हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

14 जून 2023 को ठीक बारह बजे सहयात्री पवन राय ने टैक्सी लेकर दरवाज़े पर दस्तक दी। हम कपिल मुनि के रूप में गंगा सागर में विराजमान विष्णु भगवान का नाम लेकर चौपहिया में सवार हो गए कि यार अनिश्चितताओं से भरी जीवन यात्रा में मुश्किलों भरी जीवंत यात्राओं से क्या परहेज़ करना। जीवन में यदि सब कुछ निश्चित हो जाये तो जीवन का रस ही समाप्त  हो जाएगा। आस्थावान और यथार्थवादी दोनों कहते हैं कि सारी सावधानियों के बावजूद जो होना है सो तो होना ही है।

राजाभोज हवाई अड्डा पहुँच विमानतल पर प्रवेश लिया। सुरक्षा संबंधी जाँच हेतु आगे बढ़े। हमारे सामने कुछ व्हीआईपी क़िस्म की सवारियाँ थीं। संभवतः सीआईएसएफ़ से संबंधित अधिकारी थे। एक अफ़सर उनकी अगवानी कर रहा था। हम जब आगे बढ़े तो हमसे बेल्ट निकालने को कहा गया। जबकि व्हीआईपी क़िस्म के जीव बिना किसी जाँच के निकल गए। सीआईएसएफ़ वाले अपने अधिकारियों की बेल्ट निकलवाने से तो रहे। यदि अफ़सर की बेल्ट निकली तो रंगरूटों की खैर नहीं। औपचारिकता पूरी करके विमान में सवार होने प्रतीक्षा लॉबी में पहुँचे। वहाँ पता चला कि भोपाल से हैदराबाद की उड़ान दस मिनट देरी से रवाना होगी। अंततः विमान में सवार हो गए। हवाई यात्रा के दौरान पृथ्वी को आसमान से देखकर हवाई ख़्याल आने लगे। पृथ्वी सूर्य के गैस वलय से निकली एक गैस पिंड के रूप में अलग होकर ब्रह्मांड में घूमने लगी। उससे एक गैस वलय घूमता हुआ निकला। वह भी अपनी धुरी पर घूमता हुआ पृथ्वी की परिक्रमा करने लगा- वही हम सबका चन्दामामा हो गया। अब ये तीनों एक दूसरे ने अलग होकर भी गुरुत्वाकर्षण से जुड़े हैं जैसे पति पत्नी आचार विचार व्यवहार में अलग होकर भी एक दूसरे के आकर्षण से जुड़े रहते हैं। एक दूसरे की परिक्रमा करते रहते हैं। कभी उलझते हैं- कभी सुलझते हैं। एक दूसरे की गर्मी ठंड बरसात सहते हुए साथ चलते रहते हैं। सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा की तरह सभी घूम रहे हैं। कहीं किसी को चैन नहीं है। 

पृथ्वी सूर्य से विलग होकर ठंडी होने लगी। इतनी ठंडी हो गई कि उसके ध्रुवीय प्रदेशों पर बर्फ जमने लगी। पूरी सफ़ेद हो गई। फिर पृथ्वी सूर्य के नज़दीक आने लगी तो बर्फ पिघल कर बादल बने। बादल से बारिश आई। उत्तरी क्षेत्रों में पोखर में जल इकट्ठा हुआ। उसी जल में सबसे पहले जलचर जीव की उत्पत्ति हुई। इसीलिए हिंदू शास्त्रों में विष्णु का पहला अवतार मत्स्य-अवतार है। कुछ जलचर जीवों में इस तरह के फेंफड़े विकसित हुए जो जल और थल दोनों में जीवित रह सकते थे। तभी दूसरा अवतार कच्छप-अवतार हुआ। तीसरा अवतार सूकर अवतार पशु रूप में हुआ जो थल पर ही जीवित रह सकता है। चौथा अवतार नरसिंह-अवतार हुआ जो यह सिद्ध करता है कि मनुष्य का विकास पशु से हुआ है। यही डारविन का क्रमागत विकास का सिद्धांत भी कहता है।

पृथ्वी के उसी उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में आर्यों के पूर्वज निवास करते थे। जब पृथ्वी पुनः सूर्य से दूर घूमने लगी। तब एक और शीत काल आया। जीवों का जीवन दूभर होने लगा। उन्होंने उत्तर से दक्षिण दिशा की यात्रा शुरू कर दी। समुंदरों और नदियों के किनारे बसने लगे। वे कहीं से आने की कारण आर्य कहलाये। उन्होंने यूरोप और एशिया को बसाना आरम्भ किया।

विमान उड़ने के बाद आसमान में चिलचिलाती धूप का नज़ारा दिखने लगा। ऐसा लगा जैसे ज़मीन सुलग रही है। आधा घंटे उड़ने के बाद नीचे नर्मदा नदी के दर्शन हुए। विमान धरातल पर बहती नर्मदा नदी को पार करके पुराने समय में प्रसिद्ध खानदेश अर्थात् बुरहानपुर जलगाँव अहमदनगर के ऊपर से उड़ान भरता हुआ जाएगा।

जब भारत में आर्यों की पहली खेप आई तब कुछ शांति प्रिय द्रविड़ जातियाँ उत्तर में सिंध नदी के आसपास बसती थीं। आर्यों ने उन्हें खदेड़ा तो वे निचले हिस्से में समुद्र तक खिसक गईं। आर्यों को गंगा का इलाक़ा गंगासागर तक मिल गया। आर्यों की पहली खेप बंग गंगासागर तक खिसक गई। दूसरी खेप गुर्जर पश्चिम की तरफ़ आधुनिक द्वारिका तक गई। तीसरी खेप मरहट्ट द्रविड लोगों से जा टकराए। फिर जाट मालव क्षुद्रक का आगमन हुआ जो उत्तर प्रदेश राजस्थान में बस गए। उन्हीं से राजपूत विकसित हुए। इन सबने सब तरफ़ से घुसपैठ कर मध्य प्रदेश को आबाद किया। जिसकी राजधानी भोपाल से हवाई जहाज़ में सवार होकर हैदराबाद पहुँचने वाली उड़ान में सवार हैं। हम किनारे की सीट होने से धरती के नज़ारे दिखने लगे। पायलट द्वारा दो घंटे की उड़ान बताई गई। विमान में ए.सी. की तो बात ही ना करें, पंखा तक नहीं चल रहे थे। सवारियों ने चिल्लाना शुरू किया। उन्हें बताया गया कि विमान के इंजन से वातानुकूलन सिस्टम जुड़ा हुआ है। विमान उड़ान भरते समय ए.सी. चालू होगा। विमान में दो उड़न परी खाने पीने की सामग्री बेंच रही थीं। एक थोड़े कम उम्र की सुंदर चेहरा और आकर्षक व्यक्तित्व की थी। दूसरी थुलथुल देह की थी और उसके चेहरे पर सौंदर्य प्रसाधन के बावजूद ताज़े बखर चले खेत की तरह हल्के गड्ढे साफ़ दिख रहे थे। विमान में 200/- रुपये के पचास ग्राम काजू मिल रहे थे लेकिन हमें कुछ भी ख़रीदने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। पवन भाई डी-मार्ट से 200/- में 250  ग्राम सिके मिक्स्ड ड्राई फ्रूट के पैकेट साथ में लाए थे। ड्राई फ्रूट्स चबाते और बातें करते उड़ान यात्रा का आनंद लेते रहे। अब बाहर गोदावरी नदी दिख रही है जिसका उद्गम तो नासिक से है परंतु छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े से आने वाली नदियाँ गोदावरी को पानीदार बनाती हैं। वही इलाक़ा नीचे दिखता चल रहा है। अब सफ़ेद बादलों के झुरमुट ने ज़मीन का दिखना रोक दिया है। पवन भाई लंदन में पहली बार स्कूल जाते नाती के वीडियो देख कर खूब खुश हो रहे हैं। बच्चा घर से पापा के साथ निकलते हुए खुश है कि तैयार होकर पापा के साथ घूमने जा रहे हैं। लेकिन स्कूल में छूटते समय उदास और खिन्न दिखता है। पापा पर थोड़ा नाराज़ भी नज़र आता है। पापा भी द्रवित तो होते हैं। उसे बार-बार गले लगाते हैं परंतु पिता को बच्चों के भले के लिए कुछ काम उनकी नाखुशी झेलकर भी करने पड़ते हैं। जिसकी क़ीमत बच्चों को बहुत बाद में समझ आती है।

तक़रीबन एक घंटे बाद ताप्ती नदी दिखी। मुंबई से उड़कर आते मानसूनी बादलों के दर्शन हुए। सफ़ेद बादलों की माया ज़मीन पर छाया बिखेर रही थी। नीचे एक खूब लंबी सड़क दिखती चल रही है वह निश्चित रूप से काशी से कन्या कुमारी अंतरीप तक पहुँचने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग सड़क है। उसका नागपुर से हैदराबाद पहुँचने वाला 500 किलोमीटर हिस्सा विमान यात्रा के साथ चल रहा है। महाराष्ट्र के कॉटन उत्पादन क्षेत्रों को पार करके आंध्रप्रदेश-कर्नाटक सीमा से गुज़र कर गंतव्य की तरफ़ बढ़ने लगा।

दो घंटों से ड्राई फ्रूट्स खाकर पानी पीते चल रहे हैं। शरीर के वाटर टैंक ने ख़तरे की घंटी बजाई। विमान में एक ही टॉयलेट पीछे की तरफ़ है। जिसमें कोई सवारी बहुत देर से व्यस्त है। विमान परिचारिका ने रुकने को कहा। उससे बातें होने लगीं। बात ही बात में वेतन पैकेज के बारे में पूछा तो वह बोली- इट्स गुड ? हमने कहा रिज़नेबल या गुड ? वह बोली- रिज़नेबल। लेकिन उसने पैकेज के बारे में यह नहीं बताया कि कितना मिलता है। भद्रता का तक़ाज़ा है कि पुरुषों से वेतन और महिलाओं से उम्र नहीं पूछना चाहिए। यह तब की बात है जब महिलाएँ नौकरियों कम करती थीं। अब इसे बदल देना चाहिए। अब कामकाजी महिलाओं से उम्र और वेतन दोनों नहीं पूछना चाहिए। उड़नपरी यही सीख दे गई। 

दो घंटे हैदराबाद विमानपत्तन पर गुज़ारना है। कहने को तो यहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, परंतु हमारी घरेलू उड़ान होने से देशी स्तर की असुविधाओं से निपटना था। मोबाईल चार्जिंग पॉइंट चार्ज नहीं थे। ख़ाली छेदों में एडॉप्टर घुसाया लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। मजबूरी में एक दुकानदार को पटाया। कामचलाऊ चार्जिंग हो गई।

