हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-२१ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अमृतसर पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र शहर माना जाता है। सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर में है। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का दिल माना जाता है। अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़े स्तर पर हत्याकांड हुआ। यही नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको कई बार बर्बाद किया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से इसे हर बार बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। अकबर ने गुरु रामदास को उस ज़मीन का पट्टा दिया था, जिस पर स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ है।

हमने टैक्सी नियत पार्किंग में खड़ी कर दी। जूतों की उतराई-पहनाई और रखने-उठाने की मुश्किल से बचने के लिए, जूते वाहन में ही छोड़ दिए। पार्किंग से मंदिर प्रांगण तक़रीबन डेढ़-दो किलोमीटर रहा होगा। धूप तेज होने से पाँव जलने लगे। बाज़ार के बीच से होकर रास्ता था। छाया देखकर ठंडी जगह पर पैर रख कर चलते रहे। दुकानों पर लस्सी और सिकंजी की बहार थी। अधिकतर दुकाने कपड़ों की और कुछ जूते-चप्पल की दुकाने भी थीं। आधा घंटा में मंदिर परिसर पहुँच गये। परिसर में चोकोर परकोटा है। बीच में स्वर्णमंदिर चमचमाता नज़र आ रहा है। जिसकी प्रतिच्छाया सरोवर में झिलमिला रही है। मंदिर के दाहिने और बाएँ तरफ़ से परकोटा में प्रवेश द्वार हैं। हम बाएँ दरवाज़े से अंदर घुसे। हरमंदिर साहब का इतिहास याद आने लगा।

गुरुनानक, गुरु अंगददेव और गुरु अमरदास के बाद चौथे सिख गुरु रामदास ने अमृतसर में दरबार साहिब के नाम से मशहूर मंदिर बनाने की  शुरुआत 1577 में की थी और पांचवें गुरु अर्जन ने मंदिर की स्थापना का कार्य पूरा किया था। मंदिर को पूरा करने में आठ साल लगे थे। इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया था। आदि ग्रंथ, सिखों द्वारा दस मानव गुरुओं के वंश के बाद अंतिम, संप्रभु और अनंत जीवित गुरु का रूप माना जाता है। इसमें 1,430 पृष्ठ हैं, जिनमें से अधिकांश को 31 रागों में विभाजित किया गया है।

सिखों और मुस्लिमों के बीच लंबे समय से चले विवाद से 1762 में मंदिर ध्वस्त हो गया था। 1776 में एक नया मुख्य प्रवेश द्वार, मार्ग और गर्भगृह का निर्माण पूरा हुआ, जबकि सरोवर  के चारों ओर पूल का काम 1784 में समाप्त हो गया।

रणजीत सिंह ने घोषणा की कि वह संगमरमर और सोने के साथ इसका पुनर्निर्माण करेंगे। मंदिर को 1809 में संगमरमर और मिश्रित सोना-तांबे में पुनर्निर्मित किया था, और 1830 में रणजीत सिंह ने सोने की पर्त के साथ गर्भगृह को सुसज्जित करने के लिए सोना दान किया।

मंदिर में अकाल तख्त भी मौजूद है जो ‘छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है। छठे गुरु हरगोबिंद द्वारा इसे बनवाया गया था। यह सिखों के लिए सत्ता के  पांच तख़्तों में से एक है। अकाल तख्त राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है और ऐसी जगह है जहां सिख लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक सरोकारों को संबोधित किया जाता है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरुबानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

सिक्ख गुरूग्रंथ साहिब में आस्था रखते हैं। उनके लिए गुरू ही सब कुछ हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्णमंदिर से जुडी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं। उनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है। हमने परकोटा से मंदिर की परिक्रमा करके लंगर में प्रसादी ग्रहण की और परिसर से वापस निकले।  

अमृतसर एक भयानक जलियांवाला बाग हत्याकांड का गवाह रहा है। 13 अप्रैल 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहां पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं। जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दूसरा स्मारक अमर ज्योति है।

बारह बजे अमृतसर से पठानकोट होते हुए धर्मशाला के लिए रवानगी डाली। पंजाब की उर्वरा ज़मीन पर बासमती चावल की खेती लहरा रही है। सफ़ेद बगुले कुलाँचे भरते मटरगश्ती में संलग्न हैं। अमृतसर से पठानकोट तक छै लेन की मज़बूत सड़क बन गई है। सबसे पहले बटाला आया। बटाला पंजाब राज्य के गुरदासपुर ज़िले का एक शहर है। बटाला एक मुख्य औद्योगिक केन्द्र है और पंजाब के महत्वपूर्ण माझा सांस्कृतिक क्षेत्र का एक केन्द्रबिन्दु माना जाता है। फिर धारीवाल आया। धारीवाल गुरदासपुर जिले में पंजाब का 5 वां सबसे बड़ा शहर और अपनी ऊनी मिल के लिए सबसे प्रसिद्ध है। यह शहर अपर बारी दूबा नदी के तट पर स्थित है जो व्यास नदी में मिलती है। वहाँ से गुरदासपुर 13 किमी दूर है।  

गुरदासपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पनियार गांव के एक ब्राह्मण गुरिया जी ने की थी। उन्होंने गुरदासपुर के लिए सांगी गोत्र के जाट समुदाय से जमीन खरीदी थी। उन्ही के नाम पर गुरदासपुर नाम पड़ा। गुरिया जी के दो पुत्र थे-नवल राय और पाला जी। नवल राय के वंशज गुरदासपुर में बस गए। गुरु नानक देव की पत्नी का मायका गुरदासपुर में था।

भारत के विभाजन से पहले, गुरदासपुर जिले का भविष्य लंबे समय तक तय नहीं किया गया, क्योंकि यह मुसलमान बहुल था। सीमा सीमांकन समिति द्वारा प्रारंभिक योजना पठानकोट (उस समय गुरदासपुर जिले का हिस्सा) को पाकिस्तान और शकरगढ़ को भारत में रखने की बात थी। हालांकि, बाद में निर्णय की बारीक ट्यूनिंग के रूप में इसके विपरीत किया गया। यानी शकरगढ़ पाकिस्तान को दिया गया था और गुरदासपुर जिला (पठानकोट के साथ) भारत को दिया गया। गुरदासपुर ब्यास और रावी नदियों के बीच एक शहर है। इसमें गुरदासपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है, जो पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करता है।

अंत में, रैडक्लिफ अवार्ड के तहत, केवल एक तहसील शकरगढ़- को पाकिस्तान में स्थानांतरित कर दिया गया, और शेष जिला भारत के साथ रख दिया। गुरदासपुर जिले से कई मुसलमान पाकिस्तान चले गए; सिख और हिंदू सीमा पार कर भारत आ गए। भारी मात्रा में हिंसक वारदातें हुईं। गुरदासपुर भारत को देने का दबाव नेहरू-पटेल का था। पाकिस्तान को भरोसा था कि मुस्लिम बहुल होने से और सीमा पर होने से गुरदासपुर उन्हें मिलेगा तो जम्मू-कश्मीर भारत से पूरी तरह कट जाएगा। वह उसे अधिग्रहण कर लेगा। जब पाकिस्तान ने देखा कि गुरदासपुर उन्हें पूरा नहीं मिला तो उन्होंने कश्मीर में क़बायली हमला शुरू करवा दिए। गुरदासपुर ज़िले में गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर – सबसे प्रसिद्ध सिख गुरुद्वारों में से एक, जहाँ सिख गुरु नानक देव ने अपने अंतिम दिन बिताए थे।

धारीवाल के बाद पठानकोट आया। पठानकोट ऐतिहासिक महत्व वाला एक प्राचीन शहर है। पठानकोट में पाए गए पुराने सिक्के यह सिद्ध करते हैं कि यह पंजाब के सबसे पुराने स्थलों में से एक है। यह हमेशा से बहुत महत्व का स्थान रहा होगा क्योंकि यह पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। पठानकोट हिमाचल में स्थित नूरपुर राज्य की राजधानी थी और अकबर के शासनकाल में इसका नाम बदलकर धमेरी (नूरपुर) कर दिया गया था। राजपूत के पठानिया कबीले ने अपना नाम पठानकोट से लिया है।

पठानकोट को कांगड़ा और डलहौजी की सुरम्य तलहटी में चक्की नदी पर स्थित होने के कारण जम्मू, कश्मीर, डलहौजी, चंबा, कांगड़ा, धर्मशाला, मैकलोडगंज, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी और आगे हिमालय पहाड़ों में जाने से पहले एक विश्राम स्थल के रूप में उपयोग किया जाता है। पठानकोट जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों के लिए एक शिक्षा केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। इन राज्यों के कई ग्रामीण छात्र शिक्षा के लिए पठानकोट आते हैं। पठानकोट में हल्का नाश्ता किया और गाढ़ी चाय पी। अब शिवालिक पहाड़ियाँ शुरू हो गईं। सबसे पहले काँगड़ा ज़िले का नूरपुर आया।

काँगड़ा क्षेत्र में ब्रिटिश राज के आगमन से पहले धर्मशाला और इसके आसपास के क्षेत्रों में दो सहस्राब्दियों तक कटोच राजवंश का शासन था। 1810 में सिख राजवंश के महाराज रणजीत सिंह और राजा संसार सिंह कटोच के मध्य हुई ज्वालामुखी की संधि के बाद कटोच केवल काँगड़ा क्षेत्र में स्थानीय जागीरदार रह गए। 1848 में अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा कर लिया था। 1849 में कांगड़ा जिले के अंदर एक फौजी छावनी के लिए धौलाधार पर्वत की ढलानों पर एक स्थान को चुना गया, जहां एक हिन्दू धर्मशाला स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि धर्मशाला नगर का नाम धर्मशाला शब्द से उत्पन्न हुआ है।

धर्मशाला वर्ष 1849 में कांगड़ा में स्थित सैन्य छावनी के रूप में अस्तित्व में आया। वर्ष 1855 में धर्मशाला को कांगड़ा जिले का मुख्यालय घोषित किया गया था। धर्मशाला में सिविलियन और छावनी क्षेत्र की बढ़ती चहल-पहल को देखते हुए, सुविधाएं लोगों को मुहैया करवाने के लिए नगर परिषद बनाने का विचार बना था। पांच मई 1867 को यहां नगर परिषद अस्तित्व में आई थी। उस समय बनी नगर परिषद की पहली बैठक भी 6 मई 1867 को तत्कालीन जिलाधीश एल्फिनस्टोन की अध्यक्षता में हुई थी।

धर्मशाला के 1867 में नगर परिषद बनने के बाद यहां सुविधाओं में इजाफा हुआ। 1896 में धर्मशाला में लोगों को बिजली भी मिलनी शुरू हुई थी। तत्पश्चात नगर में कार्यालयों के विकास के अतिरिक्त व्यापार व वाणिज्य, सार्वजनिक संस्थान, पर्यटन सुविधाओं तथा परिवहन गतिविधयों में भी उन्नति हई। वर्ष 1905 व 1986 के भूकम्पों से नगर का बहुत नुकसान हुआ। 1926 से 1948 के बीच यहां पर इंटर कॉलेज सहित महाविद्यालय खुला तो वर्ष 1935 में सिनेमा हाल भी यहां खुला। बढ़ते समय के साथ-साथ सामाजिक सुधारों के साथ संगीत, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी यह क्षेत्र कहीं पीछे नहीं रहा। 1960 से महामहिम दलाई लामा का मुख्यालय भी धर्मशाला में स्थित है।

धर्मशाला राज्य की शीतकालीन राजधानी है। यह कांगड़ा नगर से 16 किमी की दूरी पर स्थित है। धर्मशाला के मैक्लॉडगंज उपनगर में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मुख्यालय हैं, और इस कारण यह दलाई लामा का निवास स्थल तथा निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी है। दो घंटे बौद्ध मंदिर में गुज़ारे। धर्मशाला को भारत सरकार के स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत एक स्मार्ट नगर के रूप में विकसित होने वाले सौ भारतीय नगरों में से एक के रूप में भी चुना गया है।

12 जुलाई 2022 को पठानकोट से जम्मू के रास्ते पर पंजाब की जम्मू-कश्मीर सीमा पर करके कठुआ, बरनोटी, जसरोटा, छन्नी और सम्बा जो कि चिकन नेक बिंदु पर स्थित हैं, को पार करके जम्मू शहर में दाखिल हुए। जम्मू शहर ऐतिहासिक नगर है और पूर्व जम्मू प्रांत की राजधानी रह चुका है और बाद में भी भारत के जम्मू एवं कश्मीर राज्य की शीतकालीन राजधानी रह चुका है। राय जम्बुलोचन राजा बाहुलोचन का छोटा भाई था। बाहुलोचन ने तवी नदी के तट पर बाहु किला बनवाया था और जम्बुलोचन ने जम्बुपुरा नगर बसवाया था। नगर के नाम का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। जम्मू शहर से 32 किलोमीटर दूर अखनूर में पुरातात्त्विक खुदाई के बाद इस जम्मू नगर के हड़प्पा सभ्यता के एक भाग होने के साक्ष्य भी मिले हैं। जम्मू में मौर्य, कुशाण और गुप्त वंश काल के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 480 ई. के बाद इस क्षेत्र पर एफ्थलाइटिस का अधिकार हो गया था और यहां कपीस और काबुल से भी शासन हुआ था। इनके उत्तराधिकारी कुशानो-हेफ्थालाइट वंश के थे, जिनका अधिकार 565 से 670 ई. तक रहा। तदोपरांत 670 ई. से लेकर 11वीं शताब्दी तक शाही राजवंश का राज रहा जिसे गजनी के अधीनस्थों ने छीन लिया। जम्मू का उल्लेख तैमूर के विजय अभियानों के अभिलेखों में भी मिलता है। इस क्षेत्र ने सिखों एवं मुगलों के आक्रमणों के साथ एक बार फिर से शक्ति-परिवर्तन देखा और अन्ततः ब्रिटिश राज का नियंत्रण हो गया। यहां 840 ई. से 1869 ई. तक देव वंश का शासन भी रहा था। तब नगर अन्य भारतीय नगरों से अलग-थलग पड़ गया और उनसे पिछड़ गया था। उसके उपरांत डोगरा शासक आये और जम्मू शहर को अपनी खोई हुई आभा व शान वापस मिली। उन्होंने यहां बड़े बड़े मन्दिरों व तीर्थों का निर्माण किया व पुराने स्थानों का जीर्णोद्धार करवाया, साथ ही कई शैक्षिक संस्थान भी बनवाये। उस काल में नगर ने काफ़ी उन्नति की। 1817 में 43 कि.मी लम्बी रेल लाइन द्वारा जम्मू को सियालकोट से जोड़ा गया था, किन्तु 1947 में भारत के विभाजन के बाद यह रेल लाइन बंद कर दी गयी क्योंकि सियालकोट से आवाजाही की कड़ी टूट गयी थी। उसके बाद जम्मू शहर में 1971 तक कोई रेल सेवा नहीं थी। तभी भारतीय रेल ने पठानकोट-जम्मू तवी ब्रॉड गेज रेल लाइन डाली और अन्ततः 1975 में एक बार फ़िरसे नये जम्मू-तवी रेलवे स्टेशन के साथ जम्मू शेष भारत से रेल द्वारा जुड़ गया। वर्ष 2,000 में पुराने रेलवे स्टेशन का अधिकांश भाग ध्वस्त कर वहां एक कला केन्द्र बनाया गया।

जम्मू में बहुत तेज गर्मी है। न धरती पर बारिश है और न आसमान में बादल दिख रहे हैं। तभी दूसरे चौराहे पर अमरनाथ यात्रियों के लिए संचालित भंडारे में भोजन किया। उसके बाद दस मिनट में जम्मू विमानतल पहुँच गये। इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर Go first की फ़्लाइट नम्बर G-196 दोपहर बाद तीन बजे का प्रस्थान प्रदर्शित हो रहा है।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-२० – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

10 जुलाई 2022 को गुलमर्ग में सर्द रात गुज़ारने के बाद नाश्ता निपटाया। गाड़ी वालों ने गुलमर्ग के पर्यटन स्थलों के भ्रमण हेतु एक वाहन का खर्चा 4,000/- बताया। लम्बी बातचीत और बोलियों के उतार चढ़ाव के बाद 3,000/- में सौदा पट गया। लेकिन ईद के कारण गाड़ी नहीं आ पायी इसलिए कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा। बारह बजे दोपहर को हमारी टैक्सी आ गयी। हम हाउसबोट में शिफ़्ट होने को श्रीनगर रवाना हुए। वहाँ हाउसबोट में रुकना है। हमने सोचा भीड-भाड से परे शांत वातावरण में किसी हाउसबोट में रहने की इच्छा है तो नागिन लेक या झेलम नदी पर खडे हाउसबोट में ठहर सकते हैं। नागिन झील भी कश्मीर की सुंदर और छोटी-सी झील है। यहां प्राय: विदेशी सैलानी ठहरना पसंद करते हैं। झेलम नदी में छोटे हाउसबोट होते हैं।

आज कश्मीर में बक़रीद मनाई जा रही है। गुलमर्ग से श्रीनगर के लिए निकले। चीड़, चिनार, देवदार के पेड़ जो आते वक्त स्वागत द्वार थे, अब बिदाई तोरण नज़र आ रहे हैं। जल के कई रिसाव स्थान पार करते विचार आ रहा है कि भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड और सतपुड़ा इलाक़े में झरने।

प्रतिभा की तबियत ख़राब होने से उन्हें नूरा अस्पताल में दिखाना पड़ा। दो घंटे इलाज करने में व्यतीत हुए। तीन बजे हाउसवोट पहुँचे। चीयरफ़ुल चार्ली नामक हाउसवोट में पहुँचे। हाउसवोट मालिक को बुकिंग लेकर कुछ कठिनाई थी। उसने दो-तीन लोगों को फ़ोन घुमाया तब जाकर वोट में कमरा मिला। यहाँ से किनारे का नजारा बेहद खूबसूरत है। शिकारे बहते नज़र आ रहे हैं। आज बक़रीद की छुट्टी होने से सभी शिकारे काम पर लगे हैं। असलम भाई डाँगोला की मिशन कश्मीर हाउसवोट में एक रात का आशियाना है। उन्होंने बताया कि यदि आप सात दिनों के लिए कश्मीर आते हैं तो आपको सिर्फ़ 40,000/- रुपयों में यहाँ रहना, खाना, टैक्सी उपलब्ध रहेगी। उनका मोबाईल नम्बर 9419065385 है। हाउसवोट में सामने बैठे हैं। यहाँ से सामने शंकराचार्य पहाड़ी और बाजू में जबरवन पहाड़ी दिख रही है। शाम हो रही है। अब शिकारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। शिकारों में शराब, चिकन टिक्का, पनीर टिक्का और दूसरी चीजें मिल रही हैं।

हाउसबोट एक तरह की लग्जरी में तब्दील हो चुके हैं। कुछ लोग दूर-दूर से केवल हाउसबोट में रहने का लुत्फ उठाने के लिए ही कश्मीर आते हैं। हाउसबोट में ठहरना सचमुच अपने आपमें एक अनोखा अनुभव है। परंतु वास्तव में इसकी शुरुआत लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी में हुई थी। कश्मीर में हाउसबोट का प्रचलन डोगरा राजाओं के काल में तब शुरू हुआ था, जब उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने और घर बनाने पर क़ानूनी प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय कई अंग्रेजों और अन्य आसामियों ने बडी नाव पर लकडी के केबिन बना कर यहां रहना शुरू कर दिया। फिर तो डल झील, नागिन झील और झेलम पर हाउसबोट में रहने का चलन हो गया। बाद में उनकी देखादेखी स्थानीय लोग भी हाउसबोट में रहने लगे। आज भी झेलम नदी पर स्थानीय लोगों के हाउसबोट तैरते देखे जा सकते हैं। शुरुआती दौर में बने हाउसबोट बहुत छोटे होते थे, उनमें इतनी सुविधाएं भी नहीं थीं, लेकिन अब वे लग्जरी रूप ले चुके हैं। सभी सुविधाओं से लैस आधुनिक हाउसबोट किसी छोटे होटल के समान हैं। डबल बेड वाले कमरे, अटैच बाथ, वॉर्डरोब, टीवी, डाइनिंग हॉल, खुली डैक आदि सब पानी पर खडे हाउसबोट में है। लकडी के बने हाउसबोट देखने में भी बेहद सुंदर लगते हैं। अपने आकार एवं सुविधाओं के आधार पर ये विभिन्न दर्जे के होते हैं। शहर के मध्य बहती झेलम नदी पर बने पुराने लकडी के पुल भी पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। कई मस्जिदें और अन्य भवन झेलम नदी के निकट ही स्थित है।

हमारे पैकेज में डल झील में एक घंटे का शिकारा सफ़र तय था लेकिन आज शिकारों पर भारी भीड़ होने से सात बजे शिकारा आया। पानी की बोतल में स्कॉच के दो पेग भरकर एक घंटा शिकारा सैर से डल झील का भरपूर मज़ा लिया। चारों तरफ़ पहाड़ों पर हरियाली का आलम था। गवर्नर हाउस, शंकराचार्य पहाड़ी और मुग़ल क़ालीन क़िला ढलते सूरज की मद्धिम रोशनी में सुहाने लग रहे थे। जी भरकर फ़ोटो उतारीं। कश्मीर की डल झील को मन भरकर जी लिया।

हाऊसबोट पर तीन कश्मीरी थे। उनसे बातें होती रहीं। उन्होंने बताया कि पहाड़ों की चट्टानों और भूमि में स्थित जल ही चश्मों में फूटता है। चश्मे अक्सर ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक होते हैं जहाँ धरती में दरारें और रिसाव हो, जिनमें बारिश का पानी प्रवेश कर जाये। फिर यह पानी जमीन के अन्दर ही प्राकृतिक नालियों और गुफ़ाओं में घूमता हुआ किसी और जगह से चश्मे के रूप में उभर आता है।

कश्मीर के गाँवों में अभी भी चश्में ही पानी का मुख्य स्रोत हैं। कश्मीर के गाँवों में ज़मीनी खेती ही रोजी-रोटी का एक बड़ा सहारा है। ज्यादा ऊँचाई वाले इलाकों में खासकर चश्में ही पानी और सिंचाई के स्रोत थे। उपेक्षा और नए ‘विज्ञानियों के नजर में अनुपयोगी’ चश्मों को लोग भूलते गए। कई प्राकृतिक चश्में सालों पहले बन्द हो गए या कर दिए गए। लोगों ने उनके आस-पास और उनके ऊपर घर बना लिये। लोग भूल गए कि कभी यहाँ कोई चश्मा भी था। पिछले साल जब ज्यादा बारिश हुई तो उनके घर के नीचे से कमरों में पानी आने लगा। तब याद आया कि वे किसी पानी की ‘जगह’ पर बैठे हुए हैं। उन्होंने पानी का आशियाना हथिया लिया है।

चश्में हालांकि बहुत ज्यादा पानी नहीं देते, पर चश्में आज भी कश्मीरी गाँवों में पीने के पानी के सबसे बड़े स्रोत हैं। हाँ! सिंचाई के लिये जरूर चश्मों से थोड़ा आगे बढ़कर 8वीं शताब्दी में कश्मीर के शासक ललितादित्य ने ऊँचे पठारों तक पानी पहुँचाने के लिये एक नए यंत्र का इस्तेमाल कराना शुरू किया था जिसका नाम था ढेंकी। इसमें किसान को एक बड़े खम्बे का इस्तेमाल करना था। जिसके मुँह पर पानी के लिये बाल्टीनुमा पात्र बँधा होता था। अपने पैरों से सन्तुलन बनाते हुए उसे पानी के कुएँ या किसी जलधारा से खींचना होता था। यह सारा काम मानवीय ऊर्जा से होता था, तब तक सब ठीक ही रहा। भूजल में कोई खास दिक्कत नहीं थी। पर पम्पिंग मशीनों ने दृश्य बदल दिया। भूजल की गिरावट ने चश्मों को सुखाना शुरू कर दिया है। अब तो कश्मीरी सिंचाई का वर्तमान तरीक़ा धीरे-धीरे ‘डीपवेल’ और ‘लिफ्ट इरिगेशन’ की तरफ जा चुका है। स्थान विशेष की योजना वहाँ की ज़मीनी हकीक़त से ही बनाई जानी चाहिए। हर कीमत पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसकी गहराई में वहाँ की संस्कृति, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ सभी कुछ शामिल होती हैं। विकासवादी गतिविधियों और गलत निर्णयों के चलते चश्में खत्म होते जा रहे हैं।

पहले इस इलाके में भरपूर जंगल थे, जो चश्मों के पुनर्भरण में मददगार होते थे, लेकिन धीरे-धीरे जंगल कम हुए और चश्मों में जलापूर्ति कम होती गई। साथ ही पुनर्भरण क्षेत्रों में बिना समझे-बूझे पक्के निर्माण चश्मों की जल-भण्डारण क्षमता को घटा रहे हैं। कश्मीरी पहाड़ जो खुद ही ‘वाटर टैंक’ थे, उनको सुखा के सरकारों का जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग टैंकों और टैंकरों से पीने का पानी मुहैया करवाने की कोशिश कर रहा है। श्रीनगर और कुछ नगरों के नागरिकों को तो यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी, और होती रहेगी पर गाँवों को कौन पूछेगा। उनको तो अपने प्राकृतिक और टिकाऊ पानी के टैंक ‘चश्मों’ को ही ठीक-ठाक रखना होगा।

फिर विचार आया कि कश्मीरियत क्या है? “आज़ादी-आज़ादी, हम माँगते आज़ादी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” नारे लगाने वाले कोई मिले नहीं। एक भले से दिखते पढ़े लिखे कश्मीरी से बातचीत कश्मीरियत को कुछ इस तरह बयाँ करती है।

इस्लाम आने के बाद सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता सिकंदर बुतशिकन कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ भले शाह ज़ैन-उल-आबदीन जैसे मुसलमान हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन जैसों ने यहाँ के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने या राज्य छोड़कर जाने या मरने पर मजबूर कर दिया। कुछ ही सदियों में कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल हो गई। चौदहवीं शताब्दी में यहां मुस्लिम शासन आरंभ हुआ। उसी काल में फारस से सूफी संतों के रूप में इस्लाम का भी आगमन हुआ। यहां पर ऋषि परम्परा, त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम मिलता है, जो कश्मीरियत का सार है।

यहाँ की सूफ़ी-परम्परा बहुत विख्यात है, जो कश्मीरी इस्लाम को परम्परागत शिया और सुन्नी इस्लाम से थोड़ा अलग और हिन्दुओं के प्रति सहिष्णु बनाती है। यह हमने भी महसूस किया। सभी कश्मीरियों को आतंकी कह देना बहुत बड़ी नादानी और सिरे से बेमानी है। जन्नत-ए-कश्मीर भारत छोड़ कर जाते अंग्रेजों, रुकते हिंदुओं और बँटते मुसलमानों के बीच एक राजनीतिक मोहरा बन गया था। अब चुनावी बिछात पर शकुनि पाँसा है। चुनाव के वक़्त मंदिर-मस्जिद, कश्मीर और आतंक एक साथ परोसे जाते हैं।

हमने कहा- लेकिन 370 का समापन भारतीय राष्ट्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। एक राष्ट्र, एक संविधान, राष्ट्रीय एकता और प्रभुसत्तावादी राज्य की अनिवार्यता होती है। आप क्या कहेंगे?

