हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 211 ☆ आलेख – फिटनेस जरूरी क्यों… ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेख – फिटनेस जरूरी क्यों

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 211 ☆  

? आलेख फिटनेस जरूरी क्यों?

कहा गया है कि धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब कुछ गया. यद्यपि यह उक्ति चरित्र के महत्व को प्रतिपादित करते हुये कही गई है किन्तु इसमें कही गई बात कि “स्वास्थ्य गया तो कुछ गया” रेखांकित करने योग्य है. हमारा शरीर ही वह माध्यम है जो जीवन के उद्देश्य निष्पादित करने का साधन है. स्वस्थ्य तन में ही स्वस्थ्य मन का निवास होता है. और निश्चिंत मन से ही हम जीवन में कुछ अच्छा कर सकते हैं.

कला और साहित्य मन की अभिव्यक्ति के परिणाम ही हैं. स्वास्थ्य और साहित्य का आपस में गहरा संबंध होता है. स्वस्थ साहित्य समाज को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका अदा करता है. साहित्य में समाज का व्यापक हित सन्नहित होना वांछित है. और समाज में स्वास्थ्य चेतना जागृत बनी रहे इसके लिये निरंतर सद्साहित्य का सृजन, पठन पाठन, संगीत, नाटक, फिल्म, मूर्ति कला, पेंटिंग आदि कलाओ में हमें स्वास्थ्य विषयक कृतियां देखने सुनने को मिलती हैं. यही नहीं नवीनतम विज्ञान के अनुसार मनोरोगों के निदान में कला चिकित्सा का उपयोग बहुतायत से किया जा रहा है. व्यक्ति की कलात्मक अभिव्यक्ति के जरिये मनोचिकित्सक द्वारा विश्लेषण किये जाते हैं और उससे उसके मनोभाव समझे जाते हैं. बच्चों के विकास में कागज के विभिन्न आर्ट ओरोगामी, पेंटिग, मूर्ति कला, आदि का बहुत योगदान होता है.

स्वास्थ्य दर्पण, आरोग्य, आयुष, निरोगधाम, आदि अनेकानेक पत्रिकायें बुक स्टाल्स पर सहज ही मिल जाती हैं. फिल्में, टी वी और रेडियो ऐसे कला माध्यम है जिनकी बदौलत साहित्य और कला का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है.

जाने कितनी ही उल्लेखनीय हिन्दी फिल्में हैं जिनमें रोग विशेष को कथानक बनाया गया है. अपेक्षाकृत उपेक्षित अनेक बीमारियों के विषय में जनमानस की स्वास्थ्य चेतना जगाने में फिल्मों का योगदान अप्रतिम है.

फिटनेस उपकरणों, प्रोटीन, दवाओ, और नेचुरोपैथी, योग, जागिंग, जिम पर जनता करोड़ो रूपए प्रति वर्ष खर्च कर रही है, योग को वैश्विक मान्यता मिली है.

ये सब खान पान रहन सहन आखिर जन सामान्य में लोकप्रिय क्यों है? इसका कारण मात्र यही है की कहीं न कहीं हम सब फिटनेस का महत्व समझते हैं. भले ही आलस्य, समय की कमी या रुपए कमाने की व्यस्तता में हम फिटनेस प्रोग्राम को कल पर टालने की कोशिश करते हैं, क्योंकि शारीरिक मेहनत हमे सहज पसंद नही आती, उसकी जगह हम कोई रेडीमेड फार्मूला चाहते हैं जो हमे तन मन से फिट बनाए रखे. किंतु इस सत्य को स्वीकार कर लेने में ही भलाई है कि फिटनेस का कोई शॉर्ट कट नहीं होता, यह एक नियमित प्रक्रिया है जिसे दिनचर्या का हिस्सा बना लेने में ही भलाई है. स्वस्थ्य रहें, सबल बने, जीवन के हर मैदान में फिट रहें हिट रहें. निरोगी काया के प्रति जागरूख रहें, घर परिवार बच्चों अपने परिवेश में स्वच्छता, खान पान, लिविंग में फिटनेस का वातावरण सृजित बनाए रखें और चमत्कार देखें चिकत्सा में व्यय बचेगा, जीवन में सकारात्मक वैचारिक परिपक्वता के दृष्टिकोण से नौकरी, व्यवसाय, समाज में व्यवहारिक सफलता मिलेगी.

