकथा – माँ – बेटी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ माँ – बेटी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

वह चौराहे पर पहुंच चुका था। मां बेटी को एक साथ खड़ा देखकर उसने अपनी गाड़ी किनारे लगायी। वह मां बेटी के बीच के प्यार को पढ़ना चाह रहा था। बेटी को दुलारती पुचकारती मां, न जाने क्या सोच रही थी। वह बायें -दाएँ गर्दन घुमाते हुए आरत दृष्टि से कुछ देख रही थी। कभी-कभी वह वह अपने दोनों वाह्य कर्ण को अलग-अलग दिशाओं में घुमा आने वाले संभावित खतरे के आहट को जानने और उससे सतर्क रहने का प्रयास कर रही थी। उसकी मूकभाव भंगिमा और एकटक ताकती नजरे शायद आने जाने वालों से कुछ कहना चाह रही थी।

 मां की गर्दन की ललरियों के नीचे बाल भाव में खड़ी बिटिया माँ के पास खड़ी होकर स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही थी। वह भी अपनी माँ की ही तरह रह रहकर वह अपनी पलके मुद लेती। उसकी माँ जिधऱ देखती वह भी उसी तरफ देखती। मानो वह अपनी माँ की नक़ल कर रही हो। यह सब न जाने उसका अत्यधिक खुशी का भाव था या किसी अंतरवेदना का प्रभाव। जो भी हो माँ – बेटी के प्रेम की मूक परिभाषा समझने के लिए लेखक के पास एक सुन्दर अवसर था।

एक बड़े वाहन के कर्कश आवाज में बजे हॉर्न ने उसको एक बार पुनः डरा दिया। अब माँ आगे दूसरी तरफ बढ़ गयी। बिटिया ने भी उसके पीछे पीछे जाने का निर्णय किया। यह उसका सामान्य एवं एक व्यावहारिक स्वभाव था जिसके अनुसार हर छोटा बच्चा अपने माँ के पल्लू को पकड़कर स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करता है। शायद यही मनोदशा उस नन्हे बिटिया बच्चे के साथ रही होगी। बछीया बिटिया के मंद गति से बढ़ते पाँव को देखकर लेखक नज़रें ठहर सी गयीं। बिटिया बच्चा अपना एक पैर जमीन पर रख ही नहीं रही थी। उसके एक पैर में गहरी चोट लगी थी,जिसके चलते वह अपने तीन पैरों पर ही चल रही थी। चौथे पैर को जमीन पर रखने की उसकी कुबत नहीं रह गई थी। शायद चौराहे पर खड़ी वह बछिया बिटिया किसी वाहन से चोटिल हो गई थी।

 मानवता को समभाव में रहते हुए मनुष्य और पशु में भेद नहीं करना चाहिए। दोनों के प्यार को यदि आप समझ सकते हैं तो उनकी पीड़ा को भी आपको समझना चाहिए।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२८ – बाल कथा – चतुराई धरी रह गई! – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बाल कथा – चतुराई धरी रह गई!की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२८

☆ बाल कथा – चतुराई धरी रह गई! ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

चतुरसिंह के पिता का देहांत हो चुका था. उस ने अपने छोटे भाई कोमलसिंह को बंटवारा करने के लिए बुलाया, “बंटवारे के पहले खाना खा लेते है.” खाने परोसते हुए चतुरसिंह ने कोमलसिंह से कहा.

कोमलसिंह ने जवाब दिया, “ भैया ! बंटवारा आप ही कर लेते. मुझे अपना हिस्सा दे देते.बाकि आप रख लेते. मुझे बुलाने की क्या जरुरत थी ?”

“नहीं भाई. मै यह सुनना बरदाश्त नहीं कर सकता हूँ कि बड़े भाई ने छोटे भाई का हिस्सा मार लिया,” कहते हुए चतुरसिंह ने भोजन की दो थाली परोस कर सामने रख दी.

एक थाली में मिठाई ज्यादा थी. इस वजह से वह थाली खालीखाली नजर आ रही थी. दूसरी थाली में पापड़, चावल, भुजिए ज्यादा थे. वह ज्यादा भरी हुई नज़र आ रही थी. मिठाई वाली थाली में दूधपाक, मलाईबरफी व अन्य कीमती मिठाइयाँ रखी थी.