उन्होंने कहा- रियासत की परम्पराओं से मुक्त होना कठिन होता है। थोड़ा वक़्त लगेगा। कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीरी पंडित कहा जाता है और वो सभी ब्राह्मण माने जाते हैं। सभी कश्मीरियों को कश्मीर की संस्कृति, यानि कि कश्मीरियत पर बहुत नाज़ है। वादी-ए-कश्मीर अपने चिनार के पेड़ों, कश्मीरी सेब, केसर (ज़ाफ़रान, जिसे संस्कृत में काश्मीरम् भी कहा जाता है), पश्मीना ऊन और शॉलों पर की गयी कढ़ाई, गलीचों और देसी चाय (कहवा) के लिये दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का सन्तूर भी बहुत प्रसिद्ध है। कश्मीरी व्यंजन भारत भर में बहुत ही लज़ीज़ माने जाते हैं। ज़्यादातर कश्मीरी पंडित मांस खाते हैं। कश्मीरी लोगों के मांसाहारी व्यंजन हैं, नेनी (बकरे के ग़ोश्त का) क़लिया, नेनी रोग़न जोश, नेनी यख़ियन (यख़नी), मच्छ (मछली), इत्यादि। कश्मीरी पंडितों के शाकाहारी व्यंजन हैं : चमनी क़लिया, वेथ चमन, दम ओलुव (आलू दम), राज़्मा गोआग्जी, चोएक वंगन (बैंगन), इत्यादि। कश्मीरी मुसलमानों के (मांसाहारी) व्यंजन में कई तरह के कबाब और कोफ़्ते, रिश्ताबा, गोश्ताबा, इत्यादि शामिल होते हैं। परम्परागत कश्मीरी दावत को वाज़वान कहा जाता है। कहते हैं कि हर कश्मीरी की ये ख़्वाहिश होती है कि ज़िन्दगी में कम से कम एक बार अपने दोस्तों के लिये वो वाज़वान परोसे।

हमने पूछा- यदि कश्मीरियत कश्मीरी पंडितों की खैर ख़्वाह है तो कश्मीरी पंडित कब लौटेंगे, अभी माहौल ठीक नहीं लगता।

उन्होंने कहा- आग ठंडी होने में वक़्त लगता है, जनाब।

इतने में गिलासों में कहवा पेय आ गया। चुस्कियों के बीच कश्मीरी खान-पान पर चर्चा निकल पड़ी। उन्होंने बताया- कश्मीर घाटी की प्रसिद्ध फसल चावल यहाँ के निवासियों का मुख्य भोजन है। मक्का, गेहूँ, जौ और जई भी अन्य फसलें हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न फल एवं सब्जियाँ यहाँ उगाई जाती हैं। अखरोट, बादाम, नाशपाती, सेब, केसर, तथा मधु आदि का प्रचुर मात्रा में निर्यात होता है। कश्मीर केसर की कृषि के लिए प्रसिद्ध है। शिवालिक तथा मरी क्षेत्र में कृषि कम होती है। दून क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर अच्छी कृषि होती है। जनवरी और फरवरी में कोई कृषि कार्य नहीं होता। यहाँ  झीलों का बड़ा महत्व है। उनसे मछली, हरी खाद, सिंघाड़े, कमल एवं मृणाल तथा तैरते हुए बगीचों से सब्जियाँ उपलब्ध होती हैं। कश्मीर की मदिरा मुगल बादशाह बाबर तथा जहाँगीर को बड़ी प्रिय थी किंतु अब उसकी इतनी प्रसिद्धि नहीं रही। कृषि के अतिरिक्त, रेशम के कीड़े तथा भेड़ बकरी पालने का कार्य भी यहाँ पर होता है।

कश्मीर राज्य में प्रचुर खनिज साधन हैं किंतु अधिकांश अविकसित हैं। कोयला, जस्ता, ताँबा, सीसा, बाक्साइट, सज्जी, चूना पत्थर, खड़िया मिट्टी, स्लेट, चीनी मिट्टी, अदह (ऐसबेस्टस) आदि तथा बहुमूल्य पदार्थों में सोना, नीलम आदि यहाँ के प्रमुख खनिज हैं।

श्रीनगर का प्रमुख उद्योग कश्मीरी शाल की बुनाई है जो मुग़लों के समय ठीक से विकसित हुई थी और तभी से ही चली आ रही है। कश्मीरी कालीन भी प्रसिद्ध औद्योगिक उत्पादन है, किंतु आजकल रेशम उद्योग सर्वप्रमुख प्रगतिशील धंधा हो गया है। चाँदी का काम, लकड़ी की नक्काशी तथा पाप्ये-माशे यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं। कश्मीर का प्रमुख धंधा पर्यटन  है जिससे राज्य को और स्थानीय निवासियों को बड़ी आय प्राप्त होती है। लगभग एक दर्जन औद्योगिक संस्थान स्थापित हुए हैं परंतु प्रचुर औद्योगिक क्षमता के होते हुए भी बड़े उद्योगों का विकास अभी तक नहीं हो पाया है। मुख्य नदियाँ सिन्धु, झेलम और चेनाब हैं। यहाँ कई ख़ूबसूरत झीलें हैं जैसे: डल, वुलर और नगीन।

उनसे विदाई लेकर हम हरि पर्वत किला की सैर को निकल गये। श्रीनगर के डल झील के पश्चिम में हरि पर्वत किला स्थित है। अता मोहम्मद खान ने किले का निर्माण कराया। हरि पर्वत को कोह-ए-मारन के नाम से भी जाना जाता है। यह किला श्रीनगर की डल झील के पश्चिम में स्थित है। जिला प्रशासन के मुताबिक इस किले का निर्माण 18वीं सदी में अफगान गवर्नर अता मोहम्मद खान ने कराया। बाद में 1590 में बादशाह अकबर ने किले में एक लंबी दीवार का निर्माण कराया। इस किले से डल झील की खूबसूरती देखते बनती है। किले की देख-रेख एवं रखरखाव भारतीय पुरातत्व विभाग करता है। हरि पर्वत किले के प्राचीन खंभे इसके सौंदर्य को और बढ़ाते हैं। यहां से मखदूम साहिब की दरगाह भी अच्छी तरह दिखती है। ऊंचाई पर स्थित होने के नाते यह किला श्रीनगर के सभी इलाके से नजर आता है। इस पर्वत की पश्चिमी ढलान पर भगवती पार्वती का मंदिर है। इस किले पर आने के लिए पर्यटकों को पुरातत्व विभाग से अनुमति लेनी होती है।

11 जुलाई 2022 को अब कश्मीर से बिदाई लेने का वक़्त आ गया है। सुबह आठ बजे श्रीनगर से अमृतसर फ़्लाइट है। शिकारे में सोए थे, नींद अच्छी आई और समय पर खुल भी गई। जब तक भूख और नींद ज़िंदा है, तब तक सब ठीक समझना चाहिए। आठ बजे फ़्लाइट पकड़ने के लिए पाँच बजे निकलना पड़ा। श्रीनगर विमानतल पर सघन चौकसी और सूक्ष्म जाँच परीक्षण से गुजरना पड़ा। गो-एयर की सेवा का स्तर ठीक नहीं है। हमेशा अफ़रातफ़री में काम होता है। विमान श्रीनगर से अमृतसर-दिल्ली होकर मुंबई जाना था। श्रीनगर से अमृतसर की सवारियाँ बहुत थीं। लगभग पूरा विमान ख़ाली हो गया। जबसे कश्मीर से धारा 370 हटी है। तब से पंजाब के सिक्ख कश्मीर में प्रॉपर्टी ख़रीदने लगे हैं। उन्होंने बताया अभी सस्ती मिल रही हैं। भविष्य में निजी क्षेत्र के अस्पताल और कारोबारी आएँगे तब महंगाई चरम पर पहुँचेगी। उस समय बेंच कर कमाई कर लेंगे। आज धर्मशाला के लिए टैक्सी से निकलना है। अमृतसर में विमान के उतरने के पहले ही अमृतसर के टैक्सी चालक का फ़ोन आ गया। संदीप सिंह टैक्सी नम्बर PB 01 B 4742 लेकर गेट पर खड़े मिले। उन्हें सीधा धर्मशाला जाना था। हमारे कहने पर स्वर्ण मंदिर दर्शन करने का कार्यक्रम बन गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

08 जुलाई 2022 को हम श्रीनगर से पहलगाम जा रहे हैं। पहलगाम का रास्ता भी सैलानियों को बहुत प्रभावित करता है। मार्ग में पाम्पोर में केसर के खेत दिखाई देते हैं। जगह-जगह क्रिकेट के बैट रखे नजर आते हैं। यहां विलो-ट्री की लकडी से बैट बनते हैं। रास्ते पर सबसे पहले पम्पोर आया। जिसे पम्पर या पानपर के नाम से भी जाना जाता है। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग झेलम नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित कश्मीर का एक ऐतिहासिक शहर है। प्राचीन काल में इसे पदमपुर के नाम से जाना जाता था। यह अपने केसर के लिए प्रसिद्ध है। पम्पोर दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है जहां दुनिया का सबसे महंगा केसर उगाया जाता है। पम्पोर केसर के लिए जगप्रसिद्ध है जिसका पाँच साला पौधा छै पत्तियाँ धारण करता है। अक्टूबर में फसल आती है। तीन पत्तियाँ लाल और तीन पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। लाल रंग की पत्तियाँ असली केसर होता है। जो बहुत महँगा मिलता है। हरे रंग की पत्तियों का औद्योगिक उपयोग पान और सब्ज़ी में मसालों के तौर पर होता है। यह क्षेत्र श्रीनगर शहर के केंद्र लाल चौक से लगभग 11 किलोमीटर दूर है। पम्पोर के क्षेत्र में स्थानों के नाम आम तौर पर -बल प्रत्यय के रूप में होते है, जैसे नामलाबल, कदलाबल, द्रंगबल, फ़्रेस्टबल और लेट्राबल के इलाके। पम्पोर में तीन झीलें भी हैं, झीलों में से एक सरबल झील के नाम से जानी जाती है। सरबल झील, तुलबाग से वुयान के रास्ते में चटलम के पास केसर के खेतों से होते हुए जाती है। चटलाम के निकट स्थित होने के कारण इसे चटलाम आर्द्रभूमि भी कहा जाता है।

उसके बाद अवंतिपुर या अवंतीपोरा आया, जिसे वूंटपोर के नाम से जाना जाता है। शहर का नाम अवंतिपुर कश्मीरी राजा अवंतिवर्मन के नाम पर रखा गया था और इसमें उनके द्वारा निर्मित 9वीं शताब्दी के दो हिंदू मंदिरों के खंडहर हैं। इस शहर की स्थापना अवंतिवर्मन ने की थी जो उत्पल वंश के पहले राजा थे और उन्होंने 855 से 883 ईस्वी तक कश्मीर पर शासन किया था। अवंतिवर्मन ने राजा बनने से पहले अवंतीपोरा में विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर का निर्माण किया, जिसे “अवंतिसवामिन” कहा जाता है। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने शिव को समर्पित “अवंतीश्वर” नामक एक दूसरा हिंदू मंदिर बनाया। दोनों मंदिर विशाल आयताकार पक्के आंगनों में बनाए गए थे। वे मध्य युग में नष्ट हो गए। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वविद् दया राम साहनी द्वारा उनकी खुदाई की गई थी। भारतीय राज्यों में सिर्फ़ कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसका प्रामाणिक इतिहास कल्हण नामक विद्वान द्वारा राज़तरंगिणी नाम से अवंतीपुर में ही लिखा गया था।

भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कश्मीर में नाग, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड। श्रीनगर से 53 किलोमीटर की दूरी पर अनंतनाग है। यह श्रीनगर और जम्मू के बाद जम्मू और कश्मीर का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। इस शहर को इस्लामाबाद और अनंतनाग दोनों नामों से पुकारा जाता है।

शहर का संस्कृत नाम अनंतनाग नीलमात पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है। कश्मीर और लद्दाख के राजपत्र के अनुसार, इसका नाम विष्णु के महान नाग और अनंत काल के प्रतीक अनंत के नाम पर रखा गया है। माना जाता है कि इस्लामाबाद नाम एक मुगल गवर्नर इस्लाम खान के नाम से लिया गया है, जिन्होंने इस क्षेत्र में एक बगीचा लगवाया था।

डोगरा शासन के दौरान, अनंतनाग/इस्लामाबाद कश्मीर घाटी के तीन जिलों में से एक का मुख्यालय था, जिसे “अनंतनाग वज़रात” कहा जाता था। मार्तंड सूर्य मंदिर कश्मीर के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है, जिसे लगभग 500 ईस्वी में बनाया गया था। यह मंदिर अनंतनाग से 9 किमी पूर्व-उत्तर-पूर्व और मट्टन के दक्षिण में केहरीबल में स्थित है। इस प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को शासक सिकंदर बुतशिकन ने नष्ट कर दिया था। अनंतनाग में एक रेस्टोरेंट में नाश्ता और काफ़ी पीकर चल दिए।

अमरनाथ यात्रा के कारण कई जगह जाम लग रहा था इसलिए क़ाफ़िला घिसटते हुए चल रहा था। हम लिद्दर नदी की कलकल के सरगम में ठंडी हवाओं के साथ चिनार और पाइन पेड़ों से बात करते आगे बढ़ते रहे। लिद्दर नदी पहले कभी लम्बोदरी नदी कहलाती थी। पेड़ों पर आशियाना जमाये पक्षी दिख जाते और हमें देखकर फुदक लेते। एक बंदरिया बच्चों को समेटने में परेशान थी। पाइन के पेड़ पर सुबह के नाश्ते के बाद की ऊधम उसकी परेशानी का सबब थी। उसके बच्चे पेड़ की डाल से लटक कर नीचे आ जाते। बंदरिया उन्हें पेड़ पर चढ़ने को हड़काने के लिए नीचे उतरती तो बच्चे ऊपर चढ़ जाते। ट्राफ़िक जाम में बंदरों की मटरगस्ती और लिद्दर नदी के बहाव के साथ एक कौए की काँव-काँव सुनकर चीड़-चिनार-देवदार वृक्षों की तरफ़ ध्यान गया। जिनके साये में ट्राफ़िक जाम का वक़्त गुज़ारा। ख़्याल आया कि इस सुंदर वातावरण में कोयल कूकनी चाहिए। परंतु कोयल कश्मीर में नहीं कूकती। उसे कूकने के लिए सतपुड़ा वाले आम के पेड़ चाहिए।    

इनके अलावा अवंतिपुर में 9वीं शताब्दी में बने दो मंदिरों के भग्नावशेष तथा मार्तड का सूर्य मंदिर भी आकर्षक हैं। सागरतल से 2130 मीटर की ऊंचाई पर बसा पहलगाम कभी चरवाहों का छोटा सा गांव था। किंतु यहां बिखरी नैसर्गिक छटा ने इसे खुशनुमा सैरगाह बना दिया। लिद्दर नदी इसकी छटा को और बढाती है। नदी पर कई जगह बने लकडी के पुल और दूर दिखते हिमशिखर पिक्चर पोस्टकार्ड से दृश्य प्रस्तुत करते हैं। देवदार के जंगल, झरने और फूलों के मैदान तो जगह-जगह नजर आएंगे। बैसरन के मर्ग, आडु, चंदनवाडी जैसे स्थान घोडों पर बैठकर घूमे जा सकते हैं। साहसी पर्यटक पहलगाम से तरसर, मरसर झीलें, दुधसर झील और कोलहाई ग्लेशियर जैसे ट्रेकिंग रूटों पर निकल सकते हैं। अमरनाथ यात्रा का मुख्य मार्ग पहलगाम से चंदनवाडी, शेषनाग, महागुनस, पंचतरणी, संगम होते हुए अमरनाथ गुफा जाता है।

हमारा क़ाफ़िला ग्यारह बजे पहलगाम पहुँचा। पहलगाम शाब्दिक अर्थ = चरवाहों का गाँव है। जम्मू और कश्मीर के अनन्तनाग जिले का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। साथ ही अमरनाथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। विश्व भर से हजारों पर्यटक प्रति वर्ष यहाँ आते हैं। यह अनन्तनाग से 45 किमी की दूरी पर लिद्दर नदी के किनारे स्थित है। पहलगाम, अननतनाग ज़िले की पाँच तहसीलों में से एक तहसील है। अनंतनाग से पहलगाँव की तरफ़ रास्ता मुड़ते ही लिद्दर नदी आपका स्वागत करती है। लिद्दर नदी किसी समय लम्बोदरी नाम से जानी जाती थी।

लिद्दर घाटी की पश्चिमी सीमा कश्मीर घाटी से लगी है और उत्तरी सीमा सिंधु घाटी के लगती है। घाटी की कुल लंबाई  40 किलोमीटर है। इसकी अधिकतम चौड़ाई पांच किमी है। लिद्दर बेसिन, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में पीर पंजाल रेंज, उत्तर में सिंधु घाटी और पूर्वोत्तर में जांस्कर श्रेणी द्वारा परिसीमित है।  लिद्दर जल निकासी बेसिन का कुल  क्षेत्र 1,134 किमी है। यह घाटी लिद्दर नदी द्वारा निर्मित है जो अंग्रेजी के वाई (Y) अक्षर के आकार में है। पहलगाम के ऊपर नदी दो धाराओं, पूरबी लिद्दर और पच्छिमी लिद्दर के रूप में बहती है। इन दो धाराओं में से पूर्वी लिद्दर नदी ऊपर की ओर चन्दनवाड़ी से होकर गुजरती है और इसका स्रोत शेषनाग झील और शीशराम ग्लेशियर है। पश्चिम लिद्दर नदी कोल होई ग्लेशियर से निकलती है और अपने रास्ते में कई हरे शंकुधारी जंगलों और अल्पाइन घास की उपत्यकाओं से गुजरती है। लिद्दर घाटी अन्य ज़िलों के लिये स्वच्छ जलापूर्ति का स्रोत है और साथ ही कृषि हेतु सिंचाई का साधन भी।  लिद्दर नदी अपने मार्ग में कई उल्लेखनीय प्राकृतिक स्थलों और पर्यटन स्थलों, उदाहरणार्थ, अरु, पहलगाम, बेताब घाटी, और अकद से होकर गुजरती है। इस घाटी में अवस्थित मुख्य कस्बों में मंडलान, लारिपोरा, फ्रास्लन, अशमुकाम और सीर हमदान हैं।

पहलगाम में घुड़सवारी का भय मिश्रित मज़ा लिया। तीन घंटे घुड़सवारी का एक स्पॉट मिनी-स्विट्ज़रलैंड है। जिसका रेट 2,500.00 रुपए प्रति सवार है। सौदेबाज़ी के बाद 2000.00 प्रति सवार तय हो गया। घोड़े पर बैठ कर सीधे पहाड़ चढ़ना सचमुच दिलेरी का काम है। पत्थर, कीचड़, पेड़, पौधे, अन्य घुड़सवार के बीच शुरू में घबराहट हुई। परंतु घोड़े पर बैठने की तकनीक समझने पर सहजता आ गई। सीधी चढ़ाई चढ़ने में अधिक पता नहीं चला लेकिन उतरने में सामने खाई दिखने से भय लगता रहा। घोड़े भी आपस में टकराते रहे। घोड़ा एक पेड़ के किनारे चला तो दाहिनी घुटना पेड़ से टकरा गया। एक कराह के साथ मुँह से गाली निकल गई।

एक फ़ोटोग्राफ़र प्रति फ़ोटो प्रिंट का 100.00 माँग रहा था, और उसकी फ़ोटो मोबाईल में देने का 20.00 प्रतिफ़ोटो। सौदेबाज़ी उपरांत क्रमशः 50.00 और 10.00 रुपए तय हुआ। उसने 128 फ़ोटो निकाल लिए। फ़ोटो प्रिंट में समय अधिक लगना था इसलिए मोबाईल में फ़ोटो लेने की सौदेबाज़ी शुरू हुई। उससे सारी फ़ोटो 1000.00 रुपए में ले लीं। वहीं पराठा खाया और घोड़े पर सवार होकर वापिस चल दिए।

अनंतनाग-पहलगाम सड़क पर ग्रीनहाइट होटल में रुके। एक बहुत ही शानदार और खूबसूरत लोकेशन पर आरामदायक होटल की बालकनी से लिद्दर नदी पर राफ़्टिंग के नज़ारे लुभावने थे। हमसे रहा नहीं गया। बालकनी में कुर्सी रखकर अड्डा जमाया। कमरे की बालकनी से सामने लिद्दर नदी के पार पहाड़ियों की एक के बाद एक चार क़तार दिख रही हैं। उनके पीछे सूर्य अस्ताचलगामी हो रहा है। नदी के दोनों तरफ़ होटलों का अम्बार है। दाहिनी तरफ़ पहाड़ों की आठ-दस क़तारें और उनके ऊपर बादलों की अठखेलियाँ आकर्षित कर रही हैं। लिद्दर नदी की ध्वनि सुनते बहुत देर तक बालकनी में बैठे रहे।

सैलानियों को आकर्षित करने वाले अन्य स्थानों में कोकरनाग 2012 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान औषधीय गुणों वाले प्राकृतिक चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीरी भाषा में नाग का अर्थ चश्मा भी होता है। वेरीनाग में भी कुछ प्राकृतिक चश्में हैं। यहां बादशाह जहांगीर ने चश्मों का जल एक ताल में एकत्र कर उसके आसपास एक उद्यान बनवाया था। 80 मीटर के दायरे में फैले आठ कोणों वाले इस ताल एवं उद्यान में चिनार के वृक्षों की कतारें सैलानियों का मन मोह लेती है। चार बजे के लगभग आधा घंटा वहाँ बिताया।

09 जुलाई 2022 को सुबह छै बजे पहलगाम से गुलमर्ग के लिए रवाना होना था लेकिन दो साथियों की तबियत ठीक न होने की वजह से नौ बजे के बाद रवाना हो सके। कश्मीर घाटी में श्रीनगर से किसी भी दिशा में निकल जाएं तो प्रकृति के इतने रूप देखने को मिलते हैं कि लगता है जैसे प्रकृति ने अपना खजाना यहीं छुपा रखा है। गुल का मतलब फूल और मर्ग याने वादी, गुलमर्ग का अर्थ हुआ फूलों की वादी। लिद्दर नदी में कल साफ़ कंचन पानी प्रवाहित हो रहा था। विगत रात अमरनाथ गुफा पर बादल फटने से आज सुबह लिद्दर नदी का पानी मटमैला हो गया है। अमरनाथ गुफा के एकतरफ से झेलम और सिंधु नदियों की सहायक नदियों का प्रवाह है।

अमरनाथ गुफा के पास बादल फटा है। सैलाब आया, कई लोग मारे गए, कई लापता हैं। इसे प्राकृतिक आपदा कहकर बात खत्म नहीं की जा सकती। प्रकृति ने नदी के रास्ते में तंबू लगाने के लिए नहीं कहा था। कोई तो ऑथोरिटी होगी, जिसकी देख रेख में अमरनाथ यात्रा चल रही है। क्या श्राइन बोर्ड इस आपदा के लिए ज़िम्मेदार नहीं? साफ दिख रहा है कि नदी के बीच में तंबू लगे हैं। पहाड़ों में मौसम की अनिश्चितता के चलते अतिरिक्त सावधानी की ज़रूरत थी। पहाड़ों को जिस क्रूरता के साथ काटा जा रहा, जंगल काटे जा रहे हैं, उससे पहाड़ कमज़ोर हुए हैं। बुलडोजरों से पहाड़ भी आतंकित हैं।

गुलमर्ग जाने के लिए अनंतनाग, अवंतिपुर के बाद नारबल से बाईं तरफ़ कट गया। कश्मीर में कौए और कुत्ते खूब हैं और खूब तंदुरुस्त भी हैं। सर्वत्र मांसाहार होने से बचा-खुचा खाना और कचरा उनका खाना ख़ज़ाना होता है। यदि ये दोनो यहाँ न हों तो धरती का स्वर्ग जानवरों हड्डियों और पक्षियों के पंखों से भर जायेगा। यह भी कश्मीरियत है। सुबह पैदल घूमने निकले तो फ़ौजियों से मेल-मुलाक़ात हुई। वे बनारस, नागालैंड और उत्तराखंड से आकर यहाँ ड्यूटी निभा रहे हैं। उन्हें स्टेट बैंक का अफ़सर होना बताया तो उन्होंने खुश होकर जयहिंद कहा। कुछ देर उनके निजी जीवन पर चर्चा हुई। उन्होंने हमसे पूछा कि सेवानिवृत्त जीवन कैसा चल रहा है। हमने जो बात कही वह उनके दिल को छू गई- हमने कहा- हर छै माह में लम्बा निकल लेते हैं। पैसा छोड़ कर जाएँगे, लड़का है तो बहु उड़ाएगी और बेटी है तो दामाद उड़ाएगा, इससे कहीं ठीक है कि आधा ख़ुद उड़ा कर जाओ। आधा छोड़ जाओ। वे हँस दिए, हम चल दिये।

