हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

1.घुमक्कड़ धर्म

चरैवैति-चरैवैति का शाब्दिक अर्थ है-निरन्तर आगे बढ़ते रहना। जिस प्रकार पृथ्वी निरंतर अपनी धुरी पर ब्रह्मांड में घूमती रहती है। सूर्य निरन्तर भ्रमणशील रहता है, कहीं रुकता नहीं, कभी थकता नहीं है। उसी तरह मनुष्य निरन्तर अपने जीवन-वृत्त में प्रवृत्त रहता है और एक न एक दिन अपने गन्तव्य को प्राप्त कर अनंत में विलीन होकर पुनः नई शुरुआत करता है। निरन्तर आगे बढ़ते रहने का सिद्धान्त सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। परन्तु इस सिद्धान्त का परिपालन अत्यन्त कठिन है, क्योंकि मनुष्य के जीवन में देश, काल और परिस्थितियों का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। हर समय, हर जगह, परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं होती। कभी शारीरिक सीमाओं के कारण, कभी आर्थिक परेशानियों के कारण, कभी भावनात्मक दुर्बलताओं के कारण, कभी प्राकृतिक आपदाओं के कारण, कभी अन्य अज्ञात भय के कारण मनुष्य का उत्साह मन्द पड़ जाता है और वह अपने चरैवैति धर्म से विमुख हो जाता है। निरन्तर आगे बढ़ने की बात तो दूर, वह परिस्थितियों के आगे हथियार डाल देता है या उनसे समझौता कर लेता है। विषम परिस्थितियों में केवल वे ही लोग आगे बढ़ पाते हैं जिनमें बाधाओं से लड़ने का अदम्य साहस होता है। जीवन सतत चलते रहने का उपक्रम है। कविवर हरिऔध ने ठीक ही कहा है-

वे देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं,

वे रह भरोसे भाग्य के दु:ख भोग पछताते नही।

केवल जुझारू घुमंतू लोग ही अपने परिश्रम से आलस्य के गहन अन्धकार को प्रकाश में बदल सकते हैं, जीवन यात्रा की सफलता के अन्तिम सोपान तक पहुँच पाते हैं। इतिहास साक्षी है, कोलम्बस अपने साथियों के विरोध के बावजूद भी गरजते हुए समुद्र में नौका लेकर उतर पड़ा और आखिर नई दुनिया की खोज करने में सफल होकर मानव सभ्यता में अमर हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण में इन्द्र कहते हैं- ”परिश्रम करने वाले को श्री मिलती है।”

मैं मानता हूँ, पुस्‍तकें भी कुछ-कुछ घुमक्कड़ी का रस प्रदान करती हैं, लेकिन जिस तरह फोटो देखकर आप हिमालय पर लहराते देवदार के गहन वनों और श्‍वेत हिम-मुकुटित शिखरों के सौन्‍दर्य, बादलों से मिलकर उनके लुभावन रूप, उनके गंध का अनुभव नहीं कर सकते, उसी तरह यात्रा-कथाओं से आपकी उस सत्य से भेंट नहीं हो सकती, जिसका आभासी साक्षात्कार घुमक्कड़ को होता है। यात्रा-वृतांत पाठकों के लिए यही कहा जा सकता है, कि दूसरे अन्‍धों की अपेक्षा उन्‍हें थोड़ा आलोक मिल जाता है और साथ ही ऐसी प्रेरणा भी मिल सकती है, जो स्‍थायी नहीं तो कुछ दिनों के लिए उन्‍हें घुमक्कड़ बना सकती हैं।

घुमक्कड़ क्‍यों दुनिया का सर्वश्रेष्‍ठ गतिमान विचार है? घुमक्कड़ी ने आज की दुनिया को बनाया है। यदि आदिम-पुरूष एक जगह नदी या तालाब के किनारे गर्म मुल्‍क में पड़े रहते, तो वह दुनिया को आगे नहीं ले जा सकते थे। इसमें संदेह नहीं कि आदमियों की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहाई हैं। घुमक्कड़ों से हम हर्गिज नहीं चाहेंगे कि वह खून के रास्‍ते को पकड़ें, किंतु अगर घुमक्कड़ों के काफिले दिगदिगांत न आते-जाते, तो सुस्‍त मानव-जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पातीं। आदिम घुमक्कड़ों में से आर्यों, शकों, हूणों ने क्या-क्या किया, अपने खूनी पथों द्वारा मानवता के पथ को किस तरह प्रशस्‍त किया, इसे इतिहास में हम उतना स्‍पष्ट वर्णित नहीं पाते, किंतु मंगोल-घुमक्कड़ों की करामातों को तो हम अच्छी तरह जानते हैं। बारूद, तोप, कागज, छापाखाना, दिग्‍दर्शक, चश्‍मा यही चीजें थीं, जिन्‍होंने पश्चिम में विज्ञान-युग का आरंभ कराया और इन चीजों को वहाँ ले जाने वाले मंगोल घुमक्कड़ थे। जिन्होंने रोमन साम्राज्य की चूलें हिला कर रख दी थीं। जिससे अंततः यूरोप के देशों का जन्म हुआ।

हिन्दी का यायावर बड़ा खूबसूरत शब्द है। घुमक्कड़ के लिए सबसे प्रिय पर्यायवाची शब्द यही लगता है। एक अन्य वैकल्पिक शब्द खानाबदोश है। मगर ऐसा महसूस होता है कि भाव के स्तर पर खानाबदोश में जहाँ दर-दर की भटकन का बोध होता है वहीं यायावर अथवा घुमक्कड़ में भटकने के साथ मनमौजी वाला भाव भी शामिल है।

यायावर की व्युत्पत्ति पर गौर करें तो भी यही बात सही साबित होती है। इस शब्द का संस्कृत में जो अर्थ है वह है परिव्राजक, साधु-संत, संन्यासी आदि। साधु-संतों के व्यक्तित्व में नदियों के से गुणों की बात इसीलिए कही जाती है क्योंकि नदियों में जो सदैव बहने की, गमन करने की वृत्ति होती है वही साधु में भी होनी चाहिए। इसी भ्रमणवृत्ति के परिणामस्वरूप वे अनुवभवजनित ज्ञान से समृद्ध होते हैं और तीर्थस्वरूप कहलाते हैं। अब मनमौजी हुए बिना भला भ्रमणवृत्ति भी आती है कहीं? गौर करें कि नदी तट के पवित्र स्थानों को ही तीर्थ कहा जाता है। हमने साथियों के साथ पैदल खंड नर्मदा परिक्रमा में हर घाट को तीर्थ महसूस किया है।

यायावर बना है संस्कृत की “या” धातु से। इसमें जाना, प्रयाण करना, कूच करना, ओझल हो जाना, गुजर जाना (यानी चले जाना – मृत्यु के अर्थ वाला गुजर जाना मुहावरा नहीं) आदि भाव शामिल हैं। अब इन तमाम भावार्थों पर जब गौर करेंगे तो आज आवागमन के अर्थ में खूब प्रचलित यातायात शब्द की व्युत्पत्ति सहज ही समझ में आ जाती है। या धातु से ही बना है यात्रा शब्द जिसका मतलब है गति, सेना का प्रयाण, आक्रमण, सफर, जुलूस, तीर्थाटन-देशाटन आदि। इससे ही बना संस्कृत में यात्रिकः जिससे हिंदी में यात्री शब्द बना। घुमक्कड़ वृत्ति के चलते ही साधु से उसकी जात और ठिकाना न पूछे जाने की सलाह कहावतों में मिलती है। खास बात यह भी है कि यातायात और यायावर चाहे एक ही मूल से जन्मे हों मगर इनमें बैर भाव भी है। साधु-संन्यासियों (यायावर) के जुलूस, अखाड़े और संगत जब भी रास्तों पर होते हैं तो यातायात का ठप होना तय समझिए।

हिन्दी-उर्दू में यायावर के अर्थ में सैलानी शब्द भी प्रचलित है और भाषा में लालित्य लाने के लिए अक्सर इसका भी प्रयोग होता है। सैलानी वह जो सैर-सपाटा करे। सैलानी अरबी मूल का शब्द है और बरास्ता फारसी, हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ। इस शब्द की व्युत्पत्ति देखें तो वहाँ भी बहाव, पानी, गति ही नजर आएँगे। अरबी में एक लफ्ज है सैल, जिसके मायने हुए पानी का बहाव, बाढ़ या जल-प्लावन। गौर करें कि किसी किस्म के प्रवाह के लिए, वह चाहे भावनाओं का हो या लोगों का, हिन्दी-उर्दू में सैलाब शब्द का इस्तेमाल खूब होता है। अलबत्ता सैलाब का मूल अर्थ तो बाढ़ ही है, मगर प्रवाह वाला भाव प्रमुख होने से इसके अन्य प्रयोग भी होने लगे हैं जैसे आँसुओं का सैलाब। सैल से ही बन गया सैलानी अर्थात जो गतिशील रहे। सैर-सपाटा पसंद करनेवाला। इसी कड़ी में आता है सैर, जिसका मतलब है तफरीह, पर्यटन, घूमना-फिरना आदि। इससे बने सैरगाह, सैरतफरीह जैसे लफ्ज हिन्दी में चलते हैं।

अब बात घुमक्कड़ की। यायावर के लिए घुमक्कड़ एकदम सही पर्याय है। घुमक्कड़ वो जो घूमता -फिरता रहे। यह बना है संस्कृत की मूल धातु घूर्ण् से जिसका अर्थ चक्कर लगाना, घूमना, फिरना, मुड़ना आदि है। घूमना, घुमाव, घुण्डी आदि शब्द इसी मूल से उपजे हैं। हिन्दी-उर्दू के घुमक्कड़ और गर्दिश जैसे शब्द इसी से निकले हैं। उर्दू-फारसी का बड़ा आम शब्द है आवारागर्द। इसमें जो गर्द है वह उर्दू का काफी प्रचलित प्रत्यय है। आवारा का मतलब निकला व्यर्थ घूमनेवाला। इसका अर्थविस्तार बदचलन तक पहुँचता है। जबकि घूर्णः से ही बने घुमक्कड़ के मायने होते हैं सैलानी, पर्यटक या घर से बाहर फिरने वाला। यूँ उर्दू-हिन्दी में गर्द का मतलब है धूल, खाक। यह गर्द भी घूर्ण् से ही संबंधित है अर्थात घूमना-फिरना। धूल या या खाक भी एक जगह स्थिर नहीं रहती। इस गर्द की मौजूदगी भी कई जगह नजर आती है। जैसे गर्दिश, जिसका आम तौर पर अर्थ होता है संघर्ष। मगर भावार्थ यहाँ भी भटकाव या मारा-मारा फिरना ही है। गर्दिश से गर्दिशजदा, गर्दिशे-दौराँ, गर्दिशे-रोजगार आदि लफ्ज भी बने हैं।

“अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) का अमर लेख है। हमारा मानना है कि इस महत्वपूर्ण लेख को सभी स्कूली पाठ्यक्रमों में अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। शास्त्रों में जिज्ञासा ऐसी चीज के लिए होनी बतलाई गई है, जोकि श्रेष्‍ठ भाव है तथा व्‍यक्ति और समाज सबके लिए परम हितकारी हो। वेद व्‍यास ने अपने “ब्रह्मसूत्र” शास्‍त्र में ब्रह्म को सर्वश्रेष्‍ठ मानकर उसे जिज्ञासा का विषय बनाया। व्‍यास-शिष्‍य जैमिनि ने धर्म को श्रेष्‍ठ माना। पुराने ऋषियों से मतभेद रखना हमारे लिए पाप की वस्‍तु नहीं है, आखिर छ शास्त्रों के रचयिता छ आस्तिक ऋषियों में भी आधों ने ब्रह्म को धत्ता बता दिया है। दुनिया की सर्वश्रेष्‍ठ वस्‍तु है आज़ाद घुमक्कड़ी। वैचारिक घुमक्कड़ी से बढ़कर व्‍यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया – दु:ख में हो चाहे सुख में – सभी समय यदि सहारा पाती है, तो वैचारिक घुमक्कड़ों से। प्राकृतिक आदिम मनुष्‍य परम घुमक्कड़ था। खेती, बागबानी तथा घर-द्वार से मुक्‍त वह आकाश के पक्षियों की भाँति पृथ्‍वी पर सदा विचरण करता था, जाड़े में यदि इस जगह था तो गर्मियों में वहाँ से दो सौ कोस दूर।

आधुनिक काल में वैचारिक और दैहिक घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्‍यकता है। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्‍थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्‍पत्ति और मानव-वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि सारे ही विज्ञानों को उससे सहायता मिली। कहना चाहिए, कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी. लेकिन क्या डारविन अपने महान आविष्‍कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत नहीं लिया होता?

कोलंबस और वास्‍को द-गामा दो घुमक्कड़ ही थे, जिन्‍होंने पश्चिमी देशों के आगे बढ़ने का रास्‍ता खोला। अमेरिका अधिकतर निर्जन-सा पड़ा था। एशिया के कूप-मंडूकों ने घुमक्कड़-धर्म की महिमा बिसूर दी, इसलिए उन्‍होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं फहराई। दो शताब्दियों पहले तक आस्‍ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन और भारत को सभ्‍यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अकल नहीं आई कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते। आज अपने 400-500 करोड़ की जनसंख्‍या के भार से भारत और चीन की भूमि दबी जा रही है और आस्‍ट्रेलिया में एक करोड़ भी आदमी नहीं हैं। आज एशिया वासियों के लिए आस्‍ट्रेलिया का द्वार बंद है, लेकिन दो सदी पहले वह हमारे हाथ की चीज थी। क्‍यों भारत और चीन आस्‍ट्रेलिया की अपार संपत्ति और अमित भूमि से वंचित रह गये? इसीलिए कि वह घुमक्कड़-धर्म से विमुख थे, उसे भूल चुके थे। 

हाँ, इसे भूलना ही कहना होगा, क्‍योंकि किसी समय भारत और चीन ने बड़े-बड़े नामी घुमक्कड़ पैदा किए। वे भारतीय घुमक्कड़ ही थे, जिन्‍होंने दक्षिण-पूर्व में लंका, बर्मा, मलाया, स्‍याम, कंबोज, चंपा, बोर्नियो और सेलीबीज ही नहीं, फिलिपाईन तक का धावा मारा था और एक समय तो जान पड़ा कि न्‍यूजीलैंड और आस्‍ट्रेलिया भी बृहत्तर भारत का अंग बनने वाले हैं; लेकिन कूप-मंडूकता तेरा सत्‍यानाश हो। इस देश के बुद्धुओं ने उपदेश देना शुरू किया कि समुंदर के खारे पानी और हिंदू-धर्म में बड़ा बैर है, उसके छूने मात्र से वह नमक की डली की तरह गल जाएगा।

जिन यूरोपीय लोगों ने इस मूर्खता को गले नहीं लगाया। उन्होंने दुनिया पर राज्य किया। इतना बतला देने पर क्या कहने की आवश्‍यकता है कि राष्ट्र कल्‍याण के लिए घुमक्कड़-धर्म कितनी आवश्‍यक चीज है? जिस जाति या देश ने इस धर्म को अपनाया, वह चारों पुरुषार्थ फलों का भागी हुआ और जिसने इसे बिसराया, उसके लिए नरक में भी ठिकाना नहीं। आखिर घुमक्कड़-धर्म को भूलने के कारण ही हम सात शताब्दियों तक धक्‍का खाते रहे, ऐरे-गैरे जो भी आए, हमें चार लात लगाते गये। हम संस्कृति का टीका माथे पर धारण कर लातें खाते गये। बीसवीं सदी में भारतीय घुमक्कड़ यूरोप गये। उन्हें जात बाहर कर दिया गया। उन्ही जात बाहरों के नए विचारों में भारतीय विचार मिलाकर भारतीय राष्ट्रवाद का बीज रोपित हुआ। जिसकी हुंकार स्वामी विवेकानन्द शिकागो में भरते दिखे।  

अच्छा तो धर्म से प्रमाण लीजिए। दुनिया के अधिकांश धर्मनायक घुमक्कड़ रहे। धर्माचार्यों में आचार-विचार, बुद्धि और तर्क तथा सहृदयता में सर्वश्रेष्‍ठ बुद्ध घुमक्कड़-राज थे। यद्यपि वह भारत से बाहर नहीं गये, लेकिन वर्षा के तीन मासों को छोड़कर एक जगह रहना वह पाप समझते थे। वह खुद ही घुमक्कड़ नहीं थे, बल्कि आरंभ ही में अपने शिष्‍यों को उन्‍होने कहा था – ”चरथ भिक्‍खवे!” जिसका अर्थ है – भिक्षुओ! घुमक्कड़ी करो। बुद्ध के भिक्षुओं ने अपने गुरु की शिक्षा को कितना माना, क्या इसे बताने की आवश्‍यकता है? क्या उन्‍होंने पश्चिम में मकदूनिया तथा मिश्र से पूरब में जापान त‍क, उत्तर में मंगोलिया से लेकर दक्षिण में बाली और बांका के द्वीपों तक को रौंदकर रख नहीं दिया? जिस बृहत्तर-भारत के लिए हरेक भारतीय को उचित अभिमान है, क्या उसका निर्माण इन्‍हीं घुमक्कड़ों की चरण-धूलि ने नहीं किया? केवल बुद्ध ने ही अपनी घुमक्कड़ी से प्रेरणा नहीं दी, बल्कि घुमक्कड़ों का इतना जोर बुद्ध से एक दो शताब्दियों पूर्व ही था, जिसके ही कारण बुद्ध जैसे घुमक्कड़-राज इस देश में पैदा हो सके. उस वक्त पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ तक जम्‍बू-वृक्ष की शाखा ले अपनी प्रखर प्रतिभा का जौहर दिखातीं, कूपमंडूकों को पराजित करती सारे भारत में मुक्‍त होकर विचरा करतीं थीं।

कोई-कोई महिलाएँ पूछती हैं – क्या स्त्रियाँ भी घुमक्कड़ी कर सकती हैं, क्या उनको भी इस महाव्रत की दीक्षा लेनी चाहिए? इसके बारे में तो अलग अध्‍याय ही लिखा जाना चाहिये। किंतु यहाँ इतना कह देना काफ़ी है कि घुमक्कड़-धर्म क्या किसी भी धर्म पर स्त्रियाँ उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष। यदि वह जन्‍म सफल करके व्‍यक्ति और समाज के लिए कुछ करना चाहती हैं, तो उन्‍हें भी दोनों हाथों से इस धर्म को स्वीकार करना चाहिए। घुमक्कड़ी-धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्‍ते में लगाये हैं। बुद्ध ने सिर्फ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था। सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र के साथ बहन संघमित्रा भी बुद्ध का संदेश लेकर श्रीलंका गई थी।

 क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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यात्रा वृतांत – एक चर्चा 

पर्यटन के दो मुख्य आकर्षण पर्वत और सागर रहे हैं। पर्वतों की उदास ऊँचाइयाँ और सागरों की  रहस्यमय गहराइयाँ मनुष्यों को लुभाती हैं। मनुष्य का पूरा जीवन उदासी और उत्साह के बीच डोलता रहता है। उदास पहाड़ एक जगह खड़े रहते हैं। सागर की लहरें उत्साहित हो साहिल की तरफ़ भागती रहती हैं। साहिल से टकराकर बिखर जाती हैं। मनुष्य भी एक लहर से दुनिया में आता है और पहाड़ सा जीवन जीकर अंत में लहर सा बिखर जाता है। दुनिया का सबसे ऊँचा, लम्बा और चौड़ा हिमालय पर्वत सर्वोच्च शिखर एवरेस्ट को धरामणि सा धारण किए है। कोई ज़मीन पर कितना भी ऊँचा उठ जाए, वह एवरेस्ट से ऊँचा नहीं उठ सकता। हिमालय मनुष्य को चुनौती देकर बुलाता है कि आओ मुझे  विजित करो।

 इस महान पर्वत श्रेणी का नाम संस्कृत में हिमालय (‘बर्फ का निवास’), हिम (‘बर्फ’) और आ-लय (आलय ‘रिसेप्टकल, आवास’) से निकला है। एमिली डिकिंसन की कविता और हेनरी डेविड थोरो के निबंधों में इसे हिमालेह के रूप में लिखा है। इन पहाड़ों को नेपाली और हिंदी में हिमालय के रूप में जाना जाता है। तिब्बती में ‘द लैंड ऑफ स्नो’, उर्दू में हिमालय रेंज, बंगाली में हिमालय पर्वतमाला और चीनी में ज़िमालय पर्वत श्रृंखला है। इस रेंज का नाम कभी-कभी पुराने लेखन में हिमवान के रूप में भी किया जाता रहा है।

 नेपाल में धौलागिरी और अन्नपूर्णा की 26000 फीट ऊँची चोटियाँ भौगोलिक रूप से हिमालय को पश्चिमी और पूर्वी खंडों में विभाजित करती हैं। काली गंडकी के सिर पर कोरा ला एवरेस्ट और K2 (पाकिस्तान में काराकोरम रेंज की सबसे ऊंची चोटी) के बीच की लकीर पर सबसे निचला बिंदु है। अन्नपूर्णा के पूर्व में सीमा पार मनासलू की 26000 फीट ऊँची चोटियाँ तिब्बत, शीशपंगमा में हैं। इनके दक्षिण में नेपाल की राजधानी और हिमालय का सबसे बड़ा शहर काठमांडू स्थित है। काठमांडू घाटी के पूर्व में कोसी नदी की घाटी है जो तिब्बत, नेपाल और चीन के बीच अरानिको राजमार्ग/चीन राष्ट्रीय राजमार्ग 318 को मुख्य भूमि प्रदान करती है। इसके अलावा पूर्व में महालंगुर हिमालय है जिसमें दुनिया के चार उच्चतम पर्वत: चो ओयू, एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू हैं। ट्रेकिंग के लिए लोकप्रिय खुम्बू क्षेत्र यहां एवरेस्ट के दक्षिण-पश्चिमी दृष्टिकोण पर पाया जाता है। अरुण नदी दक्षिण की ओर मुड़ने और मकालू के पूर्व की ओर बहने से पहले इन पहाड़ों की उत्तरी ढलानों से बहती है।

