श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा।)
यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-२ ☆ श्री सुरेश पटवा
14 जून 2023 को ठीक बारह बजे सहयात्री पवन राय ने टैक्सी लेकर दरवाज़े पर दस्तक दी। हम कपिल मुनि के रूप में गंगा सागर में विराजमान विष्णु भगवान का नाम लेकर चौपहिया में सवार हो गए कि यार अनिश्चितताओं से भरी जीवन यात्रा में मुश्किलों भरी जीवंत यात्राओं से क्या परहेज़ करना। जीवन में यदि सब कुछ निश्चित हो जाये तो जीवन का रस ही समाप्त हो जाएगा। आस्थावान और यथार्थवादी दोनों कहते हैं कि सारी सावधानियों के बावजूद जो होना है सो तो होना ही है।
राजाभोज हवाई अड्डा पहुँच विमानतल पर प्रवेश लिया। सुरक्षा संबंधी जाँच हेतु आगे बढ़े। हमारे सामने कुछ व्हीआईपी क़िस्म की सवारियाँ थीं। संभवतः सीआईएसएफ़ से संबंधित अधिकारी थे। एक अफ़सर उनकी अगवानी कर रहा था। हम जब आगे बढ़े तो हमसे बेल्ट निकालने को कहा गया। जबकि व्हीआईपी क़िस्म के जीव बिना किसी जाँच के निकल गए। सीआईएसएफ़ वाले अपने अधिकारियों की बेल्ट निकलवाने से तो रहे। यदि अफ़सर की बेल्ट निकली तो रंगरूटों की खैर नहीं। औपचारिकता पूरी करके विमान में सवार होने प्रतीक्षा लॉबी में पहुँचे। वहाँ पता चला कि भोपाल से हैदराबाद की उड़ान दस मिनट देरी से रवाना होगी। अंततः विमान में सवार हो गए। हवाई यात्रा के दौरान पृथ्वी को आसमान से देखकर हवाई ख़्याल आने लगे। पृथ्वी सूर्य के गैस वलय से निकली एक गैस पिंड के रूप में अलग होकर ब्रह्मांड में घूमने लगी। उससे एक गैस वलय घूमता हुआ निकला। वह भी अपनी धुरी पर घूमता हुआ पृथ्वी की परिक्रमा करने लगा- वही हम सबका चन्दामामा हो गया। अब ये तीनों एक दूसरे ने अलग होकर भी गुरुत्वाकर्षण से जुड़े हैं जैसे पति पत्नी आचार विचार व्यवहार में अलग होकर भी एक दूसरे के आकर्षण से जुड़े रहते हैं। एक दूसरे की परिक्रमा करते रहते हैं। कभी उलझते हैं- कभी सुलझते हैं। एक दूसरे की गर्मी ठंड बरसात सहते हुए साथ चलते रहते हैं। सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा की तरह सभी घूम रहे हैं। कहीं किसी को चैन नहीं है।
पृथ्वी सूर्य से विलग होकर ठंडी होने लगी। इतनी ठंडी हो गई कि उसके ध्रुवीय प्रदेशों पर बर्फ जमने लगी। पूरी सफ़ेद हो गई। फिर पृथ्वी सूर्य के नज़दीक आने लगी तो बर्फ पिघल कर बादल बने। बादल से बारिश आई। उत्तरी क्षेत्रों में पोखर में जल इकट्ठा हुआ। उसी जल में सबसे पहले जलचर जीव की उत्पत्ति हुई। इसीलिए हिंदू शास्त्रों में विष्णु का पहला अवतार मत्स्य-अवतार है। कुछ जलचर जीवों में इस तरह के फेंफड़े विकसित हुए जो जल और थल दोनों में जीवित रह सकते थे। तभी दूसरा अवतार कच्छप-अवतार हुआ। तीसरा अवतार सूकर अवतार पशु रूप में हुआ जो थल पर ही जीवित रह सकता है। चौथा अवतार नरसिंह-अवतार हुआ जो यह सिद्ध करता है कि मनुष्य का विकास पशु से हुआ है। यही डारविन का क्रमागत विकास का सिद्धांत भी कहता है।
पृथ्वी के उसी उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में आर्यों के पूर्वज निवास करते थे। जब पृथ्वी पुनः सूर्य से दूर घूमने लगी। तब एक और शीत काल आया। जीवों का जीवन दूभर होने लगा। उन्होंने उत्तर से दक्षिण दिशा की यात्रा शुरू कर दी। समुंदरों और नदियों के किनारे बसने लगे। वे कहीं से आने की कारण आर्य कहलाये। उन्होंने यूरोप और एशिया को बसाना आरम्भ किया।