“ जैसा भी खाना चाहो, वैसी थाली उठा लो,” चतुरसिंह ने कहा, वह यह जानना चाहता था कि बंटवारे के समय कोमलसिंह किस बात को तवज्जो देता है.ज्यादा मॉल लेना पसंद करता है या कम.

चूँकि कोमलसिंह को मीठा कम पसंद था. इसलिए उस ने पापड़भुजिए वाली थाली उठा ली, “भैया मुझे यह खाना पसंद है,” कहते हुए कोमलसिंह खाना खाने लगा.

चतुरसिंह समझ गया कि कोमलसिंह को ज्यादा मल चाहिए. वह लालची है. इस कारण उस ने ज्यादा खाना भरी हुई थाली ली है. इसे इस का मज़ा चखाना चाहिए. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने बंटवारे के लिए नई तरकीब सोच ली.

खाना खा कर दोनों भाई कमरे में पहुंचे. चतुरसिंह ने घर के सामान के दो हिस्से कर रखे थे.

“ इन सामान में से कौनसा सामान चाहिए ?” चतुरसिंह ने सामने रखे हुए सामान की ओर इशारा किया.

एक ओर फ्रीज़, पंखें, वाशिंग मशीन रखी थी. दूसरी ओर ढेर सारे बरतन रखे थे. चुंकि कोमलसिंह के पास फ्रीज़, पंखे,वाशिंग मशीन थी. उस ने सोचा कि भाई साहब के पास यह चीज़ नहीं है. इसलिए ये चीज़ भाई साहब के पास रहना चाहिए.

यह सोचते हुए कोमलसिंह ने बड़े ढेर की ओर इशारा कर के कहा, “मुझे यह बड़ा वाला ढेर चाहिए.”

चतुरसिंह मुस्कराया, “ जैसी तेरी मरजी. यूँ मत कहना कि बड़े भाई ने बंटवारा ठीक से नहीं किया,” चतुरसिंह अपनी चतुराई पर मंदमंद मुस्कराता हुआ बोला . जब कि वह जानता था कि उसे ज्यादा कीमती सामान प्राप्त हुआ है.

कोमलसिंह खुश था. वह अपने बड़े भाई की मदद कर रहा था.

“अब इन दोनों ढेर में से कौनसा ढेर लेना पसंद करोगे ?” चतुरसिंह ने अपने माता की जेवरात की दो पोटली दिखाते हुए कहा.

कोमलसिंह ने बारीबारी दोनों पोटली का निरिक्षण किया, एक पोटली भारी थी, दूसरी हल्की व छोटी. उस ने सोचा कि चतुरसिंह बड़े भाई है. इसलिए उन्हें ज्यादा हिस्सा चाहिए.

“ भैया ! आप बड़े है. आप का परिवार बड़ा है, इसलिए आप बड़ी पोटली रखिए,” कोमलसिंह ने छोटी पोटली उठा ली, “यह छोटी पोटली मेरी है.”

“ नहींनहीं भाई, तुम बड़ी पोटली लो, “ चतुरसिंह ने बड़ी पोटली कोमलसिंह के सामने रखते हुए कहा.

“ नहीं भैया, आप बड़े है, बड़ी चीज़ पर आप का हक बनता है,” कहते हुए कोमलसिंह ने छोटी पोटली रख ली.

चतुरसिंह चकित रह गया. उस ने बड़ी पोटली में चांदी के जेवरात रखे थे. छोटी पोटली में सोने के जेवरात थे. वह जानता था कि कोमलसिंह लालच में आ कर बड़ी पोटली लेगा. जिस में उस के पास चांदी के जेवरात चले जाएँगे और वह सोने के जेवरात ले लेगा. मगर, यहाँ उल्टा हो गया था.

अब की बार चतुरसिंह ने चतुराई की , “ कोमलसिंह इस बार तू बंटवारा करना. नहीं तो लोग कहेंगे कि बड़े भाई ने बंटवारा कर के छोटे भाई को ठग लिया, “ चतुरसिंह ने कोमलसिंह को ठगने के लिए योजना बनाई .