 सुदूर पूर्व में भारत-नेपाल सीमा पर हिमालय कंचनजंगा मासिफ तक बढ़ता है, जो दुनिया का तीसरा सबसे ऊंचा पर्वत 26,000 फीट शिखर भारत का उच्चतम बिंदु है। कंचनजंगा का पश्चिमी भाग नेपाल में और पूर्वी भाग भारतीय राज्य सिक्किम में है। यह भारत से तिब्बत  की राजधानी ल्हासा मुख्य मार्ग पर स्थित है, जो नाथू ला दर्रे से होकर तिब्बत तक जाता है। सिक्किम के पूर्व में भूटान का प्राचीन बौद्ध साम्राज्य है। भूटान का सबसे ऊँचा पर्वत गंगखर पुएनसम है। यहां का हिमालय घने जंगलों वाली खड़ी घाटियों के साथ तेजी से ऊबड़-खाबड़ होता जा रहा है। यारलांग त्सांगपो याने ब्रह्मपुत्र नदी के महान मोड़ के अंदर तिब्बत में स्थित नामचे बरवा के शिखर पर अपने पूर्व के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले, हिमालय भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ तिब्बत के माध्यम से थोड़ा उत्तर-पूर्व की ओर मुड़ता रहता है। त्सांगपो के दूसरी ओर पूर्व में कांगरी गारपो पर्वत हैं। ग्याला पेरी सहित त्सांगपो के उत्तर में ऊंचे पहाड़ हिमालय में शामिल होते हैं।

 धौलागिरी से पश्चिम की ओर जाने पर, पश्चिमी नेपाल कुछ दूर है और प्रमुख ऊंचे पहाड़ों की कमी है, लेकिन नेपाल की सबसे बड़ी रारा झील का घर है। करनाली नदी तिब्बत से निकलती है लेकिन क्षेत्र के केंद्र से होकर गुजरती है। आगे पश्चिम में, भारत के साथ सीमा शारदा नदी का अनुसरण करती है और चीन में एक व्यापार मार्ग प्रदान करती है, जहां तिब्बती पठार पर गुरला मांधाता की ऊंची चोटी स्थित है। मानसरोवर झील के उस पार पवित्र कैलाश पर्वत है, जो हिमालय की चार मुख्य नदियों के स्रोत के करीब है। हिमालय उत्तराखंड में कुमाऊं हिमालय के रूप में नंदा देवी और कामेट की ऊंची चोटियों के साथ स्थित है।

 उत्तराखंड राज्य चार धाम के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों का भी घर है, जिसमें गंगोत्री, पवित्र नदी गंगा का स्रोत, यमुनोत्री, यमुना नदी का स्रोत और बद्रीनाथ और केदारनाथ के मंदिर हैं। अगला हिमालयी भारतीय राज्य, हिमाचल प्रदेश, अपने हिल स्टेशनों, विशेष रूप से शिमला, ब्रिटिश राज की ग्रीष्मकालीन राजधानी और भारत में तिब्बती समुदाय के केंद्र धर्मशाला के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र पंजाब के हिमालय और सतलुज नदी की शुरुआत है, जो सिंधु की पांच सहायक नदियों-झेलम, रावी, चिनाब, सतलुज, व्यास का जनक है। आगे पश्चिम में हिमालय, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का निर्माण करता है। ननकुन की जुड़वां चोटियाँ हिमालय के इस हिस्से में एकमात्र पर्वत हैं। प्रसिद्ध कश्मीर घाटी और श्रीनगर के शहर और झीलें हैं। अंत में, हिमालय अपने पश्चिमी छोर पर नंगा पर्वत की नाटकीय 26000 फुट ऊँची चोटी से होकर पश्चिमी छोर नंगा पर्वत के पास एक शानदार बिंदु पर समाप्त होता है जहां हिमालय गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में काराकोरम और हिंदू कुश पर्वतमाला के साथ पसरा है

 जब हमने घूमने जाने के बारे में सोचा तो हिमालय ने हमें भी आकर्षित किया। हमने तय किया कि हम नेपाल, लद्दाख़, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड की यात्रा पर जाएँगे। वहाँ जाने के पहले उस क्षेत्र का भूगोल और इतिहास पता किया।

 पृथ्वी के सत्तर प्रतिशत भाग पर अपार जलराशि सात महाद्वीपों को घेरे सात महासागर के रूप में लहराती है। जिनमे से हिंद महासागर भारत के पाँव पखारता है। पूर्व में कलकत्ता से चेन्नई तक बंगाल की खाड़ी है तो पश्चिम में अरब सागर का मुंबई से केरल तक का समुद्री तट लहराता है। शास्त्रों में भारत को उत्तर में हिमालय से दक्षिण में इंदू सागर की पवित्र पितृभूमि कहा गया है। किसी समय हिमालय और हिंद महासागर को अभेद्य माना जाता था। इसीलिए सोने की चिड़िया की भूमि पर निवासित भारतीय अपने आपको कछुआ की तरह सुरक्षित महसूस करते रहे। लेकिन कालांतर में पहाड़ों और सागरों दोनों ओर से आक्रामक हमलावर आए और भारत को ग़ुलाम वंश से लेकर अंग्रेजों के अधीन एक हज़ार साल तक ग़ुलाम रहने को मजबूर होना पड़ा। भारत की इन दोनों प्राकृतिक सीमाओं अर्थात् लद्दाख़ से हिंद महासागर का पर्यटन हमारे शौक़ के विषय रहे हैं। एवरेस्ट को नेपाल में सगरमाथा कहते हैं। हमने पिछले पचास सालों में नेपाल के सगरमाथा से हिंद महासागर तक की यात्राएँ की हैं।

 भ्रमण, पर्यटन और घुमक्कड़ी में फ़र्क़ होता है। भ्रमण याने देश विदेश में घूमने फिरने वाला यात्री। पर्यटन एक ऐसी यात्रा (travel) है जो मनोरंजन (recreational) या फुरसत के क्षणों का आनंद (leisure) लेने के उद्देश्यों से की जाती है। घुमक्कड़ का मतलब है,  सोद्देश्य या निरुद्देश्य घूमकर आनंदित होने वाला घुमंतू।

 बैंक में नौकरी लगने के बाद बचपन से घुमंतू बनने की इच्छा को पंख लग गए। हमारा उद्देश्य देशाटन द्वारा देश को देखना और समझना था। जबलपुर के सुषमा साहित्य मंदिर से देश के विभिन्न प्रांतों पर राजपाल एंड संस से प्रकाशित पुस्तकें इकट्ठी मिल गईं, तो ख़रीद लीं। उन्हें पढ़कर घुमक्कड़ी का नशा चढ़ने लगा। सबसे पहले मध्य प्रदेश के दर्शनीय स्थल ग्वालियर, शिवपुरी, सागर, खजुराहो, कान्हा-किसली, अमरकंटक, बांधवगढ़, भेड़ाघाट, पचमढ़ी, महेश्वर, मांडू, ओमकारेश्वर इत्यादि की यात्रा इन स्थानों के इतिहास और भूगोल को जाने बग़ैर सम्पन्न की। उसके बाद इन्ही स्थानों का इतिहास, भूगोल और संस्कृति को पढ़ समझ कर यात्राएँ कीं तो पाया कि पर्यटन से बहुत अधिक आनंद घुमंतू यात्राओं में है। बस फिर क्या था घुमंतू बनने की तीव्र इच्छा बलबती हुई। इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से “पर्यटन सामग्री” बुलाकर विभिन्न प्राकृतिक स्थलों जैसे पर्वत, सागर, मैदान, ऐतिहासिक स्थान, धार्मिक स्थान और वन्य प्रांतर घुमक्कड़ी के अर्थ और आशय को दिमाग़ में बिठाया। उसके पश्चात कहीं भी घुमक्कड़ी पूर्व इस स्थान का इतिहास, भूगोल, परिवेश, साहित्य, संस्कृति, वेशभूषा और खानपान का अध्ययन एक आदत सी बन गई। अध्ययन और घुमक्कड़ी का बढ़िया संयोजन बहुत आनंद दायक होने लगा। बन गए घुमक्कड। इसीलिए आपको हमारी यात्रा वृतांत में जगहों का सम्पूर्ण विवरण मिलेगा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-१० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-१० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

बिड़ला तारामंडल

बिड़ला तारामंडल कोलकाता के सबसे आकर्षक पर्यटक स्थलों में से एक है। जो एशिया का सबसे बड़ा और दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा तारामंडल है! कोलकाता बिरला तारामंडल 2 जुलाई 1963 को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित किया गया था। बिड़ला तारामंडल में एक इलेक्ट्रॉनिक्स प्रयोगशाला, खगोल विज्ञान गैलरी और खगोलीय मॉडल का संग्रह मौजूद है। जो पर्यटकों और विज्ञान प्रेमीयों  के लिए आकर्षण के केंद्र बने हुए है। बिड़ला तारामंडल में पर्यटकों के आकर्षण के लिए नियमित रूप से कई शो आयोजित किये जाते है जो हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली और अन्य क्षेत्रीय भाषायों में संचालित होते है। शो के दौरान नौ ग्रहों का एक दौरा उनके बारे में दिलचस्प विवरण और हमारे ब्रह्मांड में मौजूद अन्य आकर्षक खगोलीय पिंडों पर चर्चा की जाती है। जहाँ आप ग्रहों, खगोलीय पिंडों और विज्ञान संभंधित अन्य जानकरी प्राप्त कर सकते हैं।

समय की कमी होने से इसे बाहर से देखकर ही संतोष किया।

भारतीय संग्रहालय

“सिटी ऑफ़ जॉय” के नाम से प्रसिद्ध कोलकाता में स्थित भारतीय संग्रहालय दुनिया का नौवाँ सबसे पुराना संग्रहालय है। इसे तरीक़े से घूमने के लिए दो-तीन चाहिए। हमने एक बड़ा चक्कर लगाया। इसकी नीव वर्ष 1814 में रखी गई थी और तब से यह बहु-विषयक गतिविधियों का केंद्र है। ‘जादुगर’ के नाम से मशहूर भारतीय संग्रहालय समकालीन चित्रों, बुद्ध के पवित्र अवशेष, मिस्र की ममियों और प्राचीन मूर्तियाँ, आभूषणों, जीवाश्मों, कंकालों, प्राचीन वस्तुओं, बाजूबंदों और तेजस्वी मुगल चित्रों के कुछ अति उत्तम संग्रह हैं। जो भारत के अतीत को प्रदर्शित करते है और पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए लोकप्रियता के बिषय बने हुए है। संग्रहालय में 35 दीर्घाएँ हैं, जिन्हें कला, पुरातत्व, नृविज्ञान, भूविज्ञान, जूलॉजी और आर्थिक वनस्पति विज्ञान नामक छह श्रेणियों में विभाजित किया गया है। इतिहास के बारे में जिज्ञासु लोगों के लिए, संग्रहालय परिसर के भीतर एक पुस्तकालय और किताबों की दुकान भी मौजूद है। भारतीय संग्रहालय पर्यटकों के साथ-साथ इतिहास प्रेमियों के घूमने के लिए कोलकाता के सबसे आकर्षक जगहों में से एक है।

बिरला मंदिर

लगभग 130 एकड़ के विशाल छेत्र में फैला हुआ बिरला मंदिर, कोलकाता के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। बिरला मंदिर का निर्माण वर्ष 1970 में शुरू होने के बाद  21 फरवरी 1996 को 26 वर्षों बाद पूर्ण हुआ। मंदिर में मुख्य देवता राधा–कृष्ण के साथ भगवान गणेश, भगवान हनुमान, भगवान शिव, भगवान विष्णु और देवी दुर्गा के दस अवतार के दर्शन किए। बिरला मंदिर का निर्माण नक्काशीदार सफेद संगमरमर से किया गया है भगवान कृष्ण और राधा को समर्पित बिरला मंदिर कोलकाता का महत्वपूर्ण आस्था केंद्र है जो पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों के घूमने के लिए सबसे मनोरम स्थल बना हुआ है जहाँ पर्यटक राधा -कृष्ण के दर्शन और मंदिर के सुखद व आनादमयी माहोल में समय व्यतीत पसंद करते है। इसके अलावा मंदिर में जन्माष्टमी बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है जिसमे बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते है।

अलीपुर जू

अलीपुर जू जिसे कलकत्ता चिड़ियाघर या अलीपुर का प्राणी उद्यान भी कहा जाता है, अलीपुर जू  भारत में स्थापित सबसे पुराना प्राणि उद्यान है और कोलकाता का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है। 46.5 एकड़ के क्षेत्र में फैला, चिड़ियाघर 1876 से संचालित हो रहा है जो बड़ी संख्या में वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करता है। अलीपुर चिड़ियाघर रॉयल बंगाल टाइगर, हाथी, वन-सींग वाले गैंडे, व्हाइट टाइगर, ज़ेबरा, मृग, हिरण ,मैकॉव और लोरिकेट, स्वाइनहो के तीतर, लेडी एमहर्स्ट के तीतर और गोल्डन तीतर, शुतुरमुर्ग, ईमू, हॉर्नबिल्स जैसे बड़े पक्षियों का घर है। सर्दियों के मौसम के दौरान, अलीपुर चिड़ियाघर कुछ प्रवासी पक्षियों जैसे सुरस क्रेन का निवास स्थान भी बन जाता है। अलीपुर चिड़ियाघर प्रकृति के प्रति उत्साही लोगों के लिए या अपने बच्चों और परिवार के साथ घूमने जाने के लिए कोलकाता के लोकप्रिय जगहों में से एक है।

पार्क स्ट्रीट कोलकाता की एक सड़क है जिसे मदर टेरेसा सरानी के रूप में भी जाना जाता है। रात होते होते यहाँ पहुँचे। पार्क स्ट्रीट कोलकाता की सड़क के साथ-साथ प्रमुख हैंगआउट स्पॉट और एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल भी है क्योंकि पार्क स्ट्रीट एक ऐसा स्पॉट है जो कभी सोता नहीं है और हमेशा हलचल और गतिविधियों से भरा हुआ होता है। पार्क स्ट्रीट में कई बदलाब किये गए है जो इसे एक लोकप्रिय स्थल और हैंगआउट स्पॉट बनाते हैं। पार्क स्ट्रीट शहर का एक ऐसा क्षेत्र है, जहां 5-सितारा रेस्तरां और होटल, नाइट क्लब, मॉल और कई रेस्टोरेंट मौजूद हैं। जहाँ पर्यटक देशी-विदेशी खाना और बिभिन्न गतिबिधियों को एन्जॉय कर सकते हैं। पार्क स्ट्रीट में हमेशा त्योहारों जैसे धूमधाम रहती है और यह सड़क बिशेष रूप से दीवाली, क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या के अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों और पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करती है।

कोलकाता शहर स्थानीय बंगाली व्यंजनों के लिए सबसे अधिक जाना जाता है, जो कि यहाँ आने वाले सभी पर्यटकों के वीच लोकप्रिय बने हुए है। अधिकांश बंगाली व्यंजन भोजन चावल और मछली के चारों ओर घूमते हैं। और यहाँ बंगाली व्यंजनों के अलावा, शहर के विभिन्न रेस्टोरेंट में बढ़िया अंग्रेजी भोजन, कॉन्टिनेंटल, उत्तर भारतीय व्यंजन, दक्षिण भारतीय व्यंजन, मैक्सिकन और इतालवी भोजन का आनंद ले सकते हैं। आपको तिब्बती भोजन का एक उदाहरण भी मिलेगा, जिसमें मोमोस और थुप्पा काफी लोकप्रिय और व्यापक हैं। इसके अलावा कोलकाता शहर बंगाली मिठाइयाँ रसगुल्ला, चमचम, रसमलाई, शोंडेश, क्रीम चुप और अन्य बंगाली मिठाइयाँ के पेशकश भी करता है। एक मिठाई की दुकान से रसगुल्ला और चमचम ख़रीद कर पैक करवा लिए। नज़दीक की दुकान से बंगाली कचौड़ी का स्वाद चखा।

इस प्रकार हमारी गंगा सागर-कलकत्ता संपन्न  हुई। हम भोपाल लौटने को दमदम हवाई अड्डा पर अड्डा ज़माए हैं। विचार आ रहा है कि किसी ज़माने में कलकत्ता इतना खूबसूरत शहर था कि मिर्ज़ा ग़ालिब जब पेंशन बढ़वाने की अर्ज़ी लेकर कलकत्ता पहुँचे तो उस पर फ़िदा होकर उन्होंने यह ग़ज़ल लिखी थी।

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं,

इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय।

वो सब्ज़ा ज़ार  हाय मुतर्रा के है ग़ज़ब,

वो नाज़नीं बुतान-ए-खुदारा के हाय हाय।

 *

सब्र आज्मा वो उन की निगाहें के मुंतज़िर,

ताक़त रूबा वो उन का इशारा के हाय हाय।

 *

वो मेवा हाये  ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाह,

वो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाय हाय।

वे तो कलकत्ता में बसना चाहते थे नगर उनसे दिल्ली के बल्लीमारा की क़ासिम गली नहीं छूटती थी। हमसे भी भोपाल की मीनाल रेजीडेंसी नहीं छूटती। रात के नौ बज रहे हैं। वायुयान में दिल्ली उड़ान की बोर्डिंग शुरू हो चुकी है। ग्यारह बजे दिल्ली उतरेंगे। वहाँ से सुबह छै बजे भोपाल उड़ान है। घर पहुँच तकिया से टिककर कम्फर्ट जोन में राहत की सांस लेंगे। अलविदा कलकत्ता।

18 जून को 2023 को दोपहर 02:00 बजे दिल्ली की उड़ान पकड़नी थी इसलिए 11:00 बजे होटल से हवाई अड्डा पहुंच गए। उड़ान नियत समय ओर उड़ी। 05:30 पर दिल्ली पहुंच गए। अब पूरी रात दिल्ली बावड़ी अड्डा पर गुजारनी थी। 19 जून 2023  को सुबह-सुबह 06:00 बजे भोपाल की उड़ान है। दो घंटा इधर-उधर भटकने के पश्चात आराम कुर्सियां नसीब हुईं। उन पर पसरकर सोने की कोशिश की, लेकिन मजाल है शोरशराबे के कारण झपकी भी आ जाए। आखिर में परेशान होकर अपना चादर निकाला, तौलिया में कपड़े लपेट कर तकिया बनाया, सूटकेस पर पैर पसार एक लंबी नींद निकाली। पाँच बजे चेक-इन करके हवाई जहाज में सवार होकर साढ़े आठ बजे भोपाल विमानतल पर उतर कर घर पहुँचे, पूरे दिन सोकर गुजारा।

– समाप्त –

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-९ – विक्टोरिया मेमोरियल एवं कालीघाट मंदिर☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-९ विक्टोरिया मेमोरियल एवं कालीघाट मंदिर ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विक्टोरिया मेमोरियल

हावड़ा ब्रिज से गंगा पार करके हावड़ा पहुँचे  थे, और दूसरे सेतु से वापस कलकत्ता में ब्रिटिश काल का सबसे प्रसिद्ध भवन विक्टोरिया मेमोरियल देखने पहुँचे। विक्टोरिया मेमोरियल लॉर्ड कर्जन के दिमाग की उपज है। जो 1899 से 1905 तक भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल रहे थे। उन्हें बंगाल के बँटवारे के साथ हिंदू मुसलमान बँटवारे के लिए भी जाना जाता है। यह भवन भारत में रानी विक्टोरिया के शासनकाल के पच्चीसवें रजत जयंती वर्ष की याद में बनाया गया था।

 ब्रिटेन के इतिहास में तीन सम्राज्ञियाँ हुई हैं और तीनों ही बहुत प्रसिद्ध रहीं। एलिज़ाबेथ प्रथम  1558 से 1603 तक इंग्लैंड की साम्राज्ञी रहीं। वे हिंदुस्तान के बादशाह अकबर की हुकूमत 1605 के समक़ालीन थीं। दोनों ने बड़े-बड़े साम्राज्य क़ायम किए थे। एलिज़ाबेथ प्रथम का खड़ा किया गया साम्राज्य 400 साल 1952 तक अक्षुण्य रहकर ग्रेट ब्रिटेन तक सिमट गया। अकबर के साम्राज्य को उसके पड़पोते औरंगज़ेब की धार्मिक उन्मादी नीतियों ने लगभग 100 सालों में ही 1707 में ढहने लगा था, जिसकी बुनियाद पर इंग्लैंड का कभी न सूर्य अस्त वाला साम्राज्य था 1857 में खड़ा होना शुरू हुआ था।     

दूसरी महान साम्राज्ञी विक्टोरिया मानी जाती हैं, जो 1837 से यूनाइटेड किंगडम की रानी थीं और 1876 से 1901 तक ब्रिटिश इंडिया की साम्राज्ञी बन गई थीं। इंग्लैंड के इतिहास में उनका शासन विक्टोरियन युग के रूप में जाना जाता है। उनका शासनकाल 63 साल से अधिक लंबा था। जो यूनाइटेड किंगडम में औद्योगिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और सैन्य क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन का काल था, जब ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य ना डूबने की हैसियत हासिल की थी।

तीसरी एलिज़बेथ द्वितीय 1952 से 2022 में अपनी मृत्यु तक यूनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमियों की महारानी थीं। वह अपने शासनकाल के शुरुआत में 32 विभिन्न सम्प्रभु राज्यों की रानी थीं। देश आज़ाद होते चले गए और अपनी मृत्यु तक 15 राष्ट्रों की नाममात्र सम्राज्ञी रह गई थीं। एक ने साम्राज्य खड़ा किया, दूसरी ने विस्तारित किया और तीसरी के समय ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य डूब गया। इस फ़ानी दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है।

लॉर्ड कर्जन साम्राज्ञी विक्टोरिया के शासन के दौरान भारत के प्रशासक थे। वे चाहते थे कि रानी को समर्पित स्मारक विशाल और अब तक भारत में निर्मित ताजमहल जैसे सभी स्मारकों से बड़ा और भव्य होना चाहिए। विक्टोरिया मेमोरियल बनने में उस समय पूरे 1 करोड़ 5 लाख रूपए का खर्च आया था। जो भारत के राजाओं और कारोबारियों से जुटाया गया था। किंग जॉर्ज पंचम और प्रिंस ऑफ व्हेल्स ने 1906 में स्मारक की आधारशिला रखी थी और स्मारक अंततः 1921 में आम जनता के लिए खोला गया था। इस बीच 1912 में ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली पहुँच गई थी। विक्टोरिया युग में रेल, दूरसंचार और डाक व्यवस्था का जाल बिछाया जा रहा था। जब 1853 में बॉम्बे से ठाणे रेल चलाई तब विक्टोरिया टर्मिनस पहला रेल स्टेशन और पेनिनसुला रेल कंपनी का भव्य मुख्यालय बनाया गया था। जो अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के नाम से जाना जाता है। इन विचारों में खोए कलकत्ता के नज़ारे देखते चले जा रहे थे। पता ही न चला कब विक्टोरिया मेमोरियल आ गया।