विमान उड़ने के बाद आसमान में चिलचिलाती धूप का नज़ारा दिखने लगा। ऐसा लगा जैसे ज़मीन सुलग रही है। आधा घंटे उड़ने के बाद नीचे नर्मदा नदी के दर्शन हुए। विमान धरातल पर बहती नर्मदा नदी को पार करके पुराने समय में प्रसिद्ध खानदेश अर्थात् बुरहानपुर जलगाँव अहमदनगर के ऊपर से उड़ान भरता हुआ जाएगा।
जब भारत में आर्यों की पहली खेप आई तब कुछ शांति प्रिय द्रविड़ जातियाँ उत्तर में सिंध नदी के आसपास बसती थीं। आर्यों ने उन्हें खदेड़ा तो वे निचले हिस्से में समुद्र तक खिसक गईं। आर्यों को गंगा का इलाक़ा गंगासागर तक मिल गया। आर्यों की पहली खेप बंग गंगासागर तक खिसक गई। दूसरी खेप गुर्जर पश्चिम की तरफ़ आधुनिक द्वारिका तक गई। तीसरी खेप मरहट्ट द्रविड लोगों से जा टकराए। फिर जाट मालव क्षुद्रक का आगमन हुआ जो उत्तर प्रदेश राजस्थान में बस गए। उन्हीं से राजपूत विकसित हुए। इन सबने सब तरफ़ से घुसपैठ कर मध्य प्रदेश को आबाद किया। जिसकी राजधानी भोपाल से हवाई जहाज़ में सवार होकर हैदराबाद पहुँचने वाली उड़ान में सवार हैं। हम किनारे की सीट होने से धरती के नज़ारे दिखने लगे। पायलट द्वारा दो घंटे की उड़ान बताई गई। विमान में ए.सी. की तो बात ही ना करें, पंखा तक नहीं चल रहे थे। सवारियों ने चिल्लाना शुरू किया। उन्हें बताया गया कि विमान के इंजन से वातानुकूलन सिस्टम जुड़ा हुआ है। विमान उड़ान भरते समय ए.सी. चालू होगा। विमान में दो उड़न परी खाने पीने की सामग्री बेंच रही थीं। एक थोड़े कम उम्र की सुंदर चेहरा और आकर्षक व्यक्तित्व की थी। दूसरी थुलथुल देह की थी और उसके चेहरे पर सौंदर्य प्रसाधन के बावजूद ताज़े बखर चले खेत की तरह हल्के गड्ढे साफ़ दिख रहे थे। विमान में 200/- रुपये के पचास ग्राम काजू मिल रहे थे लेकिन हमें कुछ भी ख़रीदने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। पवन भाई डी-मार्ट से 200/- में 250 ग्राम सिके मिक्स्ड ड्राई फ्रूट के पैकेट साथ में लाए थे। ड्राई फ्रूट्स चबाते और बातें करते उड़ान यात्रा का आनंद लेते रहे। अब बाहर गोदावरी नदी दिख रही है जिसका उद्गम तो नासिक से है परंतु छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े से आने वाली नदियाँ गोदावरी को पानीदार बनाती हैं। वही इलाक़ा नीचे दिखता चल रहा है। अब सफ़ेद बादलों के झुरमुट ने ज़मीन का दिखना रोक दिया है। पवन भाई लंदन में पहली बार स्कूल जाते नाती के वीडियो देख कर खूब खुश हो रहे हैं। बच्चा घर से पापा के साथ निकलते हुए खुश है कि तैयार होकर पापा के साथ घूमने जा रहे हैं। लेकिन स्कूल में छूटते समय उदास और खिन्न दिखता है। पापा पर थोड़ा नाराज़ भी नज़र आता है। पापा भी द्रवित तो होते हैं। उसे बार-बार गले लगाते हैं परंतु पिता को बच्चों के भले के लिए कुछ काम उनकी नाखुशी झेलकर भी करने पड़ते हैं। जिसकी क़ीमत बच्चों को बहुत बाद में समझ आती है।