कोमलसिंह कोमल ह्रदय था. वह बड़े भाई साहब का हित चाहता था. बड़े भाई के ज्यादा बच्चे थे. इसलिए वह चाहता था कि जमीन का ज्यादा हिस्सा बड़े भाई साहब को मिले. इसलिए वह चतुरसिंह को अपने पैतृक घर पर ले गया.

“भाई साहब ! यह अपने पैतृक मकान है. पिताजी ने आप के जाने के बाद इसे बनाया था,” कोमलसिंह ने कहा.

चतुरसिंह ने देखा कि एक ओर दो मकान और तीन मंजिल भवन खड़ा है, दूसरी ओर एक दुकान के पास से अन्दर जाने का गेट है. यानि एक ओर बहुमंज़िल भवन के साथ दो दुकान बनी हुई थी. दूसरी ओर एक दुकान और पीछे जाने का गेट था.

चतुरसिंह नहीं चाहता था कि जेवरात की तरह ठगा जाए इसलिए उस ने कहा, “ कोमलसिंह तुम ही बताओ. मुझे कौनसा हिस्सा लेना चाहिए ?”

“ भाई साहब, मेरी रॉय में तो आप दूसरा हिस्सा ले लेना चाहिए,” कोमलसिंह ने कहा तो चतुरसिंह चकित रह गया.

छोटा भाई हो कर बड़े भाई को ठगना चाहता है. खुद बहुमंजिल मकान और दो दुकान हडप करना चाहता है. मुझे एक दुकान और छोटासा बाड़ा देना चाहता है. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमलसिंह, मेरा परिवार बड़ा है, इसलिए मै चाहता हूँ कि यह बहुमंजिल मकान वाला हिस्सा में ले लूँ.”

इस पर कोमलसिंह ने कहा, “ भैया ! आप हिस्सा लेने से पहले यह दूसरा हिस्सा देख ले.” कोमलसिंह ने चतुरसिंह से कहा. वह चाहता था कि बड़े भाई को ज्यादा हिस्सा मिलें. क्यों कि दूसरे हिस्से के अंदर १० मकान और लंबाचौडा खेत था, साथ ही बहुत सारे मवेशी भी थे.

मगर, चतुरसिंह ने सोचा कि छोटा भाई उसे ठगना चाहता है. इसलिए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमल, मुझे कुछ नहीं देखना है, यह दूसरा हिस्सा तेरे रहा, पहला हिस्सा मेरे पास रहेगा.”

“भैया ! एक बार और सोच लो,” कोमलसिंह ने कहा , “ आप को ज्यादा हिस्सा चाहिए, इसलिए आप यह दूसरा हिस्सा ले लें.”

चतुरसिंह जानता था कि खाली जमीन के ज्यादा हिस्से से उस का यह बहुमंजिल मकान अच्छा है. इसलिए उस ने छोटे भाई की बात नहीं मानी. सभी पंचो के सामने अपनेअपने हिस्से का बंटवारा लिख लिया.

“ भैया. एक बार मेरा हिस्सा भी देख लेते,” कहते हुए कोमलसिंह चतुरसिंह को अपना हिस्सा दिखने के लिए दुकान के पास वाले गेट से अंदर गया.

आगेआगे कोमलसिंह था, पीछेपीछे चतुरसिंह चल रह था. जैसे ही वे गेट के अंदर गए, उन्हें गेट के पीछे लम्बाचौड़ा खेत नजर आया. सामने की तरफ १० भवन बने हुए था. कई मवेशी चर रहे थे.

यह देख कर चतुरसिंह ढंग रह गया, “कोमल यह हिस्सा पापाजी ने कब खरीदा था ?”

“ भैया ! आप के जाने के बाद,” कोमलसिंह ने बताया, “ इसीलिए मै आप से कहा रहा था कि आप बड़े है, आप को बड़ा हिस्सा चाहिए, मगर, आप माने नहीं,”

मगर, अब चतुरसिंह क्या करता ? उस की चतुराई की वजह से वह स्वयम ठगाया जा चूका था. वह चुप हो गया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शाश्वत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शाश्वत ? ?