विक्टोरिया मेमोरियल के मुख्य वास्तुकार रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स के अध्यक्ष विलियम एमर्सन थे। उन्होंने एक ही समय में मिस्र, वेनिस, मुगल और अन्य पारसी शैलियों से प्रेरणा लेते हुए स्मारक को इंडो-सरैसेनिक शैली में बनाया। यह 184 फीट ऊंची इमारत सफेद रंग के मकराना मार्बल पत्थर से बनाई गई थी, जिसे जोधपुर से लाया गया था। विशाल बगीचे 64 एकड़ में फैले हुए हैं। इसे डेविड पेन और लॉर्ड रेडडेल ने डिजाइन किया था। बाग का रखरखाव बागवानों की 21 सदस्यीय टीम करती है। उत्तर गेट की तरफ़ रानी विक्टोरिया की एक कांस्य प्रतिमा है। सर जॉर्ज फ्रैम्पटन का एक चिन्ह रानी को उनके सिंहासन पर बैठे हुए चित्रित करता है।

एक एडवर्ड लॉन है जहाँ पर्यटक परिसर के दक्षिणी भाग में स्मारक मेहराब के नीचे किंग एडवर्ड सप्तम की कांस्य प्रतिमा देख सकते हैं। इसे सर बर्ट्रम मैकनेल ने डिजाइन किया था। एक अन्य लॉन कर्ज़न लॉन में फ्रेडरिक विलियम पोमेरॉय द्वारा डिज़ाइन की गई कर्ज़न की मूर्ति है। गार्डन में कॉर्नवॉलिस, हेस्टिंग्स, क्लाइव, डलहौजी, बेंटिक, वेलेस्ली, रिपन, एंड्रयू, एच.एल. फ्रेजर और राजेंद्रनाथ मुखर्जी सहित कई अन्य प्रतिमाएं हैं।

रॉयल गैलरी, नेशनल लीडर्स गैलरी, मूर्तिकला गैलरी, पोर्ट्रेट गैलरी, सेंट्रल हॉल और कलकत्ता गैलरी सहित 25 से अधिक दीर्घाओं के साथ, विक्टोरिया मेमोरियल में दुर्लभ और प्राचीन पुस्तकों का एक समृद्ध संग्रह है। इनमें शेक्सपियर की सचित्र रचनाएं, अरेबियन नाइट्स और संगीत और नृत्य पर लिखी गई अन्य पुस्तकें शामिल हैं। स्मारक वास्तव में चित्रों, हथियारों, वस्त्रों, कलाकृतियों, टिकटों, आदि वस्तुओं का उत्कृष्ट और उल्लेखनीय संग्रह का खजाना है। इसके अलावा यहां द नेशनल लीडर्स गैलरी, पोर्ट्रेट गैलरी, सेंट्रल हॉल, मूर्तिकला गैलरी, आर्म्स एंड आर्मरी गैलरी भी घूम सकते हैं।

विक्टोरिया मेमोरियल में कलकत्ता गैलरी भारत की पहली सिटी गैलरी है। गैलरी स्थापित करने की पहल भारत के तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्रो.एस. नुरुल हसन ने की थी, जिसका उद्देश्य दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को स्मारक की ओर आकर्षित करना था। गैलरी में आर बी दत्ता द्वारा बिपिन बिहारी दत्ता, माइकल मधुसूदन दत्त, राम मोहन राय, कलकत्ता और हावड़ा के बीच पोंटून पुल (हावड़ा ब्रिज के रूप में लोकप्रिय), कार्ड प्लेयर भबानी चरण लाहा द्वारा देवेंद्रनाथ टैगोर, श्रीमती बेलनोस द्वारा पायकर या पैडलर्स, बेनी माधब भट्टाचार्जी द्वारा देवी काली की मशहूर पेंटिंग्स यहां देखी जा सकती हैं। यहां एक पियानो है जिसे 1829 में विक्टोरिया को उपहार में दिया गया था जब वह 10 साल की थी। हाल ही में पियानो को विक्टोरिया मेमोरियल की सेंट्रल गैलरी में स्थानांतरित कर दिया गया है। यहां पर रखी एक राइटिंग डेस्क भी देखी जा सकती है जिसका उपयोग क्वीन विक्टोरिया ने विंडसर कैसल में किया था। यहाँ जयपुर जुलूस, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी तेल से बनी चित्रकला है। जिसमें 1876 में राजा एडवर्ड 7 को अपने राज्य का दौरा करते हुए दिखाया गया है।

हमने घूमफिर कर वहाँ की कैंटीन में नूडल खाकर दोपहर का भोजन निपटाया। फिर उत्तर दिशा से घुसकर दक्षिण गेट पर पहुँचे। टैक्सी ड्राइवर को फ़ोन पर कहा कि दक्षिण गेट पर आ जाए। वह बोला कि जहाँ आपको छोड़ा था, वहीं आइए, उसको समझाया पर वह अड़ा रहा। आख़िर हमें दक्षिण गेट से दो किलोमीटर पैदल चलकर उत्तर दरवाज़े पर पहुँचना पड़ा। फिर उसकी जो परेड ली तो वह पानी माँगने लगा। उसे पानी पिलाकर फिर रगड़ा। इस तरह जय माँ काली कलकत्ते वाली के मंदिर कालीघाट पहुँचे।

कालीघाट मंदिर

काली, कालिका या महाकाली हिन्दू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं। वे मृत्यु, काल और परिवर्तन की प्रतीक हैं। यह सुन्दर रूपवान आदिशक्ति दुर्गा माता का काला विकराल और भयप्रद रूप है, जिसकी उत्पत्ति असुरों के संहार के लिये हुई थी। रक्तबीज का वध करते समय उसके रक्त की बूँदों को धरती पर नहीं गिरने देने के लिए उन्होंने उन्हें जीभ पर ग्रहण किया था। देवी रक्त में नहाते-नहाते काले वर्ण की हो गई थीं। तब रक्तबीज का वध संभव हुआ था। क्रोधोन्मत देवी को शिव ने राह में लेटकर रोका था। उनको बंगाल, ओडिशा और असम में इसी रूप में पूजा जाता है।

हम ईडन गॉर्डन स्टेडियम देखकर एक बजे के आसपास कालीघाट मंदिर पहुँचे। वहाँ चारों तरफ़ सड़क बनाने का कार्य चल रहा था। टैक्सी से उतर कीचड़ के बीच से रास्ता बना कर बढ़ रहे थे। तभी दो पंडे आकर बोले- मंदिर के पट बंद हो गए हैं। अब चार बजे खुलेंगे। आप चाहें तो पाँच सौ रुपयों में स्पेशल दर्शन करवा सकते हैं। हम उनसे उलझे बगैर आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर चलने के बाद दो पंडों में से एक चलता बना। बाक़ी बचा बोला- चलिए, चार सौ दीजियेगा। हमने मौन साधा हुआ था। वह तीन सौ और फिर दो सौ पर उतर आया। हमने कहा- आप व्यर्थ समय ना गवायें। बलि के लिए कोई दूसरा बकरा देखें। वह भी थोड़ी दूर चलकर ग़ायब हो गया। हम जब मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुँचे तो वहाँ पंडों की पूरी जमात जमा थी। एक हृष्टपुष्ट पंडा दरवाज़ा रोक कर खड़ा था। वह बोला मंदिर बंद हो गया। हमने कहा- भक्त अंदर जाते और बाहर निकलते दिख रहे हैं। वह शिथिल होकर बोला- जूते बग़ल में निकाल दीजिए और ब्राह्मणों के कल्याण हेतु सौ रुपये निकालिए। हमने सोचा, चलो भाई पाँच सौ की सुई एक सौ पर आकर लटक गई। पंडा कल्याण निधि को एक सौ रुपये से समृद्ध करके कबीर को याद करते अंदर घुसे। 

कबीरा आप ठगाइए  और ना ठगिए कोय,

आप ठगाय सुख उपजे और ठगे दुख होय।

मंदिर प्रांगण में घुसते ही हमारे पैर खून की लंबी धार देख कर ठिठक गए। रक्त धार का पीछा करते निगाह वहाँ पहुँची, जहाँ सात-आठ लोग धर्म सम्मत कार्य में लगे थे। बकरे के कटे अंग चारों तरफ़ बिखरे थे। कटे सिर एक तरफ़, टांगों के खुर दूसरी तरफ़, आँतों का ढेर खुरों के पास और सबके बीच में गोश्त का ढेर लगा था। कसाइयों के पीछे कलेजा, भेजा और तिल्ली के अलग-अलग ढेर थे। हम फटी आँखों से यह नज़ारा देख रहे थे। तभी लाल कपड़े की धोती-कुर्ता पहने हाथ में काँसे की थाली में सिंदूर-अक्षत लोटा में जल लिए एक पुरोहित यजमान के साथ प्रकट हुआ। पीछे एक बलि का बकरा लाया गया। पुरोहित ने यजमान को लोटा से पानी लेकर बलि हव्य पर छिड़कने को कहा। पानी की बूँदें बकरे की आँखों ओर पड़ीं तो वह मिमियाया। पुरोहित ने यजमान से कहा-

अपना नाम लें-

ऽऽऽऽऽऽऽऽ

पिता जी का नाम लें

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गोत्र का नाम लें

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स्थान का नाम लें

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अपनी मन्नत कहें

@@@@@@

उसने यजमान को हव्य के माथे पर लाल सिंदूर-अक्षत टीका करने को कहा।

उसके बाद पुरोहित ने मंत्र पढ़ा-

“कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै

धीमहि तन्नो घोरा प्रचोदयात्।”

उसके बाद पुरोहित और यजमान सामने से हट गए।  एक व्यक्ति ने आकर बकरे का मुँह कस कर पकड़ लिया। दूसरे आदमी ने पीछे की दोनों टांगें पकड़ीं। तीसरा खूब तगड़ा आदमी लोहे का वज़नदार फरसा लेकर आया। उसने सिर के ऊपर तक फरसा उठा कर मारा और बकरे का सिर एक ही झटके में धड़ से अलग कर दिया। टाँग पकड़े व्यक्ति ने बकरे के तड़फ़ते धड़ को लिटा दिया। एक अन्य व्यक्ति ने बकरे का सिर उठाकर ढेर पर रख दिया। उसके बाद धड़ के पेट को चीर कर आँतें, लिवर, कलेजा निकाले। फिर धड़ को एक लंबे रस्से पर बंधे हुक से लटका कर ऊपर से नीचे की तरफ़ खाल उतारी। एक बड़ी मज़बूत पॉलीथिन में गोश्त रखकर यजमान को दिया। बाक़ी गोश्त बलि का प्रसाद स्वरूप मंदिर का हिस्सा हो गया। मंदिर में मोबाइल से फोटो खींचने की मनाही है। फिर भी हमने बाहर निकलते-निकलते पेंट की जेब से मोबाइल थोड़ा सा निकाल बिना फोकस किए एक फोटो निकाल लिया।

उसके बाद काली माता के दर्शन हेतु पंक्ति में खड़े हो गए। दस मिनट में दर्शन करके बाहर निकल टैक्सी की दिशा में चल दिए। मंदिर से लौटते समय जॉर्ज ओर्वेल के एनिमल फ़ार्म और ऑप्टन सिंक्लेयर के जंगल उपन्यासों में वर्णित मीट इंडस्ट्री में ऑटोमैटिक स्लॉटर हाउस के दृश्य घूमते रहे।

बलि चढ़ाने की प्रथा हिंदुओं के शाक्त संप्रदाय के अलावा यहूदी और इस्लाम धर्म में भी प्रचलित है। ओल्ड टेस्टामेंट के अनुसार अब्राहम ने अपने बेटे इशाक को यहोवा से प्यार करना और उसके सभी वादों पर भरोसा रखना सिखाया। मगर जब इशाक करीब 25 साल का हुआ तो यहोवा ने अब्राहम से एक ऐसा काम करने के लिए कहा जो बहुत मुश्‍किल था। परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, ‘तू अपने इकलौते बेटे को मोरिया देश ले जा और वहाँ एक पहाड़ पर उसकी बलि चढ़ा।’ अब्राहम को बिलकुल भी पता नहीं था कि यहोवा ने ऐसा करने के लिए क्यों कहा। फिर भी उसने यहोवा की बात मानी।

अगले दिन सुबह-सुबह अब्राहम ने अपने साथ इशाक और दो सेवकों को लिया और मोरिया देश की तरफ निकल पड़ा। तीन दिन बाद उन्हें दूर से वह पहाड़ दिखायी दिया। अब्राहम ने अपने सेवकों से कहा कि वे वहीं रुकें और वह इशाक को लेकर जाएगा। अब्राहम ने एक चाकू लिया और इशाक से कहा कि वह लकड़ियाँ उठाए। इशाक ने अपने पिता से पूछा, ‘बलिदान चढ़ाने के लिए जानवर कहाँ है?’ अब्राहम ने कहा, ‘बेटा, यहोवा देगा।’

जब वे चलते-चलते पहाड़ पर पहुँचे तो उन्होंने वहाँ एक वेदी बनायी। फिर अब्राहम ने इशाक के हाथ-पैर बाँधे और उसे वेदी पर लिटा दिया। फिर अब्राहम ने हाथ में चाकू लिया। वह इशाक के गले को रेंतने ही वाला था कि यहोवा के स्वर्गदूत ने स्वर्ग से पुकारा, ‘अब्राहम, लड़के को मत मार, अब मैं जान गया हूँ कि तुझे परमेश्‍वर पर विश्‍वास है क्योंकि तू अपने बेटे की बलि चढ़ाने के लिए तैयार हो गया।’ तब अब्राहम ने देखा कि वहाँ एक मेढ़ा है जिसके सींग झाड़ियों में फँसे हैं। उसने जल्दी से इशाक के हाथ-पैर खोल दिए और उसके बदले मेढ़े की बलि चढ़ायी।

यही घटना क़ुरान में इस तरह वर्णित है।

इब्राहिम की निष्ठा और समर्पित होने की भावना का जश्न मनाने के लिए बकरीद मनाई जाती है और बकरे को कुर्बान किया जाता है क्योंकि अल्लाह ने भी इस्माइल की जगह बकरे को ही कुर्बान किया था। यहाँ इशाक की जगह इस्माइल का नाम मिलता है।

पशु बलि की प्रथा हिंदुओं में शाक्त संप्रदाय से जुड़ी हुई है। बलि प्रथा आदिवासी परंपराओं में भी दृढ़ता से निहित है। पशु बलि भारत में प्राचीन वैदिक धर्म का हिस्सा थी, और इसका उल्लेख यजुर्वेद में मिलता है। बाद के पुराणों और भगवद गीता जैसे हिंदू ग्रंथों में पशु बलि की सख़्त मनाही है।

डॉक्टर रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कृति “संस्कृति के चार अध्याय” के पृष्ठ क्रमांक 60 पर डॉक्टर मंगलदेव शास्त्री के माध्यम से उल्लिखित किया है कि “भारतीय संस्कृति में जो कई परस्पर विरोधी युग्म हैं, उसका भी एक कारण है कि संस्कृति आरम्भ से ही सामासिक रही है। भारतीय समाज में एक द्वन्द तो कर्म और संन्यास का है, दूसरा प्रवृत्ति और निवृत्ति को लेकर है, तीसरा स्वर्ग और नरक की कल्पनाओं को लेकर है।” यही बात शाकाहार और मांसाहार को लेकर भी है। परस्पर विरोधी प्रवृत्ति साथ-साथ विकसित होती रही है।

हिंदुओं में मांसाहार बनाम शाकाहार प्रणाली अलग क़िस्म से विकसित हुई है। आदि शंकराचार्य (788-820 ईस्वी) तक सनातन धर्म की प्रवृत्ति कई धाराओं में विभाजित होने लग गई थी परंतु उनका विभिन्न समुदायों में विभाजन नहीं मिलता है। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्म सिद्धांत पर वेदान्त की व्याख्या शुरू की, तब कुछ प्रचलित भाष्यों के अनुसार ब्रह्म किसे माना जाय,  इस पर विवाद उत्पन्न हुए।

  • शैव मत का कहना था कि शिव ब्रह्म हैं और प्रकृति उनकी शक्ति है।
  • वैष्णव मत ने प्रतिपादित किया कि विष्णु ब्रह्म हैं और उनके सभी अवतार भी ब्रह्म हैं।
  • शाक्त मत की स्थापना थी कि शक्ति ब्रह्म है। वह कई रूपों में व्यक्त होती है। रक्त शक्ति का प्राण है। बलि उसका भोजन है। शक्ति को रक्त नहीं मिलेगा तो वह लुप्त हो जाएगी।

 भक्ति दर्शन का प्रादुर्भाव दक्षिण भारत में नयनार संतों ने किया और विशेष तौर से स्वामी रामानंद भक्ति को उत्तर भारत की तरफ़ लाए।

 भक्ति उपजी द्रविड अंग लायो रामानंद।

 गुजरात में संत नरसिंह मेहता, महाराष्ट्र में तुकाराम, बृज में सूरदास-मीरा और अवध में कबीर-तुलसीदास ने वैष्णव महिमा का बखान किया। तब तक वेदान्त से अलग समाज का बड़ा तबका बौद्ध और जैन अहिंसा सिद्धांत को व्यवहार में प्रयुक्त करने लगा था। वैष्णव पंथियों रामानुज और वल्लभ आचार्य ने शाकाहार की महिमा बताई। इस तरह दक्षिण से उत्तरप्रदेश तक वैष्णव पंथ शाकाहार सहित स्थापित हो गया। शिव-पार्वती की आराधना करने वाले शैव पंथी भी देर सवेर शाकाहार पर स्थिर हो गए।

बंगाल सहित पूर्वोत्तर भारत शक्ति की पूजा और पशु बलि पर अडिग रहे। संस्कृति व्यक्तित्वों का निर्माण करती है। बीसवीं सदी में वैष्णव महात्मा गांधी अहिंसा सिद्धांत पर आज़ादी का आंदोलन खड़ा करना शुरू करते हैं। शाक्त के गढ़ कलकत्ता में सुभाष चंद्र बोस हिंसक आंदोलन के पक्ष में खड़े हुए तो कांग्रेस में विभाजन अनिवार्यता हो गई। शाक्त क्रांतिकारी राह पर चले गए। सनातनी हिंदू सतत विकासशील दर्शन है। कभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकालता। विमर्ष हमेशा जारी है। अन्य संप्रदायों ने छठवीं-सातवीं सदी में अंतिम निष्कर्ष निकाल लिया। वहाँ विमर्ष की कोई गुंजाइश नहीं है।

कभी कोलकाता का कालीघाट मंदिर देवी काली को समर्पित हुगली नदी पर एक पवित्र घाट था। समय के साथ वैष्णव नदी शक्ति मंदिर से दूर चली गई। मंदिर अब आदिगंगा नामक एक छोटी नहर के किनारे है जो हुगली से जुड़ती है। कालीघाट को भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। शाक्त मान्यता अनुसार कालीघाट उस स्थल का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ दक्षिणायन या सती के दाहिने पैर का पंजा गिरा था। इसका 15 वीं और 17 वीं शताब्दी के बंगाल के शाक्त भक्ति साहित्य में संदर्भ मिलता है। वर्तमान मंदिर 19 वीं शताब्दी का है। माना जाता है कि कालीघाट मंदिर चंद्रगुप्त द्वितीय के समय से अस्तित्व में है।

मूल मंदिर राजा बसंत राय द्वारा बनाया गया था, जो प्रतापदित्य के चाचा और जेसोर (बांग्लादेश) के राजा थे। मंदिर एक छोटी झोपड़ी के आकार का ढांचा था, जिसे अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने 16वीं शताब्दी में वर्तमान स्वरूप दिया। वर्तमान संरचना 1809 में सबरन रॉय चौधरी के मार्गदर्शन में पूरी हुई। मुख्य मंदिर में देवी काली की एक अनूठी प्रतिमा है।

मां काली की वर्तमान मूर्ति दो संतों – ब्रह्मानंद गिरि और आत्माराम गिरि द्वारा बनाई गई थी। मूर्ति की तीन विशाल आंखें और एक लंबी जीभ और चार हाथ हैं, जो सोने के बने हैं। मंदिर में पुष्प और मोर-आकृति की टाइलें हैं जो इसे विक्टोरियन रूप प्रदान करती हैं। इसके अलावा मंदिर में “कुंडूपुकर” नामक एक पवित्र तालाब है जो परिसर के दक्षिण पूर्व कोने में स्थित है। इस तालाब के पानी को गंगा के समान पवित्र माना जाता है।

हलधर परिवार मंदिर की संपत्ति का मूल मालिक होने का दावा करता था, लेकिन उनका दावा बनिशा के चौधरी द्वारा विवादित था। 1960 के दशक में सरकार और हलधर परिवार के प्रतिनिधित्व के साथ मंदिर के प्रशासनिक प्रबंधन के लिए एक समिति का गठन किया गया था। इसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने कालीघाट मंदिर को बेहतर बनाने में दिलचस्पी ली और आज यह मंदिर कोलकाता के पर्यटन स्थलों में आकर्षण का केंद्र है।

यहाँ काली देवी की टचस्टोन से बनी प्रचंड प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में मां काली भगवान शिव की छाती पर पैर रखे हुए नजर आती हैं। गले में नरमुंडों की माला पहने हैं और हाथ में फरसा और नरमुंड हैं। काली मां की जीभ बाहर निकली हुई है, जिससे रक्त की कुछ बूंदें भी टपकती नजर आ रही हैं। इस मूर्ति के पीछे कुछ किवदंतियां भी प्रचलित हैं। काली माता की मूर्ति श्याम रंग की है। आंखें और सिर सिंदुरिया रंग में हैं। यहां तक की मां काली के तिलक भी सिंदुरिया रंग में लगा हुआ है। वे हाथ में एक फरसा पकड़े हैं जो सिंदुरिया रंग का ही है।

समय अधिक होने लगा था। इसलिए बिड़ला तारामंडल, भारतीय संग्रहालय, बिड़ला मंदिर, अलीपुर जू फुर्ती से घूमे। पार्क स्ट्रीट भी देखना थी।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