कल बक़रीद है। कल से तीन दिन सब बंद रहेगा। लोग ईद की ख़रीदी में भारी संख्या में बाज़ारों में पहुँच रहे हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस भारी संख्या में सड़क पर उतरी है। हर एक किलोमीटर के फ़ासले पर एक सुरक्षित वाहन कश्मीर पुलिस का और दूसरा रिज़र्व पुलिस का मुस्तैद है। हालाँकि दंगा उपद्रव की कोई सम्भावना नहीं है। ताली दो हाथ से बजती है और यहाँ दूसरा हाथ नदारत है। और अभी चुनाव भी नहीं हो रहा है। अचानक ट्रेन का फाटक आ गया। बारामूला से बनिहाल ट्रेन चलने लगी है। वह निकलने वाली है। हम रुके हैं।

जम्मू-बारामूला लाइन को जम्मू और कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए बिछाया जा रहा है। 356 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक जम्मू से शुरू होकर बारामूला पर खत्म होगा। यह भारतीय रेलवे के उत्तरी क्षेत्र के फिरोजपुर रेलवे डिवीजन के अधिकार क्षेत्र में आता है। 359 मीटर (1,178 फीट) लंबा चिनाब ब्रिज इस लाइन पर बना है। मार्ग के निर्माण में प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिसमें प्रमुख भूकंप क्षेत्र और दुर्गम इलाके शामिल हैं। यह रेल अभी बनिहाल से बारामूला तक चल रही है। सरकार ने अगस्त 2022 तक कटरा-बनिहाल खंड को पूरा करने के लिए समय-सीमा तय की है, लेकिन कटरा-बनिहाल खंड को तय समय सीमा में पूरा करना मुश्किल लगता है।

बहुत देर होती देख सड़क पर उतर गये। एक कश्मीरी सज्जन से बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कश्मीर में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती है। सरकारी स्कूलों में उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती है। कॉन्वेंट स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम है परंतु हिंदी नहीं बल्कि उर्दू एक वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। सभी हिंदी बोलते और समझते हैं लेकिन लिखना पढ़ना नहीं आता है। यहाँ सम्पर्क भाषा को हम हिंदी के बजाय हिंदुस्तानी कह सकते हैं। जम्मू-श्रीनगर रोड पर पुलिसिया हुक्म से रुके हैं। उन्होंने सामने से बालटाल से लौटने वाला अमरनाथ यात्रा कारवाँ छोड़ा है। बस, मिनी बस, कार, ट्रैव्लर्ज़ सरपट दौड़ रहे हैं। हमारी कार के सामने मुस्तैद सिपाही खड़ा है। हम संतरे की गोली चूस रहे हैं। उनका दाहिना हाथ बट पर और बायाँ हाथ बैरल पर है। ज़रा सी भी ग़ैर-बाजिब हरकत पर आप गोलियों के हमदम हो सकते हैं।

पर्यटन के दौरान सैलानी अक्सर खाने पीने में गलती करते हैं। पैकेज में ब्रेकफ़ास्ट और डिनर शामिल होता है। लोग क्या खाना है, निश्चित नहीं करते। वे वहाँ क्या परोसा गया है और लोगों की प्लेट में क्या खाया जा रहा है। ख़ुद की ज़रूरत और पचाने की क़ाबिलियत को अनदेखा कर गफ़लत में ठूँस कर नाश्ता कर लेते हैं। अपच के शिकार होते हैं। फिर कम खाना लेने से और खूब चलने से कमजोर होकर इन्फ़ेक्शन पकड़ लेते हैं। सैलानी को पाचन क्षमता और घूमने में मेहनत के हिसाब से खुद की प्लेट तय करनी चाहिए। 

असल में पर्यटन आसान काम नहीं है। लोग या तो ज़रूरत से अधिक खाकर पेट ख़राब कर लेते हैं या सही समय पर सही खाना नहीं खाने और अधिक मेहनत से कमजोरी के कारण इन्फ़ेक्शन के शिकार हो जाते हैं। सही समय पर सही भोजन और आराम से सेहत दुरुस्त रहती है। साथ में मानसिक और भावनात्मक मज़बूती भी पर्यटन में ज़रूरी है। अन्यथा आप घूमने का आनंद लेना तो दूर की बात है, चिड़चिड़े होकर सम्बन्धों को ख़राब कर सकते हैं। 

दो सदस्यों की तबियत ख़राब हो गई है। एक को ठंड लगने से टॉन्सिल में इन्फ़ेक्शन हो गया है। दूसरी सदस्य को सर्दी जुकाम हुआ था तब से पेट साफ़ नहीं हो रहा है। पम्पोर लेठपोरा में शाश्वत और प्रतिभा को अमरनाथ यात्रा हेतु तैनात स्वास्थ्य शिविर में दिखाया। वहीं एक केसर की दुकान पर्ल ओफ़ कश्मीर से 250.00 में गोरे और चमकदार होने के लिए एक ग्राम केसर और दिल की माली हालत सुधारने के लिए 400.00 में कहवा का एक डिब्बा यह सोच कर ख़रीदा कि अब फिरसे जवाँदिल और गोरे होकर कश्मीर आयेंगे। सौदेबाज़ी के बाद 650.00 की जगह 550.00 ही भुगतान किए।

नारबल से गुलमर्ग के लिए मुड़े। यहाँ से बारामूला 37 किलोमीटर और उरी 86 किलोमीटर दूर है। उसके उस तरफ़ मुज़फ़राबाद बॉर्डर है। जहाँ से भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार होता है। आगे मागम से निकले। ईद की ख़रीददारी शबाब पर दिखी। पापलर पेड़ की क़तारें शुरू हो गईं। जो कि गुलमर्ग की पहचान हैं। कुंजर और टंगमर्ग के बाद हम गुलमर्ग पहुँच गये। हम गुलमर्ग रिज़ॉर्ट में रुके। पुराना होटल हट टाइप बना है। केबल कार में बैठकर आसमान नापने की क़वायद में एक एजेंट को बुलाकर पता किया तो उसने कहा-कल ईद होने के कारण सभी स्टाफ़ चला गया है, और उसकी बुकिंग ऑनलाइन होती है। वह भी बंद हो चुकी है। इसलिए घोड़ों से या बड़ी गाड़ी से घूमने का विकल्प है।

राजमार्गो पर लगे दिशा-निर्देशों पर लिखे अनेक शहरों के नाम सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन अधिकतर सैलानी, गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम आदि घूमने जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में कई छोटे सुंदर गांव और आसपास धान के खेत आंखों को सुहाते हैं। सीधी लंबी सडक के दोनों और ऊंची दीवार के समान दिखाई पडती पेडों की कतार अत्यंत भव्य दिखाई देती है। पुरानी फिल्मों में इन रास्तों के बीच फिल्माए गीत पर्यटकों को याद आ जाते हैं। तंग मार्ग के बाद ऊंचाई बढने के साथ ही घने पेडों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ देर बाद सैलानी गुलमर्ग पहुंचते हैं तो घास का विस्तृत तश्तरीनुमा मैदान देख कर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार उत्तराखंड में पहाडी ढलवां मैदानों को बुग्याल कहते हैं, कश्मीर में उन्हें मर्ग कहते है। गुलमर्ग का अर्थ है फूलों का मैदान। समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग सैलानियों के लिए वर्ष भर का रेसॉर्ट है। यहां से किराये पर घोडे लेकर खिलनमर्ग, सेवन स्प्रिंग और अलपत्थर जैसे स्थानों की सैर भी कर सकते हैं। घोड़े से खिलन मर्ग, चिल्ड्रन पार्क, महाराजा पैलेस तक जाकर फ़िज़ा का लुत्फ़ उठा सकते हैं। केबल कार (गंडोला) द्वारा गुलमर्ग से कुँगडोरा जाकर चारों तरफ़ मनभावन दृश्यों का आनंद के सकते हैं।

विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फकोर्स भी यहीं है। सर्दियों में जब यहां बर्फ की मोटी चादर बिछी होती है तब यह स्थान हिमक्रीडा और स्कीइंग के शौकीन लोगों के लिए तो जैसे स्वर्ग बन जाता है। यहां चलने वाली गंडोला केबल कार द्वारा बर्फीली ऊंचाइयों तक पहुंचना रोमांचक लगता है। ढलानों पर लगे चीड या देवदार के पेडों पर बर्फ लदी दिखती है। तमाम पर्यटक बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं तो बहुत से स्लेजिंग करके ही संतुष्ट हो लेते हैं। यहां पर्यटक चाहें तो स्कीइंग कोर्स भी कर सकते हैं। हर वर्ष होने वाले विंटर गेम्स के समय यहां विदेशी सैलानी भी बडी तादाद में आते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला नंदा देवी, एलओसी और पीर पंजाल रेंज का शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। हिमालय पर्वतमाला की सुंदरता को संजोने के अलावा, पर्यटक घुड़सवारी और स्नो स्कीइंग जैसी अन्य गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। केबल कार गुलमर्ग गोंडोला दुनिया की दूसरी सबसे लंबी और दूसरी सबसे ऊंची केबल कार है।  दो चरणों में विभाजित, यह प्रति घंटे लगभग 600 लोगों को अपहरवत पर्वत तक ले जाता है, जहां गुलमर्ग में अधिकांश शीतकालीन खेल होते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला के चरण 1 द्वारा गुलमर्ग रिज़ॉर्ट से कोंगदूरी पर्वत (मध्य स्टेशन) तक पहुँचे। यह 2,990 मीटर की ऊँचाई से शुरू हुआ और 400 मीटर की ऊर्ध्वाधर वृद्धि से 3390 मीटर की ऊँचाई पर पहुँचा कर रुका। गुलमर्ग गोंडोला का चरण 2 कोंगदूरी पर्वत को अपहरवत चोटी से जोड़ता है। केबल कार 1,330 वर्टिकल मीटर से लगभग 4,000 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ती है। स्टेशन पर पहुंचने के बाद पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए 30 मिनट का ट्रेक किया। यहां से एलओसी या नियंत्रण रेखा दिखाई दे रही है।

सबसे रमणीय स्थानों में से एक, खिलनमर्ग हिमालय की कुछ सबसे ऊंची चोटियों की मनोरम झलकियों से घिरा हुआ है। खिलनमर्ग एक लघु घाटी है जो 6 किमी की पैदल दूरी पर गुलमर्ग से 2000 फीट ऊपर स्थित है और जम्मू-कश्मीर में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। यह स्थान साहसिक खेलों के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का सही समावेश है, जो इसे हजारों आगंतुकों के लिए एक पसंदीदा स्थान बनाता है। ऑफबीट यात्रा के प्रति उत्साही लोगों के लिए खिलनमर्ग एक बेहतरीन जगह है क्योंकि यह स्थान सीधे वाहनों से उपलब्ध नहीं है। इस जगह तक पहुंचने के लिए या तो गुलमर्ग से पैदल चलना पड़ता है या एक टट्टू लेना पड़ता है। टट्टू की सीधी चढ़ाई चलनी पड़ी।

खिलनमर्ग वसंत ऋतु में खिलने वाले और सुगंधित फूलों से आच्छादित है और सर्दियों में स्कीइंग के प्रति उत्साही लोगों के लिए एक प्रिय गंतव्य है। जब ऊपर पहुँचे तो नंगा पर्वत शिखर और नन और कुन की जुड़वां चोटियाँ भी खिलनमर्ग से दिखाई दे रही थीं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – शंकरचार्य पहाड़ी – भाग-१८ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – शंकरचार्य पहाड़ी – भाग-१८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

शंकरचार्य पहाड़ी

मुग़ल बाग़ घूमने के बाद होटल मुग़ल दरबार में लंच हेतु गये। कश्मीरी पुलाव ने कम लगी भूख को कुछ अधिक ही बुझाया। उसके बाद डल झील को निहारते हुए शंकरचार्य पहाड़ी पर गये। श्रीनगर में ही शंकराचार्य पर्वत है जहाँ विख्यात हिन्दू धर्मसुधारक और अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक आदि शंकराचार्य सर्वज्ञानपीठ के आसन पर विराजमान हुए थे। यह मंदिर शंकराचार्य पर्वत पर स्थित है। शंकराचार्य मंदिर समुद्र तल से 1100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसे तख्त-ए-सुलेमन के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कश्मीर स्थित सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण राजा गोपादित्य ने 371 ईसा पूर्व शिव मंदिर के रूप में करवाया था। डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने मंदिर तक पंहुचने के लिए सीढ़िया बनवाई थी। इसके अलावा मंदिर की वास्तुकला भी काफी खूबसूरत है। क़रीब पाँच किलोमीटर वाहन से चलने के पश्चात 270 सीढ़ियों को हाँफते हुए चढ़कर शिव लिंग के दर्शन करने के उपरांत वह गुफा देखी जिसमें कभी आदि शंकराचार्य ने डेरा डाला, शास्त्रार्थ किया और तपस्या की थी।

 भारतीय सभ्यता की शुरुआत से कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग रहा है। नीलमत पुराण, शिव पुराण और अनेकों धार्मिक साहित्य में कश्मीर भारत का हिस्सा प्रतिपादित होता है। विभाजन के समय भारत ने धर्म के आधार पर कभी भी न तो लोगों का बँटवारा माना और न ही दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मान्यता दी इसलिए अलगाववादियों द्वारा “आज़ादी-आज़ादी” का राग अलापना तर्क सम्मत नहीं है। कश्मीर कभी भी भारत से पृथक नहीं रहा। उन्हें आज़ादी की घुटी शेख़ अब्दुल्ला ने आज़ाद मुस्लिम रियासत के नाम पर पिलाई थी। जिसे एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सही नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरू का उपयोग किया था जबकि असलियत यह है कि नेहरू ने मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर को भारत में मिलाने और बनाए रखने में शेख़ अब्दुल्ला का उपयोग किया और वक्त आने पर उन्हें जेल के सीखचों में भी रखा।

 जब आदि शंकराचार्य काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ कर चुके तब उनको यह बात बताई गई कि कश्मीर के श्रीनगर में शारदा पीठ है वहाँ दर्शन शास्त्र के प्रकांड़ विद्वान हैं, जब तक उनसे शास्त्रार्थ न होगा उनकी विद्वाता सिद्ध न मानी जाएगी। वे श्रीनगर पहुँचे जिस स्थान पर शास्त्रार्थ किया वह पहाड़ी आज भी शंकराचार्य हिल के नाम से जानी जाती है।

 07  जुलाई 2022 को सुबह सोकर तो पाँच बजे उठ गए परंतु चाय के इंतज़ार में छै बजे तक आलस्य से पड़े रहे। सात बजे निकलना हुआ। अमरनाथ यात्रा के कारण तीन बजे के पूर्व सोनमर्ग पहुँच कर वापस निकलना होगा। इसलिए जल्दी निकले। सोनमर्ग का अर्थ सोने से बना घास का मैदान होता है। सोन का अर्थ सोना और मर्ग का मतलब वादी होता है। सुबह जब सूर्य की किरण हिमशिखरों पर पड़ती हैं तब एक सुनहरी रोशनी सम्पूर्ण वादी पर छा जाती है। इसलिए उसे सोनमर्ग कहते हैं। यह जगह श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 87 किलोमीटर दूर है। सोनमर्ग पर स्थित घाटी कश्मीर की सबसे बड़ी घाटी है। यह घाटी करीबन साठ मील लम्बी है। यहीं से कारगिल और द्रास होकर लेह की सड़क निकलती गई।

 सोनमर्ग कश्मीर की एक निराली सैरगाह है। समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह एक रमणीक स्थल है। सिंध नदी के दोनों और फैले यहां के मर्ग सोने से सुंदर दिखाई देते हैं। इसीलिए इसे सोनमर्ग अर्थात सोने का मैदान कहा गया। सोनमर्ग से घुडसवारी करके थाजिवास ग्लेशियर भी देखने जा सकते हैं। वहां ग्लेशियर पर घूमने का आनंद भी लिया जा सकता है। अनंत हिमनदों के सामने खडे होकर प्रकृति की विशालता का एहसास मन में रोमांच उत्पन्न कर देता है। प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा का एक मार्ग सोनमर्ग से बालटाल होकर भी जाता है।

 हमारी यात्रा के समय अमरनाथ यात्रा भी चालू है। पूरी कश्मीर घाटी के चप्पे-चप्पे पर सेना का क़ब्ज़ा है। हरेक गली, नुक्कड़, सड़क के किनारे हथियार बंद सैनिक मुस्तैद खड़े चौकसी कर रहे हैं। ज़रा सी हरकत पर सीटियों की आवाज़ें गूँजने लगती हैं। अमरनाथ यात्रा की गाड़ियाँ निकल रही हैं। गंदेरबल, लहार, कांगम पार करके मामर में आठ बजे एक पंजाब गार्डन होटल में नाश्ता करने रुके। सोनमर्ग से एक रास्ता बालटाल निकलता है जो कि सीधा अमरनाथ गुफा तक जाता है। अमरनाथ यात्रा के यात्री जम्मू तक ट्रेन या बस से पहुँचे हैं। वहाँ से कश्मीर के वाहनों में बैठकर सोनमर्ग होकर बालटाल जा रहे हैं। मामर से घाट शुरू हो गये है। पहाड़ों से बातें करते बादल मन मोह रहे हैं। हरीगलीवान, गुंड के बाद सोनमर्ग पहुँच गये। वहाँ से डोमरी और संगम होकर अमरनाथ गुफा पहुँचा जा सकता है। यह रास्ता जोजिला दर्रा से होकर गुजरता है। अमरनाथ यात्रियों ने बताया कि यह रास्ता खड़ा और थकाऊ है। इसलिए पहलगाम से गुफा पहुँचने और गुफा से बालटाल होकर श्रीनगर लौटने का रास्ता अपनाना श्रेयस्कर होता है। 

 टैक्सी ने हमें सोनमर्ग में छोड़ दिया। वहाँ से पहाड़ों पर चढ़ने वाली फ़ोर व्हील ड्राइव एक अन्य टैक्सी किराए पर ली। शौकत वालिद ज़लील गुंड वाले की गाड़ी JK 01L-6290 पर बैठ कर फ़िश पोईंट, बालटाल, हेलिपैड, सरबल, बालटाल घाटी, जोजिला दर्रा, इंडिया गेट, ज़ीरो पोईंट तक गये। ड्राइवर अच्छे स्वभाव का लड़का है। जोजिला दर्रा के ज़ीरो पोईंट पर बर्फ़ गिरने लगी। ठंड बहुत बढ़ गई इसलिए बर्फीले पहाड़ से तुरंत नीचे उतरना पड़ा। यहाँ से द्रास 35 किलोमीटर रह जाता है। हमने एक पिघलते ग्लेशियर पर जाकर फ़ोटो खींचे। वहीं पर अस्सी रुपयों में प्लेट गरम मैगी मिल रही थी। ठंड भी खूब लग रही थी। सुबह के नाश्ते से बचाकर रखे ठंडे पराँठे निकाले और गरमागर्म मैगी के साथ खाये।  

 श्रीनगर लौटते समय खीर भवानी दर्शन हेतु रुके। खीर भवानी, क्षीर भवानी या राज्ञा देवी मंदिर भवानी देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। जम्मू और कश्मीर के गान्दरबल ज़िले में तुलमुल गाँव में एक पवित्र पानी के चश्मे के ऊपर स्थित है। यह श्रीनगर से 25 किलोमीटर दूर है। पारंपरिक रूप से वसंत ऋतु में मंदिर में खीर चढ़ाया जाता था इसलिए नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। उन्हें महारज्ञा देवी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले  मंदिर के कुण्ड का पानी काला पड़ जाता है। जम्मू और कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह और महाराजा हरि सिंह ने मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार में योगदान दिया है।

 यह मंदिर माता रंगने देवी को समर्पित है। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि अमरनाथ यात्रियों को रुकने की व्यवस्था में मंदिर तीन बजे बंद हो चुका है। इसलिए दर्शन नहीं हो सके। प्रत्येक वर्ष जेष्ठ अष्टमी (मई-जून) के अवसर पर मंदिर में वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर काफी संख्या में लोग देवी के दर्शन के लिए विशेष रूप से आते हैं।

 चट्टी पदशाही कश्मीर के प्रमुख सिख गुरूद्वारों में से एक है। सिखों के छठें गुरू कश्मीर आए थे, उस समय वह यहां कुछ समय के लिए ठहरें थे। यह गुरूद्वारा हरी पर्वत किले से बस कुछ ही दूरी पर स्थित है। उसे आज देखा। उसके बाद हज़रतबल पहुँचे। चार दिन बाद ईद का त्योहार होने से दुकानें सज रही थीं। जूते वाहन में उतारकर कर पैदल अंदर गए। यहाँ भिखारियों की भीड़ ने घेरा। किसी तरह बचते-बचाते अंदर पहुँचे।

 हजरतबल जिसे लोकप्रिय रूप से दरगाह शरीफ  कहा जाता है, कश्मीर में श्रीनगर के हजरतबल इलाके में स्थित है। इसमें एक अवशेष, मोई-ए- मुक़द्दस शामिल है, जिसे व्यापक रूप से इस्लामी पैगंबर मुहम्मद का बाल माना जाता है। यह श्रीनगर में डल झील के उत्तरी तट पर स्थित है, और इसे कश्मीर का सबसे पवित्र मुस्लिम तीर्थ माना जाता है।

 इस दरगाह में कई मुसलमानों द्वारा इस्लामिक पैगंबर मुहम्मद के बाल होने का विश्वास किया जाता है। अवशेष को पहली बार मुहम्मद के एक कथित वंशज सैयद अब्दुल्ला मदनी ने मदीना से 1635 में लाकर दक्षिण भारतीय शहर बीजापुर में बस गए। अब्दुल्ला की मृत्यु के बाद, उनके बेटे सैयद हमीद को वह अवशेष विरासत में मिला। कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र पर मुगलों ने कब्जा कर लिया और हमीद से उसकी पारिवारिक संपत्ति छीनी जाने लगी। खुद को अवशेष की देखभाल करने में असमर्थ पाते हुए, उन्होंने इसे एक अमीर कश्मीरी व्यापारी ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई को दे दिया।

 हजरतबल तीर्थ की स्थापना शुरू में ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई की बेटी इनायत बेगम द्वारा की गई थी। इमारत का पहला निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल सूबेदार सादिक खान ने बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान किया था। इसे शुरू में इशरत जहां कहा जाता था। 1634 में शाहजहाँ ने इमारत को एक प्रार्थना कक्ष में बदलने का आदेश दिया था।

जब मुगल सम्राट औरंगजेब को पवित्र अवशेष के अस्तित्व और हस्तांतरण के बारे में सूचित किया गया था, तो उन्होंने इसे जब्त कर लिया और अजमेर में सूफी फकीर मुइन अल-दीन चिश्ती की दरगाह में भेज दिया, और ईशाई को दिल्ली में कैद कर लिया।

किंवदंती है कि नौ दिनों के बाद औरंगजेब ने चार खलीफाओं अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली के साथ मुहम्मद का सपना देखा। सपने में, मुहम्मद ने उसे अजमेर से मोई-ए-मुक़द्दस को कश्मीर भेजने का आदेश दिया। तब औरंगजेब ने पवित्र अवशेष ईशाई को लौटाने और उसे कश्मीर ले जाने की अनुमति दी। हालांकि, जेल में रहते हुए ईशाई की पहले ही मौत हो चुकी थी। 1700 में अवशेष को ईशाई की बेटी इनायत बेगम के साथ कश्मीर ले जाया गया था। उसने वहां अवशेष की रखवाली कर हजरतबल तीर्थ की स्थापना की। तब से, उसके पुरुष वंशज मस्जिद में अवशेष की रखवाली कर रहे हैं। बेगम के पुरुष वंशज बंदे परिवार के नाम से जाने जाते हैं। 2019 तक, तीन मुख्य सदस्य पवित्र अवशेष की देखभाल करते हैं: मंजूर अहमद बंदे, इशाक बंदे और मोहिउद्दीन बंदे। अवशेष केवल विशेष इस्लामी अवसरों जैसे मुहम्मद और उनके चार मुख्य साथियों के जन्मदिन, पर सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है,

मोई-ए-मुक़क़दस, मुसलमानों द्वारा व्यापक रूप से मुहम्मद के बाल माने जाने वाला एक अवशेष, 27 दिसंबर 1963 को दरगाह से गायब होने की सूचना मिली थी। इसके लापता होने के बाद, सैकड़ों लोगों के साथ पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। 31 दिसंबर को, भारतीय प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पवित्र मुस्लिम अवशेष के गायब होने पर राष्ट्र को सम्बोधित किया, और संदिग्ध चोरी की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो से एक टीम को जम्मू और कश्मीर भेजा।

