श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पान खाएं सैंया हमारो…“।)
अभी अभी # ९०७ ⇒ आलेख – पान खाएं सैंया हमारो
श्री प्रदीप शर्मा
सांवली सुरतिया होंठ लाल लाल ! जैसा कि तीसरी कसम के इस गीत से स्पष्ट है, पान पुरुषों का मुख श्रृंगार है। आप कह सकते हैं, यह मर्दों का लिपस्टिक है। पान को ताम्बुल भी कहते हैं। आयुर्वेद में इसका गुणगान है। भोजन के पश्चात् इससे मुखशुद्धि की जाती है।
पान और कुछ नहीं, एक प्रजाति का पत्ता है जिसमें कत्था, चूना, लौंग, इलायची मिलाकर बनारस वाला बीड़ा बनाया जाता है, और बिग बी के शब्दों में इसे गौरी का यार चबाता है। लगता है, बिना पान खाए, रंग नहीं बरसता।।
एक कहावत मशहूर है, नीचे पान की दूकान, ऊपर गौरी का मकान ! कुछ हद तक यह कहावत सही भी लगती है। एक समय था, जब किसी मजनू को पहचानना होता था, तो वह पान की दुकान पर खड़ा मिलता था। पान की दुकान पर सिर्फ पान ही नहीं खाया जाता, कई और गतिविधियां भी होती हैं। ताका – झांकी और छेड़छाड़ के लिए इससे अच्छा सत्संग स्थल और कहां मिल सकता है।
पान रसिकों की पहचान है। स्वच्छ भारत अभियान ने रसिकों की पीक पर लात मारी है। कोई भी गली मोहल्ला, सरकारी स्कूल, दफ्तर, थाना, अदालत, और तो और रास्तों में रखे पीकदान तक, पान की पीक की पहचान बन चुके थे। भला हो पान पराग, पान मसाला और पान पसंद जैसी गोलियों का, जो पान का स्वाद भी देती हैं और होंठ भी लाल नहीं करती। जो पीक कभी रास्तों को क्रिकेट का पिच बना देती थी, वह पिचकारी शनै: शनै: छोटी होती चली गई और स्वच्छता अभियान के चलते लुप्त – प्राय हो गई।।
खानदानी लोग आज भी घर में पान दान रखते हैं ! अपनी हैसियत के अनुसार यह चांदी अथवा पीतल का हो सकता है। एक गीले कपड़े में करीने से रखे हुए कुछ पान, सूखा कत्था, गीला चूना, लौंग, सुपारी, इलायची और पिपरमिंट के साथ थोड़ा किमाम भी नज़र आ ही जाता है। घर की सभ्रांत महिलाएं, तब चौराहों पर पान नहीं खाया करती थी। पान बनाना और पेश करने का भी एक अंदाज़ होता है।
राज पुरोहित और राजवैद्य की तरह उस ज़माने में सरकारी तंबोली भी होते थे। इंदौर के व्यस्ततम कोठारी मार्केट के सामने सरकारी तंबोली का प्रतिष्ठान आज भी इसका गवाह है। नुक्कड़ सीरियल के चौरसिया के विपरीत यहां का वातावरण शांत रहता है। सामने के छायादार वृक्ष पर लटकी एक पानी की छागल, आज भी आगंतुकों की प्यास बुझाती है।
पान, न तो जल्दी में लगाया जाता है, और न ही फुर्ती से खाया जाता है। शादी विवाह में हल्दी की रस्म की तरह ही, एक पान की रस्म भी होती है। जब दूल्हे राजा घोड़ी पर सवार होते हैं, तो उनके मुंह में पान अवश्य ठूंसा जाता है। हर शुभ कार्य, मुख शुद्धि से होता है।।
जो पान के शौकीन हैं, उनके पान की दुकानें भी निश्चित होती हैं। वे सिर्फ जाकर खड़े हो जाते हैं, उनका पान बनता रहता है। मीठा पत्ता, सिकी बारीक सुपारी, सौंफ, इलायची, गुलकंद, खोपरा बूरा, और हां एक लौंग।
महिलाएं भी पान की शौकीन होती हैं। वे पान की दुकान पर जाकर खड़ी नहीं होती, उनके हिसाब का पान जाकर लाना पड़ता है। अक्सर चाय पान की पार्टियों में चाय बिस्किट ही देखने में आते हैं। पान नदारद रहता है।।
बड़े खेद का विषय है, शराब जैसी बुरी चीज पर बच्चन जी ने मधुशाला जैसी अमर रचना कर डाली, लेकिन पान जैसे सात्विक, नवाबी शौक को नजर अंदाज कर दिया। है कोई पान का लाल, जो पान पर अपनी कलम चलाकर पान को अमर कर डाले ?
© श्री प्रदीप शर्मा
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