आज 18 जून 2023 को कलकत्ता घूमने का कार्यक्रम है। किसी भी शहर को देखने और घूमने के पहले उसकी स्थापना, विकास और वर्तमान दशा का चित्र दिमाग़ में होना चाहिए। तब आप पर्यटन का सही आनंद उठा सकते हैं, नहीं तो गाइड द्वारा परसी जाती अधकचरी जानकारी पर सिर हिलाते रहना विकल्प होता है। प्रायः प्रत्येक शहर में पर्यटन विकास निगम के बस द्वारा सिटी टूर होते हैं। सरसरी जानकारी हेतु सरकारी या निजी बस टूर ठीक रहते हैं। लेकिन यदि गंभीरता पूर्वक पर्यटन आपका लक्ष्य हो तो एक दिन में तीन या चार जगहों पर ठीक से घूमा जा सकता है। तदानुसार हमारा लक्ष्य जय काली कलकत्ता वाली माता का कालीघाट मंदिर के अलावा ब्रिटिश क़ालीन कलकत्ता देखना था। कलकत्ता की शुरुआती कहानी जॉब चारनाक के आसपास से ही आरम्भ होती है।

जॉब चारनाक सबसे पहले 1655 में ईस्ट इंडिया कम्पनी की क़ासिम बाज़ार कोठी में स्थानीय बोर्ड के चौथे सदस्य के रूप में भारत आए थे, वहाँ से  तबादला पर पटना चले गए, जहाँ उन्हें लीलावती मिली। पटना से पदोन्नत होकर सपरिवार मद्रास चले गए। 1690 में कम्पनी ने बंगाल की खाड़ी में कारोबारी जगह और कोठी के लिए ठौर ढूँढना शुरू किया। “द प्रिन्सेस” नामक जहाज़ से 24 अगस्त 1690 को रविवार को दिन के बारह बजे जॉब चारनाक सूतानाटी नामक जगह पर लंगर डाल कर उतरे। वहाँ बड़े स्तर पर सूती कपड़े का कारोबार होता था। ढाके की मलमल का कपड़ा नावों से लाया जाता था। ठीक वहीं, जहाँ आज कलकत्ता का बहु बाज़ार और स्यालदाह स्टेशन है। वहाँ गोलपत्ते से बने एक घर के बाजु में एक ऊँचा बरगद का पेड़ था। उसी पेड़ के सहारे बैठकर उन्होंने हुक्का खींचा, धुआँरे गोल गुच्छों को छोड़ते हुए तय किया कि यही जगह कम्पनी के कारोबारी ठिकाने के लिए ठीक रहेगी। वहाँ गंगा एक पहाड़ी रास्ते में आने से पश्चिम की तरफ़ घूमकर पहाड़ी को तीन तरफ़ दे घेर लेती है। सुरक्षा के लिहाज़ से ईस्ट इंडिया कंपनी का कार्यालय वहीं स्थापित कर लिया। बाद में वहीं गवर्नर जनरल का निवास और कार्यालय बना लिया।

कलकत्ता आधुनिक भारत में सबसे पहले बसने वाले शहरों में से एक है। 1690 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी “जाब चारनाक” ने अपने कंपनी के व्यापारियों के लिये एक बस्ती बसाई। 1698 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक स्थानीय जमींदार सावर्ण रायचौधुरी से तीन गाँव (सूतानुटि, कोलिकाता और गोबिंदपुर) के इजारा में ले लिए। अगले साल कंपनी ने इन तीन गाँवों का विकास कलकत्ता प्रेसिडेंसी के रूप में करना शुरू किया। कुछ इतिहासकार इस शहर की शुरुआत 1698 में फोर्ट विलियम की स्थापना से जोड़ कर देखते हैं। 1727 में इंग्लैंड के राजा जार्ज द्वतीय के आदेशानुसार यहाँ एक नागरिक न्यायालय की स्थापना की गई। कलकत्ता नगर निगम की स्थापना की गई और भारत के पहले मेयर का चुनाव हुआ। 1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर आक्रमण कर उसे अंग्रेजों से जीत लिया। उसने इसका नाम “अलीनगर” रखा। लेकिन साल भर के अंदर ही सिराजुद्दौला की पकड़ यहाँ ढीली पड़ गयी और लार्ड क्लाईव ने प्लासी की लड़ाई जीत कर 1757 में इस पर पुन: अधिकार कर लिया। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे ब्रिटिश शासकों की भारतीय राजधानी बना दिया।

कलकत्ता का व्यवस्थित विकास अंग्रेजों और अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार से हुआ। वारेन हेस्टिंग (1818-23) ने सब्सिडीएरी अलाइयन्स के ज़रिए राजपूताना सहित छोटी-छोटी सैकड़ों रियासतों को ब्रिटिश एम्पायअर में मिला लिया। राजपूताना के राजा-महाराजा मुग़लों, मराठों, अफ़ग़ानो पिंडारियो से इतने ख़ौफ़ज़दा थे कि वे ख़ुद अंग्रेज़ों के पास चले आए। इसके अलावा 1817 में मराठों को हराने के बाद सिक्खों के अलावा कोई सैनिक शक्ति भारत में नहीं बची थी। अमहरेस्ट (1823-28) ने नागपुर, भरतपुर और बैरकपुर को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया और मलाया तक पर क़ब्ज़ा कर लिया था। विलियम बेंटिक (1828-35) ने सती प्रथा और ठगी समाप्त की और भारत को एक प्रशासनिक ढाँचा दिया। पहली बार कलकत्ता में बजट बनाकर काम शुरू किया। सबसे महत्वपूर्ण काम उसने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नीव रखी, ताकि प्रशासन चलाने हेतु कर्मचारी और अधिकारी पैदा किए जा सकें। परिणामस्वरूप वे अपना प्रशासनिक क्षेत्र बढ़ाते चले गए। आज हमारा लक्ष्य कोलकाता ब्रिटिश युगीन प्रमुख स्थानों का भ्रमण करना है।

राइटर्स बिल्डिंग

हमने कलकत्ता भ्रमण यात्रा राइटर्स बिल्डिंग से आरम्भ की। अंग्रेजों द्वारा भारत में निर्मित सबसे पहला प्रशासनिक भवन राइटर्स बिल्डिंग है। उन्हें  भारत में प्रशासनिक अमला बिठाने हेतु राइटर अर्थात् क्लर्क की ज़रूरत थी। इसीलिए कोलकाता में राइटर्स बिल्डिंग बनाई गई थी। इसकी आश्चर्यजनक वास्तुकला और डिजाइन औपनिवेशिक युग के इतिहास की गवाह है। राइटर्स बिल्डिंग का निर्माण 1777 में शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के कनिष्ठ नौकरों, या ‘लेखकों’ को बिठाना था। 1780 में बनाते समय इसे ‘अस्पताल’ बताया गया था। अगले कुछ दशकों में कई संरचनात्मक परिवर्तनों के बाद, फोर्ट विलियम कॉलेज ने वहाँ शिक्षा शिविर स्थापित कर 1830 तक हिंदी और फ़ारसी भाषाओं में भारतीय और अंग्रेज़ी लेखकों को यहाँ प्रशिक्षण दिया। इसमें 150 मीटर लंबी ग्रीको-रोमन शैली संरचना में 13 ब्लॉक हैं जिसमें दीवारों पर ग्रीक देवताओं ज्यूस, एटलस, हरक्युलिस इत्यादि की कई मूर्तियाँ और साथ ही रोमन देवी मिनर्वा की एक मूर्ति ध्यान आकर्षित करती है।

इमारत की स्मृति में कई राज दफ़्न हैं। उल्लेखनीय घटनाओं में अलीपुर जेल के कुख्यात महानिरीक्षक लेफ्टिनेंट कर्नल एन.एस.सिम्पसन की हत्या मुख्य है। कर्नल सिम्पसन भारतीय कैदियों के क्रूर उत्पीड़न के लिए कुख्यात था। तीन बंगाली क्रांतिकारियों – बेनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता – ने राइटर्स बिल्डिंग के अंदर जाने के लिए खुद को पश्चिमी भद्र पुरुषों के रूप में तैयार किया और कर्नल सिम्पसन को गोली मार दी। इन स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर बीबीडी बाग (बेनॉय-बादल-दिनेश) अब कोलकाता का केंद्रीय व्यावसायिक जिला (CBD अर्थात् सेंट्रल बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट) है। वह बीबीडी बाग देखा, जहाँ भारत के शुरुआती क्रांतिकारियों की स्मृतियाँ संजोई गई हैं। 

कोलकाता के सबसे व्यस्त हिस्सों में से एक, बीबीडी बाग क्षेत्र कलकत्ता के अधिकांश दर्शनीय ऐतिहासिक स्मारकों का घर है। बेथ एल सिनेगॉग में शहर के ऐतिहासिक यहूदी मंदिर को देखें और कोलकाता के एकमात्र स्कॉटिश चर्च – चर्च की पड़ताली वास्तुकला पर आश्चर्य करें। यदि आप एक झटपट चाय या हल्का नाश्ता लेना चाहते हैं, तो नज़दीक ही आनंददायक काका चाय पर रुकें। यहाँ से अगला पड़ाव फोर्ट विलियम है।

फोर्ट विलियम

फोर्ट विलियम कोलकाता शहर में, हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। जब अंग्रेजों ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फ़त बादशाहत क़ायम करने के बारे में सोचा तो उनकी सबसे सशक्त उपस्थिति हुगली नदी के किनारे थी। उन्होंने वहीं से आगे बढ़कर प्लासी में सिराजुद्दौला को हटाकर मीर क़ासिम को गद्दी पर बिठा बंगाल में पैर जमा लिये थे। हुगली के पूर्वी किनारे पर उन्होंने क़िला निर्मित करने के बारे में सोचा क्योंकि एक तरफ़ से हुगली नदी उनका सुरक्षा कवच थी। यदि भागना भी पड़े तो हुगली के पानी में जहाज तैयार रहते थे, बैठो और मद्रास या बॉम्बे की तरफ़ निकल लो। उन्होंने प्लासी की लड़ाई के साठ साल पहले क़िला बनाना शुरू कर दिया था। उस समय इंग्लैंड में विलियम तृतीय का शासन था। इसलिए वर्ष 1696 में निर्मित इस किले का नाम किंग विलियम तृतीय (1688-1702) के नाम पर फोर्ट विलियम रखा गया था। फोर्ट विलियम 70.9 एकड़ में फैली हुई एक शानदार संरचना है, जो पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए सैकड़ों मेहराबदार खिड़कियों से सुशोभित कोलकाता का प्रमुख आकर्षण केंद्र है। फोर्ट विलियम में कुछ खामियों को देखते हुए एक और नए अष्टकोणीय भवन का निर्माण किया गया था जिसमे एक आंतरिक गढ़ शामिल था, जहां कैदियों को रखा जाता था, यही वजह है कि इसे ‘कलकत्ता के ब्लैक होल’ के रूप में भी जाना जाता था। अब फोर्ट विलियम भारतीय सेना पूर्वी कमान के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है।

 फोर्ट विलियम ईंट और मोर्टार से बनी एक भव्य अष्टकोणीय संरचना है। इसके तीन किनारे गंगा नदी अर्थात् हुगली से सुरक्षित हैं,  जबकि शेष में हरियाली से भरा एक सुंदर मैदान है। किले का डिज़ाइन एक तारे के पैटर्न का है। इसका निर्माण इस तरह से किया गया था कि इसे तोप से दागे गए गोलों से भी नष्ट नही किया जा सकता था। किले के अन्दर प्रवेश करने के लिए छह दरवाज़ों चौरंगी, प्लासी, कलकत्ता, वाटर गेट, सेंट जॉर्जेस और ट्रेजरी गेट का निर्माण किया गया। वाटर गेट से फ़ौजी मुहकमे की अनुमति से घूमने जा सकते हैं। घूमा और वापस निकल कर ईडन गार्डन तरफ़ मुड़ लिए।  

ईडन गार्डन स्टेडियम

फोर्ट विलियम के नज़दीक ही सड़क पार करके ईडन गार्डन स्टेडियम पहुँचे। ईडन गार्डन स्टेडियम उस समय आकार लेने लगा जब अभिजात्य अंग्रेज हुक्मरानों को क्रिकेट खेलने के लिए एक बड़े खेल मैदान की ज़रूरत महसूस होने लगी। आज के राज्य सचिवालय और कलकत्ता उच्च न्यायालय के पास स्थित ईडन गार्डन एक सुंदर, सुव्यवस्थित क्रिकेट स्टेडियम है। ईडन गार्डन के वर्तमान रास्ते विशाल महोगनी, आम और बरगद के पेड़ों से ढके हुए हैं, जो इसे प्राकृतिक चमत्कारों को देखने और आनंद लेने के लिए एक शांतिपूर्ण स्थान बनाते हैं। ईडन गार्डन स्टेडियम कई खेलों की मेजबानी करता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण रूप से यह एक क्रिकेट स्टेडियम है जो नियमित रूप से वनडे, टेस्ट और टी 20 मैचों की मेजबानी करता है।

स्टेडियम का नाम स्वर्ग स्थित ईडन गार्डन्स से लिया गया है। जिस बगीचे में ईश्वर ने आदम-इव को इस आदेश से छोड़ा था कि वहाँ के पेड़ का फल नहीं ख़ाना। वहीं एक शैतान सर्प के रूप में रहता था। जिसने इव को भड़का कर आदम-इव को फल खिला दिया। तब उनमें उन्माद पैदा हुआ और इव गर्भवती हो गई। ओल्ड टेस्टामेंट अर्थात् पुरानी बाइबिल इसे पाप कर्म कहती है और आदम-इव सन्तान से उत्पन्न सारी संतान पाप की संतान होती हैं। जिनके उद्धार हेतु ईसा मसीह देह त्याग द्वारा मानवता का पाप अपने सिर लेकर सलीब पर टंगे थे। यह न्यू टेस्टामेंट याने नई बाइबिल कहती है।

‘ईडन गार्डन’ कोलकाता के सबसे पुराने पार्कों में से एक है, जो स्टेडियम से सटे हिस्से में 1841 में ‘ऑकलैंड सर्कस गार्डन’ नाम से बनाया गया था लेकिन बाद में इसके निर्माताओं ने बाइबल में गार्डन ऑफ़ ईडन से प्रेरित होकर इसे ‘ईडन गार्डन’ में बदल दिया। अंग्रेजों को तब यह पता नहीं था कि इसी गार्डन में फुटबाल खेलने वाला नरेंद्र नाथ दत्त कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़कर शिकागो में उन्हें पाप की संतान कहकर चुनौती देकर विवेकानंद कहलाएगा और आज़ाद हिंदुस्तान का एक आइकॉन होगा। इसी मैदान पर खेलने वाला सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज खड़ी करके अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में रॉस आइलैंड के सामने आज़ादी का पहला परचम लहराएगा। लार्ड मैकॉले सोच रहा था कि अंग्रेज़ी पढ़े लिखे काले हिंदुस्तानी रक्त और देह से भारतीय परंतु दिमाग़ से इनग्लिष्तानी होकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव मज़बूत करेंगे। उसे नहीं पता था कि नई पश्चिमी शिक्षा से प्रेरणा लेकर दिमाग़ से वेदांती हिंदुस्तानी युवा नई सभ्यता की नगरी शिकागो में उनकी चूलें हिला देंगा।   

आज जहाँ ईडन गार्डन है वह स्थान कलकत्ता के एक ज़मींदार बाबू राजचंद्र दास ने हुगली नदी के किनारे अपने सबसे बड़े बागानों में से एक अंग्रेजों को उपहार में दिया था। आयोजन स्थल पर पहला रिकॉर्डेड टेस्ट 1934 में इंग्लैंड और भारत के बीच, 1987 में भारत और पाकिस्तान के बीच पहला वन डे इंटरनेशनल और 2011 में भारत और इंग्लैंड के बीच पहला टी 20 अंतरराष्ट्रीय मैच आयोजित किया गया था। भारत और दक्षिण अफ्रीका की विशेषता वाला हीरो कप सेमीफाइनल पहला डे / नाइट मैच था। यह वर्तमान में आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स और क्षेत्रीय बंगाल क्रिकेट टीम का घरेलू मैदान है। जिसे 1864 में गवर्नर- जनरल ऑकलैंड द्वारा स्थापित किया गया था।  50 एकड़ में फैले इस क्रिकेट स्टेडियम में लगभग 66,349 लोगों के बैठने की क्षमता है और यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। जब हम स्टेडियम के गेट पर पहुँचे तो चौकीदार बोला आज बंद है। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की बैठक चल रही है। उसने हमें गेट के थोड़ा भीतर झांकने भर दिया।

शुरुआत में ईड़न गार्डन में भारतीयों को प्रवेश अनुमत नहीं था। परंतु भारतीय सिपॉय फुटबॉल खूब खेलने लगे थे। उनमें पढ़ेलिखे हिंदुओं की संख्या अधिक थी। क्योंकि मुसलमान नेताओं ने नई पश्चिमी शिक्षा का शुरू में विरोध किया था। हिंदुस्तानियों के लिए फुटबॉल मैदान की माँग उठी तो ईड़न गार्डन के सामने ही मोहन बागान मैदान बनाया गया। मोहन बागान एथलेटिक क्लब 15 अगस्त 1889 को स्थापित किया गया था। इसे एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल क्लब होने का गौरव भी प्राप्त है। यह फुटबॉल टीम अपनी स्थापना के बाद से ही सफल रही है। इसने भारत के सबसे सफल क्लबों में से एक के रूप में अपनी स्थिति को बनाए रखा है। इसने राष्ट्रीय महत्व की कई ट्राफियां जीती है जैसे- फेडरेशन कप, डूरंड कप, नेशनल फुटबॉल लीग और कोलकाता प्रीमियर डिवीजन। मोहन बागान किसी यूरोपीय टीम को हराने वाली पहली भारतीय टीम थी, जब उन्होने 1911 में ईस्ट यॉर्कशायर रेजीमेंट को हराया था।

अंग्रेजों की फ़ूट डालो राज करो की नीति के चलते मोहन बाग़ान के सामने ही मोहमडन स्पोर्टिंग क्लब स्थापित कर दिया गया। शुरू में खान बहादुर अमीनुल इस्लाम की पहल पर 1887 में जुबली क्लब नामक एक क्लब की स्थापना की गई, जिसे बाद में क्रिसेंट क्लब और फिर हमीदिया क्लब में बदल दिया गया। अमीनुल इस्लाम ने क्लब में सुधार किया और कलकत्ता में रहने वाले बंगाली मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 1891 में इसका नाम मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब रखा। क्लब ने अपनी नींव के बाद कई स्थानीय टूर्नामेंटों में भाग लिया, लेकिन 1902, 1906 और 1909 में कूच बिहार कप जीतने के बाद ही प्रकाश में आया। इस तरह हम तीन खेल के मैदान देख कर गंगा किनारे प्रिंसेस घाट की तरफ़ चल दिये।

 प्रिंसेप घाट

प्रिंसेप घाट ब्रिटिश राज के दौरान कलकत्ता में हुगली नदी के किनारे सन 1841 में निर्मित हुआ था। सन 1843 में प्रख्यात आंग्ल-भारतीय विद्वान और पुरातत्वविद जेम्स प्रिंसेप की स्मृति में डब्ल्यू फ़िट्ज़ेराल्ड ने गंगा किनारे एक पलैडियाई ओसारे (पोर्च) का निर्माण कर उसे प्रिंसेप घाट नाम दिया। हमने प्रिंसेप की सम्राट अशोक के इतिहास की खोज विषयक किताब पढ़ी थी। जेम्स प्रिंसेप मौर्य क़ालीन भारतीयों के इतिहास की खोज के हिसाब से एक महत्वपूर्ण पुरातत्व विद्वान थे। उन्होंने अशोक के प्रस्तर स्तंभ और लॉट को ना सिर्फ़ खोद निकाला था बल्कि वे उन पर अंकित ब्राह्मी लिपि को भी पढ़ने में सफल रहे। जिसके कारण हम मौर्य क़ालीन इतिहास को ब्योरेवार व्यवस्थित कर पाए। सम्राट अशोक की महानता को समझ सके।

जेम्स प्रिंसेप ईस्ट इण्डिया कम्पनी में एक अधिकारी के पद पर नियुक्त थे। उन्होंने 1838 में सर्वप्रथम ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की। प्रिंसेप को यह जानकारी प्राप्त हुई कि अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी (प्रियदर्शी) अर्थात सुन्दर मुखाकृति वाले राजा अशोक का नाम लिखा गया है। कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम सम्राट अशोक भी लिखा हुआ था।

प्रिंसेप घाट के नाम पर एक रेलवे स्टेशन का नाम भी रखा गया है। यह स्टेशन कोलकाता सर्कुलर रेलवे का हिस्सा है जिसका अनुरक्षण पूर्वी रेलवे द्वारा किया जाता है। रेल लाईन पार करके घाट पर जाना होता है जो कि बहुत जोखिम भरा है। टैक्सी से उतर, हम इन विचारों में खोए प्रिंसेप घाट के गेट की तरफ़ कदम बढ़ा रहे थे तभी अचानक एक लोकल ट्रेन के हॉर्न की आवाज पर ठिठक कर रुक गए। ट्रेन सामने से निकल कर थोड़ी दूर जाकर प्रिंसेप घाट स्टेशन पर खड़ी हो गई। तब पता चला कि ब्रिटिश युग में कलकत्ता में आजकल की मेट्रो की जगह सड़कों के बीच से धीरे-धीरे ट्रामवे पर ट्राम चला करती थी। अंग्रेज अधिकारी हाथ में छतरी और सिर पर टोप लगाए ट्राम के रोमांटिक यात्री हुआ करते थे। अब ट्राम तो बंद हो गई लेकिन एक चक्राकार सड़क को सर्कुलर ट्रैक बना उस पर लोकल ट्रेन दौड़ती है। हम उसी से टकराते बचे।

फोर्ट विलियम के वाटर गेट और सेंट जॉर्ज गेट के बीच स्थित प्रिंसेप के इस स्मारक में यूनानी और गोथिक शैली का प्रयोग किया गया है। निर्माण के प्रारंभिक वर्षों में, सभी शाही ब्रिटिश मुहासिरे जहाजों में चढ़ने और उतरने के लिए प्रिंसेप घाट का इस्तेमाल किया करते थे। गंगा इस घाट को घेरकर बहती है। इस समय दोनों किनारों तक लबालब भरी है। नौका विहार की सौदेबाज़ी होते दिख रही है।

प्रिंसेप घाट कोलकाता के सबसे पुराने मनोरंजन स्थलों में से एक है। सप्ताहांत में लोग शाम के समय यहाँ नदी में नौका विहार करने, नदी किनारे टहलने और यहाँ मिलते स्नैक का आनन्द उठाने के लिए आते हैं। शनिवार का दिन था, सप्ताहांत का जुनून सिर चढ़कर बोल रहा था। हमें कई प्रेमी युगल भड़कीले परिधानों में तोता-मैना की तरह चौंच लड़ाते दिखे। कुछ लड़कियाँ साथियों के साथ सिगरेट के छल्ले निकालती दिखीं। वहीं कुछ युगल जोड़े कोल्ड ड्रिंक में कुछ और मिला नशीला बनाकर झूम रहे थे।