इस घटना के कारण भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में सांप्रदायिक तनाव और दंगे हुए, जिसके कारण भारत ने दिसंबर 1963 और फरवरी 1964 के बीच लगभग 200,000 लोगों को शरणार्थी शरण दी। अवशेष 4 जनवरी 1964 को भारतीय अधिकारियों द्वारा बरामद किया गया था। मांग की गई थी कि इसे आधिकारिक तौर पर बड़ों द्वारा पहचाना जाए। यह आरोप लगाया गया था कि राजनीतिक आकाओं ने बाल चुराया था ताकि वे बाद में इसे बहाल करने का श्रेय लेकर सत्ता में आ सकें। वर्तमान संरचना 1968 में शुरू होकर 11 साल बाद यह 1979 में बनकर तैयार हुई। इस मस्जिद को कई अन्य नामों जैसे हजरतबल, अस्सार-ए-शरीफ, मादिनात-ऊस-सेनी, दरगाह शरीफ और दरगाह आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस मस्जिद के समीप ही एक खूबसूरत बगीचा और इश्‍रत महल है।

आज दोपहर सोनमर्ग से वापिस लौटते वक़्त जामा मस्जिद देखी, जो कश्मीर की सबसे पुरानी और बड़ी मस्जिदों में से है। मस्जिद की वास्तुकला काफी अद्भुत है। माना जाता है कि जामा मस्जिद की नींव सुल्तान सिकंदर ने 1398 ई. में रखी थी। इस मस्जिद की लंबाई 384 फीट और चौड़ाई 38 फीट है। इस मस्जिद में तीस हजार लोग एक-साथ नमाज अदा कर सकते हैं। पुराने शहर के मध्य नौहट्टा में स्थित, जामा मस्जिद को सुल्तान सिकंदर ने 1394 ई. में बनवाया था और 1402 ई. कश्मीर में सबसे महत्वपूर्ण मस्जिदों में से एक थी। श्रीनगर में धार्मिक-राजनीतिक जीवन का एक केंद्रीय क्षेत्र है। हर शुक्रवार को मुसलमानों की भीड़ उमड़ती है, यह श्रीनगर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है।

दिन का अंतिम पड़ाव चश्मा शाही बगीचा था। चश्मे शाही या चश्मा शाही या (शाही वसंत), जिसे चश्मा शाही भी कहा जाता है, मुगल सम्राट शाहजहां के गवर्नर अली मर्दन खान द्वारा एक झरने के आसपास 1632 ईस्वी में निर्मित मुगल उद्यानों में से एक है। सम्राट के आदेशानुसार अपने ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार दारा शिकोह के लिए उपहार स्वरूप बनाया गया था। यह उद्यान भारत के श्रीनगर में डल झील के सामने राजभवन (गवर्नर हाउस) स्थित है।

चश्मे शाही मूल रूप से वसंत से अपना नाम प्राप्त करता है जिसे कश्मीर की महान महिला संत रूपा भवानी द्वारा खोजा गया था, जो कश्मीरी पंडितों के साहिब वंश से थी। रूपा भवानी का पारिवारिक नाम ‘साहिब’ था और वसंत को मूल रूप से ‘चश्मे साहिबी’ कहा जाता था। वर्षों से यह नाम भ्रष्ट हो गया और आज इस स्थान को चश्मे शाही (रॉयल स्प्रिंग) के नाम से जाना जाता है।

चश्मा शाही के पूर्व में परी महल (फेयरी पैलेस) स्थित है जहाँ दारा शिकोह ज्योतिष सीखते थे और जहाँ बाद में उनके भाई औरंगजेब ने उनकी हत्या कर दी थी। यह उद्यान 108 मीटर लंबा और 38 मीटर चौड़ा है और एक एकड़ भूमि में फैला हुआ है। यह श्रीनगर के तीन मुगल उद्यानों में सबसे छोटा उद्यान है; शालीमार उद्यान सबसे बड़ा और निशात उद्यान दूसरा सबसे बड़ा उद्यान है। तीनों उद्यान डल झील के दाहिने किनारे पर बनाए गए थे, जिसकी पृष्ठभूमि में ज़बरवान रेंज है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – कश्मीर यात्रा – जन्नत की सैर – भाग-१७ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – कश्मीर यात्रा – जन्नत की सैर – भाग-१७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

जम्मू-कश्मीर अपने अंदर अद्भुत खूबसूरती समेटे हुए है। यहां की अनोखी खूबसूरती के कारण ही कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। कश्मीर की प्राकृतिक वादियां, झरने, नदियां, बर्फ से ढके पहाड़ और घने जंगल यहां की खूबसूरती को इस कदर बढ़ाते हैं कि हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक जम्मू कश्मीर की ओर खिंचे चले आते हैं।

06 जुलाई 2022 को सुबह चार बजे उठकर छै बजकर पचपन मिनट की फ़्लाइट पकड़ने पाँच बजे लेह की होटल से रवाना हुए। होटल ने नाश्ते के लिए सैंडविच और फ़्रूट जूस पैकेज रख दिए हैं। लेह हवाईअड्डा पर बहुत अफ़रातफ़री का माहौल था। पहले तो अंदर घुसने की लम्बी क़तार, फिर चेक-इन काउंटर पर भारी भीड़ और काउंटर बदलने की क़वायद ने सब का मूड पूरी तरह ख़राब कर दिया। उस पर चिड़चिड़ाते यात्रियों के झगड़ों ने बचीखुची कसर निकाल दी। तीन काउंटर बदलने के बाद चेक-इन हुआ तो काउंटर पर कार्यरत कर्मचारी बोर्डिंग पास दिए बग़ैर काउंटर बंद करके चलती बनी। हम गो-फ़र्स्ट एयरलाईन कम्पनी के स्टाफ़ के पीछे बोर्डिंग पास के लिए भटकते रहे। यह तो अच्छा था कि सौम्या ने ई-वेब चेक-इन करके बोर्डिंग पास डाउनलोड कर रखे थे। उसमें भी एक नई समस्या आ खड़ी हुई। सौम्या का बोर्डिंग पास मोबाईल में नहीं खुल रहा था। गेट पर, फिर विमान में चढ़ने पर अनेक दिक़्क़त का सामना किया। अंत समय में चेकिंग कर्मचारी से हॉटस्पॉट लेकर बोर्डिंग पास दिखा कर विमान में सवार हुए। विमान में भी अव्यवस्था ने पीछा नहीं छोड़ा। वह विमान लेह से श्रीनगर होकर मुंबई जा रहा था। हमारी कुर्सियाँ अंत में 28-F, 29-F और 30-F थीं। ऊपर के सामान रखने की जगह बिल्कुल भी ख़ाली नहीं थी। यात्रियों की बहस से माहौल गर्माया हुआ था। आख़िर में यात्रियों ने घुटनों पर हैंडबैग रखकर बैठना ठीक समझा। विमान ने उड़ान भरी।

नीचे सिंधु नदी की घाटी में धीर-गम्भीर सिंधु नदी का नजारा दिखने लगा। हल्के बादलों से विमान ऊपर उठकर श्रीनगर की तरफ़ उड़ चला। हम थोड़ी सी देर में ही हिमशिखरों के ऊपर उड़ान भर रहे हैं। जँसकार घाटी से निकलती छोटी नदियों का बहाव सिंधु तरफ़ जा रहा हैं। कारगिल के नज़दीक द्रास दर्रा जैसे ही निकला सूखे पहाड़ हरेभरे पर्वतों में बदलने लगे। कल लद्दाख़ के ड्राइवर ने पूछा था कि साहब कल कहाँ जा रहे हैं। जब हमने उसे कश्मीर बताया तो वह बोला-कश्मीर में हरियाली के अलावा कुछ नहीं है। कश्मीरी टैक्सी चालक ने पूछा कि साहब कहाँ से आ रहे हैं। हमने लद्दाख़ बताया तो वह बोला- वहाँ सूखे पहाड़ों के अलावा कुछ नहीं है। सबको अपना स्थान प्यारा होता है। होटल में पोहा-चाय का नाश्ता किया। ग्यारह बजे श्रीनगर घूमने निकले।

श्रीनगर (Srinagar) भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य का सबसे बड़ा शहर और ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यह कश्मीर घाटी में झेलम नदी के किनारे बसा हुआ है, जो सिन्धु नदी की प्रमुख उपनदी है। प्रसिद्ध डल झील और आंचार झील भी श्रीनगर का महत्वपूर्ण भाग हैं। कश्मीर घाटी के मध्य में बसा दस लाख से अधिक जनसंख्या वाला यह नगर भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। श्रीनगर अपने उद्यानों व प्राकृतिक वातावरण के लिए जाना जाता है और यहाँ के कश्मीर शॉल, सेव व मेवा देशभर में प्रसिद्ध है।

श्रीनगर विभिन्न मंदिरों व मस्जिदों के लिए भी प्रसिद्ध है। समुद्रतल से 1700 मीटर ऊंचाई पर बसा श्रीनगर विशेष रूप से झीलों और हाऊसबोट के लिए जाना जाता है। इसके अलावा श्रीनगर परम्परागत कश्मीरी हस्तशिल्प और सूखे मेवों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। श्रीनगर का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि सम्राट अशोक मौर्य ने इस नगर को बसाया था। इस जिले के चारों ओर पांच अन्य जिले स्थित है। श्रीनगर जिला कारगिल के दक्षिण में, बुदग़म के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। ये शहर और उसके आस-पार के क्षेत्र एक ज़माने में दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल माने जाते थे — जैसे डल झील, शालीमार और निशात बाग़, गुलमर्ग, पहलगाम, चश्माशाही, आदि। यहाँ हिन्दी सिनेमा की कई फ़िल्मों की शूटिंग हुआ करती थी। माना जाता है कि श्रीनगर की हज़रतबल मस्जिद में हजरत मुहम्मद की दाढ़ी का एक बाल रखा है। डल झील और झेलम नदी (संस्कृत : वितस्ता, कश्मीरी : व्यथ) में आवागमन, घूमने और बाज़ार और ख़रीददारी का ज़रिया ख़ास तौर पर शिकारा नाम की नावें हैं। कमल के फूलों से सजी रहने वाली डल झील पर कई ख़ूबसूरत नावों पर तैरते घर भी हैं जिनको हाउसबोट कहा जाता है।

पांच मील लम्बी और ढाई मील चौड़ी डल झील श्रीनगर की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सबसे खूबसूरत झीलों में से है। दुनिया भर में यह झील विशेष रूप से शिकारों या हाऊस बोट के लिए जानी जाती है। जिसके चारों तरफ़ बीस किलोमीटर सड़क का घेरा है। डल झील के आस-पास की प्राकृतिक सुंदरता लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। डल झील चार भागों गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल और नागिन में बंटी हुई है। इसके अलावा यहां स्थित दो द्वीप सोना लेंक और रूपा लेंक झील की खूबसूरती को ओर अधिक बढ़ाते हैं।

श्रीनगर का सबसे बडा आकर्षण यहां की डल झील है। जहां सुबह से शाम तक रौनक नजर आती है। सैलानी घंटों इसके किनारे घूमते रहते हैं या शिकारे में बैठ नौका विहार का लुत्फ उठाते हैं। दिन के हर प्रहर में इस झील की खूबसूरती का अलग रंग दिखाई देता है। देखा जाए तो डल झील अपने आपमें एक तैरते नगर के समान है। तैरते आवास यानी हाउसबोट, तैरते बाजार और तैरते वेजीटेबल गार्डन इसकी खासियत हैं। कई लोग तो डल झील के तैरते घरों यानी हाउसबोट में रहने का लुत्फ लेने के लिए ही यहां आते हैं। झील के मध्य एक छोटे से टापू पर नेहरू पार्क है। वहां से भी झील का रूप कुछ अलग नजर आता है। दूर सडक के पास लगे सरपत के ऊंचे झाडों की कतार, उनके आगे चलता ऊंचा फव्वारा बडा मनोहारी मंजर पेश करता है। झील के आसपास पैदल घूमना भी सुखद लगता है। शाम होने पर भी यह झील जीवंत नजर आती है। सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी रंग झील को अपने रंग में रंग लेता है, तो सूर्यास्त के बाद हाउसबोट की जगमगाती रोशनियों का प्रतिबिंब झील के सौंदर्य को दुगना कर देता है। शाम के समय यहां खासी भीड नजर आती है।

मुगल बादशाहों को वादी-ए-कश्मीर ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। यहां के मुगल गार्डन इस बात के प्रमाण हैं। ये उद्यान इतने बेहतरीन और नियोजित ढंग से बने हैं कि मुगलों का उद्यान-प्रेम इनकी खूबसूरती के रूप में यहां आज भी झलकता है। मुगल उद्यानों को देखे बिना श्रीनगर की यात्रा अधूरी-सी लगती है। अलग-अलग खासियत लिए ये उद्यान किसी शाही प्रणय स्थल जैसे नजर आते हैं। शाहजहां द्वारा बनवाया गया चश्म-ए-शाही इनमें सबसे छोटा है। यहां एक चश्मे के आसपास हरा-भरा बगीचा है। इससे कुछ ही दूर दारा शिकोह द्वारा बनवाया गया परी महल भी दर्शनीय है। निशात बाग 1633 में नूरजहां के भाई द्वारा बनवाया गया था। ऊंचाई की ओर बढते इस उद्यान में 12 सोपान हैं। टिकट लेकर प्रवेश किया। चश्मे के किनारे से आगे बढ़ते गए। साथ में सैलानियों की भी भीड़ बढ़ती जा रही थी। फ़ोटो खींचने की जुगत में लोग पसीना-पसीना होकर उलझ रहे थे। हमें पता नहीं था कि एक महिला सैलानी अपने खाबिंद की तस्वीर खींच रही थी। हम बीच में आ गए। वह मोहतरमा बोलीं- कैसा पागल है? हमने कहा मेडम, हमें नहीं पता था कि आप तस्वीर खींच रहीं हैं। फिर आपने अपनी पागलपन की पदवी हमें क्यों दे दी। यह सार्वजनिक स्थल है आपके घर की बैठक नहीं जो आप मुफ़्त में अपनी ख़ानदानी पदवी हमें अता करें। वह महिला ग़ुस्से में लाल हो गई। उनके साथियों ने हमसे माफ़ी माँगते हुए कहा- माफ़ करें साहब, थोड़ी पागल है। 

उसके बाद शालीमार बाग पहुँचे, जिसे जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के लिए बनवाया था। वे गर्मियाँ श्रीनगर के इसी बाग में बिताते थे। इस बाग में कुछ कक्ष बने हैं। अंतिम कक्ष शाही परिवार की स्त्रियों के लिए था। इसके सामने दोनों ओर सुंदर झरने बने हैं। मुगल उद्यानों के पीछे की ओर जावरान पहाडियां हैं, तो सामने डल झील का विस्तार नजर आता है। इन उद्यानों में चिनार के पेडों के अलावा और भी छायादार वृक्ष हैं। इनमें रंग-बिरंगे फूलों की भरमार है। इन उद्यानों के मध्य बनाए गए झरनों से बहता पानी भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है। ये सभी बाग वास्तव में शाही आरामगाह के उत्कृष्ट नमूने हैं। वहाँ झरनों और सरोवरों में बच्चे कूद कर नहा रहे थे, और भी अनुशासनहीनता देखने को मिलीं। एक माली सा दिखता आदमी एक गुलाब का फूल देकर कहने लगा कि कुछ ईनाम मिल जाये। पैसे नहीं देने पर बदतमीज़ी करने लगा। उसे डाँटकर भगाया। श्रीनगर में कहीं भी भिखारी परेशान करने लगते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – हेमिस गोंपा – भाग-१६ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – हेमिस गोंपा – भाग-१६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हेमिस गोंपा

हेमिस मठ भारत में द्रुकपा वंश का लेह से 45 किमी दूर स्थित एक हिमालयी बौद्ध मठ (गोम्पा) है। हेमिस मठ 11वीं शताब्दी से पहले अस्तित्व में था। इसे 1672 में लद्दाखी राजा सेंगगे नामग्याल द्वारा फिर से स्थापित किया गया था। पद्मसंभव का सम्मान करने वाला वार्षिक हेमिस उत्सव जून की शुरुआत में वहां आयोजित किया जाता है।

भारत की पूरी दुनिया में पहचान ऐसे देश के रूप में होती है जहां सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं। हमारे यहां रोजाना देश के किसी न किसी हिस्से में त्योहार मनाया जाता है। भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग बिना किसी डर के अपने-अपने त्योहार और उत्सव धूम-धाम से मनाते हैं। ऐसा ही एक उत्सव है प्रसिद्ध हेमिस गोम्पा मेला, जो केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में बौद्ध समुदाय द्वारा आयोजित किया जाता है। हेमिस गोम्पा मेला लद्दाख के सबसे बड़े बोद्ध मठ हेमिस गोंपा में आयोजित किया जाता है।

हेमिस गोम्पा मेला हर साल बौद्धिक कैलंडर के अनुसार पांचवे महीने में मनाया जाता है। हेमिस गोम्पा मेले का सबसे बड़ा आकर्षण है स्थानीय लोगों द्वारा मुखौटा पहनकर किए जाने वाला नृत्य। मेले में चार पैर के करताल, ढोल, छोटी तुरही सहित अन्य वाद्य यंत्र की मदद से संगीतकार संगीत की प्रस्तुति देते हैं। इस दौरान स्थानीय लोग लंबे सींग और मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं। स्थानीय नृत्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इसके लिए अलावा मेले में सुंदर हस्तकलाओं की भी प्रदर्शनी होती है। हेमिस गोम्पा मेले में आकर स्थानीय परम्परा को करीब से जानने का मौका मिलता है।

हेमिस गोम्पा मेले को लेकर बौद्ध अनुयायियों की मान्यता है कि इस मेले से अच्छे स्वास्थ्य और धार्मिक शक्ति को बढ़ावा मिलता है। यह मेला भगवान पद्मसंभव के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान पद्मसंभव के जीवन का लोगों को अध्यात्म से जोड़ने का एक ही लक्ष्य था। यहां पर सबसे बड़ी थंक़ा तस्वीर भी हैं, जिसे 12 सालों में एक बार आम लोगों के दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।

हेमिस महोत्सव भगवान पद्मसंभव (गुरु रिनपोछे) को समर्पित है, जिन्हें बुद्ध के अवतार रूप में नृत्य प्रदर्शन करके सम्मानित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि की भविष्यवाणी के अनुसार बंदर वर्ष के पांचवें महीने के 10 वें दिन उनका जन्म हुआ था। यह भी माना जाता है कि उनका जीवन मिशन सभी जीवित प्राणियों की आध्यात्मिक स्थिति में सुधार करना था। इसलिए यह दिन 12 वर्षों के चक्र में एक बार आता है, हेमिस उसकी स्मृति में एक बड़ा उत्सव मनाता है। माना जाता है कि इन पवित्र अनुष्ठानों के पालन से आध्यात्मिक शक्ति और अच्छा स्वास्थ्य मिलता है। हेमिस उत्सव मठ के मुख्य द्वार के सामने आयताकार प्रांगण में होता है। अंतरिक्ष चौड़ा और खुला है, दो उभरे हुए वर्गाकार चबूतरे, तीन फीट ऊंचे केंद्र में एक पवित्र खंभा के साथ। एक अच्छी तरह से चित्रित छोटी तिब्बती मेज के साथ एक समृद्ध गद्दीदार सीट के साथ एक उठा हुआ मंच औपचारिक वस्तुओं के साथ रखा गया है – पवित्र जल से भरे कप, बिना पके चावल, तोरमाआटे और मक्खन और अगरबत्ती से सजा। कई संगीतकार चार जोड़ी झांझ, बड़े पैन ड्रम, छोटे तुरही और बड़े आकार के पवन उपकरणों के साथ पारंपरिक संगीत बजाते हैं। उनके बगल में लामाओं के बैठने के लिए एक छोटा सा स्थान निर्धारित किया गया है।

समारोह गोम्पा के ऊपर एक सुबह की रस्म के साथ शुरू होता है, जहां ढोल की थाप और झांझ की गड़गड़ाहट और पाइपों की आध्यात्मिक जय हेतु “दादमोकार्पो” या “रयज्ञलरस रिनपोछे” का चित्र औपचारिक रूप से प्रशंसा और पूजा करने के लिए प्रदर्शित किया जाता है।

उत्सव के सबसे गूढ़ रहस्यवादी मुखौटा नृत्य हैं। लद्दाख के मुखौटा नृत्यों को सामूहिक रूप से चाम्स प्रदर्शन के रूप में जाना जाता है। चाम्स प्रदर्शन अनिवार्य रूप से तांत्रिक परंपरा का एक हिस्सा है, जो केवल उन गोम्पों में किया जाता है जो भिक्षु तांत्रिक वज्रयान शिक्षाओं का पालन करके तांत्रिक पूजा करते हैं।

हेमिस गोम्पा दर्शन के बाद पेट में चूहे कूदना शुरू हो गए थे। हेमिस से थिकसे आधा घंटे का सफ़र था। बीच में स्टांका नामक जगह पर दोपहर का भोजन निपटाया। फिर रामबीरपुर होते हुए थिकसे गोम्पा पहुँचे। थिकसे ऊँची पहाड़ी पर सबसे खूबसूरत दिखता है। नीचे सिंधु नदी बहुत छोटे स्वरूप में बहती दिखती है।

थिकसे गोम्पा

अब हम थिकसे गोम्पा पहुँच गए हैं। ठिकसे गोम्पा या थिकसे मठ, टिकसे, के रूप में भी लिप्यंतरित होता है। यह एक तिब्बती शैली का मठ है जो तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय से संबद्ध है। यह लेह से लगभग 19 किलोमीटर (12 मील) पूर्व थिकसे बस्ती में एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह तिब्बत के ल्हासा में पोटाला पैलेस से मिलता-जुलता है, और मध्य लद्दाख में सबसे बड़ा गोम्पा है, जिसमें विशेष रूप से महिला साधकों के लिए अलग इमारतों की व्यवस्था है।

यह मठ सिंधु घाटी में 3,600 मीटर (11,800 फीट) की ऊंचाई पर स्थित एक बारह मंजिला परिसर है और इसमें बौद्ध कला की कई वस्तुएं जैसे स्तूप, मूर्तियाँ, थांगका, दीवार पेंटिंग और तलवारें हैं। इसमें मैत्रेय की 15 मीटर (49 फीट) ऊंची प्रतिमा है, जो लद्दाख में भवन के भीतर इमारत की दो मंजिलों को कवर करती सबसे बड़ी मूर्ति है।

15वीं शताब्दी की शुरुआत में, गेलुग स्कूल के संस्थापक, जे चोंखापा, जिन्हें अक्सर “पीली टोपी” कहा जाता है, ने अपने छह शिष्यों को नए स्कूल की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए तिब्बत के दूरदराज के क्षेत्रों में भेजा। चोंखापा ने अपने शिष्यों में से एक, जंगसेम शेराप ज़ंगपो (विली: शे रब बज़ंग पो), अमितायस (अमिताभ का संभोगकाया रूप) की एक छोटी मूर्ति दी, जिसमें हड्डी का पाउडर और चोंखापा के खून की एक बूंद थी। चोंखापा ने उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार में मदद मांगने के संदेश के साथ लद्दाख के राजा से मिलने का निर्देश दिया।

राजा, जो उस समय शे के पास नुब्रा घाटी में रह रहे थे, मूर्ति के उपहार से खुश हुए थे। राजा ने अपने मंत्री को लद्दाख में गेलुग आदेश के मठ की स्थापना के लिए शेरब जांगपो की मदद करने का निर्देश दिया। नतीजतन, 1433 में, जांगपो ने सिंधु के उत्तर में स्टैग्मो में ल्हाखांग सर्पो “येलो टेम्पल” नामक एक छोटे से मठ की स्थापना की। उनके प्रयासों के बावजूद, गेलुग व्यवस्था को अपनाने वाले लामा शुरू में कम थे, हालांकि उनके कुछ शिष्य प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गए।

15 वीं शताब्दी के मध्य में, पाल्डेन जांगपो ने अपने शिक्षक शेरब जांगपो द्वारा शुरू किए गए मठवासी कार्य को जारी रखा। उन्होंने यहां एक बड़ा मठ बनाने का फैसला किया, जो एक जगह का चयन करते समय हुई एक असामान्य घटना से तय होता था। किंवदंतियाँ हैं कि चोंखापा ने भविष्यवाणी की थी कि उनका स्वप्न सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर समृद्ध होगा। यह भविष्यवाणी तब सच हुई जब थिकसे मठ की स्थापना हुई। इसके बाद स्पितुक मठ और लिकिर मठ सिंधु के दाहिने किनारे पर ही स्थित हैं।

नया थिकसे मठ स्टैग्मो से कुछ किलोमीटर दूर, इसी नाम के एक गांव के ऊपर एक पवित्र पहाड़ी पर स्थित था। माना जाता है कि इस मठ का निर्माण पहले कदम की स्थापना के स्थान पर या उत्तर में लगभग 7 किलोमीटर (4.3 मील) स्टाकमो के छोटे चैपल के रूप में किया गया था। रिनचेन ज़ंगपो को थिकसे में लखंग न्येर्मा नाम के एक मंदिर का निर्माण करने के लिए भी जाना जाता है, जो रक्षक दोर्जे चेन्मो को समर्पित है। आज, जो कुछ देखा जा सकता है वह कुछ खंडहर है।

इस क्षेत्र में दस अन्य मठों हैं, जिनमे डिस्किट, स्पितुक, लिकिर और स्टोक प्रमुख हैं। हेमिस मठ के बाद थिकसे दूसरे स्थान पर है। थिकसे मठ के पास 1,327 एकड़ (537 हेक्टेयर) भूमि का स्वामित्व है और कुछ 25 गांव मठ से जुड़े हैं।

थिकसे मठ सहित लद्दाख में पुराने मठों का जीर्णोद्धार संबंधित मठ प्रशासन के अनुरोध पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किया जा रहा है। हालाँकि, यह विवाद के बिना नहीं रहा है। ऐसा कहा जाता है कि पारंपरिक मिट्टी और पत्थर के आंगनों को ग्रेनाइट में बदल दिया गया है, जिसने चमक को खराब कर दिया है। इसी तरह, मठ के पुनर्निर्मित दाहिने पार्श्व में नए रसोईघर का निर्माण शामिल है।