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 65 – किस्साये तालघाट… भाग – 3 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज प्रस्तुत है आपके एक विचारणीय आलेख  “किस्साये तालघाट…“ श्रृंखला की अगली कड़ी।)   

☆ आलेख # 65 – किस्साये तालघाट – भाग – 3 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

शाखा में मंगलवार का प्रारंभ तो शुभता लेकर आया पर उनको लेकर नहीं आया जिनसे काउंटर शोभायमान होते हैं. मौसम गर्मियों का था और बैंकिंग हॉल किसी सुपरहिट फिल्म के फर्स्ट डे फर्स्ट शो की भीड़ से मुकाबला कर रहा था. ये स्थिति रोज नहीं बनती पर बस/ट्रेन के लेट होने की स्थिति में और बैंकिंग केलैंडर के विशेष दिनों में होती है. जब भी ब्रेक के बाद बैंक खुलते हैं तो आने वाले कस्टमर्स हमेशा यह एहसास दिलाते हैं कि बैंक उनके लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने हमारे लिए. यह महत्वपूर्ण होना ही कस्टमर्स का, विशेषकर ग्रामीण और अर्धशहरीय क्षेत्रों के कस्टमर्स का, हमसे अपेक्षाओं का सृजन करता है. विपरीत परिस्थितियों को पारकर या उनपर विजय कर कस्टमर्स की भीड़ को देखते देखते विरल करने की कला से हमारे बैंक के कर्मवीर सिद्धहस्त हैं और जब शाखाप्रबंधक अपने चैंबर से बाहर निकलकर इस रणभूमि में पदार्पण करते हैं तो शाखा की आर्मी का उत्साह और गति दोनों कई गुना बढ़ जाती है.

शाखा प्रबंधक जी के बैंकीय संस्कारों में भी यही गुण था और उस पर उनकी धार्मिकता से जड़ित सज्जनता ने इस विषम स्थिति पर बहुत शालीन और वीरतापूर्ण ढंग से विजय पाई. बस/ट्रेन के लेट आने पर देर से आने वाले भी इस संग्राम में चुपचाप जुड़ गये और अपने दर्शकों याने कस्टमर्स के सामने बेहतरीन टीमवर्क का उदाहरण पेश किया. कुछ कस्टमर्स की प्रतिक्रिया बड़े काम की थी “कि माना कि शुरुआत में परेशान थे पर “बिना लटकाये, टरकाये, रिश्वतखोरी” के हमारा काम हो गया. बहुत बड़ी बात यह भी रही कि इन बैंक के कर्मवीरों में इस प्रक्रिया में पद, कैडर, मनमुटाव, व्यक्तिगत श्रेष्ठता कहीं नजर नहीं आ रही थी. बैंक में आये लोगों के काम को निपटाने की भावना नीचे से ऊपर तक एक सुर में ध्वनित हो रही थी और यह भेद करना मुश्किल था कि कौन मैनेजर है और कौन मेसेंजर. जिनका बैंक में पदार्पण के साथ ही कस्टमर्स की भीड़ से सामना होता है, वो ऐसी विषम स्थितियों से घबराते नहीं है बल्कि अपने साहस, कार्यक्षमता, हाजिरजवाबी और चुटीलेपन से तनाव को आनंद में बदल देते हैं. इसमें वही शाखा प्रबंधक सफल होते हैं जो अपने कक्ष में कैद न होकर बैंकिंग हॉल की रणभूमि में साथ खड़े होते हैं. जैसा कि परिपाटी थी, विषमता से भरे इस दिन की समाप्ति सामूहिक और विशिष्ट लंच से हुई जिसने “बैंक ही परिवार है” की सामूहिक चेतना को सुदृढ़ किया. हम सभी लोग जो हमारे बैंक में होने की पहचान लिये हुये हैं, सौभाग्यशाली हैं कि हमारे पास कभी दो परिवार हुआ करते थे एक घर पर और दूसरा बैंक में. हालांकि अंतर सिर्फ घरवाली का ही होता था पर बहुत सारी घटनाएं हैं जब बैंक के मधुर रिश्तों ने घर संसार भी बसाये हैं.

नोट: किस्साये चाकघाट जारी रहेगा क्योंकि यही हमारी मूलभूत पहचान है. राजनीति, धर्म और आंचलिकता हमें विभाजित नहीं कर सकती क्योंकि हमें बैंक ने अपने फेविकॉल से जोड़ा है.

यात्रा जारी रहेगी.

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 33 – देश-परदेश – हमारा गुरुद्वारा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 33 ☆ देश-परदेश – हमारा गुरुद्वारा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज विदेश में प्रातः भ्रमण के समय एक गुरुद्वारे के दर्शन हो गए। हमारी खुशी का ठिकाना ना रहा, मानो कोई साक्षात भगवान के दर्शन हो गए।

करीब बीस एकड़ भूमि में बने गुरुद्वारे में प्रवेश किया, तो वहां एकदम शांति थी। छोटे से कस्बे मिलिस जिला मैसाचुसेट्स जो कि अमेरिका के पूर्वी भाग में स्थित हैं। आस पास लोगों के घर हैं, कोई भारतीय निवासी भी नहीं दिख रहा था।