नियत समय पर हैदराबाद से कोलकाता उड़ान उड़ी। अब विमान में बैठकर यात्रा वृतांत लिख पा रहे हैं। विमान में 180 कुर्सियाँ  हैं और एक भी कुर्सी ख़ाली नहीं है। वह दिन दूर नहीं जब एयरपोर्ट और विमानों में रेल्वे स्टेशन जैसी भीड़ नज़र आने लगेगी। विमान दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा की यात्रा कर रहा है। आकाश में बादलों की बारात है। सफ़ेद बादलों पर अस्ताचल गामी मार्तण्ड की तिरछी तीक्ष्ण किरणें नभ को रोशन कर रही हैं। अब फिर नीचे गोदावरी बह रही है। लेकिन विशाखापत्तनम तक उसका नाम विशाखा हो चुका होगा। विमान अब तेलंगाना राज्य की सीमा से निकल छत्तीसगढ़-उड़ीसा के आसमान पर उड़ रहा है। नीचे महानदी इठलाती चली जा रही है। जो बंगाल की खाड़ी में मिलेगी। विमान झारखंड के शुक्तिमान पर्वतों के ऊपर से उड़ रहा है। इसे अभी गंगा नदी के ऊपर से भी यात्रा करनी है। लीजिए नीचे पटना के पास सोन और गंगा नदियों का संगम हो रहा है। हम पश्चिम बंगाल की सीमा में दाखिल हो रहे हैं। यहाँ से विमान द्वारा कलकत्ता आधे घंटे का सफ़र है। गंगा का नाम मुर्शिदाबाद पहुँचते-पहुँचते हुगली हो जाता है। हमारी उड़ान रात आठ बजे कलकत्ता पहुँच गई। जहाँ हमें रात गुज़ारनी है। सुबह सुंदरबन की यात्रा करते हुए गंगा सागर पहुँचेंगे। 

पहले सोचा था कि एयरपोर्ट पर लाउंज में रात गुज़ार सुबह जल्दी टैक्सी करके गंगासागर के लिए निकल लेंगे। एयरपोर्ट पर पता चला कि लाउंज की सुविधा सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उपलब्ध है। हमने मेक माय ट्रिप के माध्यम से एक रात के लिए फैब होटल 2000.00 रुपयों में बुक किया। एयरपोर्ट से निकल कर टैक्सी खोजने लगे। यहाँ टैक्सी की बड़ी भारी समस्या है। प्री-पैड पर लम्बी क़तार थी। वहाँ से रसीद कटवा कर फिर टैक्सी के इंतज़ार की क़तार में लगना पड़ेगा। मतलब एक घंटा कोलकाता की गर्मी में पसीने से नहाना होगा। मन को पानी से नहाने योग्य बना ही रहे थे। एक निजी टैक्सी बुकिंग काउंटर पर एक सुंदर बंगाली बाला लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी। पवन भाई ने उससे फैब होटल तक जाने के लिए टैक्सी बाबत पूछा। उसने झट से मना कर दिया। हमने भी प्रयास नहीं छोड़ा। उसने थोड़ी देर बाद कहा कि वह हमारे लिए टैक्सी का इंतज़ाम कर देगी। उसने बीस मिनट में एक टैक्सी की जुगाड़ कर दी। टैक्सी का किराया 275/- रुपये निर्धारित हुआ। उसके बाद नई समस्या इंतज़ार कर रही थी। फैब होटल दमदम इलाक़े में स्थित है। ड्राइवर इस इलाक़े में पहुँच एक घंटा घूमता रहा। उसे फैब होटल नहीं मिली। उसने गूगल का सहारा लिया। गूगल हमको घुमा फिरा कर एक जगह ले जाकर खड़ा कर देता कि आपका गंतव्य आ गया है। बहुत परेशान होने के बाद हमने गूगल पर फैब होटल का नाम डाल सर्च किया तो उस पर फैब का नंबर मिला। उस पर नंबर घुमाया तो पता चला कि वह कोई फैब ग्रुप है। जो होटल कमरा बुकिंग करते हैं। फैब ग्रुप प्रतिनिधि ने हमसे बुकिंग आईडी पूछा। तब बताया कि होटल कहाँ है। ड्राइवर ने होटल का पता समझ लिया। पता गूगल पर डाला। गूगल ने घुमा फिरा कर फिर उसी जगह खड़ा कर दिया जहाँ से टैक्सी दो बार निकल चुकी थी। वहाँ एक एजी होटल दिखा। उससे फैब होटल का पता पूछा तो उसने कहा- यही फैब एजी होटल है। वास्तविकता पता चली कि होटल का नाम एजी था जो फैब ग्रुप से संबद्ध था। हमने माथा फोड़ लिया और सामान उठा कर चलने को हुए तो टैक्सी ड्राइवर बोला- सर, 475/- रुपये किराया हुआ। उसे 500/- का नोट दिया तो वह, साहब छुट्टा नहीं है, कहकर चलता बना। हम कलकत्ता के दमदम इलाक़े में हैं। पुरानी बस्ती है। सड़क किनारे खुलेआम शराब का सेवन पूरे शबाब पर है। कोई रोकटोक नहीं दिख रही। ग्यारह बजे रात तक, जहाँ चाहो जैसे चाहो पिओ।      

होटल के कमरे में पहुँचे तो फिर माथा पीट लिया।   किसी औसत धर्मशाला जैसा कमरा दूसरी मंज़िल पर था। सोचा एसी चालू करवाकर कमर सीधी करके नहाना-धोना करेंगे। रात के खाने के लिए दही चावल और दाल का ऑर्डर दिया। कमरे में कोई टेलीफोन नहीं था। कॉल बेल भी नहीं बजती। नीचे रिसेप्शन पहुँच दरयाफ़्त करने पर ज्ञात हुआ कि एक मोबाइल नंबर है। उसी पर संपर्क साधा जा सकता है। कमरे में वापस आये तो पता चला कि एसी का रिमोट ख़राब है। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलेगा। फिर माथा पीटा। कपड़े उतार हाथ पैर सीधे किए ही थे। तभी लाइट चली गई, एसी बंद हो गया। कोलकाता में अक्सर लाइट जाती है और दो-तीन घंटे में आती है। होटल  व्हीआईपी इलाक़ा में होने से एक घंटा में आने की संभावना है। बहुत मुश्किलों के बाद जनरेटर भाई की मेहरबानी से उजाले लायक़ लाइट मिल गई, परंतु एसी साहब की तरफ़ देखा तो वे हमारी नादानी पर मुस्कुरा रहे थे। ख़ैर साहब, ख़ाना निपटाया। अगले दिन की योजना बनाकर बारह बजे के आसपास सो गए ।            

अंग्रेजों के ज़माने से कोलकाता एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई है। जो वर्तमान में उत्तरी चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना और हावड़ा ज़िलों से घिरा है। इस जिले में पहले 24 छोटे-छोटे खंड थे, जिस कारण इस स्थान का नाम 24 परगना रखा गया था। 1956 ई. में इस जिले का गठन किया गया था। 1992 ई. में इस जिले को उत्तर तथा दक्षिण भागों में विभाजित कर दिया गया था। कोलकाता के बसने की भी एक कहानी है। गंगा सागर दक्षिणी 24 परगना ज़िले में स्थित है।

टूरिस्ट गाईड के हिसाब से कोलकाता का दमदम स्थित सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा गंगासागर से निकटतम हवाई अड्डा है। वहाँ से काकद्वीप जाने के लिए टैक्सी मिल जाएँगी। ट्रेन से जाने वालों के लिए सियालदाह से काकद्वीप क़रीब है। काकद्वीप से आपको काचुबेरिया के लिए फ़ेरी मिल जाएँगी।   काचुबेरिया से बत्तीस किलोमीटर बस, टैक्सी, ऑटो द्वारा सागर द्वीप के उस किनारे पहुँचा जा सकता है, जहाँ गंगा सागर तीर्थ स्थित है।

हम् कोलकाता पहुँच गए हैं और गंगासागर पहुँचना है तो कोलकाता से गंगासागर तक की सवारी काफी रोमांचक है। इस तरफ़ काकद्वीप है, उस तरफ़ काचुबेरिया है, बीच में बंगाल की खाड़ी का लहराता समुद्र है। हम टैक्सी बुक कर रहे हैं, जो हमें होटल से काकद्वीप तक ले जाएगी। टैक्सी से काकद्वीप तक जाएँगे, जो हुगली नदी के पूर्वी तट पर एक बड़ा तालुका है। वहाँ से नाव द्वारा मुरीगंगा नदी पार कर काचुबेरिया पहुँचेंगे। कचुबेरिया पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित है। इसमें डायमंड हार्बर और काकद्वीप के बीच चलने वाली मुख्य सड़क के दोनों ओर बिखरे हुए गांवों की एक श्रृंखला शामिल है। कुलपी गांव इस क्षेत्र का केंद्र है। पश्चिम में केवल एक मील की दूरी पर हुगली नदी है जो इस बिंदु पर चौड़ी हो रही है क्योंकि यह बंगाल की खाड़ी में बहने की तैयारी कर रही है। यहां की ज़मीन नीची और समतल है इसलिए मानसून के मौसम और चक्रवात के दौरान बाढ़ का पानी आने से  अतिसंवेदनशील है। काचुबेरिया से बस एक घंटे में गंगासागर ले जाती है।

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15 जून 2023 को सबसे कठिन यात्रा पर जाना है। उबर टैक्सी बुक की। ड्राइवर का नाम मनोज साहा है। बंगाली साहा शब्द वही पुराना फ़ारसी शाह है। शाह शब्द की उत्पत्ति ईरान में हुई। वहाँ का आख़िरी राजा  शाह रज़ा पहलवी था। मुग़लों ने जब हिंदुस्तान में राजत्व ग्रहण किया तब उन्होंने ईरानी भाषा में राजा का पर्यायवाची “शाह” पदवी धारण की। कालांतर में उन्होंने कई राजपूत राजाओं को अधीन करके बादशाह अर्थात् महाराजा उपाधि धारण की जैसे अकबर बादशाह । मुग़ल काल के पतन के साथ कई महाजनों ने गुजरात में शाह उपनाम धारण करना आरम्भ किया, जैसे अमित शाह। अंग्रेजों के समय में कारोबारी पलायन पश्चिमी भारत से पूर्वी भारत की तरफ़ हुआ तो वे शाह ही अंग्रज़ों की राजधानी कलकत्ता में साहा हो गए। ड्राइवर के व्यक्तित्व में कोई भी गुजराती चिन्ह नहीं दिखते। वह हावभाव ख़ान पीन से पूरी तरह बंगाली हो चुका है। वह बहुत बातूनी है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-१ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्येक शनिवार आप आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

(यात्रा जीवन की एकरसता से निजात दिलाकर कुछ रोमांच के क्षण के अवसर उपलब्ध कराती हैं, इसलिए हर किसी को सुहाती हैं। हरेक यात्रा पर्यटन नहीं होती। यात्रा ज़रूरी होती है लेकिन पर्यटन आवश्यक नहीं होता, एक शौक होता है। पहाड़ों और सागरों के पर्यटन के अलावा तीर्थाटन भी पर्यटन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। जिसमें आस्था का पुट भी शामिल होता है। हम पिताजी को चारों धाम यात्रा कराने के पूर्व एकाधिक बार तीर्थ यात्रा कर चुके थे। इस तरह प्रायः सभी प्रमुख तीर्थ स्थान देख चुके थे। अब उन तीर्थ स्थानों को पहुंचना था, जहाँ अब तक जाना न हुआ था।

तीर्थयात्रा में अक्सर आध्यात्मिक महत्व की खोज शामिल होती है। आम तौर पर, यह किसी व्यक्ति की मान्यताओं और आस्था के लिए किसी धार्मिक स्थान की यात्रा होती है, हालांकि कभी-कभी यह किसी व्यक्ति की अपनी मान्यताओं की कुतूहल पूर्वक एक प्रतीकात्मक यात्रा भी हो सकती है। हमारी यात्राएं इसी प्रकार की थीं।)

हमारे पिताजी दोस्तों के साथ 1965 में गंगा सागर तीर्थ भ्रमण करने गए थे। उस समय हमारा मस्ती भरा बचपन चल रहा था। हम जवानी की रौ में रहते थे। वे गंगा सागर घूम कर क्या आए। मन के सितार पर दिन के सारे पहर गंगा सागर राग छेड़े रहते। वे भी हमारे बाप थे, साथियों से डींग मारते बड़ी शान से कहा करते थे- सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।

उनसे जब इसका अर्थ पूछते तो वे कहते थे कि गंगा सागर यात्रा बहुत कठिन है। जब उनको उत्तराखंड चार धाम ले गए तब बोले यार सुरेश ये तो गंगा सागर से भी कठिन है। टैक्सी यात्रा के दौरान वहाँ उनको बार-बार हिल सिकनेस होता था जिससे मितली आती थी। मितली आने से घबराहट भी होती थी। जब हम उनको साथ लेकर अमरनाथ यात्रा करने गए तब बोले यह तो चार धाम से भी कठिन है-

सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार,

गंगा सागर दस बार अमरनाथ एक बार।

एक बार बात-बात में पिताजी ने कहा था कि मेरी अस्थि प्रयाग के अलावा गंगा सागर भी ले जाना। यह उनकी भावनात्मक आस्था थी कि उनकी कुछ अस्थियाँ गंगा सागर में तिरोहित की जाएँ। पिताजी का स्वर्गारोहण हुए पाँच साल हो गए। हम अब तक गंगा सागर नहीं जा पाए थे। बात यह नहीं है कि उनकी आस्था का तार्किक आधार क्या है। असल बात है कि उन्हें औलाद से यह अपेक्षा थी। हमने उनके दाह संस्कार के दौरान उनका एक अस्थि अंश सुरक्षित कर रखा था। मन में एक टीस थी। क्या पिताजी की एक आस्थागत इच्छा पूरी नहीं की जा सकती है। गंगा सागर जाने के बारे में एक दो बार सोचा, परंतु कुछ बात बनी नहीं। हमारे मन में वहाँ जाने की बड़ी उत्कंठा थी।

सुबह की सैर पर बहुत से जान पहचान के लोग मिलते रहते हैं। मई 2023 की 07 तारीख़ को सुबह की सैर पर सरकारी प्रशासकीय सेवा से निवृत्त पवन राय मिले। उन्होंने कहा- कहीं घूमने चलते हैं आपके साथ। पहले बात चली कि काशी चलते हैं। लेकिन गर्मी में काशी घूमने का मज़ा नहीं है। वहाँ सावन के महीने में बहार का मौसम होता है, तब वहाँ चलना उपयुक्त होगा। अभी तुरंत चलना है तो कहीं समुद्र के किनारे पर लहरों से खेलने का कार्यक्रम बनाया जाय। हमारी बातचीत की सुई गोवा के समुद्री तटों से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गंगा के मुहाने पर आबाद गंगा सागर पर टिक गई। घर पहुँच कर परिवार से चर्चा में यह तय हो गया कि गंगा सागर भ्रमण को जाना चाहिए। पवन भाई को फ़ोन घुमा कर कहा कि भोपाल से कोलकाता का सेकंड एसी का किराया 5,000/- और हवाई उड़ान का 6,000/- है। बातचीत के बाद हवाई जहाज़ पर टिकट की जानकारी लेकर मात्र 6,000/- रुपये प्रति व्यक्ति खर्चे कर भोपाल से कोलकाता वाया हैदराबाद हवाई टिकट बुक कर दीं। इसी दर से वापसी टिकट भी वाया दिल्ली मिल गई।

अब बारी थी, गंगा सागर में तीन दिन रुकने के लिए उपयुक्त होटल। वेस्ट बंगाल टूरिज्म डेवलपमेंट कारपोरेशन की होटल सर्च करके मैनेजर से संपर्क साधने पर पता चला कि कमरा एडवांस बुकिंग पर ही मिलता है। दो दिन का एडवांस किराया 6,000/- रुपये गूगल-पे से भुगतान करके एक वातानुकूलित कमरा बुक कर लिया। अगली बारी कोलकाता एयरपोर्ट से गंगासागर तक तीन दिन के पैकेज पर एक बढ़िया टैक्सी बुक करनी थी। पता चला कि 3,000/- प्रतिदिन के हिसाब से तीन दिन के 9,000/- लगेंगे। यह तय हुआ कि जिस रात नौ बजे कोलकाता एयरपोर्ट पहुँच रहे हैं। वहीं लाउंज पर क्रेडिट कार्ड पर प्राप्त मुफ़्त लाउंज और भोजन की सुविधा का लाभ उठाया जाये। टैक्सी बुकिंग वहीं पहुँच कर देखेंगे। 

एक सहज कौतूहल ने दिमाग़ में खलबली सी मचानी शुरू कर दी कि भैया पिताजी गंगा सागर के इतने दीवाने क्यों थे ? खोजबीन आरम्भ की तो पता चला कि गंगा सागर कोलकाता से 140-150 कि.मी. दूरी पर हिन्दुओं का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल बंगाल की खाड़ी में सुंदरबन डेल्टा पर स्थित एक द्वीप है। यह अपनी भौगोलिक विशेषता से ज़्यादा अपनी धार्मिक विशेषता के लिए जाना जाता है। अब यह सुंदरबन डेल्टा क्या बला है ?

सुंदरबन भारत तथा बांग्लादेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है। भारत और बांग्लादेश में फैले बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर स्थित कई द्वीपों के समूह से सुंदरबन बनता है। यह गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के समुद्र मिलन पर स्थित है। इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान वृक्षों की ऐसी प्रजातियाँ हैं, जो सिर्फ़  सुंदरबन में पाई जाती हैं। यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं, जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में रह सकते हों। यह डेल्टा धीरे-धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से 24-32 किलोमीटर दूर स्थित लगभग 1,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ मिलते हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरवन पड़ा परंतु वन को बंगाली में बन कहते हैं इसलिए सुंदरवन हो गया सुंदरबन।

मन सुंदरबन की सुंदरता को लालायित हो उठा। गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदी से मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा मुहाना अर्थात् डेल्टा बनाता है। जिसके आधे हिस्से पर बांग्लादेश और आधे पर भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के परगने बसे हैं। सघन वन और सतत बारिश की बूँदों से सिंचित दलदली ज़मीन का हरीतिमा से ढँका हिस्सा सुंदरबन है। यहाँ कोबरा बहुतायत से पाए हैं।

हवाई जहाज़ की टिकट और गंगा सागर में होटल कमरा बुक हो गया। और तो और सौम्या ने भोपाल-हैदराबाद-कोलकाता उड़ान हेतु वेब चेक-इन भी कर दिया। लेकिन एक दिन पहले एक नई दिक़्क़त सामने आ खड़ी हुई। यात्रा की पूर्व संध्या को डॉक्टर मीनू पांडेय “नयन” की पहल पर श्री अर्जुन प्रसाद तिवारी अस्मी जी पुस्तक “मुस्कान के प्रतिबंध” के लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन दायित्व लिया हुआ था। कार्यक्रम स्थल दुष्यंत सभागार जाते समय लू लग गई। एक मन हुआ कि भाई आयोजकों से अनुमति लेकर घर पहुँच आराम किया जाय। परंतु फिर विचार आया कि इस कार्यक्रम का क्या होगा ? लिहाज़ा ठंडे पानी की बोतल बुलवाईं और पानी पी-पीकर तीन घंटे का कार्यक्रम संचालित किया। उसके बाद स्थिति ख़राब होना शुरू हुई। कार से घर पहुँचे। तब तक अच्छा ख़ासा एक सौ एक डिग्री बुख़ार चढ़ चुका था। दही-चावल का भोजन किया एक गोली काम्बीफ़्लेम की ली और सोने का उपक्रम करने लगे। घर वाले हमारे कल कोलकाता यात्रा को लेकर बहुत परेशान होने लगे। उन्होंने दबाव बनाना आरंभ किया कि टिकट निरस्त करवा ली जाय। हमने किसी तरह उन्हें समझाया कि हमारी स्थिति ठीक नहीं होगी तो हम कदापि नहीं जाएँगे। लेकिन गंगा सागर के इशारे अरमानों को हवा दे रहे थे। यात्रा के दिन सुबह हमारे डॉक्टर अभिषेक मिश्रा और डॉक्टर संजय पाटकार से सलाह मशविरा किया। उन्होंने कहा कि दिन में दो बार काम्बीफ़्लेम टेबलेट लेते जाओ। सौम्या ने एक बड़ी बोतल में शक्कर-नमक का घोल भर कर रख दिया। चार केले बैग में रख लिए और यात्रा पर निकल लिए। आप यदि घुमंतू तबियत के हैं तो आपकी यात्रा में इस तरह की दिक़्क़तें पेश होतीही  हैं। आपका शरीर साथ दे रहा है तो डॉक्टर की सलाह से यात्रा में आते व्यवधान से मुक्त हुआ जा सकता है। इस तरह की स्थितियों से निपटने के लिए एक और चीज महत्वपूर्ण है, आपकी इच्छाशक्ति।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२७ (अंतिम किश्त) ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज प्रस्तुत है  इस यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा की अंतिम कड़ी। अगले सप्ताह से आप श्री गंगा सागर यात्रा के संस्मरण आत्मसात कर सकेंगे। )

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२७ (अंतिम किश्त) ☆ श्री सुरेश पटवा ?

बादामी गुफा मन्दिर बागलकोट ज़िले के बादामी ऐतिहासिक नगर में स्थित एक हिन्दू और जैन गुफा मन्दिरों का एक परिसर है। मालप्रभा घाटी में चालुक्यों के शासन काल में बने हिंदू और जैन मंदिर वास्तुकला स्कूलों का उद्गम स्थल कला के क्षेत्रीय केंद्र के रूप में बादामी उभरा। द्रविड़ और नागर दोनों शैलियों के मंदिर बादामी के साथ-साथ ऐहोल, पट्टदकल और महाकुटा में हैं। बादामी में कई मंदिर, जैसे पूर्वी भूतनाथ समूह और जम्बुलिंगेश्वर मंदिर, 6वीं और 8वीं शताब्दी के बीच बनाए गए थे। वे मंदिर वास्तुकला और कला के विकास के साथ-साथ पहली सहस्राब्दी ईस्वी के मध्य में कला की कर्नाटक परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

बादामी और मालप्रभा क्षेत्र के अन्य स्थलों पर विजयनगर साम्राज्य के हिंदू राजाओं और दक्कन क्षेत्र के इस्लामी सुल्तानों के बीच लड़ाई हुई थी। विजयनगर काल के बाद आए मुस्लिम शासन ने इस विरासत को और समृद्ध किया। इसकी पुष्टि यहां के दो स्मारकों से होती है। एक गुफा मंदिरों और संरचनात्मक मंदिरों के प्रवेश द्वार के पास मरकज जुम्मा है। इसमें अब्दुल मलिक अजीज की 18वीं सदी की कब्र है। उसी के बगल से होकर निकले।

बादामी में अठारह शिलालेख हैं, जिनमें महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी है। एक पहाड़ी पर पुरानी कन्नड़ लिपि में पहला संस्कृत शिलालेख पुलकेशिन प्रथम (वल्लभेश्वर) के काल का 543 ई.पू. का है, दूसरा कन्नड़ भाषा और लिपि में मंगलेश का 578 ई.पू. का गुफा शिलालेख है और तीसरा कप्पे अरभट्ट है। अभिलेख, त्रिपदी (तीन पंक्ति) मीटर में सबसे प्रारंभिक उपलब्ध कन्नड़ कविता। भूतनाथ मंदिर के पास एक शिलालेख में तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित जैन रॉक-कट मंदिर में 12 वीं शताब्दी के शिलालेख भी हैं।