यहाँ स्थित एक आइसक्रीम और फास्ट फूड स्टाल तो पिछले 40 से भी अधिक सालों से चल रहा है। प्रिंसेप घाट और बाबुघाट के बीच के 2 किलोमीटर लम्बे सौन्दर्यीकृत नदीतट का उद्घाटन 24 मई 2012 को किया गया। यहाँ पर रोशनी से जगमगाते सुंदर बगीचे, रास्ते, फव्वारे और पुनर्निर्मित घाट स्थित हैं। हिन्दी फिल्म परिणीता के एक गाने को यहाँ फिल्माया गया था।

यहाँ पास ही मैन-ओ-वार नाम की एक जेट्टी भी है जो कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के अंतर्गत आती है और बंदरगाह द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध में निभाई गयी इसकी भूमिका की याद दिलाती है। घाट को मुख्य रूप से भारतीय नौसेना द्वारा प्रयोग किया जाता है। यहाँ से दूर हावड़ा ब्रिज दिख रहा है, नज़दीक में भी एक नया सेतु बन गया है।

हावड़ा ब्रिज

टैक्सी में बैठकर जैसे-जैसे हावड़ा ब्रिज की तरफ़ बढ़ रहे थे, तब 1958 में बनी शक्ति सामंत की एक सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म हावड़ा ब्रिज की रील दिमाग़ में घूमने लगी। जिसका एक गीत कलकत्ता की अंधेरी सड़क पर ताँगा में फ़िल्माया गया था। बैकग्राउंड में लाल रंग के अक्षरों में कोकोकोला का बोर्ड चमक रहा है। जिसमें 47 साल के अशोक कुमार 25 साल की मधुबाला की शोख़ चंचल अदाओं पर फ़िदा होकर बड़ी ख़ूबसूरती से उसका स्कार्फ निकाल उसके हुस्न को दर्शकों के सामने बेपर्दा कर देते हैं। मधुबाला गा रही है “ये क्या कर डाला तूने ये दिल तेरा हो गया।” क्लार्क रोड से शुरू हुआ गीत हावड़ा ब्रिज के नीचे से गुज़रती नैया पर समाप्त होता है। उसी फ़िल्म के एक और गीत ने करोड़ों को मधुबाला का दीवाना बनाया था और अभी तक बना रहा है “आइये मेहरबाँ बैठिए जाने जाँ”, जिसमें अशोक कुमार की सिगरेट से निकलते छल्लों के बीच के.एन.सिंह की बोलती आँखों का रहस्य और गोल चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान लिए धुमाल के सिगार से उठते धुएँ में फ़िल्म के कई रहस्य नुमाया हो रहे हैं। सीढ़ियों से उतरती मधुबाला की दिलकश अदाओं पर आशा भोंसले की मादक मुरकियों का जादू दर्शक को बांध रखने में कामयाब है। घर की बैठक में जब तक दर्शक होश में आता है तब तक उसकी गर्म कॉफ़ी कोल्ड कॉफी में तब्दील हो चुकी होती है। हावड़ा ब्रिज तब भी एक रोमांटिक पहचान हुआ करता था और आज भी रोमांस के लिए चाँदनी रात में हावड़ा ब्रिज के नीचे नौका विहार प्रेमियों की पहली पसंद है।

मौजूदा हावड़ा नगर का ज्ञात इतिहास हवड़ा जनपद में स्थित प्राचीन बंगाली राज्य भुरशुट से जुड़ा है।  जिसका शासन प्राचीन काल से 15वीं शताब्दी तक, हावड़ा जिला और हुगली ज़िला के क्षेत्र में फैला था। सन 1569-75 में भारत भ्रमण पर आए वेनिस के एक भ्रमणकर्ता सेज़र फ़ेडरीची ने अपने भारत दौरे की दैनिकी में 1578 ई में बुट्टोर (Buttor) नामक एक जगह का वर्णन किया था। उनके विवरण के अनुसार वह एक ऐसा स्थान था जहाँ बहुत बड़े जहाज भी यात्रा लंगर डाल सकते थे।

सन 1713 मैं औरंगज़ेब के पोते बादशाह फर्रुख़शियार के राजतिलक के मौक़े पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मुग़ल दरबार में एक प्रतिनिधिमण्डल भेजा था, जिसका उद्देश्य हुगली नदी के पूर्व के 34 और पश्चिम के पाँच गाँव: सलकिया (Salica), हरिराह (Harirah अथवा हावड़ा), कसुंडी (Cassundea) बातोर (battar) और रामकृष्णपुर (Ramkrishnopoor) को मुगलों से लीज पर लेना था। शहंशाह ने केवल पूर्व के 34 गाँवों पर सन्धि की। कम्पनी के पुराने दस्तावेजों में इन गाँवों का उल्लेख है। आज ये सारे गाँव हावड़ा शहर के क्षेत्र और उपनगर हैं।

सन 1854 में हावड़ा जंक्शन रेलवे स्टेशन बना, और उसी के साथ शुरू हुआ हावड़ा नगर का औद्यौगिक विकास, जिसने शहर को कलकत्ता के एक आम से उपनगर को भारतवर्ष का एक महत्वपूर्ण औद्यौगिक केन्द्र बना दिया। धीरे-धीरे हावड़ा के क्षेत्र में कई प्रकार के छोटे, मध्य और भारी प्रौद्यौगिक उद्योग खुल गए। यह विकास दूसरे विश्व युद्ध तक जारी रहा जिसका नतीजा हुआ, नगर का हर दिशा में बहुमुखी विस्तार। इस प्रकार के औद्यौगिक विस्फोट का एक पहलू उत्तर प्रदेश और बिहार से अत्यन्त अप्रवासन और उस से पैदा हुआ नगर का अनियमित विस्तार भी था। अब हावड़ा एक भीड़ भरा नगर है।

जैसे बॉम्बे में सुबह भीड़ का रुख़ उत्तर पश्चिम से दक्षिण मुंबई की तरफ़ होता है, वैसे ही हुगली के पश्चिमी तरफ़ बसे हावड़ा वासियों को हावड़ा ब्रिज से कलकत्ता की ओर भागते देखा जा सकता है। शाम को यह रुख़ पलट जाता है। कोलकाता की एक पहचान हावड़ा ब्रिज आइकॉन हुगली नदी पर बना है, जो दुनिया के सबसे लंबे कैंटिलीवर पुलों में से एक है। हावड़ा ब्रिज को रवीन्द्र सेतु के रूप में भी जाना जाता है, जो हावड़ा और कोलकाता को जोड़ता है। हुगली नदी पर निर्मित हावड़ा ब्रिज लगभग 1500 फीट लम्बा और 71 फीट चौड़ा है। हावड़ा ब्रिज यातायात परिवहन के साथ-साथ, कोलकाता के सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है। जो अपनी अद्वितीय सुन्दरता के कारण कई हजारों पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। शाम और रात के समय हावड़ा ब्रिज की अविश्वसनीय सुन्दरता को देखा जा सकता है। तेज बारिश के साये में हावड़ा ब्रिज पर खड़े होकर बादलों से रिमझिम बरसती बूँदों और हुगली का रोमांस देखते ही बनता है।

हमने ड्राइवर से कहा हावड़ा ब्रिज का बंगाली में वर्णन करो। उसने कहा “ई ब्रिज हुगली नदी पर बनल चार गो पुल सभ में से एक हवे आ। कलकत्ता आ पच्छिम बंगाल के निशानी के रूप में जानल-मानल जाला। एकरे अलावा अउरी ब्रिज बाड़ें विद्यासागर सेतु, विवेकानंद सेतु, आ सभसे हाल में बनल निवेदिता सेतु। हावड़ा ब्रिज बंगाल के खाड़ी से आवे वाला तूफ़ान के सामना करत रोज करीबन एक लक्ख गाड़ी सभ के ट्रैफिक आ लगभग डेढ़ लक्ख पैदल आवाजाही सम्हारे ला। आ एकरा चलते ई दुनियाँ के सभसे ब्यस्त कैंटीलिवर ब्रिज हवे। बने के समय अपना किसिम के, दुनियाँ के तिसरा नंबर के रहल ई ब्रिज पूरा दुनिया में, अब अइसन छठवाँ सभसे बड़ ब्रिज हवे।” मीठी जुबान से मिष्ठु बोल कानों में घोलते विक्टोरिया तरफ़ रूख किया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-७ – कोलकाता ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-७ – कोलकाता ☆ श्री सुरेश पटवा ?

17 जून 2023 की रात कलकत्ता में गुज़ारी। किसी समय कलकत्ता भारत का सबसे बड़ा शहर था। अब दिल्ली और मुंबई के बाद तीसरे नंबर पर है। दुनिया का 16वाँ सबसे बड़ा महानगर है। अंग्रेजों की यह भारतीय राजधानी सबसे पहला मेट्रोपोलिस नगर था। अंग्रेजों के ज़माने से कोलकाता एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई है। कोलकाता के बसने की भी एक कहानी है। जॉब चारनाक नाम का एक बाईस वर्षीय अंग्रेज़ अपने साथियों के साथ पटना में गंगा के किनारे घूम रहा था। वह कुछ दिन पहले ही अंग्रेज़ों की क़ासिम बाज़ार कोठी  से तबादले पर पटना आया था। गठीले बदन में उमंग, उत्साह, ऊर्जा और तेज़ दिमाग़ में तैरते सपने लेकर इंग्लैंड से भारत पहुँचा था। अक्सर दोपहर का खाना खाने के बाद आराम करने के बजाय वह गंगा किनारे घूमने निकल जाता। उस रोज़ घूमते हुए गंगा घाट पर जहाँ सोन नदी गंगा से मिलती है उस तरफ़ चला गया।

 उसने देखा एक जगह बहुत तेज़ आग जल रही है, लोग आग को घेर कर खड़े हैं। वह कौतूहलवश वहाँ पहुँचा। आग में से चिढ़-चिढ़ की आवाज़ निकल रही है। अभ्रक के साथ घी मिश्रित चरबी जलने की गंध फैली हुई थी। हिंदू वहाँ दाह-संस्कार कर रहे हैं।  बाजु में एक और शव रखा हुआ है। यह पहला अवसर था जब वह आदमी के शव को जलता हुआ देख रहा था। वहीं एक लकड़ी पर बैठ गया। लकड़ियों के ढेर पर शव रखा गया। कुछ लोग कंडे और घास-पूस लकड़ियों के बीच में ख़ाली जगहों में फँसा रहे थे।

उसमें जब लगभग आग लगाई जाने लगी तब एक सोलह-सत्रह साल की दुल्हन सी सजी लड़की को चार लोग पकड़ कर चिता के सामने लाए। गोरी चिटटी लड़की नख-शिख ऋंगार में थी। सामने जलती चिता के प्रकाश से उसका गोरा सौन्दर्य रक्ताभ लालिमा से दमक रहा था। बंगाली रिवाज के मुताबिक़ उसकी माँग में ख़ूब गहरा लाल सिंदूर भरा था। ऐसी लग रही थी मानो वह अभी-अभी शादी के मंडप से उठकर आई है। कुछ लोग उसे उसके बूढ़े मृत पति के शव के साथ चिता में ज़िंदा जलाने की ज़िद पर अड़े थे परंतु वह  तैयार नहीं थी। वह दो साल से अपने धनाढ़्य बुज़ुर्ग लकवा ग्रस्त पति की सेवा करती रही थी लेकिन अंततः वह काल कवलित हो गया था। लोग उसे ज़बरदस्ती चिता की तरफ़ धकेल रहे थे। उसकी आँखों के आँसुओं में चिता की अग्नि के दहन का प्रतिबिम्बित दृश्य चमक रहा था। वह बेचारी पूरी ताक़त से अपने आप को पीछे खींचे हुए कमान सी बनी हुई थी। लोग उसके दोनो हाथ पकड़कर खींच रहे थे। वह ज़मीन पर बैठ गई तो लोग उसे चिता की तरफ़ घसीटने लगे। जॉब चार्नाक का हृदय दहल गया। उसका धैर्य का बाँध टूट गया। उससे रहा नहीं गया। उसने अपने साथियों की मदद से लड़की को ज़िंदा जलाए जाने से बचाया। लोग दाह संस्कार करके चले गए वह लड़की और जॉब वहीं खड़े रहे। उस लड़की का नाम था लीलावती।

जॉब लीलावती को अपने गोल झोंपड़े में ले गया। उसने बंगाली सौंदर्य की इतनी ख़ूबसूरत दुल्हन कभी इतने नज़दीक से नहीं देखी थी। वह उसे अपलक देखता रह गया। उसने लीलावती को खाना-पानी दिया। तब तक रात घिरने लगी थी। वे दोनों कमरे के दो कोने पकड़ कर सो गए। सुबह जॉब की नींद खुली तो उसने देखा अट्ठारह वर्षीय नवयौवना का चेहरा सुबह की लालिमा से चमक  रहा था। उसका साड़ी का पल्लू खसक कर नीचे आ गया था। जिससे उसके वक्षों का उभार साँसों के साथ उठता-बैठता नज़र आ रहा था। जॉब उसे लगातार देखे जा रहा था। उसकी साँसें भी उसके सीने में धौंकनी की तरह चलने लगीं। आग और इंधन साथ हो तो आग भड़कनी स्वाभाविक बात है। उससे रहा नहीं गया, वह उठकर लीलावती के पास गया। उसने अपने ओंठ लीलावती के माथे पर रखे ही थे कि वह चौंकी और उसने जॉब को अपनी बाहों में कस लिया। जब लीलावती नींद की ख़ुमारी से होश में आई, ध्यान से जॉब को देखा तो उसे परे ढकेल दिया लेकिन दो दिलों में प्रेम का अंकुर फूट चुका था। युवा अवस्था में यदि काम दंश मन को भेद जाए तो एक दूसरे के मिलन के बग़ैर जीना दूभर हो जाता है। जॉब बंगाली कामिनी की गुदाज देह से आती मत्स्यगंधा सुगंध के वशीभूत था और लीलावती जॉब की सुपुष्ट देहयष्टी पर मुग्ध हो चुकी थी।

उस समय भारतीय समाज में विधवा होना एक अभिशाप होता था। विधवा का भगवान भी सहारा नहीं होता था। हालाँकि उसके घर परिवार के अधेड़ लोग उसे सहारा देने के नाम पर उसके दैहिक शोषण हेतु खड़े हो जाते थे, कुछ हाज़िर में और कुछ प्रतीक्षा में, हिंदू मान्यताओं के अनुसार वह दूसरा विवाह भी नहीं कर सकती थी। विधवा यदि पति के साथ अग्नि में सती न हो तो उसको अभिशापित मान कर घर से निकाल दिया जाता था। ऐसी युवा विधवाएँ काशी के विभिन्न घाटों पर स्वयंभू स्वामियों की सेवा में दैहिक शोषण के लिए पहुँचा दी जातीं थीं। जॉब ने लीलावती से से शादी कर ली, उनकी तीन पुत्रियाँ हुईं। कलकत्ता के सेंट जॉन गिरजाघर के प्रांगण में जॉब और लीलावती की क़ब्र हैं, हो भी क्यों न, क्योंकि जॉब चारनाक वही व्यक्ति है जिसने कलकत्ता नगर की नींव रखी थी। बस, उसने हुगली किनारे बसा दिया एक नगर कोलीकाता जो कि 1775 से 1912 तक अंग्रेज़ों के भारतीय उपनिवेश की राजधानी रहा अर्थात् भारत को  ग़ुलाम बनाने की नीतियों, कूटनीतियों, षड्यंत्रों और चालों का चश्मदीद गवाह। बंगाली उसे बुलाते थे कोलिकाता, कोलि याने काली चूना और काता याने अंचल या इलाक़ा, इस प्रकार काले चूने का इलाक़ा हुआ कोलिकाता याने कलकत्ता। वहाँ चूने की आढत के ठिए और कारख़ाना थे, समंदर गहरा होने से जहाज़ों के लंगर के अनुकूल बंदरगाह की सम्भावना थी। कलकत्ता बसना शुरू ही गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

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*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-६ – गंगासागर से कलकत्ता ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-६ – गंगासागर से कलकत्ता ☆ श्री सुरेश पटवा ?

 

आज 17 जून 2023 को वापसी यात्रा आरम्भ होना है। जिस ऑटो से आए थे। उसके चालक का फ़ोन नंबर ले लिया था। उसे फ़ोन किया तो नौ बजे होटल के दरवाज़े पर ऑटो आ खड़ा हुआ। गंगा सागर से काचुबेरिया जेट्टी तक 32 किलोमीटर फिर वही नज़ारा, हर घर के सामने घनी हरियाली की गोद में एक पोखर, मुर्गियाँ, बदक और बकरियों के झुंड। ममता दीदी ने लड़कियों को साइकिल दी है। वे साइकिलों पर सरपट स्कूल जा रही हैं। दूध वाले, सब्ज़ी वाले और अख़बार के हाकर पसीना बहा रहे हैं। ऑटो जेट्टी की तरफ़ भाग रहे हैं। दस बजने को पाँच मिनट पहले जेट्टी पहुँचे। फेरी रवाना होने को तैयार थी। फटाफट टिकट लिए और फेरी में सवार हुए ही थे कि वह चल दी। चालीस मिनट में कॉकद्वीप पहुँच कर टैक्सी से कोलकाता रवाना होना है। जेट्टी में बढ़वानी जिले से तीर्थ भ्रमण योजना अन्तर्गत छत्तीस लोगों का एक समूह है। उनके बीच पाकर लगा कि महेश्वर में नर्मदा पार कर रहे हैं। आज धूप नहीं है। आसमान बादलों से मढ़ा है। ठंडी हवा बह रही है। सामने मस्त लहरों का मनमोहक लास्य है। फेरी में बैठते ही एक लड़का एकतारा पर गाने लगा।

 सुन मेरे बंधु रे””””””””””

सुन मेरे मितवा “”””””””

सुन मेरे सा ॰॰॰॰॰॰॰॰थी रे

सचिन बर्मन की आवाज़ कानो में गूँजने लगी।

गीत को गुनगुनाते-गुनगुनाते ………गाने लगे। जब लय मिल गई तो लम्बी तान खींची””””” सुन मेरे बंधु रे”””””””””” सुन मेरे मितवा “” सुन मेरे सा ……थी रे”””” फिर पूरा गाना गाया। नाव में मौजूद यात्रियों ने देर तक तालियाँ बज़ाईं। मुखड़े से अंतरे पर उतरे। थोड़ा लड़खड़ा कर संभल गए। फिर तो ब्रह्मरांध्र से आनंद अमृत रिसने लगा।

होता तू पीपल, मैं होती अमर लता तेरी

तेरे गले माला बन के पड़ी मुस्काती रे

सुन मेरे सा ……थी रे”””” 

 

जिया कहे तू सागर, मैं होती तेरी नदिया

लहर बहर करती, अपने पिया से मिल जाती रे 

सुन मेरे सा ……थी रे”””” 

आप अगर इस गीत का आनंद लेना चाहते हैं तो मोबाईल पर इस गीत को सुन कर आगे बढ़िए। टेक्नोलॉजी ने क्या ग़ज़ब किया, मुट्ठी में आनंद थमा दिया। इस गीत में प्रेमिका की जगह अपनी “आत्मा” को रखिए और पिया की जगह “परब्रह्म” को। इसे फिर से सुनिए। मौत हसीना लगने लगेगी। इसके पहले की महबूबा की आहट आए, कॉकद्वीप जेट्टी आ गया। जेट्टी (jetty) ऐसे ढांचे को कहते हैं जो किसी जलाश्य में धरती के निकले हुए भाग पर बना हो। यह मूल रूप से फ़्रान्सीसी भाषा के “जेते” (jetée) शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ “फेंका हुआ” होता है। किनारे पहुँचने पर नाव को स्थिर करने हेतु रस्सियाँ फेंक कर बाँधी जाती हैं। जेटियाँ अक्सर नौकाओं को समुद्र की थपेड़ों और तेज़ हवाओं से सुरक्षित रखने के लिये बनाई जाती हैं। फेरी ने लंगर डाला और हम पार लग गए। इस एक जेट्टी से उस पार दूसरी जेट्टी कई फेरे लगाने से इनका नाम फेरी पड़ गया है।

टैक्सी ड्राइवर मनोज साहा को फ़ोन करके बुला लिया। वापसी यात्रा का अगला पड़ाव कोलकाता है। रास्ते में बेलपुकुर गाँव में एक मिठाई की दुकान पर रुक वहाँ मिष्ठु मलाई चाप और संदेश चखा। वहाँ “ओ रे माँझी” गीत बज रहा था। उसके बाद मन की सुई ओ रे माझी गीत पर अटक गई।

ओ रे माँझी ……… ओ रे माँझी ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

ओ ओ मेरे माँझी

 

मेरे साजन हैं उस पार,

मैं मन मार, हूँ इस पार

ओ मेरे माँझी, अबकी बार,

ले चल पार, ले चल पार

मेरे साजन हैं उस पार…

यह गीत मोबाइल पर वाईफ़ाई से टैक्सी के स्पीकर पर सेट कर दिया। फिर आनंद स्रोत खुल गए । इसमें भी “राधा” और “कृष्ण” के आत्मा और परमात्मा रूपक निराले मिलन दृश्य मस्तिष्क की स्क्रीन पर उभरने लगे। इसमें हक़ीक़ी और मज़ाज़ी दोनों रस हैं। ये अमर गीत है।

मत खेल जल जाएगी (तृष्णा),

कहती है आग मेरे मन की

मैं बंदिनी (राधा-आत्मा) पिया (कृष्ण-परमात्मा) की चिर संगिनी हूँ साजन की

मेरा खींचती है आँचल मन मीत तेरी हर पुकार

मेरे साजन हैं उस पार

ओ रे माँझी (काल) ……… ओ रे माँझी.… ओ ओ मेरे माँझी

ले चल पार॰॰॰॰अब की बार॰॰॰ले चल पार।

जल की बहुलता से बंगाल में नाव और माँझी लोक कलाओं के जीवंत पात्र हैं। बंगाली माटी के संगीतज्ञ सचिन देव बर्मन ने शास्त्रीय, रवींद्र और लोक धुनों को मिलाकर जादू रचा है। उनके जादू पर मोहित होकर मराठी मास्टर रमेश तेंदुलकर ने जादुई बेटे का नाम सचिन तेंदुलकर रखा था।