लेखक ने लिखा सत्य।लेखक ने लिखा सिद्धांत। लेखक ने लिखा निष्ठा। लेखक ने लिखा स्वाभिमान। लेखक ने लिखा ध्येय।

समय बीतता रहा। सारे शब्द, लेखक के अस्तित्व में गहरे उतर गए। वह जिया सत्य के लिए, वह जिया सिद्धांत के लिए, वह जिया निष्ठा के लिए, वह जिया स्वाभिमान के लिए, वह जिया ध्येय के लिए।

फिर एक दिन लेखक की देह चिता पर चढ़ी। नश्वर थी, सो जलकर राख हो गई। सत्य, सिद्धांत, निष्ठा, स्वाभिमान, ध्येय चिता की आँच में तपे, निखरे, अदाह्य, अकाट्य, अशोष्य बने, शाश्वत हो गए।

 ?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 1:59 बजे, 10.11.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९० – देवदूत… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देवदूत।)

☆ लघुकथा # ९० – देवदूत श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

झाड़ू लगाने वाली झुमरी जोर-जोर से  घंटी  बजा रही है।

अंदर से एक आवाज – “आई कौन है, जोर-जोर से घंटी क्यों बजा रहा है और सुबह सुबह मेरी नींद क्यों खराब कर दी, कोई चैन से मुझे सोने नहीं देता?”

राम किशोर ने गेट का ताला खोला।

“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो?”

बाबा काकी से कह दो कि चाय पिला दे ठंड बहुत लग रही है?

रामकिशोर ने कहा – “काकी की तबीयत बहुत खराब हो गई है, उससे शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया है, मैं कृष्णकांत का दोस्त हूं।”

झुमरी ने गहरी सांस लेते हुए कहा – “बाबूजी एक ग्लास पानी तो पिला देना।”

रामकिशोर ने कहा- “बेटा अंदर आकर पानी पी लो और चाय बनाओ तुम भी पियो और मुझे भी पिलाओ।”

“अरे बाबू जी आपने सुबह से कुछ नहीं खाया क्या?आपको तो बहुत जोर से खांसी आ रही है?”

“माजी मुझे रसोई नहीं छूने देती, मैं बाहर  झाड़ू लगाती थी और कभी-कभी घर को भी झाड़ू पोछा लगा देती थी।”

रामकिशोर ने कहा- “कोई बात नहीं बेटा अगर तुम्हारे पास समय हो तो चाय हम तुम दोनों पीते हैं और रोटी सब्जी बना दो तो मैं खा लूंगा क्योंकि मुझे खाना बनाना नहीं आता और यहाँ किसी के टिफिन वाले को ढूंढने जा रहा था इस उम्र में घर का खाना ठीक रहता है पर क्या करूं मुझे कोई खाना देने वाला नहीं है।”

“बाबूजी आप मेरे हाथ का छुआ हुआ खाना खाएंगे क्या?” झुमरी ने धीमे स्वर में कहा।

रामकिशोर जी ने कहा – “हां क्यों तेरे हाथ में क्या खराबी है? बाहर होटल में और टिफिन वाले कौन हैं और उनकी जात क्या पता?”

“ठीक है बेटा तू मेरे लिए भगवान बन कर आई हो।”

“बाबा, क्या आप अपने घर में भी अकेले रहते हो?” झुमरी ने उत्सुकता में पूछा।

हां क्या करूं बेटा, मेरे बेटा बहू बाहर विदेश में रहते हैं और मैं अकेला अपने घर में रहता हूं।”

“बाबा मैं आपके लिए अडूसा के पत्ते लेकर आती हूं। आपकी खांसी,बलगम, ज्वार और घुटनों का दर्द सब ठीक हो जाएगा।” 

“भगवान काकी को जल्दी अच्छा कर दे।”

झुमरी और काका दोनों की आंखों से आंसू निकल गए।

“भगवान अच्छे लोगों को इतनी तकलीफ क्यों देता है?” झुमरी कहती कहती रसोई में खाना बनाने लगती है।

राम किशोर मन ही मन सोचते हैं कि भगवान सबको सहारा देता है इस बच्ची के कारण मेरी खांसी भी ठीक हो जाएगी। यह तो सचमुच देवदूत है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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