एक अंग्रेज़ सी दिखने वाली महिला ने अपना भारतीय मूल का नाम जिसमें कौर भी शामिल था, परिचय दिया। वो मूलतः फ्रांस देश से हैं।

गुरुग्रंथ साहब को सम्मान पूर्वक माथा टेकने के पश्चात, महिला से थोड़ी देर गुरुद्वारे की जानकारी ली।

गुरुद्वारे का संबंध “मेरिकन सिख” से हैं। इस देश में करीब सौ वर्ष पूर्व कुछ सिख परिवार इस देश में रच बस गए हैं। हमारी जानकारी में तो इंग्लैंड, कनाडा और अफगानिस्तान में ही सिख समुदाय के लोग बहुतायत से रहते है। अमेरिका में भी सात लाख के करीब सिख बंधु रहते हैं।

ये लोग योग और कुंडलिनी से संबंधित ऑनलाइन शिक्षा देते हैं। वो बात अलग है, कुछ फर्जी प्रकार के कुंडलिनी योग भी अमेरिका में पैसा कमाने का साधन बने हुए हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी ⇒ नफ़रत का दरिया … ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नफ़रत का दरिया ।)  

? अभी अभी ⇒ नफ़रत का दरिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

किसी सयाने ने कहा, नेकी कर, दरिया में डाल, हमें कहां नेकी का अचार डालना था, पूरी की पूरी नेकी, दरिया में डाल दी।

लोग जैसे बहती गंगा में हाथ धोते हैं, लोगों ने लगे हाथ नेकी के दरिये में भी डुबकी मार ली। गंगा ने सारे पाप धो दिए, घर बैठे नेकी भी बिना कौड़ी खर्च किए चली आई। इसे कहते हैं, मुफ्त का सच्चा सौदा।

उधर हम नेक दिल, अपनी नेकी मुफ्त में ही दरिया में बहा आए, तो हमारे पास क्या बचा, बाबा जी का ठुल्लू ! बड़े दरियादिल बने फिरते थे, नेकी के जाते ही संगदिल बन बैठे। ।

जिस तरह खाली दिमाग शैतान का घर होता है, अगर दिल से नेकी निकल जाए तो क्या बचेगा

उसमें नफरत के सिवाय। नेकी के कारण जो दिल दरिया था, नेकी के जाते ही नफरत का समंदर हो गया। आपने सुना नहीं ;

मुखड़ा क्या देखे दर्पण में।

तेरे दया धरम नहीं मन में ..

ये दया धरम का ही तो नाम नेकी है, आखिर और क्या है नेकी। जब हम धरम की बात करते हैं, तो यह वह धर्म नहीं है, जिस धर्म की ध्वजा फहराई जाती है, और उसका गुणगान किया जाता है, यह साधारण सा, आम आदमी वाला, ईमान धरम है, जो किसी जात पांत और हिंदू मुस्लिम के धर्म को नहीं मानता, सिर्फ इंसानियत के धर्म को मानता है।

जहां ईमान है, वहीं तो धरम है। यारी है ईमान मेरा, यार मेरी बंदगी। जब हम गंगा को मैला होने से नहीं बचा पाए, तो यह नेकी का दरिया क्या चीज है। जिस तरह मन चंगा तो कठौती में गंगा, उसी प्रकार हमारे अंदर अगर नेकी है, तो कभी हमारे दिल में नफरत प्रवेश कर ही नहीं सकती। ।

चारों ओर नेकी ही तो बह रही है। नेक बनाने के भी कई मेक बाजार में उपलब्ध हैं आजकल। गुरुकुल, कॉन्वेंट, सभी नेक बालकों का ही सांदीपनी आश्रम है। सुदामा और कृष्ण दोनों यहीं के रिटर्न हैं। जरा नेकी के दरिये तो देखें, शिक्षक, चिकित्सक, व्यापारी, उधोगपति, वकील, नेता और समाज सुधारक। कितनी नेकी फैल रही है इस देश में, फिर यह नफरत की बू कहां से आ रही है।

नेकी को व्यर्थ दरिया में ना बहाएं, बस नेकदिल बने रहें, तो हर दिल एक मंदर होगा, हर इंसान नेकी का समंदर होगा, नफरत का कहीं नामोनिशान ना होगा ..!!

    ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 189 ☆ परिदृश्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 189 परिदृश्य ?