बंगाल संस्कृति की तरह बंगाली भाषा भी एशिया में सबसे विकसित सांस्कृतिक भाषा परंपराओं में से एक है। प्राचीन संस्कृत और मगधी प्राकृत की वंशज बंगाली भाषा पाल और सेन राजवंश के शासन में हिंदी से पहले लगभग 1000-1200 ईस्वी तक विकसित हुई।  यह अरबी और फारसी के प्रभाव को अवशोषित कर बंगाल में सल्तनत काल की भी एक आधिकारिक अदालती भाषा बन गई थी।

हमारी यात्रा के दौरान बंगाल में पंचायत चुनाव का माहौल है। उपद्रव आगजनी हत्यारों का दौर चल रहा है। डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच उपद्रव की खबरें हैं। इसलिए ड्राइवर ने शॉर्टकट लेने के चक्कर में गाड़ी को अत्यंत घने ग्रामीण इलाक़े से गुज़रने वाले रास्ते पर उतार दी। रास्ते पर ग्रामीण बंगाली जीवन के दर्शन होने लगे। बीच में एक बड़ा सरोवर है। उसके चारों तरफ़ झोपड़ीनुमा कच्चे घर हैं। घर के दरवाज़े से चार-पाँच कच्ची सीढ़ियाँ उतरते ही निस्तार हेतु सरोवर का पानी मिल जाता है। बंगाली नारियाँ साड़ी कटि में खौंस बच्चों को नहला रही हैं। घर के भीतर ही मुर्गियाँ और बकरियां खुली घूम रही हैं। यहाँ एक-दो प्रतिशत हिंदू छोड़कर पूरी आबादी मुस्लिम है। लेकिन कभी दंगे या धर्म परिवर्तन की घटनाएँ नहीं हुईं। इसके दो कारण बताए जाते हैं। एक तो बंगाली मुसलमान शान्तिप्रिय होते हैं। दूसरा यहाँ उपद्रवी बिहारी मुसलमान नेताओं की पैठ नहीं है। स्थानीय लोग मुसलमान होकर भी उनकी संस्कृति हिंदू ही है।   

बंगाली भाषा ने मध्य काल में 16वीं और 17वीं  शताब्दी में धर्म निरपेक्ष साहित्य का विकास किया। यह  भाषा अराकान (छंद) में भी बोली जाती थी। बंगाली पुनर्जागरण के दौरान कलकत्ता में 19वीं और 20वीं सदी में भाषा का आधुनिक मानकीकृत रूप विकसित हुआ आनंद मठ के रचयिता बंकिम चंद चट्टोपाध्याय जैसे महान साहित्यकार हुए। रवींद्रनाथ टैगोर 1913 में “गीतांजली” के लिए साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर-यूरोपीय भारतीय साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता बने। ऋत्विक घटक ने टैगोर के बारे में कहा, “उस व्यक्ति ने मेरे जन्म से काफी पहले मेरी समस्त भावनाओं को दुर्बल कर दिया … मैं उन्हें पढ़ता हूँ और पाता हूं कि …मेरे पास कहने के लिए कुछ भी नया नहीं है।” ऋत्विक घटक ने अपनी फ़िल्मों मेघे ढाका तारा (बादलों से आच्छादित सितारा) और सुवर्ण रेखा में बंगाल-विभाजन के बाद की मार्मिकता को व्यक्त करने के लिए रवींद्रसंगीत का उपयोग किया है।

1941 में टैगोर की मृत्यु हो गई लेकिन उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। अपने गीतों में, उन्होंने कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया गया है। मानवीय प्यार (प्रेम) सृष्टिकर्त्ता के प्रति समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान (गीतों का बगीचा) के रूप में जाना जाता है। इस पुस्तक के चार प्रमुख हिस्से हैं- पूजा (पूजा), प्रेम (प्यार), प्रकृति (प्रकृति) और बिचित्रा (विविध)। हालांकि, कई गीतों में यह वर्गीकरण भेद पिघल जाता है। बारिश से सम्बंधित एक गीत प्रेमी के लिए तड़प दर्शाता है। एक प्रेम गीत सृष्टिकर्त्ता के लिए प्रेम में बदल सकता है। उनका एक गीत है- “तुम मेरे गीत से परे खड़े हो। मेरे स्वरों की ध्वनि तुम्हारे चरणों तक पहुंचती है लेकिन मैं तुम तक नहीं पहुंच पाता।”

बंगाल कई चीजों के लिए प्रसिद्ध है, और उनमें सबसे महत्वपूर्ण है मुंह में पानी लाने वाले रसगुल्ला, चोमचोम और रसमलाई, सुपर स्वादिष्ट सोरशे इलिश और चिंगरी माचेर, मलाई करी अत्यधिक चलन में है।  इस क्षेत्र की सबसे पसंदीदा मछलियों में हिलसा या इलिश फिश करी को बहुत पसंद किया जाता है। यह तीखी महक वाली करी कलौंजी और मिर्च से तैयार की जाती है। आलू के व्यंजन को बनाने के अलग-अलग तरीके हैं, लेकिन यह बंगाली घरों में लोकप्रिय बना हुआ है। अगर घर में और कुछ नहीं है तो आलू हमेशा रहता है। इस को कई अलग-अलग मसालों के साथ कई अलग-अलग तरीकों से तैयार किया जाता है। यह आमतौर पर लूची के साथ खाया जाता है, जो एक अन्य बंगाली व्यंजन है। मिष्टी दोई एक मीठा दही व्यंजन है जिसे रात के खाने के अंत में परोसा जाता है हालाँकि अब पूरे देश में पसंद किया जाता  है।

बंगाल के उर्दू शायर काजी नजरूल इस्लाम को ब्रिटिश भारत के विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता था। उर्दू पॉलिटिक्स से अनुप्राणित 1905 में बंगाल विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में एक विशिष्ट उर्दू संस्कृति विकसित हुई, जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेश बन गई।

कोलकाता पहुँच कर साल्ट लेक स्टेडियम के गेट नंबर दो के सामने स्वीट एंड सोर रेस्टोरेंट में परम्परा गत बंगाली राइस प्लेट से लंच किया। जिसमें भात, सब्ज़ी, दाल के साथ आम की खट्टी मीठी लौंजी थी। मछली खाने वालों ने मच्छी करी अलग से ऑर्डर कर दी। दमदम में एयरपोर्ट के गेट नंबर तीन के पास एयरपोर्ट सिटी होटल में कमरा बुक करा लिया था। दिन के तीन बजे होटल के कमरे में थे।

शाम को कलकत्ता का प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर मंदिर घूमने गए । दक्षिणेश्वर काली मन्दिर उत्तर कोलकाता में विवेकानन्द सेतु के कोलकाता छोर के निकट हुगली नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर की मुख्य देवी भवतारिणी काली है, जो काली माता ही है। वर्तमान दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण सन 1847 में प्रारम्भ हुआ था। अंग्रेज बंगाल में लगान वसूली हेतु ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर चुके थे। कलेक्टर व्यवस्था 1861 में आनी थी। जान बाजार की ज़मीन्दार, रानी रासमणि को माँ काली ने स्वप्न में आदेश दिया कि शक्ति मंदिर का निर्माण किया जाए। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में स्थित है। जिस टैक्सी से कॉकद्वीप से कलकत्ता पहुँचे थे। उसी से यह भी तय कर लिया था कि वही शाम को दक्षिणेश्वर काली मंदिर दर्शन कराएगा। वह होटल के आसपास रुका रहा। होटल में चेक-इन करके कमरे में आधा घंटा कमर सीधी कर घूमने निकले।

दक्षिणेश्वर काली मन्दिर प्रख्यात दार्शनिक एवं रामकृष्ण मिशन के संस्थापक विश्व पटल पर प्रखर सनातन प्रवक्ता स्वामी विवेकानंद के गुरु हिन्दू नवजागरण के प्रमुख सूत्रधार स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कर्मभूमि रही है। वर्ष 1857-68 की कालावधि में स्वामी रामकृष्ण इस मंदिर के प्रधान पुरोहित रहे। तत्पश्चात उन्होंने इस मन्दिर को ही साधना स्थली बना लिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस से इसका जुड़ाव इस मन्दिर की प्रतिष्ठा और ख्याति का प्रमुख कारण है। मंदिर के मुख्य प्रांगण के उत्तर पश्चिमी कोने में रामकृष्ण परमहंस का कक्ष आज भी उनकी स्मृति के रूप में संरक्षित रखा गया है।

हमने टैक्सी से उतर कर एक रुपया प्रति जोड़ी के हिसाब से स्टैंड पर जूते रखे। फिर एक रुपया प्रति मोबाईल के हिसाब से मोबाईल अभिरक्षा में रख कर काली मंदिर दर्शन की पंक्ति में लग गए। शनिवार का दिन होने से शाम को अधिक भीड़ थी। फिर भी आधा घंटा में दर्शन हो गए। हम एक स्थान पर बैठ कर रामकृष्ण परम हंस की आध्यात्मिक विवेचना और मंदिर निर्माण के इतिहास पर सोचते रहे। किंवदंती है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस को काली माता दर्शन देती थीं। पवन भाई प्रांगण में घूमने निकल लिए। जब वे आधा घंटा नहीं आये तो हम उनको ढूँढने निकले। वे प्रांगण में नहीं मिले तो हम वहाँ से बाहर निकल गंगा नदी किनारे उन्हें देखने पहुँचे। वे वहाँ भी नहीं मिले। गंगा प्रवाहित दिख  गई। अब किसकी ज़रूरत थी।

गंगा दोनों किनारों तक लबालब भरी बह रही थी। उसमें बहाव तेज था पर भरी होने से कम दिख रहा था। ऐसा लगा कि 2400 किलोमीटर चलकर सागर से मिलने के पहले गंगा ठिठक गई है। विचार आया कि हिंदुओं की आस्था की प्रतीक गंगा सदियों से इसी तरह प्रवाहित है। प्रागवौदिक से वैदिक और उत्तरवैदिक युग के बाद उपनिषदीय युग से होती हुई महाकाव्य काल और पौराणिक काल तक की सनातन षठदर्शन सभ्यता की साक्षात प्रतीक यह गंगा मन को आह्लादित कर देती है। आस्थावान हिंदू के हृदय से स्वेमव स्फुरण होता है- हर-हर गंगे।

हमारा बहत्तरवाँ साल चल रहा है। आज से इकहत्तर साल पहले हम नहीं थे और शायद पाँच-दस साल बाद इस नश्वर देह में नहीं होंगे, लेकिन गंगा सदियों से प्रवाहित है और पृथ्वी के अस्तित्व तक प्रवाहित होती रहेगी। मान्यता है कि हमारी आत्मा परमात्मा में विलीन होगी और देह धरा की धूल होकर गंगा की धरोहर होगी। हमारा क्या, सभी का यही अंतिम हश्र है। इस वसुंधरा पर जीव जंतु के प्रथम आगमन या उद्गम से यह परिपाटी अनवरत जारी है। उस समय तक जारी रहेगी जब तक ब्रह्मांड खंड-खंड होकर विखंडित होगा। इस जगत में कुछ भी हमेशा रहने वाला नहीं है। मनुष्य की तरह सूर्य और उसके ग्रहों की भी एक आयु है। मनुष्य की सबसे बड़ी गफ़लत यह है कि वह हरेक चीज को अवचेतन रूप से स्थायी समझता है। जबकि नया बनने के लिए पुराना मिटना अनिवार्यता है। हर कण हर क्षण नया बनने को मिट रहा है। बूँद सागर हो रही है। सागर वाष्पीकरण से आकाश तक उठ रहा है। आकाश धुँध को बूँद-बूँद बादल में बदल रहा है। बादलों को समेट बरस रहा है। यही अनवरत चक्र है। मनुष्य की नियति धुँध से धुँध की यात्रा है। एक धुँध में लिपटा आता है दूसरी धुँध में सिमटा चला जाता है। यही वृतांत है। रवि इस चक्र को चला रहा है। वही चक्र का स्वामी है। उसके ऊपर अंतर्यामी है। सामने भवतारिणी गंगा है। पवन भाई कहीं नहीं दिखे तो हमने टोकन देकर स्टैंड से जूते और मोबाइल उठाए और टैक्सी के नज़दीक पहुँचे ही थे तभी वे सामने से आते दिखे।

गंगा भारत में कुल मिलाकर 2525 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई उत्तराखंड में हिमालय के गंगोत्री हिमनद के गोमुख स्थान से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुन्दरवन तक विशाल भू-भाग को सींचती है। गंगोत्री से ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, काशी और गंगा सागर प्रमुख तीर्थ हैं। आध्यात्मिक एवं भौतिक प्रकृति के अद्भुत संगम भारत के भूलोक को गौरव तथा प्रकृति का पुण्य स्थल कहा गया है। इस भारत-भूमि तथा भारतवासियों में नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार करने का श्रेय गंगा नदी को जाता है। गंगा को भारत की जीवन-रेखा तथा गंगा की कहानी को भारत की कहानी माना जाता है। गंगा की महिमा अपार है। गंगा एक नदी मात्र नहीं बल्कि एक सभ्यता की प्रतीक है। अत: गंगा की शुद्धता के लिए प्राथमिकता से प्रयास किये जाने चाहिए।

प्रयाग, वाराणसी, कोलकाता, कानपुर आदि न जाने कितने औद्योगिक नगर गंगा के तट पर ही बसे हैं। यहाँ लगे छोटे-बड़े कारखानों से बहने वाला रासायनिक प्रदूषित पानी, कचरा आदि गन्दे नालों तथा अन्य मार्गों से आकर गंगा में ही विसर्जित होता है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि सदियों से आध्यात्मिक भावनाओं से अनुप्राणित होकर गंगा की धारा में मृतकों की अस्थियाँ एवं अवशिष्ट राख तो बहाई जा ही रही है, अनेक लावारिस और बच्चों के शव भी बहा दिये जाते हैं। बाढ़ आदि के समय मरे पशु भी धारा में आ मिलते हैं। इन सबने भी गंगा-जल-प्रदूषण की स्थितियाँ पैदा कर दी हैं। गंगा के किनारों और आसपास से वनों का निरन्तर कटाव, वनस्पतियों, औषधीय तत्त्वों का विनाश भी प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

16  जून 2023 को सुबह जल्दी उठकर बैग में सामान लेकर एक टोटो से गंतव्य गंगा के सागर से मिलन स्थल गंगासागर पहुँचे। समुद्र हमेशा की तरह बेचैन होकर मचल रहा था। थोड़ी देर उसे खड़े होकर निहारा। मनुष्य के दिमाग़ में महत्वाकांक्षा के ऊँचे पर्वत होते हैं। उसके दिल की अतल गहराइयों में जीवन की कलात्मक अभिव्यक्तियाँ हाथ-पैर मारती हैं। महत्वाकांक्षी पर्वत तक की यात्रा सफल हो या असफल, जीवन के अंतिम पड़ाव पर मनुष्य दोनों स्थितियों में लद्दाख के उदास और वीरान पहाड़ों से जड़ हो जाते हैं। सागर की तरह गहराइयों में सुप्त बेचैन कामनाएँ लहरें बनकर उदास पहाड़ों से मिलने दौड़ती हैं, लेकिन किनारों से टकरा कर छिन्न भिन्न हो बिखर जाती हैं। प्रत्येक मनुष्य की जन्म से मृत्यु के द्वार तक पहुँचने की यही कहानी है।

महान दार्शनिक ज्याँ पॉ सार्त्र ने Being and Nothingness” पुस्तक में लिखा है, “जब मनुष्य का अंत निराशा और अवसाद में होने लगता है तब उसकी आत्मा में मितली उठती है कि यही बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु पूरे जीवन की कमाई है क्या ?” उन्होंने इस पर एक उपन्यास “नौसिया” लिखा था। 

 यहीं हिंदू दर्शन के पुनर्जन्म सिद्धांत की सार्थकता सिद्ध होती है। मनुष्य इस आशा के साथ बिदा होता है कि उसे फिर लौट कर आना है, लेकिन किसी दूसरे अस्तित्व में। मृत्यु के बाद इस जीवन की सच्चाई बताने वापस आना सम्भव नहीं है। इसी उधेड़बुन में ग़ालिब ने फ़रमाया था-

हम को  मालूम  है जन्नत  की  हक़ीक़त  लेकिन,

दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।

ग़ालिब से छै सौ साल पहले ख़ुसरो मियाँ भी प्रेम के दरिया बहा गए हैं।

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार,

जो उतरे  सो डूब  गए, जो डूबे सो पार।

ईश्वर के प्रेम में उतरना, डूबना, पार लगना एकमेव उपाय है। बचपन में देखी करनी-भरनी दृश्यावली के हिसाब से अपने लिए स्वर्ग में आरक्षित सीट होने से तो रही। नरक में तो परेशानी ही परेशानी है। अभी पिछले महीने ग़ालिब पर उपन्यास लिख कर फ़ुरसत हुए। तब ग़ालिब के कलाम पर सोचते-सोचते एक शेर हम पर भी नाज़िल हुआ था-

मैं ग़ाफ़िल हूँ तो ग़ाफ़िल ही रहने दे होश में लाकर क्यों परेशान करता है।

मुझे मालूम है मरने के बाद तू लोगों को उस जहाँ में भी परेशान करता है।

हम सोचते खड़े थे, तभी एक आदमी बीस रुपये कुर्सी के हिसाब से दो कुर्सियाँ ले आया। हमने एक पर सामान रखा और दूसरे पर बैठ गए। पवन भाई से कहा- आप स्नान कर लीजिए। वे जब तक नहा कर के आए तब तक एक पुरोहित महाशय पधार कर बोले- पूजन करवा लीजिए। जो इच्छा हो वह दक्षिणा देना। हमने स्पष्ट किया एक सौ रुपया देंगे। वह चुप रहा। हमने उससे कहा- सौ रुपया स्वीकार हो तो बोलो। उससे स्वीकृति लेकर पूजन शुरू करवाया। बीच में एक शांत सी महिला शिव और गंगा को चढ़ाने हेतु डुबलिया में दूध ले आई। उससे दस रुपया तय किया। एक पवन भाई को नहलवाने चली आई। पवन भाई को तैरना नहीं आता इसलिए उन्हें उसने किनारे पर ही बाल्टी लोटे से पानी डालकर पचास रुपये से धो दिया।

समुद्र में नहाना आसान नहीं होता है। उस समय तो और भी कठिन है जब ज्वार उठ रहे हों। सभी तीर्थ यात्री किनारे से दूर लोटे से पानी डाल कर नहा रहे थे। जिनको तैराना नहीं आता उन्हें तो दूर रहने में ही समझदारी है। समुद्र में उतरने की तकनीक है। लहरों की तरफ़ पीठ कर दो। यदि ऊँची लहर आये तो बैठ कर डुबकी लगा दो। लहर का सामना करने पर यदि बड़ी लहर आई तो मुँह और नाक में पानी भर जाएगा। जैसे ही आप घबराए तो पैर भी उखड़ जाएँगे। वहीं ख़तरा है। समुद्र भीतर खींच लेगा। फिर फुलाकर किनारे फेंकेगा। अपन तो सोहागपुर की बाढ़ग्रस्त पलकमती नदी में लकड़ियों के बड़े लट्ठ पकड़ते थे। इसलिए गंगा सागर में बहुत अधिक नहीं थोड़े अंदर जाकर आनंद लिया। सोचा गंगा स्नान पर कहा जाता है-

“पार जाए तो पार है, डूब जाए तो पार है।”

ज़िंदगी तो पार लग ही चुकी है, डूब भी गए तो क्या है, आख़िर अस्थियों को यहीं तो आना है। हिट विकेट आउट भी आउट ही होता है और आउट तो हर किसी को होना है। हमेशा क्रीज़ पर खड़े नहीं रह सकते।

जहाँ गंगा जी का पूजन कर रहे थे वह स्थल सागर से क़रीब एक सौ मीटर दूर था परंतु शिवलिंग पर गंगा जल अर्पण के समय गंगा लहर पूजा स्थल पर चली आई। हमें शिवलिंग उठाना पड़ा। साथ वाले कह रहे थे यह चमत्कार है। हमने कहा- यह कोई चमत्कार नहीं ज्वार-भाटा का कमाल है। हमने शिवलिंग तो उठा लिया अब देखते हैं शिव हमें कब उठाते हैं। वैसे हम तैयार हैं। साहित्य के उछाल भरी पिच पर वेटिंग चल रही है। मृत्यु से मुक्त कोई नहीं हो सकता। इसका कोई विधान नहीं है। परंतु मृत्यु का भय समाप्त हो जाय। यही मृत्योर्मुक्षीय है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव   बन्धनान्   मृत्योर्मुक्षीय  मामृतात्।

 पंडित जी ने पूजन आरम्भ किया। उन्होंने मंगलाचरण उच्चारित करना शुरू ही किया था। हमने कहा- पंडित जी, दीप प्रज्वलित कर लें अन्यथा पूजा शास्त्रोक्त नहीं होगी।

 उन्होंने प्रश्नवाचक निगाह से देखा। हमने आगे कहा- पंडित जी, दीपक पंचभूत है। उसमें पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि प्रतिनिधि रूप में उपलब्ध होते हैं।

 वे बोले- महाशय, पृथ्वी पर विराजमान हैं, जल लोटे में है, पवन प्रवाहित है, ऊपर खुला आकाश है। अग्नि भर की कमी है।

 पंडित जी अग्नि न होने से एक और कमी है ?

 क्या ?

 ज्योति स्वरूप प्रदीप्त आत्मा नहीं है। दीपक प्रज्वलित होने से पंचभूत+आत्मा अर्थात् जीव अस्तित्वमान हो जाएगा। शिवांश प्रदीप्त होगा।

उन्होंने थैले में कुछ ढूँढा, मिला नहीं।

हमने कहा- पंडित जी, अगरबत्ती है तो जला लीजिए वह भी अग्नि है। 

उन्होंने अगरबत्ती जलाकर रेत में खोंस दी।

मंगलाचरण और गंगा अवतरण सूक्त पढ़ने के बाद उन्होंने कहा- वैतरणी पार करने हेतु गाय दान का संकल्प लीजिए।

हमने कहा – क्या करना होगा।

पंडित जी – सिर्फ़ ग्यारह हज़ार दक्षिणा देनी होगी। बाक़ी हम कर देंगे।   

हमने मना कर दिया।

पंडित जी – ग्यारह ब्राह्मण भोज संकल्प लीजिएगा?