तक़रीबन एक घंटे बाद ताप्ती नदी दिखी। मुंबई से उड़कर आते मानसूनी बादलों के दर्शन हुए। सफ़ेद बादलों की माया ज़मीन पर छाया बिखेर रही थी। नीचे एक खूब लंबी सड़क दिखती चल रही है वह निश्चित रूप से काशी से कन्या कुमारी अंतरीप तक पहुँचने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग सड़क है। उसका नागपुर से हैदराबाद पहुँचने वाला 500 किलोमीटर हिस्सा विमान यात्रा के साथ चल रहा है। महाराष्ट्र के कॉटन उत्पादन क्षेत्रों को पार करके आंध्रप्रदेश-कर्नाटक सीमा से गुज़र कर गंतव्य की तरफ़ बढ़ने लगा।
दो घंटों से ड्राई फ्रूट्स खाकर पानी पीते चल रहे हैं। शरीर के वाटर टैंक ने ख़तरे की घंटी बजाई। विमान में एक ही टॉयलेट पीछे की तरफ़ है। जिसमें कोई सवारी बहुत देर से व्यस्त है। विमान परिचारिका ने रुकने को कहा। उससे बातें होने लगीं। बात ही बात में वेतन पैकेज के बारे में पूछा तो वह बोली- इट्स गुड ? हमने कहा रिज़नेबल या गुड ? वह बोली- रिज़नेबल। लेकिन उसने पैकेज के बारे में यह नहीं बताया कि कितना मिलता है। भद्रता का तक़ाज़ा है कि पुरुषों से वेतन और महिलाओं से उम्र नहीं पूछना चाहिए। यह तब की बात है जब महिलाएँ नौकरियों कम करती थीं। अब इसे बदल देना चाहिए। अब कामकाजी महिलाओं से उम्र और वेतन दोनों नहीं पूछना चाहिए। उड़नपरी यही सीख दे गई।
दो घंटे हैदराबाद विमानपत्तन पर गुज़ारना है। कहने को तो यहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, परंतु हमारी घरेलू उड़ान होने से देशी स्तर की असुविधाओं से निपटना था। मोबाईल चार्जिंग पॉइंट चार्ज नहीं थे। ख़ाली छेदों में एडॉप्टर घुसाया लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। मजबूरी में एक दुकानदार को पटाया। कामचलाऊ चार्जिंग हो गई।
नियत समय पर हैदराबाद से कोलकाता उड़ान उड़ी। अब विमान में बैठकर यात्रा वृतांत लिख पा रहे हैं। विमान में 180 कुर्सियाँ हैं और एक भी कुर्सी ख़ाली नहीं है। वह दिन दूर नहीं जब एयरपोर्ट और विमानों में रेल्वे स्टेशन जैसी भीड़ नज़र आने लगेगी। विमान दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा की यात्रा कर रहा है। आकाश में बादलों की बारात है। सफ़ेद बादलों पर अस्ताचल गामी मार्तण्ड की तिरछी तीक्ष्ण किरणें नभ को रोशन कर रही हैं। अब फिर नीचे गोदावरी बह रही है। लेकिन विशाखापत्तनम तक उसका नाम विशाखा हो चुका होगा। विमान अब तेलंगाना राज्य की सीमा से निकल छत्तीसगढ़-उड़ीसा के आसमान पर उड़ रहा है। नीचे महानदी इठलाती चली जा रही है। जो बंगाल की खाड़ी में मिलेगी। विमान झारखंड के शुक्तिमान पर्वतों के ऊपर से उड़ रहा है। इसे अभी गंगा नदी के ऊपर से भी यात्रा करनी है। लीजिए नीचे पटना के पास सोन और गंगा नदियों का संगम हो रहा है। हम पश्चिम बंगाल की सीमा में दाखिल हो रहे हैं। यहाँ से विमान द्वारा कलकत्ता आधे घंटे का सफ़र है। गंगा का नाम मुर्शिदाबाद पहुँचते-पहुँचते हुगली हो जाता है। हमारी उड़ान रात आठ बजे कलकत्ता पहुँच गई। जहाँ हमें रात गुज़ारनी है। सुबह सुंदरबन की यात्रा करते हुए गंगा सागर पहुँचेंगे।