पर्यटकों की रुचि के मुख्य बिंदुओं में से एक मैत्रेय (भविष्य बुद्ध) मंदिर है, जिसे 14वें दलाई लामा की 1970 में इस मठ की यात्रा के उपलक्ष्य में बनाया गया था। इसमें मैत्रेय बुद्ध की 15 मीटर (49 फीट) ऊंची मूर्ति है, जो इस तरह की सबसे बड़ी मूर्ति है। उन्हें असामान्य रूप से कमल की स्थिति में बैठे रूप में चित्रित किया गया है, न कि उनके सामान्य प्रतिनिधित्व के रूप में खड़े होने या एक उच्च सिंहासन पर बैठने की मुद्रा में। यह मठ की सबसे बड़ी बुद्ध प्रतिमा है, और इसे बनने में चार साल लगे। इसे स्थानीय कलाकारों द्वारा केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान (लेह) के मास्टर शिल्प गुरु नवांग त्सेरिंग के मार्गदर्शन में बनाया गया था – यह मिट्टी की बनी है जिसका ऊपरी आवरण ताम्बा मिश्रित सुनहरे रंग में है। इस तरह हमारी लद्दाख़ यात्रा पूरी हुई।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

पैंगोंग झील

04 जुलाई 2022 को आज विश्व प्रसिद्ध पैंगोंग झील पहुँचने के लिए सात बजे हुंदर से निकलना पड़ा। ड्राइवर का कहना था कि दोपहर में ग्लेशियर का पानी पिघल कर रास्ते में तेज़ी से बहकर व्यवधान उत्पन्न करता है, इसलिए कई स्थानों पर सड़क टूट जाती है। सीमा सड़क संगठन के कर्मचारी उसे ठीक करते चलते हैं। सुबह चाय बिस्कुट लिया और नाश्ता पेक करवा कर रख लिया।

पैंगोंग झील की जुड़वा त्सो मोरीरी झील का जायज़ा भी लेना ठीक रहेगा। मोरीरी झील को पैंगोंग झील की जुड़वा बहन कहा जाता है, जो लद्दाख के चांगथंग क्षेत्र में स्थित है। इस झील की समुद्र तल से ऊंचाई 4522 मीटर (14,836 फीट) है, जिसकी वजह से यहां पर भी ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है और यही कारण है कि यहां पर पर्यटकों की ज्यादा भीड़ नहीं होती। इस झील की लंबाई 135 किमी. है जो भारत और चीन दोनों देशों में विस्तारित है। इस झील में भारत का हिस्सा 1/3 (45 किमी.) और चीन का हिस्सा 2/3 (90 किमी.) है। यह झील अपने रंगों को बदलने में माहिर है। इस झील का रंग सूर्य किरणों और उनके बर्फीले पहाड़ों पर प्रतिबिम्ब से नीला, लाल और कभी-कभी हरा भी दिखलाई पड़ता है। झील के रंग से आसपास का आभामंडल भी उसी रंग का बनता है।

इस झील के किनारे कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, लेकिन 2009 में 3-इडियटस् फिल्म का शूटिंग होने के कारण यह झील काफी चर्चा में आई और अब आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। झील के पानी का कहीं पर भी निकास न होने की वजह से इसका पानी खारा है और खारा होने के बावजूद भी सर्दियों में यह झील जम जाती है, उस समय इसके ऊपर बाइक और कार वगैरह को आसानी से चलाया जा सकता है।

हुंदर, डिसकिट, खालसर और अगम के बीच एक तरफ़ गगनचुंबी पहाड़ दूसरी तरफ़ पाँच सौ फुट से एक हज़ार फुट गहरी खाई के किनारे से ख़तरनाक रास्ता पर चलते जान मुँह को आती रही। सब चुप थे। ज़ुबान को जैसे लकवा मार गया हो। घबराहट से जान छुड़ाने के लिए फ़िल्मी गीत तेज आवाज़ में बजाए जाने लगे। उसके बाद रेतीले पिघलते पहाड़ों की शृंखला आरम्भ हुईं। सीमा सड़क संगठन ने श्योक नदी के बीच से रास्ता निकाला है। जिसमें बीच-बीच में कई धाराएँ निकली हैं। रास्ता अक्सर बंद रहता है। अगम में एक नाश्ते की दुकान पर हुंदर से लाया नाश्ता निपटा रहे थे तभी खबर मिली कि आगे रास्ता बंद है। रास्ता खुला लेकिन थोड़ी दूर चलने पर फिर रुकना पड़ा। सीमा सड़क संगठन के श्रमिक बिल्कुल स्याह पड़ चुके हैं। वे बहुत मुश्किल वातावरण में सड़कों की मरम्मत और रखरखाव करते हैं। भोपाल से साथ लाए मिठाई उन्हें खिलाई और उनके हालचाल पूछे। श्योक नदी के अंदर से रास्ता है। जो ठंड के दिनों में बर्फ़ से भर जाता है। 

क्ति नामक गाँव से एक रास्ता लेह जाता है। हमने श्योक जाने वाला रास्ता पकड़ा। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। एक तरफ़ नदी का पाठ है और दूसरी तरफ़ से रास्ता। कभी भी कहीं से ग्लेशियर का पानी तेज़ी से आ सकता है। पेट्रोलिंग पुलिसकर्मी गाड़ियों को निकालने में सहायता करते हैं। अभी एक जगह बहुत देर से फँसे हैं। बाईकर्स निकलते जा रहे हैं। दुनिया के अत्यंत दुरूह रास्ता पर यात्रा करना रोमांचक है। पैंगांग पहुँचना है, कब पहुँचेंगे, कैसे पहुँचेंगे, कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। साहस और धैर्य की परीक्षा का समय है। कुछ लोग उत्तेजित हैं तो कुछ बोरियत ढ़ो रहे हैं। साथ रखा पानी पेशाब बनकर ख़त्म होता जा रहा है। अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। हृदय गति बेचैनी का मापक यंत्र साथ है। हृदय गति बढ़ती जा रही है। मापी तो 72-75 रहने वाली हृदय गति 96-98 आ रही है। बैठे-बैठे घुटने पथराने लगे हैं। हालाँकि आक्सीजन का स्तर 97-98 है। जितने भी फ़िल्मी गीत थे सब तीन बार सुन चुके हैं। अभी पता चला है कि आगे बड़े ग्लेशियर से पानी एकदम आने लगा है। पता नहीं ग्लेशियर महोदय की कृपा कब होगी। कब पानी पिघलना रोकेंगे और रास्ता खुलेगा।

आजकल युवा जोड़े बाईक पर खूब आने लगे हैं। युवकों में साहसिक रोमांचक यात्रा का रुझान बढ़ा है। तीन-चार सौ गाड़ियों का जाम लग चुका है। बाईकर सबसे आगे पहुँच गए हैं। पानी रुकने पर वे पहले निकलेंगे बाद में गाड़ियाँ। हमारे साथी श्योक नदी के पानी को छूने चले गये, तभी रास्ता खुल गया। भागकर आये। साँसें फूल गयीं। दो साथी आगे निकल गये। उन्हें आगे से बिठाना था। एक पर्वत से पानी की मोटी धार रास्ते पर  बह रही थी। गाड़ियाँ एक-एक करके निकालना जोखिम भरा काम था। दो घंटे फँसे रहे। हरेक गाड़ी के निकालने पर लगता था कि यह तो फँस जाएगी या पानी के बहाव में बह जाएगी। एक जेसीबी बीच-बीच में पत्थरों को पानी में डालकर पूरते जाती थी। फिर तीन-चार गाड़ियों को निकालते थे। सौम्या बिटिया और कैलाश भाई गाड़ी से उतर कर नजारा देखने चले गये। वे उस स्थान पर पहुँचे जहां गाड़ियाँ फँस रही थीं। उनके पैर बर्फीले पानी में जमने लगे। उन्होंने पानी के बहाव में फँसती गाड़ियों को धक्का लगाना शुरू किया। कई लोग उनकी फ़ोटो लेकर फ़ेस्बुक और व्हॉटसएप पर डालने लगे। उन्होंने पंद्रह-बीस गाड़ियाँ निकालीं। जब हमारी गाड़ी पहुँची तो दूर खड़े होकर इंतज़ार कर रहे थे। हमारा ड्राइवर होशियार था। उसने रास्ते का निरीक्षण कर एक झटके में गाड़ी निकाल ली।

श्योक से दुर्बक का रास्ता भी बहुत दुस्साहसिक और जोखिम भरा था। एक तरफ़ एक हज़ार से फुट अधिक ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ दो हज़ार फुट गहरी खाई में बहती श्योक नदी, बीच में पहाड़ों से झरनों के रूप में उतरता ग्लेशियर का बर्फीला पानी। ड्राइवर ख़तरनाक तरीक़े से तेज गाड़ी चला रहा था। उसे टोंकने पर बोला- आप चुप रहो, हमारा भरोसा करो। हमने कहा- आपका भरोसा तो है लेकिन मशीन का क्या भरोसा कब दगा दे जाये। संभल कर चलो। पत्थरों में से गाड़ी निकालने पर क्या मालूम नीचे से कोई बुश वग़ैरह कट गया हो। उसे बात समझ आई। थोड़ी देर ठीक चला और फिर अपनी पर आ गया। बंदर पलटी खाना कभी नहीं छोड़ता। दुर्बक में लंच लिया।     

पैंगोंग त्सो विवादित क्षेत्र है। उसके बिल्कुल नज़दीक से गुज़रे। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से लगभग 20 किमी पूर्व में झील का एक हिस्सा चीन द्वारा नियंत्रित है लेकिन भारत द्वारा उसका दावा किया जाता है। झील का पूर्वी छोर तिब्बत में है। 19वीं सदी के मध्य के बाद, पैंगोंग त्सो जॉनसन लाइन के दक्षिणी छोर पर था, जो अक्साई चिन क्षेत्र में भारत और चीन के बीच सीमांकन का एक प्रारंभिक प्रयास था। खुर्नक किला झील के उत्तरी किनारे पर पैंगोंग त्सो के लगभग आधे रास्ते पर स्थित है। तिब्बत अधिग्रहण के समय अर्थात् 1958 से खुर्नक किला क्षेत्र पर चीनियों का नियंत्रण है। दक्षिण में छोटी स्पंगगुर त्सो झील है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)  झील से होकर गुजरती है। यह क्षेत्र एलएसी के साथ एक संवेदनशील सीमा बिंदु बना हुआ है। इस क्षेत्र में चीनी पक्ष से घुसपैठ आम बात है। 20 अक्टूबर 1962 को, पैंगोंग त्सो ने चीन-भारतीय युद्ध के दौरान सैन्य कार्रवाई देखी, जिसमें चीन ने भारतीय ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा दबा लिया था। चूसुल की प्रसिद्ध लड़ाई पर चेतन आनंद ने हक़ीक़त फ़िल्म बनाई थी। जिसके प्रसिद्ध गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी” सुनकर तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आँखों में आँसू आ गए थे।

चीन का राष्ट्रीय राजमार्ग 219 पैंगोंग त्सो के पूर्वी छोर से गुजरता है। झील तक रुतोग से 12 किमी या शिकान्हे से 130 किमी की दूरी पर गाड़ी चलाकर पहुँचा जा सकता है। उसके बाद चीनी सीमा लग जाती है। पर्यटक झील पर एक नाव किराए पर ले सकते हैं, लेकिन पक्षियों के प्रजनन स्थल की रक्षा के लिए द्वीपों पर उतरने की अनुमति नहीं है। किनारे पर कई रेस्तरां हैं।

पैंगोंग झील का मज़ा यहाँ तक पहुँचने की रोमांचक यात्रा में है, तकलीफ़ में है, भूख-प्यास की तड़फ में है। यहाँ पहुँच कर विशाल झील में लहराता नीला पानी और उसके चारों तरफ़ सूखे पहाड़ों पर धूप और बादलों की आवारगी देख मन प्रफुल्लित हो गया है। 

झील के परे जो पहाड़ दिखते हैं वे चीन की सीमा में हैं। अगस्त 2017 में, पैंगोंग त्सो के पास भारतीय और चीनी सेना में हाथापाई हुई थी जिसमें लात मारना, मुक्का मारना, पत्थर फेंकना और लाठी और छड़ जैसे परम्परा गत हथियारों का उपयोग शामिल था। 11 सितंबर 2019 को, चीनी सैनिकों ने उत्तरी तट पर भारतीय सैनिकों का सामना किया। 5-6 मई 2020 को, झील के पास लगभग 250 भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए।

भारत की ओर की झील की यात्रा के लिए एक इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है क्योंकि यह चीन-भारतीय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित है। सुरक्षा कारणों से भारत नौका विहार की अनुमति नहीं देता है। एक मान्यता प्राप्त गाइड के साथ समूहों की अनुमति है। टांगसे, लुकूँग होते हुए शाम को पाँच बजे आख़िर पैंगोंग झील पर पहुँच गये। झील के उस पार चीन की सीमा में बीच के पहाड़ों पर एक टुकड़ा धूप चमक रही थी। आजुबाजु के पहाड़ों पर स्याह बादलों की कालिमा छाई थी। पहले पी-3 टेंट हाऊस में सामान रखा। लेकिन उसके पहले एक झंझट से निपटना पड़ा। जब हमने मैनेजर को टेंट आवंटन का पत्र दिया तो वह बोला कि उसके पास हमारे आवंटन की कोई सूचना नहीं है। हमने भुगतान नहीं किया होगा। हमने तब तक सामान उतार लिया था। सामान सहित उस पर चढ़ाई कर दी। उसके मालिक से बात कराने को कहा। वे तीन चार लोग मिलकर सलाह करने लगे। हमने ज़ोर से डाँटा तो उन्होंने तुरंत दो टेंट दे दिए। यह खेल बाद में समझ आया कि वे हमें तनाव में रखकर किराया वसूलना चाह रहे थे। उनका मालिक हमारी बुकिंग का भुगतान सीधे टूर ऑपरेटर से प्राप्त कर चुका था। हमारा भुगतान उनकी ऊपरी कमाई होती। बढ़िया चाय पी। पहली फ़ुरसत में पैंगोंग झील किनारे पहुँचे। भारतीय समाज पर फ़िल्मों का इतना प्रभाव है। इसे यहाँ पहुँच कर समझा जा सकता है। 3-इडियटस् फ़िल्म ने इस स्थान को प्रसिद्धि दिलाई है। उसका यहाँ कारोबारी उपयोग होने लगा है। करीना कपूर टाइप पीले रंग की स्कूटर पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाने का मूल्य एक सौ, तीन कुर्सियों का किराया तीन सौ रुपया लिया जाता है। 

कैम्प में पी-3 के मैनेजर को टेंट में तीसरा बिस्तर लगाने को बुलाया। उसका नाम अजित है। वह झारखंड से नौकरी करने जान जोखिम में डालकर इतनी दूर आया है। उसकी मासिक तनख़्वाह 15,000/-  माहवार है। यहाँ का पर्यटक मौसम मई से सितम्बर कुल 5 महीने रहता है। वह पूरी टीम के साथ मई में यहाँ आया है। खाना पीना यहीं से मिलता है। मासिक तनख़्वाह टेंट के मालिक उसके खाते में जमा कर देते हैं। उसके परिवार के लोग झारखंड में बैंक एटीएम से निकाल लेते हैं। इस प्रकार सीज़न में 75,000/- उसे मिल जाते हैं। उसने बताया ऊपरी कमाई से सीज़न में दो लाख अलग से ले जाते हैं। जिसमें गेस्ट की टिप्स और टेंट के मालिक की जानकारी के बग़ैर किराए से आमदनी शामिल है। मालिक लेह के राजनीतिक वर्चस्व वाले लोग हैं। इतनी दूर रोज़ आ नहीं सकते। वे बुकिंग के हिसाब से भुगतान सीधे प्राप्त करते हैं। भूले भटके पर्यटकों को टेंट उपलब्ध कराकर मैनेजर ऊपरी कमाई कर लेते हैं। सितम्बर में पेंगोंग झील पूरी तरह जमना शुरू होती है तो तापमान -40 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है।

पेंगोंग में साल के बारह महीने भारी मात्रा में सैनिक मौजूदगी रहती है। 1962 से 2020 तक भारतीय और चीनी सैनिकों में भिड़ंत होती रही है। चीन के साथ यह अत्यंत संवेदन शील इलाक़ा है। विषम परिस्थितियों में भी सैनिक मोर्चा नहीं छोड़ते हैं। राष्ट्राध्यक्ष को जब भी किसी स्थानीय कारण से जनता का ध्यान भटकाना होता है तब उनके एक इशारे पर सैनिक मुठभेड़ होती रहती हैं। 

बताया जाता है कि 1962 के युद्ध के दौरान यही वो जगह थी, जहां से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था। भारतीय सेना ने भी चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेजांग ला से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था। पिछले कुछ सालों में चीन ने पैंगोंग झील के अपनी ओर के किनारों पर सड़कों का निर्माण भी किया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह झील यक्ष राज कुबेर का मुख्य स्थान है। माना जाता है कि भगवान कुबेर की ‘दिव्य नगरी’ इसी झील के आसपास कहीं स्थित है। इसका उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, ये तो शायद ही कोई बता पाए। 

आधिकारिक तौर पर, मैकमोहन रेखा भारत और चीन के बीच की सीमा को परिभाषित करती है। यह ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा भारत और फिर तिब्बत के बीच एक समझौते के रूप में खिंची गई थी। चीन हमेशा सीमा समझौते पर आपत्ति जताता है क्योंकि उसका दावा है कि यह समझौता झूठा है क्योंकि चीन इसका हिस्सा नहीं था बल्कि तिब्बत था।

पेंगोंग से चूसुल 30 किलोमीटर और मिराक 45 किलोमीटर चीन सीमा पर अंतिम गाँव है। सुबह सेना के दो हेलिकोप्टर पेट्रोलिंग पर जाते दिखे। एक सेनानी ने बताया कि ऑफ़िसर कमांडिंग चूसुल पोईंट पर चाय-नाश्ता की मेज़ पर

तुरतुक

भारत-पाकिस्तान सीमा पर तुरतुक गाँव है। सरहदें अच्छी भी होती हैं और खराब भी। अच्छी इसलिए की सरहदें किसी मुल्क को उसके वजूद का अहसास दिलाती हैं। खराब इसलिए कि ये लोगों को एक दूसरे से जुदा कर देती हैं। सरहदें बनने का दर्द भारत से बेहतर और कौन जान सकता है। सरहद ने एक ही मुल्क के लोगों को एक दूसरे के लिए बेगाना बना दिया। जहां बंटवारे की लाइन खींची गई, वहां के आधे लोग एक तरफ और आधे लोग दूसरी तरफ के हो गए।

बंटवारे की इस लड़ाई में सरहद के पास ऐसे बहुत से इलाके थे जिन पर दोनों मुल्क अपना दावा ठोंक रहे थे। ऐसे ही इलाकों में से एक था जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाके का तुरतुक गांव। बंटवारे के वक्त ये पाकिस्तान में था। चूंकि ये गांव दोनों मुल्कों की सरहदों के बीच स्थित था, लिहाजा यहां बाहरी लोगों के आने पर पाबंदी थी। यहां के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, तो तुरतुक भी उसके हाथ से निकल कर भारत में शामिल हो गया। तुरतुक गाँव गांव में हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध तीनों धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। यह गांव श्योक नदी के तट पर स्थित है, जहां जाने के बाद आपको काफी सुंदर और बेहतरीन नजारा देखने को मिलेगा।

 यह भारत द्वारा 1971 ई० में पाकिस्तान से छीना गया गांव है, जो वर्तमान समय में भारत का एक हिस्सा बन चुका है। यह गांव चारों ओर से पहाड़ों से घिरे होने के साथ-साथ श्योक नदी के तट पर बसा हुआ है, जहां जाने के बाद एक अलग ही दुनिया का एहसास होता है। वर्तमान समय में यह गांव लद्दाख का काफी बड़ा आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जिसे देखने के लिए हर साल देश के अलग-अलग क्षेत्रों से सैलानी यहां आते हैं।

 05 जुलाई 2022 को सुबह पाँच बजे नींद खुली तो पेंगोंग झील देखने चले गए। ग़ज़ब का प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ था। सूर्य रश्मियों का हिमशिखरों पर रंगीन नृत्य और उनका झील पर सतरंगी प्रतिबिम्ब आभा देखते बनती थी। आठ बजे पेंगोंग से रवाना हुए। हमें अब पुनः श्योक नदी के और भी ख़तरनाक दर्रों से गुजरते हुए सिंधु की सहायक नदियों के काँठे में पहुँचना है।   

लद्दाखी हिमालय सिंधु की सहायक नदियों के साथ, भारत का पंजाब क्षेत्र बनाता है, जबकि नदी का निचला भाग पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत में एक बड़े डेल्टा में समाप्त होता है। सिंधु नदी ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र की कई संस्कृतियों का मिलन स्थल रही है। तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का उदय हुआ, जो कांस्य युग की एक प्रमुख शहरी सभ्यता थी। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान पंजाब क्षेत्र का उल्लेख ऋग्वेद की ऋचाओं में सप्त सिंधु और अवेस्ता धार्मिक ग्रंथों में सप्त हिंदू (दोनों शब्दों का अर्थ “सात नदियों”) के रूप में किया गया है। सिंधु घाटी में उत्पन्न होने वाले प्रारंभिक ऐतिहासिक साम्राज्यों में गांधार और सौवीर के रोर वंश शामिल रहे हैं। सिंधु नदी पश्चिमी दुनिया के ज्ञान में शास्त्रीय काल की शुरुआत में आई, जब फारस के राजा डेरियस ने नदी का पता लगाने के लिए 515 ई.पू. में अपने ग्रीक दरबारी स्काइलैक्स ऑफ कैरींडा को भेजा।  

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर, जैसे हड़प्पा और मोहनजो-दारो, लगभग 3300 ईसा पूर्व के हैं। प्राचीन दुनिया के कुछ सबसे बड़े मानव आवासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता पूर्वोत्तर अफगानिस्तान से पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत तक फैली हुई थी। झेलम नदी के पूर्व से ऊपरी सतलुज पर रोपड़ तक ऊपर की ओर पहुंचती है। तटीय बस्तियाँ पाकिस्तान, ईरान सीमा पर सुतकागन डोर से लेकर भारत के आधुनिक गुजरात कच्छ तक फैली हुई हैं। उत्तरी अफगानिस्तान में शॉर्टुघई में अमु दरिया पर एक सिंधु स्थल है, और हिंडन नदी पर सिंधु स्थल आलमगीरपुर दिल्ली से केवल 28 किमी की दूरी पर स्थित है। आज तक, 1,052 से अधिक शहर और बस्तियां मुख्य रूप से घग्गर-हाकरा नदी और उसकी सहायक नदियों के सामान्य क्षेत्र में पाई गई हैं। बस्तियों में हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो के प्रमुख शहरी केंद्र, साथ ही लोथल, धोलावीरा, गनेरीवाला और राखीगढ़ी थे। सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर 40 सिंधु घाटी स्थलों की खोज की गई है। हालांकि, सिंधु लिपि की मुहरों और उत्कीर्ण वस्तुओं की खोज की गई वे अधिकांश सिंधु नदी के किनारे पर पाए गए थे।

“इंडिया” शब्द सिंधु (Indus) नदी से लिया गया है। प्राचीन काल में, “भारत” शुरू में सिंधु के पूर्वी तट के साथ उन क्षेत्रों को संदर्भित करता था, लेकिन 300 ईसा पूर्व तक, हेरोडोटस और मेगस्थनीज सहित ग्रीक लेखक पूरे उपमहाद्वीप में इस शब्द का उपयोग कर रहे थे जो पूर्व की ओर बहुत आगे तक फैला हुआ है। सिंधु का निचला बेसिन ईरानी पठार और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक प्राकृतिक सीमा बनाता है। यह क्षेत्र पाकिस्तानी प्रांतों बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध और अफगानिस्तान और भारत के देशों को शामिल करता है। डेरियस द ग्रेट (दारा) के शासनकाल के दौरान सिंधु घाटी पर कब्जा करने वाला पहला पश्चिम यूरेशियन साम्राज्य फारसी साम्राज्य था। उनके शासनकाल के दौरान, कर्यंदा के यूनानी खोजकर्ता स्काइलैक्स को सिंधु के मार्ग का पता लगाने के लिए नियुक्त किया गया था। इसे सिकंदर की हमलावर सेनाओं ने पार कर लिया था, लेकिन उसके मैसेडोनिया के लोगों द्वारा पश्चिमी तट पर विजय प्राप्त करने के बाद – इसे हेलेनिक दुनिया में शामिल करने के बाद, सिकंदर ने एशियाई अभियान को समाप्त करते हुए नदी के दक्षिणी मार्ग के साथ पीछे हटने का चुनाव किया। सिकंदर के एडमिरल नियरचस सिंधु डेल्टा से फारस की खाड़ी का पता लगाने के लिए टाइग्रिस (दजला-फ़रात) नदी तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। सिंधु घाटी पर बाद में मौर्य और कुषाण साम्राज्यों, इंडो-ग्रीक साम्राज्यों, इंडो-सीथियन और हेप्टालाइट्स का प्रभुत्व था। कई शताब्दियों में मुहम्मद बिन कासिम, गजनी के महमूद, मोहम्मद गोरी, तैमूरलंग और बाबर की मुस्लिम सेनाओं ने सिंध और पंजाब पर आक्रमण करने के लिए नदी पार की, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रवेश द्वार उपलब्ध हुआ।

आप सोचते होंगे कि यह सब जानकारी कहाँ से लाते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन तीन बार तीन तरफ़ से तिब्बत यात्रा पर गए थे। उन्होंने “मेरी लद्दाख़ यात्रा” और “मेरी तिब्बत यात्रा” में इस क्षेत्र का विशद विवेचन किया है। प्रत्येक घुमंतू को उनकी “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” और “घुमक्कड़ शास्त्र” ज़रूर पढ़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त हेनरिख हेरर की किताब “मेरे तिब्बत में सात साल” दलाई लामा के तिब्बत से पलायन के पहले के सात सालों का जीवंत वृतांत भी पठनीय है। 