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।

अर्थात ‘न ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा ये सारे राजा नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।’

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के द्वादशवें श्लोक के माध्यम से आया यह योगेश्वर उवाच मनुष्य जीवन के शोध और सरल बोध का पाथेय है। 

मनुष्य जीवन यद्यपि सहजता और सरलता का चित्र है पर मनुष्य विचित्र है। वह सरल को जटिल बनाने पर तुला है। इस सत्य के अवलोकन के लिए किसी प्रकार के प्रज्ञाचक्षु की आवश्यकता नहीं है। जीवन का अपना अनुभव पर्याप्त है। केवल अपने अनुभव  को पढ़ा जाय, अपने अनुभव को गुना जाय तो प्रकृति की सरलता में विद्यमान गूढ़ रहस्य सहज ही सुलझने होने लगते हैं।

एक उदाहरण मृत्यु का लें। मृत्यु अर्थात देह से चेतन तत्व का विलुप्त होना। कभी ग़ौर किया कि किसी एक पार्थिव के विलुप्त होने पर एक अथवा एकाधिक निकटवर्ती मानो उसका ही प्रतिबिम्ब बन जाता है। कई बार अलग-अलग परिजनों में दिवंगत के स्वभाव, शैली, व्यक्तित्व का अंश दिखने लगता है।

“इसका चेहरा दिवंगत जैसा दिखता है। वह दिवंगत की तरह बातें करता है, हँसता है, नाराज़ होता है। उसकी लिखाई दिवंगत जैसी है, वह उठता-बैठता स्वर्गीय जैसा है।”  ऐसा नहीं है कि ये बातें केवल मनुष्य तक सीमित हैं। देखें तो पक्षियों और प्राणियों पर, चर और अचर पर भी लागू है यह सूत्र। 

विज्ञान इसे डीएनए का प्रभाव जानता है, अध्यात्म इसे अमरता का सिद्धांत मानता है।

सत्य यही है कि जानेवाला कहीं नहीं जाता पर किसी एक या अनेक में बँटकर यहीं विद्यमान रहता है। विचार करने पर पाओगे कि विधाता ने तुम्हें सूक्ष्म की अमरता दी है पर तुम स्थूल की नश्वरता तक सीमित रह जाते हो। अपनी रचना ‘सुदर्शन’ में इस अमरता को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया था,

जब नहीं रहूँगा मैं

और बची रहेगी सिर्फ़ देह,

उसने सोचा….,

सदा बचा रहूँगा मैं

और कभी-कभार नहीं रहेगी देह,

उसने दोबारा सोचा…,

पहले से दूसरे विचार तक

पड़ाव पहुँचा,

उसका जीवन बदल गया…,

दर्शन क्या बदला,

जो नश्वर था कल तक,

आज ईश्वर हो गया..!

स्मरण रहे, जब कोई एक होता अदृश्य है तो दूसरा हो जाता उसके सदृश्य है। हर ओर यही दृश्य है, जगत का यही परिदृश्य है।…इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्री हनुमान साधना 🕉️

💥 अवधि – 6 अप्रैल 2023 से 19 मई 2023 तक 💥

💥 इस साधना में हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमनाष्टक का कम से एक पाठ अवश्य करें। आत्म-परिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही 💥

💥 आपदां अपहर्तारं साधना श्रीरामनवमी अर्थात 30 मार्च को संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र सूचित की जावेगी।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी ⇒ एक चतुर नार… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक चतुर नार”।)  

? अभी अभी ⇒ एक चतुर नार? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

पुरुष के कई प्रकार हो सकते हैं लेकिन नारी के मेरी दृष्टि में केवल दो प्रकार ही होते हैं। एक सीधी सादी महिला और एक समझदार महिला। जो समझदार होता है, उसे चतुर कहते हैं। चतुर होना और सीधा होना, दोनों मानवीय गुण हैं।

सन् 1968 में एक हास्य प्रधान फिल्म आई थी, पड़ोसन जिसकी नायिका एक चतुर नार थी और नायक एक भोला भाला इंसान।

वो लड़की बिंदु थी, और वो लड़का भोला था और एक संगीत मास्टर बिंदु को संगीत सिखाने आते थे, लेकिन सिखाते कुछ और ही थे। ।

बिंदु नायिका का नाम था। बिंदु की मां को बिंदु की शादी की बड़ी चिंता रहती थी, जब कि बिंदु के पिताजी का कहना था, जब जब जो जो होना होता है, तब तब सो सो होता है, बिंदु की मां।

इसी फिल्म का एक लोकप्रिय गीत था, एक चतुर नार बड़ी होशियार ! क्या नारी ही चतुर होती है, पुरुष नहीं होता ? शास्त्रों में चतुर शब्द का अर्थ बुद्धिमान और प्रज्ञा वान भी बताया गया है। गीतकार प्रदीप फिर भी कह गए हैं, कोई लाख करे चतुराई, करम का लेख मिटे ना रे मेरे भाई। ।

आप मानें या ना मानें, पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक चतुर और समझदार होती हैं। वे घर की मालकिन भी हैं और अन्नपूर्णा भी। उनसे ही घर घर कहलाया। बहुत कम घर ऐसे होंगे जहां चूड़ियों की खनक ना हो, फिर भी रौनक हो। घर के बर्तनों की आवाज़ में जब किसी किसी समझदार महिला की आवाज़ शामिल होती है, तब ही मेहमान समझ जाता है, बस अब चाय और नाश्ते की ट्रे आई ही आई।

अगर औरत चतुर ना हो, तो पुरुष घर का तो कबाड़ा ही कर डाले। पाई पाई कैसे बचाई जाती है, काम वाली बाई से कैसे काम लिया जाता है, सब्जी वाले से कितना मोल भाव किया जाता है, यह सब पुरुषों का विभाग है ही नहीं। सुनो, पेपर वाला आया है, उसका हिसाब कर दो। और पेपर वाला भी समझ जाता है, घर के कैलेंडर में दूध वाले के साथ उसका भी हिसाब होना है। मजाल है एक भी नागा छूट जाए। ।

हमारे बोलचाल की भाषा में ऐसे गुणी लोगों को चतरा और चतरी कहते हैं। जिस घर में पुरुष सीधा है वहां महिला का तेज तर्रार होना बहुत ज़रूरी है। क्या बात है, आज बाई साब नहीं हैं, मायके गई हैं, अच्छा इसीलिए शांति है। और पुरुष घर में हो, ना हो, क्या फर्क पड़ता है। होगा कहीं किताबों, अथवा टीवी न्यूज के बीच।

जो पुरुष चतरे होते हैं उन्हें सयाना नहीं श्याणा कहते हैं। अधिक शंकालु एवं कंजूस किस्म के लोग होते हैं ये। फिर भी समय हमें सावधान तो करता ही रहता है। आज जब कोरोना का प्रकोप जारी है, सावधानी और चतुराई में ही समझदारी है। व्यवहार में और अधिक संयत और सतर्क रहना जरूरी है। ।

आज मानवीय रिश्ते दांव पर लगे हुए हैं। भलमनसाहत और सीधा पन अभिशाप बन चुका है। केवल अपना हित साधना ही समय की मांग है। किसी को गले लगाना, पास बिठाना, सुख दुख की बात करना, मानो एक सपना था। अब टूट गया है। टूट गई है माला, मोती बिखर गए। दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गए।

इतनी भयानक त्रासदी के बीच भी लोगों का राग द्वेष कम नहीं हो रहा। स्वार्थ और लालच बढ़ता ही जा रहा है। क्या इंसान वाकई ज़्यादा चतुर हो गया है। इसे केवल समय की दोहरी मार ही कहा जा सकता है। ।

 हम चतरे भले ही नहीं, लेकिन आज मजबूर हैं, असहाय हैं, दिल टूटा है फिर भी, मत कहिए किसी को ;

पास बैठो, तबियत बहल जाएगी

मौत भी आ गई हो, तो टल जाएगी।

कुछ इस तरह की चतुराई ईश्वर ना करे, शायद हमें भी दिखानी पड़े ;

दूर रहकर ही करो बात

करीब ना आओ।

हो सके तो अब फोन पर ही बतियाओ। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी ⇒ हास्य और व्यंग्य… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हास्य और व्यंग्य।)  

? अभी अभी ⇒ हास्य और व्यंग्य? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हास्य, हंसने की चीज है, व्यंग्य समझने की चीज है। किसी बात को बिना समझे भी हंसा जा सकता है, और किसी बात को समझने के बाद हंसी गायब भी हो सकती है। यूं तो हास्य और व्यंग्य का चोली दामन का साथ है लेकिन अगर अंडे मुर्गी की तरह पूछा जाए कि पहले हास्य आया या व्यंग्य, तो शायद हास्य ही बाज़ी मार ले जाए।

व्यंग्य को बुरा भी लग सकता है कि जीवन में हास्य को व्यंग्य से अधिक महत्व  क्यों दिया गया है। जिस प्रकार हास्य और व्यंग्य की जोड़ी है, वैसे ही हंसी और खुशी की भी जोड़ी है। अगर आप हंस रहे हैं और खुश नहीं हैं, तो यह फीकी हंसी है। इसी तरह जो व्यंग्य आपमें निराशा अथवा अवसाद की उत्पत्ति करे, वह भी व्यंग्य नहीं है। सकारात्मकता हास्य और व्यंग्य दोनों के आवश्यक तत्व हैं। हास्य अगर आपको हंसा सकता है तो व्यंग्य आपको गुदगुदा भी  सकता है और चिकौटी भी काट सकता है, लेकिन आपको आहत नहीं कर सकता, आपकी आत्मा को कष्ट नहीं पहुंचा सकता। ।