हमने ना की मुद्रा में सिर वाम दिशा दे दक्षिण दिशा घुमा दिया।

इस तरह पूजन से फ़ुरसत हुए ही थे, तभी एक दुकानदार प्लास्टिक थैली में चावल लेकर आया और बोला ये बेचारे भिखारी बैठे हैं, इनको दान कर दीजिए। पचास ग्राम प्लास्टिक थैली की क़ीमत पंद्रह रुपये थी। हमने ध्यान से देखा तो बीस भिखारी एक क़तार में बैठे थे। यानी बीस थैली तीन सौ रुपयों की होगीं। लेकिन थोड़ी दूर पर बीस-पच्चीस और खड़े थे। हमारे द्वारा चावल थैली ख़रीदारी करते ही, वे भी झूम पड़ते। पवन भाई ने एक भिखारी से पूछा- इन्हें आप लेकर क्या करोगे ?

वह बोला- साहब, दुकानदार पंद्रह रुपये में आपको बेचेगा फिर पाँच रुपये हमको देकर पैकेट हमसे वापिस ले लेगा। हमने उसी खबरी भिखारी को दस रुपये देकर हाथ जोड़ लिए।

पिताजी जी की अस्थि को गंगा सागर में प्रवाहित करने के बाद एक और कलाम ख़ुराफ़ाती दिमाग़ की पोरों से निकल बरास्ते ज़ुबान साहिल पर मचलती लहरों पर सवार हो गया।

प्रभु मेरी ये फरियाद आकर तेरी चौखट पर नहीं नजायज़ है,

तसल्ली जब तलक दिल में ना हो तेरा हुक्मे कूच नाजायज़ है।

 *

लेकर तेरा नाम हम पी चुके भरकर जाम ए ज़म ज़िंदगी का,

हुक्मे हुज़ूरी अब चल भी दिए हुज़ुर के ज़ानिब जायज़ है।

 हमने गंगा सागर तीर्थ का तय उद्देश्य प्राप्त कर लिया था। सुबह बहुत जल्दी गंगा सागर किनारे चले गए थे। स्नान-ध्यान पूजा-पाठ दर्शन-प्रदर्शन के बाद खींच कर भूख लगी थी। होटल लौटकर नाश्ता निपटाया, एक हल्की नींद निकाली। उसके बाद वातानुकूलित वातावरण में गंगा की उत्पत्ति, श्राप और मुक्ति से युक्त गंगा के प्रेम आख्यान पर चिंतन मनन करते रहे। गंगा की उत्पत्ति से गंगासागर में विलीन होने तक गंगा का संबंध ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों से रहा है। अद्भुत कथाएँ हैं। संपूर्णता में समझने से सनातन दर्शन की प्रकृति से तार्किक साम्यता बैठते चलती है।

वामन पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में तीनों लोक नापने हेतु अपना एक पैर आकाश की ओर उठाया, तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के चरण धोकर जल को अपने कमंडल में भर लिया। इस जल के तेज से ब्रह्मा जी के कमंडल में गंगा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने गंगा हिमवान को सौंप दी। इस तरह पार्वती और गंगा दोनों में बहनौता हुआ। इसी में एक कथा यह भी है कि वामन के पैर के चोट से आकाश में छेद हो गया और तीन धारा फूटीं। एक धारा पृथ्वी पर, एक स्वर्ग में और एक पाताल में चली गई, इस तरह गंगा त्रिपथगा कहलाईं।

शिव पुराण में ऐसी कथा मिलती है कि गंगा भी पार्वती की तरह भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थी। पार्वती नहीं चाहती थी कि गंगा उनकी सौतन बने। गंगा ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इन्हें अपने साथ रखने का वरदान दे दिया। इसी वरदान के कारण जब गंगा धरती पर अपने पूरे वेग के साथ उतरी तो जल वेग थामने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में लपेट लिया, इस तरह गंगा को भगवान शिव का साथ मिला। सिरांगी गंगा और वामांगी पार्वती।

महाभारत कथा के अनुसार गंगा सृष्टि निर्माता ब्रह्मा के साथ एक बार देवराज इंद्र की सभा में आईं। यहां पर पृथ्वी के महाप्रतापी राजा महाभिष भी मौजूद थे। महाभिष को देखकर गंगा मोहित हो गईं और महाभिष भी गंगा को देखकर सुध-बुध खो बैठे। इंद्र की सभा में नृत्य चल रहा था तभी उनके इशारे से हवा के झोंके से गंगा का आंचल कंधे से सरक गया। सभा में मौजूद सभी देवी-देवताओं ने शिष्टाचार के तौर पर अपनी आंखें झुका ली लेकिन गंगा में खोए महाभिष उन्हें एकटक निहारते रहे और गंगा भी सुधबुध खोकर उन्हें देखती रही। क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने शाप दिया कि आप दोनों लोक-लाज और मर्यादा को भूल गए हैं इसलिए आपको धरती पर जाना होगा। आप दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं इसलिए वहीं आपका मिलन होगा।

ब्रह्मा जी के शाप के कारण गंगा नदी रूप में धरती पर आईं और दूसरी ओर महाभिष को हस्तिनापुर के राजा शांतनु के रूप में जन्म लेना पड़ा। एक बार शिकार खेलते हुए शांतनु जब गंगा तट पर पहुंचे तो गंगा मानवी रूप धारण कर शांतनु से मिली और दोनों में प्रेम हो गया। शांतनु और गंगा की आठ संतानें हुई। जिनमें सात को गंगा ने अपने हाथों से जल समाधि दी और आठवीं संतान के रूप में शांतनु की हठधर्मिता से देवव्रत भीष्म बच गए। देवव्रत को गंगा जलसमाधि नहीं दे पाईं। कहते हैं कि गंगा के आठों संतान वसु थे जिन्हें शाप मुक्त करने के लिए गंगा ने उन्हें जल समाधि दी। लेकिन आठवीं संतान को शाप मुक्त कराने में गंगा सफल ना रही। वह देवव्रत नाम के राजकुमार के रूप में बड़े हुए। भीष्म प्रतिज्ञा स्वरूप भीष्म पितामह के रूप में अधर्म की तरफ़ अभिशप्त जीवन जीकर कृष्ण के इशारे पर पौत्र अर्जुन के हाथों मुक्ति पाई। इस तरह गंगा विष्णु के पैर से उत्पन्न हुईं और गंगासागर में उन्हीं के कदमों में विलीन हुईं। आदि शंकराचार्य ने भज गोविन्दम स्तोत्र में गंगासागर का उल्लेख किया है।  

कुरुते गंगासागर गमनं व्रत परिपालन मथवा दानम्,

ज्ञान विहीने सर्वमनेन मुक्तिर्न भवति जन्म शतेन।

अर्थात्- मोक्ष की प्राप्ति के लिए मनुष्य गंगासागर जाता है, व्रत रखता है, और दान देता है। लेकिन जब तक उसे सर्वोच्च का ज्ञान प्राप्त नहीं होता, सौ जन्मों में भी उसे मुक्ति नहीं मिल सकती। इसलिए जब तक ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति न हो गंगासागर तीर्थ यात्रा भी फलदायी नहीं है, तो ब्रह्म ज्ञान अनुभूति के मार्ग पर चलना चाहिए।

नमकीन पानी में नहा धोकर पसीने से और भी नमकीन होकर मुनि कपिल मंदिर दर्शन को पहुँचे।

वहीं बैठ कर पिता पर एक कविता लिखी।

 वो जो तुम्हारा कारण है,

उसे बाक़ी सब अकारण है,

कोमल हृदय उसका,

ऊपर नारियल नट्टी है,

हाथ में मिश्री मलाई लिए

हृदय धधकती भट्टी है,

तुम्हें कुछ पता है,

वह तुम्हारा पिता है।

*

जिसे दीन-दुनिया, मुन्ना-मुनिया,

मिर्ची-धनिया घर-बाहर,

गुंडा-शायर, खिलाई-पिलाई,

अमन-लड़ाई, माँ-बच्चों की अंगड़ाई

सबकी चिंता है,

वह तुम्हारा पिता है। 

*

जिसने कभी ना सराहा,

हाथ उठा तो तेज़ी से पर ना मारा

अपनी इच्छाओं को मारा,

आज भी भाव सहारा है

तुम्हारे अहसासों में

तुम्हारी साँसों में जो जिंदा है

वह तुम्हारा पिता है।

*

जो रोज़ सलीब पर चढ़ता है,

रोज़-रोज़ मरकर भी वह कभी ना मरता है,

तुम्हारी अनंग कामनाओं में,

भाव भंगिमाओं में जो जीता है

वह तुम्हारा पिता है।

*

शाम को छै बजे एक ऑटो करके ओंकार नाथ मंदिर,  भारत सेवा आश्रम, राम कृष्ण मिशन, नाग मंदिर, मुख्य बाज़ार और मच्छी बाज़ार घूमकर कपिल मुनि मंदिर की आरती में सम्मिलित हुए। प्रायः सभी आश्रमों में रुकने की व्यवस्था है। राम कृष्ण मिशन में वातानुकूलित कमरे मिल जाते हैं। लेकिन वहाँ से गंगासागर कपिल मुनि स्थल दस किलोमीटर से अधिक की दूरी पर है। समुद्र तट के आसपास सागर द्वीप लाइट हाउस अर्थात् प्रकाश स्तंभ देखा। शाम को बाज़ार में ठेलों पर ढेरों झींगा बिकते नज़र आये। यहाँ समुद्री झींगा को चिंगड़ी मछली कहते हैं। भोपाल में दो-तीन प्रकार की मछली मिलती हैं। यहाँ बीसों प्रकार के ढेर लगे थे। ईश्वर की बनाई कोई भी चीज एकांगी नहीं होती है। गुलाब की पंखुड़ियों में रेशम सा गुदाज़ अहसास है तो काँटों की चुभन भी है। जीवन में बदबू और ख़ुशबू दोनों से हमारा सामना होता है। समदर्शी भाव लिए मच्छी बाज़ार में घुसे तो देखा कि बीसों प्रकार की मछलियों का अंबार लगा है। एक बेचवाल बोला- साहिब चिंगड़ी लीजिए। हमने अकबर इलाहवादी की लज़्ज़तदार ज़ुबान की बानगी उसे नज़र की और चलते बने।

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ,

ज़ार  से  गुज़रा हूँ  ख़रीददार  नहीं हूँ।

 *

ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी,

हर चंद कि हूँ  होश में  होशियार  नहीं हूँ। 

 *

वो गुल हूँ  ख़िज़ां ने जिसे बर्बाद किया है,

उलझूं किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ। 

 *

गंगासागर में आपको ज्यादातर बंगाली खाना मिलेगा, जिसमें मछली करी, चावल, समुद्री भोजन इत्यादि है। कुछ चाइनीज और नॉर्थ-इंडियन फूड का भी स्वाद ले सकते हैं। एक प्रमुख पर्यटक स्थल होने के नाते, इस जगह खाने की पर्याप्त सुविधा है। यहां पर भोजन तो उपलब्ध है, लेकिन जब किस्मों की बात आती है तो आपके पास बहुत अधिक विकल्प नहीं होते हैं। भारत सेवा आश्रम में शाकाहारी खाने की व्यवस्था है। मंदिरों के बाहर छोटी-छोटी दुकानों पर भी आप स्नैक्स का आनंद ले सकते हैं।

अगर नवंबर से फरवरी तक सर्दियों की अवधि के दौरान गंगा सागर तीर्थ आया जाए तो बहुत अच्छा है। मकर सक्रांति के समय जनवरी मध्य अवधि भी द्वीप पर जाने का एक शानदार समय है क्योंकि द्वीप पर भव्य उत्सव होते हैं, जिसमें एक विशाल गंगासागर मेला भी शामिल है। कम नमी और सुहावने मौसम के साथ इस द्वीप का सर्दियों में बेहतर आनंद लिया जा सकता है। मेला के समय भारी भीड़ आती है। लाखों में तीर्थ यात्री पहुँचते हैं।  

आख़िर में नाग मंदिर देखा। नाग मंदिर बहुत बड़ा है। वहाँ नागराज वासुकि और उनकी रानी शतशीर्षा की बड़ी मूर्ति है। वासुकी नाग महर्षि कश्यप के पुत्र थे जो कद्रु के गर्भ से हुए थे। नागधन्वा तीर्थ में देवताओं ने वासुकि को नागराज के पद पर अभिषिक्त किया था। वासुकि शिव का परम भक्त होने के कारण इसका शिव के गले पर निवास है।

 

समुद्रमंथन के समय मंदरांचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया था। त्रिपुर दाह  के समय वह शिव के धनुष की डोर बना था। वासुकी के पाँच फण हैं। वासुकी के बड़े भाई शेषनाग हैं जो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं उन्हें शैय्या के रूप में आराम देते हैं। नागों में शेषनाग सबसे बड़े भाई हैं, दूसरे स्थान पर वासुकी और तीसरे स्थान पर तक्षक हैं। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रृंगी ऋषि का शाप पूरा करने के लिये राजा परीक्षित को तक्षक ने काटा था। इसी कारण राजा जनमेजय इससे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने संसार भर के नागों का नाश करने के लिये नागयज्ञ आरंभ किया। तक्षक इससे डरकर इंद्र की शरण में चला गया। इसपर जनमेजय ने अपने ऋषियों को आज्ञा दी कि इंद्र यदि तक्षक को न छोड़े, तो उसे भी तक्षक के साथ खींच मँगाओ और भस्म कर दो। ऋत्विकों के मंत्र पढ़ने पर तक्षक के साथ इंद्र भी खिंचने लगे। तब इंद्र ने डरकर तक्षक को छोड़ दिया।

 

शिव को जब ज्ञात हुआ कि नागवंश का नाश होने वाला है। तब उन्होंने अपने नाती आस्तिक ऋषि को सर्प यज्ञ रुकवाने भेजा था। शिव पुराण में कथा है कि आस्तीक जरत्कारु और शिव-पार्वती की पुत्री मनसा के पुत्र थे। उनके मामा गणेशजी, कार्तिकेय जी और भगवान अय्यपा थे। उनकी मौसी देवी अशोकसुन्दरी और देवी ज्योति हैं। इनके मौसाजी राजा नहुष और अश्विनी कुमार नासत्य हैं। भगवान शिव और माता पार्वती इनके नाना-नानी हैं।

 

आस्तीक ने यज्ञ मण्डप में पहुँचकर जनमेजय को अपनी मधुर वाणी से मोह लिया। उधर तक्षक घबराकर इंद्र की शरण गया। ब्राह्मणों के आह्वान पर भी जब तक्षक नहीं आया तब ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि इन्द्र से अभय पाने के कारण ही वह नहीं आ रहा है। राजा ने आदेश दिया कि इन्द्र सहित उसका आह्वान किया जाए। जैसे ही ब्राह्मणों ने ‘इंद्राय तक्षकाय स्वाहा’ कहना आरम्भ किया, वैसे ही इंद्र ने उसे छोड़ दिया और वह अकेले यज्ञकुण्ड के ऊपर आकर खड़ा हो गया। उसी समय राजा जनमेजय ने आस्तीक से कहा तुम्हें जो चाहिए मांगो। आस्तीक ने तक्षक को कुंड में गिरने से रोककर राजा से अनुरोध किया कि सर्पयज्ञ रोक दीजिए। वचनबद्ध होने के कारण जनमेजय ने खिन्न मन से आस्तीक की बात मानकर तक्षक को मंत्रप्रभाव से मुक्ति दी और नागयज्ञ बन्द करा दिया। सर्पों ने प्रसन्न होकर आस्तीक को वचन दिया कि जो तुम्हारा आख्यान श्रद्धासहित पढ़ेंगे उन्हें हम कष्ट नहीं देंगे। जिस दिन सर्पयज्ञ रुका उस दिन पंचमी थी। वर्तमान समय में भी उक्त तिथि को नागपंचमी के रूप में मनाते हैं।

कुछ बुद्धिजीवी कहते हैं कि पुराण कोरी कल्पनाएँ हैं, तो ये कितनी सुंदर कल्पना है कि हिंदू प्रकृति के प्रत्येक चर-अचर की रक्षा को धर्म समझते हैं। यही भारतीय संस्कृति है।

 

यह समुद्री इलाका है, इसलिए यहां सांप बहुत होते हैं। नाग मंदिर बहुत सघन हरियाली वाले क्षेत्र में स्थित है। स्थानीय लोगों से साँप की बारे में पूछा,  क्या साँप कोई नुक़सान पहुँचाते हैं। उन्होंने बताया कि हम लोग साँप को नहीं छेड़ते तो वे भी समझदार हैं, हम लोगों को नहीं छेड़ते। मिलजुल कर रहते हैं। यहां पर बिजली की आपूर्ति अस्थिर थी लेकिन अब पूरे समय मिलती है। अपने साथ एक इमरजेंसी लाइट या टॉर्च साथ लेकर आएं। सर्पों से भरे गंगासागर में रात को यात्रा करना सुरक्षित नहीं है। 

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – गंगा सागर – भाग-४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

गंगा सागर द्वीप पर बत्तीस किलोमीटर लंबाई में और तीन से सात किलोमीटर चौड़ाई में 12.26 वर्ग किलोमीटर चौबीस गावों की सवा दो लाख आबादी बसी है। काचुबेरिया जेटी पर नाव से उतरते ही टैक्सी वाले हम पर मधुमक्खियों की तरह झूम पड़ते हैं। पश्चिम बंगाल टूरिज्म प्रॉपर्टी में हमारी कॉटेज बुक है। टैक्सी चालक वहाँ तक का 1600/- माँगने लगे। हम उनसे बातें करते आगे बढ़ते गए। अंदाज़न पाँच सौ मीटर चलने पर ऑटो और टोटो दिखे। हल्के फुलके नये इलेक्ट्रिक वाहन को यहाँ टोटो बुलाने लगे हैं। बत्तीस किलोमीटर की लंबाई के हिसाब से टोटो थोड़े कमजोर लगे। भोपाल की भारी सवारी और वाहन में कुछ तो तालमेल होना चाहिए। ऑटो वाले पाँच-छै सौ रुपयों का अड़ियल राग छेड़े थे। हमने हिसाब लगाया कि ऑटो पचास रुपये प्रति सवारी लेकर आठ सवारी बस स्टैंड तक ले जा रहे हैं। उसके हिसाब से पूरे ऑटो के चार सौ ठीक है। हमने चार सौ की विलंबित धुन पकड़ ली। आख़िर चार सौ रुपयों में सौदा तय हुआ। हमारी शर्त थी कि वह हमें होटल तक छोड़ेगा। यह सुनकर वह पसरने लगा। उसके तीन-चार साथियों ने उसे होटल का पता समझाया, तब वह माना।

गंगा सागर द्वीप पर उत्तर से दक्षिण सीधी सड़क है। दोनों तरफ़ क़तार से कच्चे मकान बने हैं। कमोबेश पूरा बंगाली समाज मांसाहारी है। हर मकान के सामने या बाजू में एक सरोवर है जिसमें मछलियाँ पली हैं। ताजी मछलियाँ पकड़ते और खाते हैं। प्रत्येक घर के सामने बकरियाँ चर रही और देशी मुर्गियाँ फुदक रही हैं। एक बंगाली बुद्धिजीवी से मांसाहार पर बात हुई। उनका कहना था कि मनुष्य यदि सीफ़ूड (समुद्री भोजन) न खाएँ तो समुद्री जीव की प्रजनन क्षमता इतनी अधिक है, सप्त समुद्र उनकी हड्डियों से नमक के ढेर में बदल जाएँगे। तब बारिश के बादल नहीं बनेंगे और कहीं भी बारिश नहीं होगी। पृथ्वी चटकने लगेगी। जल भूमिपिंड को साधे है जल की न्यूनता में वह पिंड खंड-खंड हो जाएगा। ज़रा सोचिए कितनी बड़ी समस्या होगी। शाकाहार या मांसाहार जीव मात्र की स्वाभाविक भोजन प्रणाली है। हमने कहा उत्तर भारत में शाकाहार पर जोर दिया जाता है। उन्होंने कहा- वहाँ वैष्णव जीवन पद्धति है। शाक्तों में मांसाहार चतुर्वर्ण्य प्रमुख भोजन है। कोई परहेज़ नहीं है। पूजा में मछली रखी जाती है।

गंगा सागर में पश्चिम बंगाल टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की बेहतरीन पक्की कांक्रीट हट उपलब्ध हैं। जिनका आरक्षण भोपाल से करवा कर चले थे। तक़रीबन चार सौ वर्ग फ़िट में एक बड़ा शयन कक्ष और एक बड़ा सिटआउट वरांडा, दोनों में एसी और दोनों में पश्चिमी गुसलखाना हैं। तीन दिन रुके, एसी बंद नहीं हुए। कमरे से बाहर भट्टी धधक रही है। सागर द्वीप के चारों तरफ़ सूर्य की तीखी किरण समुंदर में भाप से मानसूनी बादल बनाने में लगी हैं। इस तरह समझ लीजिए कि एक महा भगोने में तेज आँच पर पानी उबल रहा है और आप ढक्कन पर धरे पसीना बहा रहे हैं। सुबह बंगाली अख़बार कमरे में आ गया। तीन चार हेडिंग्स ही समझ आईं। लिपि देवनागरी है। शब्दों के हाथ, पैर, सिर, धड़ और मात्राओं में हिंदी से कुछ थोड़ा भेद है। कुछ महीने रुक गए तो बंगाली अख़बार पढ़ने लायक़ हो जाएँगे। लेकिन फिर काले जादू का क्या होगा। उससे बचना होगा। ग़ालिब तो नहीं बच पाये थे।

पश्चिम बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले में स्थित गंगा सागर धार्मिक महत्व का स्थान है। पवित्र जल धाराओं के मिलन स्थान को प्रयाग कहा जाता है। हर साल गंगा सागर मेला इस सागर द्वीप के दक्षिणी छोर पर भरता है जहाँ से गंगा नदी बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती है। इसी प्रयाग को गंगा सागर का नाम दिया गया है।

प्रयाग कुम्भ मेले के बाद गंगा सागर सबसे बड़ा तीर्थ है। गंगासागर का मिथक जीवन और मृत्यु के चक्र और मोक्ष के आकर्षण के बीच की कड़ी है। इस भक्तिपूर्ण नियति का हृदय प्रतिष्ठित कपिल मुनि मंदिर है। भागवत पुराण में विष्णु के कुल 24 अवतार बताए गए हैं। जिनमें से 23 हो चुके हैं। एक कल्कि अवतार होने को है। कपिल मुनि पाँचवें अवतार माने जाते हैं। जिन्होंने सांख्य सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि आत्मा अनादि अनंत है। आत्मा पूर्व निर्धारित नियति के बंधन में है। जीव के कर्म उसका प्रारब्ध निर्धारित करते हैं। भागवत पुराण के अनुसार, महर्षि कपिल मुनि का जन्म स्वयंभू मनु की पुत्री ऋषि कर्दम और देवहुति से हुआ था। कर्दम मुनि ने अपने पिता भगवान ब्रह्मा के वचनों का पालन करते हुए समर्पणपूर्वक घोर तपस्या की। उनके समर्पण से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए। भगवान ने उन्हें देवहुति से विवाह करने के लिए कहा और आश्वस्त किया कि वह एक अवतार के रूप में जन्म लेंगे और दुनिया को सांख्य दर्शन देंगे।

समय बीतने के साथ मिथक किंवदंतियों में, किंवदंतियाँ क़िस्सों में और क़िस्से आस्था में बदल गए। वही आस्था कर्मकाण्डी धर्म का प्राण है। राजा भागीरथ के नाम पर गंगा को भागीरथी नाम दिया गया और राजा सागर के नाम पर समुद्र को “सागर” नाम दिया गया और गंगा के सागर में मिलन को गंगा सागर।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गंगा को लोक कल्याण हेतु 2525 किलोमीटर प्रवाहित होकर ग्रहण करने हेतु भगवान विष्णु कपिल मुनि के रूप में आए थे। उन्होंने इस स्थान पर अपना आश्रम बनाया और ध्यानस्थ हो गए। इसी दौरान पृथ्वीलोक पर प्रतापी इक्ष्वाकु वंशीय राजा सागर काफी पुण्य कमा रहे थे। इंद्र को अपनी गद्दी हिलती दिखने लगी। इंद्र ने एक चाल चली। राजा सागर का यज्ञ अश्व चुरा कर कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया। राजा सागर ने अपने  पुत्रों को उस अश्व को ढूँढ लाने के लिए भेजा। जब राजा सागर के पुत्रों को अश्व कपिल मुनि के आश्रम के पास मिला, उन्होंने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इंद्र की चाल से अनजान कपिल मुनि इस झूठे आरोप से क्रोधित हो गए और उन्होंने राजा सागर के सभी पुत्रों को भस्म कर दिया। जब कपिल मुनि को असल बात पता चली तो वे अपना श्राप वापस तो ले नहीं सकते थे पर उन्होंने राजा सागर के पुत्रों को मोक्ष दिलाने का उपाय बताया। अगर गंगा धरती पर जल के रूप में अवतरित हो राजा सागर के पुत्रों की अस्थियों को स्पर्श कर लेती हैं तो हिन्दू मान्यताओं के अनुसार उनकी अंतिम क्रिया पूरी हो जाएगी और वो मोक्ष प्राप्त कर स्वर्गलोक को चले जाएँगे। राजा सागर के पुत्रों को मोक्ष दिलाने के लिए उनके कुल में जन्मे राजा भगीरथ ने घोर तपस्या की ताकि माता पार्वती धरती पर आ जाएँ।  अंततः पार्वती देवी गंगा के रूप में पृथ्वी पर उतरीं और उनके स्पर्श से राजा सागर के पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। हिन्दू पंचांग के अनुसार गंगा के धरती पर आकर सागर में समाने की तिथि उत्तरायण या मकर संक्रांति पर होती है। इसलिए लाखों लोग इस दिन गंगासागर में स्नान करते हैं ताकि वे स्वर्ग प्राप्त कर सकें।

इस पौराणिक कथा में आस्था रखते हुए दुनिया भर से मोक्ष की तलाश में लाखों हिंदू तीर्थयात्री मकर संक्रांति पर गंगासागर मेले में आते हैं। माना जाता है कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से सभी दुख और पाप धुल जाते हैं। इस विश्वास के साथ लाखों लोग कपिल मुनि के आश्रम में “सब तीर्थ बार बार गंगा सागर एकबार” का जाप करते पुण्य कमाते हैं।

गंगा सागर एक अद्भुत द्वीप है जो बंगाल तट से कुछ ही दूर स्थित है। गंगा सागर गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी का मिलन बिंदु है। बताया जाता है कि काफी समय पहले गंगा नदी की धारा सागर में यहीं मिलती थी, लेकिन नदियों के तलछट ने किनारों को पूर दिया है। अब इस द्वीप के पास गंगा की बहुत छोटी सी धारा सागर से मिलती है।

यह द्वीप लार्ड क्लाइव को इसलिए पसंद था कि ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज सिराजुद्दौला से शिकस्त खाकर इसी स्थान पर डेरा डाले पड़ी थी। क्लाइव ने प्लासी की लड़ाई की तैयारी इसी द्वीप पर की थी, और गंगा के मुहाने से ही गहरे समुद्र तक पहुँच जहाँ लंगर डाला, वह स्थान बाद में डायमंड हार्बर नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसकी फ़ौज  इसी रास्ते से हुगली अर्थात् गंगा पर जहाज़ चलाकर 11 जून 1757 की रात को प्लासी के मैदान तक पहुँचा था। 13 जून 1757 को उसने भारत के भाल पर “ग़ुलाम” लिख दिया था।

संत कपिल मुनि को समर्पित मंदिर सागरद्वीप का प्रमुख आकर्षण है। तीर्थयात्री पानी में एक डुबकी के बाद मंदिर जाते हैं। मुख्य मंदिर 1960 के तूफान में नष्ट हो गया था। गंगासागर में 1973 में कपिल ऋषि का मंदिर फिर से बनवाया गया। कपिल मुनि की मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगा जी की मूर्ति स्थापित है वहीं दूसरी तरफ राजा सगर और हनुमानजी की मूर्ति है।

यहां आना हर किसी के भाग्य में नहीं होता, जो यहां तक पहुंच जाता है उसे भाग्यशाली माना जाता है। यहां का गंगा सागर मेला पूरे भारत वर्ष में प्रसिद्ध है। हर साल इस मेले में लाखों श्रद्धालु पुण्यस्नान के लिए आते हैं। यहां तीर्थयात्री संगम में स्नान कर सूर्य को अर्घ देते हैं। कपिल मुनि के साथ ही यहां श्रद्धालु सूर्य देव की भी पूजा करते हैं। यहां श्रद्धालुओं द्वारा तिल और चावल का दान दिया जाता है। यहां इस दौरान नागा साधुओं के साथ महिला सन्यासी भी नजर आती हैं। ये नजारा पूरी तरह कुंभ जैसा लगता है। यहां श्रद्धालु समुद्र देवता को नारियल अर्पित करते हैं, वहीं गौदान भी किया जाता है। इसके बाद बाबा कपिल मुनि के दर्शन किए जाते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – गंगासागर की ओर – भाग-३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – गंगासागर की ओर भाग-३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ख़ैर, यात्रा आरंभ हुई। दाहिनी तरफ़ नया कलकत्ता और बायें तरफ़ साल्ट लेक की घेराबंदी करके बसी बस्तियाँ और साथ में चलता मेट्रो ट्रैक। तक़रीबन बीस किलोमीटर चलने के बाद आख़िरी मेट्रो स्टेशन गढ़िया आया। वहाँ पर मेट्रो स्टेशन पर ड्राइव-इन करके थोड़ा सामान ख़रीदा। रास्ते पर चारों तरफ़ तृणमूल कांग्रेस के झंडे लहरा रहे हैं। पंचायत चुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर है। कोलकाता से चलकर साल्ट लेक तक शहरी आबादी के बाद ग्रामीण आबादी मुस्लिम बहुल है। मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त 1946 को “डायरेक्ट एक्शन डे” घोषित करने के बाद कोलकाता से मुस्लिम आबादी दक्षिण बंगाल तरफ़ पलायन करने लगी तो दक्षिण में बसी हिंदू आबादी कोलकाता की तरफ़ शरण लेने भागी। इस तरह अगस्त 1947 तक इस प्रक्रिया में दक्षिण बंगाल के कॉक द्वीप तक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बस गया। उनकी जीविका का साधन हिंदुओं की गंगासागर यात्रा है। वर्तमान में सभी बंगाली नज़र आते हैं। इक्का दुक्का मुस्लिम परिधान में दिखते हैं।

अब हम डेल्टा के बीच में गंगा की धारा को देख रहे हैं। सुंदरवन डेल्टा में भूमि का ढाल अत्यंत कम होने के कारण यहाँ गंगा अत्यंत धीमी गति से प्रवाहित है। अपने साथ लाई मिट्टी को मुहाने पर जमा कर देती है, जिससे डेल्टा का आकार बढ़ता जाता है और नदी की कई धाराएँ तथा उपधाराएँ बन जाती हैं। समुद्र सिकुड़ता जा रहा है। इस प्रकार बनी हुई गंगा की प्रमुख शाखा नदियाँ जालंगी, इच्छामती, भैरव, विद्याधरी और कालिन्दी हैं। इन नदियों की धाराओं को पार करते चल रहे हैं। नदियों के वक्र गति से बहने के कारण दक्षिणी भाग में कई धनुषाकार झीलें बन गई हैं। ढाल उत्तर से दक्षिण है, अतः अधिकांश नदियाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं। ज्वार के समय इन नदियों में ज्वार का पानी भर जाने के कारण इन्हें ज्वारीय नदियाँ भी कहते हैं। डेल्टा के सुदूर दक्षिणी भाग में समुद्र का खारा पानी पहुँचने से यह भाग नमकीन एवं दलदली है। यहाँ आसानी से पनपने वाले मैंग्रोव जाति के पेड़ों की बहुतायत  है। मैंग्रोव वनों का पारिस्थिक महत्व है, क्योंकि यह तटों को स्थिरता प्रदान करते हैं और विभिन्न मछली और पक्षी जातियों को निवास व सुरक्षा प्रदान करते हैं। मैंग्रोव वन झुरमुट विश्व के उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में मिलते हैं। मैंग्रोव शब्द दक्षिण अमेरिका की गुआरानी भाषा से व्युत्पन्न है। इन्ही मैंग्रोव वनों में फैली हरियाली से गुज़र रहे हैं। मेहनतकश अर्धनग्न बंगाली स्त्री-पुरुष बारिश के इंतज़ार में खेतों को तैयार करते हुए रवींद्र संगीत धुनों पर गुनगुना रहे हैं। हमने मोबाइल यूट्यूब फिल्मी गीत सेट किया है। हम बाहर से तप रही, पर अंदर से मुलायम ठंडी कार में बैठे, रोशन की धुन पर इंदीवर रचित मुकेश की आवाज़ में संजीव कुमार, मुकरी, ज़ाहिदा पर फ़िल्माया गीत सुन रहे हैं।

ओह रे ताल मिले नदी के जल में,

नदी मिले सागर में,

सागर मिले कौन से जल में,

कोई जाने ना …

 

सूरज को धरती तरसे, धरती को चंद्रमा,

पानी में सीप जैसे, प्यासी हर आत्मा,

ओ मितवा रे… ऐ… ऐ… ऐ…,

बुंद छुपी किस बादल में,

कोई जाने ना …

बंगाल की खाड़ी में हुगली नदी के मुहाने से मेघना नदी के मुहाने (बांग्लादेश) तक 260 किमी विस्तृत व्यापक जंगली एवं लवणीय दलदली क्षेत्र गंगा डेल्टा का निचला हिस्सा है। यह 100-130 किमी में फैला अंतर्राष्ट्रीय सीमा इलाक़ा है। मुहानों के साथ बहती लहरों वाली नदियों और अनेक नहरों द्वारा कटी हुई खाड़ियों के साथ इस भूक्षेत्र में घने जंगलों से ढके दलदली द्वीप समूह हैं।

समुद्र तट मैंग्रोव वाले दलदलों में परिवर्तित होते है; दक्षिणी क्षेत्र विभिन्न जंगली जानवरों और घड़ियालों से भरा हुआ है और वस्तुतः निर्जन है। यह बंगाल के शेर का आख़िरी संरेक्षित क्षेत्र और बाघ संरक्षण परियोजना का स्थल है। कृषि योग्य उत्तरी क्षेत्र में चावल, गन्ना, लकड़ी और सुपारी की खेती होती है। सुंदरबन रॉयल बंगाल टाइगर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। सुंदरबन, विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा, 10,200 वर्ग किमी में है जो भारत और बांग्लादेश में फैला है। भारतीय सीमा के भीतर आने वाले वन का हिस्सा सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान कहलाता है। यह पश्चिम बंगाल के दक्षिणी हिस्से में है। वहीं से हम गुज़र रहे हैं।

गंगा का डेल्टा चावल की खेती के लिए विख्यात है। यहाँ विश्व में सबसे अधिक कच्चे जूट का उत्पादन होता है। कटका अभयारण्य सुंदरवन के उन इलाकों में से है जहाँ का रास्ता छोटी-छोटी नहरों से होकर गुज़रता है। उन्हीं के एक हिस्से से होकर निकल रहे हैं। यहाँ बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरवन पड़ा है। इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान वृक्षों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं, जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में जीवित रह सकते हों।

क़रीब चालीस किलोमीटर के बाद बारूईपुर से दाहिनी तरफ़ मुड़कर डेढ़ बजे कॉक द्वीप जेट्टी पर पहुँचे। कार के वातानुकूलित वातावरण में बैठे सघन हरियाली का आनंद लेते रहे। बाहर निकलते ही गर्मी के रौद्र रूप का सामना हुआ। पूरे कपड़े पसीने से तर हो गए। सर्वोच्च सिरे से निम्नतर अंगों तक झरनों के रूप में बहते पसीने को पोंछकर रूमाल निचोड़ लिया। एक बार, दो बार, तीन बार रूमाल निचोड़ कर उसे धोकर गीले रूमाल दे चेहरा पोंछा तब कुछ राहत मिली। कॉक द्वीप जेट्टी पर मालूम हुआ कि तीन बजे एक जेट्टी साढ़े तीन किलोमीटर दूरी तय करके सागर द्वीप ले जाएगी। चालीस मिनट का सफ़र होगा। फिर सागर जेट्टी से होटल तक तीस किलोमीटर जाना होगा। इंतज़ार में पसीना बहाते बैठे हैं। यदि नल-नील सी शक्ति होती तो रामेश्वरम का सा पुल बना देते। पता चला है कि भारत सरकार और बंगाल सरकार मिलकर पुल बनाने की योजना बना रहे हैं। योजना दीदी और फेंकू की तकरार में उलझी है।

बंगाल धरा पर घूम रहे हों और बंगाली कवि चण्डीदास की याद ना आए। अमीर मीनाई की लिखी और जगजीत सिंह द्वारा गाई यह मशहूर गजल में रामी धोबन और चंडीदास का जिक्र है वे भारत की एक कम चर्चित ऐतिहासिक प्रेम कहानी के पात्र हैं।

गई जब रामी धोबन एक दिन दरिया नहाने को,

वहाँ  बैठा  था  चंडीदास  अफ़साना सुनाने को।

 

बसाना है अगर उल्फ़त का घर आहिस्ता आहिस्ता

कहा  उसने  के रामी  छोड़ दे  सारे ज़माने को।

बंगाली वैष्णव समाज में मान प्राप्त मध्ययुगीन चंडीदास राधाकृष्ण लीला साहित्य के बंगाली भाषा के आदि कवि हैं। बंगाल की धरती पर पैदा चैतन्य महाप्रभु से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महाकवि चंडीदास की मार्मिक गाथा से प्रेरित रहे हैं। चंडीदास ने अपनी आत्मा को प्रेम के अनंत सागर में विलीन कर दिया था। प्रेम ही उनके जीवन का सारतत्व, तपस्या और सिद्धि था। चंडीदास की पदावलियों में सर्वत्र ‘पिरीति’ अर्थात प्रीति की धुन सुनाई पड़ती है। चण्डीदास पर 1934 में बनी कुंदन लाल सहगल अभिनीत हिंदी फ़िल्म भी खूब चली थी। महान प्रेमी और बंगला महाकवि चंडीदास बहुत पहले समय में भी मानवता को जाति-धर्म से ऊपर मानने के हिमायती थे, उन्हीं के शब्दों में—

शुनो रे मानुष भाई

सबार उपरे मानुष सत्य

ताहार उपरे नाई।

हे मनुष्य भाई सुनो, सबके ऊपर मनुष्य सत्य है, इस सत्य से परे कोई नहीं।

सुंदरबन में पतझड़ नहीं होता। ज्येठ-वैशाख की गर्मी में भी सघन हरियाली। पानी के पोखर वर्ष के बारह महीने भरे रहते हैं। पानी पाँच फुट पर भरपूर निकल आता है। नारियल, केले और कटहल भरपूर निकलते रहते हैं। आम नीम पीपल के पेड़ नहीं होते।

चाय पीकर एक होटल में अड्डा जमाया है। होटल की मालकिन सीधे पल्लू की परम्परा गत बंगाली परिधान में काम में लगी थी। उसने लड़की को दुकान सौंपी और ज़मीन पर एक लेट गई। ऊपर पंखा पूरी गति से चल रहा था। उससे थोड़ी दूर पर बेंच पर बैग सिरहाने रख हम भी लेट गए । मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। उस पर नज़र रखे लेटे रहे। ऊपर छत पर नज़र डाली तो जीवन में पहली बार साड़ियों की फ़ाल्स सीलिंग दिखी। बेलबूटेदार मनमोहक रंगों की साड़ियाँ टीन की छत से गर्मी को छनकर आने से थोड़ा रोक रही थीं। नौ ग़ज़ा बंगाली साड़ियों के बेलबूटों को गिनते दो घंटे गुज़ारे। चार बजे फेरी की टिकट मिलनी शुरू हुई। पवन भाई दो टिकट ख़रीद लाए।

कुछ मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के तीर्थयात्री भी आ गए। एक तरफ़ बंगाली महिलाएँ सपरिवार बैठी हैं। एक अधेड़ हरियाणवी बोला- जे बंगाल का काड़ा जादू क्या होवे है। कहीं देखने को मिलेगा क्या ?

चर्चा चल पड़ी। हम बहुत देर तक सुनते रहे। फिर कहा- देखो इस महिला दुकानदार का बच्चा अभी स्कूल से आया है। उसकी माँ ने उसके कपड़े बदल मुँह हाथ धुलवा कर उसे बड़ी थाली में मांस-भात परस दिया है। वह योगी की मुद्रा में बैठा ख़ाना खा रहा है। छोटी मछलियों के झोल में भात मींड कर गोला बना मुँह में भरता जा रहा हैं। यही इनका तीनों पहर रोज़ का ख़ाना है। मछली सरसों या राइस ब्रान तेल में पकाई जाती है। अब इसके और इसकी बहन के बाल देखो कितने सघन घने और निसंग काले हैं। इनकी देह से मादक मत्स्यगंध निकलती है। अब इनके चेहरे की बनावट देखिए, थोड़े छोटे से गोल चेहरे पर कोनों पर हल्की मुड़ी छोटी सी नाक और छोटे सुघड़ कान के पास से गहरी काली घटाएँ और जीभ को गोलाकार करके मिठास ज़ुबान, यही है काला जादू।

इस दुनिया में इंसानों ही नहीं बल्कि जीव मात्र पर काम का जादू सिर पर चढ़ कर बोलता है। शाक्तों में एक पंच-मकार पद्धति है। जो मांस अर्थात् मछली, मदिरा, मैथुन, मधु अर्थात् मिष्ठू और मुद्राएँ के रासरंग पर आधारित है। पूरा बंगाल वर्ष के बारह महीने मछली और मीठा खूब खाते हैं। मदिरा खुलेआम पीते हैं। नाच गाने की मुद्राओं में पारंगत हैं। महिलाओं की लंबी काली घटाएँ और इनके बदन सत्यवती की तरफ़ मत्स्यगंधा मादक ख़ुशबू बिखेरती हैं, उनकी बोली में एक मिठास है, यही काला जादू है। इसी काले जादू से लबरेज़ लघु उरोजनी सुपुष्ट नितंबिनी धीवर कन्या सत्यवती ने ऋषि पाराशर और राजा शान्तनु को बावला बना दिया और महाभारत युद्ध की नींव रख दी थी। और तो और सत्यवती ने ऋषि पाराशर से तीन शर्तें तक मनवा ली थीं कि उसका कौमार्य भंग नहीं होना चाहिए, उसकी गंध सुगंध में बदल जानी चाहिए, और वह व्यास जी को पैदा करने हेतु नौ महीने गर्भ धारण नहीं करेगी तुरंत बच्चा होना चाहिए। तब नदी के बीच द्वीप पर पाराशर-सत्यवती के समागम से द्वैपायन व्यास का त्वरित जन्म हुआ। महाभारत में शान्तनु-गंगा से भीष्म पितामह की उत्पत्ति भी जुड़ी है। उसके धर्मपिता निषाद ने भी राजा शान्तनु से मनमाफ़िक शर्तें मनवाई थीं। सत्यवती महाभारत की एक महत्वपूर्ण पात्र है। वह उपरिचर वसु द्वारा इंद्र की “अद्रिका” नाम की अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। वह ब्रह्मा के शाप से मत्स्यभाव को प्राप्त हुई। उसका नाम बाद में सत्यवती हुआ। यह बातें चल रही थीं तभी नौका तक जाने की लाईन लगने लगी।

टिकट लेकर भीड़ में खड़े होना त्रासदाई है। सामने समुंदर पर वाष्पीकरण होने से हवा थमी है, वातावरण में बहुत उमस है। सिर पर धूप और देह में पसीने की धार बह रही है। एकाध घंटा खड़ा रहने पर आरसी गेट खुला लेकिन उसके आगे बढ़ने पर एक और गेट बंद था। पता चला कि गंगा सागर द्वीप से फेरी आने पर उसकी सवारियों उतरेंगी तब दूसरा गेट खुलेगा। एक घंटा और धूप में तपाई होती रही। पानी पीते और पसीना बहाते खड़े रहे। जब गेट खुला तो आगे खड़ी जनता ने भागकर नाव में कुर्सियाँ घेर लीं। जब तक हम पहुँचे तब तक नाव में घुसने की धक्का मुक्की हो रही थी। कुछ अनुनय से कुछ धकिया कर नाव में चढ़ तो गए लेकिन पैर रखने तक की जगह नहीं थी। नाव के चालक की डेक पर चढ़ गए। हमको चढ़ते देख एक हरियाणवी परिवार भी चढ़ आया। लंबे चौड़े हरियाणावासियों ने डेक पर जगह घेर ली। उनके परिवार का मुखिया डेक की सीढ़ियों पर आसन जमा कर विराजमान हो गया। उसके बगल में थोड़ी सी जगह थी। हम उड़ी जगह पर धंसकर बैठ गए। नाव चालीस मिनट में साढ़े तीन किलोमीटर की यात्रा करके गंगा सागर टापू पर पहुँची।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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