बहुत ज्ञान बघार लिया। अब दर्रों पर आते हैं। श्योक नदी काराकोरम दर्रे के पास से निकलती है। श्योक और नुब्रा नदियों की घाटी वाले क्षेत्र को नुब्रा के नाम से जाना जाता है। नुब्रा-सियाचिन घाटी में बड़े पैमाने पर अप्सरास समूह, रिमो समूह, और तेराम कांगरी समूह शामिल हैं। इस प्रकार हमने इन सभी गगनचुंबी शिखरों से सटे दर्रों को श्योक से सिंधु काँठे में पहुँचने हेतु पार किया।

पूर्वी और मध्य हिमालय अर्थात् सिक्किम, भूटान, नेपाल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश मानसूनी बादलों को रोक कर ख़ाली कर देते हैं। वृष्टिछाया के कारण भारतीय मानसून के नमी भरे बादलों का प्रवेश लद्दाख़ में नहीं होता है। यहाँ सितम्बर से जनवरी तक भारी हिमपात होता है। इस प्रकार लद्दाख एक उच्च ऊंचाई वाला वनस्पति विहीन बियाबान है। पानी का मुख्य स्रोत पहाड़ों पर शीतकालीन हिमपात है। हिमालय के उत्तरी किनारे के क्षेत्र- द्रास, सुरू घाटी और ज़ांस्कर- में भारी हिमपात होता है और वर्ष में कई महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से लगभग कट जाता है। ग्रीष्मकाल छोटा होता है, हालांकि फसल उगाने के लिए काफी लंबा होता है। वनस्पति की कमी के कारण ऊंचाई पर कई स्थानों पर हवा में ऑक्सीजन का अनुपात कम है।

पेंगोंग से चलकर तंगस्ते से लेह सड़क पकड़ी। खारू होते हुए लेह 110  लिखा था। पेंगोंग जाते समय खारदुंग ला पार किया था। अब 17,600 फुट ऊँचाई वाला चांगला दर्रा पार करना था। पहला पड़ाव सोलतक था, दस बजे चांगला दर्रा पर पहुँचने वाले थे तभी ट्राफ़िक जाम का सामना हो गया। सेना की गाड़ियाँ भी साथ में थीं। तंगस्ते से लेह के रास्ते पर कई गाँव है। जिनके घोड़े, याक और अन्य पशु चरते दिख रहे थे। उनके गोबर के कंडे भी बनते दिखे।

चांगला पार करके हम फिरसे सिंधु घाटी में प्रवेश कर गए। यहाँ के ग्लेशियर पंजाब और सिंध को तर करते हैं। जिंग्राल, शक्ति आया। शक्ति के आगे सीमा सुरक्षा संगठन का सड़क निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए ट्राफ़िक जाम फिर सामने आ खड़ा हुआ। वहाँ सीमा सड़क संगठन और इंडीयन आयल कोर्पोरेशन मिलकर प्रोजेक्ट हिमांक नाम से एक सड़क बना रहे हैं। खारू तक उम्दा सड़क बन चुकी है। हेमिस मठ खारू से आठ किलोमीटर है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

गुरुद्वारा पत्थर साहिब

श्री गुरु नानक देव जी भूटान, नेपाल, तिब्बत से होते हुए लद्दाख पहुंचे थे। लेह में लोगों से मिलते हुए वह कश्मीर के मट्टन पहुँचे थे। लेह और मट्टन में स्थित गुरुद्वारे श्री गुरु नानक देव जी की याद दिलाते हैं। अगर हम बात लेह की करें तो वहां पत्थर साहिब गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा लेह से पहले 25 किमी दूर श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है। श्री गुरु नानक देव जी 1517 ई में सुमेर पर्वत पर अपना उपदेश देने के बाद लेह पहुंचे थे। गुरुद्वारे का इतिहास काफी अहम है किंवदंती है कि गुरु जी ने एक राक्षस को सही रास्ते पर लाकर लोगों के दिल से उसका भय दूर किया था। वहां एक पहाड़ पर रहने वाला एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। लोगों ने अपने दुख को गुरु जी के सामने बयां किया। गुरु नानक देव जी ने नदी किनारे अपना आसन लगा लिया।

एक दिन की बात है कि जब श्री गुरु नानक देव जी प्रभु की भक्ति में लीन थे, तब राक्षस ने गुरु जी को मारने के लिए पहाड़ से बड़ा पत्थर फेंका। गुरु जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम जैसा मुलायम हो गया। इससे गुरु जी के शरीर का पिछला हिस्सा मोम बने पत्थर में धंस गया। गुरुद्वारे में पत्थर में धंसा श्री गुरु नानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरु जी को ज़िंदा देखर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर मोम बने पत्थर में धंस गया। तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई है। राक्षस गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर देखा जा सकता है। गुरु जी ने राक्षस को उपदेश दिया कि बुरे काम मत करो, लोगों को तंग न करो, मानव के कल्याण के लिए काम करो। इस समय गुरुद्वारा पत्थर साहिब की संभाल का जिम्मा भारतीय सेना के पास है।

हमने वाहन से उतर कर देखा तो गुरुद्वारा के सामने से एक रास्ता बग़ल में गया था। लोग वहाँ गरम चाय का सेवन कर रहे थे। वहाँ पर एक नल में बर्फ़ का पानी ठंडा पानी आ रहा था। उसके पीछे देखा तो पाया कि एक बड़ा लम्बा पतला पाइप नल से जुड़ा था और वह पतला पाइप मोटे पाइप से जुड़ा था। जिनमे से होकर  बर्फ़ का पानी पिघल कर नल तक आ रहा था। शुद्ध कंचन पानी देख मुँह हाथ धोए और ठंडा पानी पीकर दिन भर से थकी देह से थकान और गर्मी को राहत देकर चाय सेवन के स्थान पर पहुँच चाय ग्रहण करने लगे। तेज हवा चल रही थी। चाय अधिक गरम होने से फूँक-फूँक कर सिप कर रहे थे। तभी हमारे पीछे किसी सज्जन ने चाय ठंडी करने के लिए चाय को दो गिलासों में ऊपर से एक दूसरे में उँडेल कर ठंडी करने की कोशिश की तो हवा के तेज झौंके से हमारी बायीं बाँह कंधे से लेकर कोहनी तक गरम चाय से तरबतर हो गई। हमने मुड़कर उन सज्जन को देखा तो वे मुँह फेरकर दूसरी तरफ़ देखने लगे। अब उनसे क्या बोलते, जिन्हें अपनी गलती का अहसास ही नहीं था। हमने अपनी चाय मेज़ पर रख कर नल से पानी ले बाँह से कंधे तक को धो लिया। ताकि दाग पक्के न हो जायें। ज़रूरी नहीं है कि आपको खुद की ग़लतियों से दाग लगें। कभी-कभी दूसरों की ग़लतियों से भी दाग लग सकते हैं। उन परिस्थितियों में किसी से उलझने की बजाय दाग साफ़ कर लेना ठीक रहता है अन्यथा कपड़ों पर लगे दाग मन मस्तिष्क में पक्के होने की सम्भावना रहती है।             

मेगनेटिक हिल 

लद्दाख क्षेत्र के लेह के नज़दीक एक ऐसी पहाड़ी है जिसे मैग्नेटिक हिल के नाम से जाना जाता है। सामान्यतौर पर पहाड़ी के ढलान पर वाहन को गियर में डाल और हैंडब्रेक लगा खड़ा किया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो वाहन नीचे की ओर लुढ़ककर खाई में गिर सकता है लेकिन इस मैग्नेटिक हिल पर वाहन को न्यूट्रल करने खड़ा कर दिया जाए तब भी वाहन ढलान की तरफ़ नहीं जाता। ऊपर की तरफ़ जाने लगता है। यह श्रीनगर-लद्दाख रोड पर लेह से 26.5 किमी पश्चिम में है। आश्चर्य तो तब होता है जबकि वाहन एंजिन बंद होने पर नीचे की ओर नहीं जाकर खुद ब खुद उपर की ओर जाने लगता है। यही तो इस पहाड़ी का चमत्कार है कि वाहन लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। दूसरा चमत्कार यह कि न सिर्फ गाड़ियां बल्कि आसमान से उड़ने वाले जहाज भी इस पहाड़ी के गुरुत्वाकर्षण से बच नहीं सकते। कोई इसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं तो कुछ इसे सिर्फ एक भ्रम मानते हैं लेकिन अब तक इस पहाड़ी का रहस्य सुलझाया नहीं जा सका है।

वैज्ञानिक कहते हैं…मैग्नेट हिल या निमू-लेह मैग्नेट हिल भारत के लद्दाख में लेह के पास स्थित एक गुरुत्वाकर्षण पहाड़ी है। आसपास की भौगोलिक विशेषताओं के कारण, इसमें एक ऑप्टिकल भ्रम है जहां वाहन गुरुत्वाकर्षण की अवहेलना में ऊपर की ओर लुढ़कते हुए प्रतीत होते हैं, जबकि वे वास्तव में पृथ्वी के ढलान पर लुढ़क रहे होते हैं।

विमान चालकों के अनुसार गुरुद्वारा पत्थर साहिब के निकट स्थित इस हिल में गजब की चुंबकीय ताकत है। यही नहीं इसका मैग्नेटिक फील्ड भी काफी बड़े क्षेत्र तक प्रभावित करता है। यदि इस हिल की चुंबकीय ताकत का परीक्षण करना हो तो किसी वाहन के इंजन को बंद करके वहां खड़ा कर दें, वह बंद वाहन धीरे-धीरे पहाड़ी की चोटी की ओर स्वत: ही खिसकना शुरू कर देता है। इस मैग्नेटिक हिल से होकर विमान उड़ा चुके कई पायलटों का दावा है कि इस हिल के ऊपर से विमान के गुजरते वक्त उसमें हल्के झटके महसूस किए जा सकते हैं, इसीलिए जानकार पायलट इस क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही विमान की गति बढ़ा लेते हैं ताकि विमान को हिल के चुंबकीय प्रभाव से बचाया जा सके।

जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ थोड़ा ऊपर पहाड़ी पर जाने के लिए मोटरबाईक किराए पर मिल रही थीं। जहाँ पहुँच कर पर्यटक मैग्नेटिक हिल का करिश्मा देख रहे थे। मुख्य सड़क पर हमने अपना वहाँ खड़ा करके देखा तो कोई वैसा चमत्कार नहीं हुआ जिसका दावा किया जाता है। हमारे पास इतना समय भी नहीं था कि एक हज़ार रुपए देकर चमत्कारी भ्रम का सत्यापन करने मोटरबाईक से ऊपर जाया जाये। पर्यटन उद्योग के नुमाइंदे कुछ पर्यटक पोईंट भ्रम फैलाकर बनाए रखते हैं। हम मैग्नेटिक हिल को दूर से सलाम करके आगे बढ़ गये।

स्पितुक गोंपा 

स्पितुक मठ, जिसे स्पितुक गोम्पा या पेथुप गोम्पा भी कहा जाता है, स्पितुक, लेह से 8 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक बौद्ध मठ है। इसकी स्थापना 11 वीं शताब्दी में मरियम में आने पर लामा चांगचब ओड के बड़े भाई ओड-डी ने की थी। जब लोत्सेवा रिनचेन ज़ंगपो (अनुवादक) उस स्थान पर आए तो उन्होंने कहा कि एक अनुकरणीय धार्मिक समुदाय वहां विकसित होगा, इसलिए मठ को स्पितुक (अनुकरणीय) कहा जाता था। धर्म राज ग्रगस्पा बम-आइड के समय मठ को लामा लवांग लोदोस द्वारा बहाल किया गया था और टोंसखापा का स्टेनलेस ऑर्डर पेश किया गया था और यह आज तक बरकरार है। रेड हैट संस्था के रूप में स्थापित, मठ को 15 वीं शताब्दी में पीली टोपी संप्रदाय द्वारा ले लिया गया था। वह एक छोटा मठ था। वहाँ थोड़ी देर रुककर अगले पड़ाव की तरफ़ चल दिये।

हाल ओफ़ फ़ेम

कारगिल युद्ध में भारतीय सूरमाओं की गाथा बताने वाला हाल आफ फेम पर्यटकों का सिर गर्व से ऊंचा करने में सक्षम है। टूरिस्ट सर्किट पर महत्वपूर्ण पड़ाव यह हॉल आफ फेम देशभक्ति को प्रदर्शित करता है। भारतीय सैनिकों की बहादुरी और उनकी साहसिक उपलब्धियों का बखान करता है। जैसे ही आप विजय गैलरी से गुजरेंगे तो वहां आपको कारगिल युद्ध में इस्तेमाल किए गए हथियार दिख जाएंगे। सियाचिन ग्लेशियर और अन्य स्थानों पर पहने जाने वाली युद्ध की ड्रेस देखते हैं तो आप उन मुश्किलों का अन्दाज़ लगा सकते हैं, जिनसे हमारे सैनिकों को गुजरना पड़ता है। सैनिकों द्वारा उनके परिवारों को लिखे गए पत्र इस क्षेत्र में लड़े गए युद्धों के दौरान ली गई तस्वीरें और कारगिल युद्ध पर 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री कुछ ऐसे आकर्षण हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर खींच ही लेते हैं।  इस भवन की दूसरी मंजिल पर भारतीय सेना द्वारा जप्त पाकिस्तानी बंदूकों और अन्य युद्धक शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। हॉल को भारतीय सेना द्वारा उन सैनिकों के सम्मान में बनाया गया था जो इस क्षेत्र में लड़े गए विभिन्न युद्धों के दौरान शहीद हुए थे।

शांति स्तूप

शांति स्तूप लद्दाख के लेह जिले के चांसपा क्षेत्र में एक पहाड़ी की चोटी पर सफेद गुंबद वाला एक बौद्ध स्तूप (चोर्टेन) है। इसे 1991 में जापानी बौद्ध भिक्षु , ग्योमोयो नाकामुरा और पीस पैगोडा मिशन द्वारा बनाया गया था। स्तूप न केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण बल्कि अपने अवस्थिति के कारण भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है जो आसपास के समूचे क्षेत्र का मनोरम दृश्य नज़रों की परिधि में समेटे है। शांति स्तूप से लेह शहर दिखाई देता है, दालान में खड़े होने पर नज़दीक में चांगस्पा गांव, दूर क्षितिज पर नामग्याल त्सेमो पैलेस और आसपास के पहाड़ों के मनोरम दृश्य प्रदान करता है। शांति स्तूप से सूर्योदय और सूर्यास्त को सबसे आकर्षक तरीक़े से देखा जा सकता है। स्तूप रात में रोशनी से जगमगाता है। जिसे लेह शहर से देखा जा सकता है और स्तूप से लेह शहर की रोशनी देखी जा सकती है।

शांति स्तूप का निर्माण अप्रैल 1983 में भिक्षु ग्योम्यो नाकामुरा और भारत सरकार के अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य, पूर्व राजनेता और भारत गणराज्य के पूर्व अंतरराष्ट्रीय राजनयिक लद्दाख के लामा कुशोक बकुला की देखरेख में हुआ था। यह परियोजना लद्दाखी बौद्धों और जापानी बौद्ध, जो भारत को बुद्ध का “पवित्र” जन्मस्थान मानते हैं, की मदद से पूरी की गई थी। भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री, इंदिरा गांधी ने 1984 में स्तूप के लिए एक सड़क के निर्माण को मंजूरी दी थी। राज्य सरकार ने शांति स्तूप के निर्माण के लिए कुछ वित्तीय सहायता भी प्रदान की। वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अगस्त 1991 में शांति स्तूप का उद्घाटन किया।

शांति स्तूप में वर्तमान दलाई लामा की तस्वीर है जिसके आधार पर बुद्ध के अवशेष बताए जाते हैं। स्तूप दो-स्तरीय संरचना के रूप में बनाया गया है। पहले स्तर में प्रत्येक तरफ हिरण के साथ धर्मचक्र है। एक स्वर्ण बुद्ध की छवि “धर्म के टर्निंग व्हील” (धर्मचक्र) को दर्शाते हुए एक मंच पर बैठी है। दूसरे स्तर में बुद्ध के “जन्म”, बुद्ध की मृत्यु (महाननिर्वाण) और बुद्ध को  “शैतानों को हराने” को ध्यान में रखते हुए दर्शाया गया है।

शांति स्तूप का निर्माण विश्व शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने और बौद्ध धर्म के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया था। इसे जापान और लद्दाख के लोगों के बीच संबंधों का प्रतीक माना जाता है। अपने उद्घाटन के बाद से, शांति स्तूप एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण बन गया है। द हिंदू के अनुसार यह लेह के आसपास “सबसे प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षण” है। इसकी स्थापत्य शैली लद्दाखी शैली से अलग है।

खारदुंग ला की ओर

लद्दाख भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है, जो हरियाली विहीन ऊंचे पहाड़ों, झीलों, नदियों, ग्लेशियरों, बौद्ध मठों और धार्मिक स्थलों से परिपूर्ण है। अगर देखा जाए तो लद्दाख में ऐसी एक भी जगह नहीं है, जहां जाने के बाद आपको लगेगा कि मुझे यहां नहीं आना चाहिए था, क्योंकि लद्दाख में स्थित हर एक जगह का अपना अलग ही महत्त्व है, जो पहाड़ों के बीच अपने अलग-अलग रंग-रूप, प्राकृतिक सौन्दर्य और अपने आस-पास के सुन्दर नजारों से भरे पड़े हैं, जिसे देखने के बाद आपको ऐसा लगेगा कि आप एक अलग ही दुनिया में आ गए हैं।  आप सिर्फ़ पहाड़ों पर हरियाली की तलाश करने की कोशिश न करें। लद्दाखी पहाड़ों की बारिश से दुश्मनी है। ला याने दर्रे और दाख शब्द दस का अपभ्रंश, याने दसों दर्रों की जगह लद्दाख़ हुआ। 

03 जुलाई 2022 को खारदुंग ला (दर्रा) पार करके नुब्रा घाटी पहुँचना है। खारदुंग ला लेह से लगभग 40 किमी. की दूरी पर स्थित है, जिसे विश्व में सबसे ऊंची जगह से गाड़ियों के गुजरने वाली सड़क का दर्जा मिला है। खारदुंग ला की ऊंचाई 5,359 मीटर (17,582 फीट) है। लेह में गरम कपड़े और आक्सीजन सिलेंडर बेचने वाले दर्जनों स्टोर गलत तरीके से इसकी ऊंचाई 5,602 मीटर (18,379 फीट) के आसपास होने का दावा करते हैं। ताकि समुद्र सतह से अधिक ऊँचाई पर होने वाली सम्भावित दिक्कतों के मद्देनज़र पर्यटकों को सामान बेचा जा सके। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस रास्ते से युद्ध के सामानों को भी चीन तक पहुँचाया गया था। अभी भी इस सड़क पर भारतीय सेना के वाहनों को जाते हुए देखा जा सकता है। यहां पर जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट की जरूरत पड़ती है, जिसे आप लेह के डीसी ऑफिस या वहां किसी भी ट्रैवल एजेंट के मार्फ़त बनवा सकते हैं।

खारदुंग ला लद्दाख के सबसे ऊंचे स्थानों की सूची में शामिल होने की वजह से वहां ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम रहती है, जिसकी वजह से वहां जाने पर एल्टीट्यूड सिकनेस होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आप खारदुंग ला जा रहे हैं, तो एल्टीट्यूड सिकनेस से बचने के लिए मेडिसिन वगैरह अपने साथ लेकर जरूर जाएं, वरना चिड़चिड़े  होकर आप एटीट्यूड सिकनेस का शिकार भी हो सकते हैं। एटीट्यूड सिकनेस से आप सिर्फ़ धैर्य पूर्वक निकल सकते हैं। लद्दाख़ के दर्रों की जानकारी इसे समझने में सहायक रहेगी।

पर्वतों के आर-पार विस्तृत सँकरे और प्राकृतिक मार्ग, जिससे होकर पर्वतों को पार किया जाता है, दर्रा कहलाते हैं| ‘ला’ शब्द तिब्बती भाषा में ‘दर्रे’ का अर्थ रखता है। परिवहन, व्यापार, युद्ध अभियानों और मानवीय आवागमन में इन दर्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिमालय पर काराकोरम दर्रा, रोहतांग दर्रा, खारदुंग दर्रा, बुर्जिला,  जोजिला, पीर पंजाल दर्रा, बनिहाल दर्रा, नाथूला दर्रा प्रमुख दर्रे हैं।

रोहतांग दर्रा (Rohtang Pass) भारत के हिमाचल प्रदेश में कुल्लू घाटी और लाहौल और स्पीति घाटियों के बीच 3,980 मीटर (13,058 फुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह हिमालय की पीर पंजाल श्रेणी के पूर्वी भाग में मनाली से 51 किमी दूर है। यह पूरे वर्ष हिमग्रस्त रहता है। हिमाचल को लद्दाख़ से जोड़ने वाला मनाली लेह राजमार्ग इस दर्रे से गुज़रता है। अब वहाँ अटल सुरंग बन जाने से चार घंटो का सफ़र चौबीस मिनट में पूरा किया जा सकता है। एल्टीट्यूड सिकनेस से बच जाते हैं।

क़ाराक़ोरम दर्रा भारत और चीन द्वारा नियंत्रित शिंजियांग प्रदेश के बीच 4,693 मीटर (15,397 फ़ुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह लद्दाख़ के लेह शहर और तारिम द्रोणी के यारकन्द क्षेत्र के बीच प्राचीन व्यापारिक मार्ग का सबसे ऊँचा स्थान है।

ज़ोजिला या ज़ोजि दर्रा भारतीय लद्दाख क्षेत्र के कारगिल जिले में स्थित कश्मीर घाटी को पश्चिम में द्रास और सुरू घाटियों से जोड़ता है और इसके सुदूर पूर्व में सिंधु घाटी को जोड़ता है। ज़ोजिला दर्रा को अक्सर कश्मीर से लद्दाख के प्रवेश द्वार के रूप में नामित किया जाता है। यहाँ भी सुरंग बनने का काम जोरशोर से जारी है।   

पीर पंजाल दर्रा भारत के जम्मू और कश्मीर की पीर पंजाल पर्वतमाला में  3,490 मी॰ (11,450 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह कश्मीर घाटी को जम्मू क्षेत्र के राजौरी ज़िले और पुंछ ज़िले से जोड़ता है। इस दर्रे से मुगल काल में बनाई गई सड़क गुज़रती है। कल्हण के अनुसार इसका प्राचीन नाम “पञ्चालधारा” है। “दर्रा” को संस्कृत में “धारा” कहते हैं। इस दर्रे से उत्तर में श्रीनगर और दक्षिण में जम्मू स्थित है।

बनिहाल दर्रा हिमालय का एक प्रमुख दर्रा हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-1 ए इस दर्रे से होकर निकलता है। यही दर्रा कश्मीर घाटी को जवाहर सुरंग के माध्यम से जम्मू से जोड़ता है।

नाथूला दर्रा सिक्किम राज्य को दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी से जोड़ता है। यह 14,200 फुट की ऊंचाई पर है। भारत और चीन के बीच 1962  युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। इसे 05 जुलाई 2006 को व्यापार के लिए खोल दिया गया है। बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत और चीन के होने वाले व्यापार का 80 प्रतिशत हिस्सा नाथू ला दर्रे के ज़रिए ही होता था। यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा का भी हिस्सा रहा है।

खारदुंग ला लेह के उत्तर में सिंधु नदी घाटी और श्योक नदी घाटी को जोड़ता है। उत्तर-पूर्व तरफ़ मुड़ जाओ तो यह नुब्रा घाटी का प्रवेश द्वार भी बनाता है, जिसके आगे सियाचिन ग्लेशियर है। दर्रे के ऊपर से 1976 में एक मोटर चलने योग्य सड़क सैनिक उपयोग हेतु बनाई गई थी, जो 1988 में सार्वजनिक मोटर वाहनों के लिए खोल दी गई। सीमा सड़क संगठन द्वारा रखरखाव वाला यह दर्रा भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उपयोग सियाचिन ग्लेशियर में आपूर्ति करने के लिए भी किया जाता है। यह सड़क दुनिया की सबसे ऊंची मोटर चलने योग्य सड़कों में से एक है।

1950 के दशक की शुरुआत में, विलियम ओ. डगलस ने वर्णन किया है कि “सिंधु पार करने के बाद पगडंडी का एक रास्ता नदी के किनारे दक्षिण-पर्व की ओर स्पितोक, खलत्से और खारगिल तक जाता है, दूसरा उत्तर की ओर लेह, खरडोंग दर्रा (… ), और सिंकियांग के एक प्राचीन व्यापारिक केंद्र “यारकंद” की तरफ़ जाता है।  उन्होंने आगे कहा, “लेह एक ऐतिहासिक कारवां मार्ग पर है जो न केवल सिंकियांग में यारकंद की ओर जाता है बल्कि तिब्बत में ल्हासा तक जाता है। (…) ऊन, चांदी, चाय, कैंडी, खाल, मखमल, रेशम, सोना, कालीन, कस्तूरी, मूंगा, बोरेक्स, जेड कप, नमक उत्तर से नीचे लेह आता था। कपास के सामान, शॉल, ब्रोकेड, अफीम, नील, आलूबुखारा, जूते, मोती, अदरक, लौंग, काली मिर्च, शहद, तंबाकू, गन्ना, जौ चावल, गेहूं नीचे से ऊपर की तरफ़ रेशम मार्ग जाता था।” द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस मार्ग से चीन को युद्ध सामग्री पहुँचाने करने का प्रयास किया गया था।

हम अब लद्दाख़ में सबसे कठिन यात्रा की शुरुआत करने वाले हैं। दिमाग़ में कौतुहल मिश्रित भय है। थोड़ी असुरक्षा भी लग रही है। दो दिनों के लेह प्रवास में दर्रों पर साँस उखड़ने की कठिनाइयाँ सुनने-सुनाने को मिलती रही है। जो खारदुंग ला होकर आते हैं, वे बहादुरी के क़िस्से सुनाते हैं और जो जाने वाले हैं, वे सहमे-सहमे से सुनते रहते हैं।  

खारदुंग ला ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्य एशिया के लेह से काशगर तक जाने वाले प्रमुख कारवां मार्ग पर स्थित है। इतिहास में इसे सालाना लगभग 10,000 घोड़ों और ऊंटों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। बैक्ट्रियन ऊंटों की एक छोटी आबादी अभी भी पास के उत्तर क्षेत्र हुंडर में देखी जा सकती है। खारदुंग ला लेह सड़क मार्ग से 39 किमी. की दूरी पर है। दक्षिण पुल्लू चेक प्वाइंट से उत्तर पुल्लू चेक प्वाइंट तक के लगभग 15 किमी की दूरी तक के भाग में मुख्य रूप से ढीली चट्टान, गंदगी और यदाकदा पिघली बर्फ के नाले हैं। नुब्रा घाटी की निकटवर्ती सड़क (कुछ स्थानों को छोड़कर जहां शिला स्खलन होता है) बहुत अच्छी तरह से बनी हुई है। दो और चार-पहिया वाहन, भारी ट्रक और मोटरसाइकिल विशेष अनुमति से नियमित रूप से नुब्रा घाटी में यात्रा के लिए जाते हैं।

हम सुबह दस बजे चल दिए। टैक्सी JK 10 9335 चालक तंडुप सहित चल पड़ी। लेह से एक आक्सीजन यूनिट 3,000/- रुपए में किराए पर ली, जिसका उपयोग ज़रूरत पड़ने पर करना था। यात्रा की शुरुआत 12,000 फुट से होना था और उच्चतम बिंदु 17,582 फुट पर था। उसके बाद फिर नीचे उतरना था। पहले साउथ पुल्लु गाँव आया वहाँ से खारदुंग ला 14 किलोमीटर बचा था। खड़ी चढ़ाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। ऊपर से सर्पाकार सड़क की कई रेखाएँ नीचे देखने में डर लगता है। साँस में भारीपन महसूस होने लगा। टिस्सु पेपर में लपेट कर कपूर की दो टिकियाँ शर्ट के ऊपरी ज़ेब में रखी हैं। जिनको आक्सीजन की कमी दूर करने के लिए बीच-बीच में निकाल कर सूंघते रहते हैं। चढ़ाई पर आक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए पानी सहित तरल पदार्थ पीना होता है। ऊपर पहुँच कर लोग पेशाबघर ढूँढते रहे। एक जगह दो बाथरूम बने थे लेकिन उनमें ताले डले थे। एक-दो पर्यटक बाथरूम के बाहर ही निस्तार करने लगे तो आर्मी सेनानियों ने उन्हें डाँट पिलाई। डाँट खाने के बाद बाथरूम की अनिवार्यता और बढ़ गई। खारदुंग ला पर गाड़ियों की भारी भीड़ थी। लोग गाड़ियाँ उठाकर आगे बढ़ गए। जहां बर्फ़ जमी थी। पर्यटकों ने बर्फ़ पर खेलना, बर्फ़ उछालना और पेशाब करना आरम्भ कर दिया। अब हम लेह घाटी से निकल कर स्योक घाटी में प्रवेश कर रहे थे।

पर्वतों से पिघलते ग्लेशियर से श्योक नदी की धाराएँ मिलकर एक घाटी का निर्माण कर रही थीं। घाटी में सबसे पहले उत्तर पुल्लू नाम का गाँव आया। फिर खारदुंग नामक गाँव पहुँचे। वहाँ से एक सड़क सियाचीन ग्लेशियर और दूसरी सड़क स्कर्दु की ओर जाती है। आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ़ स्कर्दु घाटी आरम्भ हो गई।  खालसार और प्रतापपुर पार करने के बाद स्कर्दू पहुँचे। एक ठीकठाक से दिखते रेस्टौरेंट पर पेशाब की थैली ख़ाली करने का अनुपूरक कार्य निपटाया। कुछ अनुपूरक के साथ मूल निस्तार कार्य से भी निवृत्त होकर फ़्रेश हो प्रसन्नचित्त हुए। फिर नाश्ता और चाय निपटाई।

हिमाच्छादित हिमालय पर्वतमाला से घिरी नुब्रा घाटी तिब्बत और कश्मीर के बीच स्थित है। घाटी का दृश्य मनोरम और मनमोहक है। सर्दियों के दौरान, पूरी घाटी दिन रात चंद्रमा के परिदृश्य से भरी रहती है। दिन में उत्तरायण सूर्य की तेज किरण बर्फ़ पर पड़ने से सफ़ेदी लिए होती हैं और रात में चाँदनी का बर्फ़ के साथ अलहदा करिश्मा दिखटा है।

अलेक्जेंडर कनिंघम ने नुब्रा को लद्दाख के पांच प्राकृतिक और ऐतिहासिक डिवीजनों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया था। नुब्रा लद्दाख के उत्तरपूर्वी हिस्से पर है, उत्तर में बाल्टिस्तान और चीनी तुर्किस्तान की सीमा और पूर्व में अक्साई चिन पठार और तिब्बत पर चीन का कब्जा है। सियाचिन ग्लेशियर घाटी के उत्तर में स्थित है। सैसर दर्रा और प्रसिद्ध काराकोरम दर्रा घाटी के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और नुब्रा को उइघुर (मंदारिन: झिंजियांग) से जोड़ता है। पहले पश्चिमी चीन के झिंजियांग और मध्य एशिया के साथ इस क्षेत्र से बहुत अधिक व्यापार होता था। बाल्टिस्तान के लोगों ने भी तिब्बत जाने के लिए नुब्रा घाटी का इस्तेमाल किया था।

तिब्बती पठार की तरह, नुब्रा नदी के किनारे को छोड़कर दुर्लभ वर्षा और दुर्लभ वनस्पति के साथ एक उच्च ऊंचाई वाला ठंडा रेगिस्तान है। गांव सिंचित और उपजाऊ हैं, गेहूं, जौ, मटर, सरसों और विभिन्न प्रकार के फल और मेवे पैदा करते हैं, जिनमें सेब, अखरोट, खुबानी और यहां तक ​​​​कि कुछ बादाम के पेड़ भी शामिल हैं। अधिकांश नुब्रा में नुब्रा बोली या नुब्रा स्काट वक्ताओं का निवास है। बहुसंख्यक बौद्ध हैं। नियंत्रण रेखा के पास नुब्रा के पश्चिमी या सबसे कम ऊंचाई वाले छोर पर यानी भारत-पाक सीमा पर श्योक नदी किनारे के गांव तुरतुक के निवासी गिलगित-बाल्टिस्तान के बाल्टी हैं, जो बलती बोलते हैं, और शिया और सूफिया नूरबख्शिया मुसलमान हैं।

नुब्रा घाटी एक तीन भुजाओं वाली घाटी है जो लद्दाख घाटी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह श्योक और नुब्रा नदियों के संगम से बनी है। श्योक नदी उत्तर पश्चिम की ओर बहती है और नुब्रा नदी एक न्यूनकोण बनाते हुए इसमें उत्तर-उत्तर पश्चिम से आ कर मिलती है। श्योक नदी आगे जाकर सिन्धु नदी में मिलती है। नुब्रा की केन्द्रीय बस्ती दिस्कित की दूरी लेह से 150 कि॰मी॰ है।  दिस्कित अपने बागों, दर्शनीय स्थलों, बैक्ट्रियन ऊंटों और मठों के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी जम्मू और कश्मीर का सबसे उत्तरी भाग है। नुब्रा घाटी को लद्दाख के बाग के रूप में जाना जाता है और इसे मूल रूप से लदुमरा कहा जाता है जिसका अर्थ है फूलों की घाटी।

नुब्रा घाटी दूर से देखने पर घाटी सूखी लगती है। हालांकि, घाटी में मुख्य रूप से प्रमुख कृषि भूमि शामिल है। तब कोई आश्चर्य नहीं कि घाटी ने लद्दाख का प्रतिष्ठित बाग का सम्मान अर्जित किया है। यह सिर्फ नुब्रा की प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। घाटी मुख्य रूप से बौद्ध है और बौद्ध शिक्षा के कई केंद्रों को बसाए है। एन्सा, समस्टेमलिंग, दिस्कित और हुंदर प्रसिद्ध बौद्ध मठ हैं। हम सुमूर, हुंदर और दिस्कित की तरफ़ बढ़ रहे हैं। सबसे पहले सुमूर पहुँचे। श्योक नदी के बहुत चौड़े पाठ के किनारे पर स्थित मठ पर चढ़े तो दोनों तरफ़ नदी का आठ-दस किलोमीटर भाग दिखने लगा। बर्फ़ पिघल कर आते पानी से नदी एक किनारा पकड़ कर बह रही है। नीचे से एक सड़क चीन के खसगर की तरफ़ जा रही है।

नुब्रा घाटी समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। पर्यटक वर्ष के किसी भी समय यात्राओं की योजना बना सकते हैं। जुलाई और सितंबर में, जब यहाँ पतझड़ का मौसम होता है, नुब्रा घाटी की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय है। यहाँ पेड़ नहीं होते इसलिए पतझड़ में पत्ते नहीं झड़ते अपितु बर्फ़ पिघलती है। उसे बर्फ़झड़ कहा जा सकता है। नुब्रा घाटी की जलवायु साल भर अनुकूल रहती है। यहां तक कि गर्मी के मौसम के दौरान न्यूनतम और अधिकतम तापमान क्रमशः 4 डिग्री सेल्सियस और 30 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। हालाँकि मौसम साल भर शीतल और सुखद रहता है, सर्दियों के मौसम के दौरान तापमान न्यूनतम -40 डिग्री तक गिर सकता है। दिसंबर और जनवरी के महीने आम तौर पर सबसे ठंडे होते हैं, जब पूरी घाटियाँ और दर्रे बर्फ़ से ढँककर समतल हो जाते हैं।

हम सुमूर पहुँच रहे हैं। लद्दाखी में ‘सुम’ का अर्थ  तीन है और ‘यूर’ का अर्थ है धारा या चैनल। कहा जाता है कि इस गांव में तीन प्रमुख धाराएं बहती हैं और इसी से यह नाम सुमूर पड़ा है। कुछ लोग यह भी अनुमान लगाते हैं कि यह Sum_Yul है, जिसका अर्थ है तीन गाँव। Sum_Yul  ही सुमूर है। ऐतिहासिक रूप से यह गांव चीन के खसगर को लद्दाख से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग पर है। मठ के ठीक ऊपर पहाड़ी की चोटी पर एक प्राचीन किला है। मठ नुब्रा घाटी में सबसे बड़ा है, जिसे लामा त्सुल्टिम नीमा ने 1830 के आसपास स्थापित किया था। 8-9वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व की विशाल चट्टान की लालसा है। पूरे साइचेन बेल्ट में जनसंख्या के मामले में सबसे बड़ा गांव है। लंबी सर्दियों के दौरान गांव के लोग विभिन्न पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं का पालन करते हैं।

सुमूर से श्योक नदी पार करके पर्वत को काट कर बनाए मार्ग पर चलने लगे हैं। रास्ता कभी नदी के बीच से होता है और कभी किनारे से पहाड़ पर चढ़ जाता है। नुब्रा घाटी में ठहरने के लिए दिस्कित के पास बजट रेंज में गेस्टहाउस हैं। कैंपिंग के लिए टेंट भी उपलब्ध कराते हैं। सुमुर में सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ डीलक्स कैंप हैं। हंडर में अच्छे होटल भी हैं। नुब्रा घाटी में खाने के लिए सबसे अच्छी जगह होटल और गेस्ट हाउस भारतीय, चीनी, महाद्वीपीय और यूरोपीय भोजन परोसते हैं। हमारा एक रात का डेरा हुंदर के सैंडलवुड कैम्प में अर्थात् पर्यटक टेंट में था। पंद्रह टेंट के गोलाकार घेरा के बीच एक पार्क में चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरे बैठकर भोजन का आनंद लिया। फिर हुंदर पहुँचे।

हुंदर लद्दाख के लेह जिले का एक गाँव है जो रेत के टीलों, बैक्ट्रियन ऊंटों के लिए प्रसिद्ध है। यह नुब्रा तहसील में श्योक नदी के तट पर स्थित है। हुंदर कभी पूर्व नुब्रा साम्राज्य की राजधानी थी। कई बर्बाद इमारतें हैं, जिनमें राजा के महल के खंडहर, लंगचेन खार (“हाथी महल”) शामिल हैं। पहाड़ी की चोटी पर एक किला है, जिसे गुला कहा जाता है। हुंदर में दो बौद्ध मंदिर भी हैं: सफेद मंदिर (लखांग कार्पो) और लाल मंदिर (लखांग मारपो)। हुंदर और दिस्कित के बीच रेत के टीले हैं।

दिस्कित और हुंदर के बीच का ठंडा रेगिस्तान पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। पर्यटक रेत के टीलों को देखने और बैक्ट्रियन ऊंटों की सवारी करने के लिए ठंडे रेगिस्तान में आते हैं। राजस्थान और भारत के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले एकल-कूबड़ वाले ऊंटों के विपरीत, मध्य एशिया के स्टेपीज़ मूल के बैक्ट्रियन ऊंट के दो कूबड़ होते हैं। बैक्ट्रियन ऊंट, केवल हुंदर में पाए जाते थे। जब लद्दाख मध्य एशिया के साथ प्राचीन व्यापार मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, तब बैक्ट्रियन ऊंट परिवहन का मुख्य साधन थे। प्राचीन रेशम मार्ग पर एक प्रमुख पड़ाव, नुब्रा अभी भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पश्मीना ऊनी वस्त्रों और बागवानी फसलों का एक प्रमुख व्यापार केंद्र है। स्थानीय लोग सेब, अखरोट, खुबानी, बादाम और मुख्य फसलों जैसे गेहूं, जौ आदि का उत्पादन करते हैं।

दिस्कित मठ

नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ न केवल अपने अविश्वसनीय स्थान के लिए, बल्कि मठ के ठीक नीचे स्थित 106 फीट मैत्रेय बुद्ध प्रतिमा के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ खालसर-पनाकिल मार्ग से 15 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में 10,308 फीट की ऊंचाई पर ठंडे रेगिस्तान के किनारे स्थित है। यह पार्थपुर और उन को जोड़ती सड़क के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर खड़ा है।

दिस्कित मठ के अंदरूनी भाग इसके बाहरी हिस्से की तरह ही सुंदर हैं, क्योंकि वे जटिल थंक़ा भित्तिचित्रों से सजाए गए हैं। प्रार्थना कक्ष, जिसे दुखंग कहा जाता है, बौद्ध संरक्षक देवताओं के विशाल ड्रम और सुंदर छवियों का घर है। मठ का भंडार कई मंगोलियाई और तिब्बती धार्मिक ग्रंथों को संरक्षित करता है। मठ के ठीक ऊपर लाचुंग मंदिर है, जो बौद्ध धर्म के गेलुगपा संप्रदाय के संस्थापक सोंग खापा की बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। इसे नुब्रा घाटी के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। दिस्कित मठ का प्रांगण दिस्कित गांव और आसपास के परिदृश्य के सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है।

नुब्रा घाटी में एक प्रमुख आकर्षण मैत्रेय बुद्ध की 108 फीट की मूर्ति है, जो को आश्चर्यचकित करती है। सोने और लाल रंग की मूर्ति पाकिस्तान की ओर श्योक नदी का सामना करती एक पहाड़ी के ऊपर दिस्कित मठ के ठीक नीचे स्थित है। पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर के गाँव सामने की दिखती पहाड़ी के पार स्थित हैं। श्योक नदी उसी तरफ़ जा रही है। काराकोरम पहाड़ पर सिंधु से मिलेगी। माना जाता है कि मूर्ति के सौंदर्य और आध्यात्मिक महत्व के अलावा, तीन विचारों को शामिल किया गया है: दिस्कित गांव की सुरक्षा, विश्व शांति को बढ़ावा देना और पाकिस्तान के साथ युद्ध की रोकथाम करना।

दिस्कित मठ में मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार दोस्मोचे, या देस्मोचे है, जिसका अर्थ है, “बलि का बकरा का त्योहार।” यह नुब्रा घाटी के गांवों के लोगों की बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। त्योहार का मुख्य आकर्षण छम नृत्य है, जो पर्यटकों के बीच मुखौटा नृत्य के रूप में अधिक प्रसिद्ध है। ये नृत्य मठ के लामाओं द्वारा किए जाते हैं। किसी भी आपदा की घटना को रोकने के लिए आटे से बने चित्र भी फेंके जाते हैं, और हर जगह शांति और समृद्धि का स्वागत करते हैं।

इस मठ का निर्माण त्सोंग खपा के एक शिष्य चंग्ज़ेम त्सेराब जंगपो ने 14 वीं शताब्दी में करवाया था, जिसके अंदर अलग-अलग तरीके से तिब्बती चित्रकारियाँ की हुई हैं, जो देखने में काफी खूबसूरत लगती है। इस मठ में प्रवेश करने के लिए ₹ 30 देना पड़ता है और अगर कोई व्यक्ति यहां ड्रोन उड़ाना चाहता है, तो उसे अलग से ₹.500 देना पड़ेगा। एक घंटा मठ का अवलोकन करके रुकने के स्थान हुंदर तरफ़ कूच किया। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। नदी एक  कोने से बह रही है। नदी की किनारे घने घुमावदार कूचों में एक घंटा भटकने के बाद तय स्थान मिला।

हमारे रुकने का इंतज़ाम टेंट हाऊस में था। चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरे छोटे से मैदान में 14 टेंट हाऊस बने थे। बीच में एक बगीचा में बीस-पच्चीस कुर्सियाँ डली थीं। उन पर चाँदनी छनकर आ रही थी। रात को आठ बजे के लगभग तीस दक्षिण भारतीय पर्यटक और आ गए। उनकी धमाचौकड़ी देर रात तक चलती रही। रात बारह  बजे तक बर्फीले पहाड़ों से उतरती चाँदनी का आनंद लेकर शयन को चले गये।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१३ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

लेह के आसपास

02 जुलाई 2022  को नाश्ता करने के बाद लेह के आसपास भ्रमण को निकले। होटल में पता चला कि जयपुर से आये पर्यटकों को आक्सीजन की कमी के कारण साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है। लेह समुद्र तल से तक़रीबन 12,000 फुट ऊँचाई पर है। अब हमें 13,000 फुट पर जाना था। हमने पेपर नैप्किन में कपूर की एक-एक गोली रखकर सभी साथियों को इस निर्देश के साथ पकड़ा दी कि वे इसे थोड़ी-थोड़ी देर में सूंघते रहें। इससे उन्हें घुमावदार चढ़ाई वाले रास्तों पर मितली की परेशानी नहीं होगी और आक्सीजन की कमी भी न होगी। जब भी किसी स्थान के विभिन्न पर्यटन केंद्रों पर घूमने जाना हो तो टैक्सी वाले एक तरीक़ा अपनाते हैं कि सबसे नज़दीक के स्थलों पर पर्यटकों का अधिक समय खर्च कराने की जुगत में रहते हैं। लंच तक उसी स्थान के आसपास तीन बज जाएँ और इतने थक जाएँ कि लम्बी दूरी के स्थान पर जाने लायक़ न रहें या जाने को अनिछुक हो जायें। हमने टैक्सी चालक को लेह से सत्तर किलोमीटर दूरी पर स्थित अलची गोम्पा स्थल पर सबसे पहले चलने को कहा। थोड़ी आनाकानी के बाद वह सहमत हो गया। उसने गाड़ी में डीज़ल भरवा लिया।

लिकिर गोंपा

वाहन तेज गति से लेह-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 01 पर चल पड़ा। सबसे पहले 52 किलोमीटर पर हमारा पड़ाव लिकिर गोंपा था। यह लेह के पश्चिम में 3700 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी पहाड़ी पर सुरम्य रूप से स्थित है। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग्पा संप्रदाय द्वारा लद्दाख के पांचवें राजा, ल्हाचेन ग्यालपो (ल्हा-चेन-रग्याल-पो) की कमान के तहत 1065 में लामा दुवांग चोसजे ने स्थापित किया गया था। वर्तमान में लगभग 120 बौद्ध भिक्षु इस मठ में रहकर साधना करते और धर्म चक्र प्रवर्तित करते हैं। यहाँ लगभग तीस छात्रों वाला एक स्कूल है। जिसमें बौद्ध धर्म सम्बन्धी शिक्षा तीन भाषाओं, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी में प्रदान की जाती है। इसे केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान चलाता है।

मठ में दो सभा मंडप हैं, जिन्हें दुखांग के नाम से जाना जाता है। जीवन सतत दुख का अंग है। उससे मुक्त होने के लिए निर्वाण सुखांग है। दुखांग में बोधिसत्व (जिसने सत्य जान लिया है), अमिताभ (जिसकी अमिट आभा है)  शाक्यमुनि ( शाक्यों में जो मुनि है), मैत्रेय (भविष्य के बौद्ध) और पीली टोपी संप्रदाय के संस्थापक त्सोंग खापा की बड़ी मूर्तियाँ हैं। एक केंद्रीय प्रांगण के दाईं ओर ध्यान केंद्र स्थित है जिसमें सात-सात लामाओं के बैठने की छह पंक्तियाँ और लिकिर के प्रमुख लामा के लिए एक सिंहासन है।

मठ में एक संग्रहालय है जिसमें पुरानी पांडुलिपियों का भंडार है। उल्लेखनीय थंका पेंटिंग संग्रह और पुरानी वेशभूषा और मिट्टी के बर्तन हैं। छत पर बैठे मैत्रेय की 75 फीट ऊंची सुनहरे रंग की मूर्ति है। यह बुद्ध मूर्ति 1999 में बनकर तैयार हुई है। बाईं दीवार में 35 इकबालिया बुद्धों के चित्र हैं, जबकि दाहिनी दीवार में शाक्यमुनि की एक छवि है। एक सीढ़ी हॉल से बाहर निकलती है, जो प्रमुख लामा का कमरा ज़िनचुन की ओर जाती है। जिसमें मुख्य रूप से थंका और लामाओं की छवियां और अवलोकितेश्वर की पत्नी तारा की अभिव्यक्तियाँ हैं। 

हमारा समूह दो भागों में बँट गया। इस कारण से ज़रूरत से अधिक समय इस मठ में व्यतीत हुआ। हमें आज दस पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना था इसलिए सभी को समूह में साथ रहने और प्रत्येक स्थल पर समय निर्धारण करने की हिदायत दी गई। 

अलची गोम्पा

अगला पड़ाव सिंधु नदी के दक्षिण तट पर 3,100 मीटर (10,200 फीट) की ऊंचाई पर लेह से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अलची मठ है। सिंधु नदी की सहायक नदियों के किनारे बीस किलोमीटर चलकर अलची गोम्पा पहुँचे। गोम्पा या गोम्बा या गोन्पा तिब्बती शैली में बने एक प्रकार के बौद्ध-मठ के भवन या भवनों के समूह को कहते हैं। तिब्बत, भूटान, नेपाल और लद्दाख़, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश क्षेत्रों में कई स्थानों पर गोम्पा बने हैं।

अलची गोम्पा को लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के तहत संचालित लेह जिले के अलची गांव में मंदिरों के मठ परिसर (चोस-खोर) के रूप में जाना जाता है। इस परिसर में निचले लद्दाख क्षेत्र के अलची गांव में चार अलग-अलग बस्तियां हैं। जिनमें विभिन्न अवधियों के स्मारक हैं। इन चार बस्तियों में लिकिर मठ द्वारा प्रशासित अलची गोम्पा सबसे पुराना और सबसे प्रसिद्ध कहा जाता है।

अलची परिसर के निर्माण का श्रेय 10 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध विद्वान-अनुवादक रिनचेन ज़ंगपो (958-1055) को दिया जाता है, साथ ही लामायुरु मठ, वानला, मांग-ग्यू और सुमदा का नाम भी उनके नाम के साथ जुड़ा है। दसवीं शताब्दी के दौरान, गुगे के तिब्बती लामा-राजा येशे- Ö ने ट्रांस हिमालय क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए 21 विद्वानों को क्षेत्र आवंटित करके मठ निर्माण की पहल की थी। हालांकि, कठोर जलवायु और विषम स्थलाकृतिक परिस्थितियों के कारण, केवल दो ही जीवित रहे, उनमें से एक सम्मानित विद्वान और अनुवादक रिनचेन जांगपो थे। जिन्होंने लद्दाख क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश और सिक्किम सहित भारत के अन्य क्षेत्रों में बौद्ध मठों की स्थापना की थी। अपने प्रवास के दौरान, वे नेपाल, भूटान और तिब्बत के पड़ोसी देशों में भी गए। जांगपो को “लोहत्सावा” या “महान अनुवादक” के नाम से जाना जाने लगा। उन्हें बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में 108 मठों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म को संस्थागत रूप दिया। इन मठों को तिब्बती बौद्ध धर्म के वज्रयान का मुख्य आधार माना जाता है। जांगपो ने पौराणिक 108 मठों में दीवार पेंटिंग और मूर्तियां बनाने के लिए कश्मीरी कलाकारों को लगाया। इनमें से केवल कुछ ही मठ बचे हैं, लद्दाख में अलची मठ परिसर को उनके द्वारा बनाए गए सभी मठों में प्रथम स्थान का गौरव प्राप्त है।

निचले लद्दाख क्षेत्र में अलची तीन गांवों में एक हिस्सा है जो ‘स्मारकों के अलची समूह’ का गठन करते हैं; अलची से सटे अन्य दो गाँव मंग्यू और सुमदा चुन हैं। इन तीन गांवों में स्मारकों को “अद्वितीय शैली और कारीगरी” कहा जाता है, लेकिन अलची मठ परिसर सबसे प्रसिद्ध है। यह एक मात्र मठ है जो पहाड़ी पर स्थित न होकर निचले धरातल पर है। मठ में उस समय के बौद्ध और हिंदू दोनों राजाओं के कलात्मक और आध्यात्मिक विवरण चित्रों में परिलक्षित होते हैं। ये लद्दाख की कुछ सबसे पुरानी पेंटिंग हैं। परिसर में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और विस्तृत लकड़ी की नक्काशी और बारोक शैली में कला-कार्य भी हैं।

मठ परिसर में तीन प्रमुख मंदिर हैं: दुखांग (असेंबली हॉल), सुमत्सेक और मंजुश्री का मंदिर , सभी 12 वीं और 13 वीं शताब्दी की शुरुआत के बीच के हैं। चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके अलावा, अलची परिसर में दो अन्य महत्वपूर्ण मंदिर हैं, अनुवादक का मंदिर जिसे ‘लॉटसभा लखंग’ कहा जाता है और एक नया मंदिर जिसे ‘लखंग ​​सोमा’ कहा जाता है। दुखंग या असेंबली हॉल और एक तीन मंजिला मुख्य मंदिर (gTsug-lag-khang), है, जिसे सुमत्सेग (gSum-brtsegs) कहा जाता है। कश्मीरी शैली में बनाया गया एक चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तीसरे मंदिर को मंजुश्री मंदिर (‘जाम-दपाल ल्हा-खांग) कहा जाता है। यहाँ दो सौ रुपए प्रवेश शुल्क जमा कराया जाता है। प्रवेश टिकट लेकर तीनों मंदिरों के दर्शन किये।

निम्मू गाँव

लद्दाख़ की मुख्य नदी सिंधु की मुख्य धारा का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के पास है। ज़ांस्कर पर्वत श्रृंखला से इसकी एक सहायक ज़ांस्कर नदी निकलती है। यह लद्दाख के पूर्वोत्तर भाग से होकर बहती है। इस क्षेत्र में ठंड के कारण सर्दियों जम जाती हैं। ज़ांस्कर नदी निम्मू (निमो) गांव में सिंधु नदी में मिलती है। हम निम्मू गाँव पहुँचे। निम्मू चाय-समोसा और चोल-पूरी के लिए बहुत प्रसिद्ध है। निम्मू में रुककर दोपहर का खाना निपटाया और चाय पी।

निम्मू गांव के पास कई पर्यटन स्थल हैं, जिनमें बाजगो, लिकिर और अलची मठ शामिल हैं। यहां का तापमान गर्मियों में 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर सर्दियों में -29 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इतनी कठोर जलवायु और चरम मौसम की स्थिति के कारण बहुत कम वनस्पति आच्छादन है। यहाँ एक जलविद्युत ऊर्जा संयंत्र है जिसे निमु-बाजगो बांध के नाम से जाना जाता है। बाजगो मठ नदी किनारे देखते निकले।

सिंधु नदी भारतीय उपमहाद्वीप को जीवनदायिनी वरदान है। हिमालय महापर्वत उत्तर दिशा से ब्रह्मपुत्र महानद को तिब्बत से बंगलादेश तक पहुँचाता है। वहीं दक्षिण में तिब्बत और पामीर के पठार से अनेकों नदियों को मिलाकर सिंधु महानद को अरब सागर तक पहुँचाता है। मानो हिमालय भारतीय महाद्वीप को दोनों हाथों से सहेज रहा हो। 

सिंधु नदी का कुल जल ग्रहण क्षेत्र 11,65,000  वर्ग किमी से अधिक है। लद्दाख में इसकी बायीं ओर की सहायक नदी ज़ांस्कर है, और मैदानी इलाकों में इसकी बाएँ किनारे की सहायक नदी पंजनाद हैं, जो पंजाब की पाँच नदियों, अर्थात् ब्यास, सतलुज, झेलम, रावी, और चिनाब, के क्रमिक संगम से बनती है। सिंधु उत्तरी भाग में एक पहाड़ी झरने से शुरू होकर हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश पर्वतमाला में ग्लेशियरों और नदियों से पोषित होकर समशीतोष्ण जंगलों, मैदानों और शुष्क ग्रामीण इलाकों के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करती है। इसकी दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ श्योक, गिलगित, काबुल, कुर्रम और गोमल नदियाँ हैं। सिंधु नदी लद्दाख की रीढ़ है; सभी प्रमुख स्थान शे, लेह, बासगो और टिंगमोसगैंग नदी के करीब स्थित हैं।

यह ज़ांस्कर घाटी का क्षेत्र है। सुरू नदी ज़ांस्कर श्रेणी की पश्चिमी और उत्तरी सीमा बनाती है। सुरु कारगिल के उत्तर में थोड़ी दूरी पर द्रास और शिंगो नदियों के संयुक्त जल को प्राप्त करने के बाद बाल्टिस्तान के मरोल में सिंधु में शामिल हो जाता है, जो अब नियंत्रण रेखा के पाकिस्तान की ओर है। रंगदम मठ और जूलिडोक का परिचर गांव सुरु घाटी में अंतिम बसा हुआ क्षेत्र है; यह बकरवाल नामक खानाबदोश चरवाहों का भी गंतव्य है, जो हर गर्मियों में जम्मू क्षेत्र में ट्रेकिंग करते हैं। रंगदम, हालांकि पेन्सी-ला के उत्तरी किनारे पर, सुरू के बजाय सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ज़ांस्कर का हिस्सा माना जाता है।

ज़ांस्कर घाटी रंगदम से  पेन्सी-ला में 4400 मीटर तक ऊँची हो जाती है। कारगिल सुरू घाटी का एकमात्र शहर, 1947 से पहले व्यापार कारवां के मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जो श्रीनगर, लेह, स्कर्दु और पदुम से लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर कमोबेश समान दूरी पर था।

हिमालय के उत्तरी भाग में भारी हिमाच्छादित फ्लैंक के तल पर ज़ांस्कर और सुरु घाटियाँ एक बड़ा ट्रफ़ बनाती हैं। ज़रा देखें ज़ांस्कर नदी कैसे आकार लेती है। ज़ांस्कर घाटी में दो नदियाँ, स्टोड (डोडा) और लुंगनाक (ज़ाराप लिंगती) के कुंड हैं। लुंगनाक की मुख्य सहायक नदियों में से एक ज़ाराप है, जो उत्तरपूर्वी हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों और घाटियों को त्सो मोरीरी (झील) के उत्तर-पश्चिम में सिर्फ 20 किलोमीटर दूर से आती है। बारा-लाचा-ला के उत्तर में थोड़ा दूर यह लिंगटी और एक अन्य सहायक नदी से जुड़ती है; इसके बाद यह उत्तर-पश्चिम की ओर बहती है और अचानक एक दर्रे से होकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और फुगताल गोम्पा से होते हुए शिंगो-ला से उतरती कारग्याक नदी में मिल जाती है, जो हिमाचल प्रदेश से आती है। स्टोड पेन्सी-ला के नीचे द्रांग-ड्रंग ग्लेशियर पिघला हुआ पानी ले जाता है, और लुंगनाक के पास एक विस्तृत खुली घाटी में बहता है। ज़ांस्कर में भारी हिमपात होता है, पेन्सी-ला केवल जून में खुलता है और अक्टूबर के मध्य में फिर से अवरुद्ध हो जाता है। पूरी घाटी वस्तुतः वृक्षविहीन है। ज़ांस्कर नदी के रूप में इन सबका संयुक्त जल ज़ांस्कर रेंज में एक दर्रे के माध्यम से उत्तर की ओर बहता है, मध्य लद्दाख में निम्मू के नज़दीक में सिंधु नदी में शामिल होता है। उसी संगम के सामने आधा घंटा गुज़ारा।

ग्रीष्मकाल के दौरान, ज़ांस्कर नदी और भी प्रफुल्लित होती है और सर्दियों के दौरान यह हरे रंग में बदल जाती है जबकि सिंधु नीला हो जाता है। सिंधु नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 1) और ज़ांस्कर नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 2) लोकप्रिय आउटडोर खेल हैं। ज़ांस्कर और सिंधु नदियों का संगम इसके करीब स्थित है। निम्मू सभी रिवर राफ्टिंग समूहों के लिए एक पड़ाव है और सिंधु नदी में सालाना अखिल भारतीय रिवर राफ्टिंग अभियान के लिए मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।

हमने सिंधु नदी और ज़ांस्कर नदियों के संगम पर हिमाच्छादित शिखरों का अवलोकन किया। दो पहाड़ों के बीच बहती नीली-हरी सिंधु नदी का मटमैली ज़ांस्कर नदी के साथ संगम हम देख रहे हैं। रंगों के इस जादुई संगम के चारों ओर अनगढ़ सूखे पहाड़ों ने इसकी जीवंतता को और बढ़ा दिया है। सूर्य की आभा में जुड़ा नीले आसमान से उतरती पहाड़ियाँ – सचमुच भूमि की चुप्पी कितनी प्यारी है। फड़फड़ाते झंडे के साथ उभरते प्रार्थना के स्वरों ने सहूलियत बिंदु के साथ एक शांति जोड़ दी। पूरे वातावरण ने सम्मोहन से आगाह किया कि आप सब कुछ भूलकर मंत्रमुग्ध कर देने वाले परिदृश्य को हृदय में बसा लें।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

दर्रों की लुकाछिपी 

01 जुलाई 2022 को सुबह सात बजे भोपाल से दिल्ली उड़ान पकड़ने राजा भोज विमान तल रवाना होना था। पर्यटन की शुरुआत करने के उत्साह में सुबह की ताजी हवा और भी सुहानी लग रही थी। लगे भी क्यों न, आख़िर हवा बदलने के लिए दुनिया के सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित लेह हवाई अड्डे पर उतरने वाले थे। वहाँ की ज़मीन कुछ-कुछ चाँद सी वीरान दिखती है। शायरी में चौदहवीं का चाँद लाजवाब होता है। लेकिन अपोलो-११ के अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रोंग ने सचमुच के चाँद को बहुत खुरदुरा बताया है। वहाँ पीने को पानी नहीं है और साँस लेना दूभर है। घर के चाँद के सानिध्य में तो साँस कतिपय कारणों से अक्सर तेज हो जाती है। लद्दाख़ में आक्सीजन कम होने से साँस धीमी होने लगती है।

पिछले पंद्रह दिन से इस यात्रा की तैयारी कर रहे थे। चाहे कितनी भी तैयारी कर लो लेकिन अंतिम समय की अफ़रातफ़री से बचा नहीं जा सकता। महिलाओं की तैयारी का आलम बिल्कुल अलहदा होता है। कपड़े-ज़ेवर-जूते-चप्पल और खाने पीने की सामग्री सब गड्डमड्ड हो जाते हैं। लद्दाख़ में समुद्र तल से 14,000 से 18,000 फुट ऊपर अजीबोग़रीब मौसम होता है। वहाँ हरियाली रहित सूखे नंगे पहाड़ हैं जिनके शिखरों पर जमी बर्फ़ पर तेज धूप से दिन में 37-38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रहता है परंतु शाम घिर आते ही तापमान एकदम से गिर कर 4-8 डिग्री तक पहुँच जाता है।

आख़िर वह क्षण आ ही गया जब टैक्सी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, और गरम कपड़ों को रखने की अफ़रातफ़री ने माहौल बिगाड़ दिया। भारतीय घरों में अक्सर तनावग्रस्त वातावरण में पर्यटन यात्रा की शुरुआत होती है। आपको तनाव झेलने और उससे निजात पाने की आदत डालना ही होती है। फिर भी कुछ न कुछ सामान छूट ही जाता है। जैसे साबुन, दवाइयाँ, दंतमंजन ट्यूब और ब्रश वग़ैरह। इन चीजों का एक अतिरिक्त पैकेट पहले से ही बैग में रख लेना चाहिए। फिर भी महिलाओं के रबर बैंड, सुई-धागा, अतिरिक्त नाड़ा और सिंदूर डिबिया छूटते-छूटते बचीं। टैक्सी में बैठते ही विमान में अनुमत सामान और हैंडबेग हेतु नियत क्रमशः पंद्रह और दस किलो वजन निर्धारित होने लगा। थोड़ा-थोड़ा करते सामान अधिक हो ही जाता है। फिर कम करते-करते बहुत कम हो जाता है। ख़ैर गहरी साँस लेकर मन के विमान को संतुलित किया। इतने में हवाई अड्डा आ गया। सुरक्षाकर्मी को टिकिट और पहचान के साक्ष्य दिखाकर अंदर घुसे। बोर्डिंग पास के बाद सुरक्षा जाँच में सामान की बिदाई के समय महिलाएँ कुछ इस तरह द्रवित हो रही थीं, मानो बेटी की बिदाई हो रही हो।

सात बजे विमान में बैठने के लिए गेट नम्बर 4 की तरफ़ प्रस्थान किया। सौम्या ने वेब चेक-इन करके सभी की कुर्सियाँ खिड़की की तरफ़ ले ली थीं। तक़रीबन एक घंटा इंतज़ार करते बैठे रहे। विमान में चढ़ने कि घोषणा होने पर विमान में प्रवेश किया। चार उड़नपरियों का समूह विमान के प्रवेश द्वार पर नमस्कार की मुद्रा में कुछ बोलता सा नज़र आ रहा था लेकिन उनके शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे। उनसे नज़र मिलाकर धन्यवाद कह आगे बढ़ गये। हमारी सीट 16-A खिड़की किनारे पर थी। नज़दीक जाकर खड़े हुए तो वहाँ एक जोड़ा बैठा था। उन्होंने हमें मूर्ख समझ 16-C की तरफ़ बैठने का इशारा किया लेकिन हम जन्म से ही मूर्ख नहीं हैं। हमने प्रत्युत्तर में आँखों से 16-A की तरफ़ इशारा किया। उन्होंने हमारी बुद्धिमानी से चकित हो खड़े होकर हमें अपनी कुर्सी तक जाने दिया। फिर वे तोता-मैना की तरह चौंच लड़ाने में और हम लद्दाख़ की घाटियों के विचार में खोए यात्रा वृतांत लिखने में व्यस्त हो गये।

विमान ने नियत समय 7:45 पर उड़ान भरी। विमान रनवे याने उड़ान भरने के लम्बे रास्ते पर पहुँचा। कैप्टन के कुछ बुदबुदाने के बाद विमान दौड़ाना शुरू किया। विमान ने पल भर में गति पकड़ ठीक तीस सेकंड में ज़मीन छोड़ दी। उड़ान भरते ही भोपाल का बड़ा तालाब और ताज़ुल मसाज़िद दिखने लगी। अब हम सही के आसमान में उड़ रहे थे। वो वाला नहीं, जिसे लोग कहते हैं “साला आसमान में उड़ रहा है।” ख़्याल आया, ज़मीन पर थे तो आसमान मुट्ठी में नहीं था, आसमान में पहुँचे तो ज़मीन छूट गई। निदा फ़ाज़ली ने क्या ख़ूब कहा है।

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

कहीं जमीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता।

बग़ल वाला तोता-मैना जोड़ा ग़ैरज़रूरी बातें करके हाथों में हाथ डालकर सो गया। थोड़ी देर बाद हाथ से हाथ छूटे तो मैना का सिर तोता के कंधे पर था। किरदार तो नींद में थे परंतु उनकी बाहों और कलाइयों पर छपे टैटू आपस में जो बयाँ रहे थे। उसे देख हम निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल गुनगुनाने लगे-

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,

ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता।

थोड़ी देर में उनकी साँसों से बिना धुएँ के शोले उठने लगे।

बुझा सका है भला कौन वक़्त (इश्क़) के शोले,

ये ऐसी आग है जिसमे धुआँ नहीं मिलता।

उन्हें देखकर लगा कि इनकी ज़िंदगी का यह रूमानी  वक्त गुज़रने के बाद सब लोगों की तरह ये लोग गुनगुनाएँगे। 

 तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,

जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता।

आसमान में उमड़ते-घुमड़ते सफ़ेद बादलों से बातें करते सोचते रहे कि इस घूमती फ़ानी दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है- मुहब्बत भी। इतने में नाश्ता परोसने वाली परिचारिका आ गई। जब से मास्क चलन में आया है, उनकी नक़ली ख़ुशी बिखेरती मुस्कान दिखती नहीं है। वह काली घटाओं को गोल माथे पर से खींच पीछे कसकर जूड़ा बाँधे सिर्फ़ आँखों से बात कर रही थी। नाश्ता भुगतान पर उपलब्ध था। मतलब 295.00 रुपए की सैंडविच, जिसमें 29.00 रुपए से अधिक लागत नहीं लगी थी, GST सहित 307.00 रुपयों में मिल रही थी। सैंडविच की विमान सी ऊँची क़ीमत सुनकर हमें चक्कर आने लगा। ऐसा लगा क़ीमत सुनकर आक्सीजन कम हो रही है। इसीलिए शायद उड़ान के पहले ही विमान में आक्सीजन लेने की विधि से परिचय करा दिया जाता है। विमान हसीना से एक गिलास पानी लेकर गले में उँडेला और दिल्ली पहुँचने लग गए।

तोता-मैना जोड़ा गहन निद्रा में था। शायद कई दिनों से सोया नहीं था। बाहर निकलने के लिए आख़िर उनकी नींद में ख़लल डालना पड़ा। वे चौंक कर उठे। अस्तव्यस्त परिधानों को व्यवस्थित करने लगे। विमान रुका नहीं कि यात्री तुरंत खड़े हो गये। जबकि उतरने की सीढ़ी विमान के दरवाज़े पर लगाने में पंद्रह-बीस मिनट का समय तो लगता ही है। तब तक अपन आराम से बैठे रहे। जब स्थिति धक्कामुक्की से सामान्य हुई तब विमान से उतरना शुरू किया। विमान के दरवाज़े पर पहुँचे तब सीढ़ियाँ ख़ाली थीं। दरवाज़े पर थोड़ा रुककर किसी राष्ट्राध्यक्ष सी धीमी चाल से चारों तरफ़ देखते हुए उतरे। अरे भाई! फोकट में इतराना भी तो एक अदा है। जब कोई न देख रहा हो तो थोड़ा इतराने में क्या हर्ज है। ख़ैर आसमान में उड़कर ज़मीन पर आ गये। कितना भी ऊँचा उड़ लो आख़िर ज़मीन पर तो आना ही पड़ता है।  

ज़मीं की गोद में इतना सुकून है ’आतिश’
जो उतरा वो सफ़र की थकान भूल गया।

 हमें दिल्ली से लेह की उड़ान पकड़नी थी। दिल्ली विमानतल पर प्रस्थान से बाहर निकल पुनः आगमन द्वार से सुरक्षा जाँच उपरांत मालूम पड़ा कि लेह की उड़ान गेट नम्बर 32 से प्रस्थान करेगी। क्रेडिट कार्ड संस्कृति के कुछ फ़िज़ूल खर्ची नुक़सान हैं तो कुछ फ़ायदे भी मिलते हैं। ये किसी-किसी विमानतल पर इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में मुफ़्तखोरी करवाते हैं। इत्तफ़ाक़न इग्ज़ेक्युटिव लाउंज गेट नम्बर 32 के बिल्कुल बग़ल में था। थोड़ी लम्बी क़तार थी। क्रेडिट कार्ड की दो रुपया पकड़ जुगाड़ से दस मिनट में लाउंज के अंदर थे। अमेरिकन नाश्ता और हिंदुस्तानी नाश्ता का विकल्प था। हिंदुस्तानी इडली साम्भर चटनी उपमा उदरस्त किया और साथ में काप्पीछिनों काफ़ी का कड़क ज़ायक़ा गले में उतारा। इतनी देर में बोर्डिंग की घोषणा हुई और विमान में चढ़कर खिड़की वाली 18-A कुर्सी पर आसान जमाया।

विमान कप्तान ने बताया लेह का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक होने के कारण बर्फ़ पर सूर्य रश्मियाँ चकाचौंध पैदा करती हैं। जिससे विमान उतारने में दिक़्क़त हो सकती है। इसलिए 11:45 के तय समय से पूर्व ही 11:30 को उड़ान भरना पड़ेगी। विमान के उड़ान भरते ही गुड़गाँव का कांक्रीट जंगल दिखने लगा। दस मिनट के बाद हम बादलों से बातें कर रहे थे। उसके बाद शिवालिक पहाड़ियाँ, पीर पंचाल पर्वत शिखर दिखने लगे।

शिवालिक पहाड़ियाँ मुख्य हिमालय से उतार की बाह्य हिमालयी पर्वतमाला है, जो  भारतीय महाद्वीप के उत्तरी भाग में पश्चिम में सिंधु नदी  से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2,400 किलोमीटर तक पसरी है। यह लगभग 10–50 किमी चौड़ी है और इसके शिखरों की औसत ऊँचाई 1,500–2,000 मीटर (4,900–6,600 फुट) है। असम में  तीस्ता और रायडक नदी के बीच लगभग 90 किलोमीटर (56 मील) का गलियारा है, जहाँ शिखर कम ऊँचाई के हैं। वहीं से अरुणाचल का रास्ता है। यह हिमायल पर्वत प्रणाली के दक्षिणतम और भूगर्भ शास्त्रीय दृष्टि से, कनिष्ठतम पर्वतमाला कड़ी है। इसकी औसत ऊंचाई 850-1200 मीटर है और इसकी कई उपश्रेणियां भी हैं। यह 1600 कि॰मी॰ तक पूर्व में तीस्ता नदी सिक्किम से पश्चिमवर्त नेपाल और उत्तराखंड से कश्मीर  होते हुए उत्तरी पाकिस्तान तक जाते हैं। बीच में शाकंभरी देवी की पहाडियों से सहारनपुर,  देहरादून मसूरी  के पर्वतों में जाने हेतु मोहन दर्रा  प्रधान मार्ग है। “शिवालिक” का अर्थ “शिव की जटाएँ” है। शिवालिक से उत्तर में ऊँची हिमालय पर्वत माला  है, जो मध्य हिमालय भी कहलाती है। एक पौराणिक मिथक के अनुसार रघु कुल के भागीरथी प्रयासों से गंगा स्वर्ग से धरा पर आने की सहमत हुईं लेकिन उनके तीव्र वेग को पृथ्वी पर झेलना मुश्किल था। शिव अपनी जटाएँ फैलाकर कैलाश पर्वत पर विराजमान हुए, तब उनकी जटाएँ हिमालय की तराई तक फैल गईं, वे ही शिवालिक पहाड़ियाँ कहलाती हैं। 

लेह में चटक तेज धूप की अल्ट्रा वायोलेट किरण बर्फीले पहाड़ों पर पड़कर गर्मी बढ़ा देती है। सूर्य रश्मियों की तेज़ी नज़र को दृश्यों पर थमने नहीं दे रही थी। आसमान में मानसूनी बादलों का दूल्हा बिना बूँदों की बारात नृत्य कर रहा था। विमान को बादलों से ऊपर उठाने के प्रयास में विमान बुरी तरह हिलने लगा। कुछ लोग घबराहट में एक दूसरे को देखने लगे। वैसे भी विमान में सिवाय उड़नपरियों को देखने के अलावा और कुछ था भी नहीं। कुछेक को उल्टियाँ होने लगीं। थोड़ी देर में भोजन परोसने की घोषणा हुई। सवारियाँ चौकन्नी हो गईं। उनकी जीभें लपलपाने लगीं। यह जानकारी मिलते ही कि भोजन भुगतान पर उपलब्ध है, सुनते ही सबने अपनी जीभें समेट लीं। हमारी टिकट कारपोरेट बुकिंग में होने से मुफ़्त नाश्ते में सजीधजी सैंडविच एक गिलास पानी के साथ परोसी गई।

विमान आधा घंटे बाद 18000 फुट की ऊँचाई पर था। बादल नदारत और उनकी जगह धूप में झुलसते हिम शिखरों ने ले ली। हिमालय का अर्थ ही हिम का आलय याने बर्फ़ का भंडार होता है जैसे पुस्तकों का भंडार पुस्तकालय होता है। पायलट ने सूचना दी कि सब हम लेह पहुँचने वाले हैं। सभी यात्री कुर्सी सीधी करके बेल्ट कस लें। विमान सुविधाजनक तरीक़े से नीचे पहुँचने लगा। फ़ौज की छावनी दिख रही थी। उसके ठीक बाजू की हवाई पट्टी पर विमान उतरा। लेह की हवाई पट्टी फ़ौजी है। उसे नागरिक विमान उतरने की अनुमति है। सामान समेटकर बाहर निकले। एक टैक्सी चालक हमारे नाम की तख़्ती लिए खड़ा था। सवार होकर लेह शहर के बीच में स्थित मानसरोवर होटल पहुँच गये।

लेह की मानसरोवर होटल में पहले माले पर कमरा मिला। कमरे में पंखा या एसी होने को कोई प्रश्न नहीं है। दिन में यद्यपि 38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान है परंतु रात ढलते ही सात डिग्री पर खिसक जाएगा। रूम हीटर चलाना पड़ता है। स्वागत पेय के रूप में बढ़िया गाढ़े लीकर की चाय पीकर मज़ा आ गया। स्थानीय नियमों के अनुसार शरीर के थर्मोस्टेट को सेट करने और कोविड नियमावली पालन हेतु एक दिन का आराम आवश्यक है। चार बजे पैदल घूमने निकले तो घरों में सेवफल से लदे पेड़ दिखे। बाक़ी दिन आराम किया। मुफ़्त के खाने का भी एक अलग मज़ा होता है। होटल की तरफ़ से सौजन्य रात्रिभोज करके जल्दी सोने चले गये।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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