एक नवजात शिशु, अपनी मां के पास लेटा है। रात का वक्त है, मां गहरी नींद में सो रही है। अचानक बालक की आंख खुलती है, उसके शरीर में हलचल होती है। उसने बाबा रामदेव का न तो नाम सुना है और न ही कोई योग की ट्रेनिंग ली है। कुछ ही समय में वह उघाड़ा पड़ा हुआ, हाथ पांव चला चलाकर व्यायाम कर रहा है और ज़ोर ज़ोर से किलकारी मार रहा है।

मां की नींद खुलती है, किंकर्तव्यविमूढ़ हो वह उसे प्यार से अपने आंचल में छुपा लेती है। इस किलकारी का कोई मोल नहीं। हास्य और व्यंग्य इसके आगे पानी भरते हैं।

अक्सर बच्चे बात बात पर ताली बजाकर हंसते रहते हैं। उनका हंसना, खिलखिलाना, एक कली का मुस्कुराना है, एक फूल का खिलना है। बच्चों में ज़िन्दगी की सुबह है, बुढ़ापे में ज़िन्दगी की शाम है। अगर जीवन में हास्य बोध है तो ज़िन्दगी की शाम भी रंगीन है। ।

किसी पर हंसना अथवा किसी का अपमान करना या उस पर ताने कसना , न तो हास्य की श्रेणी में आता है और न ही व्यंग्य की श्रेणी में। नवरस में हास्य को भी रस माना गया है। विसंगति में भी रस की निष्पत्ति जहां है, वह व्यंग्य है। व्यंग्य एक साहित्यिक विधा है, हास्य , एक स्वस्थ जीवन का निचोड़ है।

अपने कई हास्य फिल्म देखी होगी। व्यंग्य फिल्माया नहीं जा सकता। सिनेमा और नाटक में हास्य कलाकार और विदूषक होते हैं, व्यंग्य कलाकार नहीं। पंच मारा जा सकता है। पंच पर भी ताली ठोकी जा सकती है।

हास्य को अंग्रेजी में laughter कहते हैं। एक कहावत भी है – Laughter is the best medicine. अनावश्यक हंसना अथवा मौके की नज़ाकत को देखे बिना हंसना, पागलपन की निशानी है। जीवन में हास्य बोध होना बहुत ज़रूरी है। जिन लोगों में sense of humour नहीं है, लोग उनसे दूर रहना ही पसंद करते हैं। क्या भरोसा, कब खसक जाए। ।

जब भी व्यंग्य की चर्चा होगी, कबीर को अवश्य याद किया जाएगा। सहज शब्दों में गूढ़ार्थ एवं शब्दों की मार एक साथ और कहीं देखने को नहीं मिलती। धार्मिक पाखंड और अंध विश्वास पर मुगल शासन में प्रहार कोई जुलाहा ही कर सकता है। काहे का ताना, काहे का बाना। समाज की विसंगतियां ही व्यंग्य को समृद्ध करती हैं। कांग्रेस का कुशासन व्यंग्य के लिए वरदान सिद्ध हुआ। अब सुशासन में व्यंग्य चुभने लगा है। हास्य बोध का स्थान आक्रोश और क्रोध ने ले लिया है। व्यंग्यकार को सकारात्मक व्यंग्य की ऐसी  विधा तलाशनी पड़ेगी जो सत्ता को भी नाखुश ना करे।

अभी कुछ दिन पहले कपिल के कॉमेडी शो पर अनुपम खेर और सतीश कौशिक का पदार्पण हुआ। क्या हंसी के ठहाके लगे हैं, दोस्ती दुश्मनी की मीठी यादों की चाशनी में सराबोर, दोनों कलाकारों ने ऐसा समां बांधा कि लगा बहुत दिनों बाद कोई अच्छा प्रोग्राम देखने को मिला है। अपनी असफलताओं पर हंसना कोई सतीश कौशिक से सीखे।

खुद पर हंसना श्रेष्ठ है। मिल जुलकर हंसना स्वस्थ रहने की निशानी है। विकृत राजनीति के चलते हंसी खुशी का स्थान निंदा स्तुति ने ले लिया है। जब आप साल भर बुरा मानते रहे हैं, तो होली पर बुरा न मानो होली है, का भी क्या औचित्य ? किलकारी न सही, कहकहे तो लग सकते हैं, खुले मन से अट्टहास तो किया जा सकता है। हास परिहास ही जीवन है। किसने कहा, हंसना मना है। ।

    ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #181 ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 181 ☆

☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब 

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रहता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं करते हैं, उल्लसित करते हैं और वह उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उसके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों के सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या और  मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ जहान से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक रह पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ एकांत में रहने की सीख देती हैं। जो स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है, भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में उलझा रहता है।

जो हमारे पास है; लाजवाब है, परंतु बावरा इंसान इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो भी मिला है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब रोगों  का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश  में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए, ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’

हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने और दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदारर निभाते हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखिए; सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन मे ं इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण होता है, रामायण होती है और जहाल इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त होती है, महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना चाहिए; सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था। हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए हमें स्वार्थ को तजकर,जो हमें मिला है, उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गा त की पंक्तियों से समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते है/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे। जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं है, वह ख़्वाब है;  जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं, निरंतर कर्मरत रहें, कभी पराजय स्वीकार न करें।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी ⇒ अंगूठे का कमाल… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंगूठे का कमाल”।)  

? अभी अभी ⇒ अंगूठे का कमाल? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

अंगूठी उंगलियों में शोभा देती है, अंगूठे में नहीं। कहने को हमारे हाथों में पांच पांच उंगलियां हैं, लेकिन उंगली, उंगली है और अंगूठा, अंगूठा। जब यह किसी कागज़ पर लगाया जाता है तब तो अंगूठा निशानी बन जाता है, लेकिन जब किसी को दिखाया जाता है, तो ठेंगा कहलाता है।

बड़े मोटे होते हैं ये अंगूठे, चाहे हाथ के हों, या दोनों पांव के। पतली पतली नाजुक उंगलियों की तुलना में आप इन्हें, मोटा

हाथी भी कह सकते हैं। बचपन में हमारा शरीर इतना लचीला होता है कि एक नन्हा सा बालक हाथ का ही नहीं, अपने दोनों पांवों का अंगूठा भी आसानी से चूस सकता है। ऐसा क्या है इस अंगूठे में, कि कुछ बच्चे पेट भरने के बाद भी अंगूठा ही चूसा करते हैं। अंगूठा, हमारे जमाने की चुस्की था। कोई हमें क्या बहलाएगा, हमारा अंगूठा ही हमारे काम आएगा। ।

निरक्षर को बोलचाल की भाषा में अंगूठा छाप कहते हैं। जहां पढ़े लिखे अपने हस्ताक्षर छोड़ते हैं, वहां एक अनपढ़ बड़े आत्म विश्वास के साथ, अपना अंगूठा निशानी छोड़ जाता है। जब वे इस संसार से गए, तो अपने बाद, कई कानूनी कागजों और दस्तावेजों पर अपने अंगूठे की छाप छोड़ गए।

साक्षरता अभियान में हमारे कई अनपढ़ लोगों ने अपने हस्ताक्षर करना सीख लिया। अब रामप्रसाद गर्व से अपने हस्ताक्षर करता है, अंगूठा नहीं लगाता। वैसे उसके लिए आज भी काला अक्षर भैंस बराबर ही है। उसका आज भी यही मानना है, कि ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय, जब कि रामप्रसाद तो ढाई नहीं, पांच अक्षर लिख और बांच सकता है, तो क्या वह महा पंडित नहीं हुआ। ।

हमारा केरल प्रदेश सौ प्रतिशत साक्षर है, लेकिन वहां के पढ़े लिखे लोगों को नौकरी करने अन्य प्रदेशों में जाना पड़ता है, जहां आज भी गांव गांव में आंगनवाड़ी और प्रौढ़ शिक्षा अभियान जारी है। आज भी याद आता है, अटल जी का आव्हान, चलो इस्कूल चलें। कितना ठंडा ठंडा, कूल कूल, हमारा स्कूल।

द्वापर युग में ही कौरव पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य, अंगूठे का महत्व जान गए थे, तभी तो अपने ऑनलाइन शिष्य एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांग लिया। ये अंगूठा मुझे दे दे, सत् शिष्य ! कोई आज का शिष्य होता तो अपने गुरु को अंगूठा दिखा देता, अब तो गुरुजी सरकार तो मुझे स्कॉलरशिप दे रही है, और आपको दो कौड़ी की तनख्वाह। जाओ, कहीं और ट्यूशन करो। ।

जब से हमारा देश पेपर करेंसी से मुक्त हुआ है, वह पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। कागज की महत्ता को देखते हुए, सभी शासकीय और अर्ध शासकीय कामकाज, पेपरलेस होते चले जा रहे हैं। दफ्तरों में हाजरी रजिस्टर नहीं, ई – हस्ताक्षर किए जा रहे हैं। संचार क्रांति आजकल डिजिटल क्रांति बन चुकी है।

हमने भी कब से कागज पत्तर और कलम दवात का मोह छोड़ दिया है। आज हमारे हाथ में भी स्मार्ट एंड्रॉयड फोन, लैपटॉप, डेस्क टॉप और कंप्यूटर है। लेकिन हम इतने लालची नहीं ! आज भी एक अदद 4-G एंड्रॉयड फोन से हम सभी लिखा पढ़ी, चिट्ठी पत्री और चैटिंग सफलतापूर्वक संपन्न कर लेते हैं, और इसमें हमारा एकमात्र सहारा और सहयोगी होता है, हमारा मात्र अंगूठा। ।