पहले सोचा था कि एयरपोर्ट पर लाउंज में रात गुज़ार सुबह जल्दी टैक्सी करके गंगासागर के लिए निकल लेंगे। एयरपोर्ट पर पता चला कि लाउंज की सुविधा सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उपलब्ध है। हमने मेक माय ट्रिप के माध्यम से एक रात के लिए फैब होटल 2000.00 रुपयों में बुक किया। एयरपोर्ट से निकल कर टैक्सी खोजने लगे। यहाँ टैक्सी की बड़ी भारी समस्या है। प्री-पैड पर लम्बी क़तार थी। वहाँ से रसीद कटवा कर फिर टैक्सी के इंतज़ार की क़तार में लगना पड़ेगा। मतलब एक घंटा कोलकाता की गर्मी में पसीने से नहाना होगा। मन को पानी से नहाने योग्य बना ही रहे थे। एक निजी टैक्सी बुकिंग काउंटर पर एक सुंदर बंगाली बाला लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी। पवन भाई ने उससे फैब होटल तक जाने के लिए टैक्सी बाबत पूछा। उसने झट से मना कर दिया। हमने भी प्रयास नहीं छोड़ा। उसने थोड़ी देर बाद कहा कि वह हमारे लिए टैक्सी का इंतज़ाम कर देगी। उसने बीस मिनट में एक टैक्सी की जुगाड़ कर दी। टैक्सी का किराया 275/- रुपये निर्धारित हुआ। उसके बाद नई समस्या इंतज़ार कर रही थी। फैब होटल दमदम इलाक़े में स्थित है। ड्राइवर इस इलाक़े में पहुँच एक घंटा घूमता रहा। उसे फैब होटल नहीं मिली। उसने गूगल का सहारा लिया। गूगल हमको घुमा फिरा कर एक जगह ले जाकर खड़ा कर देता कि आपका गंतव्य आ गया है। बहुत परेशान होने के बाद हमने गूगल पर फैब होटल का नाम डाल सर्च किया तो उस पर फैब का नंबर मिला। उस पर नंबर घुमाया तो पता चला कि वह कोई फैब ग्रुप है। जो होटल कमरा बुकिंग करते हैं। फैब ग्रुप प्रतिनिधि ने हमसे बुकिंग आईडी पूछा। तब बताया कि होटल कहाँ है। ड्राइवर ने होटल का पता समझ लिया। पता गूगल पर डाला। गूगल ने घुमा फिरा कर फिर उसी जगह खड़ा कर दिया जहाँ से टैक्सी दो बार निकल चुकी थी। वहाँ एक एजी होटल दिखा। उससे फैब होटल का पता पूछा तो उसने कहा- यही फैब एजी होटल है। वास्तविकता पता चली कि होटल का नाम एजी था जो फैब ग्रुप से संबद्ध था। हमने माथा फोड़ लिया और सामान उठा कर चलने को हुए तो टैक्सी ड्राइवर बोला- सर, 475/- रुपये किराया हुआ। उसे 500/- का नोट दिया तो वह, साहब छुट्टा नहीं है, कहकर चलता बना। हम कलकत्ता के दमदम इलाक़े में हैं। पुरानी बस्ती है। सड़क किनारे खुलेआम शराब का सेवन पूरे शबाब पर है। कोई रोकटोक नहीं दिख रही। ग्यारह बजे रात तक, जहाँ चाहो जैसे चाहो पिओ।
होटल के कमरे में पहुँचे तो फिर माथा पीट लिया। किसी औसत धर्मशाला जैसा कमरा दूसरी मंज़िल पर था। सोचा एसी चालू करवाकर कमर सीधी करके नहाना-धोना करेंगे। रात के खाने के लिए दही चावल और दाल का ऑर्डर दिया। कमरे में कोई टेलीफोन नहीं था। कॉल बेल भी नहीं बजती। नीचे रिसेप्शन पहुँच दरयाफ़्त करने पर ज्ञात हुआ कि एक मोबाइल नंबर है। उसी पर संपर्क साधा जा सकता है। कमरे में वापस आये तो पता चला कि एसी का रिमोट ख़राब है। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलेगा। फिर माथा पीटा। कपड़े उतार हाथ पैर सीधे किए ही थे। तभी लाइट चली गई, एसी बंद हो गया। कोलकाता में अक्सर लाइट जाती है और दो-तीन घंटे में आती है। होटल व्हीआईपी इलाक़ा में होने से एक घंटा में आने की संभावना है। बहुत मुश्किलों के बाद जनरेटर भाई की मेहरबानी से उजाले लायक़ लाइट मिल गई, परंतु एसी साहब की तरफ़ देखा तो वे हमारी नादानी पर मुस्कुरा रहे थे। ख़ैर साहब, ख़ाना निपटाया। अगले दिन की योजना बनाकर बारह बजे के आसपास सो गए ।