बादामी गुफा मंदिरों को संभवतः 6वीं शताब्दी के अंत तक पूरी तरह से अंदर से चित्रित किया गया था। गुफा 3 (वैष्णव, हिंदू) और गुफा 4 (जैन) में पाए गए भित्तिचित्र टुकड़े, बैंड और फीके खंडों को छोड़कर, इनमें से अधिकांश पेंटिंग अब खो गई हैं। मूल भित्तिचित्र सबसे स्पष्ट रूप से गुफा 3 में पाए जाते हैं, जहां विष्णु मंदिर के अंदर, धर्मनिरपेक्ष कला के चित्रों के साथ-साथ भित्तिचित्र भी हैं जो छत पर और प्राकृतिक तत्वों के कम संपर्क वाले हिस्सों में शिव और पार्वती की किंवदंतियों को दर्शाते हैं। ये भारत में हिंदू किंवदंतियों की सबसे पुरानी ज्ञात पेंटिंगों में से हैं, जिन्हें दिनांकित किया जा सकता है।

यह भारतीय शैलकर्तित वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें विशेषकर बादामी चालुक्य वास्तुकला देखी जा सकती है। इस परिसर का निर्माण छठी शताब्दी में आरम्भ हुआ था। बादामी नगर का प्राचीन नाम “वातापी” था, और यह आरम्भिक चालुक्य राजवंश की राजधानी था, जिसने 6ठी से 8वीं शताब्दी तक कर्नाटक के अधिकांश भागों पर राज्य किया। बादामी गुफा मन्दिर दक्कन पठार के प्राचीनतम मन्दिरों में से हैं। इनके और एहोल के मन्दिरों के निर्माण से मलप्रभा नदी के घाटी क्षेत्र में मन्दिर वास्तुकला तेज़ी से विकसित होने लगी, और इसने आगे जाकर भारत-भर के हिन्दू मन्दिर निर्माण को प्रभावित किया।

यह नगर अगस्त्य झील के पश्चिमी तट पर स्थित है, जो एक मानवकृत जलाशय है। झील एक मिट्टी की दीवार से घिरी है, जिस से पत्थर की सीढ़ीयाँ जल तक जाती हैं। झील उत्तर और दक्षिण में बाद के काल में बने दुर्गों से घिरी हुई है। शहर के दक्षिण-पूर्व में नरम बादामी बलुआ पत्थर से बनी गुफाओं की संख्या 1 से 4 तक है।

  • गुफा न. 1 में, हिंदू देवी-देवताओं और प्रसंगों की विभिन्न मूर्तियों के बीच, नटराज के रूप में तांडव-नृत्य करने वाले शिव की एक प्रमुख नक्काशी है।
  • गुफा न. 2 ज्यादातर अपने अभिन्यास और आयामों के संदर्भ में गुफा न. 1 के समान है, जिसमें हिंदू प्रसंगों की विशेषता है, जिसमें विष्णु की त्रिविक्रम के रूप में उभड़ी हुई नक्काशी सबसे बड़ी है।
  • गुफा न. 3 सबसे बड़ी है, जिसमें विष्णु से संबंधित पौराणिक कथाएं बनाई गई हैं, और यह परिसर में सबसे जटिल नक्काशीदार गुफा भी है।
  • गुफा न. 4 जैन धर्म के प्रतिष्ठित लोगों को समर्पित है। झील के चारों ओर, बादामी में अतिरिक्त गुफाएँ हैं जिनमें से एक बौद्ध गुफा हो सकती है। 2015 में चार मुख्य गुफाओं में 27 नक्काशियों के साथ एक अन्य गुफा की खोज हुई है।

पट्टदकल्लु (Pattadakal), जिसे रक्तपुर कहा जाता था, बागलकोट ज़िले में मलप्रभा नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक गाँव है, जो अपने यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ चालुक्य राजवंश द्वारा 7वीं और 8वीं शताब्दी में बने नौ हिन्दू और एक जैन मन्दिर हैं, जिनमें द्रविड़ (दक्षिण भारतीय) तथा नागर (उत्तर भारतीय ) दोनों शैलियाँ विकसित हुई थीं। पट्टदकल्लु बादामी से 23 किमी और एहोल से 11 किमी दूर है।

यदी बादामी को महाविद्यालय तो पट्टदकल्लु को मन्दिर निर्माण का विश्वविद्यालय कहा जाता है। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन 24 किमी बादामी है। इस शहर को कभी किसुवोलल या रक्तपुर कहा जाता था, क्योंकि यहाँ का बलुआ पत्थर लाल आभा लिए हुए है।

चालुक्य शैली का उद्भव 450 ई. में एहोल में हुआ था। यहाँ वास्तुकारों ने नागर एवं द्रविड़ समेत विभिन्न शैलियों के प्रयोग किए थे। इन शैलियों के संगम से एक अभिन्न शैली का उद्भव हुआ। सातवीं शताब्दी के मध्य में यहां चालुक्य राजाओं के राजतिलक होते थे। कालांतर में मंदिर निर्माण का स्थल बादामी से पट्टदकल्लु आ गया। यहाँ कुल दस मंदिर हैं, जिनमें एक जैन धर्मशाला भी शामिल है। इन्हें घेरे हुए ढेरों चैत्य, पूजा स्थल एवं कई अपूर्ण आधारशिलाएं हैं। यहाँ चार मंदिर द्रविड़ शैली के हैं, चार नागर शैली के हैं एवं पापनाथ मंदिर मिश्रित शैली का है। पट्टदकल्लु को 1987 में युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

यहां के बहुत से शिल्प अवशेष यहां बने संग्रहालय तथा शिल्प दीर्घा में सुरक्षित रखे हैं। इन संग्रहालयों का अनुरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग करता है। ये भूतनाथ मंदिर मार्ग पर स्थित हैं। इनके अलावा अन्य महत्वपूर्ण स्मारकों में, अखण्ड एकाश्म स्तंभ, नागनाथ मंदिर, चंद्रशेखर मंदिर एवं महाकुटेश्वर मंदिर भी हैं, जिनमें अनेकों शिलालेख हैं। वर्ष के आरंभिक त्रैमास में यहां का वार्षिक नृत्योत्सव आयोजन होता है, जिसे चालुक्य उत्सव कहते हैं। इस उत्सव का आयोजन पट्टदकल्लु के अलावा बादामी एवं ऐहोल में भी होता है। यह त्रिदिवसीय संगीत एवं नृत्य का संगम कलाप्रेमियों की भीड़ जुटाता है। उत्सव के मंच की पृष्ठभूमि में मंदिर के दृश्य एवं जाने माने कलाकार इन दिनों यहां के इतिहास को जीवंत कर देते हैं।

बादामी से हुबली एयरपोर्ट 125 किलोमीटर है। 02 अक्टूबर 2023 को दोपहर तीन बजे फ्लाइट है। सुबह नाश्ता निपटा कर नौ बजे निकलना है। होटल के गेट के सामने रंगीन फूलों से गजरों की दुकानें थीं। हमारे दल की महिलाओं ने गजरे ख़रीद धारण कर लिए। बस में बैठ चल दिए। बारह बजे तक हुबली हवाई अड्डा पहुंच गए। हमारी फ्लाइट दिल्ली होकर भोपाल थी। फ्लाइट हुबली से 03:45 दोपहर को चलकर 06:15 शाम को दिल्ली एयरपोर्ट पहुंची। दिल्ली में हवाई अड्डा बदलना पड़ा। करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर एक निशुल्क बस में बैठकर घरेलू हवाई अड्डा पहुंचे। भोपाल की फ्लाइट शाम साढ़े सात बजे थे। नौ बजे भोपाल में थे। इस प्रकार डॉक्टर राजेश श्रीवास्तव जी के नेतृत्व और उनकी टीम के सानिध्य में बिना किसी दुर्घटना के सभी यात्रियों की सकुशल घर वापसी हुई।

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२६ —- अंतिम किश्त ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज प्रस्तुत है इस यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा की अंतिम कड़ी)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२६ —- अंतिम किश्त ☆ श्री सुरेश पटवा ?

बादामी गुफा मन्दिर बागलकोट ज़िले के बादामी ऐतिहासिक नगर में स्थित एक हिन्दू और जैन गुफा मन्दिरों का एक परिसर है। मालप्रभा घाटी में चालुक्यों के शासन काल में बने हिंदू और जैन मंदिर वास्तुकला स्कूलों का उद्गम स्थल कला के क्षेत्रीय केंद्र के रूप में बादामी उभरा। द्रविड़ और नागर दोनों शैलियों के मंदिर बादामी के साथ-साथ ऐहोल, पट्टदकल और महाकुटा में हैं। बादामी में कई मंदिर, जैसे पूर्वी भूतनाथ समूह और जम्बुलिंगेश्वर मंदिर, 6वीं और 8वीं शताब्दी के बीच बनाए गए थे। वे मंदिर वास्तुकला और कला के विकास के साथ-साथ पहली सहस्राब्दी ईस्वी के मध्य में कला की कर्नाटक परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

बादामी और मालप्रभा क्षेत्र के अन्य स्थलों पर विजयनगर साम्राज्य के हिंदू राजाओं और दक्कन क्षेत्र के इस्लामी सुल्तानों के बीच लड़ाई हुई थी। विजयनगर काल के बाद आए मुस्लिम शासन ने इस विरासत को और समृद्ध किया। इसकी पुष्टि यहां के दो स्मारकों से होती है। एक गुफा मंदिरों और संरचनात्मक मंदिरों के प्रवेश द्वार के पास मरकज जुम्मा है। इसमें अब्दुल मलिक अजीज की 18वीं सदी की कब्र है। उसी के बगल से होकर निकले।

बादामी में अठारह शिलालेख हैं, जिनमें महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी है। एक पहाड़ी पर पुरानी कन्नड़ लिपि में पहला संस्कृत शिलालेख पुलकेशिन प्रथम (वल्लभेश्वर) के काल का 543 ई.पू. का है, दूसरा कन्नड़ भाषा और लिपि में मंगलेश का 578 ई.पू. का गुफा शिलालेख है और तीसरा कप्पे अरभट्ट है। अभिलेख, त्रिपदी (तीन पंक्ति) मीटर में सबसे प्रारंभिक उपलब्ध कन्नड़ कविता। भूतनाथ मंदिर के पास एक शिलालेख में तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित जैन रॉक-कट मंदिर में 12 वीं शताब्दी के शिलालेख भी हैं।

बादामी गुफा मंदिरों को संभवतः 6वीं शताब्दी के अंत तक पूरी तरह से अंदर से चित्रित किया गया था। गुफा 3 (वैष्णव, हिंदू) और गुफा 4 (जैन) में पाए गए भित्तिचित्र टुकड़े, बैंड और फीके खंडों को छोड़कर, इनमें से अधिकांश पेंटिंग अब खो गई हैं। मूल भित्तिचित्र सबसे स्पष्ट रूप से गुफा 3 में पाए जाते हैं, जहां विष्णु मंदिर के अंदर, धर्मनिरपेक्ष कला के चित्रों के साथ-साथ भित्तिचित्र भी हैं जो छत पर और प्राकृतिक तत्वों के कम संपर्क वाले हिस्सों में शिव और पार्वती की किंवदंतियों को दर्शाते हैं। ये भारत में हिंदू किंवदंतियों की सबसे पुरानी ज्ञात पेंटिंगों में से हैं, जिन्हें दिनांकित किया जा सकता है।

यह भारतीय शैलकर्तित वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें विशेषकर बादामी चालुक्य वास्तुकला देखी जा सकती है। इस परिसर का निर्माण छठी शताब्दी में आरम्भ हुआ था। बादामी नगर का प्राचीन नाम “वातापी” था, और यह आरम्भिक चालुक्य राजवंश की राजधानी था, जिसने 6ठी से 8वीं शताब्दी तक कर्नाटक के अधिकांश भागों पर राज्य किया। बादामी गुफा मन्दिर दक्कन पठार के प्राचीनतम मन्दिरों में से हैं। इनके और एहोल के मन्दिरों के निर्माण से मलप्रभा नदी के घाटी क्षेत्र में मन्दिर वास्तुकला तेज़ी से विकसित होने लगी, और इसने आगे जाकर भारत-भर के हिन्दू मन्दिर निर्माण को प्रभावित किया।

यह नगर अगस्त्य झील के पश्चिमी तट पर स्थित है, जो एक मानवकृत जलाशय है। झील एक मिट्टी की दीवार से घिरी है, जिस से पत्थर की सीढ़ीयाँ जल तक जाती हैं। झील उत्तर और दक्षिण में बाद के काल में बने दुर्गों से घिरी हुई है। शहर के दक्षिण-पूर्व में नरम बादामी बलुआ पत्थर से बनी गुफाओं की संख्या 1 से 4 तक है।

  • गुफा न. 1 में, हिंदू देवी-देवताओं और प्रसंगों की विभिन्न मूर्तियों के बीच, नटराज के रूप में तांडव-नृत्य करने वाले शिव की एक प्रमुख नक्काशी है।
  • गुफा न. 2 ज्यादातर अपने अभिन्यास और आयामों के संदर्भ में गुफा न. 1 के समान है, जिसमें हिंदू प्रसंगों की विशेषता है, जिसमें विष्णु की त्रिविक्रम के रूप में उभड़ी हुई नक्काशी सबसे बड़ी है।
  • गुफा न. 3 सबसे बड़ी है, जिसमें विष्णु से संबंधित पौराणिक कथाएं बनाई गई हैं, और यह परिसर में सबसे जटिल नक्काशीदार गुफा भी है।
  • गुफा न. 4 जैन धर्म के प्रतिष्ठित लोगों को समर्पित है। झील के चारों ओर, बादामी में अतिरिक्त गुफाएँ हैं जिनमें से एक बौद्ध गुफा हो सकती है। 2015 में चार मुख्य गुफाओं में 27 नक्काशियों के साथ एक अन्य गुफा की खोज हुई है।

पट्टदकल्लु (Pattadakal), जिसे रक्तपुर कहा जाता था, बागलकोट ज़िले में मलप्रभा नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक गाँव है, जो अपने यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ चालुक्य राजवंश द्वारा 7वीं और 8वीं शताब्दी में बने नौ हिन्दू और एक जैन मन्दिर हैं, जिनमें द्रविड़ (दक्षिण भारतीय) तथा नागर (उत्तर भारतीय ) दोनों शैलियाँ विकसित हुई थीं। पट्टदकल्लु बादामी से 23 किमी और एहोल से 11 किमी दूर है।

यदी बादामी को महाविद्यालय तो पट्टदकल्लु को मन्दिर निर्माण का विश्वविद्यालय कहा जाता है। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन 24 किमी बादामी है। इस शहर को कभी किसुवोलल या रक्तपुर कहा जाता था, क्योंकि यहाँ का बलुआ पत्थर लाल आभा लिए हुए है।

चालुक्य शैली का उद्भव 450 ई. में एहोल में हुआ था। यहाँ वास्तुकारों ने नागर एवं द्रविड़ समेत विभिन्न शैलियों के प्रयोग किए थे। इन शैलियों के संगम से एक अभिन्न शैली का उद्भव हुआ। सातवीं शताब्दी के मध्य में यहां चालुक्य राजाओं के राजतिलक होते थे। कालांतर में मंदिर निर्माण का स्थल बादामी से पट्टदकल्लु आ गया। यहाँ कुल दस मंदिर हैं, जिनमें एक जैन धर्मशाला भी शामिल है। इन्हें घेरे हुए ढेरों चैत्य, पूजा स्थल एवं कई अपूर्ण आधारशिलाएं हैं। यहाँ चार मंदिर द्रविड़ शैली के हैं, चार नागर शैली के हैं एवं पापनाथ मंदिर मिश्रित शैली का है। पट्टदकल्लु को 1987 में युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

यहां के बहुत से शिल्प अवशेष यहां बने संग्रहालय तथा शिल्प दीर्घा में सुरक्षित रखे हैं। इन संग्रहालयों का अनुरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग करता है। ये भूतनाथ मंदिर मार्ग पर स्थित हैं। इनके अलावा अन्य महत्वपूर्ण स्मारकों में, अखण्ड एकाश्म स्तंभ, नागनाथ मंदिर, चंद्रशेखर मंदिर एवं महाकुटेश्वर मंदिर भी हैं, जिनमें अनेकों शिलालेख हैं। वर्ष के आरंभिक त्रैमास में यहां का वार्षिक नृत्योत्सव आयोजन होता है, जिसे चालुक्य उत्सव कहते हैं। इस उत्सव का आयोजन पट्टदकल्लु के अलावा बादामी एवं ऐहोल में भी होता है। यह त्रिदिवसीय संगीत एवं नृत्य का संगम कलाप्रेमियों की भीड़ जुटाता है। उत्सव के मंच की पृष्ठभूमि में मंदिर के दृश्य एवं जाने माने कलाकार इन दिनों यहां के इतिहास को जीवंत कर देते हैं।

बादामी से हुबली एयरपोर्ट 125 किलोमीटर है। 02 अक्टूबर 2023 को दोपहर तीन बजे फ्लाइट है। सुबह नाश्ता निपटा कर नौ बजे निकलना है। होटल के गेट के सामने रंगीन फूलों से गजरों की दुकानें थीं। हमारे दल की महिलाओं ने गजरे ख़रीद धारण कर लिए। बस में बैठ चल दिए। बारह बजे तक हुबली हवाई अड्डा पहुंच गए। हमारी फ्लाइट दिल्ली होकर भोपाल थी। फ्लाइट हुबली से 03:45 दोपहर को चलकर 06:15 शाम को दिल्ली एयरपोर्ट पहुंची। दिल्ली में हवाई अड्डा बदलना पड़ा। करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर एक निशुल्क बस में बैठकर घरेलू हवाई अड्डा पहुंचे। भोपाल की फ्लाइट शाम साढ़े सात बजे थे। नौ बजे भोपाल में थे। इस प्रकार डॉक्टर राजेश श्रीवास्तव जी के नेतृत्व और उनकी टीम के सानिध्य में बिना किसी दुर्घटना के सभी यात्रियों की सकुशल घर वापसी हुई।

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© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – मी प्रवासीनी ☆ सुखद सफर अंदमानची…नैसर्गिक पूल – भाग – ७ ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆

सौ. दीपा नारायण पुजारी

? मी प्रवासीनी ?

☆ सुखद सफर अंदमानची… नैसर्गिक पूल –  भाग – ७ ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆

मानवनिर्मित अनेक पूल आपण पाहतो. ते स्थापत्य शास्र बघून अचंबित होतो. कोकणात किंवा काही खेड्यात ओढ्यावर, लहान नद्यांवर गावकऱ्यांनी बांधलेले साकव आपल्याला चकीत करतात. असाच एक अनोखा पूल आपल्या पावलांना खिळवून ठेवतो.

हा नैसर्गिकरीत्या तयार झालेला पूल आहे, नील बेटावर. अर्थात शहीद द्वीप येथे. भरतपूर किनाऱ्यावर प्रवाळ खडकांचा बनला आहे. किनाऱ्यावर केवड्याच्या झाडांसारख्या वनस्पतींची दाट बने आहेत. काही पायऱ्या चढून जावं लागतं. नंतर पुन्हा काही पायऱ्या आणि काही वेडीवाकडी, खडकाळ पायवाट उतरून जावं लागतं. पण एवढे श्रम सार्थकी लागतात असं दृश्य समोर असतं. निळा, शांत समुद्र. खडकाळ किनारा. किनाऱ्यावर दाट हिरवी बेटं. आणखी थोडंसं खडकाळ किनाऱ्यावरुन, तोल सावरत, उड्या मारत गेलं की हा नैसर्गिक पूल आपलं स्वागत करतो. पाणी जाऊन जाऊन खडकाची झीज होऊन खडकात पोकळी तयार झाली आहे. या कमानीतले काही महाकाय खडकांचे अवशेष हा पूर्वी एक मोठा विशाल खडक असल्याचा पुरावा देतात. या कमानीच्या खालून मात्र आपण सहज जाऊ शकत नाही. या उरलेल्या खडकांवर चढून वर जायचं, आणि पुन्हा उतरायचं. मगच या पुलापलिकडील दुनिया नजरेत भरते. पाण्यामुळं शेवाळ झालंय. निसरडं आहे. पण हे धाडस केले तर समाधान आहे. तुम्हाला शक्य नसल्यास पुलाच्या पलिकडून जो खडकाळ किनारा आहे त्यावरून ही तुम्ही पलिकडे जाऊ शकता. या कमानीत फोटोप्रेमींची गर्दी होते.

एकूणच या खडकाळ किनाऱ्यावर चालणं हे एक आव्हान आहे. आमच्या सोबत काही पंचाहत्तरीचे तरुण तरुणी होते. ते देखील या किनाऱ्यावर आले. त्यांच्याकडं बघून मी मध्येच कधीतरी माझ्या नवरोजीचा आधार घेत होते याची लाज वाटत होती.

या दगडांत अध्ये मध्ये पाणी साठलं आहे. या पाण्यात अनेक सागरी प्राणी दर्शन देतात. नेहमीप्रमाणे शंख शिंपले तर आहेतच. अनेक प्रकारचे मासे, शेवाळ, खेकडे यांची रेलचेल आहे इथं. हिरव्या पाठीची समुद्र कासवं इथं बघायला मिळतात. या खडकाळ किनाऱ्यावर असणाऱ्या डबक्यांपाशी थांबून कितीतरी मजेशीर गोष्टींचं निरीक्षण करता येतं. फोटोग्राफी करणाऱ्यांना वेगळे फोटो मिळतात. आमच्या टूर गाईडनं सांगितलं की या खडकांभोवती विळखे घालून मोठमोठाले साप सुद्धा असतात. हे विषारी असतात. आम्हाला दिसले तरी नाहीत. विश्वास ठेवायलाच हवा होता कारण, त्याच्याच मोबाईलवर त्यानं स्वतः घेतलेला फोटो दाखवला. असेलही. त्या शांत, खडकांमध्ये समुद्रसाप वस्तीला येतही असतील. खडकांची झीज होऊन तयार झालेला हा पूल पूर्वी हावडा पूल म्हणून ओळखला जाई. येथे बंगाली लोकांची वस्ती आहे. म्हणून असेल. याला रविंद्रनाथ सेतू असेही नाव कुणी दिलंय असं कळलं.

अंदमान मध्ये शेती फारशी केली जात नाही. बहुतेक सगळं अन्न धान्य, फळं भाज्या कलकत्त्याहून येतात. पण हिंदी महासागरातल्या या शहीद द्वीपवर पालक, टोमॅटो सारख्या काही भाज्या घेतल्या जातात. शहाळी मात्र भरपूर मिळतात. नैसर्गिक पूल बघण्यासाठी केलेले श्रम नारळाच्या थंडगार, मधुर पाण्यानं विसरले जातात.

शहीद बेटावरील लक्ष्मणपूर किनारा सुर्यास्त बघण्यासाठी प्रसिद्ध आहे. हा किनारा मऊ, पांढरी शाल ओढून बसला आहे. शांत किनारा, तितकाच शांत शीतल निळा समुद्र. आणि निळ्या आकाशात लांबवर चाललेली रंगपंचमी. केशरी, पिवळी लाल, गुलाबी, जांभळे रंग धारण करणारा ते नीळाकाश. त्याच्या बदलत्या छटा बघत शांत बसून रहावं. स्वतः बरोबर निळ्या खोलीचाही रंग बदलवणाऱ्या जादुई संध्येला अभिवादन करावं. आणि मग नि:शब्द पायांनी परतावं. हो, पण, पाण्यात बुडणारा सूर्य बघायला मिळेल असं नाही. कारण इथलं अनिश्चित हवामान. दुपारपासून तापलेलं आकाश अचानक कुठुनतरी आलेल्या काळ्या ढगांनी झाकोळतं. मग संध्येला भेटायला केशरी पाण्यात शिरणारं ते बिंब शामल ढगा़आड दडताना बघावं लागतं.

– समाप्त –

© सौ. दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

01 अक्टूबर 2023 को हमारे दल की वापिसी यात्रा शुरू हुई। हमको एहोल और बादामी गुफाओं के दर्शन करके बादामी स्थित आनंदनगर की एक होटल में एक रात गुज़ारना थी। ताकि अगले दिन हुबली एयरपोर्ट से सुबह की दिल्ली फ्लाइट पकड़ी जा सके। दिल्ली एयरपोर्ट पर रात्रि विश्राम करके शाम को भोपाल फ्लाइट पकड़नी थी। हम लोग हुबली आते समय सीधे कोप्पल के रास्ते से से हॉस्पेट पहुँचे थे। वापिसी में हंगुण्ड हुए एहोल पहुंचना था। होटल से नाश्ता करके चले।

साथियों को बताया कि कार्बन डेटिंग पद्धति से यह पता चला है कि दक्षिण भारत में ईसा पूर्व 8000 से मानव बस्तियाँ रही हैं। लगभग 1000 ईसा पूर्व से लौह युग का सूत्रपात हुआ। मालाबार और तमिल लोग प्राचीन काल में यूनान और रोम से व्यापार किया करते थे। वे रोम, यूनान, चीन, अरब, यहूदी आदि लोगों के सम्पर्क में थे। प्राचीन दक्षिण भारत में विभिन्न समयों तथा क्षेत्रों में विभिन्न शासकों तथा राजवंशों ने राज किया। सातवाहन, चेर, चोल, पांड्य, चालुक्य, पल्लव, होयसल, राष्ट्रकूट आदि ऐसे ही कुछ राजवंश थे। इनमें से चालुक्य राजाओं के शासन के दौरान भूतनाथ गुफाओं में प्रश्तर मूर्तियों का निर्माण हुआ।

अब यात्रा उत्तर दिशा में कोल्हापुर जाने वाली सड़क पर शुरू होनी है। हॉस्पेट से दस किलोमीटर चले थे और तुंगभद्रा नदी पर बना बांध दिखने लगा। दूर से ही दर्शन करके आगे बढ़ गए। करीब 100 किलोमीटर चलकर हंगुण्ड पहुँचे। तब तक लंच का समय हो  चुका था।

हंगुण्ड के होटल मयूर यात्री निवास रेस्टोरेंट में दोपहर का भोजन निपटा कर प्रसिद्ध ऐहोल शिलालेख देखा।

यह रविकीर्ति का ऐहोल शिलालेख है, जिसे कभी-कभी पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल शिलालेख भी कहा जाता है। यह शिलालेख ऐहोल शहर के दुर्गा मंदिर और पुरातात्विक संग्रहालय से लगभग 600 मीटर दूर एहोल शिलालेख मेगुटी जैन मंदिर की पूर्वी दीवार पर पाया गया है। एहोल – जिसे ऐतिहासिक ग्रंथों में अय्यावोल या आर्यपुरा के रूप में भी जाना जाता है – 540 ईस्वी में स्थापित पश्चिमी चालुक्य वंश की मूल राजधानी थी, उनके बाद 7वीं शताब्दी में वातापी की राजधानी रहा।

शिलालेख में पुरानी चालुक्य लिपि में संस्कृत की 19 पंक्तियाँ हैं। यह मेगुटी मंदिर की पूर्वी बाहरी दीवार पर स्थापित एक पत्थर पर अंकित है, जिसमें लगभग 4.75 फीट x 2 फीट की सतह पर पाठ लिखा हुआ है। अक्षरों की ऊंचाई 0.5 से 0.62 इंच के बीच है। शैलीगत अंतर से पता चलता है कि 18वीं और 19वीं पंक्तियाँ बाद में जोड़े गए अपभ्रंश हैं, और रविकीर्ति की नहीं हैं।

शिलालेख एक प्रशस्ति है। यह पौराणिक कथाएँ बुनता है और अतिशयोक्ति पूर्ण है। लेखक ने अपने संरक्षक पुलकेशिन द्वितीय की तुलना किंवदंतियों से की है, और खुद की तुलना कालिदास और भारवि जैसे कुछ महानतम संस्कृत कवियों से की है – जो हिंदू परंपरा में पूजनीय हैं। फिर भी, यह शिलालेख कालिदास के प्रभावशाली कार्यों से वाक्यांशों को उधार लेता प्रतीत होता है।

ऐहोल के बाद अगला पड़ाव बादामी था। बादामी बागलकोट जिला में पहले वातापी के नाम से जाना जाता था, वर्तमान में एक तालुक मुख्यालय है। यह 540 से 757 तक बादामी चालुक्यों की शाही राजधानी रहा। बादामी गुफा मंदिर चट्टानों को काटकर बनाए गए स्मारकों के साथ-साथ भूतनाथ मंदिर, बादामी शिवालय और जम्बुलिंगेश्वर मंदिर जैसे संरचनात्मक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यह अगस्त्य झील के चारों ओर ऊबड़-खाबड़, लाल बलुआ पत्थर की चट्टान के नीचे एक खड्ड में स्थित है।

बादामी शहर महाकाव्यों की अगस्त्य कथा से जुड़ा हुआ है। महाभारत में, असुर वातापी एक बकरी बन जाता था, जिसे उसका भाई इल्वला पकाता था और मेहमान को खिलाता था। इसके बाद, इल्वला उसे पुकारता था, वातापी पीड़ित के अंदर से पेट फाड़ कर बाहर निकलता था। जिससे पीड़ित की मौत हो जाती थी। जब ऋषि अगस्त्य आए, तो इल्वला उन्हें बकरी भोज प्रदान करता है। अगस्त्य भोजन को पचाकर वातापी को मार देते हैं। इस प्रकार अगस्त्य ने  वातापि और इल्वला को मार डाला। ऐसा माना जाता है कि यह किंवदंती बादामी के पास घटित हुई थी, इसलिए इसका नाम वातापी और अगस्त्य झील पड़ा।

चालुक्यों के प्रारंभिक शासक पुलकेशिन प्रथम को आम तौर पर 540 में बादामी चालुक्य राजवंश की स्थापना करने वाला माना जाता है। बादामी में एक शिलाखंड पर उत्कीर्ण इस राजा के एक शिलालेख में 544 में ‘वातापी’ के ऊपर पहाड़ी की किलेबंदी का रिकॉर्ड दर्ज है। क्योंकि बादामी तीन तरफ से ऊबड़-खाबड़ बलुआ पत्थर की चट्टानों से सुरक्षित है। इसीलिए उनकी राजधानी के लिए यह स्थान संभवतः रणनीतिक कारण से पुलकेशिन की पसंद था। उनके पुत्रों कीर्तिवर्मन प्रथम और उनके भाई मंगलेश ने वहां स्थित गुफा मंदिरों का निर्माण कराया।

कीर्तिवर्मन प्रथम ने वातापी को मजबूत किया और उसके तीन बेटे थे, पुलकेशिन द्वितीय, विष्णुवर्धन और बुद्धवारास, जो उसकी मृत्यु के समय नाबालिग थे। कीर्तिवर्मन प्रथम के भाई मंगलेश ने राज्य पर शासन किया, जैसा कि महाकूट स्तंभलेख में उल्लेख किया गया है। 610 में, प्रसिद्ध पुलकेशिन द्वितीय सत्ता में आया और 642 तक शासन किया। वातापी प्रारंभिक चालुक्यों की राजधानी थी, जिन्होंने 6वीं और 8वीं शताब्दी के बीच कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के कुछ हिस्सों और आंध्र प्रदेश पर शासन किया था।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासीनी ☆ सुखद सफर अंदमानची… प्रवाळांची दुनिया – भाग – ६ ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆

सौ. दीपा नारायण पुजारी

? मी प्रवासीनी ?

☆ सुखद सफर अंदमानची… प्रवाळांची दुनिया –  भाग – ६ ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆

प्रवाळांची दुनिया 

अंदमान मधील बेटं कोरल लिफ्स अर्थात प्रवाळ भिंती साठी प्रसिद्ध आहेत. ही बेटं म्हणजे जणू या भूमीवरील अद्भुत चमत्कार आहे. प्रवाळांचे एकशेएकोण ऐंशी पेक्षा जास्त प्रकार इथं आढळतात. शाळा कॉलेज मध्ये शिकत असताना प्रवाळांचा अभ्यास नेहमी वेगळी ओढ लावत असे. प्रवाळांची रंगीत चित्रे मन आकर्षित करणारी असतात. प्रत्यक्ष प्रवाळ कधी बघायला मिळतील असं वाटलं नव्हतं. पण अंदमानची सहल या करता वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. प्रवाळ भिंत ही एक अद्भुत अशी पाण्याखालील बाग आहे. जिवंत, श्वास घेणाऱ्या प्रवाळांच्या बागेत आपण फिरतोय ही कल्पनाच केवढी मोहक आहे, हो ना? 

ते एक चित्तथरारक दृश्य आहे. लाल, गुलाबी, जांभळे, निळे लवलवते प्रवाळ, हात पसरून आपल्या आजूबाजूला पसरलेले दिसतात. जणू काही पाण्याखालील रंगीबेरंगी उद्यानांची शहरेच. अकराशे चौरस किलोमीटर पेक्षा जास्त पसरलेली ही शहरे दोन प्रकारात मोडतात. एक-बॅरियर रीफ आणि दुसरा -फ्रिंगिंग रिफ. भारतातील सर्वात प्राचीन व गतिशील परिसंस्थांपैकी एक. समुद्राच्या उथळ आणि पारदर्शक पाण्यात वाढणारी ही प्रवाळ बेटे म्हणजे सिलेंटेराटा या वर्गातील ऍंथोझोआ गटातील लहान आकाराच्या प्राण्यांची वसाहत होय. हे सजीव चुन्याचे उत्सर्जन करतात. त्यांच्या भोवती या चुन्याचे कवच तयार होते. कालांतराने हे सजीव मृत झाल्यावर, त्यांच्या अवशेषांमध्ये वाढणारे जलशैवाल आणि त्यांनी उत्सर्जित केलेले चुनायुक्त क्षार एकत्र येऊन प्रवाळ खडक तयार होतात. या खडकांना प्रवाळ मंच किंवा प्रवाळ भित्ती (Coral reefs) असे म्हणतात. सामान्य भाषेत आपण यांना पोवळे म्हणतो.

अंदमान येथील नॉर्थ बे, हॅवलॉक बेट (स्वराज द्वीप) आणि नील बेट (शहीद द्वीप) या बेटांवर ही प्रवाळांची भिंत आपल्याला बघायला मिळते. नॉर्थ बे द्वीप या बेटावर मऊशार पांढरी शुभ्र वाळू तुमचं स्वागत करते. या वाळूवर जिकडं तिकडं प्रवाळांचे अवशेष इतस्ततः विखुरलेले दिसतात. स्वच्छ समुद्रकिनारा हे ही अंदमानच्या सर्व सागरकिनाऱ्यांचं वैशिष्ट्य म्हणायला हवं. मऊ रेशमी वाळूचा किनारा आणि निळा समुद्र. दोन्ही किती मोहक. निळी मोरपंखी झालर झालर वाली घेरदार वस्रं ल्यालेली नवतरुण अवनी, जिच्या निळ्या झालरीला शुभ्र मोत्यांच्या लडी अलगद जडवल्यात. तिच्या पदन्यासात निळ्या झालरीची लहर फेसाळत शुभ्र किनाऱ्यावर झेपावत येते. येताना किती चमकते शुभ्र मोती पसरून जाते. का कुणी अवखळ सागरकन्या धीरगंभीर भारदस्त किनाऱ्याच्या ओढीनं मौत्यिकं उधळत खिदळत येते. नजरकैद म्हणजे काय हे उमगावं असं हे फेसाळणारं सौंदर्य बघून.

सबमरीन नावाची लालपरी आपल्याला अलगद समुद्रात पाण्याखाली घेऊन जाते. आठ जणांना बसायची सोय असलेल्या या परीतून आपण समुद्रात काही मीटर खोल जातो. आजूबाजूला पसरलेलं प्रवाळ साम्राज्य बघून स्तिमित होतो. नॉर्थ बे किनाऱ्यावर जास्त करून आपल्याला प्रवाळांचे खडक बघायला मिळतात. यातील प्राणी आता जिवंत सापडत नाहीत. पण यांनी समुद्रातील कितीतरी सजीवांना आसरा दिला आहे. इथं माशांचे खूप प्रकार बघायला मिळाले. टेबल कोरल्स, ब्रेन कोरल्स, फिंगर कोरल्स, फुलकोबी कोरल्स अशी यांची नावं असल्याचं आमच्या नावाडीमित्रानं माहिती दिली.

नील बेटावर आम्हाला काचेचा तळ असलेल्या बोटीतून समुद्र सफर करायला मिळाली. या बोटीच्या तळाशी काच बसवलेली असते. त्यामुळे समुद्रातील प्राणी, मासे, वनस्पती अगदी बसल्या जागेवरून दिसतात. या बोटीतून नावाडी आपल्याला समुद्रात दूरवर घेऊन जातो. मनमोहक निळं पाणी संपून जिथं अधिक गहिरा निळा रंग समुद्रानं धारण केला असतो. या पाण्यात प्रवाळांची संख्या जास्त आहे. शिवाय प्रकार देखील जास्त आहेत. समुद्र वनस्पती प्रवाळांच्या खडकांतून डोकावताना दिसतात. नावाडी त्याला माहित असलेल्या प्रवाळांची माहिती देतो. सबमरीन पेक्षा जास्त प्रकारचे प्रवाळ तर दिसतातच, पण विविध मासेही दिसतात. नशीब बलवत्तर असेल तर डॉल्फिन दर्शन सुद्धा होतं.

या बेटांवर स्कुबा डायव्हिंग, स्नॉर्कलिंग, केयाकिंग, पॅराग्लायडिंग सारखे साहसी खेळ आहेत. आवड असणारे साहसवीर यात सहभागी होऊ शकतात. समुद्र सफारीचा अनोखा आनंद मिळवू शकतात. अर्थात यासाठी वयाची अट आहे. साठी नंतरचे लोक, तसंच रक्तदाब, मधुमेह किंवा आणखी काही शारीरिक व्याधी असेल तर परवानगी मिळत नाही. इथं जाताना आपलं आधार कार्ड, पासपोर्ट गरजेचा आहे. त्याशिवाय हे साहसीखेळ खेळायला परवानगी दिली जात नाही. हा समुद्र प्रवास सुद्धा शक्य नाही. प्रत्येक जेट्टीवर हे तपासलं जातं.

– क्रमशः भाग सहावा

© सौ. दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हॉस्पेट बाज़ार से होटल लौटते समय एक बड़े चौराहे पर महात्मा गांधी उद्यान दिखा। हमने कुछ समय उद्यान में बिताने का निर्णय किया। घनी हरियाली के बीच पुष्पों, मध्यम ऊँचाई के आच्छादित पेड़ों के सायों में  फ़व्वारों की जल लहरियाँ मध्यम संगीत की धुन पर नृत्य कर रही थीं। पुरसुकुन माहौल पाकर एक हरी घास की मोटी सी कालीन पर आँख बंद कर लेट का ध्यानस्थ हो गए। समय रुक सा गया। जब थोड़ी देर बाद आँख खुली तो सुबह सी ताज़गी नसों में दौड़ रही थी।

तब तक चारों तरफ़ कई मुस्लिम परिवार बाल बच्चों सहित आकर आनंदित हो रहे थे। साथी ने पूछा – यहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है क्या ?

  • हाँ विजयनगर साम्राज्य के विध्वंस के बाद अधिकांश आबादी ने धर्म बदल लिया था। विजयनगर साम्राज्य की चार मुस्लिम रियासतों ने आपस में बांट लिया था। बाक़ी काम हैदरअली-टीपू सुल्तान ने निपटा लिया था।

लेकिन बाद में तो शिवाजी का मराठा साम्राज्य यहाँ स्थापित हुआ था।

  • सही है, लेकिन उन्होंने इनकी घर वापिसी की कोई मुहिम नहीं चलाई। और चलाई भी होती तो इन्हें किस जाति में वापस लेते।

मगर यहाँ के मुसलमान सीधे-सादे दिखते हैं।

  • हाँ, दक्षिण में अधिकांश शिया पंथ के मुसलमान हैं। जो उत्तर के तुर्की मुसलमानों जैसे कट्टर सुन्नी नहीं होते। इसीलिए दक्षिण में कम दंगे होते हैं। यहाँ दोनों कौमों में उतनी नफ़रत नहीं है।

महात्मा गांधी उद्यान में एक घंटा व्यतीत कर जब तक होटल लौटे, भोजन का समय हो चुका था। लौटकर मालूम हुआ, राजेश जी के चुम्बकीय व्यक्तित्व से प्रभावित होकर होटल के मालिक ने अपने बंगले की छत पर एक सामूहिक परिचय और रात्रिभोज का इंतज़ाम किया था। रात ग्यारह बजे तक आसमान से छिटक कर बरसती चाँदनी में कुछ साधु संतों की संगत में इन्द्रियों पर रंगत चढ़ाते आनंदित हुए। अगले दिन से वापिसी यात्रा शुरू होनी थी। पुस्तक से थोड़ा ऐहोले और बादामी का भूगोल और इतिहास देखते बारह बजे के आसपास मुलायम गद्दे पर नींद के आगोश में चले गए।

ऐहोले (Aihole) कर्नाटक राज्य के बागलकोट ज़िले में मलप्रभा नदी घाटी में फैले हुए 120 से अधिक शिला और गुफा मन्दिरों का एक समूह है। इसमें हिन्दू, जैन और बौद्ध स्थापत्य आकृतियाँ शामिल हैं। इन मन्दिरों व मठो का निर्माण 4थी–12वीं शताब्दी में चालुक्य राजवंश ने कराया था। लेकिन अधिकांश स्थापत्य 7वीं से 10वीं शताब्दी में निर्मित हैं। यह ऐहोले नामक गाँव के आसपास स्थित हैं, जो खेतों और बलुआ पत्थर के पहाड़ों के बीच बसा हुआ है। यहाँ से हुनगुन्दा लगभग 35 किमी दूर है, जिसके बिल्कुल नज़दीक ऐहोले है।

ऐहोले से चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय का 634 ई. का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। यह प्रशस्ति के रूप में है और संस्कृत काव्य परम्परा में लिखा गया है। इसके रचयिता जैन कवि रविकीर्ति थे। इस अभिलेख में पुलकेशी द्वितीय की विजयों का वर्णन है। अभिलेख में पुलकेशी द्वितीय के हाथों हर्षवर्धन की पराजय के बारे में जानकारी मिलती है। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हर्ष और पुलकेशिन के मध्य युद्ध 630 और 634 ईसवी के बीच हुआ था। जिसमें पुलकेशिन ने नर्मदा नदी के उत्तर तक का बहुत सा हिस्सा दबा लिया था।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 286 ☆ यात्रा-संस्मरण ☆ चमत्कारी गेट और अपनी पाप-मुक्ति ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अविस्मरणीय यात्रा संस्मरण – ‘चमत्कारी गेट और अपनी पाप-मुक्ति‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

(25 अप्रैल 2025 को परम आदरणीय डॉ कुंदन सिंह परिहार जी ने अपने सफल, स्वस्थ एवं सादगीपूर्ण जीवन के 86 वर्ष पूर्ण किये। आपका आशीर्वाद हम सबको, हमारी एवं आने वाली पीढ़ियों को सदैव मिलता रहे ईश्वर से यही कामना है। ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से आपके स्वस्थ जीवन  के लिए हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 286 ☆

☆ यात्रा-संस्मरण ☆ चमत्कारी गेट और अपनी पाप-मुक्ति

हाल ही में सिक्किम यात्रा का अवसर मिला। ट्रेन से दिल्ली पहुंच कर 22 मार्च को बागडोगरा की फ्लाइट पकड़ी। हमारे परिवार के नौ लोग थे। बागडोगरा पहुंचने पर रोलेप ट्राइबल होमस्टे के संचालक श्री रोशन राय ने हमारी ज़िम्मेदारी संभाल ली। पहला गंतव्य मानखिम। उसके बाद लुंचोक, रोलेप, ज़ुलुक, गंगटोक और रावोंगला। 30 मार्च तक घूमना-फिरना, रुकना-  टिकना, खाना-पीना सब रोशन जी के ज़िम्मे। होमस्टे का अलग ही अनुभव था। रोशन जी अभी युवा हैं, बहुत सरल, विनोदी स्वभाव के। वैसी ही उनकी पूरी टीम है। सब कुछ घर जैसा, पूरी तरह अनौपचारिक। मेरी बेटियां और बहू उनकी टीम को रसोई में मदद देने में जुट जाती थीं।

रोलेप में हम ऊंची, मुश्किल जगहों में पैदल चढ़े। तब इत्मीनान हुआ कि उम्र बहुत हो जाने पर भी काठी अभी ठीक-ठाक है। अपने ऊपर भरोसा पैदा हुआ। ऊपर चढ़ने में मेरी फिक्र मुझसे ज़्यादा रोशन जी के लड़कों को रहती थी। हम 12000 फुट की ऊंचाई पर स्थित ज़ुलुक में भी एक रात ठहरे, जो बेहद ठंडी जगह है।

लौटते वक्त गंगटोक में हमारी भेंट रोशन जी की पत्नी और उनकी बहुत प्यारी बेटी से हुई। उनके साथ भोजन हुआ। दूसरे दिन रोशन जी ने हमें रास्ते में रोक कर हम सब के गले में पीला उत्तरीय डालकर हमें विदा किया। उनके व्यवहार के कारण हमारी यात्रा सचमुच यादगार बन गयी।

रोशन जी की टीम में जो लड़के हैं वे गांव-देहात के लड़कों जैसे हैं। होटलों में कार्यरत, ट्रेन्ड, ‘गुड मॉर्निंग, गुड ईवनिंग सर’ वाले सेवकों जैसे नहीं। आपके बगल में चलते-चलते वे आपके साथ कोई मज़ाक करके हंसते-हंसते दुहरे हो जाएंगे। रोशन जी ने बताया ये सब ऐसे लड़के थे जिनके घर में खाने-पहनने की भी तंगी थी। रोशन जी उन पर नज़र रखते थे कि पैसा मिलने पर कोई ग़लत शौक न पाल लें।

गंगटोक से चलकर हम नाथूला पास पर कुछ देर रुकते हुए रावोंगला पहुंचे, जो बागडोगरा वापस पहुंचने से पहले हमारा आखिरी मुकाम था। यहां ‘सेविन मिरर लेक’ नामक होमस्टे पर हम दो दिन रुके। सुन्दर स्थान है। सिक्किम में हर जगह तरह-तरह के फूलों की बहार दिखी। प्राकृतिक, प्रदूषण-मुक्त वातावरण में फूलों के दमकते रंग आंखों को चौंधयाते हैं।

इस होमस्टे से कुछ दूरी पर बुद्ध पार्क है। यहां गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमा, संग्रहालय  और पुस्तकालय हैं। पार्क बड़े क्षेत्र में फैला है। वहां पर्यटकों की अच्छी भीड़ दिखी।

होमस्टे की सीढ़ियों पर बने द्वार के बगल में लगी सफेद पत्थर की एक पट्टिका ने ध्यान खींचा। उस पर कुछ अंकित था। उत्सुकतावश पढ़ा तो चमत्कृत हो गया। पट्टिका पर लिखा था कि  वह द्वार अनेक ‘ज़ुंग’ अर्थात मंत्रों से अभिषिक्त था और उसके नीचे से निकलने वाला अपने सभी पिछले पापों से मुक्त हो जाएगा। (फोटो दे रहा हूं)

अंधा क्या चाहे, दो आंखें। मैं 86 की उम्र पार करने के बाद भी अभी तक संगम पहुंचकर अपने पाप नहीं धो पाया, इसलिए इस द्वार की लिखावट पढ़कर लगा अंधे के हाथ बटेर लग गयी। मैं तुरन्त दो तीन बार उस द्वार के नीचे से गुज़रा । मन हल्का हो गया, सब पापों का बोझ उतर गया। 86 पार की उम्र में नये पापों का पराक्रम करने की गुंजाइश बहुत कम है, इसलिए मुझे अब स्वर्ग की दमकती हुई रोशनियां साफ-साफ दिखायी पड़ने लगी हैं। मित्रगण भरोसा रख सकते हैं कि दुनिया से रुख़सत होने पर मुझे स्वर्ग में बिना ख़ास  जांच- पड़ताल के ‘एंट्री’ मिल जाएगी। परलोक की चिन्ता से मुक्त हुआ।

(ई-अभिव्यक्ति द्वारा डॉ कुंदन सिंह परिहार जी के 85 वें जन्मदिवस के अवसर पर स्मृतिशेष भाई जय प्रकाश पाण्डेय जी द्वारा संपादित 85 पार – साहित्य के कुंदन आपके अवलोकनार्थ)

इस प्रकार सौ टका पुण्यवान होकर 31 मार्च को दिल्ली से ट्रेन पकड़कर 1 अप्रैल की सुबह पंछी पुनि जहाज पर पहुंच गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासीनी ☆ सुखद सफर अंदमानची… द्वीपसखी – भाग – ५ ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆

सौ. दीपा नारायण पुजारी

? मी प्रवासीनी ?

☆ सुखद सफर अंदमानची… द्वीपसखी –  भाग – ५ ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆

आपल्या आजूबाजूला आपण काही निसर्गप्रेमी बघतो. हे लोक तसे आपल्या सारखे व्यस्त असतात. तरीही त्यांच्या व्यस्ततेतून सवड काढून ते झाडांची, पशुपक्ष्यांची काळजी घेताना दिसतात. अगदी स्वतःच्या जीवावर उदार होऊन हे काम ते करत असतात. खिशाला खार लावून निसर्ग संवर्धन करताना आढळतात. यातील काहींना तर त्यांची भाषाही कळते असं वाटतं. आपण त्यांचं हे सौहार्द बघून स्तिमित होतो. माझ्यासाठी म्हणाल तर हे निसर्गमित्र वंदनीय आहेत.

एका कुत्र्याच्या किंवा मांजराच्या विषयी माया वाटणं हे तसं थोडंसं सोपं आहे. परंतु एखाद्या अधिवासात राहणाऱ्या सर्वच प्राणीमात्रांविषयी, तिथल्या वनस्पतींविषयी, प्रेम वाटणं थक्कं करणारं आहे, हो ना? मला अशी एक व्यक्ती माहिती आहे, जिला शेकडो प्राणी ओळखतात. जिला त्यांची भाषाही कळते. आपण जशी रोज संध्याकाळी घरी परतणाऱ्या आपल्या आप्तेष्टांची वाट पाहतो ना, अगदी तशीच वाट हे सगळे या ताईची पाहतात. अगदी आतुरतेनं. तिची चाहूल लागताच हरणांचे कळपच्या कळप तिच्या भोवती जमा होतात. सुंदर पिवळ्या सोनेरी रंगाचे, ठिपक्या ठिपक्यांची वस्त्रं चमचम करत तिच्या भोवती जमा होतात. थुईथुई करणाऱ्या मोरांची नाचरी चाल तिच्याकडं धाव घेते. सोनेरी रंगांमध्ये निळ्या मोरपिशी रंगांचे थवे डोलत उभे राहतात. निळे हिरवे पिसारे, वेड लावेल अशी गर्द निळ्या रंगाच्या ऐटदार मानेला अधिकच तोऱ्यात उभी करत ते शेकडो मोरोपंत दाटीवाटी करतात. मागं दिसणारा समुद्र अधिक निळाशार की समोरचा मोहक मयुरसंच अधिक निळा? आकाशाचा निळा रंग बघू, सागराची निळी गहराई शोधू कि या मयुरपंखांची निळीहिरवी जादू डोळ्यात साठवू. त्यातच तो निळाई छेदून आरपार जाणारा पिवळा सोनेरी रंग घायाळ करता होतो. तितक्यात एक इटुकली, धिटुकली खारुताई तिच्या खिशातून बाहेर येते आणि घाईघाईने, तुरुतुरु कुठंतरी जाते.

मी अचंबित होऊन बघत होते. जेमतेम साडेचार पाच फुटांची ती ताई, या सगळ्यांची जणू आई होती. आईच म्हणायला हवं. ही आहे एक आदिवासी महिला, अनुराधा, अनुराधा ताई, दिदी, माई कोणतीही हाक मारा. रॉस आयलंड, म्हणजेच सध्याच्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस बेटावर तुम्ही गेलात तर हे दृश्य तुम्हाला नक्की दिसेल. त्सुनामी नंतर हे बेट विराण खंडहर झालंय. पूर्वी इथं सेल्युलर जेल मध्ये काम करणारे इंग्रज अधिकारी रहात होते. त्यांचे बंगले होते. आता फक्त अवशेष दिसतात. तो सगळा इतिहास अम्मा सांगतातच, पण या सगळ्या प्राण्यांच्या, पक्ष्यांच्या, झाडांच्या गोष्टी त्या सांगतात. वादळानंतर या बेटावर फक्त तीन प्राणी उरले होते. आता त्यांची संख्या हजारोत आहे. या प्राण्यांना त्यांच्याच अधिवासात तिनं अतिशय प्रतिकूल परिस्थितीतून अनुकूल परिस्थितीत आणलंय. प्रसंगी वेडी अनुराधा हा शिक्का मारुन घेऊन. कधी वेडीला मारलेले दगड झेलून, तिनं या विराण खंडहर झालेल्या मातीत पुन्हा नंदनवन उभं केलं आहे. तिनं तिचे आईवडील, भावंड या सर्वांना गमावलंय. पण मुक्या प्राण्यांवर प्रेम करण्याची वडिलांनी दिलेली शिकवण ती विसरली नाहीय. इथल्या आदिवासी जमातीची अनुराधा या निसर्गावर भरभरून प्रेम करते. या मातीचं क्षण फेडण्यासाठी अविरत धडपडते. आज तिची दखल भारतीय नौदलानं घेतली आहे. तिला मानाचा किताब दिला आहे. पण पुरस्कार मिळाला तरी तिचं काम सुरू आहे.

अम्माला या सजीवांचं बोलणं समजतं, त्यांच्या डोळ्यातले भाव ओळखता येतात. तिच्याशी बोलायला सगळे प्राणी उत्सुक असतात. एक आंधळं हरीण तिच्या सगळ्या आज्ञा पाळतं. (अर्थात बाकीचे सगळे तिला देवासमान मानतात हे तर आहेच.) ताई सांगत होती, ती आमच्याशी बोलतेय हे त्या हरणाला आवडलं नाहीय. म्हणून ते रुसून बसलंय. बघा बघा, ते चाललंय निघून. तिनं त्याला सांगितलं की बघ बरं आपल्या कडं पाहुणे आले आहेत. त्यांच्याशी बोलते. मग भेटते तुला. त्याला पटलं असावं. लांब जाऊ लागलेलं ते थांबलं. बेटावरचे सर्व रहिवासी, (माणसं तिथं रहात नाहीत आता) तिला मनातलं सांगतात, तिला आपल्या भावविश्वात घेऊन जातात. त्यांना तिची भाषा समजते यापेक्षा, तिला त्यांची, त्यांच्यातल्या प्रत्येकाच्या मनात काय आहे हे कळतं. केवढं मोठं वरदान लाभलंय तिला. आपल्याशी बोलता बोलता ती स्वातंत्र्याच्या इतिहासाची पानं उलटते. आपल्याला स्वातंत्र्यवीरांच्या कथा सांगते, अंदमानच्या तुरुंगाविषयी त्वेषानं बोलते. तिच्या अंगात जणू वीरश्री संचारते. सावरकरांच्या विषयी तिला वाटणारा आदर तिच्या शब्दांत, तिच्या डोळ्यात, सहज दिसतो. सावरकरांच्या बाबतीतल्या काही गोष्टी ज्या सहजतेनं वाचायला मिळणार नाहीत, अशा कथा ऐकायला, आपल्या देशाविषयी, आपल्या वीर सैनिकांना खरीखुरी आदरांजली द्यायला, नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वीपाला भेट द्यायलाच हवी. जाज्वल्य अभिमान कसा असतो हे अम्माच सांगू शकते. बाकी कुणी नाही.

मोबाईल संस्कृती, मोबाईल पर्वात वावरणारे आपण. आपली छटाकभर बुद्धी चंगळवादी राहणीमानाला दान करून टाकणारे आपण, तिच्या समोर खूप खुजे ठरतो. कृत्रिम जगात वावरताना आपण संवाद विसरलोय. आपल्या आईवडिलांशी, घरातल्या लोकांशी, आपण बोलायला कचरतो. शेजारपाजाऱ्यांशी तर आपण ओळख ठेवायला तयार नसतो. त्यांची नावंच काय पण चेहरे ही माहित नसतात आपल्याला. मग भावबंध कुठले? पण ही ताई लौकिक दृष्ट्या एकटी असून एकटी नाही. एकटेपणा तिच्या वाऱ्याला उभा रहातच नाही. तिला अगणित नाती आहेत. अस़ंख्य भावबंधांनी ती निसर्गाशी जोडली गेलीय. तिचा तसा साधाच पण आनंदी चेहरा मनात घर करून राहतो. अम्माचं साधंसुधं मोठेपण सोबत बांधून घेण्याचा प्रयत्न करत आपण परतीचा प्रवास सुरु करतो.

– क्रमशः भाग पाचवा 

© सौ. दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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