कभी जब हमारी उंगलियां टाइपराइटर पर चलती थी, तो दसों उंगलियों को रोजगार मिल जाता था। हम जब टाइप करते थे, तो लगता था, हम कोई हरमुनिया बजा रहे हैं। सारेगम, पधनीसा की जगह हमारा हिंदी कीबोर्ड होता था, बकमानजन, सपिवप।

अंग्रेजी कीबोर्ड आज भी यूनिवर्सल है, asdfg, hjkl इत्यादि इत्यादि।

अब मात्र चार अंगुल का तो हमारा एंड्रॉयड फोन का की -बोर्ड, कहां कहां उंगली रखी जाए ? आपको आश्चर्य होगा, हमारा केवल अंगूठा किस खूबी और दक्षता से पूरा की बोर्ड चला लेता है। एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ का केवल अंगूठा ही यह अभी अभी रोज इसी तरह आपकी सेवा में प्रस्तुत करता चला आ रहा है। मुझे नहीं पता, आप कौन से कर कमल से यह कार्य निष्पादित करते हैं। ।

मेरे मन मस्तिष्क ने महर्षि वेद व्यास की तरह, मेरे अंगुष्ठ रूपी श्रीगणेश को, विचारों की श्रृंखला को, एक कड़ी में पिरोकर, अग्रेषित किया और हमारे अंगुष्ठ महाराज, गणेश जी की तरह, फोन के की बोर्ड पर, उसे यथावत उतारते चले गए। इसमें हमारे अथवा मेरे मैं का कोई योगदान नहीं।

तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। यह सिर्फ हमारे अंगूठे का कमाल है। अगर कुछ अच्छा है तो वह सब उसका है, अगर अच्छा नहीं, तो सब कुछ मेरा है।

थ्री चीयर्स एंड थम्स अप।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 147 ☆ शठे शाठ्यं समाचरेत्… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका कीhttps://e-abhivyakti.com/wp-admin/post.php?post=53412&action=edit# प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शठे शाठ्यं समाचरेत्…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 147 ☆

☆ शठे शाठ्यं समाचरेत्

अक्सर लोग शीर्ष पर पहुँचने की चाहत में अपनों का साथ खो देते हैं, और जब उल्लास का समय आता है तो बनावटी भीड़ इक्कठी करके उत्सव मनाने लगते हैं।

क्या आपने कभी गौर किया कि वास्तविक शुभचिंतक व अवसरवादी शुभचिंतक में क्या अंतर है। ऐसे लोग जो सामने कड़वा बोलकर रास्ता दिखाते हैं वे ही हमारा हित चाहते हैं। अतः ऐसे रास्तों का चुनाव करें जो सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास पर आधारित हो जिससे सबका कल्याण हो।

कहते हैं जैसी सोच होगी वैसे ही परिणाम मिलेंगे। हमेशा देखा जाता है कि सामान्य लोग कई बार ऐसे कार्य कर बैठते हैं, जो बड़े- बड़े लोगों द्वारा भी सम्भव नहीं होता। उसका कारण भाग्यशाली होना नहीं होता वरन ये सब उनकी इच्छा शक्ति का कमाल होता है, जो उन्होंने ऐसे विचारों को अपनाकर न केवल कल्पना के घोड़े दौड़ाए वरन उसे अमलीजामा भी पहनाया और समाज के प्रेरक बन कर उभरे।

किसी से सम्बन्ध बनाना जितना सरल होता है, उसका निर्वहन उतना ही कठिन होता है। हर मुद्दे पर सबकी राय एक नहीं हो सकती तब कार्य के दौरान खासकर प्रशासकीय कार्यों में मतभेद पनपने लगते हैं और गुटबाजी के रूप में लोग मजबूत व्यक्ति की ओर झुक जाते हैं जिसका असर सुखद नहीं होता है।कार्य की गुणवत्ता धीरे- धीरे कम होने लगती है। समय पास ही साधन और साध्य बनकर उभरता है।

कटु वचन और धूर्तता पूर्ण व्यवहार सबको समझ में आता है पर लोग विरोध नहीं करते क्योंकि वे सोचते हैं यदि मेरे साथ ऐसा होगा तब देखा जायेगा और इसी चक्रव्यूह में एक एक कर सारे सम्बन्ध दम तोड़ देते हैं। इस सम्बंध में संस्कृत की ये कहावत तर्क संगत प्रतीत होती है-

कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम्।

तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत् ॥

(विदुर नीति)

अर्थात जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो। खग जाने खग ही की भाषा। महाभारत इसी को आधार मानते हुए अधर्म पर धर्म का युद्ध था।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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