अंग्रेजों के ज़माने से कोलकाता एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई है। जो वर्तमान में उत्तरी चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना और हावड़ा ज़िलों से घिरा है। इस जिले में पहले 24 छोटे-छोटे खंड थे, जिस कारण इस स्थान का नाम 24 परगना रखा गया था। 1956 ई. में इस जिले का गठन किया गया था। 1992 ई. में इस जिले को उत्तर तथा दक्षिण भागों में विभाजित कर दिया गया था। कोलकाता के बसने की भी एक कहानी है। गंगा सागर दक्षिणी 24 परगना ज़िले में स्थित है।
टूरिस्ट गाईड के हिसाब से कोलकाता का दमदम स्थित सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा गंगासागर से निकटतम हवाई अड्डा है। वहाँ से काकद्वीप जाने के लिए टैक्सी मिल जाएँगी। ट्रेन से जाने वालों के लिए सियालदाह से काकद्वीप क़रीब है। काकद्वीप से आपको काचुबेरिया के लिए फ़ेरी मिल जाएँगी। काचुबेरिया से बत्तीस किलोमीटर बस, टैक्सी, ऑटो द्वारा सागर द्वीप के उस किनारे पहुँचा जा सकता है, जहाँ गंगा सागर तीर्थ स्थित है।
हम् कोलकाता पहुँच गए हैं और गंगासागर पहुँचना है तो कोलकाता से गंगासागर तक की सवारी काफी रोमांचक है। इस तरफ़ काकद्वीप है, उस तरफ़ काचुबेरिया है, बीच में बंगाल की खाड़ी का लहराता समुद्र है। हम टैक्सी बुक कर रहे हैं, जो हमें होटल से काकद्वीप तक ले जाएगी। टैक्सी से काकद्वीप तक जाएँगे, जो हुगली नदी के पूर्वी तट पर एक बड़ा तालुका है। वहाँ से नाव द्वारा मुरीगंगा नदी पार कर काचुबेरिया पहुँचेंगे। कचुबेरिया पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित है। इसमें डायमंड हार्बर और काकद्वीप के बीच चलने वाली मुख्य सड़क के दोनों ओर बिखरे हुए गांवों की एक श्रृंखला शामिल है। कुलपी गांव इस क्षेत्र का केंद्र है। पश्चिम में केवल एक मील की दूरी पर हुगली नदी है जो इस बिंदु पर चौड़ी हो रही है क्योंकि यह बंगाल की खाड़ी में बहने की तैयारी कर रही है। यहां की ज़मीन नीची और समतल है इसलिए मानसून के मौसम और चक्रवात के दौरान बाढ़ का पानी आने से अतिसंवेदनशील है। काचुबेरिया से बस एक घंटे में गंगासागर ले जाती है।
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15 जून 2023 को सबसे कठिन यात्रा पर जाना है। उबर टैक्सी बुक की। ड्राइवर का नाम मनोज साहा है। बंगाली साहा शब्द वही पुराना फ़ारसी शाह है। शाह शब्द की उत्पत्ति ईरान में हुई। वहाँ का आख़िरी राजा शाह रज़ा पहलवी था। मुग़लों ने जब हिंदुस्तान में राजत्व ग्रहण किया तब उन्होंने ईरानी भाषा में राजा का पर्यायवाची “शाह” पदवी धारण की। कालांतर में उन्होंने कई राजपूत राजाओं को अधीन करके बादशाह अर्थात् महाराजा उपाधि धारण की जैसे अकबर बादशाह । मुग़ल काल के पतन के साथ कई महाजनों ने गुजरात में शाह उपनाम धारण करना आरम्भ किया, जैसे अमित शाह। अंग्रेजों के समय में कारोबारी पलायन पश्चिमी भारत से पूर्वी भारत की तरफ़ हुआ तो वे शाह ही अंग्रज़ों की राजधानी कलकत्ता में साहा हो गए। ड्राइवर के व्यक्तित्व में कोई भी गुजराती चिन्ह नहीं दिखते। वह हावभाव ख़ान पीन से पूरी तरह बंगाली हो चुका है। वह बहुत बातूनी है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈








